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कविता

फिर से माँ गरजी
प्रदीप शुक्ल


चार बज गए
दरवाजे की घंटी नहीं बजी
ढेरों काम
पड़े हैं घर में
नजर घड़ी पर लगी हुई है
धड़कन बढ़ती ही जाती है
जैसे जैसे बढ़ी सुई है
मोबाइल पर
रटा रटाया, "है नेटवर्क बिजी"

विद्यालय तो
बंद हो गया
था लगभग दो घंटे पहले
अखबारों में छपे हुए जो समाचार
पढ़ कर दिल दहले
आँखों में
आँसू की झिलमिल सेना दिखे सजी

और तभी
दरवाजे पर
दोपहिया रुकने की आहट है
दरवाजा खुलने तक मन में
जाने कितनी घबराहट है
मुस्काती बिटिया
पर देखो, फिर से माँ गरजी।
 


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