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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 4
शेखर : एक जीवनी

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल

अनुक्रम

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वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है। जो यातना में है वह द्रष्टा हो सकता है।

'शेखर : एक जीवनी' जो मेरे दस वर्ष के परिश्रम का फल है-दस वर्षों में अभी कुछ देर है, लेकिन 'जीवनी' भी तो अभी पूरी नहीं हुई! घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए (Vision) को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है।

आप इसे शेखी समझ सकते हैं। मेरे कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि इतना बड़ा पोथा मैंने एक रात में गढ़ डाला। नहीं, आप मेरे एक-एक शब्द को फिर ध्यान से पढ़िए-'शेखर' घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए (Vision) को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है।

सम्भव है, आप जानना चाहें, वह रात कैसी थी। किन्तु वैसी बातों का वर्णन शक्य नहीं होता, न उसका आपके लिए कोई प्रयोजन ही है। आपके लिए तो उसका यही वर्णन और यही महत्त्व हो सकता है कि उसमें मैंने यह Vision देखा था। वह रात मुझे उपलब्ध कैसे हुई, इसके सम्बन्ध में इतना बता सकता हूँ कि जब आधी रात को डाकुओं की तरह आकर पुलिस मुझे बन्दी बना ले गयी, और उसके तत्काल बाद पुलिस के उच्च अधिकारियों से मेरी बातचीत, फिर कहा-सुनी और फिर थोड़ी-सी मारपीट भी हो गयी, तब मुझे ऐसा दीखने लगा कि मेरे जीवन की इतिश्री शीघ्र होनेवाली है। फाँसी का पात्र मैं अपने को नहीं समझता था, न अब समझता हूँ, लेकिन उस समय की परिस्थिति और अपनी मनःस्थिति के कारण यह मुझे असम्भव नहीं लगा। बल्कि मुझे दृढ़ विश्वास हो गया कि यही भवितव्य मेरे सामने है। ऊपर मैंने कहा कि घोर यातना व्यक्ति को द्रष्टा बना देती है। यहाँ यह भी कहूँ कि घोर निराशा उसे अनासक्त बनाकर द्रष्टा होने के लिए तैयार करती है। मेरी स्थिति मानो भावानुभावों के घेरे से बाहर निकलकर एक समस्या-रूप में मेरे सामने आयी-अगर यही मेरे जीवन का अन्त है, जो उस जीवन का मोल क्या है, अर्थ क्या है, सिद्धि क्या है-व्यक्ति के लिए, समाज के लिए, मानव के लिए?...इस जिज्ञासा की अनासक्त निर्ममता के, और यातना की सर्वभेदी दृष्टि के आगे मेरा जीवन धीरे-धीरे खुलने लगा, एक निजी और अप्रासंगिक विसंगति के रूप में नहीं, एक घटना के रूप में, एक सामाजिक तथ्य के रूप में, और धीरे-धीरे कार्य-कारण परम्परा के सूत्र सुलझ-सुलझकर हाथ में आने लगे...

पौ फटने तक सारा चित्र बदल गया। अर्थ के बहुत-से सूत्र मेरे हाथ में थे, लेकिन देह जैसे झर गयी थी, धूल हो गयी थी। थककर, किन्तु शान्ति पाकर मैं सो गया और दो-तीन दिन तक सोया रहा।

यही उस रात के बारे में कह सकता हूँ। उसके बाद महीना भर तक कुछ नहीं हुआ। एक मास बाद जब मैं लाहौर किले से अमृतसर जेल ले जाया गया, तब लेखन-सामग्री पाकर मैंने चार-पाँच दिन में उस रात में समझे हुए जीवन के अर्थ और उसकी तर्क-संगति को लिख डाला। पेंसिल से लिखे हुए वे तीन-एक सौ पन्ने 'शेखर : एक जीवनी' की नींव हैं। उसके बाद नौ वर्ष से अधिक मैंने उस प्राण-दीप्ति को एक शरीर दे देने में लगाये हैं। उसी को शरीर देने के लिए, इसलिए कि वैसी intensity 'तीव्रता' केवल कल्पना के सहारे नहीं मिल सकती, वह जीवन में ही मिल जाय, तो कल्पना से उसे संयत ही किया जा सकता है, पूर्वापर का जामा ही पहनाया जा सकता है।

यदि आपने क्रान्तिकारियों के जीवन का कुछ भी अध्ययन किया होगा, तो आप पाएँगे कि अथक कार्यशील इन प्राणियों में उनके सारे कृतित्व के नीचे छिपी हुई एक कठोर नियति रहती है। क्रान्तिकारी अन्ततोगत्वा एक प्रकार के नियतिवादी होते हैं। लेकिन यह नियतिवाद उन्हें अक्षम और निकम्मा बनानेवाला कोरा भाग्यवाद नहीं होता, वह उन्हें अधिक निर्मम होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। इसमें वह गीता के कर्मयोग से एक सीढ़ी आगे होता है-क्योंकि वह कर्ता को निरा निमित्त नहीं बना देता। यदि यों कहा जाय, कि क्रान्तिकारी का नियतिवाद अटल नियति की स्वीकृति न होकर, जीवन की विज्ञानसंगत कार्य-कारण परम्परा पर गहरा (यद्यपि अस्पष्ट) विश्वास होता है तो शायद सच्चाई के निकट होगा। मेरा ख्याल है कि आज के अधिकांश वैज्ञानिक भी कुछ इसी प्रकार के नियतिवादी हैं।

तो 'शेखर : एक जीवनी' के क्रान्तिकारी नायक ने अपने जीवन में इसी नियति के सूत्र को पहचानने का प्रयत्न किया है। क्योंकि उसे पहचान लेना ही जीवन को समझ लेना है, उसकी पूर्ति पा लेना है। ईश्वर जो करता है, अच्छा ही करता है, अतएव प्रत्येक घटना स्वयं अपनी सिद्धि है-यह भी एक मार्ग है; लेकिन इस तर्क परम्परा को जो व्यक्ति स्वीकार नहीं कर सकता है, उसके लिए जीवन को सह्य बनाने का दूसरा उपाय यही हो सकता है। इसलिए आप पाएँगे कि 'जीवनी' के पहले भाग में शेखर अपने बाल्यकाल की छोटी-छोटी घटनाओं की भी जाँच कर रहा है। बाल्यकाल का अध्ययन स्वयं अपना महत्त्व रखता है, और विदेशों के कई कलाकारों ने बाल्यमन का अध्ययन और चित्रण किया है, लेकिन 'जीवनी' में यह अध्ययन साध्य नहीं है, यह केवल उन सूत्रों को खोजने का साधन है, जो होते हैं प्रत्येक जीवन में, किन्तु जिन्हें देखने की शक्ति सदा नहीं होती-वह तो तब मिलती है, जब किसी घटना की चोट से जीवन दीप्त हो उठता है, या तब जब यातना की तीव्रता से व्यक्ति ही सूक्ष्मद्रष्टा बन जाता है... अपनी रचना के बारे में कुछ कहने का अधिकार मुझे नहीं है, लेकिन 'शेखर' का और अपना सम्बन्ध ध्यान में रखते हुए मुझे लगता है कि इसी में उसके जीवन की महानता और इसी में उसकी दीनता है। महानता इसलिए कि उसकी जिज्ञासा में लगन है, निष्ठा है; दीनता इसलिए कि इस तीव्रता के कारण ही वह कई जगह सच्चा शोधक न रहकर केवल हेतुवादी रह जाता है और उसका हेतुवाद (rationalisation) करुण और दयनीय जान पड़ने लगता है*...

तो संक्षेप में यही 'शेखर : एक जीवनी' की बुनियाद की कहानी है। आप कहेंगे कि यह तो एक VISION नहीं, यह एक तर्क-प्रणाली है, एक फ़लसफ़ा है। लेकिन मैं मानता हूँ कि फ़लसफ़ा भी अन्ततः दृष्टि है, vision है - और अपनी धारणा की पुष्टि के लिए फ़लसफ़े के हिन्दी नाम की शरण लेता हूँ - दर्शन!

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क्या यह 'जीवनी' आत्म-जीवनी है? यह प्रश्न अवश्य पूछा जाएगा। बल्कि शायद पूछा भी नहीं जाएगा, क्योंकि पाठक पूर्व-धारणा बनाकर चलेगा। हिन्दी में जहाँ प्रत्येक कवि अपनी स्त्री को लक्ष्य करके लिखता है, जहाँ वियोग की कविता इतने भर से प्रमाणित मान ली जाती है कि उसे अमुकजी ने अपनी पत्नी के देहान्त के बाद लिखा है, वहाँ यही आशा करना व्यर्थ है कि 'शेखर' जो केवल एक जीवनी ही नहीं एक व्यक्ति की अपने मुँह कही हुई जीवनी है, उसके लेखक की जीवनी नहीं मान ली जाएगी। मुझे याद है, तीन वर्ष पहले जब मेरी एक कविता 'द्वितीया' छपी थी, तब उसके कई-एक पाठकों ने मुझे संवेदना के पत्र लिखे थे और एक ने यहाँ तक लिखा था कि 'मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है क्योंकि स्वयं उसी परिस्थति में होने के कारण मैं आपकी अवस्था बखूबी समझ सकता हूँ।' पत्र के सम्पादक ने भी (यद्यपि कुछ मजाक में) पूछा था कि 'आपका पहला विवाह तो हुआ नहीं, दूसरी पत्नी से यह झगड़ा कैसा?' ऐसे व्यक्तियों को यदि प्रमाण मिल जाय कि मैंने बिना एक भी विवाह हुए, दूसरे विवाह की बात लिख दी है, तो वे समझेंगे कि उन्हें धोखा दिया गया है। यह कहते खेद होता है-किन्तु बात है सच-कि आजकल का अधिकांश हिन्दी साहित्य और आलोचना एक भ्रान्त धारणा पर आश्रित है; कि आत्म-घटित (आत्मानुभूति नहीं, क्योंकि अनुभूति बिना घटित के भी हो सकती है) का वर्णन ही बड़ी सफलता और सबसे बड़ी सच्चाई है। यह बात हिन्दी के कम लेखक समझते या मानते हैं कि कल्पना और अनुभूति-सामर्थ्य (sensibility) के सहारे दूसरे के घटित में प्रवेश कर सकना, और वैसा करते समय आत्म-घटित की पूर्व-धारणाओं और संस्कारों को स्थगित कर सकना- objective हो सकना-ही लेखक की शक्ति का प्रमाण है। इसके विपरीत लेखको में ऐसे अनेक मिल जाएँगे, जो ऐसी अनुभूति (मैं फिर कहता हूँ कि आत्म-घटित ही आत्मानुभूति नहीं होता, पर-घटित भी आत्मानुभूत हो सकता है, यदि हममें सामर्थ्य है कि हम उसके प्रति खुले रह सकें) को परकीय, सेकण्ड-हैण्ड, अतएव घटिया और असत्य कहेंगे। ऐसे व्यक्तियों के लिए टी.एस. इलियट की उस उक्ति का कोई अर्थ नहीं होगा, जो वास्तव में इसका एकमात्र उत्तर है : There is always a separation between the man who suffers and the artist who creates; and the greater the artist the greater the separation.

(भोगनेवाले प्राणी और सृजन करने वाले कलाकार में सदा एक अन्तर रहता है, और जितना बड़ा कलाकार होता है, उतना ही भारी यह अन्तर होता है।)

* उपर्युक्त कथन के बाद यह कहने की तो आवश्यकता नहीं होना चाहिए कि यद्यपि शेखर का जीवन-दर्शन सामान्यतया उसके लेखक का भी जीवन-दर्शन है, तथापि उसमें जहाँ-तहाँ शेखर जिन  rationalisations या fallacies  की शरण लेता है, वे शेखर की ही हैं, उसके लेखक की नहीं। तर्क की ऐसी करुण भूलें सभी करते हैं, लेकिन एक कहानी के पात्र में जो त्रुटि है, ठीक वही त्रुटि उसके लेखक में भी है, यह मानना ग़लती है। यह यहाँ इसलिए कहना पड़ता है कि हिन्दी का पाठक ऐसी भूल प्रायः करता है, और मैं अनुभव से जानता हूँ।

लेकिन यह एक लम्बा विषयान्तर हो गया है और मुझे मानना पड़ेगा कि इलियट के कथनानुसार मैं बहुत बड़ा अर्टिस्ट हो सका हूँ। शेखर का एक भी पात्र नहीं है, जो न्यूनाधिक मात्रा में एक संश्लिष्ट चरित्र (composite character) नहीं है, तथापि मेरी अनुभूति और मेरी वेदना शेखर को अभिसिंचित कर रही है। और यह अभिसिंचन ऐसा है कि उससे यह कहकर छुटकारा नहीं पाया जा सकता कि अन्तोगत्वा सभी गल्प साहित्य आत्मकथा-मूलक है, अपने ही जीवन का चित्रण नहीं तो प्रक्षेपण है, अपने स्यात् की कहानी है। 'शेखर' में मेरापन कुछ अधिक है; इलियट का आदर्श जिसकी महानता मैं मानता हूँ मुझसे नहीं निभ सका है। शेखर निस्सन्देह एक व्यक्ति का अभिन्नतम निजी दस्तावेज, a record of personal suffering है, यद्यपि वह साथ ही उस व्यक्ति के युग-संघर्ष का प्रतिबिम्ब भी है। इतना और ऐसा निजी वह नहीं है कि उसके दावे को आप 'एक आदमी की निजू बात' कहकर उड़ा सकें; मेरा आग्रह है कि उसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है कि वह मेरे और शेखर के युग का प्रतीक है; लेकिन इतना सब होते हुए भी मैं जानता हूँ कि यदि इस उपन्यास का सूत्रपात दूसरी परिस्थिति में और दूसरे ढंग से (और शायद दूसरे अधिक समर्थ हाथों से!) हुआ होता, तो इस भूमिका की आवश्यकता न रहती...और न ही इसकी सम्पूर्ण उपेक्षा करते हुए पाठक के यह कहने की गुंजाइश रहती कि शेखर में घटनाओं की तो बात ही क्या, स्थान भी लेखक के देशाटन की परिचर्या से मेल खाते हैं। (यद्यपि यह कहने के लिए लेखक को मेरे सम्बन्ध में विशेष रूप से जानकार होना पड़ता)।

इस अन्तिम साम्य के बारे में एक बात कह दूँ। शिशु-मानस के चित्रण की सच्चाई के लिए मैंने 'शेखर' के आरम्भ के खण्डों में घटनास्थल अपने ही जीवन से चुने हैं, फिर क्रमशः बढ़ते हुए शेखर का जीवन और अनुभूति-क्षेत्र मेरे जीवन और अनुभूति-क्षेत्र से अलग चला गया है, यहाँ तक कि मैंने स्वयं अनुभव किया है कि मैं एक स्वतन्त्र व्यक्ति की प्रगति का दर्शक और इतिहासकार हूँ; उसके जीवन पर मेरा किसी तरह का भी वश नहीं रहा है। एक पात्र के स्रष्टा के लिए यह कहना उचित है या नहीं, पात्र सचमुच ऐसा स्वतन्त्र अस्तित्व रख सकता है या नहीं, लेखक के हाथों का कठपुतला न रहकर स्वयं लेखक को बाध्य कर सकता है या नहीं, ऐसे गूढ़ प्रश्नों में जिनकी रुचि हो वे पिराँडेलो की साक्षी ले सकते हैं।

3

'जीवनी' का सूत्रपात कैसे हुआ और उसे पाठक किस रोशनी में देखें, इसके बारे में मुझे जो निवेदन करना था, वह मैं कर चुका। लेकिन शायद इसके बाद भी कुछ कहने को रह जाता है, क्योंकि पाठक के सामने इस भूमिका के साथ जीवनी का एक भाग पहुँचेगा, दो बाकी रह जाएँगे?

'शेखर : एक जीवनी' तीन भागों में विभक्त है। तीनों भाग एक ही कथा-सूत्र से गुँथे होकर भी अलग-अलग भी प्रायः सम्पूर्ण है। कहा जा सकता हैं कि जीवनी वास्तव में तीन स्वतन्त्र उपन्यासों का अनुक्रम है। ऐसा न भी होता तब उन्हें अलग-अलग छापा जा सकता है, ऐसा होने पर तो विशेष सफाई देने की जरूरत नहीं है। एक भाग पढ़ने के बाद दूसरा पढ़ना नहीं चाहेंगे, उनको यह सोचने की आवश्यकता नहीं कि उन्होंने अधूरी कहानी पर वक्त बरबाद किया, वे एक को ही पूरा उपन्यास मान सकते हैं, उसी पर अपनी राय भी कायम कर सकते हैं, मैं पक्षपात की शिकायत नहीं करूँगा।

किन्तु जो पाठक पहला भाग पढ़ते हुए जानना चाहते हैं कि शेष भाग वे क्यों पढ़ें या उनके बारे में कैसी पूर्व-धारणा बनाकर चलें, उनके लिए कुछ निवेदन करना यहाँ अप्रासंगिक न होगा। अतः उन पाठकों के लिए मैं कहना चाहता हूँ कि अभिप्राय की-यदि उतना दम्भ कर सकूँ तो कहूँ कि सन्देश की!-दृष्टि से शेखर के तीन भागों में एक एकान्तता है; कालीन के रंग-बिरंगे बाने को जैसे मोटे और सख्त बटे हुए सूत का एकरंगा ताना धारण करता और सहता है, उसी तरह जीवन के तीन भागों की रंगीन गाथा में मेरे अभिप्रेत, मेरे कथ्य का एक तन्तु है, जो एक है, अविभाज्य है, मेरी ओर से जीवन की आलोचना और जीवन का दर्शन है। 'जीवनी' को गढ़ते हुए मैंने कथावस्तु गढ़ने का यत्न किया है; इसलिए वह चाहे कैसी भी हो उसे लेकर मैं पाठक के आगे प्रार्थी के रूप में तो आ सकता नहीं, पर इतना कहूँगा कि यदि आप निर्णेता होने का हौसला करते हैं, तो पहले पूरा पढ़ने की उदारता भी दिखाइए।

शेखर से आपका साक्षात करा देने के बाद अब मैं अलग हट जाता हूँ-तब आप उससे स्वयं परिचय प्राप्त करें। शेखर कोई बड़ा आदमी नहीं है, वह अच्छा भी आदमी नहीं है। लेकिन वह मानवता के संचित अनुभव के प्रकाश में ईमानदारी से अपने को पहचानने की कोशिश कर रहा है। वह अच्छा संगी नहीं भी हो सकता है, लेकिन उसके अन्त तक उसके साथ चलकर आपके उसके प्रति भाव कठोर नहीं होंगे, ऐसा मुझे विश्वास है। और, कौन जाने, आज के युग में जब हम, आप सभी संश्लिष्ट चरित्र हैं, तब आप पाएँ कि आपके भीतर भी कहीं पर एक शेखर है, जो बड़ा नहीं, अच्छा भी नहीं, लेकिन जागरूक और स्वतन्त्र और ईमानदार है, घोर ईमानदार!

पुनश्च

(द्वितीय संस्करण की भूमिका)

यह संस्करण प्रथम संस्करण की पुनरावृत्ति ही है, किन्तु जहाँ-तहाँ कुछ संशोधन किया गया है। अँग्रेजी उद्धरणों के या वाक्यों के अनुवाद भी दे दिये हैं। प्रथम संस्करण में अनुवाद नहीं दिए गये थे, विज्ञों ने राय दी थी कि छोटे-छोटे पद्यांशों का गद्यानुवाद करने से उनका चमत्कार नष्ट हो जाएगा। किन्तु हिन्दी के पाठक (और आलोचक) का अपने अधिकार पर आग्रह है, प्राण रहे न रहे, देह उसे चाहिए। जो अनुवाद दिए गये हैं, दोनों भाषाएँ जाननेवाले को वे रद्दी और अनर्थकर जान पड़ें तो उनसे प्रार्थना है, मुझे क्षमा कर दें, क्योंकि वे कम-से-कम देवनागरी हिन्दी तो हैं! फिर जो आत्मा तक पहुँच सकते हैं, उन्हें रूप-सज्जा पर आग्रह नहीं करना चाहिए, वे मूल पढ़ सकते हैं।

-अज्ञेय


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