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आलोचना

त्रिलोचन की काव्यानुभूति की संस्कृति
रवि रंजन


" त्रिलोचन की कविता एक नए काव्यशास्त्र की माँग करती है। " - नामवर सिंह

" हर समर्थ कवि के साथ काव्यशास्त्र भी खुद की पुनर्रचना करता है और बदले में सृजन की परंपराओं को काव्य को लौटाता है। परंपराएँ काव्य को समृद्ध बनाती हुई अंततः एक दिन काव्यरूढ़ियाँ बन जाती हैं , पुनः कोई समर्थ कवि या आलोचक एक अन्य काव्यशास्त्रीय पुनर्रचना की जरूरत और वजह पैदा करते हैं।" - विनोद शाही : आलोचना , अप्रैल-जून 2009, पृ. 97

त्रिलोचन की कविता में हिंदी भाषा की प्रकृति तथा उसके प्रयोक्ता समुदाय के जीवन का एक ठेठ रूप प्राप्त होता है। उसमें भारत की आम जनता की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति का निखरा हुआ काव्यमय रूप जगह-जगह देखा जा सकता है। किंतु, इसका यह मतलब कतई नहीं हैं कि त्रिलोचन निरे लोक कवि हैं और उन्हें अपने समय की बदलती हुई सामाजिक संरचना की कोई खबर नहीं थी। वस्तुतः त्रिलोचन का कवि भारतीय ग्रामीण जीवन की समस्याओं से जितनी गहराई से परिचित रहा है, उससे कम परख उसे शहरी जीवन की नहीं रही है। निर्मल वर्मा ने अपनी संवेदनशीलता की सीमाओं को स्वीकार करते हुए कहा है कि 'मैं संवेदनशीलता के अपने इलाके को जानता हूँ, मेरे पास केवल मध्य-वर्ग का नगरीय जीवन है।' स्पष्ट ही कवि त्रिलोचन की संवेदनशीलता का फलक बहुत व्यापक है। यदि वे पूँजीवादी आधुनिकीकरण के फलस्वरूप गाँवों की कीमत पर मकड़ी के जाले की तरह दिनानुदिन फैलते शहरी वातावरण एवं वहाँ के जीवन की समस्याओं से परिचित नहीं होते तो उनके द्वारा 'रैन बसेरा' जैसी कविता की रचना संभव न हो पाती। 'मैं' शैली में रचित इस कविता के उत्तम पुरुष द्वारा पहले काव्य-नायक परमानंद को शहर में बिना सोचे-समझे यहाँ-वहाँ टिकने पर संभावित खतरे से परिचित तो कराया जाता है पर बाद में उन्हें अपने यहाँ नहीं टिका पाने की विवशता के कारण उसे अत्यंत दुखी भी होना पड़ता है -

'कमरा एक और रहने वाले तीन

पत्नी, बच्चा और मैं

चौथे की गुंजाइश यहाँ नहीं

मेरी अनकहनी चिंता

मेरी बिथा बना दी।'

सच तो यह है कि कवि त्रिलोचन का अनुभव लोक अत्यंत व्यापक है। उनकी कविता का फलक गाँव से लेकर शहर तक, ग्रामीण किसान एवं खेत मजूर से लेकर कारखनियाँ मजूर तक तथा निम्न-वर्ग एवं मध्य-वर्ग की खस्ता हालत से लेकर श्रम से विरत अवकाशभोगी धन्नासेठ एवं भूस्वामी-वर्ग तक प्रसरित है। इसलिए उनकी कविताएँ अपने पाठकों से संवेदना का विस्तार माँगती हैं।

काव्यवस्तु ही नहीं, बल्कि रूपविधान की दृष्टि से भी त्रिलोचन-काव्य विविधिवर्णी है। उसमें कहीं गद्य-लय की उठान काव्य-लय में, तो कहीं काव्य-लय का पर्यवसान गद्य की लय में होता हुआ दिखाई देता है। लेकिन कुल मिलाकर त्रिलोचन एक गद्यात्मक प्रकृति के कवि प्रतीत होते हैं। इन सबसे अलग उनके यहाँ 'सौनेट' जैसे विदेशी काव्यरूप का भी सफल प्रयोग इतना अधिक हुआ है कि आज हिंदी में त्रिलोचन और सौनेट तकरीबन एक-दूसरे के पर्याय से बन गए हैं। अतः विचारणीय मुद्दा यह है कि क्या त्रिलोचन का काव्य रूपविधान की दृष्टि से स्खलित हो गया है तथा कहाँ वे वस्तुतत्व की नैसर्गिक आकांक्षा के अनुकूल उसे 'रूप' प्रदान कर श्रेष्ठ काव्य का सृजन करने में सफल हो सके हैं।

त्रिलोचन-काव्य के शिल्प पर विचार करते हुए शमशेर बहादुर सिंह ने अपने 'एक बिल्कुल परसनल एसे' में लिखा है कि 'मैं त्रिलोचन के शिल्प और शैली पर बहुत कठोर मत रखते हुए भी, उनकी कम-से-कम सौ से अधिक चीजों को दुनिया के अच्छे-से-अच्छे शिल्पी की रचनाओं के बराबर निःसंकोच रख सकता हूँ। उनके यहाँ जो कमजोरियाँ हैं, वे सहज ही कब ही दूर हो सकती थीं, मगर कई बातों की तरह भाषा और शैली पर भी इनके दृष्टिकोण में एक प्रकार का कट्टरपन है, एक कड़ापन। इस दिशा में मैं समझता हूँ कि इनके और मेरे बीच कहीं-न-कहीं बुनियादी मतभेद है। त्रिलोचन खड़ी बोली की हिंदी भाषा और साहित्यिक अभिव्यक्ति के आधुनिक इतिहास में एक बड़ी महत्वपूर्ण कड़ी बनकर आते हैं। एक विशिष्ट दृष्टिकोण के कारण उन्होंने अपने लिए, जाने या अनजाने जो सीमाएँ निर्धारित कर ली हैं, उनको पार करके आगे बढ़ना, ऐसा लगता है, उनके लिए सहज नहीं है। मगर फिर भी उनके लिए संभव क्या नहीं है?'

शमशेर का उपर्युक्त मंतव्य इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी पूर्वाग्रही आलोचना-दृष्टि का फलाफल होने के बजाए एक सुधी रचनाकार एवं कवि मित्र की हैसियत से दिया गया संतुलित वक्तव्य है। इसके साथ ही सब जानते हैं कि अनेक बार खुद शमशेर ने त्रिलोचन की कविताओं को ठीक-ठाक करने का कष्ट भी उठाया है और इस संदर्भ में उनमें 'सुचिंतन और श्रम' की सराहना स्वयं त्रिलोचन ने भी की है। अपने इस आलेख में शमशेर ने त्रिलोचन-काव्य की खूबियों एवं खामियों दोनों ही को पकड़ने का जो सूत्र बताया है, वह अत्यंत काम का है - 'त्रिलोचन की कमजोरियों और शक्तियों, दोनों को समझने के लिए यह हृदयंगम कर लेना बहुत उपयोगी है कि वह सामान्य को ही असामान्य का दर्जा देते हैं और उसी को व्यक्त करने के लिए कृत-संकल्प हैं। वे सपाट और स्पष्ट शैली में ही विश्वास करते हैं। सपाट का मैं स्ट्रेट के अर्थ में प्रयोग कर रहा हूँ। यह सपाट भाव, विचार और अनुभूति तीनों के अर्थ में है और अक्सर अनुभूति की धारा पर अनुलक्षित ड्रामें को व्यक्त करने के लिए, जिसमें भाषा का किंचित्भी लालित्य या 'साहित्यिकपन' उसे अयथार्थ बना देगा, जो त्रिलोचन को सह्य नहीं होगा। कविता मात्र अनुभूति की विशिष्टता में होगी, नहीं तो फिर नहीं होगी। उसके लिए और कोई उपादान और कोई आदान नहीं, जहाँ तक भी संभव है।'

कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि शमशेर की दृष्टि में सहजता ही त्रिलोचन काव्य का प्राण है। उनके यहाँ इस सहजता को काव्यवस्तु एवं रूपविधान, दोनों ही स्तरों पर गठित देखा जा सकता है। जहाँ उन्होंने जटिल काव्य वस्तु को उठाकर उसे सहज 'रूप' में विन्यस्त करने की असफल चेष्टा की है, वहाँ कविता कुछ हद तक लड़खड़ा गई-सी प्रतीत होती है पर अधिकांश कविताओं में त्रिलोचन अपनी स्वाभाविक सहजता एवं संयमित स्वर के बावजूद कुछ इस रूप में उपस्थित होते हैं कि उनके सामान्य रचाव में भी एक प्रकार का वैशिष्टय परिलक्षित होता है। अपनी कविता के बारे में उन्होंने दावा किया है -

शब्दों के द्वारा जीवित अर्थों की धारा

मैंने आज बहा दी है जिसके दो तट हैं

एक भाव का एक रूप का। निकट-निकट हैं

चाहे दूर-दूर दिखते हों। जो भी हारा-थका

यहाँ पहुँचेगा वह तन-मन में न्यारा

तेज-ओज पाएगा, लक्ष्ण सभी प्रकट हैं

हुलसी हरियाली से उपचित है, उद्भट हैं

वचन प्राण का परितोषण करते हैं सारा।'

(शब्द, पृ. 44)

कहना न होगा कि कविता अन्य कलाओं से इस कारण भी भिन्न है कि इसकी संरचना मात्र भाषिक होती है तथा इसकी संरचना की व्याख्या का एकमात्र माध्यम भाषा ही है। अतः कवि के सामने अपनी 'काव्यवस्तु' को उसके अनुकूल 'रूप' प्रदान करने की जो चुनौती होती है इसके लिए उसे भाषा के स्तर पर भी एक प्रकार का रचनात्मक संघर्ष करना पड़ता है। सर्वेश्वर जब अपनी सुप्रसिद्ध कविता 'कुआनो नदी' में लिखते हैं कि -

'आग मेरी भी धमनियों में जलती है

पर शब्दों में नहीं ढल पाती

मुझे एक चाकू दो

मैं अपनी रगें काटकर दिखा सकता हूँ

कि कविता कहाँ हैं'

तो प्रकारांतर से वे काव्य-रचना के क्रम में अपने इसी संघर्ष की ओर इंगित करते हैं। त्रिलोचन ने भी संभवतः अपने इसी संघर्ष की ओर इशारा करते हुए लिखा है -

'शब्दों में उन अर्थों को मैं कैसे लाऊँ

जो आमों की टहनी-टहनी में फल बनकर

झूल रहे हैं, जंगल में देखा है तनकर

सिंह किस तरह चलता है, किस विधि से पाऊँ

धरती का सा धैर्य दृगों में व्योम बसाऊँ

फिर यह छवि उरेहता जाऊँ'।

वस्तुतः यह कविता के सृजन-क्रम में कवि त्रिलोचन द्वारा काव्यवस्तु को सही रूप प्रदान करने के लिए उनकी तत्परता एवं सजगता का प्रमाण है। उसके पास साधन के रूप में मात्र शब्दों की पूँजी है, जिनकी शक्ति में कवि को पूरी आस्था है -

'शब्दों से ही वर्ण गंध का काम लिया है

मैंने शब्दों को असहाय नहीं पाया है

कभी किसी क्षण'

(शब्द, पृ. 41)

अज्ञेय ने एक स्थान पर कदाचित कविता की संरचना पर विचार करते हुए लिखा हैं कि - 'आज भी मेरे सामने जो समस्या है और जिसका हल पा लेना मैं अपने कवि जीवन की चरम उपलब्धि मानूँगा, वह अर्थवान शब्द की समस्या है। काव्य सबसे पहले शब्द है। और अंत में भी यही बात बच जाती है कि काव्य शब्द है। सारे कवि-धर्म इसी परिभाषा से निःसृत होते है। शब्द का ज्ञान, शब्द की अर्थवत्ता की सही पकड़ भी कृतिकार को कृती बनाती हैं। ध्वनि, लय, छंद आदि के सभी प्रश्न इसी में से निकलते और इसी में विलय होते हैं। इतना ही नहीं, सारे सामाजिक संदर्भ भी यहीं से निकलते है, इसी में युग संपृक्ति का और कृतिकार के सामाजिक उत्तरदायित्व का हल मिलता है या मिल सकता है।'

जाहिर है कि अज्ञेय ने यहाँ कविता को शब्द केंद्रित विधा माना है। किंतु जब वे 'दूसरा सप्तक' की भूमिका में लिखते है कि 'भाषा के विकास के क्रम में कविता की भाषा निरंतर गद्य की भाषा होती जाती है - तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि जब कविता की भाषा निरंतर गद्य की भाषा होती हुई अंततः गद्य काव्य की संरचना में अपनी भूमिका अदा करने लगेगी, क्या तब भी वह शब्द केंद्रित रह पाएगी? स्पष्टतः ऐसी स्थिति में कविता की इकाई के रूप में शब्द की जगह वाक्य की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होगी। ऐसे भी चूँकि कविता में शब्द है अतः काव्यात्मक तर्क से उनके एक-दूसरे के निकट होने के संयोग से यदि वाक्य बन जाए तो वह कविता में और अधिक प्रभावशाली भूमिका अदा कर सकता है। उदाहरण के लिए त्रिलोचन रचित 'गद्य कविता' का अंश देखना प्रासंगिक होगा -

'शहरों में आदमी को आदमी नहीं चीन्हता। पुरानी

पहचान भी बासी होकर बस्साती है। आदमी को

आदमी की गंध बुरी लगती है। इतना ही विकास

मनुष्यता का, अब हुआ है।

(आलोचना - 82, पृ. 13)

त्रिलोचन-काव्य में जो अनगिनत सूक्ति वाक्य हमें प्राप्त होते है वे कविता के प्रभाव को और बढ़ाते ही हैं। इस संदर्भ में उनका काव्य-कौशल वहाँ देखा जा सकता हैं, जबकि वे सौनेट के छंदों-तुकों की कठोर पाबंदी का पूरी तरह निर्वाह करते हुए भी अपने गद्यात्मक वाक्य-विन्यास की सरसता को संपूर्णतः सुरक्षित रख पाते हैं। अनेक बार तो उनके साँनेट में प्रयुक्त गद्यात्मक वाक्य-विन्यास साधारण बोलचाल की भाषा के बिलकुल करीब आ जाते हैं -

दुपहर थी जेठ की। हवा भी चलकर ठहरी थी।

नींम छाँह। चलता कुआँ। मुड़े। चलें हम

तुम। प्यास कड़ी भी और थकन भी गहरी।

घनी छाँह देखी। जा बैठे पेड़ के तले।

घमा गए थे हम। फिर नंगे पाँव भी चले

थे। मर गया पसीना जी भर बैठ जुड़ाए

लोटा-डोर फाँस कर जल काढ़ा। पिया।

चले चंगे हुए। हवा ने जब-तब वस्त्र उड़ाए।

उपर्युक्त वर्णन के मद्देनजर लूसिएं फेवब्रो के एक मार्मिक कथन का स्मरण हो आना स्वाभाविक है, जिसे इतिहासकार कार्लों गिंजबर्ग ने एक भिन्न संदर्भ में उद्धत किया है : "जो आप देखें, उसका वर्णन करना ठीक है, लेकिन जिसका वर्णन किया ही जाना चाहिए, उसे देख पाना - असल काम तो यह है।" कहना न होगा कि त्रिलोचन की कविता हिंदी के प्रबुद्ध पाठकों एवं आलोचकों से इसी 'असल काम' की अपेक्षा करती है।

इसी प्रकार नीचे उद्धृत उनके एक सौनेट के 'षष्ठक' की पंक्तियाँ भी काव्यभाषा एवं बोलचाल की भाषा के समीप होने का अच्छा उदाहरण हैं, पर इसका वाक्य-विन्यास ऊपर के उद्धरण के मुकाबले थोड़ा पद्यात्मक हैं -

'प्रिय लगती हैं बहुत, घमौनी, घाम देखकर

लोग कहीं जमते हैं, गायें और बकरियाँ

खड़ी धूप में मौज लिया करती है, सर्दी

इसी तरह जाती है। घर में मीन-मेख कर

आती है महिलाएँ, आती हैं, सुंदरियाँ,

कुत्ते करते रहते हैं आवारागर्दी।'

(शब्द, पृ. 22)

किंतु इसका मतलब यह नहीं कि त्रिलोचन की कविता केवल काव्य-भाषा को जनभाषा के करीब लाने के क्रम में किया गया अकाव्यात्मक प्रयोग मात्र है। वस्तुतः वे उधार की भाषा का इस्तेमाल करने के बजाए उस देशज भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिसमें हिंदी अंचल के लोग बोलते-बतियाते है। उनकी काव्य भाषा में एक खास तरह की जीवंतता है जो काव्य-सृजन में आम आदमी की बातचीत के लहजे के इस्तेमाल से पैदा हुई है। राजेश जोशी ने सही लिखा है कि 'बातचीत के अंदाज ही नहीं, बातचीत वाली भाषा का भी कलात्मक उपयोग त्रिलोचन ने किया है। उनकी कविता में एक ओर किसानों-सा बातूनीपन है तो दूसरे छोर पर बहुत सारी बात को कुछ शब्दों में, एक चुस्त-से वाक्य में या एक सूक्ति में समेट लेने की मितव्ययिता भी। यह द्वैत वस्तुतः इस बात का प्रमाण है कि उनकी कविता का रचाव हिंदी अंचल के किसान के चरित्र, आदतों और बोलचाल से कितने गहरे अर्थों में संपन्न हुआ है।'

वस्तुतः त्रिलोचन अपनी कविता में वस्तु-रूप के बीच सामंजस्य के आग्रही हैं। इसलिए जब काव्यवस्तु लोक जीवन से ली जाएगी, उसे अभिव्यक्ति देने वाली काव्य भाषा का भी लोक भाषा के करीब आ जाना अस्वाभाविक नहीं है। जिन कवियों के पास वस्तु-रूप के द्वंदात्मक संबंधों की पहचान का अभाव होता है वे अपनी कविता में वस्तु की नैसर्गिक आकांक्षा के विपरीत कभी तो संस्कृत शब्दों की आनावश्यक ठूँस-ठाँस करके तैयार की गई गद्य पंक्तियों को ही कविता के नाम पर आड़ी-तिरछी रेखाओं में सजा दिया करते हैं जिसके फलस्वरूप रचना से स्वाभाविकता का प्रायः लोप हो जाता है। कहना न होगा कि काव्य-रचना के बहाने कवि-कर्म को मजाक बना देने वाले कवियों से ज्यादा खतरनाक चरित्र उन रचनाकारों का होता है, जो शिल्प के उस्ताद तो होते हैं, पर अपनी इस उस्तादी को ही वे कवि-कर्म की इति मान लेते हैं। ऐसे रूप-शिल्प के आग्रही रचनाकारों की कविता में जन पक्षधरता की बात तो दूर, अनेक बार वहाँ भाव पक्ष की कीमत पर चमत्कार सृजन का आत्यंतिक आग्रह दिखाई देता है। त्रिलोचन का कवि इन तमाम स्थितियों से भली-भाँति अवगत है -

'भाषा कितना छिपा लिया करती है

अपनी पर्तों में, मनुष्य का केवल चेहरा

रह जाता है, केवल अभिनय की उस्तादी

खेल दिखाया करती है।'

कविता की अंतर्वस्तु को ठीक-ठाक अभिव्यक्ति देने के लिए समुचित काव्यभाषा तलाशने का उनका संघर्ष कितना गहरा है, यह नीचे उद्धृत उनकी काव्यपंक्तियों से पता चलता है -

भाषा के भी पार प्राण लहरें लेता है,

उगता है, बहता है और पल्लवित होकर

अपने पाँव खड़ा होता है, इसके द्वारा

और-और भी उठते हैं।

डॉ. परमानंद श्रीवास्तव मानते हैं कि 'त्रिलोचन के यहाँ एकदम अपरिचिति अप्रचलित संस्कृत के तत्सम शब्द ठेठ देशज तद्भव शब्दों के साथ जितना सहजता से, अनायास आते हैं और भाषा की अर्थशक्ति (जहाँ-तहाँ अर्थव्याप्ति) के कारण बनते हैं, वह अन्यत्र विरल है।' वस्तुतः त्रिलोचन की कविता में तत्सम शब्दों के साथ तद्भव एवं देशज शब्दों के सटीक प्रयोग से रचना में बेतरतीबी की जगह एक प्रकार की विशिष्टता पैदा होती है, जो नए अर्थ-सौंदर्य की सृष्टि करती है -

भूमंडल भर के भविष्यव्यवसायी दल ने

जल-स्थल-नभ ने महा प्रलय होगा - भाखा है।

प्राणी अर्थप्राण हो गए हैं, बस कल की

चिंता उनको अकर्मण्यता से कर मलने

पर ही विवश कर रही है, जिसने राखा है

वह क्या कल न रखेगा, ऐसी चिंता छलकी।

(शब्द, पृ. 27)

उपर्युक्त काव्यपंक्तियों की संरचना का विश्लेषण करते हुए डॉ. नंदकिशोर नवल ने लिखा है कि 'इसमें भाखा शब्द में व्यंग्य है। व्यंग्य का कारण स्पष्ट है। वह यह कि भविष्य कथन का व्यवसाय करने वाले ज्योतिषियों के एक समूह ने एक निहायत झूठी बात इस भाव से कही है, जैसे कि वह सवा सोलह आने सही हो। यह कहना सामान्य कहना न होकर 'भाखना' ही हो सकता है। इस 'भाखा' में जो व्यंग्य है वह आगे 'राखा' शब्द में अपना अर्थविस्तार करता है, लेकिन इस बार व्यंग्य उस आम जनता पर है जो इस अंधविश्वास की शिकार है कि 'जाको राखे साईयाँ, मार सके न कोय' यह व्यंग्य उस सर्वशक्तिमान ईश्वर पर भी है, जिसमें कण मात्र भी शक्ति नहीं है। यह सारी व्यंजना 'भाखा' की तुक के लिए 'राखा' शब्द को लाने से संभव हुई है। इस तरह त्रिलोचन के सौनेटों में रूप और वस्तु, तुक और अर्थ की एक-दूसरी पर क्रिया-प्रतिक्रिया चलती रहती है।'

जैसा कि विदित है, त्रिलोचन ने सौनेट जैसे पश्चिमी काव्यरूप को अपनाने के बावजूद उसे रोला छंद के मात्रिक संगीत में ढालकर उसका एक अलग साँचा तैयार किया है, जो हिंदी भाषा की आंतरिक लय से मेल खाता है। उस संदर्भ में गंभीरतापूर्वक विचार करने से यह भी स्पष्ट होता है कि उन्होंने इस रूप प्रकार को विषयवस्तु की दृष्टि से अपेक्षित विस्तार दिया है। पेट्रार्की पद्धति पर लिखे गए सौनेटों के अलावा शेक्सपीरियन पद्धति पर लिखित उनके अनेकानेक सौनेटों में भी हमें वस्तुतत्व की दृष्टि से विविधता के दर्शन होते है। उदाहरण के लिए सदियों से सामंती दमन-शोषण के चक्र में पिसती तथा व्यवस्था का नरकभोगने को अभिशप्त आम जनता का क्रांतिकारी आवाहन करते हुए 'शेक्सपीरियन' पद्धति पर रचित उनके एक सौनेट की प्रथम चतुष्पदी की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -

'सड़ी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह के लिए

मैं ललकार रहा हूँ उस सोई जनता को

जिनको नेता लूट रहे हैं, कह कर ताको

मत, हम तो है ही।'

वस्तुतः त्रिलोचन का राजनीतिक विवेक उनकी काव्य-चेतना का अपरिहार्य अंग है। इसलिए अपने कविकर्म के बारे में उनकी समझ साफ है -

'बीज क्रांति के बोता हूँ मैं, अक्षर दाने

हैं, घर-बाहर जन समाज को नए सिरे से

रच देने की रुचि देता है। धीरे-धीरे से

रहना असम्मान है जीवन का अनजाने।'

और, अंत में सड़ी-गली समाजार्थिक व्यवस्था का व्यूह तोड़ने के लिए अवाम का यह आह्वान -

'अगर घुटन हो, प्राण छटपटाएँ तो घेरा

तोड़-फोड़ दो, क्योंकि हुआ है नया सबेरा।'

(अनकहनी भी कुछ कहनी है, पृ. 87)

त्रिलोचन की एक कविता है - 'बिना मिले लौटने की राह में।' मुक्त छंद में रचित यह पूरी की पूरी कविता आत्मकथन की शैली में विन्यस्त है। इस कविता का उत्तम पुरुष जब कवि विजेंद्र से मिलने भरतपुर जाता है तो पहले वह दरवाजे पर ही रुक कर भीतर की टोह लेता है। इस क्रम में जब उसे किसी की कोई आवाज नहीं सुनाई पड़ती तो बिना दरवाजा खटखटाए ही वह कई तरह के अनुमान करते हुए वापस लौट जाता है -

'संभव है, विजेंद्र और ऊषा किसी बात पर

आपस में ऊलझे हों

बच्चियाँ चुप हैं

माँ जी लेटी होंगी

बर्तन रसोई में बोलते हैं

उषा बोलती नहीं

सोचती हो शायद

ऐसा क्यों हो जाया करता है ऐसे में,'

इसके साथ ही उसे इस बात का भी तीक्ष्ण एहसास है कि उसके कवि-मित्र की पत्नी कविता से बहुत चिढ़ती हैं -

'यदि मिलकर ही आता

तो उषा कविता से

और अधिक चिढ़ जाती

वैसे हँसकर कहती

बड़ा आनंद आया'

इस पूरी कविता में आतिथेय के संभावित व्यवहार के बहाने अपनी खस्ता हालत तथा परिवार-समाज में कवि-कर्म की अप्रतिष्ठाजन्य स्थिति पर भाँति-भाँति से विचारा गया है। किंतु, जैसे ही अपने भविष्य के बारे में आशावादिता का एक स्वर उभरा है, तो, न केवल छंद विधान बदलता है, बल्कि इस भाव को अभिव्यक्ति देने वाली भाषा भी बदल जाती है -

'एक दिना नहिं एक दिना

कबहूँ दिन वे दिन फेर फिरेंगे'

(तुम्हें सौपता हूँ, पृ. 99)

कवि राजेश जोशी का कहना है कि "यथार्थवादी शैली और बातचीत की भाषा में त्रिलोचन की कविता को एक और महत्वपूर्ण आयाम दिया है - कविता में छोटी-बड़ी कहानी कहने का। ...लोककथाओं-सी सरल चुटीली, लेकिन गहरे घाव करने वाली कहानियाँ त्रिलोचन ने बाँधी हैं। 'धरती' की कविता 'चंपा' और 'जीवन का एक लघु प्रसंग' का बहुत सार्थक विस्तार 'नगई महरा' में हुआ है। त्रिलोचन की कहानी कहने की इस कला पर विस्तार किया जाना चाहिए।"

नागार्जुन-काव्य के रूप विधान पर विचार करते हुए राजेश जोशी ने जिस 'स्वागत में मुक्त संवाद' के फार्म की विस्तृत चर्चा की है, उसे उदाहृत करने वाली यथार्थ चेतना संपन्न अनेकानेक कविताएँ त्रिलोचन के यहाँ भी मौजूद हैं। यदि हम उनके 'धरती' नामक काव्य-संग्रह की कविताओं से ही आरंभ करें तो वहाँ 'भोरई केवट के घर' तथा 'चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती' जैसी कविताएँ अपनी नाटकीय संरचना एवं संवाद-योजना के कारण अत्यंत सशक्त बन पड़ी है।

नामवर सिंह ने ठीक ही लिखा है कि 'धरती' की जिस भाषा से 'चंपा' की कली फूटी है, उसी से आगे चलकर त्रिलोचन ने 'नगई महरा' शीर्षक लंबी कविता की सृष्टि की है, जिसमें गाँव की पूरी संस्कृति मूर्तिमान हो उठी है। वस्तुतः 'नगई महरा' ठेठ अर्थ में एक वर्णनात्मक कविता है। ऐसे तो त्रिलोचन की कविता में भाषा के विविध धरातल मिलते है, पर 'नगई महरा' कविता में उनकी काव्य भाषा चिरानीपट्टी की भाषा के बिलकुल करीब आ गई है, जिसमें कहीं से भी कोई बनावटीपन, आवेश एवं तनाव नजर नहीं आता -

'नगई खाँची फाँदे बैठा था

हाथों में वही काम

आँखे उन हाथों को

हयवट चिताती हुई

खाँची में लगी एक आँख मुझे भी देखा

और कहा बैठो उस पीढ़े पर

साफ है मैंने कुछ ही पहले धोया है

बैठने पर मुझसे कहा

अच्छा बाँच लेते हो रामायन

तुम्हारे बापू कहते थे जैसे

अब कोई क्या कहेगा

उनकी भीतरी आँख खुली थी

सुर भी क्या कंठ से निकलता था

जैसे असाढ़ के मेघ की गरज'

(प्रतिनिधि कविताएँ, पृ. 60)

रूप विधान की दृष्टि से 'नगई महरा' कविता पर विचारने से स्पष्ट होता है कि छोटे-बड़े कुल तेईस चरणों में लिखित इस कविता के हर चरण का एक केंद्रीय प्रयोजन है और उसमें किसी न किसी दृश्य या तथ्य या भाव का प्रस्थापन अवश्य हुआ है। प्रत्येक चरण के अंत में अगले चरण का आरंभ निहित है तो विधि वस्तुतः कथा-कथन की है और उपन्यासों में अपनाई जाती है जैसा कि पहले कहा जा चुका है, त्रिलोचन के काव्य में शब्द की जगह वाक्य ही प्रायः काई की भूमिका में है। इस कविता में भी जिन छोटे-छोटे सुगठित वाक्यों का इस्तेमाल किया गया है वे कविता को कथात्मक चरित्र प्रदान करते हैं। कविता की इस कथात्मकता के द्वारा जिस यथार्थ का उसे अभिव्यक्ति देने वाली भाषा बिल्कुल पारदर्शी है। तल तक साफ। सोमदत्त के शब्दों में कहें तो त्रिलोचन की यह कविता 'किसी व्यक्ति विशेष की या अलग-अलग घटी घटनाओं की काव्यात्मक परिणति मात्र नहीं, बल्कि एक समूचे वर्ग की जीवन पद्धति का औपन्यासिक संवेदना वाला आख्यान है।'

त्रिलोचन के कवि की एक बड़ी विशेषता है उसका संयमित स्वर। काव्य रचना के क्रम में कवि प्रायः उद्विग्न नहीं होता। इसके विपरीत नागार्जुन की अधिकांश कविताओं में हमें अत्याधिक उद्वेग के दर्शन होते हैं। किंतु, इसका मतलब यह नहीं है कि त्रिलोचन का मन अपनी पारिवेशिक विसंगतियों से आहत नहीं होता और उसके मनःमस्तिष्क में आक्रोश की लहरें नहीं उठती। सच तो यह है कि वे अपनी गंभीर प्रकृति एवं अंतर्मुखी व्यक्तित्व के कारण अपना गुस्सा पी जाते हैं। राजेश जाशी का कहना है कि 'स्वर की ऊपरी तटस्थता उनको ऐसा विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करती है, जिससे उन्हें हिंदी कविता में अलग से पहचाना जा सकता है। आवेगों की ऐसी संयमित अभिव्यक्ति और सुर की ऐसी तटस्थता का कोई दूसरा कवि ढूँढ़ना असंभव-सा लगता है।' इसके चलते जब वे अपनी काव्यवस्तु को रूप प्रदान करने या काव्य-रचना के लिए प्रवृत्त होते हैं, तो अनायास उनकी रचना में एक प्रकार की संवेदनात्मक गहराई आ जाती है। परंतु इसके साथ ही त्रिलोचन-काव्य में ऐसे भी अनेक उदाहरण मौजूद हैं, जहाँ अनुभूतिप्रवणता के बजाए कोरी उपदेशात्मकता की प्रवृत्ति प्रधान है। वस्तुतः अनुभव के जिस मर्म के कारण उनकी अनेकानेक गद्यात्मक शैली में लिखित कविताओं में भी उच्च स्तरीय कवित्व के दर्शन होते हैं, उसी के अभाव में उनकी कई छंदोंबद्ध एवं तुकों के कठोर नियम का पालन करके लिखित कविताओं एवं विशेषकर सौनेटों में फाकनर के गद्य-सा कड़ियल ठोसपन के चलते कवित्व लगभग गायब हो गया-सा प्रतीत होता है। डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में - 'उसके बाद रह जाता है, द्विवेदी-युगीन सीधा-सरल पूरा सही वाक्य। व्याकरण और इतिवृत्त। सौनेट के अंदर अनुवर्तन वाक्य-रचना-निर्वाह के कारण ऐसी दुर्घटना अक्सर घटित होती है। तुक मिलाने की दयनीय कोशिश में फालतू वाक्य भी काफी आते हैं। कारण वही पूरा वाक्य लिखने का हठ।'

इस प्रसंग में त्रिलोचन का कहना है कि 'लय तो गद्य और पद्य दोनों में होती है गद्य की लय थोड़ा अलग जाती है, वह अनियंत्रित होती है और पद्य की लय नियंत्रित होती है। कवि वहाँ पंक्ति के अनुवर्तन में है, उसे हर पंक्ति को पूरा करना ही है चाहे भाव हर पंक्ति का पूरा होने के पहले ही खत्म हो जाए।'

जाहिर है कि त्रिलोचन ने बड़ी संख्या में गजलों की रचना भी की है, जो उनके 'गुलाब और बुलबुल' नामक संग्रह में संग्रहित हैं। जहाँ तक 'गज़ल' के फार्म का प्रश्न है, उसके निर्माण की इकाई शेर होता है जिसकी तुलना एक हद तक 'दोहे' जैसे रूप प्रकार से की जा सकती है। ज्यादातर गजलों के अधिकांश शेर अपने-आप में पूर्ण होते हैं। इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण बात यह है कि शेर में प्रायः रवानी तभी आती है जब इसकी अंतर्वस्तु रोमांटिक होती है। कहने की जरूरत नहीं कि यह रोमांस कई बार 'रेडिकल रोमांस' भी हो सकता है। किंतु, इसका मतलब यह नहीं है कि शेर या गज़ल के फार्म में यथार्थवादी अंतर्वस्तु को ढाला ही नहीं जा सकता। उर्दू के तरक्कीपसंद शायदों में अकेले फ़ैज अहमद 'फ़ैज' की सैकड़ों गज़लें यथार्थवादी अंतर्वस्तु वाली हैं। फिर भी यदि गौर से देखें तो स्पष्ट होगा कि उर्दू की बेहतर गजलों में प्रायः तिक्त यथार्थवादी अंतर्वस्तु भी रोमानी शर्करा से आवेष्ठित रहा करती है। तब जब तक यह संतुलन वहाँ बना रहता है, तभी तक यथार्थवादी अंतर्वस्तु का गज़ल के फॉर्म में प्रभावकारी विन्यास संभव हो पाता है। उदाहरण के लिए फ़ैज का एक प्रसिद्ध शेर देखा जा सकता है -

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग

और भी दुख हैं, जमाने में मुहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा

या

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया

तुझ से भी दिलफ़रेब हैं, ग़म रोजगार के।

ऊपर उद्धत दोनों ही कविताओं की अंतर्वस्तु यथार्थवादी है पर कवि के कहने का ढंग कुछ ऐसा है कि यथार्थवादी अंतर्वस्तु भी सफलता के साथ रोमांटिक ढंग से अभिव्यक्त कर दी गई है। खूबी यह कि इनमें न तो वस्तु द्वारा रूप की सीमाओं की अवहेलना की गई है और न ही रूपतत्व ने वस्तु का गला घोंटकर काव्य-प्रभाव को बाधित किया है। वस्तुतः यहाँ कविता के दोनों ही तत्व अपनी-अपनी जगह पर संतुलन बनाए हुए हैं। इसलिए विलग उर्दू शायरी में ऐसे भी कई उदाहरण मिलते हैं, जबकि प्रातिभ रचनाकारों ने गज़ल के फार्म में खालिस क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को भी सफलता के साथ विन्यस्त किया है। हिंदी गज़ल के नाम पर दुष्यंत ने जो कुछ लिखा है, वह मेरी समझ से नागरी लिपि में लिखित उर्दू ज्यादा है। ऐसा कहकर यहाँ हिंदी-उर्दू विवाद छेड़ना मेरा अभिप्राय नहीं है। किंतु यदि केवल दुष्यंत की काव्य भाषा पर गौर किया जाए तो स्वतः स्पष्ट हो जाएगा कि अपवादस्वरूप कुछ शेर छोड़कर उनके काव्य संग्रह 'साए में धूप' की अधिकांश गजले हिंदी में है या उर्दू में।

जहाँ तक त्रिलोचन की गजलों का सवाल है, उनकी कई गज़लें बेशक अच्छी हैं, जिनको हिंदी गज़ल भी कहा जा सकता है। पर गज़ल में काफ़िया-रदीफ़ की पाबंदी के कारण जब वे भाषा के स्तर पर तत्सम शब्दों को ग्रहण करते हैं, तो, स्वभावतः उनके शेर बोलचाल की भाषा से दूर चले जाते हैं। उदाहरण के लिए उनके एक शेर में 'कितना अवसन्न हूँ कितना दुखी है मेरा मन' में 'अवसन्न' तथा 'अपनी बस्ती में कहीं हर्ष नहीं पाता है' में 'हर्ष' जैसे शब्द वस्तुतः गज़ल या शेर के फार्म की प्रकृति के अनुरूप नहीं हैं। लेकिन यदि इनका विकल्प ढूँढ़ा जाए तो शेर के हिंदी-उर्दू से दूर फारसी के करीब चले जाने की संभावना अधिक होगी। अतः यहाँ इनका प्रयोग करना एक प्रकार से कवि की बाध्यता है। इन सबसे विलग कई बार त्रिलोचन जब अपनी कवि-प्रकृति के अनुरूप सहज होकर खालिस यथार्थवादी अंतर्वस्तु को 'शेर' के फार्म में विन्यस्त करते हैं, बात तो वे कह पाते हैं, पर कवित्व की दृष्टि से शेर बहुत कमजोर प्रतीत होता है -

'घर औरों का जो बनता है अपना भी आप बना लेगा

अनुकूल मसाला पा जाए औ' चूना गारा पा जाए।'

कहने की अवश्यकता नहीं है कि यहाँ कवि ने जिस प्रकार काव्य वस्तु को 'शेर' के फार्म में विन्यस्त करने का असफल प्रयास किया है उससे कविता की प्रभावान्विति बाधित हुए बिना नहीं रह सकती। किंतु इसका मतलब यह नहीं है कि त्रिलोचन गज़लगो के रूप में बिलकुल असफल रहे हैं। सच तो यह है कि जहाँ गज़ल के 'रूप' की प्रकृति को ध्यान में रखकर उसके अनुकूल अंतर्वस्तु को हिंदी-उर्दू से उपयुक्त शब्दों का चयन करके विन्यस्त किया गया है, वहाँ उनकी गज़लें भाव का निर्झर बन गई है -

'लोग कच्चा तुम्हें बतलाएँगे खुश होकर

गैर के आगे गिला अपनों का गाया न करो

क्या हुआ लोग जो हँसते है, उन्हें हँसने दो

प्रेम की पीर में तो आँसू न बहाया करो।'

(गुलाब और बुलबुल, पृ. 18)

त्रिलोचन-काव्य के प्रसंग में सौनेट, वैचारिक कविताओं, गज़ल आदि के बाद 'गीत' के फार्म की चर्चा भी अपेक्षित है। वस्तुतः त्रिलोचन ने इस संदर्भ में निराला के अनुभवों से लाभ उठाते हुए एक लंबे समय से ठहरे हुए रूप प्रकार को जो प्रगति का मार्ग दिखाया है वह कहीं से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उनके गीतों में मात्र आत्माभिव्यंजना की जगह शब्द-चेतन समुदाय को अपने से बाहर आकर देखने-परखने का जो आमंत्रण है वह हिंदी गीतकाव्य में प्रायः दुर्लभ है। कहना न होगा कि केवल वाचन के लिए रचित वैचारिक कविता से भिन्न गीत की एक अलग रचनात्मक शर्त एवं समझ होती है और कई मायने में तो प्रभावान्वित की दृष्टि से वैचारिक कविता की अपेक्षा गीत कहीं ज्यादा श्रेयस्कर होता है।

गीत की रचनात्मक महत्ता को स्वीकारते हुए जार्ज लुकाच ने लिखा है कि 'गीतकाव्य में केवल महान क्षण रहता है। यह वह क्षण होता है जिसमें प्रकृति और आत्मा की सार्थक एकता या उनका सार्थक अलगाव जो आत्मा का सर्व-स्वीकृत आकेलापन हुआ करता है, शाश्वत बन जाते हैं।' आगे लुकाच ने कदाचित गीतकाव्य की रचना-प्रक्रिया पर विचार करते हुए लिखा है कि 'गीतमय क्षण में आत्मा की शुद्धतम आभ्यंतरिकता अनिवार्यतः काल से पृथक कर दी जाती है, वस्तुओं की अस्पष्ट विविधता से ऊपर उठा दी जाती है और इस तरह पदार्थ में परिवर्तित कर दी जाती है, जबकि अपरिचित और अज्ञेय प्रकृति भीतर से निकाल दी जाती है, ताकि चमकते हुए एक प्रतीक में बंध सके। आत्मा और प्रकृति के बीच स्थापित इस संबंध को केवल गीतमय क्षणों में ही निर्मित किया जा सकता है।' (उपन्यास का सिद्धांत, पृ. 15)

लुकाच ने यहाँ जिस गीतमय क्षण की महत्ता पर बल दिया है वह और कुछ नहीं, बल्कि गायन-योग्य सामग्री को रचने की मनःस्थिति ही है, जिसका सीधा संबंध गायन की मनःस्थिति से है और यह मनःस्थिति निश्चय ही पढ़ने के लिए लिखित वैचारिक कविता को रचने की मनःस्थिति से एक हद तक भिन्न होगी। त्रिलोचन-काव्य में हमें इस मनःस्थिति का प्रथम दर्शन उनके पहले काव्य संग्रह 'धरती' की पहली ही रचना में होता है -

'मुझे जगत जीवन का प्रेमी

बना रहा है प्यार तुम्हारा

मेरी दुर्बलता को हर कर

नई शक्ति नव साहस भर कर

तुमने फिर उत्साह दिखाया

कर्म क्षेत्र में बढ़ूँ सँभलकर

तब से मैं अविरत बढ़ता हूँ

बल देता है प्यार तुम्हारा।'

(धरती, पृ.11)

डॉ. रामविलास शर्मा का मानना है कि आदिम कबीलाई समाज टूटने और नया श्रम विभाजन लागू होने पर 'स्त्री-पुरुष' में छोटे-बड़े का भेद उत्पन्न होता है। स्त्री घर का काम करती है, पुरुष बाहर का काम करता है। संपत्ति का स्वामी पुरुष होता है, वह युद्ध करता है, शास्त्र रचता है, व्यापार करता है, स्वभावतः उसके काम के आगे स्त्री का घरेलू काम छोटा लगता है। शूद्रों में, जहाँ स्त्री पुरुष के साथ काम करती है, वह द्विजवर्ण की देवियों की तुलना में अधिक समर्थ होती है। कहना न होगा कि स्त्री पर उसके अनचाहे ही थोपी गई दासता की बेड़ियों से उसे मुक्त कराने के लिए प्रगतिशील कवियों ने दो तरीके अख्तियार किए।' पहला, सामाजिक जीवन में अपने साथ उन्हें सहभागी बनने को प्रेरित किया और दूसरा सामाजिक विषमताओं का अंत करके समता पर आधारित नए समाज की रचना का आदर्श अपनाया। सामाजिक जीवन में स्त्री-पुरुष द्वारा परस्पर एक-दूसरे को अपने संघर्ष में सहभागी बनाने की कामना को व्यक्त करते हुए त्रिलोचन लिखते हैं -

बाँह गहें कोई अपरिचय के सागर में

दृष्टि को पकड़कर कुछ बात कहे कोई।

लहरें ये लहरें वे इनमें ठहराव कहाँ

पल-दो पल लहरों में साथ रहे कोई।

(ताप के ताए हुए दिन)

हालाँकि कवि का जीवन-संघर्ष अत्यंय गहरा है जिसमें बारंबार उसे पराजय की पीड़ा झेलनी पड़ी है -

ठोकरें दर-ब-दर की थीं हम थे,

कम नहीं हमने मुँह की खाई है।

(गुलाब और बुलबुल)

पर ऐसे में प्रेम पाकर उसकी जीवन शक्ति बढ़ जाती है और वह जीवन-संग्राम से मुँह फेरने की बजाए नई ऊर्जा से परिपूर्ण होकर कर्म-क्षेत्र में प्रवृत्त होता है - 'मुझे जगत जीवन का प्रेमी बना रहा है प्यार तुम्हारा।' जयशंकर प्रसाद ने प्रेम के संदर्भ में लिखा है कि वह पाने के बजाय देने की चीज है - 'पागल रे! वह मिलता है कब / उसको तो देते ही हैं सब'। त्रिलोचन की कविता में भी ऐसे ही उदात्त स्वर सुनाई पड़ते हैं -

'स्नेह मेरे पास है, लो स्नेह मुझसे लो

चल अँधेरे में न जीवन दीप ठुकराओ

साँस के संचित फलों को यों न बिखराओ

मेघ माला विश्व है लो राग मुझ से लो।'

(सबका अपना आकाश, पृ. 55)

किंतु, यहाँ ध्यान रखना जरूरी है कि प्रसाद के 'प्यार' के मुकाबले जीवन के उत्थान-पतन को सहज रूप में झेलने को तत्पर जुझारू समुदाय को त्रिलोचन के कवि द्वारा दिया जाने वाला यह 'स्नेह' तथा 'राग' अपनी प्रकृति में कहीं ज्यादा आत्मीय है। दूसरे शब्दों में इस 'स्नेह' और 'राग' की अर्थध्वनि अपने विशिष्ट संदर्भों के कारण परंपरागत नहीं रह गई है, जिसका कारण कवि की प्रगतिशील जीवन-दृष्टि है। त्रिलोचन के पास विपरीत स्थितियों में भी इस 'राग तत्व' से जुड़ाव के कारण एक आंतरिक दृढ़ता है, अतिरिक्त ऊर्जा है -

'मुझको तो मुस्कान तुम्हारी जिला रही है

जहाँ कहीं भी और जब कहीं भी जाता हूँ

वही स्निग्ध मुस्कान आँख आगे पाता हूँ,

मर्त्यलोक में श्रांत देख कर पिला रही है

मुझे सुधा का सार...'

(फूल नाम है एक, पृ. 85)

टी.एस. एलियट ने अपने 'ट्रेडिशन एंड इंडिविजुअल टैलेंट' शीर्षकीय सुप्रसिद्ध निबंध के पूर्वार्ध में किसी कविता का महत्व पूर्ववर्ती कवियों की कविताओं के साथ समझने-परखने की आवश्यकता पर बल देते हुए लिखा है कि 'किसी कवि या कलाकार की पूर्ण सार्थकता केवल अपने-आप में नहीं होती। उसकी सार्थकता, उसकी परिशंसा दिवंगत कवियों और कलाकारों की सापेक्षता में ही होती है।' राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने एक आलेख में सोदाहरण यह उद्घाटित किया है कि त्रिलोचन की कई कविताओं में पूरा उपमान या बिंब ही नहीं, कथ्य भी कालिदास से आभार के साथ लिया गया है। किंतु, 'त्रिलोचन के कवि का यह स्वभाव नहीं है कि वह केवल सजावट के लिए या अपनी बात में टेका लगाने के लिए पुराने समर्थ कवि की कथनभंगी उधार लें, पहले की कविता से मुहावरा या उक्ति वह तभी उठा सकता है जब वह मुहावरा या उक्ति उसके अपने अनुभव में संपृक्त हो।' यदि हम इस दृष्टि से त्रिलोचन के गीतों को उनके पूर्ववर्ती गीतकारों की रचनाओं के संदर्भ में रखकर विचारें तो हमें वहाँ अनेकानेक ऐसे गीत भी प्राप्त होंगे, जो उन्होंने उन गीतकारों की विभिन्न शैलियों का अभ्यास करते हुए रचे हैं -

'दूर अति दूर, क्षितिज के पार

कनक का रच सुंदर संसार

हरित अंकुर से उठा उभार

प्राप्त कर जग का मृदु व्यवहार।'

पंत की 'दूर उन खेतों के उस पार' वाली शैली में रचित इस गीत की अगली पंक्तियों में 'त्रिलोचनपन' को आसानी से रेखांकित किया जा सकता है -

'बढ़ा, वह उद्धत हो स्वयमेव

बह पड़ा पाकर कुटिल बयार

धरा के धसके मानस नेत्र

वितरने लगे उसे धिक्कार।'

(तुम्हें सौंपता हूँ, पृ. 13)

इसी प्रकार निराला-शैली में रचित उनका एक छोटा गीत भी देखा जा सकता है -

'कैसी नित नई यह प्यास!

हो गया प्रति-कंठ में

जिसका कि अब आवास

तृषित छूटे हैं उसी की ओर

यदि कहाँ-समझे कि यह निशि भोर

चाहते भर हैं कृपा की कोर

उठ रहा प्रति-रोम में गति रोर

जग का यही अभ्यास!'

(तुम्हें सौंपता हूँ, पृ. 16)

आज यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है कि कालांतर में त्रिलोचन की एक निजी शैली का विकास हुआ। जहाँ तक उनके गीतों में वस्तु-रूप संबंध का सवाल है, वहाँ प्रायः संतुलन की स्थिति ही दृष्टिगत होती है। कारण यह कि गीत के फार्म में विन्यस्त करने हेतु रचनाकार ने प्रायः लिरिकल अंतर्वस्तु का ही चुनाव किया है। फलतः गीत-रचना में उसे बेहद सफलता मिली है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, त्रिलोचन के गीत मात्र आत्माभिव्यंजना के वाहक नहीं हैं, वहाँ इसके साथ-साथ जनपक्षधरता का भी स्पष्ट स्वर सुनाई देता है -

व्यूह बनते हैं दलों के एक दल चुनना पड़ेगा

फिर महाभारत निकट है

लक्षणों से यह प्रकट है

शंख नीरव हैं, रहें पर

भर चुका अब धैर्य-घट है

रात-दिन उद्योग चलता

पक्षवर्धन की विकलता

पाँव सिर की ओर दो हैं, एक की सुनना पड़ेगा

एक अपहर्ता अपरकर्ता तुम्हें गुनना पड़ेगा।

(सबका अपना आकाश, पृ. 35)

पिछले कई वर्षों में भारतीय राजनीति में सक्रिय कुछ अवसरवादी तत्वों ने सामाजिक न्याय को सांप्रदायिक और जातिवादी घृणा का पर्याय-सा बना दिया है। फलतः जो राजनीतिक पार्टियाँ जातिवाद को जड़-मूल से उखाड़ने का संकल्प लेकर गठित हुई थीं उनमें से अनेक आज खुद जातिवाद की घिनौनी राजनीति में लिप्त है। ऐसे में डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की चेतावनी अक्षरशः सत्य सिद्ध हो रही है कि 'जाति के आधार पर कोई भी निर्माण स्थायी नहीं रह सकेगा, वह खंड-खंड हो जाएगा।' यदि आजादी के बाद सत्तारूढ़ हुए दल ने जनतांत्रिक नैतिकता के तहत आरंभ से ही सांप्रदायिक और जातिवादी राजनीति के बजाए सत्ता में आम आदमी की व्यापक साझेदारी सुनिश्चित करते हुए उसके बहुमुखी विकास के लिए कुछ ठोस कदम उठाया होता तो आज यह समाजघाती तांडव भारतीय राजनीति को इतना विद्रूप और गर्हित न बना पाता। दीगर बात यह कि हमारे जमाने में वृद्ध पूँजीवाद जिस तरह भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से गुजरते हुए आर्थिक उपनिवेशवाद को जन्म दे रहा है, उसके चलते विकास के नाम पर दुनिया के गरीब देशों में प्राकृतिक संसाधनों की लूट मची हुई है। भारत में बड़े पैमाने पर किसानों द्वारा रोज-ब-रोज आत्महत्याओं तथा ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का शहर की ओर पलायन आदि के मद्देनजर याद आते है क्लाद लेवी-स्त्रास, जिन्होंने अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक 'ट्रिस्टेस ट्रापिक्यूज' में लिखा है : 'दुनिया बिना मानव प्रजाति के शुरू हुई और निश्चय ही इसी के साथ खत्म हो जाएगी। आदमी ने क्या किया है, सिवा प्रसन्नतापूर्वक खरबों संरचनाओं को तोड़ा और उन्हें ऐसी स्थिति पर पहुँचा दिया कि वे अब पुनर्गठित होने की स्थिति में नहीं हैं।' इस विवेचन के आलोक में यदि त्रिलोचन के काव्य-परिदृश्य पर दृष्टिपात करें तो वहाँ ऐसी अनेकानेक कविताएँ मिलती है जिनके माध्यम से कवि ने अवाम को धर्म-जाति आदि की सामंती दीवारों के साथ-साथ तमाम तरह की विषमताओं के घेरों को तोड़कर अपने हित में एकजुट होने की सलाह दी है -

'दीवारें! दीवारें! दीवारें! दीवारें!

चारों ओर खड़ी हैं। तुम चुपचाप खड़े हो

हाथ धरे छाती पर, मानो वहीं गड़े हो।

मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्के मारें

और ढहा दें। उद्यम करते कभी न हारें

ऐसे-वैसे आघातों से। स्तब्ध पड़े हो

किस दुविधा में। हिचक छोड़ दो। जरा कड़े हो।

आओ, अलगाने वालें अवरोध निवारें।'

(त्रिलोचन : प्रतिनिधि कविताएँ, पृ. 80)

कार्ल मार्क्स ने अपने लेखन में धर्म की आलोचना को बहुत महत्व दिया है और कहना न होगा कि जब धर्म की संवेदना पथराती है तो यह ठूँठ कर्मकांड बन जाता है। इस दृष्टि से त्रिलोचन द्वारा महाकुंभ (1953) में मची भगदड़ पर रचित पच्चीस सौनेटों का महत्व उल्लेखनीय है, जिनमें मुख्य चिंता है : 'कब स्वतंत्र होगी यह जनता टूटी हारी।' नामवर सिंह ने सही लिखा है कि इनसे गुजरते हुए 'सहज ही कवितावली के लंकादहन संबंधी कवित्त याद आ जाते हैं। लेकिन यह विभीषिका कुछ और है। इस सौनेट-पुंज में त्रिलोचन महाकाव्यात्मक प्रतिभा के साथ सामने आते हैं। वही विराटता। वही गरिमा। वही मानव त्रासदी।'

कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं :

कीचड़ से लथपथ आता है, चिल्लाता है -

लाशों पर चढ़कर मानव आता-जाता है।

लानत है, लानत। विराग को राग सुहाए

साधू होकर मांस मनुज का भरमुँह खाए।

लाशों का सुखवन पुलीस ने फैलाया है,

इसी के लिए तो उसने पैसा खाया है

सुप्रबंध का कहना ही क्या है, कमाल था

समाचार-पत्रों ने गली-गली गाया है।

लाशों की चर्चा थी, अथवा सन्नाटा था

राज्यपाल ने दावत दी थी, हा-हा, ही-ही।

इस प्रसंग पर रचित सौनेटों में यदि एक ओर 'सतुआ और पिसान बाँध के कुंभ नहाने' आई 'गंगा मैय्या के गीत गा रही' दिशाहारा धर्मभीरु जनता-जनार्दन के प्रति आत्यंतिक मोह और उसकी दुर्दशा को देखकर गहरा दुख व्यक्त हुआ है वहीं नामवर जी के शब्दों में 'महाकुंभ में हत निरीह प्राणों की पीड़ा' के लिए जिम्मेदार सत्ता-व्यवस्था के शोषण-तंत्र के सभी पेंचों का उद्घाटन भी किया गया है। कवि आलोचक अरुण कमल के शब्दों में कहें तो 'इनसे गुजरते हुए सहृदय पाठक को यह तीखा एहसास हुए बगैर नहीं रह सकता कि एक तरह से यह महाकुंभ सिर्फ प्रयाग का ही महाकुंभ नहीं, बल्कि पूरे भारत में लगातार चल रहे शोषण का महाकुंभ है।'

कवि केदारनाथ सिंह के अनुसार त्रिलोचन के शिल्प की एक खास बात यह है कि वे किसी भी वस्तु का प्रयोग प्रतीकवत नहीं करते। अपनी कविता में वे सारी काव्यात्मक जिम्मेदारी के साथ उसे 'वस्तु' ही बने रहने देते हैं। वस्तुतः इसका संबंध भारतीय साहित्य की रूप संबंधी अवधारणा की एक विशिष्ट परंपरा से हैं, जिसके व्यावहारिक उदाहरण हमें अपनी लोक-कविता और क्लासिकी कविता में एक साथ मिल सकते है। यह परंपरा एक खास ढंग से प्रेमचंद के कथा साहित्य में भी जीवित है। वहाँ भी वर्णन के क्रम में आने वाली वस्तुओं को प्रतीकों में बदल डालने की जल्दी कहीं नहीं दिखाई देती। 'नए पत्ते' और 'बेला' की कुछ कविताओं में निराला ने भी इस तथ्यपरक कला का प्रयोग किया है। फिर भी मोटे तौर पर कहना चाहे तो त्रिलोचन काव्य में आए चरित्रों में 'नगई महरा', 'भोरई केवट' एवं 'चंपा' आदि पात्रों को उस सत्तर-पचहत्तर प्रतिशत भारतीय ग्रामीण जन का प्रतीक-पात्र कह सकते हैं, जिन्हें हाड़-तोड़ मजूरी के बाद भी भरपेट अन्न नसीब नहीं हो पाता। इस प्रकार 'रैन बसेरा' कविता का 'मैं' (उत्तम पुरुष) भी शहर में रहने वाले निम्न-मध्यवर्गीय लोगों की जीवन स्थिति को प्रतीकित करता है, जो चाहते हुए भी किसी को अपने यहाँ टिका पाने में असमर्थ होते हैं और 'देह धरे का दंड' भोगते हुए इन तमाम स्थितियों को चुपचाप झेलने को अभिशप्त होते हैं। त्रिलोचन-काव्य में ऐसे अनेक प्रतीकों को खोजा जा सकता है।

मैनेजर पांडेय ने लिखा है कि त्रिलोचन का कवि-व्यक्तित्व आधुनिकतावादियों को पसंद नहीं आ सकता उन्होंने आज तक अपनी कविता को लगातार आधुनिकतावादी फैशनों और प्रवृत्तियों से बचाया हैं। याद आ सकते हैं कवि-आलोचक मलयज, जिन्होंने त्रिलोचन को 'औसत भारतीयता का कवि' बताया था। आगे चलकर उन्होंने अपनी डायरी में त्रिलोचन की भारतीयता में बौद्धिक ऊर्जा की कमी को भी दर्ज किया था : 'हमें रामचंद्र शुक्ल की भारतीयता चाहिए, प्रेमचंद की भारतीयता चाहिए, गांधी जी की भारतीयता चाहिए जिनमें एक ओर अपनी जमीन का विवेक था तो दूसरी तरफ पश्चिम से टकराने की अदम्य बौद्धिक ऊर्जा और ललकार और उससे टकराने का खुलापन - त्रिलोचन की भारतीयता जैसा बँधा-बँधापन उनमें न था, एक जगह टिके रहने की भारतीयता उनमें न थी।'

कहना न होगा कि मलयज के चिंतन में आधुनिकतावादी आग्रह है जिसके चलते अज्ञेय में उन्हें दो टूक ओजस्वी विचारशीलता दिखाई दी वहाँ त्रिलोचन में काव्य-विवेक के अत्यंत पुष्ट होने के बावजूद समय के विवेक का अभाव खटकता रहा और अपने इसी आलोचनात्मक विवेक के तहत उन्होंने कवि त्रिलोचन को अपनी कविता का कायाकल्प करने का जोखिम उठाने की सलाह दे डाली। गौरतलब है कि स्वयं त्रिलोचन ने भी एक साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि 'हमारी आधुनिकता यूरोपीय आधुनिकता न होगी। भारतीय आधुनिकता ही होगी। और कोई रचनाकार तब बड़ा होता है जब वह अपने पात्रों का वैसा उपस्थापन करता है रचना में जैसे वे हैं - चाहे वें गिरी हुई मानसिकता और आर्थिक स्थिति के हों या उत्कृष्ट मानसिकता के। इसी परिवेश के कारण कोई रचनाकार बड़ा कहलाता हैं।'

'संस्कृति' यदि 'सौंदर्यबोध के विकसित होने की मौलिक चेष्टा है तो निस्संदेह त्रिलोचन की कविता उसे अपने तर्इं विस्तार देती है। उनकी काव्यानुभूति की संस्कृति लोकधर्मी है। सच तो यह है कि शिष्ट संस्कृति भी आसमान से नहीं टपकती। वह लोकजीवन की तद्भवता का ही मार्जित संस्करण होती है। विदित है कि सारी की सारी शास्त्रीय राग-रागिनियों का मूल कहीं न कहीं लोक रागों में ही निहित है। लोक और शास्त्र के बीच जब तक आवाजाही बरकरार रहती है, तब तक उसमें जीवंतता व उल्लास भी बना रहता है। कवि त्रिलोचन की रचनाओं में ये गुण लोकजीवन से उनके गहरे जुड़ाव से चलते मौजूद हैं। डॉ. रामविलास शर्मा को ठीक ही त्रिलोचन उन कवियों की याद दिलाते हैं 'जो जनता के बीच रहते थे, एक बस्ती से दूसरी बस्ती पहुँचकर उसे अपनी कविता सुनाते थे, चरैवेति सिद्धांत का पालन करते थे, जब उनकी मुक्त दार्शनिक चेतना को पुरोहित वर्ग के धर्मशास्त्र में दबोच न लिया था, जब भूस्वामी वर्ग ने उनकी प्रतिभा खरीदकर उन्हें अपना चाटुकार न बना लिया था।' इस क्रम में यह भी जोड़ देना जरूरी है कि त्रिलोचन अपने समय में अनेक सांस्थानिक प्रलोभनों एवं विभिन्न पुरस्कारों को पाने-देने-दिलाने की घुड़दौड़ में कभी शामिल नहीं हुए। त्रिलोचन के काव्यमूल्य वस्तुतः उनके इन जीवन-मूल्यों की ही पुनर्रचना हैं जिनमें उस चेतना को विकसित करने की क्षमता अंतर्निहित है, जो रेणु की शब्दावली में 'समाज को मानवीय और मनुष्य को सामाजिक' बनने के लिए प्रेरित करती है।


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हिंदी समय में रवि रंजन की रचनाएँ