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कविता

हार्वेस्टर
मणि मोहन


पकी हुई फसल
इंतजार कर रही है
कटैयों का
संशय में हैं गेहूँ की बालियाँ
कि शायद हार्वेस्टर के पहले
इस बार आ जाएँ चेतुए

गेहूँ की इन मासूम बालियों को
शायद पता नहीं
कि हरे रंग की जिस दैत्याकार मशीन को
वे हार्वेस्टर समझ रही हैं
दरअसल एक टैंक है
जिसने तकनीकी बर्बरता के साथ
तहस नहस कर दिया है
चेतुओं का घर-संसार

बालियों के भीतर दुबके
अन्न के दानों की स्मृति में
आज भी ताजा हैं
चेतुओं के मासूम बच्चों की किलकारियाँ
और फसल काटते हुए
उनके कंठ से निकले फागुन के गीत

गेहूँ की इन मासूम बालियों को
शायद पता हो
कि यहाँ से मीलों दूर
अपने उजाड़ संसार में
भूख से बेहाल चेतुए
पकी हुई फसलों के संसार में आने के लिए
किस कदर बेचैन हैं...
 


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