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कहानी

तीन बूढ़ों की हँसी
कैलाश चंद्र


बूढ़े संख्या में तीन थे। कॉलोनी से लगे पार्क में वे अक्सर दिख जाते थे। कॉलोनी बड़ी थी और उसके भीतर चार बिल्डिगें थीं। इस वजह से उन बूढ़ों के बीच पहचान का संकट था। उनको शायद केवल इतना पता होगा कि वे एक ही कॉलोनी के बाशिदें हैं। क्योंकि आते-जाते वे एक दूसरे को दिख जाते होंगे। वे तीनों थोड़े समय के अंतर से पार्क में आते थे। जाते भी अपनी इच्छानुसार आगे-पीछे। कोई पहले तो कोई थोड़ा बाद में। पार्क में एक साथ अथवा एक ही बेंच पर बैठे वे नहीं देखे गए। एक बूढ़ा जिस दिशा में कॉलोनी थी उस तरफ बैठता, दूसरा उस चौड़ी सड़क की ओर जो पार्क के समानांतर आगे सीधे कलेक्ट्रेट रोड से मिलती थी और तीसरा बूढ़ा पार्क के बड़े गेट की तरफ। उनका क्रम बदल भी जाता। बैंचें भी बदल जातीं थीं। हाँ एक बात तो तीनों में समान थी वह यह कि वे पार्क के उस तरफ वाले हिस्से में कभी नहीं बैठते थे जिस तरफ सघन झाड़ियाँ थीं। क्योंकि उस तरफ जवान लड़के-लड़कियाँ झाड़ियों में घुसे रहते थे। यह लड़के-लड़कियों का प्राईवेट सेक्टर जैसा था। यह उनका कोई सौजन्यता जैसा भाव नहीं था बल्कि एक भय था जो सिरज जाता था। एक दफा किसी बूढ़े को लड़के-लड़की के एक जोड़े ने उस तरफ से गेट तक खदेड़ दिया था। वह बूढ़ा अगर पकड़ में आ जाता तो शायद पिट भी जाता। हाँ कभी सौजन्यता सप्ताह मनाती नैतिकता ओढ़े पुलिस की वहाँ रेड पड़ती तो फिर वे आशिक मिजाज लड़के ही पिटते थे और साथ ही लड़की जलील होती थी।

एक बूढ़ा जिसका नाम जगन्नाथ त्यागी था पाँच साल पहले फूड एंड सिविल सप्लाई विभाग में इंस्पैक्टर के पद से रिटायर हुआ था और इस कॉलोनी जिसका नाम पंचशील था, उसके दाएँ कोने वाली पाँच मंजिली इमारत विवेचना के ग्राउंड फ्लोर के पीछे के फ्लैट में रहता था। जिसका नंबर ए/12 था। उसको सबसे पीछे का फ्लैट लेने की यह सुविधा मिली थी कि इमारत के पीछे छूटी जमीन उसके कब्जे में आई थी जिसको उसने दो तरफ से कँटीले तार से घिरवा लिया था। वहाँ पहले उसने एक छप्पर डाल कर एक गाय पाल ली थी। लेकिन शहर में भूसा बहुत महँगा हो गया था और आसानी से मिलता नहीं था। वह गाय को गाँव अपने छोटे भाई के पास छोड़ आया था। अब छप्पर हटा कर उसने वहाँ कुछ सब्जी उगा ली थी। उसके अनुसार शुद्ध सब्जी वह और उसका परिवार खा रहा था और काफी हद तक पैसों की बचत भी कर रहा था। उस वक्त सब्जियों के दाम आसमान छू रहे थे। वहीं एक कमरा उसके बड़े लड़के शिवेंद्र ने जो प्रापर्टी डीलिंग का काम करता था बनवा दिया था। आपात स्थिति के लिए मसलन घर में मेहमान आ जाएँ, एक बाथरूम और लेट्रिन भी वहाँ उस कमरे से जोड़ कर बनवा दिया था। अब यह कमरा जगन्नाथ त्यागी को रहने के लिए दे दिया था। क्योंकि फ्लैट के कमरों में भीड़ बहुत हो गई थी और कोई सुविधाजनक एकांत नहीं छूटा था। देखा जाए तो भजन और चिंतन के लिए एकांत का एकांत और घर की चिल्ल-पौं से मुक्ति। पीछे के बरामदे में एक कुर्सी पड़ी रहती थी जहाँ ऊबने पर जगन्नाथ त्यागी अपने कमरे से निकल कर बैठ जाते थे। डूबते सूरज की रोशनी इस भाग में पड़ती थी।

यह फ्लैट बड़ी साईज का तीन बेडरूम, दो किचन और एक बड़े हॉल वाला था। फिर भी उन लोगों के लिए कम पड़ता था। बड़े लड़के शिवेंद्र और मँझले लड़के वीरेंद्र का परिवार यहाँ एक साथ रहता ता। उनकी पत्नियाँ सगी बहनें थी। वीरेंद्र आरटीओ चैकपोस्ट पर हेड कान्स्टेबल था और अक्सर ड्यूटी पर ही रहता था। उसकी कमाई बहुत थी। वह अपना अलग आशियाना बनाना चाहता था। पर विजिलेंस के डर से फिलहाल साथ में चिपका हुआ था। दोनों भाइयों के तीन-तीन बच्चे थे। खाना उन सब का हालाँकि एक ही रसोई में बनता था पर अलग-अलग समय पर और अलग रुचि के अनुसार। इसे एक तरह से अलग भी कह सकते हैं। शिवेंद्र ने एक किचन का प्लेटफार्म तुड़वा कर बच्चों का स्टडी रूम बना दिया था।

एक दिन बाबू यानी जगन्नाथ त्यागी को फ्लैट से बेदखल कर उस अलग बने बाहरी कमरे में ठेल दिया गया था। एक तरह से बनवास जैसा कुछ। घर के भीतर उसके रहने पर बहुओं को एतराज था। यह एतराज उन्होंने कई तरीके से प्रकट किया था। जैसे उनको थाली परस कर फिर दोबारा रोटी और दाल-सब्जी के लिए नहीं पूछना। पानी माँगें तो इतनी देर कर देना कि वे फिर बिना पानी पिए ही उठने को मजबूर हो जाएँ। बाथरूम में उनको देर तक न घुसने देना। यह हिदायत देते रहना कि कमरे के भीतर घुसे तो खाँस-खँखार कर ही घुसें।

निर्वासन तो होना ही था एक खास समय पर।

देखा जाए तो वे इतनी पैंशन पाते थे कि किसी के लिए बोझ नहीं बन सकते थे। यह फ्लैट भी उनके जीपीएफ और ग्रेचुटी को मिला कर खरीदा गया था। अक्सर वे अपने पैसों से किराना का सामान पास के लक्ष्मी डिपार्टमेंटल स्टोर से खरीद लाते थे। बच्चों के लिए अक्सर बिस्कुट या टाफियाँ ले आते थे। फिर भी उनके प्रति न बहुएँ सहज थी और न बेटे। गाँव में उनकी जमीन-जायदाद थी और बड़ी बहू उनसे कम से कम दो बार वहाँ का बँटवारा कराने के लिए कह चुकी थी। पर जगन्नाथ त्यागी तैयार नहीं थे इसके लिए। वे वहाँ की जायदाद पर अपने छोटे भाई रामनाथ का ही हक मान रहे थे। उसका परिवार भी बड़ा था। उसके चार बेटे और तीन लड़कियाँ थीं। वे जायदाद आधी बँटवा लेते तो उसके लिए मुसीबतें बढ़ जातीं। वे तर्क देते यहाँ शहर में किस बात की कमी है। गाँव का सब उसी छोटे का है।

नौकरी से रिटायर होने के दो साल पहले उनकी पत्नी रंभा का निधन हो गया था। उन्होंने अपनी जमा-पूँजी का पूरा पैसा शिवेंद्र को प्रॉपर्टी डीलिंग का काम शुरू करने के लिए दे दिया था और वीरेंद्र को नौकरी में भरती कराने के लिए डेढ़ लाख की रिश्वत उन्होंने अपने ही जोड़े पैसों से दी थी। इसके बावजूद दोनों बहुएँ यह अहसान मानने को तैयार नहीं थीं। वे इसे कर्तव्य के खाते में डाल देतीं थी। बड़ी बहू उनको खाना परसते दुनिया भर के खरचे गिनाती रहती और ऐसी महँगाई में गृहस्थी खींचते जाने की मजबूरी का बखान करती रहती थी।

जगन्नाथ त्यागी को कभी-कभी लगता कि अपनी जिंदगी को किसी की कृपा पर घसीट रहे हैं। कमरे में अकेले पड़े-पड़े उनका दम घुटने लगता था। उनके जीवन से हँसी गायब हो गई थी। उनको याद नहीं वे पिछली बार कब जोर से हँसे थे। इधर एक लाफिंग क्लब में वे सुबह दस बजे जाने लगे थे पर वहाँ की हँसी उनको बहुत बनावटी लगती थी। फेफड़ों की वर्जिश तो हो जाती थी पर अंतरतम से वह उन्मुक्त हँसी नहीं निकलती थी। इसलिए अभ्यास के बाद भी हँसी उनकी पसलियों में फँसी रह जाती थी। जगन्नाथ त्यागी हँसी के आंदोलन के लिए तरस कर रह जाते थे।

सांयकाल का समय ही ऐसा होता था जब पूरी दुनिया फुरसत में हो जाती थी। दिन भर फुरसत और उपेक्षा में रहने वाले जगन्नाथ त्यागी अपना फ्लैट छोड़ कर पार्क में आ जाते थे। यहाँ बच्चों की धमाचौकड़ी होती, कुछ उल्लास, कुछ उदासी से भरे जोड़े होते, जवान धड़कनों का सरगम होता जो प्रायः आँखों से ओझल रहता पर अहसासों में उनकी खुशबू वहाँ तैरती रहती। कुछ देर के लिए थोड़ा मन बहल जाता। जगन्नाथ त्यागी लगभग रोज आते। हाँ बरसात में यह क्रम प्रायः टूट जाता था। जगन्नाथ त्यागी को भीगना पसंद नहीं था। वे स्नोफीलिया के मरीज थे। उनकी नाक जल्दी सुड़सुड़ाने लगती थी।

दूसरे बूढ़े का नाम भगीरथ प्रसाद शर्मा था, वह बीच की इमारत नीरांजना में दूसरी मंजिल के सी/15 फ्लैट में अपनी पत्नी के साथ रहते थे। यह दो बेडरूम वाला फ्लैट था और उन दोनों के हिसाब से कुछ बड़ा था। पति-पत्नी के अलावा कोई तीसरा वहाँ नहीं था। भगीरथ प्रसाद बड़े प्रशासनिक पद से रिटायर अधिकारी थे। उनको रिटायर हुए दस साल बीत गए थे। उनको उच्च रक्तचाप था और रक्तचाप नियंत्रित रखने के लिए वे नियमित रूप से गोली खाते रहते थे। उनकी पत्नी माधवी देवी गृहणी थीं और गठिया वात से पीड़ित थीं। इसलिए अधिकतर समय अपने बिस्तर से ही बँधीं बैठी या लेटी रहती थीं। यों अपने और अपने पति के लिए चाय-नाश्ता तैयार कर देती थीं इतनी सामर्थ्य उनमें थी। हाँ पर बहुत धीरे-धीरे यह सब कर पातीं थीं। अपने आप बाथरूम चली जातीं थी। अपने कपड़े बदल लेती थीं। दुपहर में जब भगीरथ प्रसाद टेरेस पर कुर्सी डाले बैठे अँग्रेजी अखबार या कोई मैगजीन पलट रहे होते माधवी देवी बड़े टाइप वाली मानस खोले चौपाई-दोहा सस्वर गुनगुनातीं रहती थीं। वे बखूबी महरी और खाना बनाने वाली बाई पर निगाहें भी रखे रहतीं थीं कि कहीं किसी चीज पर हाथ साफ न कर दें। कभी-कभार खाना बनाने वाली बाई नहीं आती तो वे धीरे-धीरे खाना भी बना लेतीं थीं। भगीरथ प्रसाद उनकी इस काम में काफी मदद कर देते थे।

उनके एक बेटा-बेटी थी। उनको ऊँची शिक्षा उन्होंने दिलवाई थी। दोनों टैक्नोक्रेट थे। लड़का विनीत शिकागो अमरीका में एक बड़ी इंटरनेशनल कंपनी में सी.ओ. था और बेटी तन्वंगी ह्यूस्टन में ब्याही थी। दोनों पति-पत्नी एक फर्म में ऊँचे वेतन पर नौकरी करते थे। भगीरथ प्रसाद ने अपनी पूरी कमाई बच्चों को पढ़ाने, उनको अमेरिका भेजने एवं नौकरी जमाने में झोंक दी थी। रिटायर होने के बाद उनको सबसे पहले रहने के लिए घर का इंतजाम करना था। पर पैसे उनके पास थे नहीं। रिटायर होने के बाद वे कोई छोटी-मोटी नौकरी अपने पद की हैसियत देखते हुए कर नहीं सकते थे। सामाजिक स्थिति भी उनकी डावाँडोल थी। बड़ा अधिकारी होने के नाते अपने अधीनस्थों और आम लोगों से उन्होंने कभी संवाद बनाने की कोशिश नहीं की थी। नौकरी में थे तो हर काम उनके कहने भर से फौरन हो जाता था। आदत न होने के कारण अब तो उनको बाजार से सामान खरीदने में भी परेशानी होती थी। घर के नौकरों से सामान मँगाने में उनको विश्वास नहीं था।

गनीमत रही कि लड़के ने उनको घर खरीदने के लिए एकमुश्त रकम भेज दी। पर बहुत दिनों तक वे तय ही नहीं कर पाए कि कहाँ, किस अपार्टमेंट में फ्लैट खरीदें। वे चाहते थे कि ऐसी कॉलोनी मिले जहाँ उनकी स्टेटस के समतुल्य रिटायर बड़े अधिकारी रहते हों। पर ऐसी एकाध कॉलोनी में कोई फ्लैट विक्रय के हिसाब से उपलब्ध नहीं था। हार कर उनको इस पंचशील कॉलोनी में बिल्डरों, दुकानदारों, ज्वेलरों, कर्मचारियों और मँझोले कद के नेताओं से भरी इमारतों में आशियाना ढूँढ़ना पड़ा। अगल बगल के पड़ोसियों से घुलने-मिलने में उनको कोफ्त होती थी और उनके बड़े अधिकारी होने के रोब में कोई उनसे निकटता बनाने में हिचकता था। उन आवासों के बीच वे अपनी निर्वैयक्तिता की वजह से निर्वासित से रह रहे थे।

बेटा और बेटी कभी-कभार उनसे बात कर लेते थे और पोते-पोतियों का समाचार दे देते थे। पोते-पोती के जन्म का समाचार भी उनके बेटे और बेटी ने इंटरनेट के जरिए ही ई-मेल से दिया था। बाद में उनके फोटो फेस बुक पर उन्होंने पोस्ट कर दिए थे। वे दोनों पति-पत्नी देर रात तक लेपटाप खोले उस पर पोते-पोती के फोटो देख कर मगन होते रहते थे। उनकी बड़ी इच्छा होती कि उनको अपनी गोद में खिलाएँ पर वैसे इंटरनेट चाहे जितनी जानकारियाँ उगल दे किंतु वह यह ममता भरा एहसास उनको नहीं दिला सकता था।

वे दोनों अपने आखिरी के समय में विदेश जाना नहीं चाहते थे। अपनी-अपनी व्यावसायिक मजबूरियों के चलते बेटे और बेटी यहाँ आ नहीं सकते थे। बूढ़े और बूढ़ी का यही दुख था। पेंशन पर्याप्त मिलती थी। पूरी खर्च ही नहीं हो पाती थी। इसलिए आर्थिक रूप से कोई कष्ट नहीं था। पर अपनों से दूर बहुत दूर थे। रिश्तेदारी में किसी को अपने साथ रख नहीं सकते थे। फिर किसी के पास उनके साथ रहने की फुरसत ही नहीं थी। कुछ ऐसी वारदातें हुई थीं जब अपनों ने ही कत्ल कर दिए थे। बेटे के इस मामले में सख्त निर्देश थे। वे डरते भी थे। इसलिए उन दोनों ने अपने किसी रिश्तेदार में से इस बाबत किसी पर न तो साथ रखने का जोर दिया और न इस बाबत किसी से कोई बात की थी।

भागीरथ प्रसाद दिन भर चुप रहते। किसी से बतियाने-बोलने का मौका ही नहीं मिलता था। अँग्रेजी के अखबारों को कहाँ तक चाटते। बोर हो जाते तो पत्नी के पास चले जाते। उनसे चाय के लिए पूछते, उनकी तबियत का हाल लेने लग जाते। एवज में चलने-फिरने में लाचार पत्नी भी उनसे चाय के लिए पूछ लेती थी। खाना वे ही बना देती थीं। कुछ महीने पहले खाना बनाने वाली एक बाई मिली थी तब काफी आराम मिला था। पर इधर उसे उसके लड़के ने जो सूरत की किसी कपड़े की फर्म में काम करता था, अपने पास रहने के लिए बुला लिया था। तब से कोई बाई उनको नहीं मिली थी। यहाँ तक कि उन्होंने अखबार में विज्ञापन तक दिया था। तब भी कोई नहीं आया था। भगीरथ प्रसाद खाना बनाने में अपनी पत्नी माधवी देवी की मदद कर देते थे। माधवी देवी उनकी पसंद की सब्जी बनाने में चूक नहीं करती थी। सोते समय एक गिलास गुनगुना मीठा दूध देना नहीं भूलती थी।

पर भगीरथ प्रसाद को दिन भर एक अदद अँग्रेजी अखबार में विधाए रखना संभव नहीं था। दिन के दस बजे तक तो कॉलोनी में कुछ चहल-पहल दिखती थी। बंद दरवाजों के पीछे भी स्वर मुखरित होते रहते थे। पर इसके बाद वहाँ सन्नाटा पसर जाता था। सड़कों पर चलती भीड़ का शोर छिटक कर आ जाता था। भगीरथ प्रसाद के पड़ोस में मि. पाराशर का फ्लैट था। पर सिवाय उनकी नेम प्लेट के और कोई पहचान नहीं बनती थीं। माधवी देवी कभी उनके दरवाजे कुछ लेने के बहाने भी नहीं गई और न उस तरफ से कोई इस तरफ आया था। फ्लैट ऐसे बनाए गए थे कि हर हिस्सा दूसरे से अलहदा था। एक ही फ्लोर भले ही हो पर सब से कटे-फटे, बेगाने से। भगीरथ प्रसाद ने उनको देखा था कि वहाँ उस फ्लैट से दो लोग एक अधेड़-सा और एक युवा निकलते थे। युवा एक बड़ा-सा काला एक्जीक्यूटिव बैग कंधे पर लटकाए निकलता था। वह आगे चौराहे पर सिटी बस पकड़ता था। फिर कुछ देर बाद कुछ अस्त-व्यस्त-सा वह अधेड़ अक्सर टाई-सूट में निकलता था। दोनों लिफ्ट से नीचे आते थे। फिर ड्राइवर गैरेज से निकाली गाड़ी का पीछे का दरवाजा खोलता था, वह अधेड़ उसमें बैठ जाता था और गाड़ी आगे चली जाती थी। उन दोनों की बीवियाँ उस फ्लैट में रही होंगी अगर युवा भी शादीशुदा हुआ तो। उस युवा और अधेड़ के बीच क्या रिश्ता था उनको मालूम नहीं था। माधवी देवी ने बताया था कि उस फ्लैट में एक बूढ़ी औरत भी रहती है। उसकी प्रार्थना की आवाज उसने सुनी है। उन दोनों की माँ और दादी होगी अगर वे दोनों बाप-बेटे होंगे।

भगीरथ प्रसाद माधवी देवी से कहते कि उस फ्लैट में एक माँ कम से कम अपने बच्चों के साथ तो रहती है। उन दोनों की तरह निर्वासित तो नहीं है। माधवी देवी गहरी साँस लेकर रह जातीं। इस निर्वासन का कोई निदान नहीं था। टेरेस में पड़ी आरामकुर्सी पर भगीरथ प्रसाद बैठ जाते और उस बेहिसाब भीड़ को देखते रहते जिसके बीच भागते हुए भी आदमी अकेला और सबसे कटा-फटा था। दिन भर कारें और बसें दौड़ती रहतीं। पता नहीं कहाँ जाती और कहाँ से लौट आतीं थीं। वे उस भीड़ का हिस्सा नहीं बनते। पर ऊब जाते। एक दिन मार्क ट्वेन का उपन्यास पढ़ रहे थें। सहसा उनको ख्याल आया कि इसे माधवी देवी को सुनाना चाहिए। उसे कुछ सुकून मिलेगा। उसने अँग्रेजी में गाजियाबाद के एक महाविद्यालय से प्रथम श्रेणी में एमए पास किया था।

एक घंटे तक वे पाठ करते रहे और अंत में उन्होंने पाया कि माधवी देवी सुनते-सुनते सो गई हैं और उसकी नाक बज रही है। फिर भी उन्होंने सोचा कि वे उसकी आदत डलवा देंगे। उनको अफसोस हुआ कि रिटायर होने के बाद क्यों उन्होंने पुस्तकों के गट्ठर एक प्राईवेट हायर सेकेडरी स्कूल को भेंट कर दिए थे। इस शहर के फुटपाथों पर अँग्रेजी के नॉवेल तो मिल जाते हैं पर मार्क ट्वेन और चार्ल्स डिकंस के नॉवेल मिल पाना मुश्किल है। आसपास कोई लाईब्रेरी है इसकी जानकारी उनको नहीं है। खैर देखेंगे। अभी तो यही खत्म हो।

कभी-कभी अकेलेपन से घबड़ा जाते और उनको लगता कि नौकरी के दिनों से ही उनको सामान्य बन जाना चाहिए था। इस घुटन से तो निजात मिली रहती। वे कभी-कभी चार बजे ही पार्क के लिए निकल पड़ते। उस वक्त पार्क सूना रहता था। एक किनारे सामने के हॉली डेस्टीनेशन्स हायर सेकेंडरी स्कूल के बच्चे धमाचौकड़ी मचाते कभी-कभार दिख जाते थे। उस वक्त कोई सुरक्षाकर्मी भी वहाँ मौजूद नहीं होता था। दुपहर के बाद की नर्म धूप वहाँ पसरी होती थी और सन्नाटा होता था। पर भगीरथ प्रसाद देर साँझ तक वहाँ बैठे रहते थे। अलग-बगल से निस्पृह और निरपेक्ष। जैसे उनके लिए समय रुक गया हो या उनके आरपार जा रहा हो।

एक दिन दुपहर अचानक एक आशंका ने उनको जकड़ लिया और बहुत कोशिशों के बाद भी वे उससे छूट नहीं पाए। उन्होंने सोचा अगर अचानक कैजुयल्टी हो जाए तो अर्थी ढोने के लिए चार कंधे भी न मिलेंगे। शायद दो या तीन दिन में इस बात का पता चल पाए दूसरों को कि कोई हादसा हो गया है। बुलाने पर भी किसी फ्लैट के दरवाजे नहीं खुलेंगे। इसके लिए कॉलोनी के सेक्रेटरी को बुलाना पड़ेगा। वही फिर निकट के लोगों को फोन पर सबको सूचना देगा। ऐसे मामलों के लिए उसने बाकायदा एक रजिस्टर बना कर रखा है जिसमें सब आवश्यक विवरण दर्ज है। वे यह सब सोचकर एकाएक घबड़ा गए। देर लग गई उनको संयत होने में। उन्होंने माधवी देवी को कुछ नहीं बताया। सुनकर वह बिला वजह घबड़ा जाती।

इसके बाद जब भी वे इमारत से नीचे जाते या आते तो अपनी छाती पर हाथ रखकर अपनी धड़कन की लय जाँच लेते थे। उनको सहसा लगता कि उनके दिल ने धड़कना बंद कर दिया है। कुछ दूर पर सब्जी लाने जाते और वहाँ भी वे जाँच कर लेते थे। पार्क में बैठते और वहाँ भी यही सब दोहराते।

तीसरे जो बूढ़े थे उनका नाम था परमानंद सोनी। इस पंचशील कॉलोनी की इमारत वंदना में तीसरे फ्लोर पर रहते थे। उनके फ्लैट का नंबर था एस/19 और यह फ्लैट उनका अपना नहीं था। वे किराये से इसमें रहते थे। किराया था साढ़े तेरह हजार रुपये प्रति माह। वे अपनी बेटी सुषम के साथ रहते थे। उनकी पेंशन नौ हजार पैंतीस रूपया थी और उनकी पेंशन के रुपयों से बाकी रुपये मिलाकर फ्लैट का भाड़ा चुका दिया जाता था। इस तरह किराया देने की झंझट से निजात मिल जाती थी। दामाद एक डेयरी फार्म में मैनेजर था। इस वजह से घर में डेढ़ किलो दूध फ्री में आता था। उसमें परमानंद सोनी को एक बूँद भी नहीं मिलता था। चाय में जो उनको एक कप सुबह और शाम मिल जाती थी उतना दूध उनके हिस्से में आता था।

बेटी सुषम पास की एक दूसरी कॉलोनी द ब्राइट में चलने वाले एक नर्सरी स्कूल में टीचर थी। दो-चार ट्यूशन भी किए हुए थे। इस वजह से बच्चों की स्कूली फीस और दीगर खर्चे निकल आते थे। उसके तीन बच्चे थे। दो लड़के और एक लड़की। लड़का और लड़की सेक्रेड होम प्राईमरी स्कूल में दूसरी और तीसरी कक्षा में पढ़ते थे। यह स्कूल इस सेक्टर के अंत में स्थित था और स्कूल के अपने रिक्शों में बच्चे स्कूल जाते-आते थे। छोटा मुन्ना अभी तीन माह का था और जब सुषम खाना बना रही होती या कोई दूसरा काम या स्कूल में होती तब मुन्ना को सँभालने की जिम्मेदारी परमानंद सोनी की होती थी। इस वजह से वे दिन भर उसकी देखभाल में ही उलझे रहते थे। दामाद सुबह आठ बजे डेयरी के लिए निकलता और बारह बजे लौट आता था। तीन बजे फिर चला जाता और सात बजे तक लौट आता था। बीच के समय में वह सोता रहता था।

दरअसल उनके रिटायर होने के साल ही उनकी पत्नी गायत्री की मृत्यु हो गई थी। उनके लड़के थे नहीं बस यही एक लड़की सुषम थी। सुषम ने उनको अपने पास रखना चाहा, पर उसका पति खिलाफ था। पहले तो वे आनाकानी करते रहे। फिर सोचा होगा कि बुढ़ापे में उनको किसी का सहारा चाहिए था। सुषम ने पति को यह कह कर मना लिया कि अच्छी जगह रहना है तो जियादा किराया देना पड़ेगा। इस जियादा किराये की पूर्ति बाबूजी की पेंशन से हो सकती है। इसलिए बाबूजी यानी कि परमानंद सोनी को बुलाने का आग्रह बढ़ता गया और अंत में वे रहने के लिए आ गए। कुछ जियादा ही दबाव में उन्होंने अपना पुश्तैनी घर भी बेच दिया। आखिर उसे बंद ही तो रहना था। अच्छे खासे पैसे मिल गए उनको घर के। उन पैसों की एफडी उन्होंने अपने बड़े पोते के नाम करा दी। इस तरह परमानंद सोनी की अपनी बेटी के साथ रहने की पुख्ता वजह बन गई।

परमानंद सोनी सुबह-शाम सब्जी भी ले आते और दीगर खरीदारी भी कर लेते थे। इस वजह से वे ऐसे सदस्य बन गए जिनका उस घर में रहना जरूरी मान लिया गया। वे शासकीय मुद्रणालय में सुपरवाइजर के पद से रिटायर हुए थे। घर में वैसे तो शांति ही रहती थी पर दामाद रंजन को दारू पीने की बुरी आदत थी। महीने में एकाध दो दफा वह ओवरडोज ले लेता था और घर लौट कर हंगामा करता था। ऐसे में वह सुषम पर हाथ भी उठा देता था। उसका रौद्र रूप देख कर परमानंद सोनी की हिम्मत उसे समझाने की नहीं पड़ती थी। यह हंगामा वह एकाध-दो दफा ही करता था इस वजह से कह सकते हैं कि घर की शांति बनी हुई थी।

घर में अखबार नहीं आता था। कॉलोनी के सामने की चाय की गुमटी में बेंच पर बैठ कर वे अखबार पढ़ सकते थे। पर इसके लिए उनको नीचे उतर कर वहाँ तक जाना पड़ता। पर उनको इतना समय नहीं मिलता था। उस समय मुन्ने की सँभाल जरूरी होती थीं। निदान के रूप में उन्होंने सोचा कि अगर पास में कोई वाचनालय हो तो वे वहाँ जाकर अखबार पढ़ सकते हैं। वाचनालय दूर था और सिटी बस से जाया जा सकता था। पर सिटी बस का किराया वे कहाँ से जुटाते।

दिन भर मुन्ना को सँभालते वे बुरी तरह थक जाते थे। कमर सीधी करने के लिए वे लेट तक नहीं पाते थे। मुन्ना कई-कई बार सिस्सी कर देता था और उनको ही साफ करनी पड़ती थी। सुषम जब स्कूल से लौटती तभी उनको कुछ रियायत मिलती थी। क्योंकि खाना बनाने तक उनको फिर मुन्ना को सँभालना पड़ता था। रंजन तो संतान पैदा करने के कारक भर थे। बच्चों को सँभालने से उनको कोई मतलब नहीं था।

परमानंद सोनी सोचते कुछ सालों तक पत्नी का साथ और बना रहता तो अपने पुश्तैनी घर में आराम से जिंदगी जी रहे होते। यहाँ बेटी के साथ भविष्य की सुरक्षा की दृष्टि से आ तो गए पर बुरी तरह बंध कर रह गए और अब आगे कोई निजात मिलने वाली नहीं है। वे गले तक जिम्मेदारियों में फँस गए हैं। इस घर में उनका अपना वजूद जरूरी होते हुए भी कुछ नहीं है। जो उनको अपने मन का खाना है वह चयन भी उनसे छिन गया है। अब जो मिल गया खा लेते हैं।

यहाँ तक कि उनका डेरा बरामदे में खिसका दिया गया है। बरसात और गरमी की रातों में तो ठीक है पर सर्दियों में इस कदर खुले में सोना खतरनाक है। भीतर सुषम, उसके पति और संतानों का कब्जा रहता है। जियादा बिजली खर्च न हो इस बजह से टीवी बहुत कम चलाया जाता है। जब सुषम को कोई सीरियल देखना होता है, तभी खुलता है। उनको पता ही नहीं चलता कि देश-दुनिया में क्या घट रहा है। इसलिए कभी कभार सुबह के वक्त वे चाय की उस गुमटी में अखबार की लालच में पहुँच ही जाते हैं। पर वहाँ इंतजार करना होता है। बहुत लोग पन्ना-पन्ना पकड़े अखबार पढ़ते होते हैं। परमानंद सोनी यहाँ चाय पीने नहीं अखबार चाटने जाते थे। इस वजह से दो-तीन बार उनकी मुफ्तखोरी परखने के बाद चाय वाला उनको जियादा तरजीह नहीं देता। लंबे वक्फे के बाद उनके हाथ एकाध पन्ना हाथ आता तो वह व्यापारिक गतिविधियों का होता, जिसमें समाचार बिल्कुल नहीं होते हैं। वे यहाँ जियादा इंतजार नहीं कर सकते, क्योंकि सुषम को खाना बनाना होता है और मुन्ना को सँभालने वाला वहाँ कोई नहीं रह जाता। रंजन आठ बजे तक डेयरी के लिए निकल जाता है। वे हताश से लौट आते।

एक बार हिम्मत करके उन्होंने अखबार लगाने के लिए सुषम से कहा भी। उसने बहुत ठंडे स्वर में कहा कि फिर किसी जरूरी खर्च में कटौती करनी पड़ेगी। वे चुप रह गए थे। वे नहीं कह सकते कि उनका पेंशन का बहुत थोड़ा भाग इसमें खर्च किया जा सकता है। पर घर अनिवार्य था और उससे जियादा अनिवार्य यह कि हर माह नियमित रूप से किराया चुकाया जाता रहे। वरना सबसे पहले बिजली का कनेक्शन कटेगा फिर नल का। जिंदगी के लिए दोनों ही अनिवार्य हैं।

परमानंद सोनी लगभग रोज ही पार्क में जाते थे। कुछ देर की आजादी उस दमघोंटू माहौल से उनको मिल जाती थी। अपने आप में जीने के कुछ क्षण उनको नसीब हो जाते थे। आखिर लौटना तो उनको वहीं था। लौटते और कुछ देर में खाना खाकर वे बरामदे में पड़ी अपनी खाट पर आकर लेट जाते। बरामदे में अमूमन अँधेरा ही रहता। आखिर उनको रोशनी की जरूरत ही क्या है, इस कारण बरामदे में जीरों वॉट का बल्ब भी नहीं लगाया गया था। वे जब तक नींद नहीं आती उतरी बनियान को पछोर पर मच्छर भगाते लेटे रहते थे। सुबह जल्दी आँख अगर खुल जाती तो फिर नीचे उतर कर सूनी सड़क पर कुछ दूर टहल आते थे।

तो यह थी उन तीन बूढ़ों की कहानी जो एक दूसरे से अपरिचित, अनजान लगभग रोज ही कॉलोनी से लगे उस पार्क में आकर अलग-अलग जगहों पर बैठते थे। बैठे रहते थे अँधेरा घिरने तक फिर बिना एक-दूसरे को टोके वहाँ से निकल जाते थे। कोई किसी की पृष्ठभूमि से वाकिफ नहीं था। बस तीनों ही रिटायर बूढ़े थे और अब जिंदगी से रिटायर होने की तैयारी में थे। तीनों के भीतर एक बेजार जिंदगी की धड़कनें थी और वे हँसी से महरूम थे। ऐसा नहीं कि वे हँसना नहीं चाहते थे बल्कि जगन्नाथ त्यागी तो बाकायदा लाफिंग क्लब के सदस्य थे और दुपहर में वहाँ चले जाते थे। वे वहाँ ठहाका लगाने का अभ्यास करते थे और मुह आड़ा-तिरछा करके हँसी छाती में भरने में लगे रहते थे। पर इस अभ्यास में वर्जिश के अलावा कुछ नहीं था। वह उल्लास और खुशी जो हँसी के लिए जरूरी होती है नदारत रहती है। बिना किसी कारण के हँसना बड़ा कठिन होता है। हँस रहे हैं ठिलठिल कर जैसे झरने का पानी झरता है वह हँसी दुर्लभ थी। वह हँसना जो आँखों में आँसू ला देता है जिसे खुशी के आँसू कहते है जीवन में उमंग ला देता है।

क्लब में उपजाई गई हँसी किसी तानाशाह की हँसी की तरह होती है। जिसमें एक खौफ का अंदाज खुबा रहता है। ऐसी हँसी सिनेमा के विलेन की हँसी भी कही जा सकती है जो दूसरे की मजबूरी से चलती है। किसी तूफान के शोर की तरह जो तबाही लाती है। यह किसी अल्हड़ किशोरी की हँसी नहीं हो सकती। जो अनायास छूटती है और छूटी रहती है देर तक। इस हँसी में किसी बगीचे की सुरभि की महक होती है। शिशुओं की कौतुक हँसी नहीं होती जिसमें इतना भोलापन मिठास की तरह धुला होता है कि तन और मन को तंरगित कर देती है। बूढ़े भी हँसते बिना दाँतों के और पूरी देह पत्ते की तरह हिलने लगती है। दुनिया के सब बूढ़ों की हँसी खो गई है। वे लाचारी की हँसी भी नहीं हँस पाते जो दीन हैं, अभावग्रस्त हैं उनकी हँसी तो पिछले साठ-पैंसठ सालों में गायब ही रही है, पर जो अपने जीवन में सफल रहे और संपन्नता उनसे चिपकी रही, उनकी हँसी भी गायब है उनके चेहरों से। कहीं निर्वासन का दंश है तो कहीं रोगी काया का कहर, तो कहीं आसपास के माहौल से गहरा असंतुलन और घोर उपेक्षा का भाव। जीवन की सहजता का लोप हो गया है। वे हँसने को तरस गए हैं।

भगीरथ प्रसाद को छोड़ कर शेष दो बूढ़े सुबह की मार्निंग वाक में भी निकल जाते हैं। पर साँझ के समय पार्क में तीनों आते हैं। अलग-अलग कोनों में बैठ जाते हैं चुपचाप। उनमें से किसी को शायद दूसरे के बारे में मालूम हो ऐसा पक्का तौर पर नहीं कहा जा सकता। उनको यह भी नहीं मालूम होगा कि वे एक ही कॉलोनी की अलग-अलग इमारतों में रहते हैं। कभी कॉलोनी के परिसर में आते-जाते टकरा भी गए होंगे तो ध्यान न दिया होगा। अपनी ही उलझनों में डूबे वे एक दूसरे को जानने से बच गए होंगे। हजार गमों के बीच पहचान की चिलक दब गई होगी।

भगीरथ प्रसाद हमेशा सुरक्षा में जिए इस वजह से छड़ी लेकर आते थे कुत्तों से बचाव के लिए। बाकी दोनों बूढ़े खाली हाथ झुलाते आते थे। यहाँ की चहल-पहल में उनका मन रमता था या माहौल बदल जाने की तृप्ति उनको खींच लाती थी। कुछ भी कह सकते हैं। यों पार्क खूबसूरत और बड़ा था एवं तरतीब से बनाया गया था। सफाई रहती थी फिर भी घास में मूँगफलियों के छिलके गिरे मिल जाते थे। पॉलीथीन की थैलियाँ झाड़ियों की ओट में अटकी दिख जातीं थीं। बच्चों के लिए झूले थे, फिसलन पेटियाँ थीं, धरती के समानांतर घूमने वाली चकरियाँ थीं जिनमें बैठने के लिए छोटी-छोटी कुर्सियाँ जड़ी थीं। मिकी माउस के रुपाकार की कुर्सियाँ यत्र तत्र पड़ी थीं। पार्क में बच्चों की आवाजें उठती रहतीं थीं। उनके बोलने का शोर, उनकी छलकती हुई हँसी मन को सुकून से भर जाती थीं। आठ बजे के बाद पार्क खाली होना शुरू हो जाता था। वे तीन बूढ़े इसके काफी पहले लौट आते थे।

राज्य की सरकार ने 65 साल से ऊपर के बूढ़ों के लिए कोई कल्याणकारी योजना चलाई थी। चैनलों पर यह खबर बार-बार दिखाई जा रही थी। राज्य के तमाम लोगों ने इस योजना का स्वागत किया था। इस शहर के हर चौराहे पर एक बहुत बड़ी होर्डिंग इस योजना के विज्ञापन के बतौर लगाई थी। योजना के विवरण के बाद लगभग दो तिहाई जगह में एक बूढ़े का विशाल फोटो लगाया गया था। बूढ़े का हँसता-मुस्कराता-उमगता फोटो। वह फोटो लोगों को आकर्षित कर रहा था और पूरे शहर में इस फोटो की चर्चा थी। वह होर्डिंग इतनी बड़ी थी कि सीधे आधा किलोमीटर दूर से दिख जाती थी। इन तीन बूढ़ों को भी किसी प्रकार से इस फोटो के बारे में पता चल चुका था। वे होर्डिंग देखने को उत्सुक हो उठे थे - हँसते हुए बूढ़े को देखने की लालसा में वे सराबोर हो उठे थे। कैसा लगता होगा यह कौतुक था उनके मनों में।

वे तीनों एक साँझ किसी अंतःप्रेरणा के वशीभूत संयोग से एक साथ पास के चौराहे पर वह होर्डिंग देखने पार्क से बाहर निकल पड़े - कुछ-कुछ आगे-पीछे। कुछ ही देर में वे उस होर्डिंग के नीचे खड़े थे और उस हँसते हुए बूढ़े को जो इस विशाल होर्डिंग में छपा था बड़ी हसरतों से निहार रहे थे। फोटो वाले बूढ़े का चेहरा समूचा हँस रहा था। उसके खुले मुँह में एक भी दाँत दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था। फिर भी उसके चेहरे पर हँसी उमग रही थी। तीनों उस बूढ़े की हँसी में अभिभूत वहाँ खड़े थे। अपने भीतर वे उस फोटो के बूढ़े की हँसी की खनक को जज्ब करना चाहते थे। निर्बाध और निर्मल हँसी जिसमें कहीं बनावटीपन और औपचारिकता नहीं थी। उस हँसी में तितली के परों का नर्तन और रंग भरे हुए थे। एक निष्काम हँसी जो दुर्लभ थी।

तीनों बूढ़े खड़े निहारते रहे। वे उस रात घर नहीं लौटे। दस बज गए फिर बारह बजे, दो और तीन भी बज गए। वे उसी तरह खड़े थे फोटों को निहारते। सुबह जब सूरज की किरणें फूटी और आमदरफ्त चालू हुई, वे तीनों बूढ़े उस विशाल होर्डिंग के नीचे चित्त लेटे मरे पड़े थे। भगीरथ प्रसाद थोड़ा अलग हट कर पड़े थे। उन्होंने जीवन भर छोटे लोगों से संवाद जो नहीं किया था। उनके चेहरों को देख कर कोई भी जान सकता था कि फोटो वाले बूढ़े की-सी हँसी हँसने की कोशिशों में उनके प्राण निकले थे।


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हिंदी समय में कैलाश चंद्र की रचनाएँ