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कविता

तुम्हारी यादें
मंजूषा मन


जंगल-सी घनी हैं तुम्हारी यादें
ऊँचे-ऊँचे पड़े सटकर खड़े हैं
बीच से गुजरती हवा
सरसराते पत्तों का शोर
सुकून देती शीतलता तुम्हारा स्पर्श...

पाँवों से उलझतीं लताएँ
तुम रोक रहे हो जाने से,
झाड़ियों में उलझता दामन
तुमने पकड़ लीं है बाँहें...
पपीहे की तान,
कोयल का गीत,
कानों को छूकर निकलती हवा
सीटियाँ-सी बजाती है
यूँ कि जैसे तुम गा रहे हो गीत
या धीरे से कानों में कह रहे हो
मन की बात...
 


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