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कहानी

वह अजनबी
सरिता कुमारी


'क्लिंग....!' फेसबुक मैसेंजर ने अपने काम पर मुस्तैदी से डटे होने की सूचना देते हुए मैसेज रिसीव होने का ऐलान किया।

'हे हलो! हाउ आर यू? आय'म सो हैप्पी टू सी यू हेयर!'

'होप यू रिमेंबर मी!' किसी अनजान अकाउंट से पहचान की खुशबू लिए ये मैसेज झाँक रहा था।

वह सोच में पड़ गया कि इतने अपनेपन से मैसेज भेजने वाला कौन है? अपने दिमाग में भागते-दौड़ते सवालों को शांत करने के लिए सहज ही उसने माइकल नाम का उसका प्रोफाइल खँगालना शुरू किया। प्रोफाइल फोटो एक खूबसूरत जगह पर मोहक उगते सूरज की थी। लाल, गुलाबी, नारंगी रंगों का मनमोहक घालमेल सहज ही ध्यान आकर्षित कर रहा था। पर मैसेज भेजने वाला उगता सूरज तो नहीं ही था, जो था उसे इस तस्वीर से जान पाना असंभव था। प्रोफाइल पर और कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी, शायद उसने पब्लिक में कोई पोस्ट डाली ही नहीं थी।

इसलिए मजबूर होकर बिना किसी पहचान की कड़ी के उसे पूछना पड़ा,

'आय'म फाइन! थैंक यू! मे आय नो हू इज देयर! सॉरी, आय डोंट रिमेंबर माइकल।'

माइकल का झट से जवाब आया, 'याह, आय अंडरस्टैंड, प्लीज एक्सेप्ट माय फ्रेंड रिक्वेस्ट। आय एम माइकल, वंस वी मेट एट हांगकांग पार्क इन हांगकांग इन फ्रंट ऑफ योअर होटल, टू ईयर्स बैक, होप यू रिमेंबर नाउ!'

ओह माइकल! यहाँ! ऐसे फेसबुक पर! उसे उम्मीद नहीं थी। इस एक सूचना भर से पहचान और एक न भूल पाने वाली अजब अजनबी मुलाकात की याद जेहन में तैर गई। कुछ लोगों का जीवन में यूँ ही मिल जाना और फिर सिर्फ और सिर्फ कुछ मिनटों या कुछ घंटों का साथ अविस्मरणीय याद बन दिमाग के कोने में दुबक कर हमेशा के लिए बैठ जाता है। माइकल उनमें से ही एक था। वह उसे कैसे भूल सकता है?

दो साल पहले वह जनवरी की एक गुनगुनी सुबह थी। वह हांगकांग पार्क में टहल रहा था। टहलते-टहलते उसकी नजर कलाई पर बँधी घड़ी पर गई और वहीं ठिठक गई। उसने समय देखने के लिए घड़ी पर नजर डाली थी पर समय के साथ-साथ तारीख पर भी ध्यान गया। 'आज तेईस तारीख...! नहीं... नहीं... वह चौंका और सोचने लगा कि क्या आज सचमुच तेईस तारीख है? दिमाग पर जोर डालते ही वह इस निश्चय पर पहुँच गया कि आज तेईस तारीख तो किसी हाल में नहीं है। निस्संदेह आज चौबीस तारीख है क्योंकि आज रविवार है और उसे काम पर जाने का कोई दबाव नहीं है। ये ख्याल आते ही उसे यकीन हो गया कि हाँ! घड़ी तो गलत तारीख ही बता रही है' और वह उसे ठीक करने के उद्देश्य से पास पड़ी बेंच पर बैठ गया।

घड़ी ठीक कर उसने नजर उठाई और इत्मीनान से अपनी चारों ओर मुग्ध भाव से देखने लगा। सतरंगी नरम रेशमी किरणों से नहाते पार्क के फूल, पौधे, पत्ते बाहर भागते-दौड़ते शहर से अलहदा एक अलग ही जादुई दुनिया रच रहे थे जिसमें न जाने क्या पाने को, न जाने कहाँ पहुँचने की जल्दी में दौड़ते जा रहे इनसान और मोटर गाड़ियों का तनाव और बेरुखी नहीं थी और न ही अपने में होकर भी अपने में न होते हुए जीवन की आपा-धापी की गुत्थियाँ सुलझाने में गुम लोगों की फौज थी। यहाँ चारों ओर हरी घास की सुकून भरी चादर बिछी पड़ी थी। हरे-नीले तालाबों में जीवन का शांत ठहराव था और उनमें उछलती-कूदती रंग-बिरंगी मछलियों में उन्मुक्त सपनों का सैलाब था। वह खोया-खोया सा, धुले-धुले पत्तों की हरी-पीली रंगत से छन-छन कर आती जनवरी की गुलाबी धूप से सराबोर पार्क की गुनगुनी ऊष्मा अपने तन-मन में महसूस कर रहा था।

वह कुछ दिन पहले ही दफ्तर के काम से अपने कुछ सहकर्मियों के साथ हांगकांग आया था। जब से वे यहाँ आए थे, लगातार बारिश हो रही थी जिससे मौसम में सामान्य से अधिक ठंडक घुल गई थी। बारिश के कारण उनकी दिनचर्या होटल से ऑफिस और ऑफिस से होटल तक सिमट कर रह गई थी। पर आज सुबह जब उसकी नींद खुली, तो देखा मौसम साफ था। हल्के-फुल्के उजले बादलों के बीच से सूरज की गुनगुनी नरम किरणें धरती का रोम-रोम नरमी से सहला रही थीं। देखते ही मन खुश हो गया। ऐसे मोहक मौसम में कमरे में बैठने का कोई तुक नहीं था। वह हाथ-मुँह धोकर फटाफट जूते पहनकर प्रसन्न मन होटल से बाहर निकल आया और होटल के पास ही स्थित इस खूबसूरत पार्क में जिसे हांगकांग पार्क कहते हैं, घुस गया। इतने दिनों से बोझिल वातावरण मानो आज चहक रहा था, साथ ही उसका मन भी रुई के फाहे सा हल्का होकर मौसम की खुमारी में घुलकर तैर रहा था। पार्क में बड़ी देर टहलने के बाद उसने समय देखने को घड़ी देखी थी जिसकी तिथि ठीक करने को पार्क के बीच में पड़ी उस बेंच पर बैठ गया था। उसे बैठे थोड़ी ही देर हुई थी कि उसकी बेंच की दूसरी छोर पर एक आदमी आकर बैठ गया। उसने उड़ती नजर से उसे देखा, निस्संदेह वह यहाँ का निवासी तो नहीं था। उसका गहरा काला रंग, मध्यम कद, मानो जलने से गुँजिल हुए से बाल उसके परदेशी होने का बयान दे रहे थे। नजर मिलते ही वह बड़े अपनेपन और सहज भाव से मुसकराया,

'हलो! गुड मॉर्निंग!'

'गुड मॉर्निंग!'

उसके आत्मीयता से पगे संबोधन के जवाब में गौरव ने कहा। उस अजनबी में उसे सहज ही एक अपनापन जाग गया।

'आज मौसम बहुत खुशगवार है! (वेदर इज वेरी प्लेजेंट टुडे!)' उसने बातचीत का सिरा थामते हुए अँग्रेजी में कहा।

'हाँ! सचमुच!' गौरव ने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा।

थोड़ी देर उसे गौर से देखने के बाद उसने पूछा, 'आप कहाँ से हैं, यहाँ के तो नहीं हैं?'

'जी, सही कहा आपने। मैं इंडिया से हूँ। यहाँ कुछ दिनों के लिए सरकारी काम से आया हूँ।'

'आप इंडिया से हैं!' उसने हैरान होते हुए कहा।

'लगते नहीं हैं!'

वह हँस पड़ा, 'जी मैं इंडिया से ही हूँ! आपको कहाँ का लग रहा?'

'मुझे लगा, आप यूरोपियन हैं, आप, अपना हाथ देखिए, ऐसी स्किन तो यूरोपियनस की होती है।' उसने उसका हाथ पकड़ उलट-पुलट कर देखते हुए कहा।

वह हँसने लगा, अपने गोरे-गुलाबी रंग के कारण बचपन से ऐसी बातें सुनने का वो अभ्यस्त था।

'नहीं दोस्त, मैं इंडियन ही हूँ! इंडिया में भी मेरे जैसे लोग मिल जाते हैं। हाँ! तुम्हारी तरह मुझे कोई यूरोपियन कहता है तो कोई ईरैनियन!'

'हाँ! ईरैनियन भी हो सकते हैं! पर आप इंडियन नहीं लगते!'

'आप कहाँ के हैं?' बात बदलते हुए उसने जानना चाहा।

'तंजानिया!!'

'पर मेरे पिता मूलतः गुजराती और माँ अफ्रीकन हैं। एक तरह से मेरी भी जड़ें कहीं बहुत गहरे इंडिया तक जाती हैं।' उसने मुसकराते हुए ऐसे कहा मानो इस नाते से उससे कोई रिश्ता ढूँढ़ निकाला हो।

गौरव भी मुसकरा दिया।

'आपको किस नाम से पुकारूँ, दोस्त?' उसने पहचान को एक नाम देने की इच्छा से पूछा।

'मुझे आप गौरव नाम से बुला सकते हैं।' उसने सवाल की अगली कड़ी भाँपते हुए सवाल के पहले ही जवाब जोड़ते हुए कहा।

'आप मुझे माइकल कहिए, दोस्त।' उसने अपने अजनबी वजूद को एक नाम दे दिया।

'आप अपनी फैमिली नहीं लाए?' पहचान की कड़ी जुड़ते ही वह मानो इसे पुख्ता करने की इच्छा से व्यक्तिगत सवालों की ओर मुड़ गया। माइकल बात करने के मूड में था।

'नहीं! इस बार नहीं! उन्हें पहले की विजिट में हांगकांग घुमा चुका हूँ।'

'ओह तो आप अकसर आते हैं।'

'अकसर तो नहीं, पर यहाँ यह तीसरी बार है।'

'अच्छा! और भी कहीं गए हैं आप? मेरा मतलब है इंडिया से बाहर।'

'जी, माइकल! मेरा वर्क प्रोफाइल ऐसा है कि मैं अब तक अलग-अलग कई देशों में जा चुका हूँ।' मैंने उसकी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।

वह मेरी बातों से बहुत प्रभावित हो चुका था।

'आप जानते नहीं गौरव कि आप कितने भाग्यशाली हैं। आपका कोई करीबी निस्संदेह आपके लिए निरंतर सच्चे दिल से प्रार्थना करता होगा! शायद आपकी पत्नी या आपकी माँ या फिर और कोई शुभचिंतक। तभी आप जीवन में ऐसा सुख देख पा रहे...! इसे भरपूर जिओ, दोस्त और ईश्वर का तहेदिल से शुक्रगुजार रहो।'

वह भावविभोर होकर बोल रहा था, न जाने क्यों वह बेहद भावुक हो चला था। गौरव उसकी बातों से अभिभूत होता हुआ उसकी प्रतिक्रिया से थोड़ा हैरान हो रहा था। उसने द्रवित होकर पूछा, 'और आपकी फैमिली, माइकल? कौन-कौन है आपके परिवार में? आप उन्हें नहीं लाए क्या अपने साथ?'

नहीं, दोस्त! मैं किसी को नहीं लाया अपने साथ। घर पर मेरी पत्नी और तीन बच्चे हैं। मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ। उनको लाना संभव नहीं था।' कहते-कहते वह रो पड़ा। गौरव इस भावुकता के लिए तैयार नहीं था। उसने घबरा कर पूछा,

'क्या हुआ, माइकल? सब ठीक तो है?'

माइकल ने अपने को सँभालते हुए कहा, 'ठीक नहीं है, दोस्त। मैं यह अकेला इलाज के लिए आया हूँ। मेरे पास इतने पैसे नहीं कि किसी को साथ ला सकता।' बोलते-बोलते वह ठिठक गया।

गौरव साँस रोककर उसकी बात सुन रहा था। उसने घबरा कर पूछा, 'क्या हुआ? आपको क्या हुआ है, दोस्त? देखने में तो आप बिलकुल ठीक दिख रहे।' उस बमुश्किल कुछ मिनटों की मुलाकात में ही वह उस अजनबी से एक पहचान की डोर से बँध चुका था। किसी अनहोनी की आशंका से उसका दिल धड़क रहा था।

अपने भर्राए गले को साफ करते हुए ठहर कर माइकल बोला,

'नहीं, दोस्त! मुझे एक जानलेवा बीमारी है। कुछ ही दिन पहले मुझे थायरॉइड कैंसर डिटेक्ट हुआ है...। मेरे डॉक्टर ने सलाह दी कि मुझे सही इलाज के लिए या तो यूरोप या फिर हांगकांग जाना चाहिए। यूरोप अधिक महँगा है, इसलिए मैंने हांगकांग आना डिसाइड किया।' कहते-कहते उसका गला फिर भर आया, वह थोड़ी देर ठिठक गया।

गौरव साँस रोककर दुख में डूबता-उतरता हैरानी से उसकी बात सुन रहा था।

थोड़ा सँभलकर उसने आगे कहना शुरू किया, 'जब इस बीमारी का पता चला। हम पर जैसे कहर टूट पड़ा। मैं एक मामूली स्कूल टीचर हूँ। मेरी सैलरी से घर-परिवार का खर्चा ठीक-ठाक चल जाता है। पर इस मँहगी बीमारी के इलाज के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे। पत्नी और बच्चों ने जिद कर सारी जमा-पूँजी और जो भी जमीन-जायदाद थी, सब बेचकर इलाज के पैसे इकट्ठे किए। यहाँ इलाज के लिए 95 हजार डॉलर चाहिए थे। सारे जोड़-तोड़कर इतने पैसे इकट्ठे कर मैं अकेला ही इलाज के लिए आया हूँ। किसी और का यहाँ आने का खर्चा उठाने को पैसे नहीं थे...।'

'जब मैं घर से यहाँ के लिए निकला, उस वक्त अपनी उदास-रोती पत्नी और बच्चों का चेहरा एक मिनट के लिए भी नहीं भूल पाता।' यह कहकर माइकल रोने लगा।

'मुझे जीना है, दोस्त... हर हाल में जीना है... अपने परिवार के लिए... मुझे जीना ही है!'

'जब यहाँ अस्पताल में भर्ती होने के लिए पैसे जमा कराए तो उन्होंने कहा कि मेरे पास पाँच हजार डॉलर कम हैं। इलाज का खर्चा अब एक लाख डॉलर हो चुका है।'

गौरव अविश्वास और दुख से भरा माइकल की बात सुन रहा था। माइकल ने अपनी गर्दन के पीछे के निशान और अपने पैर दिखाए जो बीमारी के कारण गलना शुरू हो गए थे।

उसकी हालत देखकर गौरव ने घबराकर पूछा 'तो फिर आप यहाँ क्या कर रहे हैं, माइकल? बाकी पैसों का इंतजाम कैसे करेंगे?'

'इसी सोच में पड़ा हूँ, दोस्त। यही सोचता-सोचता यहाँ पार्क में आकर बैठ गया हूँ। मुझे नॉर्दन पाइंट जाना है। वहाँ हमारी चर्च है। मुझे पूरी उम्मीद है कि वहाँ कोई न कोई व्यवस्था हो जाएगी।' उसने उम्मीद भरी उदास आवाज में कहा।

'क्या तुम्हें पता है कि वह कहाँ है?' गौरव ने चिंतित स्वर में पूछा।

'वही पता करने की कोशिश कर रहा हूँ। पर यहाँ के लोग... यहाँ के लोग अच्छे नहीं हैं। मुझे देखते ही उपेक्षा से मुँह फेर लेते हैं। कोई कुछ भी बताने को तैयार नहीं।' उसने हताशा से कहा।

'यहाँ आप पहले इनसान हैं, गौरव जिसने मुझसे इतने प्यार से सम्मानपूर्वक बात की है।' उसने अपनी गीली आवाज में कहा।

'कोई बता दे तो मैं वहाँ पैदल ही चला जाऊँगा।' उसने कुछ सोचते हुए आगे जोड़ा।

'पर वह यहाँ से बहुत दूर है, माइकल। ऐसी हालत में इतनी दूर पैदल कैसे जाओगे?' उसके गलते हुए पैरों की हालत याद कर गौरव ने परेशान होकर पूछा।

'मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं, दोस्त कि मैं वहाँ तक के किराए पर खर्च कर सकूँ।' उसने बेचारगी से टूटी आवाज में कहा।

उसकी असहाय अवस्था पर गौरव का दिल डूबने लगा। इसे इस हालत में कैसे छोड़ सकते हैं। उसके मन में विचार कौंधा,

'दोस्त! क्यों न तुम मेरे साथ मेरे होटल चलो, वहीं पता करने की कोशिश करते हैं कि वह चर्च एक्जैकटली है कहाँ और वहाँ तक कैसे पहुँचा जाए?'

'होटल पास ही है, बस सड़क पार करके सामने ही!'

'ठीक है, जैसा आप कहें!' वह सहज ही तैयार हो गया।

दोनों साथ ही गौरव के होटल के कमरे में आए। रास्ते में माइकल उससे बताता रहा कि कैसे उसने अपनी एंबैसी में बात की और उनके सुझाने पर चर्च से मदद मिलने की उसे पूरी उम्मीद लग रही है। वह जल्द से जल्द चर्च पहुँच कर पैसे का इंतजाम करना चाहता है जिससे जितनी जल्दी हो सके, अस्पताल में भर्ती हो सके, जहाँ उसका इलाज तुरंत शुरू हो जाए। गौरव उसकी बात सुनता रहा और सोचता रहा कि इसकी मदद कैसे की जाए, उसकी हालत जानने के बाद से वह सकपकाया हुआ था।

होटल के कमरे में पहुँचकर उसने रिसेप्शन में बात की और उनसे रिक्वेस्ट की कि कोई उन्हें नार्थ प्वाइंट में स्थित चर्च तक पहुँचने का रास्ता और सही तरीका समझाए। माइकल कमरे में आकर काफी खुश था, वह कमरे की साज-सज्जा देखकर सम्मोहित था। मदद मिलने से वह अब थोड़ा रिलैक्स और खुश था। थोड़ी देर में होटल के रिसेप्शन पर एक जानकार अटेंडेंट ने उसे विस्तार से चर्च पहुँचने तक रास्ता और तरीका समझाया। चूँकि वहाँ मेट्रो से आराम से पहुँचा जा सकता था, इसलिए गौरव ने उसे सुझाया कि वह मेट्रो का आक्टोपस (पास) बनवा ले, जिससे उसे आने-जाने में आसानी रहे। उस समय गौरव के पर्स में मात्र 100 डॉलर ही थे। उसने माइकल को वह पैसे थमाए और समझाया की आक्टोपस कार्ड कहाँ और कैसे बनवाना है। माइकल इस अप्रत्याशित मदद से अभिभूत था, उसने सजल आँखों से गौरव को देखा और उसका हाथ पकड़कर बोला,

'दोस्त, तुम मेरे लिए ईश्वर के भेजे दूत हो। देखो, तुम्हारे ही कारण होटल के रिसेप्शन में मुझे कितनी अच्छी तरह अटेंड किया गया, मदद की गई, नहीं तो ये तो मुझे आस-पास भी फटकने नहीं देते और बुरी तरह घुड़क कर भगा देते।'

'मैं तुम्हारा शुक्रिया कैसे अदा करूँ, दोस्त। तुम्हारी ये मदद मैं पूरी जिंदगी नहीं भूलूँगा।' ये कहते हुए वह रो पड़ा।

गौरव की आँखें भी नम हो गईं, बस वह इतना ही कह पाया, 'जल्दी निकलो, माइकल, तुम्हारे पास समय कम है। ऑल दि बेस्ट, मित्र! तुम्हारा काम पूरा हो!'

'शुक्रिया! शुक्रिया...!' कहता हुआ माइकल चला गया। पीछे खड़ा गौरव उसे तब तक देखता रहा जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गया। उसके जाने के बाद गौरव सुबह से घटी घटनाओं की एक के बाद एक कड़ियाँ जोड़ता रहा और हैरानी से सोचता रहा कि आखिर आज ये सब हुआ क्या। सुबह उसका पार्क जाना, घड़ी में गलत तारीख का होना, उसे ठीक करने के लिए उसका बेंच पर बैठना, उसी बेंच पर आकर माइकल का बैठना, माइकल से बातचीत, उसकी गंभीर बीमारी... सोचते हुए उसका सिर घूमने लगा।

कहाँ तंजानिया का माइकल, कहाँ भारत से वह, यहाँ अनजान जगह हांगकांग में आकर एक अनजान अजनबी की तरह मिलते हैं और कुछ समय के परिचय में जीवन भर न भूल पाने वाली याद में बदल जाते हैं। हाँ! वह माइकल से हुई यह संक्षिप्त मुलाकात ताउम्र नहीं भूल सकता। पता नहीं, उससे दोबारा कभी मुलाकात होगी भी या नहीं। पर हांगकांग और यहाँ माइकल से मिलना इस जगह की न भूल पाने वाली धरोहर है। वह यह सोच कर आहत था कि पराए देश में लोग बिना ये जाने समझे कि कोई किन हालात और परेशानियों से लड़ रहा है, मशीन की तरह अपना कीमती एक पल भी अनजान पर खर्च नहीं करना चाहते। किसी के बाहरी रंग-रूप से निश्चय कर लेते हैं कि उससे बात करनी भी है कि नहीं। जबकि उनके बस एक क्षण के प्यार और सम्मान भरी मदद के कुछ बोल से किसी को कितनी बड़ी राहत मिल सकती है, किसी की बड़ी से बड़ी मुश्किल आसान हो सकती है। कुछ नहीं तो उसे अपनी लड़ाई लड़ पाने का एक हौसला, एक नई ताकत मिल सकती है। बस चंद परवाह भरे बोलों से। पर दुखद है कि मशीनों के साथ मशीन ही बनते जा रहे हम इंसानो में वो संवेदनशीलता ही समाप्त होती जा रही है, नहीं तो अकेले यूँ अनजान देश में भटक रहे माइकल की इतनी छोटी सी मदद तो कोई भी यहाँ का रहने वाला राह चलते ही कर सकता था।

गौरव को इस बात का संतोष था कि उन हालात में जो थोड़ा बहुत वह उसके लिए कर सकता था, उसने कोशिश की करने की। उसके जाने के बाद उसकी चिंता, उसका दर्द उसके मन में कहीं गहरे पैठ गया था। सच है, सुख इनसानों को उतना नहीं जोड़ता, जितना दुख और दर्द जोड़ता है। किसी की तकलीफ से उपजी आह सीने में हमेशा के लिए जम जाती है और किसी भी कमजोर पल में पिघल कर बहने लगती है। माइकल का दर्द वही दर्द था जो गौरव के सीने में जाकर जम गया था और गाहे-बगाहे पिघल कर बहने लगता और वह सोचता कि पता नहीं, माइकल कैसा होगा? कहाँ होगा? वह दुआ करता कि वह पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने परिवार के बीच चला गया हो। कई बार वह सोचता कि उसे उसका स्थाई कांटैक्ट डिटेल्स ले लेना चाहिए था, पर वह सब कुछ इतनी तेजी से घटा था कि उस समय हड़बड़ी में उसके दिमाग में यह खयाल आया ही नहीं। समय के साथ माइकल की याद थोड़ी धुँधली तो हो गई थी पर मिटी बिलकुल भी नहीं थी।

आज अचानक माइकल का ऐसे फेसबुक पर मिल जाना किसी माँगी मुराद के पूरी हो जाने से कम नहीं था। वह सुखद आश्चर्य से डूब-उतरा रहा था। वह बड़ी देर तक चैट करते रहे। माइकल ने विस्तार से अपने इन दो वर्षों के संघर्षपूर्ण समय का लेखा-जोखा दिया। वह साँस थामे उसके कठिन समय की पीड़ा में डुबकियाँ लगाता रहा, कभी उसकी आँखें नम हो जातीं, कभी उम्मीद की लौ से उसकी आँखें दपदपा जातीं। वह सुनता रहा, गुनता रहा, महसूसता रहा माइकल की पीठ पर उस भयावह समय की मार के निशान।

'जानते हैं, गौरव, आप उस दिन अगर मुझे अचानक उस तरह नहीं मिलते तो मेरा न जाने क्या हाल होता?'

माइकल की इस बात से उसके जीवन के उतार-चढ़ाव में खोए हुए गौरव की तंद्रा अचानक भंग हुई।

वह चौंक गया पर कुछ कह न सका क्योंकि माइकल से हुई उस अद्भुत मुलाकात की पहेली गौरव आज तक नहीं सुलझा पाया था।

'मैं आपको बहुत शिद्दत से याद करता रहा इन पिछले दो सालों में। आपसे एक बार बात करने की दिली ख्वाहिश थी।'

'आपसे हुई उस छोटी मुलाकात ने मुझे ये समझ दी कि मैं खुद अब किसी अजनबी का दुख-दर्द बाँटने को हर पल तैयार रहता हूँ। मैं समझता हूँ, एक मायने में हम सब एक ही वजूद के कई हिस्से हैं।'

माइकल एक रौ में बोलता जा रहा था।

'मैं आज स्वस्थ होकर जो आपसे फिर जुड़ सका, ये निस्संदेह आप ही की दुआओं का जादू है, दोस्त। देखा जाए तो हम कभी अजनबी थे ही नहीं।

है न मित्र?'

'बिलकुल, माइकल! मैं पूरी तरह से सहमत हूँ आपसे।' माइकल के सवाल पर गौरव ने भावुक होकर कहा। वह मुग्ध भाव से माइकल की बातें सुनता उसकी हाँ में हाँ मिलाता जा रहा था।

गौरव की खुशी की कोई थाह नहीं थी कि उस लड़ाई में उसका सरल हृदय हांगकांग में मिला अजनबी दोस्त विजेता था और अब तंजानिया में अपने प्यारे परिवार के साथ एक स्वस्थ सुखी जीवन जी रहा था। उसका वह मिल कर बिछुड़ा अजनबी दोस्त अब खोया अजनबी नहीं था। गौरव खुश था, संतुष्ट था जीवन के इस अप्रत्याशित उपहार और एक सुखद मोड़ से जिसका नाम माइकल था।


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