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कहानी

एक शहरी पाकिस्तान का
रामलाल

अनुवाद - नन्द किशोर विक्रम


मुनि और मीशा धूप में खेल रहे थे। सरस्वती उन्हें नहलाने के लिए जल्दी-जल्दी गर्म पानी, तौलिया, साबुन, उनके कपड़े वगैरा बाथरूम में रखने जा रही थी। उसने बच्चों को पुकारा-

''ऐ मुनि, ऐ मीशा, चलो नहा लो जल्दी-जल्दी, वरना मुझे वक्त नहीं मिलेगा।''

बच्चे खेल में व्यस्त रहे। सरस्वती ने आगे बढक़र दोनों को पकड़ा और उन्हें लेकर सीधी बाथरूम में चली गयी।

छब्बीस साल की सुन्दर, स्वस्थ, ऊँची और आकर्षक सरस्वती उन्हें साबुन मल-मलकर नहलाने लगी। बच्चे आँखों में साबुन पड़ जाने से रोने लगे। सरस्वती बुदबुदाई-''अभी तुम्हारे डैडी आ जाएँगे। लंच का टाइम हो गया है। दिन-भर बेचारे मजदूरों के सिर पर खड़े सरकारी मकान बनवाते रहते हैं, उन्हें भूख लगी होगी।''

अचानक उसकी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

''लो, वह आ भी गये ! मैं आयी जी, इन्हें ज़रा...''

मीशा पानी के छींटे उड़ाने लगा।

''देखा...'' सरस्वती कुछ कहते हुए दोनों बच्चों को उठाकर बाहर धूप में ले आयी और वहीं बिछी हुई खाट पर ला बिठाया। उन्हें उठाकर लाने में सरस्वती का साड़ी-जम्पर पानी से भीगकर, उसके जिस्म से चिपक गया। इस ओर कोई ध्यान न देकर वह बच्चों की तरफ तौलिया फेंकते हुए बोली, ''पोंछो, मैं आयी।'' और दरवा$जा खोलने चली गयी। बोलती भी रही, ''मैं जानती थी, आप आते होंगे। आपको भूख लगी होगी। मैंने सब्ज़ी तो बना रखी है, सिर्फ रोटी बनाना बाकी है। ये बच्चे...''

उसने कुंडी खोल दी। बाहर से दबाव पडऩे पर दोनों किवाड़ भी खुल गये। लेकिन पति के बजाय एक दूसरे व्यक्ति को सामने खड़ा पाकर सरस्वती की बात अधूरी रह गयी। वह विस्मय से भरी हुई अचम्भित और घबड़ायी हुई एक तरफ हट गयी! कन्धों पर झूलता हुआ दुपट्टा सिर पर ठीक किया। धूप में पानी से तर-ब-तर बैठे हुए बच्चे भी हैरान होकर देखने लगे। यह कौन है?

धारियोंवाली नीली कमीज़ और स$फेद सलवार पहने ऊँचा सुडौल जिस्म, उलझे हुए घुँघराले बाल। छोटी-छोटी तुर्शी हुई मुर्झाई-मुर्झाई-सी मूँछें, जिन पर धूल के कण आ टिके थे। उसके सूखे हुए होंठ सरस्वती को देखकर कभी मुस्कराते, कभी सिकुड़ जाते। उसके एक हाथ में एक बैग था और दूसरे में तह किया हुआ मिलेट्री का पुराना कम्बल।

''नहीं पहचाना मुझे...'' नवागन्तुक ने भारी और गम्भीर आवाज़ में पूछा और एक बार फिर मुस्कराने की कोशिश की।

सरस्वती ने उसे खूब ध्यान से देखा। फिर नीचे ज़मीन पर देखने लगी। उसके माथे पर पसीने के कई ह$जार कण जैसे एक साथ उभर आये!

नवागन्तुक ने उसे उलझन में पड़ा देखकर कहा, ''मैं बलदेव हूँ, याद नहीं?''

सरस्वती ने उसे फिर गहरी नज़र से देखकर सिर झुका लिया और कोई जवाब दिये बिना बच्चों की तरफ चल दी। उसी तरह विस्मित, उसी तरह परेशान जैसे उसे सब कुछ याद आया था। एक-एक क्षण याद था। उसकी कैफ़ियत बताती थी कि उसे कोई बात भूली न थी। वह बलदेव को अच्छी तरह पहचान गयी थी।

बच्चे माँ के पास खिसक आये। सरस्वती उसी बेसुधी और घबराहट की स्थिति में उनका गीला बदन पोंछने लगी। बलदेव आहिस्ता-आहिस्ता चलता हुआ अन्दर आ गया और चारपाई के पास खड़ा हो गया, जहाँ सरस्वती बैठी थी। वह सरस्वती और उसके बच्चों को घूरने लगा। उसके चेहरे पर कई रंग थे, कई रेखाएँ थीं, कई भाव और कई भंगिमाएँ थीं, जैसे उसके अन्दर कोई तूफान उठ रहा हो! अचानक जैसे सरस्वती अपनी बेसुधी से चौंकी। उसने अभी तक बलदेव को कहीं बिठाया नहीं था। उसने अपनी चारपाई के सामने एक और चारपाई बिछा दी।

बलदेव ने बैग और कम्बल चारपाई पर रखा और बैठते हुए पूछा, ''ये तुम्हारे बच्चे हैं?''

सरस्वती ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह पहले जैसी ही खामोशी से हाथ में थामे तौलिया का एक धागा खींचे जा रही थी। वह धागा टूट गया तो वह दूसरा धागा खींचने लगी, लेकिन बलदेव के सवाल का कोई जवाब उसने नहीं दिया। बलदेव ने बच्चों के सिर पर हाथ फेरा। उसकी पलकों पर आँसू उभर आये, वह तरह स्वर में बोला-

''मेरा यही खयाल था कि तुमने दूसरी शादी कर ली होगी। करनी ही चाहिए थी। लेकिन जब मुझे मालूम हुआ कि तुम जिन्दा हो तो तुमसे मिलने फौरन चल पड़ा। सफ्फो ने मुझे बहुत रोका। बहुत रोयी। जानती हो न अपने मोहम्मद शरीफ़ मिस्त्री की बेटी सफ्फो को? जब तुमने उसे अन्तिम बार देखा था, बारह-तेरह साल की थी। अब तो बहुत बड़ी हो गयी है। लेकिन पागल है बिलकुल, सचमुच!'' यह कहते-कहते बलदेव मुस्करा भी दिया।

बलदेव की आँखें अब सिर्फ सरस्वती पर जमी थीं। शेर-ओ-शराब की कैफियत में डूबी हुई। उसकी सुन्दर आँखें और भरे-भरे गुलाबी होंठ! उसका जवान भरा-भरा जिस्म, उसकी प्रीत। उसकी सारी कायनात कभी उसकी थी, सिर्फ उसकी। वही इसका मालिक था। वह उसकी तरफ बड़े प्यार से देखने लगा। दिल के अन्दर उठे तू$फान को दबाकर, आँखों में केवल प्रेम का अमृत लेकर उसकी तरफ देखता रहा। हालाँकि खंडित कामना की आयी मायूसी की धूल-गर्द से उसकी आँखें बची हुई नहीं थीं...सरस्वती का मुखड़ा भी कभी लाज के आवेग में एकदम लाल हो उठता, कभी राख की तरह ठंडा होकर एकदम मुर्झा जाता। उसके रूखे, भूरे बालों की एक लम्बी लट उसके कान से उतरकर चेहरे पर आ गयी। बालों की लम्बी लट उसकी पतली नाक की नोक छूने लगी। उसकी आँखों से बहते हुए आँसू नाक की कगार पर पहुँचकर वहाँ से बूँद-बूँद उसके आँचल पर गिरने और जज़्ब होने लगे।

बलदेव ने पाँव में पहनी हुई पेशावरी चप्पल की नोक से ज़मीन पर कई लकीरें खींची। कई त्रिकोण और वृत्त बनाये। फिर उन सबको चप्पल से मिटाते हुए बोला-

''मैं सीधा पाकिस्तान से चला आ रहा हूँ।''

यह सुनकर सरस्वती चौंक पड़ी। उसकी हैरानी और बढ़ गयी। उसे यों हैरान देखकर बलदेव के अधरों पर मुस्कान उतर आयी। वह बोला, ''हाँ-हाँ पाकिस्तान से, परन्तु अब यहीं रहूँगा। मुझे यहीं रहना चाहिए, क्यों?''

अचानक वहाँ एक अधेड़ औरत आ गयी। बाहर से हँसती आ रही थी। बलदेव को देखते ही उसका मुँह खुला का खुला रह गया। उसकी आँखें कई बार सिकुड़ी और फैलीं। जैसे उसे बलदेव के सचमुच बलदेव होने का विश्वास नहीं हो रहा था। फिर वह लगभग चीखकर बोली-

''वे तू बलदेव है क्या !''

बलदेव ने उठकर उसके चरण छुए, ''हाँ जी, मैं बलदेव हूँ, आपने पहचान लिया न?''

''अरे कैसे नहीं पहचानती। लेकिन तू जिन्दा कैसे है ? हम तो समझते थे...''

यह कहते-कहते उसने सरस्वती की ओर देखा और उसकी कमर पर जोर से दो धाप मारकर बोली, ''...तू यहाँ बैठी क्या कर रही है, लाज नहीं आती तुझे? चल अन्दर!''

सरस्वती ने जल्दी से सिर पर आँचल ठीक किया और माँ के शब्दों से आहत होकर जल्दी-जल्दी बच्चों को घसीटती कमरे के अन्दर चली गयी। शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया था।

बलदेव की सास बलदेव के सामने चारपाई पर बैठकर बोली, ''तू जीवित है तो भगवान का लाख-लाख शुकर है, लेकिन अब होगा गया? हम तो समझे हुए थे...हाय, अब मैं क्या कहूँ, कुछ कहते हुए जी डूबता है अब..अब मैं क्या करूँ?''

वह उठकर कमरे की ओर चल दी, ''बेटा सरस्वती, अब क्या होगा? मेरी तो बुद्धि जवाब दे चली है।''

सरस्वती की प्रतिक्रिया सुने बिना वह तुरन्त उलटे पाँव बाहर आ गयी। वह घर से बाहर जाना चाहती थी, किसी को बुलाना चाहती थी। बलदेव ने उसे रोक लिया। चारपाई पर बैठाकर बोला-

''यहाँ बैठ जाइए माताजी ! आप घबरा क्यों रही हैं? मेरे आ जाने पर आपको खुशी नहीं हुई न?''

सरस्वती की माँ आँखों पर दुपट्टे का पल्लू रखकर रोने लगी, ''मेरी बेटी की जिन्दगी को किसकी हाय लग गयी, सारी इज्जत खाक में मिल गयी। जीते जी दो-दो घरवाले आ मौजूद हुए! हाय, तू मर क्यों नहीं जाती बेटी! पाकिस्तान से इज़्ज़त बचाकर यहाँ आ गयी-पर यहाँ सिवा मर जाने के कोई और रास्ता नहीं मिलेगा तुझे!''

यह कहकर उसने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। बलदेव दोनों हाथों से सिर थामकर बैठ गया। सरस्वती की माँ तो उसकी कोई बात सुनती ही नहीं थी! अवसर पाकर खँखारकर गला साफ़ करके उसने कहा, ''मैं भी यही समझे हुए था कि आप सब मार दिये गये हैं। भोला के मकान में मैंने सरस्वती के चाचा की लाश अपनी आँखों से देखी थी। ठाकुर की लाश दरवाजे पर पड़ी देखी थी। नौनीत और लाजवन्ती भी मेरे सामने ही छज्जे से नीचे फेंकी गयी थीं। आप सबके बारे में मुझे यही बताया गया था कि कोई नहीं बचा। मैंने भी विश्वास कर लिया।''

''फिर...फिर तू चला कहाँ गया था ? हमें तलाश करने की कोई कोशिश क्यों नहीं की?'' वह बिफरकर बोली।

''मैं करता भी क्या? जब यह विश्वास हो गया कि अब मेरा कोई नहीं बचा तो फिर तलाश किसे करता?''

''यही तो हमने तो समझ लिया था, तेरे बारे में। इसमें हमारा कोई दोष नहीं। हम यह थोड़े ही चाहते थे कि तू मर जाएे और हम बेटी का हाथ किसी दूसरे के हाथ में दे दें। ऐसे कौन-से नीच माँ-बाप होंगे। कोई नहीं बेटा, कोई नहीं।'' रोते-रोते वह हवा में उँगली लहराकर पुन: बोली, ''तेरी ख़बर किसी को भी नहीं मिली। मैं और सरस्वती, हर जगह, हर कैम्प में, जहाँ-जहाँ हम पहुँचे, तेरा नाम ले-लेकर पुकारते और रोते फिरे। जब तेरे भाई, तेरे माँ-बाप, तेरे घरवाले सब मार डाले गये तब फिर हम कैसे यक़ीन कर लेते कि तू बच गया है। मारने और बचाने वाला तो बेशक वह भगवान है, जिसने हमारी आँखों पर पर्दा डाल दिया।''

''मेरी राह तो देखी होती माँ !''

''तेरी राह...बेटा, तेरी राह तो मैं सरस्वती के मरने तक देखती। इसकी चिता को आग ही नहीं लगने देती, अगर मुझे मालूम होता कि तू जिन्दा है ! यह तो वहीं मरने जा रही थी। मर जाती तो अच्छा था। सुन्दरदास मेरी कोख को जलाने के लिए इसे ज़$ख्मी हालत में उठाकर हमारे पास कैम्प में ले आया। हम सभी को जान पर खेलकर वही बचाता रहा। भारत पहुँचकर भी हमारी अब तक सेवा कर रहा है।''

बलदेव ने अपने सिर व कन्धे पर लगे ज़$ख्मों के निशान दिखाते कुए कहा, ''मैं तो इनकी वजह से अपने मकान की छत पर बेहोश पड़ा था। घायल न हो गया होता तो मैं भी आप सबकी जान बचाने में कोई कसर न छोड़ता।''

इस बीच वहाँ कुछ और लोग आ गये। सरस्वती का बाप, उसकी मामी, कुछ पड़ोसी और कुछ पड़ोसिनें। सबने बलदेव को घूर-घूरकर देखा। निगाहों से टटोला। जब मुँह से कोई न बोला तो सरस्वती की माँ ने चिल्लाकर कहा-

''पहचानते क्यों नहीं, बलदेव है ! जिन्दा है मेरी बेटी की नाक काटने के लिए सारे जग में!''

सरस्वती का बाप सकते में आ गया। शेष भी जहाँ थे, वहीं खड़े रह गये।

''क्या तू सचमुच बलदेव है?'' लाला बोधराज की सफेद घनी मूँछों में से उसकी डूबती हुई आवाज़ छनकर बाहर आयी।

''जी हाँ, लालजी!'' कहते हुए उसने आगे बढक़र सरस्वती के बाप के पाँव छुए।

''तू कहाँ रहा इतने दिन ?''

''पाकिस्तान में लालाजी !''

''पाकिस्तान में ? पर वहाँ करता क्या रहा पगले!''

बलदेव ने अपने सूखे होंठों की एक पपड़ी काटी। उसे देखा और बताया-''वही जो करता था, दुकानदारी।''

''तू अजब मूर्ख है, हिन्दुस्तान क्यों नहीं चला आया ?''

''मैं समझा, अब मेरा कोई बचा नहीं है, यहाँ आकर क्या करता ?''

''ओहो, पर तुझे वहाँ अपनी जान का कोई ख़तरा नहीं था ?''

बलदेव हँसकर बोलो, ''अपने तौर पर तो उन्होंने मुझे मार ही डाला था। जब यहाँ से इतने सारे ज़$ख्मी और तबाहहाल मुहाजिरों के काफिले के काफिले वहाँ पहुँचे तो मेरे लिए वहाँ रहना करीब-करीब नामुमकिन हो गया था। लेकिन भला हो अपने स्कूल-मास्टर खुदादाद खाँ का, जिसने मौके पर मेरी मदद की। फौलाद की ढाल बनकर मेरी हि$फाज़त करता रहा। उसकी वजह से आज वहाँ मैं, मेरा पैतृक मकान और मेरी दुकान सब बचा हुआ है।''

बलदेव के उत्तर से लाला बोधराज को जैसे सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने उसी उतावलेपन से पूछा-

''वहीं तूने शादी-वादी भी की है या नहीं ?''

''शादी?'' बलदेव ने हैरान होकर सबकी तरफ देखा। वे लोग घेरा डाले उसके चारों तरफ खड़े थे। उसके जवाब का इन्त$जार कर रहे थे। सरस्वती भी द्वार के पीछे ताक के साथ माथा टेके खड़ी थी। वह क्या करे? वह उससे किस तरह के उत्तर की आशा रखते थे? सरस्वती की माँ की दहाड़ें, उसके बाप की नमनाक पलकें और घबराहट से काँपती हुई चेहरे की झुर्रियाँ। ये सब कुछ किस ह$कीकत का बिम्ब उभार रही थीं। वे लोग क्या चाहते थे?

सहसा गली के उस छोर से एक और आदमी अन्दर आया। खाकी नेकर और कमीज पहने, साइकिल थामे, सिर के बालों और शरीर पर धूल-गर्द की तहें जमाये। इतने सारे लोगों को एकत्रित देखकर उसे हैरानी और चिन्ता हुई। साइकिल उसने दीवार के सहारे खड़ी की, बूटों पर पड़ी गर्द को ज़मीन पर ज़ोर से पाँव पटककर झाड़ा और फिर दोनों हाथों से मुँह पोंछते हुए, उनके पास आकर पूछा-

''क्या हुआ, क्या बात है लालाजी ?''

वह उनके पास पहुँच गया। सबके बीच चारपाई के किनारे बैठे हुए बलदेव को उसने हैरानी से देखा। पर उसे पहचान न सका। बलदेव का चेहरा भी एक सवालिया निशान बनकर रह गया। वह उसे घूर-घूरकर देख रहा था। उसके गाल पर बने एक पुराने जख्म पर आँखें जमाये हुए वह उठकर खड़ा हो गया और लाला बोधराज से कहा-

''यही सुन्दरदास है, इसे मैं पहचानता हूँ।''

''हाँ...'' लाला बोधराज ने सुन्दरदास के दोनों कन्धों पर अपने बाजू फैला दिये, ''...यही सुन्दरदास है, जिसने हम सबकी जान बचायी, हमारे साथ कैम्पों में सर्दी-गर्मी सारे कष्ट बर्दाश्त किये। सारे झगड़े और बखेड़े झेले। हमें दोबारा यहाँ आकर बसने में जो मुसीबतें उठानी पड़ी हैं, इस शेर जवान का उनमें बहुत-सा हिस्सा है। इस घर को देखते हो, इसकी दीवारों पर अभी प्लास्टर नहीं हुआ। यह इसी का घर है, इसका अपना घर। इस छोटे-से घर से, इसकी छोटी-सी दुनिया आबाद है, मोहब्बत से भरी हुई दुनिया। दो मासूम बच्चों और एक बीवी की दुनिया। सरस्वती को विधवा समझकर इस चरित्रवान नौजवान ने उससे ब्याह कर लिया। हमारे पास सरस्वती का हाथ उसके हाथ में देने के सिवा चारा ही क्या रह गया था? तुम्हारी कोई खबर नहीं मिलती थी, और बहुत-से लोगों ने भी यही राय दी थी।''

यह कहते-कहते लाला बोधराज का गला भर आया। लेकिन बलदेव की आँखें अभी तक सुन्दरदास के चेहरे पर जमी हुई थीं। उसके गाल पर बने गहरे चिह्न पर। उसकी गहरी सुर्ख लकीर के भीतर वह पन्द्रह वर्ष पहले की एक घटना देख रहा था। ईष्र्या और शत्रुता से भरपूर घटना! म्यूनिसिपल कमेटी के पीछे एक खेत में हुई निर्बाध लड़ाई की यादगार था यह निशान!

उस घटना को सरस्वती जानती थी। उस लड़ाई का प्रमुख कारण भी वही थी। हालात ने आज सरस्वती को छीनकर सुन्दरदास के हवाले कर दिया था, वरना उसके रहते तो वह सरस्वती की कल्पना तक नहीं कर सकता था।

सुन्दरदास के मुख पर आवेश का भाव उतर आया था। उसका जबड़ा कसा हुआ था। उसके चेहरे पर एक सुर्ख लहर, थोड़े-थोड़े अन्तराल के बाद उभर रही थी; जैसे वह बहुत तेजी से कुछ सोचने में व्यस्त हो! अचानक वह सब लोगों को छोडक़र कमरे में चला गया! सभी लोग उधर देखने लगे। बलदेव की दृष्टि भी उधर जम गयी। सरस्वती की माँ अब भी रो रही थी। कुछ क्षणों बाद सुन्दरदास कमरे से बाहर निकल आया। वह सीधा बलदेव के पास आया। दोनों हाथ नेकर की जेबों में थे। सिर छाती पर झुका हुआ था। मानो वह अभी तक किसी सोच में डूबा था। फिर उसने आँखें उठाकर बलदेव को घूरा और धीरे से कहा-

''तुम चाहो तो अदालत का द्वार खटखटा सकते हो।''

यह सुनकर सबकी जान में जान आ गयी। जैसे सब लोग यही चाहते हों। सब लोगों ने बलदेव की ओर देखा। वह सब एक ओर थे। बलदेव दूसरी ओर अकेला और $खामोश। दस साल तक तन्हाई और खामोशी भरी जिन्दगी गुजारने के बाद वह अकेला और मौन था। उसके चेहरे पर जैसे इस जिन्दगी की यन्त्रणा और त्रासदी के बिम्ब उभर आये थे। गहरे, तीखे बिम्ब। वह कुछ कहे बिना कई क्षणों तक सुन्दरदास को देखता रहा। फिर खँखारकर गला साफ़ किया, कमरे के अधखुले काँपते कपाटों को देखा और कहा-

''सरस्वती मेरी बीवी है। वह मेरे प्रेम को कभी भुला नहीं सकती। उसे दोबारा पाने के लिए आप लोग अदालत का रास्ता दिखा रहे हैं। मुझे अदालत का रास्ता मालूम है। अदालत भी इंसाफ करेगी, लेकिन कब? कितने साल बाद? कौन जाने? मैं अब एक दूसरी अदालत का द्वार खटखटाना चाहता हूँ। इसी वक्त, इसी जगह। मुझे उसके इन्साफ पर पूरा-पूरा भरोसा है।''

यह कहते-कहते बलदेव का गला रुँध गया। वह और कुछ न कह सका। उसकी आँखों में छाये हुए बादल भी बरस पड़े। वह अधखुले, काँपते द्वार पर निगाह जमाकर रोते हुए थोड़ी ऊँची आवाज़ में बोला-

''जवाब दो सरस्वती, मैं किसी और से नहीं पूछता, सिर्फ तुमसे पूछता हूँ, तुमसे सरस्वती !''

उसी क्षण कमरे में एक हृदयविदारक चीख बुलन्द हुई। सरस्वती ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी, सब औरतें घबराकर उस ओर भागीं।

उसी समय गली के मुहाने पर एक और व्यक्ति दिखाई पड़ा। उसके हाथ में एक खाकी रंग का काग़ज़ था। भीतर आकर बोला।

''यहाँ पाकिस्तान का एक शहरी आया है, इसी घर में आकर ठहरा है न ?''

बलदेव ने उसके हाथ से काग़ज़ लिया। कुछ देर तक उसे पढ़ा। फिर वापस करते हुए बोला-

''हाँ...आज लौट जाएगा।'' यह कहकर उसने अपनी आँसू भरी आँखें आस्तीन से पोंछी, अपना पुराना मिलेट्री कम्बल और बैग उठाया और आहिस्ता-आहिस्ता क़दम उठाता हुआ बाहर निकल गया।


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