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कविता

पुकारता शहर
तियांहे

अनुवाद - साधना अग्रवाल


कुछ लोग गीतों से तारीफ करते हैं अपने शहर की
लेकिन मैं इसे लिखकर करता हूँ
मैं उसे तभी बुलाऊँगा,
जब मैं कुछ भी नहीं लिख पाऊँगा
मेरा शहर दक्षिण में है
मैं उसे दक्षिण दिशा की ओर से बुला रहा हूँ
वह मेरे दिल, मेरी कलम, मेरे गले,
मेरी पुकार, मेरे आँसू और मेरे खून में बसी है
मेरी पुकार सुनकर मेरा शहर काँप जाएगा
जब भी सूरज और चंद्रमा को देखकर मैं चिल्लाऊँगा
मुझे अपनी पुकार पहाड़ों, नदियों के ऊपर
महसूस हुई
और यह गाँव से बाहर आता है
घास, पशु, भेड़, खेतों और सब्जियों को देखते
मैं चिल्लाऊँगा, हवा मुझे उड़ा ले जाएगी
मैं ऊँचे स्थान पर खड़ा पुकार रहा हूँ
उन लोगों को पानी, फसलों, धुआँ और प्यार को
एक प्रतिध्वनि बनने दो
हमेशा के लिए।
 


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