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कहानी

बंद लिफाफा
सरिता कुमारी


आज फिर एक बंद लिफाफा मेज पर पड़ा उसका मुँह चिढ़ा रहा था। वही गहरे बैंगनी रंग के किनारों वाला हल्के बैंगनी रंग का लिफाफा। भेजने वाले को पता है कि उसे बैंगनी रंग पसंद है। पता भी क्यों न हो, बचपन से लेकर जवानी तक की हर कड़ी जो जुड़ी है उनसे। जानता है कि उन्हें बैंगनी रंग नहीं पसंद पर वह उसके लिए अपनी हर छोटी-बड़ी, पसंद-नापसंद से अब तक समझौता करती रही थीं तो इस बैंगनी रंग से अपनेपन की डोर जोड़ना क्या मुश्किल था उनके लिए?

यह इस महीने के अंत तक उनका बीसवाँ पत्र था। वह शायद अब उसके पत्र की प्रतीक्षा किए बिना ही पत्र लिखती जा रही थीं। इस उम्मीद में कि वह शायद किसी पत्र पर नाराजगी भूलकर, लिफाफा खोलकर पढ़ ही ले और उन्हें माफ कर दे।

माफ कर दे! पर क्यों कर दे? कैसे कर दे? उसने खुद से ही सवाल किया। ऐसी बातों की कोई माफी भी हो सकती है क्या भला? नहीं, वह हरगिज उन्हें माफ नहीं कर सकता। कभी नहीं कर सकता। नफरत और गुस्से का मिला-जुला लावा उसके अंदर खदबदाने लगा। वह थोड़ी देर उस बैंगनी रंग के लिफाफे को घूरता रहा। फिर हिकारत से मुँह मोड़कर बैठक से बालकनी में चला आया।

बैंगनी रंग, यह उनका खत नहीं होता तो वह बरबस ही इसे छू लेता मंत्रमुग्ध सा। इस रंग का जादू उसके सिर चढ़कर बोलता है और वह जैसे सपेरे की धुन पर बेसुध साँप सा इस रंग के मोहपाश में बँध जाता है। जानने वाली उसकी इस कमजोरी का कैसा फायदा उठाने की कोशिश कर रहीं पर उनके प्रति गुस्से और नफरत का यह भाव उसके बैंगनी प्रेम पर भारी रहा है अब तक और नतीजा उसने एक भी खत खोलकर नहीं देखा पिछले डेढ़ महीने में। वैसे वह हैरान है कि वह कैसे अपने बैंगनी रंग के प्रेम की कमजोरी पर काबू पाने में सफल हो गया है। क्या किसी के प्रति जागा ताजा नफरत का भाव पुराने प्रेम पर भारी पड़ता है। हाँ शायद, तभी तो वह उन बंद लिफाफों के ढेर लगाए जा रहा है बिना उन्हें खोले जबकि वह जानता है, इन लिफाफों में बैंगनी कागज पर बैंगनी मोती बिखरे होंगे। इस खयाल से उसका मन हुलस गया। जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए वह शहर से बाहर गया था तो इन्हीं बंद बैंगनी लिफाफों का कितनी बेकरारी से इंतजार करता था। हर दस दिन में आने वाले उन लिफाफों में बंद बैंगनी लेटर पैड में वही बातें होती थीं।

'खाना तो ठीक से खा रहा है न?

समय पर सो जाया कर।

पढ़ाई के साथ अपनी सेहत का भी ध्यान रखना।'

और वह हलके बैंगनी कागजों पर बिखरे गहरे बैंगनी अक्षरों के मोतियों को समेट कर दिल के नाजुक कोने में रख लेता। कागज की खुशबू में बसी ममता की खुशबू साँसों में भरकर घर से दूर होने की पीड़ा भूल जाता। दोस्त उस पर हँसते,

'ये बंद बैंगनी लिफाफे किसके हैं? जो एक दिन भी देर से मिले तो किसी की जान अटक जाती है।'

वह हँसकर खुला बैंगनी लिफाफा उनकी ओर बढ़ा देता, खत पढ़कर वह भीगी मुसकुराहट फैलाकर जस का तस पकड़ा देते। आखिर हर ममता की खुशबू और रंग तो एक ही होता है और हर सीना धप-धप धड़कता है उसी की ठंडी छाँव में, हर समय चुपचाप।

'खाना ठीक से खाते रहना!' इन शब्दों के बीच कसमसाते वात्सल्य के झरने में दूध की खुशबू रची-बसी रहती है, जिसकी याद हर जेहन में कुलबुलाती है।

'बड़ा भाग्यशाली है रे तू!' उसका रूममेट वैभव उससे कहता।

'इतना भाग्यशाली तो सब कोई होता है, यार!' वह हँस देता।

'अच्छा, हर दस दिन में नियम से खत किसका आता है, यार? हम तो एक फोन में निपट जाते हैं या कभी-कभार ईमेल! आज के जमाने में बंद लिफाफे किसके आते हैं, वह भी माँ के?'

वह निरुत्तर हो जाता।

'उन्हें लिखने का बहुत शौक है, यार, देख न हर पत्र में किसी न किसी नई पढ़ी हुई किताब की पूरी समीक्षा लिख डालती हैं!'

वह सफाई देने की कोशिश करता।

'नहीं रे, मुदित! तेरी माँ तुझे बहुत प्यार करती हैं। बड़ा भाग्यशाली है तू। कभी उनका दिल मत दुखाना।'

'नहीं यार, माँ तो सबकी प्यार करती हैं।' वह सफाई देता।

'इतना नहीं, मेरे बच्चे!' वैभव उसकी पीठ पर धौल जमाते हुए कहता।

वह मन ही मन अपनी किस्मत पर रश्क करता था।

'अरे आप कब आए?'

सामने स्नेहा खड़ी थी मुसकराती। वह सहसा यादों की गुफा से खाली हाथ बाहर चला आया।

'हाँ, बस अभी-अभी आया।'

'आप फ्रेश हो जाइए, मैं चाय लाती हूँ।'

'हाँ, ठीक है।'

स्नेहा जाते-जाते ठिठकी और उनकी तरफ देखा, उनकी आँखें मिलीं। उन आँखों में छलकता सवाल बिना कुछ कहे ही उसने पढ़ लिया। मुदित ने झट से नजरें फेर लीं। स्नेहा पल भर ठिठकी, उसे देखती रही, फिर झटके से मुड़कर चली गई। स्नेहा बहुत वाचाल नहीं है। उससे उम्र में दो साल छोटी है पर उससे कहीं अधिक समझदार और परिपक्व है। पिछले डेढ़ महीने से चलती संबंधों की यह रस्साकशी मूक दर्शक बनी देख रही है। जो बोलना होता है, वह अपनी आँखों और हाव-भाव से चुपचाप कह देती है और उसका यह माध्यम इतना सशक्त और प्रभावशाली है कि वह न चाहते हुए भी सब समझ जाता है।

स्नेहा भी क्या करे? उसने जब उसे समझाने की कोशिश की थी, उसने कैसे बौखला कर सारी भड़ास उसी पर निकाल दी थी।

'तुम आज की मॉडर्न औरतें! न तुम्हें समाज का लिहाज है, न रीति-रिवाज का, न परंपराओं का। इस उम्र में ये सब? क्या मुँह दिखाऊँगा मैं दुनिया को? और तुम उनकी पैरवी कर रही? कुछ शरम लाज है कि नहीं तुम लोगों को?'

वह हैरान उसे देखती रह गई थी। मुदित का यह व्यवहार उसके लिए नया था। पर उसके बाद उसने उससे कुछ भी कहना छोड़ दिया था।

वह जानता है, माँ से उसकी अक्सर बातचीत होती रहती है। उसने कभी उसे कुछ कहा नहीं क्योंकि उसे पता है, बिना कहे-सुने चल पड़ने वाली उसकी मूक बातचीत का एक भी जवाब उसके पास नहीं होगा। वह ऐसी स्थिति से घबराता है। क्यों भेजती जा रही हैं वे इतने पत्र? क्यों नहीं समझतीं कि वह नहीं पढ़ेगा एक भी पत्र अब उनका? कभी नहीं।

रंजना आज भी प्रतीक्षा करती रहीं डाकिए का। वह आया तो पर उसने उनके घर की ओर रुख नहीं किया। उनकी हसरत भरी निगाहें उसे अरमानों के फूल लिए निहारती रहीं पर वह उन पर मीठे जल बरसाने की बजाए आज भी निराशा का तेजाब डाल गया। उनके अरमानों के फूल झुलस कर रह गए। पर हमेशा की तरह वह कल फिर नए अरमानों के फूल खिला लेंगी और डाकिए के डाक के थैले में बंद पत्र के अमृत वर्षा की प्रतीक्षा करेंगी पर आज का दिन तो गया।

उन्होंने गहरी साँस ली और बरामदे से वापस कमरे में चली आईं। असलम की गहरी नजरों से बचते हुए वो रसोईघर में चली गईं। क्या करें, जिससे मन बदले। हमेशा की तरह उन्होंने आज भी चाय बना ली और बिना असलम से पूछे उनके लिए भी एक कप ले आईं।

चाय की ट्रे देख असलम मुसकरा दिए। आधे घंटे पहले ही तो पी थी पर वो जानते थे, ये चाय सिर्फ चाय पीने के लिए नहीं थी। कितनी वस्तुएँ होती हैं जो कभी-कभी अपने मूल मकसद से हटकर कुछ और ही मकसद पूरा करती हैं चुपचाप। जैसे अभी ये चाय। वो जानते हैं, रंजना को इस वक्त कुरेदना ठीक नहीं। इकलौते बेटे के प्रति अथाह प्यार उनके ऊपर से शांत झील से चेहरे के तले हिचकोले लेते सागर का तूफान समेटे रहता है जो कभी-कभी चुपचाप आँखों से बह निकलता है।

मुदित था भी तो एक प्यारा बच्चा, अपनी उम्र के और बच्चों जैसा ही थोड़ा नटखट, थोड़ा शैतान। पड़ोस में रहने वाले उनके सबसे प्यारे दोस्त का बेटा। बचपन में वह किस कदर उनसे घुला-मिला था। जब कभी वह घर आते, उसकी बातें खत्म ही न होतीं। वह उनके आगे-पीछे डोलता रहता। जब तक रमन उसे बहला कर किसी तरह भेज नहीं देते, वह उन्हें बात तक नहीं करने देता था। वह बड़ा होता गया पर उनके प्रति उसका लगाव कभी कम नहीं हुआ। जब वह इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए जा रहा था, उन्होंने उसकी पसंद की एक महँगी घड़ी उपहार में दी थी। रमन और रंजना कुछ कह नहीं पाए, ये उनका आपस का मामला था और इस पर उन दोनों की दखलंदाजी की कोई जगह नहीं थी। वह कैसा खुश था?

'ओह, थैंक यू, अंकल!'

वह कसकर उनसे लिपट गया था। वह आत्मविभोर थे। मुदित उन्हें अपने बेटे जैसा ही लगता था। उनकी बस दो बेटियाँ फरहा और सादिया थीं पर मुदित के रहते उन्हें कभी बेटे की कमी नहीं खली। हर रक्षाबंधन पर वह सुबह-सुबह उनके दरवाजे पर खड़ा होता था और उनकी दोनों बेटियाँ जो उम्र में उससे 4-6 बरस बड़ी थीं, पूरी तैयारी से उसकी बाट जोह रही होती थीं। उनका वह प्यारा-दुलारा भाई था और वे उसकी प्यारी बहनें। उनका बचपन आपसी प्यार-मनुहार में बीता था।

इंजीनियरिंग के बाद मुदित एक अच्छी नौकरी पर विदेश चला गया था। धीरे-धीरे न चाहते हुए भी उनका मुदित कहीं खो गया था। उसके विदेश से वापस आने की प्रतीक्षा करते उन्हें लगता, उनका बेटा उन्हें फिर मिल जाएगा। पर बदले हालात ने उनका बेटा तो दूर अंकल कहने वाला मुदित भी कठोरता से छीन लिया था। उनकी दोनों बेटियाँ शादी के बाद अपने-अपने शौहर के साथ विदेशों में जा बसी थीं। पत्नी बच्चियों की शादी के एक साल बाद ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ कर उन्हें इस बियाबान दुनिया के जंगल में अकेला छोड़ गई थीं।

उनके अकेलेपन और हर दुख-सुख के साथी रमन और रंजना ही थे। उनकी पत्नी रेहाना के जाने के बाद अगर वे दोनों उन्हें सँभाल न लेते तो वे पता नहीं किस हाल में होते। बेटियाँ उन्हें बुलाती रहती थीं पर इस उम्र में अपने दरो-दीवार छोड़कर विदेश जाने का उन्हें कोई कारण समझ में नहीं आता था। अब इस उम्र में पराई हवा-मिट्टी में वो कैसे पनपेंगे? बेटियों ने हार मानकर उन्हें बुलाना कब का छोड़ दिया था। बस फोन पर हाल-चाल लेती रहती थीं।

रंजना चुपचाप विचारों में खोई चाय के घूँट भर रही थीं। उसकी उदासी और निराशा मानो चाय की रंगत में हौले से उतर गई थी। वह चुप रंजना की चुप्पी की भाषा पढ़ने में तल्लीन थे। क्या बोलें, जब वह सब जानते और समझते हैं। उसकी पीड़ा उनकी भी तो रगों में जहर बनकर दौड़ती रहती है जिसके असर से वे दोनों चुपचाप घुल रहे हैं। ऐसा क्या गलत कर दिया उन्होंने, वे समझ नहीं पाते। उनका अपना मुदित एक दिन इतना खफा हो जाएगा उनसे, ये तो उन्होंने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था।

रंजना चुपचाप चाय के छोटे-छोटे घूँट भरतीं मन पर सालती चोट को मानो सेंक रही थीं। कुछ तो आराम मिले। उनका अपना मुदित परायों से भी पराया व्यवहार करेगा, ये तो उन्होंने सोचा ही नहीं था। उसे क्या लगा इस उम्र में उनसे वासना की भूख इतना बड़ा कदम उठाने के लिए प्रेरित कर रही थी? क्या वह अपनी माँ को बिलकुल ही नहीं जानता, नहीं समझता? सच तो यही है, उन्हें सबसे बड़ा दुख इसी बात का है कि उन्हीं का बेटा उन्हें नहीं समझता और दुख इस बात का भी है कि उनके ही पाले-पोसे बेटे की सोच का दायरा इतना संकुचित निकला कि वह घुट रही थीं, तड़प रही थीं।

वह थोड़ी हैरान भी थीं कि रमन और रंजना के दिए संस्कारों में क्या कमी रह गई कि मुदित उनका अपना बेटा ही उन्हें अपराधी समझ रहा है एक ऐसे बेबुनियादी अपराध का जिसकी नींव उनकी समझ के परे है। शुरू से ही रमन और रंजना बेहद खुले विचारों के रहे थे और इसीलिए उनकी आपसी समझ बहुत गहरी थी, इतनी कि कई बार आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों को वे दोनों समझ में ही नहीं आते थे। उनके आचार-व्यवहार में शुरू से ही न धर्म और न ही जाति के बंधन का जानलेवा कसाव था, न ही दम घोंटती, सड़ी-गली रूढ़ियों और परंपराओं का लिजलिजापन। वे दोनों मनुष्य को मनुष्य के रूप में ही देखते थे और ये उन्हें अधिक सहज और व्यवहारिक लगता था। इसीलिए पड़ोस में रहने वाले असलम और रेहाना उनके किसी भी नाते-रिश्तेदार या आस-पड़ोस की तुलना में सबसे करीब थे। उनके सबसे अधिक सगे। उनके हर सुख-दुख के साथी।

जब वे एक साल के मुदित के साथ अपने पुराने शहर और परिचितों से दूर नए शहर, नए घर में रहने आए थे तो पहले ही दिन अजनबियत की झिझक भरी दीवार सहज ही तोड़ कर शाम की चाय और नाश्ते के साथ रेहाना और असलम उनके घर के दरवाजे पर खड़े थे। दिसंबर की ठंड में घर में चारों ओर बिखरे सामान के बीच उनकी गरम चाय और स्नेह की ऊष्मा सदा के लिए उनकी आत्मा में समा गई। दिसंबर की उस शाम से लेकर अब तक किसी भी धर्म-जाति की दीवार से परे उन्होंने कितने उतार-चढ़ाव और सुख-दुख की हिचकोले खाती नाव पर जीवन का सफर एक-दूसरे का मजबूती से साथ देते हुए तय किया था। उन्होंने कभी नहीं जाना कि रंजना-रमन और असलम-रेहाना में कोई मनुष्यता से परे भी कोई और संबंध या भेद है। जाना तो बस ये कि एक-दूसरे के सहारे के बिना जीवन वैसी एक सरल रेखा नहीं होती जैसी उन मजबूत घुली-मिली परछाइयों ने बना ली थी। कितना होनी-अनहोनी घटता गया इस दौरान और सदस्यों के जोड़-घटाव और संबंधों के समीकरण बदल गए इन कई वर्षों में... और समय की इच्छा कि जीवन की संध्या में अंततः निर्बाध साथ निभाने को बचे तो रंजना और असलम।

वो अप्रत्याशित ही था जब रमन एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए। कंपनी से रिटायरमेंट के ठीक एक महीने पहले। रंजना पर मानो कहर टूट पड़ा, रमन के बिना जीवन की कल्पना तक नहीं की थी उसने। वो तीन दिन आई.सी.यू. में लड़ते रहे पूरी ताकत से। वो जानती थी कि ये लगभग असंभव जीत वाली लड़ाई वो सिर्फ उसके लिए लड़ रहे थे पूरे जी-जान से। अर्ध-बेहोशी में भी वो उसी का नाम बड़बड़ा रहे थे। जीवन के किसी भी मोड़ पर अब तक उन्होंने अपनी रंजना का हाथ एक पल भी नहीं छोड़ा था और अब अचानक उसे जीवन की ढलती बेला में छोड़कर जा रहे थे, जब उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी उनकी। उस कठिन समय में असलम रात-दिन साए की तरह साथ थे। उनके जीवन का भी सहारा, जीने का रस भी तो रमन-रंजना में ही था। उनकी भी हँसती-खेलती बगिया एक झटके में बिना कोई मौका दिए उजाड़ी जा रही थी। रमन के बहते खून में उनके तन का एक बोतल खून मिल चुका था। कैसे वो डॉक्टर से मनुहार कर रहे थे कि उनके खून का एक-एक कतरा रमन की नसों में उतार दे। रमन के साथ उनकी भी लाइफलाइन 'बीप-बीप' की आवाज पर टिकी थी पर डॉक्टर ने साफ मना कर दिया था कि नहीं, एक सीमा से अधिक उनका खून नहीं ले सकते, उनकी जान को भी खतरा होगा। वो पंखकटे पंछी से फड़फड़ाते रह गए और उनका रमन एक झटके में साँसों की डोर तोड़ उन्हें पराया कर गया। उनकी गर्म हथेली में रमन का ठंडा, निर्जीव हाथ उनकी रूह कँपकँपा गया। कान में बस रमन के टूटे-फूटे शब्द हथौड़े की तरह बजते रहे,' रं... जना, रं... ज... ना, बस... आ... प... के भ... रो... से... उ... स... का... ख... या...'

'चट' की आवाज के साथ रंजना फर्श पर मूर्छित पड़ी थी। अपने बिगड़ते होश जैसे-तैसे सँभाल कर वो रंजना को सँभालने में लग गए। रमन का जाना उन्हें अंदर से खाली कर गया। दो साल पहले रेहाना और अब रमन। उनके लिए जीवन के कारण बुरी तरह धुँधला गए थे, जैसे ठहरे तालाब में बड़े-बड़े पत्थरों के फेंकने से उठी लहरों में पारदर्शी पानी के पार दिखने वाला तला मटमैले पानी और बेडौल लहरों में खो जाता है, बिलकुल वैसे ही बिछड़ चुके रेहाना और रमन की देहांत रूपी मटमैली लहरें उनके जीने की चाह धुँधला गई थीं। पर रमन से किया वह अनकहा अंतिम वादा, वह जिम्मेदारी उन्हें जीने को मजबूर कर रही थी।

मुदित यू.एस.ए. से एक दिन बाद आ सका। उनकी दुर्घटना की खबर सुनते ही सारी कोशिशों के बाद भी वह उनकी अंत्येष्टि के पहले ही पहुँच सका। बीस दिनों बाद जब वह और स्नेहा यू.एस.ए. वापस जाने लगे तो रंजना को साथ ले जाने की उन्होंने बहुत कोशिश की। पर घर के कण-कण में रचे-बसे रमन की यादों को छोड़कर जाने को वह टस से मस नहीं हुईं। असलम ने भी समझाने की कोशिश की पर वह तैयार नहीं हुईं तो नहीं हुईं। हार मानकर मुदित और स्नेहा को बिना रंजना के ही वापस यू.एस.ए. जाना पड़ा।

रमन के बिना सूना घर-आँगन, चंचल, मजबूत रंजना को कमजोर-बुझी रंजना में ढाल गया। हमेशा की स्वस्थ तन की स्वामिनी रंजना का कमजोर मन, तन भी कमजोर करने लगा धीरे-धीरे। रमन के जाने के बाद वह अकसर ही बीमार रहने लगीं। अजीब-अजीब बीमारियों ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया। मीलों दूर मुदित से वह कुछ भी न कहतीं। अब तक उन्होंने भाग-भागकर सेवा ही की थी। अब सेवा करवाने की स्थिति उन्हें हैरान-परेशान करती।

ऐसे में सहज ही असलम ही थे जो उनके टूटते तन और मन का सहारा थे। वे हर समय उनकी देखभाल के लिए बिना एक शब्द भी कहे उपस्थित रहते। न जाने कैसे वे रंजना के मन में सुलग रही हर दर्द भरी चिंगारी के लिए ठंडा मलहम खोज लाने में सफल रहते। बीमार पड़ने पर उनकी सेवा में लगे रहते। रंजना को उनकी उपस्थिति मात्र से ही सब्र आ जाता। उनका सहज और निश्छल संबंध जहाँ एक-दूसरे का सबसे बड़ा सहारा और संबल था, वहीं दुनिया की आँखों की सबसे बड़ी किरकिरी। पहले तो आस-पड़ोस के लोगों के बीच चलती काना-फूसी पर न असलम ने ध्यान दिया, न रंजना ने, पर लोग इतनी आसानी से हार मानने वाले कहाँ थे? वे हर संबंध को अपनी ही परिभाषा में तोलते हैं और फिट न बैठने पर तोड़ने-मरोड़ने लगते हैं। असलम और रंजना का संबंध भी जब उनकी सहज समझ और व्यवहारिक बुद्धि की कसौटी पर खरा नहीं उतरा तो तुच्छ तानों और छींटाकशी का रूप लेकर जहाँ-तहाँ बिखरने लगा।

जब भी असलम और रंजना बाजार सौदा-सुलुफ लेने साथ जाते तो घर की जरूरी वस्तुओं के साथ-साथ तानों और घटिया मजाक से सनी लोगों के कुविचारों की पोटली भी अनचाहे ही साथ ले आते। असलम तो सुनकर भी अनसुना कर देते पर रंजना का चेहरा अपमान से लाल हो जाता और वह बेहद दुखी हो जातीं। इस उम्र में ऐसी बातें सुनकर वह तिलमिला कर रह जातीं।

उस दिन दो घर छोड़कर रहने वाली पड़ोसन मिसेज वर्मा ने बातों-बातों में रंजना का मन बुरी तरह छलनी कर दिया,

'क्या बहन जी? आप भी क्या करती हैं? अच्छे-भले बेटे-बहू के रहते इस उम्र में पराए मर्द के भरोसे बुढ़ापा काटने का क्या मतलब है भला? रात-बेरात पराए मर्द का यूँ घर पर आना-जाना अच्छा नहीं लगता। जब तक भाई साहब जिंदा थे, तब तक दूसरी बात थी...।

आपको पता नहीं क्या कि लोग कैसी-कैसी बातें बनाते हैं... मैं तो आपका भला सोचती हूँ, इसलिए बता रही हूँ। मैं तो जानती हूँ कि आप भली महिला हैं पर...।'

पड़ोसन की इस जुर्रत पर रंजना अवाक रह गईं। बिना कुछ जवाब दिए तुरंत ही घर को भागीं। बाद में झिझकते हुए उन्होंने ये बात असलम को बताई तो वह थोड़ी देर के लिए चुप हो गए, फिर कुछ सोचते हुए बोले,

'मैं मुदित से बात करूँ क्या? वह तुमको आकर ले जाए। तुम्हें लगातार देखभाल की जरूरत है, रंजना। यहाँ रहते तो मैं तुम्हें संघर्ष करने के लिए अकेली नहीं छोड़ सकता। लोगों की ऊल-जुलूल बातों की मुझे परवाह नहीं है पर तुम्हें ऐसी बातों से परेशान होते देख अच्छा नहीं लगता। बोलो, आज ही बात करूँ क्या मुदित से...?'

रंजना एकदम ही सिटपिटा गईं। छूटते हुए एकदम ही बोल पड़ीं,

'मैं चली गई तो आप? आपका खयाल कौन रखेगा, असलम? मैं भी तो आपको संघर्ष करने के लिए यूँ अकेला नहीं छोड़ सकती...' कहते-कहते वह ठिठक गईं।

'और... और क्या आप यहाँ सब कुछ छोड़कर बच्चों के पास जाना चाहते हैं?'

न जाने क्यों असलम का गला भर आया और वह कोई जवाब नहीं दे पाए। गला रंजना का भी भर आया। रंजना ने निर्णय सुनाते हुए कहा था,

'वहाँ बेटे-बहू की अपनी व्यस्त जिंदगी है, वहाँ पराई धरती, पराई आबो-हवा में अब कहाँ खुद को समा पाऊँगी। यहाँ कम से कम धरती, पानी, हवा और आसमान सब अपने हैं, फिर आप तो हैं ही। लोगों का क्या, उन्हें कुछ न कुछ तो कहना ही है।'

रंजना ने अपने मन का भय बयान करते हुए मानो खुद को ही तसल्ली देते हुए कहा था। बात आई-गई हो गई। उस दिन रंजना को एहसास हुआ कि वह असलम को यूँ अकेला छोड़ने की हिम्मत भी तो नहीं जुटा सकतीं। जितनी फिक्र असलम को उसकी थी, उससे रत्ती भर भी कम फिक्र नहीं थी उसे असलम की।

समय बीतता रहा, लोगों की छींटाकशी पर दोनों ने ही ध्यान देना बंद कर दिया था। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। एक बार असलम अचानक ही बहुत बीमार पड़ गए। बुखार में हफ्ता भर भट्ठी से तपते रहे। रंजना ने उन कठिन दिनों में असलम की रात-दिन लगातार देखभाल की। वह साए की तरह हर समय असलम के आस-पास मँडराती रहीं। इतनी दूर से बच्चे तो समय पर आ नहीं सकते थे। घर-बाहर सारी जिम्मेदारी रंजना ने एक पैर पर सँभाल रखी थी। रात-रात भर असलम के जलते माथे पर पट्टी करती रहीं, खाने-पीने से लेकर दवा तक हर चीज बिल्कुल समय पर कायदे से देती रहीं। असलम जब थोड़े स्वस्थ हुए तो रंजना के प्रति कृतज्ञता से भर गए। उन दिनों जब उन्हें बुखार में होश नहीं रहता था, तब रंजना कभी उन्हें बच्चे सा सँभालती, तो कभी बीमारी से उपजे अवसाद में दोस्त बन तसल्ली देतीं, हल्के-फुल्के मजाक से उनका मूड बदल देतीं। असलम न चाहते हुए भी रंजना को एक अलग ही रूप में महसूस करने लगे थे। रंजना की आँखों में भी उन्हें अक्सर एक अलग सी चमक गाहे-बगाहे दिख जाती। जब वह बेमन से सिर्फ रंजना का मन रखने के लिए पतली, फीकी खिचड़ी खा रहे होते तो उन्हें स्नेह से सराबोर रंजना की सहलाती नजरें रोमांचित कर जातीं और तब वह नजर उठाकर रंजना को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। एक अजब डोर से बँध रहे थे वे दोनों जो सम्मान भरे लगाव और परवाह से लबालब भरा था।

कुछ समय बाद जब वह स्वस्थ हो गए तो उनके दूर के एक परिचित उनका हाल-चाल लेने आए। रंजना की उपस्थिति उन्हें काँटें सी चुभ रही थी, बहुत कुछ सुन भी रखा था उन दोनों के बारे में, छूटते हुए मजाक-मजाक में कह ही दिया,

'ऐसा क्या रिश्ता है आप दोनों का? इतनी परवाह और देखभाल तो सगे भी नहीं करते। दुनिया से कब तक छिपाएँगे ये सब?' उस दिन न जाने क्यों असलम भी तिलमिला गए। रंजना के लिए कोई कुछ गलत कहे, उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हुआ उस दिन। बोले तो कुछ नहीं पर छटपटा कर रह गए।

परिचित के जाने के बाद असलम ने रंजना से पूछ ही लिया,

'क्यों न तुम कुछ माह मुदित के पास अमेरिका चली जाओ?'

'क्यों?' रंजना ने हैरानी से पूछा। फिर ठहरकर बोलीं,

'आपको यूँ अकेला छोड़कर कैसे चली जाऊँ?'

'ऐसा क्या रिश्ता है हमारा कि तुम अकेला छोड़कर जा नहीं सकतीं मुझे?' एक अलग ही रौ में उस दिन वे बोल ही गए। रंजना लाजवाब उन्हें देखती ही रह गईं, फिर सँभलकर बोलीं,

'आप लोगों की बातों को इतना तवज्जो क्यों दे रहे हैं? ये तो न जाने कब से क्या-क्या बोल रहे? आपने तो कहा था कि आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। अब क्या हो गया, असलम?'

असलम चुप हो गए। मौन की अपनी भाषा होती है और जब दो मन बेहद करीब हों तो उस मौन में सब अनकहा मुखर हो जाता है। रंजना भी असलम का मौन सुन रही थीं और बखूबी समझ रही थीं।

कुछ समय बाद बहुत सोच-समझकर दोनों ने एक निर्णय ले ही लिया। सामाजिक व्यवस्था के ठप्पे के साथ, साथ रहने का निर्णय और बिना किसी उठी अँगुली के प्रति जवाबदारी या चुभते सवालों की तिलमिलाहट महसूस किए बिना। उन्हें लगा, ऐसी व्यवस्था के साथ वह बेझिझक और बेधड़क पूरे अधिकार से एक-दूसरे की पूरी देखभाल और हर पल बेझिझक एक-दूसरे का साथ निभा सकते थे। शादी ही वह व्यवहारिक कदम था जो हर बेचैन करते सवाल का माकूल जवाब था। हालाँकि यह आसान नहीं था, दोनों ही जिंदा रहते अपने-अपने जीवनसाथी के प्रति पूरी तरह समर्पित और ईमानदार रहे थे। यह निर्णय लेते हुए उनके मन में यह झिझक तो थी ही कि अपने दिवंगत साथियों से कहीं बेईमानी तो नहीं कर रहे? फिर उन्हें ख्याल आया, रमन की अंतिम बेचैन इच्छा, उन्होंने रंजना की जिम्मेदारी असलम पर ही तो छोड़ी थी। बदले हालात में रमन की उस अंतिम इच्छा को पूरा करने के सिवाय शादी के और कोई उपाय नहीं दिख रहा था उन्हें।

दुनिया और समाज की व्यावहारिक समझ रखने वाले, उन्हें इतना तो आभास था कि उनके इस निर्णय को भी सहजता से नहीं लिया जाएगा पर आशा के विपरीत अपने ही बेटे का प्रबल विरोध झेलना पड़ेगा, यह उम्मीद उन्हें नहीं थी। असलम की बड़ी बेटी फरहा जहाँ खुश और उत्साहित थी, वहीं छोटी बेटी सादिया का तटस्थ रवैया न उन्हें नकारात्मक लगा, न सकारात्मक। बड़ी बेटी फरहा ने राहत की साँस लेकर उनसे कहा था कि - 'इसमें इतनी बड़ी बात नहीं, यहाँ विदेशों में तो ऐसी बातों को बहुत सहजता से लिया जाता है। इस उम्र में एक साथी की सबसे अधिक जरूरत होती है, तब तो और भी ज्यादा, जब बच्चे दूर हों।' उसने झट से रंजना को अम्मी बुलाना शुरू कर दिया।

पर मुदित की नाराजगी उनकी समझ के परे थी। वह लगभग चीख पड़ा था,

'माँ! क्या कह रही हैं आप? इस उम्र में ये सब? वह भी असलम अंकल से? क्या आप जानती नहीं क्या कि वे मुसलमान हैं?'

मुदित की इस बात से वह लगभग सदमे में थीं। असलम मुसलमान? हाँ, मुसलमान ही तो? पर तो क्या? पिछले छब्बीस बरस में मुदित को यह क्यों नहीं दिखा? जब उनके गले में झूल-झूलकर फरमाइशों की लिस्ट सुनाता था। जो हठ रमन और रंजना से पूरे न कर पाता, वह चुपके से असलम और रेहाना से पूरे कर लेता। तब तो कभी असलम का धर्म नहीं दिखा, अब कैसे?

रमन के जाने के तीन बरस बाद भी मुदित का दोबारा आना नहीं हो सका था। बस यही जिद की आप अमेरिका चली आइए बिना ये समझे कि उनकी थकी हड्डियों में विदेशी धरती में रचने-बसने का बूता नहीं। इन तीन बरसों में रमन के जाने के बाद उनकी हर छोटी-बड़ी दुख-तकलीफ और जरूरत का ख्याल तो असलम ही रख रहे थे। बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी उम्मीद के। जैसे कि उनकी आँखों में जीने की टिमटिमाती लौ पर उनके जीवन का उजाला टिका हो। मानो उन्हें रंजना में ही रेहाना और रमन का बिछड़ा-छूटा वजूद दिखता हो। रंजना के साथ उन्हें जीने की वजह मिलती हो और रंजना को भी हर रोज जीते जाने का हौसला।

वह हैरान थीं कि क्या वह अपने ही बेटे को नहीं समझ पाई थीं। उन्हें लगा था कि मुदित हमेशा से जिस तरह असलम के करीब था, उन्हें सहज ही इस नए रूप में अपना लेगा। आखिर वह शुरू से ही पिता की ही छवि में ही तो थे उसके लिए या समय के साथ मुदित इतना बड़ा हो गया, इतना बदल गया कि वह अब ठीक से जानती ही नहीं उसे। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दस-ग्यारह साल पहले जब वह निकला था, तबसे कितने दिन फिर साथ रह पाया उनके? पर हर हफ्ता दस दिन में बंद लिफाफों से जुड़ी डोर क्या इतनी कच्ची थी उनके बीच कि वह अपनी माँ को नहीं समझता अब? क्या पत्र में लिखी बातें सिर्फ नीले, गहरे बैंगनी अक्षर ही थे बस?

वे दोनों कोर्ट में पहले से कराए नामांकन के हिसाब से एक महीने बाद विवाह बंधन में बंध गए बिना किसी धार्मिक रीति-रिवाज या परंपरा के। उसकी दोनों को ही कोई जरूरत नहीं लगी। असलम की बड़ी बेटी फरहा जैसे-तैसे छुट्टी लेकर अचानक ऐन मौके पर कोर्ट आ पहुँची थी और उन्हें सुखद रूप से हैरान करती हुई दोनों के कसकर गले लग गई थी। उनकी बोझिल, थकी-थकी खुशी राहत भरी हँसी में बदल गई थी। फरहा की मौजूदगी ने उनके उदास दिलों पर मुसकराहट का मलहम मल दिया था। सादिया का सुबह से दो-तीन बार फोन आ चुका था, साफ था कि वह भी संतुष्ट और उत्साहित थी। स्नेहा ने भी फोन पर दोनों को बड़े चाव से बधाई दी थी, उसकी आवाज से साफ था कि वह भी खुश थी, बार-बार न आ पाने के लिए उनसे माफी माँगती जा रही थी। पर रंजना उसकी आवाज में छलकती उदासी और न आ पाने का कारण साफ महसूस कर रही थीं।

मुदित ने उस दिन के बाद से एक बार भी न फोन पर बात की थी और न ही एक भी पत्र का जवाब दिया था। हमेशा लौटती डाक से मिलने वाले पत्र के जवाब की जगह उन्हें डाकिए के हाथ से पत्र के बजाए रूह घायल कर देने वाली निराशा ही मिल रही थी। वह बार-बार दुविधा में आ जातीं कि क्या उन्होंने गलत निर्णय ले लिया पर पिछले तीन वर्षों में वे और असलम जिस तरह से एक-दूसरे पर पूरी तरह निर्भर और भावनात्मक रूप से इतने गहरे जुड़ चुके थे कि उन्हें इसमें कुछ भी गलत नहीं लग रहा था।

रहने को तो वे बिना विवाह-बंधन के भी रह सकते थे पर बहुत सोचने-समझने के बाद उन्हें यही ठीक लगा। जीवन की ढलती बेला में वे पीले पड़ रहे पत्ते ही एक-दूसरे के सच्चे साथी थे।

रंजना को यह भी भरोसा था कि उनका मुदित ज्यादा समय उनसे नाराज नहीं रह सकता। एक न एक दिन वह अपनी माँ के हालात और उनमें लिए गए उनके निर्णय का औचित्य समझेगा पर अकसर उसके कहे वे शब्द गर्म लावे से उनके मातृत्व की मजबूत चूनर तार-तार कर जाते। वो उदास सोचतीं कि कैसे उनका अपना मुदित ये तक कह गया उस दिन कि - 'मुझे शर्म आ रही कि मैंने आपकी कोख से जन्म लिया।'

इस वाक्य से वह सच में सन्न रह गई थीं। मुदित ऐसी जान ले लेने वाली बातें भी बोल सकता था, यह सचमुच उनके लिए अकल्पनीय था। थोड़ा गुस्सैल तो था वो शुरू से पर थोड़ा-बहुत गुस्सा तो हर किसी को ही आता है, ऐसी कोई परेशानी वाली बात उसके व्यवहार में उन्हें कभी नहीं लगी थी। पर उनके इस निर्णय पर उसकी ऐसी प्रतिक्रिया? उन्हें कोई राह नहीं सूझ रही थी, कैसे अपने ही बेटे को अपनी बदली दुनिया का मर्म समझाएँ? ऐसी बातों में क्या बुराई है भला? कैसे बताएँ? कैसे अपने और असलम के मन की हर परत छील कर जस का तस उसके सामने बिखेर दें? कैसे करें? अब तो वह उनकी हर बात से मुँह मोड़कर, ऐसा रूठ गया है कि उनकी एक भी सदा उस तक नहीं पहुँच पा रही।

स्नेहा से वह पूछती रहती हैं कि 'क्या उनका बंद लिफाफा उसे नियमित मिल रहा?'

उसके 'हाँ' के बाद की चुप्पी से वह समझ जाती हैं कि लिफाफा मिला तो पर बंद ही है।

फिर मानो उन्हें दिलासा देने या खुश करने की कोशिश में स्नेहा के मनुहार भरे शब्द उनके कानों में गूँजते रहते 'बिना खोले एक-एक लिफाफा उसकी नजर से बचाकर अपनी आलमारी के ड्राअर में सँभाल-सँभाल कर रखते जा रहे हैं मुदित।'

स्नेहा के इस छोटे से वाक्य से उनकी उम्मीदों का मुरझाया पौधा फिर जी उठता। वो जानती हैं, उनका मुदित उनसे और असलम से दूर कैसे रह सकता है? आखिर कितने दिन?

पर इस इंतजार की उम्र उनकी सोच से कहीं अधिक लंबी निकली। चार महीने से ऊपर होने को आए पर मुदित ने मुड़कर उनसे संपर्क नहीं किया, न ही किसी बंद लिफाफे की किस्मत ही खुली। नतीजा हर सुबह उनकी उम्मीद का बीमार होता जाता पौधा, डाकिए के उनके घर के सामने से खाली हाथ लौटने की तेजाबी निराशा में हर रोज की तुलना में और तेजी से झुलस जाता। डाकिया भी अब उन्हें देख बचने की कोशिश करता हुआ उनके सामने से सिर झुका कर निकल जाता जैसे उसे भी उनके लिए बंद लिफाफे का बेसब्री से इंतजार हो और खाली हाथ वह मानो खुद को उनका अपराधी मानता हो।

ऐसी टूटती उम्मीदों के बीच संयोग से स्नेहा का दफ्तर के किसी जरूरी काम से दिल्ली आने का कार्यक्रम बना। उसने जब रंजना को बताया कि वह उन दोनों के पास ही ठहरेगी चार-छ दिन तो यह सुनकर रंजना के लिए मानो बेमौसम की दिवाली हो गई। वह उत्साहित सी स्नेहा के आने की तैयारियों में लग गईं। बरसों से बेचैन ममता उनके सीने में ठाठें मारने लगी।

पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। स्नेहा के बहुत मना करने के बाद भी वे नहीं माने थे और उसे एअरपोर्ट पर रिसीव करने के लिए वे दोनों आने वाले थे। पर स्नेहा को लाने को घर से एअरपोर्ट तक का उनका सफर अनंत का सफर निकला। स्नेहा एअरपोर्ट पर इंतजार करती रही और उनका कोई अता-पता नहीं। एक अनजाने नंबर से आई कॉल ने स्नेहा के होश उड़ा दिए। कहाँ तो वह घर जाने को उत्साहित थी, कहाँ नियति ने अपना ही चक्र चलाते हुए उसे अस्पताल के आई.सी.यू. के सामने पहुँचा दिया था। एअरपोर्ट आते हुए एक सड़क दुर्घटना में असलम घटनास्थल पर ही प्राण त्याग चुके थे और रंजना आई.सी.यू. के बिस्तर पर मशीनों से बँधी एक-एक साँस के लिए लड़ रही थीं। स्नेहा सदमे में थी।

वह टूटी आवाज में मुदित को फोन पर सूचित करते हुए बस यही कह पाई,

'अब तुम कब तक रूठे रहोगे, मुदित? वे तो, तुम क्या, हम सब से, इस दुनिया से रूठ गए।'

मुदित ने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा कुछ हो जाएगा, वह तो अपने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रंजना और असलम के इस नए रिश्ते को न देख पा रहा था और न ही स्वीकार कर पा रहा था। उसकी अपने-आप से चल रही लड़ाई इतनी घनी थी कि उसके पार उसे कुछ भी न दिख रहा था, न महसूस हो रहा था अब तक पर यह तो अप्रत्याशित था। जब तक वह पहुँच पाया, रंजना जीवन की डोर तोड़ कर किसी और ही दुनिया में मुक्त हो चुकी थीं। पीछे अपना मृत तन संसार की बेमानी रीतियों के लिए छोड़ गई थीं।

प्राण निकलने के पहले उन्हें मुश्किल से 5-10 मिनट के लिए होश आया था, उनकी बेचैन नजरें स्नेहा के साथ मुदित को तलाश रही थीं। हताश रंजना ने भीगी आँखों और काँपती स्नेहा के सिर पर मुश्किल से हौले से हाथ फिराया और अपनी नई यात्रा पर निकल गईं।

मुदित, फरहा और सादिया के आ जाने के बाद उन दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

उनके सामान को व्यवस्थित करने के दौरान स्नेहा ने लॉकर की चाभी ढूँढ़कर बैंक का लॉकर खुलवाया, जिसमें ज्वेलरी और प्रॉपर्टी के पेपर्स, उनकी विल आदि के अलावा एक पुराने छोटे पैकेट में कुछ पुराने कागज थे।

पता नहीं क्या सोचकर स्नेहा ने वह पैकेट मुदित को पकड़ा दिया। मुदित ने झिझकते हुए वह पैकेट ले लिया। घर आकर वह चुपचाप उस पैकेट को देखता रहा। फिर कुछ सोचते हुए उसने धीरे-धीरे पैकेट खोलना शुरू किया। हर किसी की उत्सुक नजर उस पुराने पीले पड़ चुके लिफाफे पर ही थी।

लिफाफे से एक पुराना पीला पड़ चुका सर्टिफिकेट जैसा कागज निकला। मुदित काँपते हाथों से पकड़े उस कागज को पढ़ते हुए बुरी तरह काँपने लगा। उसके चेहरे का रंग फक पड़ चुका था। उसकी हालत देख फरहा ने उसके हाथ से कागज ले लिया और स्नेहा और सादिया उसे सँभालने की कोशिश करने लगीं।

फरहा ने एक ही साँस में जल्दी-जल्दी वह कागज बोलते हुए पढ़ लिया। कागज का मजमून पढ़कर और समझकर उन चारों को काटो तो खून नहीं। मुदित की अवाक और खराब हो रही हालत का कारण स्पष्ट था। ये पुराने पीले पड़ चुके कागज मुदित के एडॉप्शन पेपर थे। मुदित को रमन और रंजना ने 27-28 बरस पहले किसी अनाथालय से गोद लिया था। इस सच से वे सब अनजान थे। मुदित को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। वह सदमे जैसी हालत में था। बिना शब्दों के उसकी आँखें सावन की झड़ी बन चुकी थीं। पश्चाताप, ग्लानि, दुख न जाने कितने भाव इन आँसुओं में घुले-मिले थे। उसके कानों में रंजना से चार-पाँच महीने पहले अंतिम बार बात होने पर गुस्से में कहे अपने ही कहे शब्द गूँज रहे थे,

'मुझे शर्म आ रही कि मैंने आपकी कोख से जन्म लिया।'

अपने ही कहे शब्द गर्म लावे से अब उसका तन-मन छीज रहे थे। वह घुट रहा था और इस घुटन से मुक्ति दिलाने में समर्थ उसकी माँ रंजना का आँचल नहीं था अब। उसे लग रहा था, उसकी ये बातें, उसकी उपेक्षापूर्ण बेरुखी वह आँचल कब का खाक कर चुकी थी। पीछे वह बचा हुआ था जीवन भर इस खाक में सुकून तलाशते रहने के लिए। काश वह दुनिया, समाज, धर्म-जाति से पहले अपनी माँ के बारे में सोचता जैसे उन्होंने उसे गोद लेते हुए इन सब बातों से परे सिर्फ और सिर्फ उसके बारे में सोचा होगा।

वापस आने के बाद मुदित अक्सर रात में यह सोचकर कि स्नेहा सो रही है, चुपचाप उन बैंगनी लिफाफों से घिरा माँ के वात्सल्य भरे आँचल के झुलसे तार बुनने की कोशिश करता है। उसकी घुटती सिसकियों को सुनती स्नेहा अकसर चुपचाप कोने में खड़ी उन लिफाफों से बह निकले वात्सल्य और विश्वास के समंदर की सुकून भरी तरलता महसूसती है। वह जानती है कि सारे बंद लिफाफे खुल चुके हैं और मुदित का सुकून अब इन्हीं खुले लिफाफों के बीच तैर रहा है।


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