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कविता

बबूल
मंजूषा मन


मेरी खिड़की के पीछे
उग आया बबूल
जिसकी हर शाख
कँटीली ही सही
पर अपनेपन से भरी है।
इसे अपने साथ बड़ा होते
अपनी जड़ों पर खड़ा होते
देखा है मैंने।
जब-जब इस बबूल पर
पतझड़ आया,
और इसके नुकीले काँटों पर
यौवन छाया,
तब देखकर इसके काँटों को
सबका मन भर गया
अनजाने डर से,
तो लोग दूर हो गए
इस बबूल से,
तब मेरे दिल में
और उमड़ आया
इसके लिए प्रेम

क्योंकि
इस बनावट की दुनिया में
सभी ने
अपने कँटीलेपन को
छुपा लिया है कुशलता से
और ओढ़ ली
कोमलता की चादर
वे कहीं अधिक
लहूलुहान करते रहे
तन-मन को।
इन दोमुँहें लोगों से
कहीं प्यारा है मुझे
मेरा बबूल
जिसने अपने कँटीलेपन को
छुपाया नहीं
झूठे लोगों की तरह।
इसके कँटीलेपन में भी
एक कोमलता का अहसास है
अहसास है
सच्चे होने का।
 


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