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कविता

हमने दुर्गा बनते देखा
प्रदीप शुक्ल


कई बार
घर में अम्मा को
हमने दुर्गा बनते देखा

यों तो घर के
हर निर्णय में
उनकी सहमति ही रहती थी
बड़े बड़े झगड़ों में भी वो
अक्सर ही बस चुप रहती थीं
बच्चों के
भविष्य को लेकर
हमने उन्हें बिफरते देखा

वत्सलता तो
ऐसी जब तब
घंटों बछिया को दुलराएँ
कभी कभी तो उसे गाय का
पूरा पूरा दूध पिलाएँ
बैल कभी
उद्दंड हुए तो
उनको लट्ठ पकड़ते देखा
कई बार
घर में अम्मा को
हमने दुर्गा बनते देखा।
 


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