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कविता

सूर्य की आँखें तनी हैं
प्रदीप शुक्ल


गर्म है माहौल,
कितनी सनसनी है
कहीं छुप लो,
सूर्य की आँखें तनी हैं

बारजे में
धूप की
चिंगारियाँ फैली हुई हैं
डालियों की झुक गईं सब
उँगलियाँ मैली हुई हैं
पत्तियाँ भी
धूल में बिल्कुल सनी हैं

कहाँ तो
वादा यहाँ
पुरवाई का, मौसम से था
सुन रहे पर हम यहाँ
हर रोज ही पछुआ कथा
नीम आँगन में
जरा कुछ अनमनी है

लापता
सब हो गए
मेढक जो टर्राए अभी थे
गा न पाए,
झींगुरों के पास भी मौके सभी थे
एक दो की बात
किसने कब सुनी है?
गर्म है माहौल,
कितनी सनसनी है
कहीं छुप लो,
सूर्य की आँखें तनी हैं।
 


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