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कविता

शून्यता में निद्रा की बन
महादेवी वर्मा


शून्यता में निद्रा की बन,
उमड़ आते ज्यों स्वप्निल घन;
पूर्णता कलिका की सुकुमार,
छलक मधु में होती साकार;

हुआ त्यों सूनेपन का भान,
प्रथम किसके उर में अम्लान ?
और किस शिल्पी ने अनजान,
विश्व प्रतिमा कर दी निर्माण ?

काल सीमा के संगम पर,
मोम सी पीड़ा उज्ज्वल कर।
उसे पहनाई अवगुंठन,
हास औ’ रोदन से बुन-बुन !

कनक से दिन मोती सी रात,
सुनहली साँझ गुलाबी प्रात;
मिटाता रँगता बारंबार,
कौन जग का यह चित्राधार ?

शून्य नभ में तम का चुंबन,
जला देता असंख्य उडुगण;
बुझा क्यों उनको जाती मूक,
भोर ही उजियाले की फूँक?

रजतप्याले में निद्रा ढाल,
बाँट देती जो रजनी बाल;
उसे कलियों में आँसू घोल,
चुकाना पड़ता किसको मोल ?

पोंछती जब हौले से वात,
इधर निशि के आँसू अवदात;
उधर क्यों हँसता दिन का बाल,
अरुणिमा से रंजित कर गाल ?

कली पर अलि का पहला गान,
थिरकता जब बन मृदु मुस्कान,
विफल सपनों के हार पिघल,
ढुलकते क्यों रहते प्रतिपल ?

गुलालों से रवि का पथ लीप,
जला पश्चिम में पहला दीप,
विहँसती संध्या भरी सुहाग,
दृगों से झरता स्वर्ण पराग;

उसे तम की बढ़ एक झकोर,
उड़ा कर ले जाती किस ओर ?
अथक सुषमा का सृजन विनाश,
यही क्या जग का श्वासोच्छवास ?

किसी की व्यथासिक्त चितवन,
जगाती कण कण में स्पंदन;
गूँथ उनकी साँसों के गीत,
कौन रचता विराट संगीत ?

प्रलय बनकर किसका अनुताप,
डुबा जाता उसको चुपचाप,
आदि में छिप जाता अवसान,
अंत में बनता नव्य विधान;

सूत्र ही है क्या यह संसार,
गुँथे जिसमें सुख-दुख जयहार ?

(रश्मि से)
 


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