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कविता

मैं बनी मधुमास आली !
महादेवी वर्मा


मैं बनी मधुमास आली !

आज मधुर विषाद की घिर करुण आई यामिनी,
बरस सुधि के इंदु से छिटकी पुलक की चाँदनी
उमड़ आई री, दृगों में
सजनि, कालिंदी निराली !

रजत स्वप्नों में उदित अपलक विरल तारावली,
जाग सुक-पिक ने अचानक मदिर पंचम तान लीं;
बह चली निश्वास की मृदु
वात मलय-निकुंज-वाली !

सजल रोमों में बिछे है पाँवड़े मधुस्नात से,
आज जीवन के निमिष भी दूत हैं अज्ञात से;
क्या न अब प्रिय की बजेगी
मुरलिका मधुराग वाली ?

मैं बनी मधुमास आली !
 


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