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कविता

धूप सा तन दीप सी मैं
महादेवी वर्मा


धूप सा तन दीप सी मैं !

उड़ रहा नित एक सौरभ-धूम-लेखा में बिखर तन,
खो रहा निज को अथक आलोक-साँसों में पिघल मन
अश्रु से गीला सृजन-पल,
औ' विसर्जन पुलक-उज्ज्वल,
आ रही अविराम मिट मिट
स्वजन ओर समीप सी मैं !

सघन घन का चल तुरंगम चक्र झंझा के बनाए,
रश्मि विद्युत ले प्रलय-रथ पर भले तुम श्रांत आए,
पंथ में मृदु स्वेद-कण चुन,
छाँह से भर प्राण उन्मन,
तम-जलधि में नेह का मोती
रचूँगी सीप सी मैं !

धूप-सा तन दीप सी मैं !

(दीपशिखा से)
 


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