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कविता

थकीं पलकें सपनों पर डाल
महादेवी वर्मा


थकीं पलकें सपनों पर डाल
व्यथा में सोता हो आकाश,
छलकता जाता हो चुपचाप
बादलों के उर से अवसाद;
वेदना की वीणा पर देव
शून्य गाता हो नीरव राग,
मिलाकर निश्वासों के तार
गूँथती हो जब तारे रात;

उन्हीं तारक फूलों में देव
गूँथना मेरे पागल प्राण
हठीले मेरे छोटे प्राण !

किसी जीवन की मीठी याद
लुटाता हो मतवाला प्रात,
कली अलसाई आँखें खोल
सुनाती हो सपने की बात;
खोजते हों खोया उन्माद
मंद मलयानिल के उच्छवास,
माँगती हो आँसू के बिंदु
मूक फूलों की सोती प्यास;

पिला देना धीरे से देव
उसे मेरे आँसू सुकुमार
सजीले ये आँसू के हार !

मचलते उद्गारों से खेल
उलझते हों किरणों के जाल,
किसी की छूकर ठंडी साँस
सिहर जाती हों लहरें बाल;
चकित सा सूने में संसार
गिन रहा हो प्राणों के दाग,
सुनहली प्याली में दिनमान
किसी का पीता हो अनुराग;

ढाल देना उसमें अनजान
देव मेरा चिर संचित राग
अरे यह मेरा मादक राग !

मत्त हो स्वप्निल हाला ढाल
महानिद्रा में पारावार,
उसी की धड़कन में तूफान
मिलाता हो अपनी झंकार;
झकोरों से मोहक संदेश
कह रहा हो छाया का मौन,
सुप्त आहों का दीन विषाद
पूछता हो आता है कौन ?

बहा देना आकर चुपचाप
तभी यह मेरा जीवन फूल
सुभग मेरा मुरझाया फूल !
  
(नीहार से)
 


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