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कहानी

बेटा
गोविंद उपाध्याय


जब से फोन आया था। उसका मन काफी बेचैन था। हालाँकि पत्नी इस समाचार के बाद से ही बेहद उत्साहित थी। पत्नी ने अपनी डोलची तैयार करना शुरू कर दिया था। वह पत्नी की तरफ देखने लगा। उसके साँवले चेहरे पर इस समय गजब की चमक थी। माथे और गालों पर उग आयी झुर्रियाँ उम्र के तीसरे पड़ाव की तरफ इशारा कर रही थी। उसका ध्यान बार-बार फोन की तरफ जा रहा था। अभी घंटी बजेगी और वो दोनों चल देंगे। आरुषी रसोई में उनके लिए नाश्ता बनाने में व्यस्त थी।

रोज की तरह सुबह उठकर वह अखबार के साथ चाय की चुस्कियाँ ले रहा था कि तभी शांतनु का फोन आया - पापाजी मानुषी आधी रात के बाद से ही तकलीफ में है। डाक्टर साहिबा से बात हुई तो उन्होंने कहा कि घबराने की बात नहीं है। आपका केस बिल्कुल नारमल है। सुबह बताती हूँ कि किस नर्सिंग होम में भर्ती कराना है। आप टेंशन न लें शुरुआत में ऐसा ही होता है...।

उसके बाद से ही मन में घबराहट होने लगी थी और वह ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था कि सब कुछ ठीक-ठाक निपट जाया। अब बस उसे शांतनु के फोन का इंतजार था कि डाक्टर साहिबा किस नर्सिंग होम को रिकमंड कर रही हैं।

मानुषी के शादी का यह दूसरा वर्ष था। वह छब्बीस साल की होने वाली थी। बस बारह दिन शेष बचा था उसके जन्म दिन का। उसे मानुषी के विवाह के लिए बहुत ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ा था। सिर्फ तीन जगह उसके रिश्ते की बात चली थी। दो जगह तो शुरुआती दौर की औपचारिकताओं के बाद ही बात खत्म हो गई थी। तीसरी जगह रिश्ता पक्का हो गया। शांतनु एम.टेक. के बाद मल्टीनेशनल में इंजीनियर थे। सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व के साथ सेलरी पैकेज भी अच्छा था। सबसे अच्छी बात यह थी कि वह निहायत विनम्र और सभी प्रकार व्यसनों से दूर थे। शायद यही कारण था कि उसने अपने हैसियत से ज्यादा खर्च कर दिया था। जो लड़के वालों की माँग थी, उसके अतिरिक्त भी उसने बहुत कुछ दिया...। इसके बावजूद जैसा कि होता है... लड़के वालों को हमेशा कम ही लगता है। मानुषी की सास को भी शिकायत रहती कि इस शादी में उनके आशा के अनुरूप दान-दहेज नहीं मिल पाया। शुरू में मानुषी जब भी उसे बताती, विचलित हो जाता...। उसके ऊपर तीन लाख का कर्ज था। कुछ अपने विभाग से ले रखा था और कुछ इष्ट-मित्रों से। जिसे चुकाने की चिंता हमेशा बनी रहती। कमाई का एक बड़ा हिस्सा उसी में निकल जाता। बेटी के लिए कुछ न कर पाने का अपराध-बोध भी था। शांतनु भी कहीं न कहीं अपने परिवार के साथ खड़े दिखाई देते थे।

मानुषी से तीन साल छोटी आरुषी थी। वह अभी उसके विवाह के बारे में तो कुछ सोच पाने की स्थिति में ही नहीं था।

मानुषी जब पैदा हुई थी, उसके कुछ दिनों पहले ही उसे नौकरी मिली थी। ऐसे में अम्मा ने उसके पैदा होने पर उत्साह ही दिखाया था - 'लक्ष्मी है भाई, आने के पहले पिता को सरकारी नौकरी मिल गई। बेचारा कितना परेशान रहता था। छोटी-मोटी नौकरी मिलती भी तो मेहनत ज्यादा थी और पैसा कम...। पहला फल है। क्या बेटा...? क्या बेटी...?'

मानुषी रुई के फाहे की तरह थी। गोद में उठाते समय उसके भीतर पिता होने का एक अजीब उल्लास था। वह अपनी छोटी आँखों से उसकी तरफ ताक रही थी और वह उल्लास से भरा हुआ था। उसने पत्नी की तरफ देखा। माँ बनने के गौरव उसके चेहरा भी चमक उठा था।

लेकिन आरुषी के पैदा होने पर सब कुछ विपरीत हो गया था। अम्मा की आँखों में आँसू आ गए थे - 'किस तरह मैं तीन बेटियों की शादी निपटाई हूँ, मेरी आत्मा जानती है। एक तो पहले से ही थी अब फिर लड़की...?'

पत्नी ने भी बहुत कातर नजरों से देखा था उसे। जैसे उससे कोई बड़ा गुनाह हो गया हो। उसके सूखे और पपड़िआए होंठ काँप रहे थे। पत्नी ने उसका हाथ जोर से पकड़ा था। पत्नी उससे सांत्वना चाहती थी।

वह मुस्कराने की कोशिश किया - 'क्या फर्क पड़ता है? जमाना बदल रहा है। अब बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं है। बस उन्हें इस योग्य बनाओ की समाज में सर ऊँचा करके जी सकें।'

उसकी बातों को सुनने के बावजूद भी पत्नी की आँखों में संदेह था कि वह यह बाते सिर्फ उसका दिल रखने क लिए कह रहा है... क्योंकि हम दोनों ही बेटे की कामना कर रहे थे।

आरुषी माँ की तरह साँवली थी पर उसके नाक नक्श मानुषी से ज्यादा सुंदर थे।

लेकिन इतने सालों बाद भी कुछ नहीं बदला था। सभी कुछ यथावत था। मानुषी की शादी के बाद से तो वह काफी तनाव में आ गया था। जो लोग देखने में बहुत सीधे और सरल लगते थे। अचानक उनके चेहरों से नकाब उतरने लगे। शुरुआती छह महीनों में मानुषी जो भी बताती वह सब उसने किस्से-कहानी में ही पढ़ा था। वह घबरा जाता। आए दिन अखबारों में छपने वाली दहेज हत्या और दहेज प्रताड़ना की खबरें उसे और विचलित करती। पत्नी सांत्वना देती - 'आप बिना मतलब ही इतना घबरा जाते हैं। ऐसा कुछ नहीं होगा। सामान्य लोग हैं। जितना मिल सकता है लड़की वालों से ले लो की सोच तो हमारे समाज में है ही...। आपकी लड़की को इसके लिए कोई शारीरिक यातना तो देते नहीं है। बस जुबान से उलाहना ही तो देते हैं। यह तो हर लड़के वाले करते हैं। कुछ दिन चलेगा, फिए सब कुछ सामान्य हो जाएगा। क्या आप की माता जी मुझसे नहीं बोलती थी? तब मोबाइल और फोन तो था नहीं जरा-जरा सी बात मायके तक पहुँती। अब तो दाल के तड़के में क्या-क्या डाला है उसकी खबर भी मायके में तड़के को दाल में डालने से पहले पहुँचाने का प्रचलन है। यह सब बहुत सामान्य बातें हैं। आप लड़की के बाप हैं। धैर्य रखना सीखिए...।'

मानुषी शुरू से इस शादी का विरोध कर रही थी। हालाँकि इसके पीछे कोई ठोस आधार नहीं था। तब उसे लगा था कि हर लड़की पिता की सरपरस्ती से निकलने पर ऐसा करती है। लेकिन जब मानुषी के फोन आते तो वह स्वयं को अपराधी महसूस करता। फिर धीरे-धीरे सब सामान्य होने लगा था।

शांतनु का ट्रांसफर इसी शहर में हो गया था। बेटी के पास आ जाने पर उसे थोड़ा सुकून मिला। शहर एक होने के बावजूद भी वो शांतनु से बीस किलोमीटर की दूरी पर था। बीच में ट्रैफिक और शहर की खस्ता हालत सड़कें इस दूरी को और कष्टमय बना देती।

इसके बावजूद लगभग हर छुट्टी अब मानुषी उनके साथ बिताती। वह उम्मीद से थी। शांतनु के लिए यह शहर अपरचित था। इसलिए उसका झुकाव भी उसकी तरफ होने लगा था। मानुषी भी अब आजाद थी। यहाँ संयुक्त परिवार की पाबंदियाँ नहीं थी।

अब वह मानुषी की तरफ से चिंता मुक्त हो गया था। वह स्वस्थ और प्रफुल्लित नजर आती। शांतनु उसका पूरा ख्याल रखता। डाक्टर से समय-समय से चेकअप कराना। दवाइयों और खाने-पीने पर ध्यान रखना। परिवार के हर सदस्य को नए मेहमान का बेसब्री से इंतजार था।

सभी चाहते थे कि बेटा ही पैदा हो। मानुषी कहती - 'मम्मी यदि लड़का हो गया तो मुझे दुबारा इस झंझट में नहीं पड़ना होगा। और यदि लड़की हुई तो पुत्र की लालसा में एक बार फिर मुझे यह बोझ उठाना पड़ेगा। वैसे भी मेरे परिवार में लड़कियाँ बहुत है।'

शांतनु इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। हाँ! उनके परिवार के अन्य लोगों की अपेक्षा जरूर थी कि मानुषी को बेटा हो। शायद उसकी भी यही इच्छा थी।

पिछले दो महीने में मानुषी से जब मिलता वह दयनीय सी दिखती। उसे उठने बैठने में भी दिक्कत होने लगी थी। वह ईश्वर से प्रार्थना करता कि सब कुछ ठीक-ठाक निपट जाए। शायद यही कारण था कि जब से शांतनु ने फोन किया था, उसका दिल अंदर ही अंदर घबड़ा रहा था। मानुषी की सास भी दो सप्ताह पहले उसकी देख-भाल के लिए आ गई थी।

पत्नी पास ही सोफे पर आ कर बैठ गई थी। उसे देखकर मुस्कराई - 'अब तो आप नाना बनने वाले हैं। फिर काहे इतना उदास बैठे हैं?'

वह कुछ कहने के लिए मुँह खोलता इसके पहले ही मोबाइल बजने लगा। शांतनु का ही फोन था - 'पापा जी... अहिल्या नर्सिंग होम में हैं हम लोग। सब ठीक है...। घबराने वाली कोई बात नहीं है। नार्मल डिलवरी संभव है...।'

वह पत्नी को पूरी बात बताया और घर से बाहर निकल पड़ा। घबड़ाहट और बढ़ गई थी। मोटरसाइकिल चलाने का साहस नहीं हुआ। आरुषी ने भी मना किया। वह पत्नी के साथ कुछ कदम दूर आटो स्टैंड की तरफ चल दिया।

पत्नी शांत थी। वह हमेशा सकारात्मक सोचती है। शायद इस समय भी ऐसा ही सोच रही थी। वह पिछले तीन महीने से आने वाले मेहमान के बारे में सोच-सोच कर प्रफुल्लित होती रही थी। उसके पैर के पास ही डोलची रखी हुई थी। उसमें क्या है? वह नहीं जानता। न ही जानने की कोशिश की थी।

अचानक आटो रुक गया। वह बाहर सड़क की तरफ देख रहा था। रेलवे क्रासिंग था। कोई ट्रेन आने वाली थी। दोनों तरफ जाम लगा था। यह जून का दूसरा सप्ताह था। दस बजने वाले थे। हवा गरम होने लगी थी। उसने शांतनु का मोबाइल लगाया। मोबाइल स्विच ऑफ बता रहा था। उसने कई प्रयास किए किंतु सफलता नहीं मिली। अब वह भुनभुना रहा था। पत्नी ने उसका हाथ दबा कर सांत्वना देने का प्रयास किया।

ट्रेन सामने से गुजर गई थी। एक बार फिर ट्रैफिक में जान आ गई और वह धीरे-धीरे रेंगने लगी। आटो वाला दो-तीन जगह पूछने के बाद उसे एक गली के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया। एक अधबनी इमारत थी। जिसके ऊपर नीले रंग का नर्सिंग होम का साइन बोर्ड लगा था। एक मुर्झाया सा अधेड़ आदमी इमारत के गेट पर तंबाकू रगड़ रहा था। वह आटो से उतरने के बाद जैसे ही आगे बढ़ा अधेड़ आदमी में अचानक फुर्ती आ गई। वह सामने की केबिन में घुसा और उससे तमाम जानकारी लेने लगा। आदमी ने रजिस्टर में उसका नाम दर्ज किया और हस्ताक्षर के लिए रजिस्टर सामने बढ़ा दिया।

नीचे हाल में शांतनु मिल गए। वह किसी से मोबाइल पर बात करने में व्यस्त थे। उसे देखते ही वह फौरन बात करना बंद करके पास आ गए - 'आइए पापा जी... बधाई हो... आप नाना बन गए। बस अभी उन्हें रूम में शिफ्ट करवा कर आ रहा हूँ।'

'सब ठीक तो है न...। मानुषी कैसी है और बच्चा...?'

'हाँ... हाँ... सब ठीक है। आइए...।'

वह शांतनु के साथ हो लिया। पत्नी उसके पीछे थी। उसकी डोलची अब शांतनु के हाथ में थी। इमारत बाहर से देखने में जितनी अधूरी दिखाई दे रही। अंदर से उतनी बुरी नहीं थी। एक प्राइवेट रूम के सामने शांतनु रुक गए। उन्होंने दरवाजे को धक्का दिया और मानुषी मेरे सामने थी। उसके बगल में ही रुई के फाहे जैसी छोटी सी जान इस दुनिया को टुकुर-टुकर देख रहा। मैं उसे छूना चाहता था। अचानक याद आया - 'क्या है? बेटा या बेटी...?'

शांतनु धीरे से बोलें - 'बेटी...'

कमरे में कुछ देर के लिए खामोशी छा गई। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा - 'अरे पापा जी समय बदल रहा है। अब बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं है। बस उन्हें इस योग्य बनाओ की समाज में सर ऊँचा करके जी सकें।'

मुझे यह शब्द बेहद जाने-पहचाने से लग रहे थे।


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