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कविता

बरवै
त्रिलोचन


उठे चले बइठे ओलरे हर दाइँ,
तोहरिन सुधि हमरे आपन कछु नाइँ।
तोहइँ देखि सब देखे देखेसि आँखि,
अब का देखे चित्त अधिक अभिलाखि।
काउ करी मन हम्मइँ दिह्याऽ अकेल,
मिला न एकर मेल खोइ गऽ खेल।
मतक जियावनि मुसकी देखि तोहारि,
बिसरी सम्मिइँ चोटि भूलि गइ हारि।
नित्तिमान भिनसारे उअइ अँजोर,
देखि-देखि देखवारे होइँ विभोर।
जेहि छन अपने ओप उषा सेन्हुराइ,
तेहि छन मंगल-गीत जागि उपराइ।
पिअरनाभ फूले-भरि सरसइ फूलि,
अपने रंगे बयारीं झलुआ झूलि।
नओ-नओ पल्लओ तामबरन विस्तार,
अमवा फगुने एतनइ किहेसि सिंगार।
बेझि के कहेसि पवन बसंत रितु आइ,
पीपर चिलबिल महुआ गये नँगाय।
डउँडी डउँगी महुआ उठा कुँचाइ,
रतिगर पाये फूल चुआवत जाइ।
अमिलतास कइ रंग सोनहुला झूल,
लरछा-लरछा लेसे कली कि फूल।
घेरइँ हेरइँ गरजइँ बरसइँ जाइँ,
बादर भुइँ कर ताप ताकि अफनाइँ।
बहइ बतास, मेघ झूमइ, बँसवारि,
जइसे परछन करइ उआरि-उआरि।
कोहरन भुइँ अउ बदरन भरा अकास,
पवन झकोरइ बिरवा बिरई घास।
बदरी ओरमी घेरि-घेरि बुनियानि,
फर्चं पात होइ गये अइस खेह धोवानि।
बरखा मऽ बोलइ अकास जिउ खोलि,
भुइँउ न पछरइ उछरइ बोलिनि बोलि।
लहलहाइ हरिअरी दहउ बुनिआइ,
बरखाँ भुइँ पहिरन पहिरइ चनिआइ।
पातिन कइ कस छूटि रंग फरचान,
भइ बूनिन से फूलन कइ पहिचान।
बरखा-जल पिइ सोरि-सोरि हुमसानि,
कल्ला-कल्ला धइ आभा अलगानि।
 


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