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कविता

मेरे महबूब
शैली किरण


बहुत खूबसूरत है यह पहाड़,
मेरे देश का हर रंग है यहाँ,
बाँस की हँस कर दोहरी होती टहनियाँ,
जब बाँसुरी बन सजती हैं,
कहती हैं व्यथा बिछोह की,
किसी गड़रिए के होठों पर बैठकर,
दर्द की लहरियों से गूँज उठता है वन,
झरना भी, दौड़ने लगता है तेज,
गाते हुए तन्हाई का गीत,
तय करना चाहता है, दौड़ कर,
बुराँस के जंगल,
दूर निकलना चाहता है,
कोयल की कूक,
पपीहे की धुन,
कठफोड़वे की टुकर टुकर से,
चंपा की महक से,
ठहर जाता है,
किसी झील से मिलकर,
मधुमक्खियाँ नृत्य करती हैं,
फूलों की क्यारियों में,
उनके पँखो का गुंजन मधुर है,
कई पाजेबों से,
उसमें बंधन की खनक नहीं,
बॅाटल ब्रश पर मँडराते, हमिंग बर्ड
मेरी आँखों से देख सको तो,
देख सको मोरों का नृत्य,
सुन सको उनका कलरव,
जंगली मुर्गे का बाँग देकर मुझे उठाना,
शहतूत की शाखों का राह में लचक जाना,
अंजीर का पकना,
कैक्टस के फूल आना
बहुत कुछ जो मैं कह ना पाऊँ,
शब्द से परे महसूस करना !
तुम्हारी दुनिया से अलग मेरी दुनिया,
कितना लाजिमी है,
उनके एक होने से डरना !


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