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कविता

रीछ
मणि मोहन


रीछ की सी शक्ल लिए
जाकर धम्म से बैठ जाता हूँ
उसकी कुर्सी पर

ठीक सामने एक आईना था
दुनिया का सबसे चमकदार और साफ आईना
( वरना इन दिनों किसे फुर्सत है
अपने चेहरों से
कि आईनों का ख्याल रखें )

मैं अपना चेहरा देखता हूँ
इस आईने में
और घबराकर अपनी आँखें बंद कर लेता हूँ
वह अपना काम शुरू करता है
और अगले कुछ मिनटों तक
सिर्फ कैंची और कंघे की जुगलबंदी सुनाई देती है

अचानक संगीत रुक जाता है
और उसकी आवाज सुनाई देती है -
अब देखिए बाबूजी !
मैं आँख खोलता हूँ
और उसके आईने से प्यार करने लगता हूँ

वह फिर पूछता है -
'कोई कसर रह गई हो तो बताएँ बाबूजी'
मैं सिर्फ मुस्करा देता हूँ
और मन ही मन कहता हूँ -
यार, तू तो जादूगर निकला
सिर्फ दस मिनिट में
रीछ से मनुष्य बना दिया

वह पैसे लेता है बड़े ही विनीत भाव से
और कुर्सी के चारों तरफ गिरे बालों को
बुहारने लगता है

वह बालों के साथ-साथ
पल-पल गिरे
मेरे अक्स भी बुहार रहा है।
 


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