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उपन्यास

चंद्रकांता संतति
खंड 5

देवकीनंदन खत्री

अनुक्रम

अनुक्रम सत्रहवां भाग     आगे

बयान - 1

हमारे पाठक 'लीला'[1] को भूले न होंगे। तिलिस्मी दारोगा वाले बंगले की बरबादी के पहिले तक इसका नाम आया है जिसके बाद फिर इसका जिक्र नहीं आया।

लीला को जमानिया की खबरदारी पर मुकर्रर करके मायारानी काशी वाले नागर के मकान में चली गई थी और वहां दारोगा के आ जाने पर उसके साथ इन्द्रदेव के यहां चली गई। जब इन्द्रदेव के यहां से भी भाग गई और दारोगा तथा शेरअलीखां की मदद से रोहतासगढ़ के अन्दर घुसने का प्रबन्ध किया गया जैसा कि सन्तति के बारहवें भाग के तेरहवें बयान में लिखा गया है उस समय लीला भी मायारानी के साथ थी मगर रोहतासगढ़ में जाने के पहिले मायारानी ने उसे अपनी हिफाजत का जरिया बनाकर पहाड़ के नीचे ही छोड़ दिया था। मायारानी ने अपना तिलिस्मी तमंचा, जिससे बेहोशी के बारूद की गोली चलाई जाती थी लीला को देकर कह दिया था कि मैं शेरअलीखां की मदद से उन्हीं के भरोसे पर रोहतासगढ़ के अन्दर जाती हूं, मगर ऐयारों के हाथ मेरा गिरफ्तार हो जाना कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि वीरेन्द्रसिंह के ऐयार बड़े ही चालक हैं। यद्यपि उनसे बचे रहने की पूरी-पूरी तर्कीब की गई है मगर फिर भी मैं बेफिक्र नहीं रह सकती, अस्तु यह तिलिस्मी तमंचा तू अपने पास रख और इस पहाड़ के नीचे ही रहकर हम लोगों के बारे में टोह लेती रह, अगर हम लोग अपना काम करके राजी-खुशी के साथ लौट आये तब तो कोई बात नहीं, ईश्वर न करे कहीं मैं गिरफ्तार हो गई तो तू मुझे छुड़ाने का बन्दोबस्त कीजियो और इस तमंचे से काम निकालियो। इसमें चलाने वाली गोलियां और वह ताम्रपत्र भी मैं तुझे दिये जाती हूं जिसमें गोली बनाने की तर्कीब लिखी हुई है।

जब दारोगा और शेरअलीखां सहित मायारानी गिरफ्तार हुई और वह खबर शेरअलीखां

के लश्कर में पहुंची जो पहाड़ के नीचे था तो लीला ने भी सब हाल सुना और वह उसी समय वहां से टलकर कहीं छिप रही। फिर भी जब तक राजा वीरेन्द्रसिंह वहां से चुनारगढ़ की तरफ रवाना न हुए वह भी उस इलाके के बाहर न गई और इसी से शिवदत्त और कल्याणसिंह (जो बहुत से आदमियों को लेकर रोहतासगढ़ के तहखाने में घुसे थे) वाला मामला भी उसे बखूबी मालूम हो गया था।

माधवी, मनोरमा और शिवदत्त ने जब ऐयारों की मदद से कल्याणसिंह को छुड़ाया था तो भीमसेन भी उसी के साथ ही छुड़ाया गया मगर भीमसेन कुछ बीमार था इसलिए शिवदत्त के साथ मिल-जुलकर रोहतासगढ़ के तहखाने में न जा सका था। शिवदत्त ने अपने ऐयारों की हिफाजत में उसे शिवदत्तगढ़ भेज दिया था।

सब बखेड़ों से छुट्टी पाकर जब राजा वीरेन्द्रसिंह कैदियों को लिए चुनारगढ़ की तरफ रवाना हुए तो मायारानी को कैद से छुड़ाने की फिक्र में लीला भी भेष बदले हुए उन्हीं के लश्कर के साथ रवाना हुई। लश्कर में नकली किशोरी, कामिनी और कमला के मारे जाने वाला मामला उसके सामने ही हुआ और तब तक उसे अपनी कार्रवाई करने का कोई मौका न मिला मगर जब नकली किशोरी, कामिनी और कमला की दाहक्रिया करके राजा साहब आगे बढ़े और दुश्मनों की तरफ से कुछ बेफिक्र हुए तब लीला को भी अपनी कार्रवाई का मौका मिला और वह उस खेमे के चारों तरफ ज्यादे फेरे लगाने लगी जिसमें मायारानी कैद थी और चालीस आदमी नंगी तलवार लिये बारी-बारी से उसके चारों तरफ पहरा दिया करते थे। एक दिन इत्तिफाक से आंधी-पानी का जोर हो गया और इसी से उस कम्बख्त को अपने काम का अच्छा मौका मिला।

वीरेन्द्रसिंह का लश्कर एक सुहावने जंगल में पड़ा हुआ था। समय बहुत अच्छा था, संध्या होने के पहिले ही से बादलों का शामियाना खड़ा हो गया था, बिजली चमकने लग गई थी, और हवा के झपेटे पेड़-पत्तों के साथ हाथापाई कर रहे थे। पहर रात जाते-जाते पानी अच्छी तरह बरसने लग गया और उसके बाद तो आंधी-पानी ने एक भयानक तूफान का रूप धारण कर लिया। उस समय लश्कर वालों को बहुत ही तकलीफ हुई। हजारों सिपाही, गरीब बनिये, घसियारे और शागिर्द पेशे वाले जो मैदान में सोया करते थे इस तूफान से दुःखी होकर जान बचाने की फिक्र करने लगे। यद्यपि राजा वीरेन्द्रसिंह की रहमदिली और रिआयापरवरी ने बहुतों को आराम दिया और बहुत से आदमी खेमों और शामियानों के अन्दर घुस गये, यहां तक कि राजा वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह के खेमों में भी सैकड़ों को पनाह मिल गई मगर फिर भी हजारों आदमी ऐसे रह गये थे जिनकी भूंडी किस्मत में दुख भोगना बदा था। यह सब-कुछ था मगर लीला को ऐसे समय भी चैन न था और वह दुःख को दुःख नहीं समझती थी क्योंकि उसे अपना काम साधने के लिए बहुत दिनों बाद आज यही एक मौका अच्छा मालूम हुआ।

जिस खेमे में मायारानी और दारोगा वगैरह कैद थे उससे चालीस या पचास हाथ की दूरी पर सलई का एक बड़ा और पुराना दरख्त था। इस आंधी-पानी और तूफान का खौफ न करके लीला उसी पेड़ पर चढ़ गई और कैदियों के खेमे की तरफ मुंह करके तिलिस्मी तमंचे का निशाना साधने लगी। जब-जब बिजली चमकती तब-तब वह अपने निशाने को ठीक करने का उद्योग करती। सम्भव था कि बिजली की चमक में कोई उस पेड़ पर चढ़ा हुआ उसे देख लेता मगर जिन सिपाहियों के पहरे में वह खेमा था उस (कैदियों वाले) खेमे के आस-पास जो लोग रहते थे सभी इस तूफान से घबड़ाकर उसी खेमे के अन्दर घुस गये जिसमें मायारानी और दारोगा वगैरह कैद थे। खेमे के बाहर या उस पेड़ के पास कोई भी न था जिस पर लीला चढ़ी हुई थी।

लीला जब अपने निशाने को ठीक कर चुकी तब उसने एक गोली (बेहोशी वाली) चलाई। हम पहिले के किसी बयान में लिख चुके हैं कि इस तिलिस्मी तमंचे के चलाने में किसी तरह की आवाज नहीं होती थी मगर जब गोली जमीन पर गिरती थी तब कुछ हल्की-सी आवाज पटाखे की तरह होती थी।

लीला की चलाई हुई गोली खेमे को छेद के अन्दर चली गई और एक सिपाही के बदन पर गिरकर फूटी। उस सिपाही को कुछ नुकसान नहीं हुआ जिस पर गोली गिरी थी। न तो उसका कोई अंगभंग हुआ और न कपड़ा जला, केवल हलकी-सी आवाज हुई और बेहोशी का बहुत ज्यादे धुआं चारों तरफ फैलने लगा। मायारानी उस वक्त बैठी हुई अपनी किस्मत पर रो रही थी। पटाखे की आवाज से वह चौंककर उसी तरफ देखने लगी और बहुत जल्द समझ गई कि यह उसी तिलिस्मी तमंचे से चलाई गई गोली है जो लीला के सुपुर्द कर आयी थी।

मायारानी यद्यपि जान से हाथ धो बैठी थी और उसे विश्वास हो गया था कि अब इस कैद से किसी तरह छुटकारा नहीं मिल सकता मगर इस समय तिलिस्मी तमंचे की गोली ने खेमे के अन्दर पहुंचकर उसे विश्वास दिला दिया कि अब भी तेरा एक दोस्त मदद करने लायक मौजूद है जो यहां आ पहुंचा और कैद से छुड़ाया ही चाहता है।

वह मायारानी, जिसकी आंखों के आगे मौत की भयानक सूरत घूम रही थी और हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थी, चौंककर सम्हल बैठी। बेहोशी का असर करने वाला धुआं बच रहने की मुबारकबाद देता हुआ आंखों के सामने फैलने लगा और तरह-तरह की उम्मीदों ने उसका कलेजा ऊंचा कर दिया। यद्यपि वह जानती थी कि यह धुआं मुझे भी बेहोश कर देगा, मगर फिर भी वह खुशी की निगाहों से चारों तरफ देखने लगी और इतने में ही एक दूसरी गोली भी उसी ढंग की वहां आकर गिरी।

मायारानी और दारोगा को छोड़कर जितने आदमी उस खेमे में थे सभों को उन दोनों गोलियों ने ताज्जुब में डाल दिया। अगर गोली चलाते समय तमंचे में से किसी तरह की आवाज निकलकर उनके कानों तक पहुंचती तो शायद कुछ पता लगाने की नीयत से दो-चार आदमी खेमे के बाहर निकलते मगर उस समय सिवाय एक-दूसरे का मुंह देखने के किसी को किसी तरह का गुमान न हुआ और धुएं ने तेजी के साथ फैलकर अपना असर जमाना शुरू कर दिया। बात की बात में जितने आदमी उस खेमे के अन्दर थे सभी का सिर घूसने लगा और एक-दूसरे के ऊपर गिरते हुए सब बेहोश हो गए, मायारानी और दारोगा को भी दीन दुनिया की सुध न रही।

पेड़ पर चढ़ी हुई लीला ने थोड़ी देर तक इन्तजार किया। जब खेमे के अन्दर से किसी को निकलते न देखा और उसे विश्वास हो गया कि खेमे के अन्दर वाले अब बेहोश हो गये होंगे तब वह पेड़ से उतरी और खेमे के पास आई। आंधी-पानी का जोर अभी तक वैसा ही था मगर लीला ने इसे अच्छी तरह सह लिया और कनात के नीचे से झांककर खेमे के अन्दर देखा तो सभों को बेहोश पाया।

पाठकों को यह मालूम है कि लीला ऐयारी भी जानती थी। कनात काटकर वह खेमे के अन्दर चली गई। आदमी बहुत ज्यादे भरे हुए थे इसलिए उसे मायारानी के पास तक पहुंचने में बड़ी कठिनाई हुई। आखिर उसके पास पहुंची और हाथ-पैर खोलने के बाद लखलखा सुंघाकर होश में लाई। मायारानी ने होश में आकर लीला को देखा और धीरे से कहा, ''शाबाश, खूब पहुंची, बस दारोगा को छुड़ाने की कोई जरूरत नहीं,'' इतना कहकर मायारानी उठ खड़ी हुई और लीला के हाथ का सहारा लेती हुई खेमे के बाहर निकल गयी।

लीला ने चाहा कि लश्कर में से दो घोड़े भी सवारी के लिए चुरा लावे मगर मायारानी ने स्वीकार न किया और उसी तूफान में दोनों कम्बख्तों ने एक तरफ का रास्ता लिया।

 

बयान - 2

पाठकों को मालूम है कि शिवदत्त और कल्याणसिंह ने जब रोहतासगढ़ पर चढ़ाई की थी तब उनके साथ मनोरमा और माधवी भी मौजूद थीं। भूतनाथ और सर्यूसिंह ने शिवदत्त और कल्याणसिंह को डरा-धमकाकर मनोरमा को तो गिरफ्तार कर लिया [2] परन्तु माधवी कहां गई था क्या हुई इसका हाल कुछ लिखा नहीं गया। अस्तु अब हम थोड़ा-सा हाल माधवी का लिखना उचित समझते हैं।

जिस जमाने में माधवी गया और राजगृही की रानी कहलाती थी उस जमाने में उसका राज्य केवल तीन आदमियों के भरोसे पर चलता था - एक दीवान अग्निदत्त, दूसरा कोतवाल धर्मसिंह और तीसरा सेनापति कुबेरसिंह। बस यही तीनों उसके राज्य का आनन्द लेते थे और इन्हीं तीनों का माधवी को भरोसा था। यद्यपि ये तीनों ही माधवी की चाह में डूबने वाले थे मगर कुबेरसिंह और धर्मसिंह प्यासे ही रह गये जिसका उन दोनों को बराबर बहुत ही रंज बना रहा।

जब राजगृही और गया की किस्मत ने पलटा खाया तब धर्मसिंह कोतवाल को तो चपला ने माधवी की सूरत बन और धोखा दे गिरफ्तार कर लिया और दीवान अग्निदत्त बहुत दिनों तब बचा रहकर अन्त में किशोरी के कारण एक खोह के अन्दर मारा गया, परन्तु अभी तक यह न

मालूम हुआ कि उसके मर जाने का सबब क्या था। हां सेनापति कुबेरसिंह जिसने माधवी के राज्य में सबसे ज्यादे दौलत पैदा की थी, बचा रह गया क्योंकि उसने जमाने को पलटा खाते देख चुपचाप अपने घर (मुर्शिदाबाद) का रास्ता लिया मगर माधवी के हालचाल की खबर लेता रहा, क्योंकि यद्यपि उसने माधवी का राज्य छोड़ दिया था मगर माधवी के इश्क ने उसके दिल में से अपना दखल नहीं उठाया था।

माधवी की बिगड़ी हुई अवस्था देखकर भी उसकी मुहब्बत से हाथ न धोने के दो सबब थे, एक तो माधवी वास्तव में खूबसूरत हसीन और नाजुक थी दूसरे राजगृही और गया के राज्य से खारिज हो जाने पर भी वह माधवी को अमीर और बेहिसाब दौलत का मालिक समझता था और इसलिए वह समय पर ध्यान रखकर माधवी के हालचाल की बराबर खबर लेता रहा और वक्त पर काम देने के लिए थोड़ी-सी फौज का मालिक भी बना रहा।

मनोरमा के गिरफ्तार हो जाने के बाद शिवदत्त और कल्याणसिंह के साथ जब माधवी रोहतासगढ़ की तराई में पहुंची तो एक आदमी ने गुप्त रीति पर उसे एक चीठी दी और बहुत जल्द उसका जवाब मांगा। यह चीठी कुबेरसिंह की थी और उसमें यह लिखा हुआ था -

''मुझे आपकी अवस्था पर बहुत रंज और अफसोस है। यद्यपि आपकी हालत बदल गई और आप मुझसे बहुत दूर हैं मगर मैं अभी तक आपकी खयाली तस्वीर अपने दिल के अन्दर कायम रखकर दिन-रात उसकी पूजा किया करता हूं। यही सबब है कि बहुत दिनों तक मेहनत करके मैंने इतनी ताकत पैदा कर ली है कि आपकी मदद कर सकूं और आपको पुनः राजगृही की गद्दी का मालिक बनाऊं। आप अपने ही दिल से पूछ देखिये कि अग्निदत्त, जिसके साथ आपने सब-कुछ किया, कैसे बेईमान और बेमुरौवत निकला और मैं, जिसे आपने हद से ज्यादे तरसाया कैसी हालत में आपकी मदद करने को तैयार हूं। यदि आप मुनासिब समझें तो इस आदमी के साथ मेरे पास चली आवें या मुझी को अपने पास बुला लें। यह आदमी जो चीठी लेकर जाता है मेरा ऐयार है।

आपका - कुबेर''

माधवी ने उस चीठी को बड़े गौर से दोहराकर पढ़ा और देर तक तरह-तरह की बातें सोचती रही। हम नहीं जानते कि उसका दिल किन-किन बातों का फैसला करता रहा था, वह किस विचार में देर तक डूबी रही, हां थोड़ी देर बाद उसने सिर उठा चीठी लाने वाले की तरफ देखा और कहा, ''कुबेरसिंह कहां पर है?'

ऐयार - यहां से थोड़ी दूर पर।

माधवी - फिर वह खुद यहां क्यों न आया?

ऐयार - इसीलिए कि आप इस समय दूसरों के साथ हैं जिन्होंने आपको न मालूम किस तरह का भरोसा दिया होगा या आप ही ने शायद उनसे किस तरह का इकरार किया हो, ऐसी अवस्था में आपसे दरियाफ्त किये बिना इस लश्कर में आना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा।

माधवी - ठीक है, अच्छा तुम जाकर उसे बहुत जल्द मेरे पास ले आओ। कितनी देर में आओगे?

ऐयार - (सलाम करके) आधे घण्टे के अन्दर।

वह ऐयार तेजी के साथ दौड़ता हुआ वहां से चला गया और माधवी उसी जगह टहलती हुई उसका इन्तजार करने लगी।

दिन आधे घण्टे से कुछ ज्यादे बाकी था और इस समय माधवी कुछ खुश मालूम होती थी। शिवदत्त और कल्याणसिंह का लश्कर एक जंगल में छिपा हुआ था और माधवी अपने डेरे से निकलकर सौ-सवा सौ कदम की दूरी पर चली गई थी। माधवी कुबेरसिंह के अक्षर अच्छी तरह पहिचानती थी इसीलिए उसे किसी तरह का धोखा खाने का शक कुछ भी न हुआ। और वह बेखौफ उसके आने का इन्तजार करने लगी।

संध्या होने के पहिले ही उसी ऐयार को साथ लिये हुए कुबेरसिंह माधवी की तरफ आता दिखाई दिया जो थोड़ी ही देर पहिले उसकी चीठी लेकर आया। उस समय वह ऐयार भी एक घोड़े पर सवार था और कुबेरसिंह अपनी सूरत-शक्ल तथा हैसियत को अच्छी तरह सजाये हुए था। माधवी के पास पहुंचकर दोनों आदमी घोड़े से नीचे उतर पड़े और कुबेरसिंह ने माधवी को सलाम करके कहा, ''आज बहुत दिनों के बाद ईश्वर ने मुझे आपसे मिलाया! मुझे इस बात का बहुत रंज है कि आपने लौंडियों के भड़काने पर चुपचाप घर छोड़ जंगल का रास्ता लिया और अपने खैरखाह कुबेरसिंह (हम) को याद तक न किया। मैं खूब जानता हूं कि आपने अपने दीवान अग्निदत्त से डरकर ऐसा किया था मगर उसके बाद भी मुझे याद करने का मौका जरूर मिला होगा।''

माधवी - (मुस्कुराती हुई कुबेरसिंह का हाथ पकड़के) मैं घर से निकलने के बाद ऐसी मुसीबत में पड़ गयी थी कि अपनी भलाई-बुराई पर कुछ भी ध्यान न दे सकी और जब मैंने सुना कि गया और राजगृही में वीरेन्द्रसिंह का राज्य हो गया तब तो और भी हताश हो गई। फिर भी मैं अपने उद्योग की बदौलत बहुत कुछ कर गुजरती मगर गयाजी में अग्निदत्त की लड़की कामिनी ने मेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया और मुझे किसी लायक न रक्खा। (अपनी कटी हुई कलाई दिखाकर) यह उसी की बदौलत है।

कुबेर - यह खानदान का खानदान ही नमकहराम निकला और इसी फेर में अग्निदत्त मारा भी गया।

माधवी - हां, उसके मरने का हाल मायारानी की सखी मनोरमा की जुबानी मैंने सुना था। (पीछे की तरफ देखकर) कौन आ रहा है?

कुबेर - आप ही के लश्कर का कोई आदमी है, शायद आपको बुलाने आता हो, नहीं वह दूसरी तरफ घूम गया, मगर अब आपको कुछ सोच-विचार करना, किसी से मिलना या इस जगह खड़े-खड़े बातों में समय नष्ट करना न चाहिए और यह मौका भी बातचीत करने का नहीं है। आप (घोड़े की तरफ इशारा करके) इस घोड़े पर शीघ्र सवार होकर मेरे साथ चली चलें, मैं आपका ताबेदार सब लायक और सब-कुछ करने के लिए तैयार हूं, फिर किसी की खुशामद की जरूरत ही क्या है यदि कल्याणसिंह के लश्कर में आपका कुछ असबाब हो तो उसकी परवाह न कीजिए।

माधवी - नहीं, अब मुझे किसी की परवाह नहीं रही, मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं।

इतना कहकर माधवी कुबेरसिंह के घोड़े पर सवार हो गई, कुबेरसिंह अपने ऐयार के घोड़े पर सवार हुआ तथा पैदल ऐयार को साथ लिये हुए दोनों एक तरफ को रवाना हुए।

यही सबब था कि शिवदत्त वगैरह के साथ माधवी रोहतासगढ़ के तहखाने में दाखिल नहीं हुई।

 

बयान - 3

कैद से छुटकारा मिलने के बाद बीमारी के सबब से यद्यपि भीमसेन को घर जाना पड़ा और वहां उसकी बीमारी बहुत जल्दी जाती रही मगर घर में रहने का जो सुख उसको मिलना चाहिए वह न मिला क्योंकि एक तो मां के मरने का रंज और गम उसे हद से ज्यादे था और अब वह घर काटने को दौड़ता था, दूसरे थोड़े ही दिन बाद बाप के मरने की खबर भी उसे पहुंची जिससे वह बहुत ही उदास और बेचैन हो गया। इस समय उसके ऐयार लोग भी वहीं मौजूद थे जो बाहर से यह दुःखदाई खबर लेकर लौट आये थे। पहिले तो उसके ऐयारों ने उसे बहुत समझाया और राजा वीरेन्द्रसिंह से सुलह कर लेने में बहुत-सी भलाइयां दिखाईं मगर उस नालायक के दिल में एक भी न बैठी और वीरेन्द्रसिंह से बदला लेने तथा किशोरी को जान से मार डालने की कसम खाकर घर से बाहर निकल पड़ा। बाकरअली, खुदाबक्श, अजायबसिंह और यारअली इत्यादि उसके लालची ऐयारों ने भी लाचार होकर उसका साथ दिया।

अबकी दफे भीमसेन ने अपने ऐयारों के सिवाय और किसी को भी साथ न लिया, हां रुपये, अशर्फी या जवाहिरात की किस्म में से जहां तक उससे बना या जो कुछ उसके पास था लेकर ऐयारों को लालच भरी उम्मीदों का सब्जबाग दिखाता रवाना हुआ और थोड़ी दूर जाने के बाद ऐयारों के साथ ही उसने अपनी भी सूरत बदल ली।

''राजा वीरेन्द्रसिंह को किस तरह नीचा दिखाना चाहिए और क्या करना चाहिए' इस विषय पर तीन दिन तक उन लोगों में बहस होती रही और अन्त में यह निश्चय किया गया कि राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान तथा आपस वालों का मुकाबला करने के पहिले उनके दुश्मनों से दोस्ती बढ़ाकर अपना दल पुष्ट कर लेना चाहिए। इस इरादे पर वे लोग बहुत कुछ कायम भी रहे और माधवी, मायारानी तथा तिलिस्मी दारोगा वगैरह से मुलाकात करने की फिक्र करने लगे।

कई दिनों तक सफर करने और घूमने-फिरने के बाद एक दिन ये लोग दोपहर होते-होते एक घने जंगल में पहुंचे। चार-पांच घण्टे आराम कर लेना इन लोगों को बहुत जरूरी मालूम हुआ क्योंकि गर्मी के चलाचली का जमाना था और धूप बहुत कड़ी और दुःखदाई थी। मुसाफिरों को तो जाने दीजिये, जंगली जानवरों और आकाश में उड़ने तथा बात की बात में दूर-दूर की खबर लाने वाली चिड़िया को भी पत्तों की आड़ से निकलना बुरा मालूम होता था।

इस जंगल में एक जगह पानी का झरना भी जारी था और उसके दोनों तरफ पेड़ों की घनाहट के सबब बनिस्बत और जगहों के ठंडक ज्यादे थी। ये पांचों मुसाफिर भी झरने से किनारे पत्थर की साफ चट्टान देखकर बैठ गए और आपस में इधर-उधर की बातें करने लगे। इसी समय बातचीत की आहट पाने और निगाह दौड़ाने पर इन लोगों की निगाह दस-बारह सिपाहियों पर पड़ी जिन्हें देख भीमसेन चौंका और उनका पता लगाने के लिए अजायबसिंह से कहा, क्योंकि दोस्तों और दुश्मनों के खयाल से उसका जी एक दम के लिए भी ठिकाने पर नहीं रहता था और 'पत्ता खड़का बन्दा भड़का' की कहावत का नमूना बन रहा था।

भीमसेन की आज्ञानुसार अजायबसिंह ने उन आदमियों का पीछा किया और दो घण्टे तथा लौटकर न आया। तब दूसरे ऐयारों को भी चिन्ता हुई और वे अजायबसिंह की खोज में जाने के लिए तैयार हुए मगर इसकी नौबत न पहुंची क्योंकि उसी समय अजायबसिंह अपने साथ कई सिपाहियों को लिए भीमसेन की तरफ आता दिखाई दिया।

अजायबसिंह के इस तरह आने ने पहिले तो सभी को खटके में डाल दिया मगर जब अजायबसिंह ने दूर ही से खुशी का इशारा किया तब सभों का जी ठिकाने हुआ और उसके आने का इन्तजार करने लगे। पास आने पर अजायबसिंह ने भीमसेन से कहा, ''इस जंगल में आकर टिक जाना हम लोगों के लिए बहुत अच्छा हुआ क्योंकि रानी माधवी से मुलाकात हो गई। आज ही उनका डेरा भी इस जंगल में आया है। कुबेरसिंह सेनापति और चार-पांच सौ सिपाही उनके साथ हैं। जिन लोगों का मैंने पीछा किया था वे भी उन्हीं के सिपाहियों में से थे और ये भी उन्हीं के सिपाही हैं जो मेरे साथ आपको बुलाने के लिए आए हैं।''

माधवी की खबर सुनकर भीमसेन उतना ही खुश हुआ जितना अजायबसिंह की जुबानी भीमसेन के आने की खबर पाकर माधवी खुश हुई थी। अजायबसिंह की बात सुनते ही भीमसेन उठ खड़ा हुआ और अपने ऐयारों को साथ लिये हुए घड़ी भर के अन्दर ही अपनी बेहया बहिन माधवी से जा मिला। ये दोनों एक-दूसरे को देखकर बहुत खुश हुए मगर उन दोनों की मुलाकात कुबेरसिंह को अच्छी न मालूम पड़ी जिसका सबब क्या था सो हमारे पाठक लोग खुद ही समझ सकते हैं।

थोड़ी देर तक भीमसेन और माधवी ने कुशल-मंगल पूछने में बितायी। माधवी ने खाने-पीने की चीजें तैयार करने का हुक्म दिया क्योंकि उसे अपने अनूठे भाई की खातिरदारी आज मंजूर थी और इसीलिए बड़ी मुहब्बत के साथ देर तक बातें होती रहीं।

माधवी को इस जंगल में आये आज पांच दिन हो चुके हैं। पांचवें दिन दोपहर के समय भीमसेन से मुलाकात हुई थी। उसका (कुबेरसिंह का) ऐयार दुश्मनों की खोज-खबर लगाने के लिए कहीं गया हुआ था क्योंकि माधवी और कुबेरसिंह ने इस जंगल में पहुंचकर निश्चय कर लिया था कि पहिले दुश्मनों का हाल-चाल मालूम करना चाहिए इसके बाद जो कुछ मुनासिब होगा किया जायगा।

 

बयान - 4

कैद से छूटने के बाद लीला को साथ लिए हुए मायारानी ऐसा भागी कि उसने पीछे की तरफ फिरके भी नहीं देखा। आंधी और पानी के कारण उन दोनों को भागने में बड़ी तकलीफ हुई, कई दफे वे दोनों गिरीं और चोट भी लगी मगर प्यारी जान को बचाकर ले भागने के खयाल ने उन्हें किसी तरह दम लेने न दिया। दो घण्टे के बाद आंधी-पानी का जोर जाता रहा, आसमान साफ हो गया और चन्द्रमा भी निकल आया। उस समय उन दोनों को भागने में सुभीता हुआ और सबेरा होने तक ये दोनों बहुत दूर निकल गईं।

मायारानी यद्यपि खूबसूरत थी, नाजुक थी और अमीरी परले सिरे की कर चुकी थी मगर इस समय ये सब बातें हवा हो गईं। पैरों में छाले पड़ जाने पर भी उसने भागने में कसर न की और सबेरा हो जाने पर भी दम न लिया, बराबर भागती ही चली गई। दूसरा दिन भी उसके लिए बहुत अच्छा था, आसमान पर बदली छाई हुई थी और धूप को जमीन तक पहुंचने का मौका नहीं मिलता था। अब मायारानी बातचीत करती हुई और पिछली बातें लीला को सुनाती हुई रुककर चलने लगी। थोड़ी दूर जाती फिर दम ले लेती, पुनः उठकर चलती और कुछ दूर बाद दम लेने के लिए बैठ जाती। इसी तरह दूसरा दिन भी मायारानी ने सफर ही में बिता दिया और खाने-पीने की कुछ विशेष परवाह न की। संध्या होने के कुछ पहिले वे दोनों एक पहाड़ी की तराई में पहुंचीं जहां साफ पानी का सुन्दर चश्मा बह रहा था और जंगली बेर तथा मकोय के पेड़ भी बहुतायत से थे। वहां पर लीला ने मायारानी से कहा कि ''अब डरने तथा चलते-चलते जान देने की कोई जरूरत नहीं, हम लोग बहुत दूर निकल आये हैं और ऐसे रास्ते से आये हैं कि जिधर से किसी मुसाफिर की आमदरफ्त नहीं होती, अस्तु अब हम लोगों को बेफिक्री के साथ आराम करना चाहिए। यह जगह इस लायक है कि हम लोग खा-पीकर अपनी आत्मा को सन्तोष दे लें और अपनी-अपनी सूरतें भी अच्छी तरह बदलकर पहिचाने जाने का खुटका मिटा लें!''

लीला की बात मायारानी ने स्वीकार की और चश्मे के पानी से हाथ-मुंह धोने और जरा दम लेने के बाद सबके पहिले सूरत बदलने का बन्दोबस्त करने लगी क्योंकि दिन नाममात्र को रह गया था और रात हो जाने पर बिना रोशनी के सहारे यह काम अच्छी तरह नहीं हो सकता था।

सूरत-शक्ल के हेर-फेर से छुट्टी पाने के बाद दोनों ने जंगली बेर और मकोय को अच्छे से अच्छा मेवा समझकर भोजन किया और चश्मे का जल पीकर आत्मा को सन्तोष दिया, तब निश्चिंत होकर बैठीं और यों बातचीत करने लगीं -

माया - अब जरा जी ठिकाने हुआ, मगर शरीर चूर-चूर हो गया। खैर किसी तरह तेरी बदौलत जान बच गई, नहीं तो मैं हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थी और राह देखती थी कि मेरी जान किस तरह ली जाती है।

लीला - चाहे तुम्हारे बिल्कुल नौकर-चाकर तुम्हारे अहसानों को भूल जायें और तुम्हारे नमक का खयाल न करें मगर मैं कब ऐसा कर सकती हूं, मुझे दुनिया में तुम्हारे बिना चैन कब पड़ सकता है, जब तक तुम्हें कैद से छुड़ा न लिया अन्न का दाना मुंह में न डाला बल्कि अभी तक जंगली बेर और मकोय पर ही गुजारा कर रही हूं।

माया - शाबाश! मैं तुम्हारे इस अहसान को जन्म-भर नहीं भूल सकती, जिस तरह आप रहूंगी उसी तरह तुम्हें भी रक्खूंगी, यह जान तुमने बचाई है इसलिए जब तक इस दुनिया में रहूंगी इस जान का मालिक तुम्हीं को समझूंगी।

लीला - (तिलिस्मी तमंचा और गोली मायारानी के सामने रखकर) यह अपनी अमानत आप लीजिए और अब इसे अपने पास रखिये, इसने बड़ा काम किया।

माया - (तमंचा उठाकर और थोड़ी-सी गोली लीला को देकर) इन गोलियों को अपने पास रक्खो, बिना तमंचे के भी ये बड़े काम देंगी, जिस तरफ फेंक दोगी या जहां जमीन पर पटकोगी उसी जगह ये अपना गुण दिखलावेंगी।

लीला - (गोली रखकर) बेशक ये बड़े वक्त पर काम दे सकती हैं। अच्छा यह कहिये कि अब हम लोगों को क्या करना, कहां जाना चाहिए?

माया - इसका जवाब भी तुम्हीं बहुत अच्छा दे सकती हो, मैं केवल इतना ही कहूंगी कि गोपालसिंह और कमलिनी को इस दुनिया से उठा देना सबसे पहिला और जरूरी काम समझना चाहिए। किशोरी, कामिनी और कमला को मारकर मनोरमा ने कुछ भी न किया, उतनी ही मेहनत अगर गोपालसिंह और कमलिनी को मारने के लिए करती तो इस समय मैं पुनः तिलिस्म की रानी कहलाने लायक हो सकती थी।

लीला - ठीक है मगर मुझे... (कुछ रुककर) देखो तो वह कौन सवार जा रहा है मुझे तो उस छोकरे रामदीन की छटा मालूम पड़ती है। यह पंचकल्यान मुश्की घोड़ी भी अपने ही अस्तबल की मालूम पड़ती है बल्कि...।

माया - (गौर से देखकर) वही है जिस पर मैं सवार हुआ करती थी, और बेशक वह सवार भी रामदीन ही है, उसे पकड़ो तो गोपालसिंह का ठीक हाल मालूम हो।

लीला - पकड़ना तो कोई कठिन काम नहीं है क्योंकि तिलिस्मी तमंचा तुम्हारे पास मौजूद है, मगर यह कम्बख्त कुछ बताने वाला नहीं है।

माया - खैर जो हो, मैं गोली चलाती हूं।

इतना कहकर मायारानी ने फुर्ती से तिलिस्मी तमंचे में गोली भरकर सवार की तरफ चलाई। गोली घोड़ी की गर्दन में लगी और तुरंत फट गई, घोड़ी भड़की और उछली-कूदी मगर गोली से निकले हुए बेहोशी के धुएं ने अपना असर करने में उससे भी ज्यादे तेजी और फुर्ती दिखाई। घोड़ी और सवार दोनों ही पर बेहोशी का असर हो गया। सवार जमीन पर गिर पड़ा और दो कदम आगे बढ़कर घोड़ी भी लेट गई। मायारानी और लीला ने दूर से यह तमाशा देखा और दौड़ती हुई सवार के पास पहुंचीं।

लीला - पहिले इसकी मुश्कें बांधनी चाहिए।

माया - क्या जरूरत है?

लीला - क्यों, फिर इसे बेहोश किसलिए किया?

माया - तुम खुद ही कह चुकी हो कि यह कुछ बताने वाला नहीं है, फिर मुश्कें बांधने से मतलब?

लीला - आखिर फिर किया क्या जायगा?

माया - पहिले तुम इसकी तलाशी ले लो फिर जो कुछ करना होगा मैं बताऊंगी।

लीला - बहुत खूब, यह तुमने ठीक कहा।

इस समय संध्या पूरे तौर पर हो चुकी थी परन्तु चन्द्रदेव के दर्शन हो रहे थे इसलिए यह नहीं कह सकते कि अन्धकार पल-पल में बढ़ता जाता था। लीला उस सवार की तलाशी लेने लगी और पहिले ही दफे जेब में हाथ डालने से उसे दो चीजें मिलीं। एक तो हीरे की कीमती अंगूठी जिस पर राजा गोपालसिंह का नाम खुदा हुआ था और दूसरी चीज एक चीठी थी जो लिफाफे के तौर पर लपेटी हुई थी।

चाहे अंधकार न हो मगर चीठी और अंगूठी पर खुदे हुए नाम को पढ़ने के लिए रोशनी की जरूरत थी और जब तक चीठी का हाल मालूम न हो जाय तब तक कुछ काम करना या आगे तलाशी लेना उन दोनों को मंजूर न था, अस्तु लीला ने अपने ऐयारी के बटुए में से सामान निकालकर रोशनी पैदा की और मायारानी ने सबके पहिले अंगूठी पर निगाह दौड़ाई। अंगूठी पर 'श्रीगोपाल' खुदा हुआ देख उसके रोंगटे खड़े हो गये फिर भी अपनी तबियत सम्हालकर वह चीठी पढ़नी पड़ी, चीठी में यह लिखा हुआ था -

''बेनीराम जोग लिखी गोपालसिंह -

आज हमने अपना पर्दा खोल दिया, कृष्णाजिन्न के नाम का अन्त हो गया, जिनके लिए यह स्वांग रचा गया था उन्हें मालूम हो गया कि गोपालसिंह और कृष्णाजिन्न में कोई भी भेद नहीं है, अस्तु अब हमने काम-काज के लिए एक छोकरे को अपनी अंगूठी देकर विश्वास का पात्र बनाया है। जब तक यह अंगूठी इसके पास रहेगी तब तक इसका हुक्म हमारे हुक्म के बराबर सभों को मानना होगा। इसका बन्दोबस्त कर देना और दो सौ सवार और चार रथ बहुत जल्द पिपलिया घाटी में भेज देना। हम किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी और कमलिनी वगैरह को लेकर आ रहे हैं। थोड़ा-सा जलपान का सामान उम्दा अलग भेजना। परसों रविवार की शाम तक हम लोग वहां पहुंच जायेंगे।''

इस चीठी ने मायारानी का कलेजा दहला दिया और उसने घबड़ाकर इसे पढ़ने के लिए लीला के हाथ में दे दिया।

माया - ओफ! मुझे स्वप्न में भी इस बात का गुमान न था कि कृष्णाजिन्न वास्तव में गोपालसिंह है! आह, जब मैं पिछली बातें याद करती हूं तो कलेजा कांप जाता है और मालूम होता है कि गोपालसिंह ने मेरी तरफ से लापरवाही नहीं की बल्कि मुझे बुरी तरह से दुःख देने का इरादा कर लिया था। किशोरी, कामिनी और कमला के बारे में भी... ओफ! बस अब मैं इस जगह दम भी नहीं ठहर सकती और ठहरना उचित भी नहीं है।

लीला - बेशक ऐसा ही है, मगर कोई हर्ज नहीं, आज यदि कृष्णाजिन्न का भेद खुल गया है तो यह (अंगूठी और चीठी दिखाकर) चीजें भी बड़ी ही अनूठी मिल गई हैं। तुम बहुत जल्द देखोगी कि इस चीठी और अंगूठी की बदौलत मैं कैसे-कैसे नामी ऐयारों की आंखों में धूल डालती हूं और गोपालसिंह तथा उसके सहायकों को किस तरह तड़पा-तड़पाकर मारती हूं। तुम यह भी देखोगी कि तुम्हारे उन लोगों ने जो ऐयारी का बाना पहिरे हुए थे और नामी ऐयार कहलाते थे उसका पासंग भी नहीं किया जो मैं अब कर दिखाऊंगी। तो अब यहां से चलना चाहिए।

माया - बहुत जल्द ही चलना चाहिए, मगर क्या इस छोकरे को जीता ही छोड़ जाओगी?

लीला - नहीं-नहीं, कदापि नहीं। क्या इसे मैं इसलिए जीता छोड़ जाऊंगी कि यह होश में आकर जमानिया या गोपालसिंह के पास चला जाय और मेरी कार्रवाइयों में बट्टा लगाए!

इतना कहकर लीला ने खंजर निकाला और एक ही हाथ में बेचारे रामदीन का सिर काट दिया, तब लाश को उसी तरह छोड़ घोड़ी को होश में लाने का उद्योग करने लगी।

थोड़ी देर में घोड़ी भी चैतन्य हो गई, उस समय लीला के कहे अनुसार मायारानी उस घोड़ी पर सवार हुई और दोनों ने वहां से हटकर एक घने जंगल का रास्ता लिया। लीला घोड़ी की रकाब थामे साथ-साथ बातें करती हुई जाने लगी।

माया - यह मदद मुझे गैब से मिली है, यकायक रामदीन का मिल जाना और उसकी जेब में से अंगूठी तथा चीठी का निकल आना कहे देता है कि मेरे बुरे दिन बहुत जल्द खत्म हुआ चाहते हैं।

लीला - इसमें क्या शक है! अबकी दफे तो राजा गोपालसिंह सचमुच हमारे कब्जे में आ गये हैं। अफसोस इतना ही है कि हम लोग अकेले हैं, अगर सौ-पचास आदमियों की भी मदद होती तो आज गोपालसिंह तथा किशोरी, लक्ष्मीदेवी और कमलिनी वगैरह को सहज ही में गिरफ्तार कर लेते।

माया - अब उन लोगों को गिरफ्तार करने का खयाल तो बिल्कुल जाने दे और एकदम से उन लोगों को मारकर बखेड़ा निपटा डालने की ही फिक्र कर। इस अंगूठी और चीठी के मिल जाने पर यह काम कोई मुश्किल नहीं है।

लीला - ठीक है, जो कुछ तुम चाहती हो मैं पहिले से समझे बैठी हूं। मेरा इरादा है कि तुम्हें किसी अच्छी और हिफाजत की जगह पर छोड़कर मैं जमानिया जाऊं और दीवान साहब से मिलूं जिसके नाम गोपालसिंह ने यह चीठी लिखी है।

माया - बस रामदीन छोकरे की सूरत बना ले और इसी घोड़ी पर सवार होकर चीठी लेकर जा। इस चीठी के अलावे भी तू जो कुछ दीवान को कहेगी वह उससे इन्कार न करेगा। गोपालसिंह के लिखे अनुसार जो कुछ खाने-पीने की चीजें तू लेकर उस घाटी की तरफ जायगी उसमें जहर मिला देना तो तेरे लिये कोई मुश्किल न होगा और इस तरह एक साथ कई दुश्मनों की सफाई हो जायगी, मगर इसमें भी मुझे एक बात का खुटका होता है।

लीला - वह क्या?

माया - जिस वक्त से मुझे यह मालूम हुआ है कि गोपालसिंह ही ने कृष्णाजिन्न का रूप धारण किया था उस वक्त से मैं उसे बहुत ही चालाक और धूर्त ऐयार समझने लग गई हूं, ताज्जुब नहीं कि वह तेरा भेद मालूम कर ले या वे खाने - पीने की चीजें जो उसने मंगाई हैं उनमें से स्वयं कुछ भी न खाय।

लीला - यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है। मेरा दिल भी यही कहता है कि उसने खाने-पीने का बहुत बड़ा ध्यान रखा होगा। सिवाय अपने हाथ के और किसी का बनाया कदापि न खाता होगा क्योंकि वह तकलीफ उठा चुका है, अब उसे धोखा देना जरा टेढ़ी खीर है, मगर फिर भी तुम देखोगी कि इस अंगूठी की बदौलत मैं उसे कैसा धोखा देती हूं और किस तरह अपने पंजे में फंसाती हूं।

माया - खैर जो मुनासिब समझ, कर, मगर इसमें तो कोई शक नहीं है कि रामदीन छोकरे की सूरत बन और घोड़ी पर सवार होकर तू दीवान साहब के पास जायगी।

लीला - जाऊंगी और जरूर जाऊंगी, नहीं तो इस अंगूठी और चीठी के मिलने का फायदा ही क्या हुआ! बस तुम्हें किसी अच्छे ठिकाने पर रख देने भर की देर है।

माया - मगर मैं एक बात और कहना चाहती हूं।

लीला - वह क्या?

माया - मैं इस समय बिल्कुल कंगाल हो रही हूं और ऐसे मौके पर रुपये की बड़ी जरूरत है। इसलिये मैं चाहती हूं कि दीवान साहब के पास तुझे न भेजकर खुद ही जाऊं और किसी तरह तिलिस्मी बाग में घुसकर कुछ जवाहिरात और सोना जहां तक ला सकूं ले आऊं, क्योंकि मुझे वहां के खजाने का हाल मालूम है और यह काम तेरे किये नहीं हो सकता। जब मुझे रुपये की मदद मिल जायेगी तब कुछ सिपाहियों का भी बन्दोबस्त कर सकूंगी और...।

लीला - यह सब-कुछ ठीक है मगर मैं तुम्हें दीवान साहब के पास कदापि न जाने दूंगी। कौन ठिकाना कहीं तुम गिरफ्तार हो जाओ तो फिर मेरे किये कुछ भी न हो सकेगा। बाकी रही रुपये-पैसे वाली बात, सो इसके लिए तरद्दुद करना वृथा है, क्या यह नहीं हो सकता कि जब मैं दीवान साहब के पास जाऊं और सवारी इत्यादि तथा खाने-पीने की चीजें लूं तो एक रथ पर थोड़ी-सी अशर्फियां और कुछ जवाहिरात भी रख देने के लिए कहूं क्या वह इस अंगूठी के प्रताप से मेरी बात न मानेगा और अगर अशर्फियों और जवाहिरात का बन्दोबस्त कर देगा तो क्या मैं उन्हें रास्ते में से गुम नहीं कर सकती इसे भी जाने दो, अगर तुम पता-ठिकाना ठीक-ठीक बताओ तो क्या मैं तिलिस्मी बाग में जाकर जवाहिरात और अशर्फियों को नहीं निकाल ला सकती?

माया - निकाल ला सकती है और दीवान साहब से भी जो कुछ मांगेगी सम्भव है कि बिना कुछ विचारे दे दें, मगर इसमें मुझे दो बातों की कठिनाई मालूम पड़ती है।

लीला - वह क्या?

माया - एक तो दीवान साहब के पास अन्दाज से ज्यादे रुपये-अशर्फियों की तहबील नहीं रहती और जवाहिरात तो बिल्कुल ही उसके पास नहीं रहता, शायद आजकल गोपालसिंह के हुक्म से रहता हो मगर मुझे उम्मीद नहीं है, अस्तु जो चीज तू उससे मांगेगी वह अगर उसके पास न हुई तो उसे तुझ पर शक करने की जगह मिलेगी और ताज्जुब नहीं कि काम में विघ्न पड़ जाय।

लीला - अगर ऐसा है तो जरूर खुटके की बात है, अच्छा दूसरी बात क्या है?

माया - दूसरे यह कि तिलिस्मी बाग के खजाने में घुसकर वहां से कुछ निकाल लाना नये आदमी का काम नहीं है। खैर, मैं तुझे रास्ता बता दूंगी फिर जो कुछ करते बने कर लीजियो।

लीला - खैर जैसा होगा देखा जायगा, मगर मैं यह राय कभी नहीं दे सकती कि तुम दीवान साहब के सामने या खास बाग में जाओ, ज्यादे नहीं तो थोड़ा-बहुत मैं ले ही आऊंगी।

माया - अच्छा यह बता कि मुझे कहां छोड़ जायगी और तेरे जाने के बाद मैं क्या करूंगी

लीला - इतनी जल्दी में कोई अच्छी जगह तो मिलती नहीं, किसी पहाड़ की कन्दरा में दो दिन गुजारा करो और चुपचाप बैठी रहो, इसी बीच में मैं अपना काम करके लौट आऊंगी। मुझे जमानिया जाने में अगर देर हो जायगी तो काम चौपट हो जायगा। ताज्जुब नहीं कि देर हो जाने के कारण गोपालसिंह किसी दूसरे को भेज दें और अंगूठी का भेद खुल जाय।

इत्तिफाक अजब चीज है। उसने यहां भी एक बेढब सामान खड़ा कर दिया। इत्तिफाक से लीला और मायारानी भी उसी जंगल में जा पहुंचीं जिसमें माधवी और भीमसेन का मिलाप हुआ था और वे लोग अभी तक वहां टिके हुए थे।

 

बयान - 5

आधी रात का समय था जब लीला और मायारानी उस जंगल में पहुंचीं जिसमें माधवी और भीमसेन टिके हुए थे। जब ये दोनों उसके पास पहुंचीं और लीला को वहां टिके हुए बहुत-से आदमियों की आहट मिली तो वह मायारानी को एक ठिकाने खड़ा करके पता लगाने के लिए उनकी तरफ गई।

हम ऊपर बयान कर चुके हैं कि सेनापति कुबेरसिंह के साथ थोड़ी-सी फौज भी थी - अस्तु लीला को थोड़ी ही कोशिश से मालूम हो गया कि यहां सैकड़ों आदमियों का डेरा पड़ा हुआ है और वे लोग इस ढंग से घने जंगल में आड़ देख टिके हुए हैं जैसे डाकुओं का गरोह या छिपकर धावा मारने वाले टिकते हैं और हर वक्त होशियार रहते हैं। लीला खूब जानती थी कि राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके साथी या सम्बन्धी अगर किसी काम के लिए कहीं जाते हैं या लड़ाई करते हैं तो छिपकर या आड़ पकड़कर डेरा नहीं डालते, हां अगर अकेले या ऐयार लोग हों तो शायद ऐसा करें, मगर जब उनके साथ सौ-पचास आदमी या कुछ फौज होगी तब कदापि ऐसा न करेंगे इसलिये उसे गुमान हुआ कि ये लोग जरूर कोई गैर हैं बल्कि ताज्जुब नहीं कि हमारा साथ देने वाले हों। अस्तु बहुत-सी बातों को सोच-विचार और अपनी ऐयारी पर भरोसा करके लीला माधवी की फौज में घुस गई और वहां बहुत-से सिपाहियों को होशियार तथा पहरा देते हुए देखा।

पहिले लिखा जा चुका है कि लीला भेष बदले हुए थी और यह भी दर्शा गया है कि माधवी और कुबेरसिंह अपनी असली सूरत में सफर करते थे।

लीला को कई सिपाहियों ने देखा और एक ने टोका कि कौन है?

लीला - एक मुसाफिर परदेसी औरत।

सिपाही - यहां क्यों चली आ रही है?

लीला - अपनी भलाई की आशा से।

सिपाही - क्या चाहती है?

लीला - आपके सरदार से मिलना।

सिपाही - अपना परिचय दे तो सरदार के पास भेजवा दूं।

लीला - परिचय देने में कोई हर्ज तो नहीं है मगर डरती हूं कि आप लोग भी कहीं उन्हीं में से न हों जिन्होंने मुझे लूट लिया है, यद्यपि अब मैं बिल्कुल खाली हो रही हूं मगर...।

इतने में और भी कई सिपाही वहां जुट आये और सभों ने लीला को घेरकर सवाल करना शुरू किया और लीला ने भी गौर करके जान लिया कि ये लोग राजा वीरेन्द्रसिंह के दल वाले नहीं हैं क्योंकि उनके फौजी सिपाही अक्सर जर्द पोशाक काम में लाते हैं, इसी तरह से जमानिया वाले भी नहीं मालूम हुए क्योंकि उनकी बातचीत और चाल-ढाल को लीला खूब पहिचानती थी, अस्तु कुछ और बातचीत होने पर लीला को विश्वास हो गया कि ये लोग उनमें से नहीं हैं जिनका मुझे डर है।

उन सिपाहियों को भी एक अकेली औरत से डरने की कोई जरूरत न थी इसलिये उन्होंने अपने मालिक का नाम जाहिर कर दिया और लीला को लिये हुए उस जगह जा पहुंचे जहां माधवी और भीमसेन का बिस्तर लगा हुआ था और वे दोनों इस समय भी बैठे बातचीत कर रहे थे। लालटेन जलाया गया और लीला की सूरत अच्छी तरह देखी गयी, लीला ने भी उसी रोशनी में माधवी को पहिचान लिया और खुश होकर बोली, ''अहा, आप तो गया की रानी माधवीदेवी हैं!''

माधवी - और तू कौन है?

लीला - मैं प्रसिद्ध मायारानी की ऐयारा हूं और उन्हीं के साथ यहां तक आई भी हूं। यह दुनिया का कायदा है कि एक से दूसरे को मदद पहुंचती है अस्तु जिस तरह आपको मायारानी से मदद पहुंच सकती है उसी तरह आप मायारानी की भी मदद कर सकती हैं। वाह-वाह, यह समागम तो बहुत ही अच्छा हुआ। अगर आजकल मायारानी मुसीबत के दिन काट रही हैं तो क्या हुआ मगर फिर भी वह तिलिस्म की रानी रह चुकी हैं और जो कुछ वह कर सकती हैं किसी दूसरे से नहीं हो सकता। आप लोगों का मिलकर एक हो जाना बहुत ही मुनासिब होगा और तब आप लोग जो चाहेंगी कर सकेंगी।

माधवी - (खुश होकर) मायारानी कहां हैं उन्हें तो राजा वीरेन्द्रसिंह कैद करके चुनार ले गये थे!

लीला - जी हां, मगर मैं अभी कह चुकी हूं कि मायारानी आखिर तिलिस्म की रानी हैं इसलिये जो कुछ वह कर सकती हैं किसी दूसरे के किये नहीं हो सकता। राजा वीरेन्द्रसिंह ने उन्हें कैद किया तो क्या हुआ, उनका छूटना कोई मुश्किल न था!!

माधवी - बेशक-बेशक, अच्छा बताओ वह कहां हैं?

लीला - यहां से थोड़ी दूर पर खड़ी हैं, किसी सरदार को भेजिये उनका इस्तकबाल करके यहां ले आवे, दो-तीन सौ कदम से ज्यादे न चलना पड़ेगा।

माधवी - मैं खुद उन्हें लेने के लिए चलूंगी।

लीला - इससे बढ़कर और क्या हो सकता है अगर आप उनकी इज्जत करेंगी तो वह भी आपके लिये जान तक देना जरूरी समझेंगी।

लीला ने अपनी लम्बी-चौड़ी बातों में माधवी को खूब उलझाया, यहां तक कि माधवी अपने साथ भीमसेन और कुबेरसिंह तथा कई सिपाहियों को लेकर मायारानी के पास गई और उसे बड़ी खातिर और इज्जत के साथ अपने डेरे पर ले गई। जल मंगवाकर हाथ-मुंह धुलवाया और फिर बातचीज करने लगी।

माधवी - (मायारानी से) आपको वीरेन्द्रसिंह की कैद से छूट जाने पर मैं मुबारकबाद देती हूं यद्यपि आपके लिए यह कोई बड़ी बात न थी।

माया - बेशक यह कोई बड़ी बात न थी, इस काम को तो अकेली मेरी सखी या ऐयारा लीला ही ने कर दिखाया। इस समय आपसे मिलकर मैं बहुत खुश हुई और इसमें अब शक करने की कोई जगह न रही कि आप पुनः गया की रानी और मैं जमानिया की मालिक बन जाऊंगी। दुनिया में एक का काम दूसरे से हुआ ही करता है और जब हम-आप एक दिल हो जायेंगे तो वह कौन-सा काम है जिसे नहीं कर सकते! मुझे आपके कैद होने की भी खबर लगी थी और मुझे इस बात का बहुत रंज था कि आपको मेरी छोटी बहिन कमलिनी ने कैदखाने की सूरत दिखाई थी।

माधवी - इधर तो यह सुनने में आया है कि आपसे और कमलिनी से कोई नाता नहीं है और लक्ष्मीदेवी भी प्रकट हो गई है तथा उसे राजा वीरेन्द्रसिंह चुनार ले गये हैं।

माया - (मुस्कराकर) बेशक ऐसा ही है, मगर जिस जमाने का मैं जिक्र कर रही हूं उस जमाने में वह मेरी ही बहिन कहलाती थी। और लक्ष्मीदेवी को राजा वीरेन्द्रसिंह चुनार नहीं ले गये हैं वह तो किशोरी, कामिनी, कमलिनी, लाडिनी और कमला के सहित किसी दूसरी ही जगह छिपाई गई है। मगर इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि कल शाम को गोपालसिंह उन सभों को जमानिया की तरफ ले जायेंगे और हम लोग उन्हें गोपालसिंह के सहित रास्ते ही में गिरफ्तार कर लेंगे।

माधवी - (ताज्जुब से) हां! क्या कल मैं दुष्टा किशोरी की नापाक सूरत देख सकूंगी! उस पर मुझे बड़ा ही रंज है, और कमलिनी ने तो मुझे कैद ही किया था।

माया - बेशक कल किशोरी और कमलिनी इत्यादि तुम्हारे कब्जे में होंगी और गोपालसिंह भी तुम्हारे काबू में होगा जो वीरेन्द्रसिंह और उनके लड़कों की बदौलत तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन हो चुका है।

माधवी - निःसन्देह वह मेरा और तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है। तो क्या उसकी गिरफ्तारी का इन्तजाम हो चुका है?

माया - हां, चौदह आना इन्तजाम हो चुका और जो दो आना बाकी है सो वह भी हो जायगा।

माधवी - क्या बन्दोबस्त हुआ है और किस समय तथा किस तरह वे लोग गिरफ्तार किये जायेंगे?

माया - (इधर-उधर देखकर) बहुत-सी बातें ऐसी हैं जो मैं केवल तुम्हीं से कहूंगी क्योंकि कोई दूसरा उसके सुनने का अधिकारी नहीं है।

माधवी - बहुत अच्छा, यह कोई बड़ी बात नहीं है।

इतना कहकर माधवी ने भीमसेन और कुबेरसिंह की तरफ देखा क्योंकि माधवी, मायारानी और लीला के सिवाय केवल ये ही दो आदमी वहां मौजूद थे। भीमसेन ने कहा, ''हम दोनों यहां से हट जाते हैं, तुम लोग बेधड़क बातें करो मगर (मायारानी से) मेरे एक सवाल का जवाब पहिले मिलना चाहिए।''

माया - वह क्या?

भीम - आप अभी कह चुकी हैं कि कल किशोरी, कामिनी और लक्ष्मीदेवी वगैरह गिरफ्तार हो जायेंगी मगर मैंने सुना था कि राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में पहुंचकर मनोरमा ने किशोरी, कामिनी और कमला को जान से मार डाला, अब इस समय कोई और ही बात सुनने में आ रही है।

माधवी - हां यह सवाल मैं भी करने वाली थी लेकिन बातों का सिलसिला दूसरी तरफ चला गया और मैं पूछना भूल गई।

माया - हां यह बात अच्छी तरह सुनने में आई थी और मुझे विश्वास भी हो गया था कि वास्तव में ऐसा ही हुआ है मगर आज यह बात खुद गोपालसिंह की लिखावट से खुल गई कि वास्तव में वे तीनों मारी नहीं गयीं, परन्तु मुझे यह मालूम नहीं है कि इस विषय में किस तरह की चालाकी खेली गयी या मनोरमा ने जिन्हें मारा वह कौन थीं।

भीम - तो निश्चय है कि वे तीनों मारी नहीं गईं?

माया - बेशक वे तीनों जीती हैं। (गोपालसिंह वाली चीठी दिखाकर) देखो एक ही सबूत में मैं तुम्हारी दिलजमई कर देती हूं। इसे पढ़ो और माधवी रानी को सुनाओ।

(माधवी से) देखो बहिन, तुम इस बात का खयाल न करना कि मैं तुम्हें आप कहकर सम्बोधन नहीं करती, मेरा-तुम्हारा अब दोस्ती और मुहब्बत का नाता हो चुका इसलिये अब इन बातों का खयाल नहीं हो सकता।

माधवी - मैं भी यही पसन्द करती हूं और इस बारे में अपने लिये भी तुमसे पहिले ही माफी मांग लेती हूं।

भीमसेन ने पत्र पढ़ा और माधवी को सुनाया।

भीम - इस पत्र से तो बड़ा काम निकल सकता है! यह कब का लिखा है और तुम्हारे हाथ क्योंकर लगा तथा जिस अंगूठी का इसमें जिक्र किया गया है वह कहां है?

माया - (अंगूठी दिखाकर) अंगूठी भी मुझे मिल गई है और यह चीठी आज ही की लिखी और आज ही मेरे हाथ लगी है। अभी इसकी कार्रवाई बिल्कुल बाकी है।

भीम - अफसोस इतना ही है कि मेरे ऐयारों में से कोई भी रामदीन को नहीं जानता...।

माया - क्या हर्ज है, यह मेरी ऐयारा लीला बखूबी उसकी तरह बनकर काम निकाल सकती है, तुम्हारे ऐयार इसकी मदद पर मुस्तैद रह सकते हैं, और यह जब रामदीन की सूरत बनेगी तो इसे अच्छी तरह देख भी सकते हैं।

भीम - (चीठी मायारानी के हाथ में देकर) अच्छा अब तुम दोनों को जो कुछ गुप्त बातें करनी हैं कर लो पीछे मैं इस विषय में कुछ कहूं-सुनूंगा।

इतना कहकर भीमसेन उठ खड़ा हुआ और कुबेरसिंह को साथ लिये हुए कुछ दूर चला गया और मौका समझकर लीला भी कुछ पीछे हट गई।

माया - जो कुछ तुम पीछे कहो-सुनोगी उसे मैं पहिले ही निपटा देना चाहती हूं। सच पूछो तो मेरी और तुम्हारी अवस्था बराबर है, तुम भी विधवा हो और मैं भी विधवा हूं, क्योंकि मैं वास्तव में गोपालसिंह की स्त्री नहीं हूं और यह बात सभों को मालूम हो गई बल्कि तुम भी सुन ही चुकी होगी।

माधवी - हां, मैं सुन चुकी हूं, और मैंने यह सुना था कि तुमने राजा गोपालसिंह को वर्षों तक कैद कर रक्खा था पर आखिर कमलिनी ने उन्हें छुड़ा लिया। तो तुमने ऐसा क्यों किया और उन्हें मार ही क्यों न डाला?

माया - यही मुझसे भूल हो गई। तिलिस्म के दो-चार भेद जो मुझे मालूम न थे जानने के लिए मैंने ऐसा किया था, मुझे उम्मीद थी कि वह कैद की तकलीफ उठाकर बता देगा। तब उसे मार डालती तो आज यह दिन देखना नसीब न होता। मैं तिलिस्म की बदौलत अकेली ही राजा वीरेन्द्रसिंह ऐसे दस को जहन्नुम में पहुंचा देने की ताकत रखती थी। अब भी अगर गोपालसिंह को मैं पकड़ पाऊं और मार सकूं तो पुनः तिलिस्म की रानी होने से मुझे कोई भी नहीं रोक सकता और तब मैं बात की बात में तुम्हें राजगृही और गया की रानी बना सकती हूं, मगर उस बात का सिलसिला तो टूटा ही जाता है। तुम भी विधवा हो और मैं भी विधवा हूं, तुम भी नौजवान और आशिक-मिजाज हो तथा मैं भी नौजवान और आशिक-मिजाज हूं, तुम भी इन्द्रजीतसिंह के फेर में पड़कर दुःख भोग रही हो और मैं भी आनन्दसिंह की मुहब्बत में इस दशा तक आ पहुंची हूं। अब भी मेरी और तुम्हारी किस्मतों का फैसला एक साथ और एक ही ठिकाने हो सकता है क्योंकि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी आजकल जमानिया ही में तिलिस्म तोड़ रहे हैं। अगर आज हम-तुम एक होकर काम करें तो बहुत जल्द दुश्मनों का नामोनिशान मिटाकर अपने प्यारों के साथ दुनिया का सुख भोग सकती हैं, मगर मुझे इस समय तुम्हारे दो कंटक दिखाई देते हैं।

माधवी - हां, एक तो मेरा भाई भीमसेन और दूसरा मेरा सेनापति कुबेरसिंह मगर तुम इन दोनों का कुछ भी खयाल न करो, इस समय हमें इन दोनों को मिला-जुलाकर काम कर लेना चाहिए फिर तुम जैसा कहोगी वैसा किया जायगा।

माया - शाबाश-शाबाश! यही मालूम करने के लिए मैं तुमसे निराले में बातचीत किया चाहती थी क्योंकि ये बातें ऐसी हैं कि सिवाय मेरे और तुम्हारे किसी तीसरे का न जानना ही अच्छा है।

माधवी - निःसन्देह ऐसा ही है, हम दोनों के दिल की बातें हवा को भी न मालूम होनी चाहिए। आज बड़ी खुशी का दिन है कि हम दोनों जो एक ही तरह का दिल रखती हैं यहां पर आ मिली हैं। अब हम दोनों को हमेशा मेल-मिलाप रखने और समय पड़ने पर एक-दूसरे की मदद करने के लिए कसम खाकर मजबूत हो जाना चाहिए।

पाठक, मायारानी और माधवी दोनों ही अपना मतलब देख रही हैं। दोनों ही धूर्त, दोनों ही खुदगर्ज, और दोनों ही विश्वासघातिनी हैं। इस समय कुछ देर तक कानों में घुल-घुलकर बातें होती रहीं, वादे भी हुए और कसमें भी खाई गईं। इसके बाद फिर भीमसेन और कुबेरसिंह बुलाए गए तथा लीला भी आ गई और आपस में बातें होने लगीं।

भीम - अच्छा तो अब क्या निश्चय किया जाता है राजा गोपालसिंह की चीठी लेकर जमानिया कौन जायगा और क्या होगा?

माया - पहिले तुम अपनी राय दो।

भीम - मेरी राय तो यह है कि लीला रामदीन की सूरत बन दीवान साहब के पास जाय और वहां से उनकी फरमाइश लेकर 'पिपलिया घाटी' पहुंचे और हम लोग भी अपनी फौज लेकर वहीं मौजूद रहें। लीला को यह करना चाहिए कि उन दो सौ सवारों को जिन्हें जमानिया से अपने साथ लायेगी किसी बहाने से पीछे टिकवा दे जिससे गोपालसिंह के पहुंचते ही हम लोग बात की बात में उन सभों को गिरफ्तार कर लें या मार डालें।

माया - मगर यह बात मुझे नापसन्द है क्योंकि एक तो उसके लिखे अनुसार फौज 'पिपलिया घाटी' तक जरूर जायगी, अगर मान लिया जाय कि नकली रामदीन के हुक्म से फौज पीछे रह भी जाय और तुम लोग उन सभों को गिरफ्तार कर लो तो भी हमारा काम न निकल सकेगा क्योंकि राजा गोपालसिंह के पकड़े या मारे जाने की खबर दीवान को तुरंत लग जायगी। और वह अपनी फौज को दुरुस्त करके लड़ने के लिए तैयार हो जाएगा और हम लोगों को जमानिया के अन्दर कभी घुसने न देगा। कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी जमानिया ही में तिलिस्म के अन्दर हैं, वे दोनों भी लड़ने-भिड़ने के लिए तैयार हो जायेंगे और उस समय हम लोग फिर लंडूरे ही रह जायेंगे। इतना बखेड़ा करने का कुछ फायदा न निकलेगा, न तो जमानिया की गद्दी मिलेगी और न गया का राज्य।

भीम - अब आप ही कहिए कि क्या करना चाहिए।

माया - (कुबेर से) इस वक्त आपके पास कितनी फौज है?

कुबेर - पांच सौ।

माया - (माधवी से) ऐसा करना चाहिए कि हम-तुम, भीमसेन और कुबेरसिंह चारों आदमी जमानिया वाले तिलिस्मी बाग के अन्दर जा घुसें और इन पांच सौ आदमियों को इस तरह तिलिस्मी बाग के अन्दर ले चलें और छिपा रक्खें कि किसी को कानों-कान खबर न हो, क्योंकि उस बाग में इतने आदमियों को छिपा रखने की जगह है और वह बाग भी इस लायक है कि अगर मैं उसके अन्दर मौजूद रहूं तो चाहे कैसा ही जबर्दस्त दुश्मन हो और चाहे कितनी ही ज्यादे फौज लेकर क्यों न चढ़ आवे मगर बाग के अन्दर किसी की नजर तक पहुंचने न दूं।

माधवी - बेशक यह बाग ऐसा ही सुनने में आया है और तुम तो वहां की रानी ही ठहरीं तथा तुम्हें वहां के सब भेद मालूम भी हैं, अच्छा तब?

माया - जब किशोरी और कमलिनी इत्यादि को लेकर गोपालसिंह जमानिया जायगा तो निःसन्देह सभों को लिये हुए उसी बाग में पहुंचेगा, बस उस समय हम लोग जो छिपे हुए रहेंगे निकल आवेंगे और बात की बात में सभों को मार लेंगे। ऐसा होने से जमानिया में दखल भी बना रहेगा और इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह भी कब्जे में आ जायेंगे।

माधवी - (खुश होकर) बात तो बहुत ठीक है, मगर हम लोग इतने आदमियों को लेकर चुपचाप उस बाग के अन्दर किस तरह पहुंच सकते हैं?

माया - इसका बन्दोबस्त इस तरह हो सकता है कि हम-तुम, भीमसेन और कुबेरसिंह एक साथ ही भेष बदलकर लीला के साथ जमानिया जायें और लीला दीवान साहब से कहे कि गोपालसिंह ने इन सभों अर्थात् हम लोगों को खास बाग के अन्दर पहुंचा देने का हुक्म दिया है। बस इतना कहकर हम लोगों को उस बाग के अन्दर पहुंचा दे क्योंकि दीवान इस नकली रामदीन की बात अंगूठी की बरकत से टाल न सकेगा और रामदीन पहिले भी खास बाग के अन्दर आता-जाता था यह बात दीवान जानता है। जब हम लोग उस बाग के अन्दर जा पहुंचेंगे तो एक गुप्त रास्ते से कुल फौज को बाग के अन्दर ले लेंगे। इन फौजी सिपाहियों को सुरंग के मुहाने का पता बता दिया जायगा जिसकी राह से हम सभों को खास बाग के अन्दर पहुंचावेंगे।

माधवी - यह बात तो तुमने बहुत ही अच्छी सोची!

भीम - इससे बढ़कर और कोई तर्कीब फतह पाने के लिए हो ही नहीं सकती!

कुबेर - और ऐसा करने में कोई टण्टा भी नहीं है।

लीला - बस अब इसी राय को पक्की रखिए।

इसके बाद फिर सभों में बातचीत और राय होती रही यहां तक कि सबेरा हो गया। मायारानी, माधवी, भीमसेन और कुबेरसिंह ने सूरतें बदल लीं और लीला भी रामदीन बन बैठी। भीमसेन के चारों ऐयारों को सुरंग का पता-ठिकाना अच्छी तरह बता दिया गया और कह दिया गया कि उसी ठिकाने सुरंग के मुहाने पर फौजी सिपाहियों को लेकर इन्तजार करना, इसके बाद मायारानी, माधवी, भीमसेन, कुबेरसिंह और लीला ने घोड़ों पर सवार होकर जमानिया का रास्ता लिया।

 

बयान - 6

दिन दो पहर से कुछ ज्यादे ढल चुका था जब जमानिया में दीवान साहब को रामदीन के आने की इत्तिला मिली। दीवान साहब ने रामदीन को अपने पास बुलाया और उसने दीवान साहब के सामने पहुंचकर गोपालसिंह की चीठी उनके हाथ में दी तथा जब वे चीठी पढ़ चुके तो अंगूठी भी दिखाई। दीवान साहब ने नकली रामदीन से कहा, ''महाराज का हुक्म हम लोगों के सिर-आंखों पर, तुम अंगूठी को पहिन लो और हम लोगों को अपने हुक्म का पाबन्द समझो! सवारी और सवारों का इन्तजाम दो घड़ी के अन्दर हो जायगा। तुम यहां रहोगे या सवारों के साथ जाओगे?'

रामदीन ने कहा, ''मैं सवारों के साथ ही राजा साहब के पास जाऊंगा मगर इस समय चार आदमियों को खास बाग के अन्दर पहुंचाकर उनके खाने-पीने का इन्तजाम कर देना है जैसा कि हमारे राजा साहब का हुक्म है।''

दीवान - (ताज्जुब से) खास बाग के अन्दर?

रामदीन - जी हां।

दीवान - और ये चारों आदमी हैं कहां पर?

रामदीन - उन्हें मैं बाहर छोड़ आया हूं।

दीवान - (कुछ सोचकर) खैर जो राजा साहब ने हुक्म दिया हो या जो तुम्हारे जी में आवे करो, अब हम लोगों को तो रोकने-टोकने का अधिकार ही नहीं रहा।

रामदीन सलाम करके उठ खड़ा हुआ और अपने चारों साथियों को लेकर तिलिस्मी बाग के अन्दर चला गया जहां इस समय बिल्कुल ही सन्नाटा था। अंगूठी के खयाल से उसे किसी ने भी नहीं रोका और मायारानी बेखटके अपने ठिकाने पहुंच गई तथा लुकने-छिपने और दरवाजों को बन्द करने लगी।

अब हम रामदीन के साथ राजा गोपालसिंह की तरफ रवाना होते हैं और देखते हैं कि बनी-बनाई बात किस तरह चौपट होती है।

संध्या होने से पहिले खाने-पीने का सामान, चार रथ और दो सौ सवारों को लेकर नकली रामदीन पिपलिया घाटी की तरफ रवाना हुआ और दूसरे दिन दोपहर के बाद वहां पहुंचा।

आज ही संध्या होने के पहिले राजा गोपालसिंह यहां पहुंचने वाले थे यह बात रामदीन की जुबानी सभों को मालूम हो चुकी थी और सभी आदमी उनके आने का इन्तजार कर रहे थे।

संध्या हो गई, चिराग जल गया, पहर रात गई, दो पहर रात गुजरी, आखिर तमाम रात बीत गई, मगर राजा गोपालसिंह न आये, इसलिए नकली रामदीन के ताज्जुब का तो कहना ही क्या उसके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं, मगर इसके अतिरिक्त जितने फौजी सवार तथा लोग साथ आये थे उन सभों को भी बहुत ताज्जुब हुआ और वे घड़ी-घड़ी राजा साहब के न आने का सबब उससे पूछने लगे, मगर रामदीन क्या जवाब देता उसे इन बातों की खबर ही क्या थी!

दूसरे दिन संध्या के समय राजा गोपालसिंह घोड़े पर सवार वहां आ पहुंचे मगर अकेले थे, साईस तक साथ में न था। सिपाहियाना ठाठ से बेशकीमत कपड़ों के ऊपर तिलिस्मी कवच-खंजर और ढाल-तलवार लगाये बहुत ही सुन्दर तथा रोआबदार मालूम होते थे। सभों ने झुककर सलाम किया और नकली रामदीन ने आगे बढ़कर घोड़े की लगाम थाम ली तथा उसकी गर्दन पर दो-चार थपकी देकर कहा, ''आश्चर्य है कि आपके आने में पूरे आठ पहर की देर हो गई और फिर भी अकेले ही हैं!''

यह सुनकर राजा साहब ने कई पल तक रामदीन का मुंह देखा और तब कहा, ''हां किशोरी, कामिनी और लक्ष्मीदेवी वगैरह ने हमारे साथ आने से इनकार किया इसलिए हम अकेले ही आए हैं और हमारे जाने में रात भर की देर है। इस समय हम किसी काम को जाते हैं सबेरे यहां आयेंगे, तब तक तुम सभों को इस घाटी में टिके रहना होगा!''

रामदीन - घोड़ों का दाना तो सिर्फ एक ही दिन का आया था, और सवार लोग भी...।

गोपाल - खैर क्या हर्ज है, घोड़े चराई पर गुजारा कर लेंगे और सवार लोग रात-भर फाका करेंगे।

इतना कहकर राजा गोपालसिंह ने घोड़े की बाग मोड़ी और जिधर से आये थे उसी तरफ तेजी के साथ रवाना हो गये। रामदीन चुपचाप ज्यों-का-त्यों खड़ा उनकी तरफ देखता ही रह गया और जब वे नजरों की ओट हो गये तब उसने सभों को राजा साहब का हुक्म सुनाया और इसके बाद अपने बिछावन पर जाकर सोचने लगा...।

गोपालसिंह की बातें कुछ समझ में नहीं आतीं और न उनके इरादे का ही पता लगता है! लक्ष्मीदेवी और कमलिनी वगैरह को न मालूम क्यों छोड़ आये और जब उन्होंने इनके साथ आने से इनकार किया तो इन्होंने मान क्यों लिया क्या अब लक्ष्मीदेवी का और इनका साथ न होगा अगर ये अकेले जमानिया गए तो क्या केवल इन्हीं के साथ वह सलूक किया जायगा जो हम सोच चुके हैं मगर कमलिनी वगैरह का बचे रह जाना तो अच्छा नहीं होगा। लेकिन फिर क्या किया जाय, लाचारी है। हां एक बात का इन्तजाम तो कुछ किया ही नहीं गया और न पहिले इस बात का विचार ही हुआ। जमानिया पहुंचने पर जब दीवान साहब की जुबानी गोपालसिंह को यह मालूम होगा कि रामदीन ने चार आदमियों को खास बाग के अन्दर पहुंचाया है तब वह क्या सोचेंगे और पूछने पर मुझसे क्या जवाब पावेंगे कुछ भी नहीं। इस बात का जवाब देना मेरे लिए कठिन हो जायगा। तब फिर खास बाग पहुंचने के पहिले ही मेरा भाग जाना उचित होगा ओफ, बड़ी भूल हो गई, यह बात पहिले न सोच ली! दीवान साहब को बिना कुछ कहे ही उन सभों को खास बाग में पहुंचा देना मुनासिब होता। मगर ऐसा करने पर भी तो काम नहीं चलता। अगर दीवान साहब को नहीं तो खास बाग के पहरेदारों को तो मालूम हो ही जाता कि रामदीन चार आदमियों को बाग के अन्दर छोड़ गया है और उन्हीं की जुबानी यह बात राजा साहब को भी मालूम हो जाती। बात एक ही थी, सबसे अच्छा तो तब होता जब वे लोग किसी गुप्त राह से बाग के अन्दर जाते, मगर यह असम्भव था क्योंकि जरूर भीतर से सभी रास्ते गोपालसिंह ने बन्द कर रक्खे होंगे। तब क्या करना चाहिए हां भाग ही जाना सबसे अच्छा होगा। मगर मायारानी को भी इस बात की खबर कर देनी चाहिए। अच्छा तब जमानिया होकर और मायारानी को कह-सुनकर भागना चाहिए। नहीं अब तो यह भी नहीं हो सकता, क्यों मायारानी फौजी सिपाहियों को बाग के अन्दर करके साथियों समेत कहीं छिप गई होगी और मैं उस भाग के गुप्त भेदों को न जानने के कारण इस लायक नहीं हूं कि मायारानी को खोज निकालूं और अपने दिल का हाल उनसे कहूं या उन्हीं के साथ आप भी छिप रहूं। ओफ्! वह तो मजे में अपने ठिकाने पहुंच गई मगर मुझे आफत में डाल गई। खैर अभी तो नहीं मगर गोपालसिंह को जमानिया की हद में पहुंचाकर जरूर भाग जाना पड़ेगा। फिर जब मायारानी उन्हें मारकर अपना दखल जमा लेंगी तब फिर उनसे मुलाकात होती रहेगी।

इन्हीं विचारों में लीला (नकली रामदीन) ने तमाम रात आंखों में बिता दी। सबेरा होने के पहिले ही वह जरूरी कामों से छुट्टी पाने के लिए घोड़े पर सवार होकर दूर चली गई और घण्टे भर बाद लौट आई।

 

बयान - 7

दिन अनुमान दो घड़ी के चढ़ चुका होगा जब राजा गोपालसिंह दो आदमियों को साथ लिये हुए धीरे-धीरे आते दिखाई पड़े। वे दोनों भैरोसिंह और इन्द्रदेव थे और पैदल थे। जब तीनों उस ठिकाने पहुंच गये जहां राजा साहब के रथ और सवार लोग थे तब राजा साहब ने अपना घोड़ा छोड़ दिया और उस पर भैरोसिंह को सवार होने के लिए कहा तथा और सवारों को भी घोड़ों पर सवार हो जाने के लिए इशारा किया। इसके बाद स्वयं एक रथ पर सवार हो गये और इन्द्रदेव को भी उसी पर अपने साथ बैठा लिया, बाकी तीन रथ खाली ही रह गये। सवारी धीरे-धीरे जमानिया की तरफ रवाना हुई और फौजी सवार खूबसूरती के साथ राजा साहब को घेरे हुए धीरे-धीरे जैसा कि रथ जा रहा था जाने लगे। भैरोसिंह अपना घोड़ा बढ़ाकर नकली रामदीन के पास चला गया जो उसी पंचकल्यान घोड़ी पर सवार था और उसके साथ-साथ जाने लगा। यह बात लीला को बहुत बुरी मालूम हुई क्योंकि वह राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों से बहुत डरती थी। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह बोली -

लीला - (भैरो से) आपने राजा साहब का साथ क्यों छोड़ दिया?

भैरो - (हंसकर) तुम्हारा साथ करने के लिये, क्योंकि मैं अपने दोस्त रामदीन को अकेला नहीं छोड़ सकता।

लीला - और जब मुझे राजा साहब ने अकेले जमानिया भेजा था तब आप कहां डूब गये थे?

भैरो - तब भी मैं तुम्हारे साथ था मगर तुम्हारी नजरों से छिपा हुआ था।

लीला - (डरकर, मगर अपने को सम्हालकर) परसों तुम कहां थे कल कहां थे और आज सबेरा होने के पहिले तक कहां गायब थे क्यों झूठी बातें बना रहे हो?

भैरो - परसों भी, कल भी और आज भर भी मैं तुम्हारे साथ ही था मगर तुम्हारी नजरों से छिपा हुआ था, हां जब दो घण्टे रात बाकी थी तब मैंने तुम्हारा साथ छोड़ दिया और राजा साहब से जा मिला। अब मैं फिर तुम्हारे साथ जा रहा हूं क्योंकि राजा साहब का ऐसा ही हुक्म है। (हंसकर) क्योंकि राजा साहब ने सुना है कि तुम्हारा इरादा जमानिया पहुंचने के पहिले ही भाग जाने का है!

लीला - (अपने उछलते कलेजे को रोककर) यह उनसे किसने कहा?

भैरो - मैंने।

लीला - और तुम्हें किसने खबर दी?

भैरो - तुम्हारे दिल ने।

लीला - मानो मेरे दिल के आप भेदिया ठहरे!

भैरो - बेशक ऐसा ही है। अगर तुम्हें ऐयारी का ढंग पूरा-पूरा मालूम होता तब तुम्हारा दिल मजबूत होता मगर तुम्हारी ऐयारी अभी बिल्कुल कच्ची है। अहा, एक बात तुमसे कहना तो मैं भूल ही गया, जिस रात मायारानी राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर से भाग गई थी उसी रोज सबेरा होने के पहिले ही वह खबर राजा गोपालसिंह को मालूम हो गई।

लीला - (कांपती हुई और लड़खड़ाती आवाज में) यह तो मुझे भी मालूम है, मगर तुम्हारे इस कहने का मतलब क्या है सो समझ में नहीं आता।

भैरो - मतलब यही है कि तुम अपनी सूरत साफ करो और मेरे साथ राजा साहब के पास चलो क्योंकि अब असली रामदीन के सामने तुम्हारा रामदीन बने रहना मुनासिब नहीं है।

लीला - असली रामदीन अब कहां...!

जल्दी में लीला इतना कह तो गई मगर फिर उसने जुबान बन्द कर ली। भैरोसिंह की चलती-फिरती बातों ने उसका कलेजा हिला दिया और वह समझ गई कि अब मेरा नसीब मुझे धोखा दिया चाहता है, मेरा भेद खुल गया, और अब मेरे कैद होने में ज्यादे देर नहीं है। अब उसके दिल ने भी कहा कि वास्तव में कल ही राजा साहब को तुझ पर शक हो गया था, अगर तू कल ही भाग जाती तो अच्छा था, मगर अब तेरा भागना भी कठिन है। लीला ने कुछ और सोच-विचार के भैरोसिंह से कहा, ''तुम जरा निराले में चलकर मेरी एक बात सुन लो बेहतर होगा कि हम दोनों आदमी घोड़ा बढ़ाकर जरा आगे निकल चलें, मैं जो बात कहना चाहता हूं उसे सुनकर तुम बहुत खुश होवोगे।''

भैरो - न तो मैं तुम्हारी कुछ सुन सकता हूं और न तुम्हें छोड़ सकता हूं, हां एक बात तुम्हें और भी कहे देता हूं जिसे सुनकर तुम्हारे दिल का खुटका निकल जायगा, वह यह है कि जब राजा साहब ने दीवान साहब के नाम की चीठी देकर असली रामदीन को जमानिया भेजा था तो जुबानी कह दिया था कि 'इस चीठी में हमने दो सौ सवार भेजने के लिए लिखा है मगर तुम केवल बीस सवार अपने साथ लाना और जिस दिन हमने मांगा है उसके एक दिन बाद आना'। कहो अब तो बहुत-सी बातें तुम्हारी समझ में आ गई होंगी?

इतना कह भैरोसिंह ने लीला का हाथ पकड़ लिया और राजा साहब की तरफ चलने के लिए कहा मगर लीला को उधर जाना मंजूर न था इसलिए उसने अपनी घोड़ी को न रोका और झटका देकर अपना हाथ छुड़ाना चाहा मगर ऐसा न कर सकी। भैरोसिंह ने उसे खेंचकर जमीन पर गिरा दिया। उस समय भैरोसिंह को मालूम हुआ कि यह मर्द नहीं, औरत है।

भैरोसिंह की यह कार्रवाई देखकर सभों के कान खड़े हो गये। सवारों ने घोड़ा रोक दिया, राजा साहब की सवारी (रथ) खड़ी हो गई, कई सवार अपने घोड़े पर से कूदकर भैरोसिंह के पास चले गये और इन्द्रदेव भी रथ पर से उतरकर उसके पास जा पहुंचे। आज्ञानुसार लीला की मुश्कें बांध ली गईं और पानी मंगाकर उसका चेहरा साफ किया गया और तब लीला को सभों ने पहिचान लिया। लीला राजा गोपालसिंह के पास लाई गई और भैरोसिंह ने सब हाल कहा जिसे सुन राजा साहब हंस पड़े और बोले, ''अब इन्द्रदेव जैसा कहें वैसा करो।''

इन्द्रदेव की आज्ञानुसार लीला रस्सियों से जकड़कर एक खाली रथ पर बैठा दी गई और कई सवार उसकी निगरानी पर मुस्तैद किये गये।

अब सवारी तेजी के साथ जमानिया की तरफ रवाना हुई। दोपहर के बाद जब सवारी जमानिया के पास पहुंची तब इन्द्रदेव ने राजा साहब से धीरे-धीरे कुछ कहा और रथ से उतरकर पैदल ही मैदान का रास्ता लिया और देखते-देखते न मालूम कहां चले गये। सवारी खास बाग के दरवाजे पर पहुंची और राजा साहब रथ से उतरकर भैरोसिंह को साथ लिये हुए बाग के अन्दर चले गये।

 

बयान - 8

कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तिलिस्म तोड़ने की धुन में लगे हुए थे। मगर उनके दिल से किशोरी और कमलिनी तथा कामिनी और लाडिली की मुहब्बत एक सायत के लिए भी बाहर नहीं होती थी। जब दोनों कुमारों ने बाग के उत्तर तरफ वाले मकान की खिड़की (छोटे दरवाजे) में से झांकते हुए राजा गोपालसिंह की जुबानी किशोरी, कमलिनी, कामिनी और लाडिली का सब हाल सुना और यह भी सुना कि अब वे बहुत जल्द जमानिया में लाई जाएंगी, तब बहुत खुश हुए और उन लोगों से जल्द मिलने के लिए तिलिस्म तोड़ने की फिक्र उन्हें बहुत ज्यादे हो गई। जब गोपालसिंह, इन्दिरा और इन्द्रदेव बातचीत करके चले गये तब बड़े कुमार ने सर्यू से कहा, ''सर्यू, हम लोग अब बहुत जल्द तुम्हें अपने साथ लिये हुए इस तिलिस्म के बाहर होंगे। हम लोगों को तिलिस्म तोड़ने और दौलत पाने का उतना खयाल नहीं है जितना तिलिस्म से बाहर निकलने का ध्यान है। इस तिलिस्म से हम लोगों को एक किताब मिलने वाली है जिसके लिए हम लोग जरूर उद्योग करेंगे क्योंकि उसी किताब की बदौलत हम लोग चुनारगढ़ का वह भारी तिलिस्म तोड़ सकेंगे जिसे हमारे पिता ने हमारे लिए छोड़ रक्खा है और जिसका तोड़ना हम दोनों भाइयों को आवश्यक कहा जाता है।''

सर्यू - मेरे दिल ने उम्मीदों से भरकर उसी समय विश्वास दिया कि अब तेरा दुर्दैव सदैव के लिए तेरा पीछा छोड़ देगा जब आप दोनों भाइयों के दर्शन हुए तथा आप लोगों का परिचय मिला। अब मैं अपना दुःख भूलकर बिल्कुल बेफिक्र हो रही हूं और सिवाय आपकी आज्ञा मानने के कोई दूसरा खयाल मेरे दिल में नहीं है।

इन्द्रजीत - अच्छा तो अब तुम हम लोगों के लिए फल तोड़ो और तब तक हम लोग इस बाग में घूमकर कोई दरवाजा ढूंढ़ते हैं। ताज्जुब नहीं कि हम लोगों को इस बाग में कई दिन रहना पड़े।

सर्यू - जो आज्ञा।

इतना कहकर सर्यू फल तोड़ने और नहर के किनारे छाया देखकर कुछ जमीन साफ करने के खयाल में पड़ी और दोनों कुमार बाग में इधर-उधर घूमकर दरवाजा खोजने का उद्योग करने लगे।

पहर भर से ज्यादे देर तक घूमने और पता लगाने के बाद जब कुमार उत्तर तरफ वाली दीवार के नीचे पहुंचे जिधर मकान था तब उन्हें पूरब तरफ के कोने की तरफ हटकर जमीन में एक हौज का निशान मालूम हुआ। उसी के पास दीवार में एक छोटे से दरवाजे का चिह्न भी दिखा जिससे निश्चय हो गया कि उन लोगों का काम इन्हीं दोनों निशानों से चलेगा। इतना सोचकर वे दोनों भाई वहां चले आये जहां सर्यू फल तोड़ और जमीन साफ करके बैठी हुई दोनों भाइयों के आने का इन्तजार कर रही थी। सर्यू ने अच्छे-अच्छे और पके हुए फल दोनों भाइयों के लिए तोड़े और जल से धोकर साफ पत्थर की चट्टान पर रक्खे थे। दोनों भाइयों ने उन्हें खाकर नहर का जल पिया और इसके बाद सर्यू को भी खाने के लिए कहके उसी ठिकाने चले गए जहां हौज और दरवाजे का निशान पाया था। हौज में मिट्टी भरी हुई थी जिसे दोनों भाइयों ने खंजर से खोद-खोदके निकालना शुरू किया और थोड़ी देर में सर्यू भी उनके पास पहुंचकर मिट्टी फेंकने में मदद करने लगी। संध्या हो जाने पर इन सभों ने उस काम से हाथ खींचा और नहर के किनारे जाकर आराम किया। उस हौज की सफाई में इन लोगों को चार दिन लग गए। पांचवें दिन दोपहर होते-होते वह हौज साफ हुआ और मालूम होने लगा कि यह वास्तव में एक फौवारा है। वह हौज संगमर्मर का बना हुआ था और फौवारा सोने का। अब दोनों कुमारों ने खंजर के सहारे उस हौज की जमीन का पत्थर उखाड़ना शुरू किया और जब दो-तीन दिन की मेहनत में सब पत्थर उखड़ गए तब वह फौवारा भी सहज ही में निकल गया और उसके नीचे एक दरवाजे का निशान दिखाई दिया। दरवाजे में पल्ला हटाने के लिए कड़ी लगी हुई थी और जिस जगह ताला लगा हुआ था उसके मुंह पर लोहे की एक पतली चादर रक्खी हुई थी जिसे कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने हटा दिया और उसी तिलिस्मी ताली से ताला खोला जो पुतली के हाथ में से उन्हें मिली थी।

दरवाजा हटाने पर नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां दिखाई पड़ीं। आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर हाथ में लेकर रोशनी करते हुए नीचे उतरे और उनके पीछे-पीछे इन्द्रजीतसिंह और सर्यू भी गए। नीचे पहुंचकर उन्होंने अपने को एक छोटी-सी कोठरी में पाया जिसके बीचोंबीच में एक हौज बना हुआ था। उस हौज के चारों तरफ वाली दीवार कई तरह की धातुओं से बनी हुई थी और हौज के बीच में किसी तरह की राख भरी हुई थी। कोठरी की चारों तरफ की दीवारों में से तांबे की बहुत-सी तारें आई थीं और वे सब एक साथ होकर उसी हौज के बीच में चली गई थीं। इन्द्रजीतसिंह ने सर्यू से कहा, ''जब ये सब तारें काट दी जायेंगी तब बाग के चारों तरफ की दीवार करामात से खाली हो जायेगी अर्थात् उसमें यह गुण न रहेगा कि उसके छूने से किसी को किसी तरह की तकलीफ हो। इसके बाद हम लोग उस दीवार वाले दरवाजे को साफ करके रास्ता निकालेंगे और इस बाग से निकलकर किसी दूसरी ही जगह जायेंगे, अस्तु तुम यहां से निकलकर ऊपर चली जाओ तब हम लोग तार काटने में हाथ लगावें।''

इन्द्रजीतसिंह की आज्ञानुसार सर्यू कोठरी से बाहर निकल गई और दोनों कुमारों ने तिलिस्मी खंजर से शीघ्र ही उन तारों को काट डाला और बाहर निकल आये। दरवाजा पहिले की तरह बन्द कर दिया और ऊपर से मिट्टी डाल दी, फिर नहर के किनारे आकर तीनों आदमी बैठ गए और बातचीत करने लगे।

सर्यू - अब दीवार छूने में किसी तरह की तकलीफ नहीं हो सकती?

इन्द्र - अभी नहीं धीरे-धीरे दो पहर में उसका गुण जायेगा और तब तक हम लोगों को व्यर्थ बैठे रहना पड़ेगा।

आनन्द - तब तक (सर्यू की तरफ बताकर) इनका बचा हुआ किस्सा सुन लिया जाता तो अच्छा होता।

इन्द्र - नहीं अब इनका किस्सा पिताजी के सामने सुनेंगे।

सर्यू - अब तो मैं आपके साथ ही रहूंगी, इसलिए तिलिस्म तोड़ते समय जो कुछ कार्रवाई आप करेंगे या जो तमाशा दिखाई देगा देखूंगी मगर यदि आज के पहिले का हाल जब से आप इस तिलिस्म में आये हैं सुना देते तो बड़ी कृपा होती। मैं भी समझती कि आपकी बदौलत इस तिलिस्म का पूरा-पूरा तमाशा देख लिया।

इन्द्र - अच्छी बात है, (आनन्दसिंह से) तुम इस तिलिस्म का हाल इन्हें सुना दो।

थोड़ी देर आराम करने तथा जरूरी कामों से छुट्टी पाने के बाद भाई की आज्ञानुसार आनन्दसिंह ने अपना और तिलिस्म का हाल तथा जिस ढंग से इन्दिरा की मुलाकात हुई थी वह सब सर्यू को कह सुनाया, इसके साथ ही साथ तिलिस्म के बाहर आजकल का जैसा जमाना हो रहा था वह सब भी बयान किया। वह सब हाल कहते-सुनते रात आधी से कुछ ज्यादा चली गई और उस समय इन लोगों ने एक विचित्र तमाशा देखा।

इस बाग के उत्तर तरफ जो सटा हुआ मकान था और जिसमें से राजा गोपालसिंह और कुमार में बातचीत हुई थी, हम पहिले लिख आये हैं कि उसमें आगे की तरफ सात खिड़कियां थीं। इस समय यकायक एक आवाज आने से दोनों कुमारों और सर्यू की निगाह उस तरफ चली गई। देखा कि बीच वाली बड़ी खिड़की (दरवाजा) खुली है और उसके अन्दर रोशनी मालूम होती है। इन लोगों को ताज्जुब हुआ और इन्होंने सोचा कि शायद राजा गोपालसिंह आये हैं और हम लोगों से बातचीत करने का इरादा है मगर ऐसा न था। थोड़ी ही देर बाद उसके अन्दर दो-तीन नकाबपोश चलते-फिरते दिखाई दिये और इसके बाद एक नकाबपोश खिड़की में कमन्द अड़ाकर नीचे उतरने लगा। पहिले तो दोनों कुमारों और सर्यू को गुमान हुआ कि खिड़की में राजा गोपालसिंह या इन्द्रदेव दिखाई देंगे या होंगे मगर जब एक नकाबपोश कमन्द के सहारे नीचे उतरने लगा तब उनका खयाल बदल गया और वे सोचने लगे कि यह काम इन्द्रदेव या गोपालसिंह का नहीं है बल्कि किसी ऐसे आदमी का है जो इस तिलिस्म का हाल नहीं जानता क्योंकि गोपालसिंह और इन्द्रदेव तथा इन्दिरा को भी मालूम ही है कि इस बाग की दीवार छूने या बदन के साथ लगाने लायक नहीं है, तभी तो इन्दिरा अपनी मां के पास नहीं पहुंच सकी थी और सर्यू ने यह बात इन्दिरा से कही होगी।

इन्द्रजीतसिंह ने इसी समय सर्यू से पूछा कि ''इस बाग की दीवार का हाल इन्दिरा को मालूम है' इसके जवाब में सर्यू ने कहा, ''जरूर मालूम है, मैंने खुद इन्दिरा से कहा था और इसी सबब से तो वह मेरे पास आज तक न आ सकी, निःसन्देह इन्दिरा ने यह बात राजा गोपालसिंह से कही होगी बल्कि वह खुद जानते होंगे इसी से मैं सोचती हूं कि ये लोग कोई दूसरे ही हैं जो इस भेद को नहीं जानते, मगर अब तो इस दीवार का गुण जाता ही रहा।''

तीनों को ताज्जुब हुआ और तीनों आदमी टकटकी लगाकर उस तरफ देखने लगे। जब वह नकाबपोश कमन्द के सहारे नीचे उतर आया तब दूसरे नकाबपोश ने वह कमन्द ऊपर खेंच ली और उसी कमन्द में एक गठरी बांधकर नीचे लटकाई। दोनों कुमारों और सर्यू को विश्वास हो गया कि इस गठरी में जरूर कोई आदमी है।

जो नकाबपोश नीचे आ चुका था उसने गठरी थाम ली और खोलकर कमन्द खाली कर दी मगर जिस कम्बल में वह गठरी बंधी हुई थी उसे इसी के साथ बांध दिया और ऊपर वाले नकाबपोश ने खेंच लिया। थोड़ी देर बाद दूसरी गठरी लटकाई गई और नीचे वाले नकाबपोश ने पहिले की तरह उसे भी थाम लिया और कम्बल खोलकर फिर कमन्द के साथ बांध दिया।

इसी तरह बारी-बारी से सात गठरियां नीचे उतारी गईं, इसके बाद वह नकाबपोश जो सबके पहिले नीचे उतरा था उसी कमन्द के सहारे ऊपर चढ़ गया और खिड़की बन्द हो गई।

 

बयान - 9

जिस समय राजा गोपालसिंह खास बाग के दरवाजे पर पहुंचे उस समय उनके दीवान साहब भी वहां हाजिर थे। नकली रामदीन अर्थात् लीला इनके हवाले कर दी गई। भैरोसिंह के सवाल करने पर उन्होंने कहा कि 'इस लीला ने चार आदमियों को खास बाग के अन्दर पहुंचाया है मगर हम नहीं कह सकते कि वास्तव में वे कौन थे।' अस्तु राजा साहब और भैरोसिंह को यह तो मालूम हो गया कि चार आदमी भी इस बाग के अन्दर घुसे हैं जो हमारे दुश्मन ही होंगे मगर उन्हें उन पांच सौ फौजी सिपाहियों की शायद ही खबर हो जिन्हें मायारानी ने गुप्त रीति से बाग के अन्दर कर लिया था। पहिली दफे जब मायारानी को गोपालसिंह ने छकाया था तब वह खुले तौर पर बाग में रहती थी मगर अबकी दफे तो वह उस भूल-भुलैया बाग में जाकर ऐसा गायब हुई है कि उसका पता लगाना भी कठिन होगा। दीवान साहब ने पूछा भी कि 'अगर हुक्म हो तो बाग में तलाशी ली जाय और उन आदमियों का पता लगाया जाय जिन्हें लीला ने इस बाग में पहुंचाया है', मगर राजा साहब ने इसके जवाब में सिर हिलाकर जाहिर कर दिया कि यह बात उन्हें स्वीकार नहीं है।

कुछ दिन रहते ही राजा गोपालसिंह बाग के दूसरे दर्जे में केवल भैरोसिंह को साथ लेकर गये और बाग के अन्दर चारों तरफ सन्नाटा पाया। इस समय भैरोसिंह और राजा गोपालसिंह दोनों ही के हाथ में तिलिस्मी खंजर मौजूद थे।

खास बाग के दूसरे दर्जे में दो कुएं थे जिनमें पानी बहुत ज्यादे रहता था, यहां तक कि इस बाग के पेड़-पत्तों को सींचने और छिड़काव का काम इन दोनों में से किसी एक कुएं ही से चल सकता था मगर सींचने के समय दूर और नजदीक का खयाल करके या शायद और किसी सबब से बनवाने वाले ने दो बड़े-बड़े जंगी कुएं बनावाये थे परन्तु ये दोनों कुएं भी कारीगरी और ऐयारी से खाली न थे।

भैरोसिंह और गोपालसिंह छिपते और घूमते हुए पूरब तरफ वाले कुएं पर पहुंचे जिसका घेरा बहुत बड़ा था। और नीचे उतरने तथा चढ़ने के लिए कुएं की दीवार में लोहे की कड़ियां लगी हुई थीं। भैरोसिंह और गोपालसिंह दोनों आदमी कड़ियों के सहारे इस कुएं में उतर गये।

किसी ठिकाने छिपी हुई मायारानी इस तमाशे को देख रही थी। गोपालसिंह और भैरोसिंह को आते देख वह बहुत खुश हुई और उसे निश्चय हो गया कि अब हम लोग गोपालसिंह को मार लेंगे। जिस जगह वह बैठी हुई थी वहां पर माधवी, कुबेरसिंह, भीमसेन और ऐयारों के अतिरिक्त बीस आदमी फौजी सिपाहियों में से भी मौजूद थे और बाकी फौजी सिपाही तहखानों में छिपाये हुए थे। पहिले तो मायारानी ने चाहा कि केवल हम ही लोग बीस सिपाहियों के साथ जाकर गोपालसिंह को गिरफ्तार कर लें मगर जब उसे कृष्णाजिन्न वाली बात याद आई और यह खयाल हुआ कि गोपालसिंह के पास वह तिलिस्मी खंजर और कवच जरूर होगा जो कि रोहतासगढ़ में उनके पास उस समय मौजूद था जब शेरअली और दारोगा के साथ हम लोग वहां गये थे, तब उसकी हिम्मत टूट गई और बिना कुल फौजी सिपाहियों को साथ लिए गोपालसिंह के पास जाना उचित न जाना। इसी बीच में उसके देखते-देखते गोपालसिंह कुएं के अन्दर चले गये।

इस तिलिस्मी बाग के अन्दर आने तथा यहां से बाहर जाने वाला दरवाजा जिस तरह बन्द होता है इसका हाल उस समय लिखा जा चुका है जब पहिली दफा इस बाग में मायारानी के ऊपर आफत आई थी और मायारानी ने सिपाहियों के बागी हो जाने पर बाहर जाने का रास्ता बन्द कर दिया था, अस्तु इस समय भी उसी ढंग से मायारानी ने बाग का दरवाजा बन्द कर दिया और इसके बाद कुल सिपाहियों को तहखाने में से निकालकर माधवी, भीमसेन और कुबेरसिंह तथा ऐयारों को साथ लिए उस कुएं पर पहुंची जिसके अन्दर भैरोसिंह को साथ लिये हुए राजा गोपालसिंह उतर गये थे।

मायारानी ने सोचा था कि आखिर गोपालसिंह उस कुएं के बाहर निकलेंगे ही, उस समय हम लोग उन्हें सहज ही में मार लेंगे बल्कि कुएं से बाहर निकलने की मोहलत ही न देंगे - इत्यादि, मगर जब बहुत देर हो गई और रात हो जाने पर भी गोपालसिंह कुएं के बाहर न निकले तो उसे बड़ा ही ताज्जुब हुआ। वह खुद कुएं के अन्दर झांककर देखने लगी और उसी समय चौंककर माधवी से बोली -

माया - क्यों बहिन, आज ही तुमने भी देखा था कि इस कुएं में पानी कितना ज्यादा था!

माधवी - बेशक मैंने देखा था कि बीस हाथ से ज्यादे दूरी पर पानी नहीं है, तो क्या इस समय पानी कम जान पड़ता है?

माया - कम क्या मैं तो समझती हूं कि इस समय इसमें कुछ भी पानी नहीं है और कुआं सूखा पड़ा है।

माधवी - (ताज्जुब से) ऐसा नहीं हो सकता। एक पत्थर इसमें फेंककर देखो।

माया - आओ तुम ही देखो।

माधवी ने अपने हाथ से ईंट का टुकड़ा कुएं के अन्दर फेंका और उसकी आवाज पर गौर करके बोली -

माधवी - बेशक इसमें पानी कुछ भी नहीं है केवल कीचड़ मात्र है। तो क्या तुम नहीं जानतीं कि इसके अन्दर पानी के निकास का कोई रास्ता तथा आदमियों के आने-जाने के लिए कोई सुरंग या दरवाजा है या नहीं?

माया - मुझे एक दफे गोपालसिंह ने कहा था कि इस कुएं के नीचे एक तहखाना है जिसमें तरह-तरह के तिलिस्मी हर्बे और ऐयारी के काम की अपूर्व चीजें हैं।

माधवी - बेशक यही बात ठीक होगी और उन्हीं चीजों में से कुछ लाने के लिए गोपालसिंह गये होंगे।

माया - शायद ऐसा ही हो!

माधवी - तो बस इससे बढ़कर और कोई तर्कीब नहीं हो सकती कि यह कुआं पाट दिया जाय जिससे गोपालसिंह को फिर दुनिया का मुंह देखना नसीब न हो।

माया - निःसन्देह यह बहुत अच्छी राय है अस्तु जहां तक हो सके इसे कर ही देना चाहिए।

इस समय कुबेरसिंह की फौज टिड्डियों की तरह इस बाग में सब तरफ फैली हुई हुक्म का इन्तजार कर रही थी। माधवी ने अपनी राय भीमसेन और कुबेरसिंह से कही और उनकी आज्ञानुसार फौजी आदमियों ने जमीन खोदकर मिट्टी निकालने और कुआं पाटने में हाथ लगा दिया।

पहर रात जाते तक कुआं बखूबी पट गया और उस समय मायारानी के दिल में यह बात पैदा हुई कि अब मुझे गोपालसिंह का कुछ भी डर न रहा।

फौजी सिपाहियों को खुले मैदान बाग में पड़े रहने की आज्ञा देकर भीमसेन, कुबेरसिंह और माधवी तथा ऐयारों को साथ लिये हुए मायारानी अपने उस खास कमरे की छत पर बेफिक्री और खुशी के साथ चली गई जिसमें आज के कुछ दिन पहिले मालिकाना ढंग से रहती थी।

 

बयान - 10

रात अनुमान दो पहर के जा चुकी है। खास बाग के दूसरे दर्जे में दीवानखाने की छत पर कुबेरसिंह, भीमसेन और उसके चारों ऐयार तथा माधवी के साथ बैठी हुई मायारानी बड़ी प्रसन्नता से बातें कर रही है। चांदनी खूब छिटकी हुई है और बाग की हर एक चीज जहां तक निगाह बिना ठोकर खाये जा सकती है साफ दिखाई दे रही है, बातचीत का विषय अब यह था कि 'राजा गोपालसिंह से तो छुट्टी मिल गई, अब राज्य तथा राजकर्मचारियों के लिए क्या प्रबन्ध करना चाहिए

जिस छत पर ये लोग बैठे हुए थे उसके दाहिनी तरफ वाली पट्टी में भी एक सुन्दर इमारत और उसके पीछे ऊंची दीवार के बाद तिलिस्मी बाग का तीसरा दर्जा पड़ता था। इस समय मायारानी का मुंह ठीक उसी इमारात और दीवार की तरफ था। और उस तरफ की चांदनी दरवाजों के अन्दर घुसकर बड़ी बहार दिखा रही थी। बात करते-करते मायारानी चौंकी और उस तरफ हाथ का इशारा करके बोली - ''हैं! उस छत पर कौन जा पहुंचा है'

माधवी - हां एक आदमी हाथ में नंगी तलवार लेकर टहल रहा है।

भीम - चेहरे पर नकाब डाले हुए है।

कुबेर - हमारे फौजी सिपाहियों में से शायद कोई ऊपर चला गया होगा, मगर उन्हें बिना हुक्म ऐसा करना नहीं चाहिए!

माया - नहीं-नहीं, उस मकान में सिवा मेरे और कोई नहीं जा सकता।

माधवी - तो फिर वहां गया कौन?

माया - यही तो ताज्जुब है! देखिए एक और भी आ पहुंचा, यह तीसरा भी आया, मामला क्या है?

अजायब - कहीं राजा गोपालसिंह कुएं में घुसकर वहां न जा पहुंचे हों! मगर वे तो केवल दो ही आदमी थे!!

माया - और ये तीन हैं! (कुछ रुककर) लीजिए अब पांच हो गये!

मायारानी और उसके संगी-साथियों के देखते-देखते उस छत पर पचीस आदमी हो गये। उन सभों ही के हाथों में नंगी तलवारें थीं। जिस छत पर वे सब थे वहां पर से ऊपर मायारानी के पास तक जाने में यद्यपि कई तरह की रुकावटें थीं मगर ऐयारों के लिए यह कोई मुश्किल बात न थी इसीलिए मायारानी के पक्ष वालों को भय हुआ और उन्होंने चाहा कि अपने फौजी आदमियों में से कुछ को ऊपर बुला लें और ऐसा करने के लिए अजायबसिंह को कहा गया।

अजायबसिंह फौजी सिपाहियों को लाने के लिए चला गया मगर मकान के नीचे न जा सका और तुरंत लौट आकर बोला, ''जाने का हर दरवाजा बन्द है, कोई तर्कीब मायारानी करें तो शायद वहां पहुंचने की नौबत आवे!''

अजायबसिंह की इस बात ने सभों को चौंका दिया और साथ ही इसके सभों को अपनी-अपनी जान की फिक्र पड़ गई। मायारानी के दिलाये हुए भरोसे से जो कुछ उम्मीद की जड़ इन लोगों के दिलों में जमी थी वह हिल गई और अब अपने किए पर पछताने की नौबत आई, मगर मायारानी अब भी बात बनाने से न चूकी, यह कहती हुई अपनी जगह से उठी कि ''कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह इस तिलिस्म को तोड़ रहे हैं इसलिए ताज्जुब नहीं कि ये सब बातें कुछ उन्हीं से सम्बन्ध रखती हों।''

मायारानी स्वयं नीचे उतरी मगर जा न सकी और अजायबसिंह की तरह लाचार होकर बैरंग लौट आई। उस समय उसके दिल में भी तरह-तरह के खुटके पैदा हुए और वह ताज्जुब की निगाह से उन लोगों की तरफ देखने लगी जो उसके मुकाबले में एकाएक आकर अब गिनती में पचीस हो गए थे।

थोड़ी देर बाद वे ऊपर से कूदते-फांदते मायारानी की तरफ आते हुए दिखाई दिए। उस समय मायारानी और उसके संगी-साथी सभी उठ खड़े हुए और अपनी-अपनी जान बचाने की नीयत से तलवारें खेंच-खेंच मुस्तैद हो गए।

बात की बात में वे पचीसों आदमी उस छत पर चले आए जिस पर मायारानी थी, मगर मायारानी या उसके साथियों से किसी ने कुछ भी न कहा बल्कि उनकी तरफ आंख उठाकर देखा भी नहीं और मस्तानी चाल से चलते हुए छत के नीचे उतर गए। इन लोगों ने भी यह सोचकर कि वे लोग गिनती में हमसे ज्यादे हैं रोक-टोक न किया मगर इस बात का खयाल जरूर रहा कि नीचे जाने के रास्ते तो सब बन्द हैं खुद मायारानी भी न जा सकी और लौट आई, इन सभों को भी निःसन्देह लौट आना पड़ेगा, मगर थोड़ी देर में यह गुमान जाता रहा जब कि पचीसों नीचे उतरकर बाग के बीच में चलते हुए दिखाई दिए।

माधवी ने समझा कि हमारे फौजी सिपाही उन लोगों को जरूर टोकेंगे और वास्तव में बात ऐसी ही थी। उन पचासों को बाग में देख फौजी सिपाहियों में खलबली मच गई और बहुतों ने उठकर उन लोगों को रोकना चाहा मगर वे लोग देखते ही देखते पेड़ों की झुरमुट में घुसकर ऐसा गायब हुए कि किसी का पता भी न लगा और सब लोग आश्चर्य से देखते रह गए। उस समय माधवी ने मायारानी से कहा, ''बहिन, यहां तो मामला बेढब नजर आता है!''

माया - कुछ समझ में नहीं आता कि ये लोग कौन थे, यहां क्यों आये और हम लोगों को बिना रोके-टोके इस तरह क्यों और कहां गायब हो गये!

माधवी - यह तो ठीक ही है मगर मैं पूछती हूं कि आप तिलिस्म की रानी कहलाकर भी इस बाग का हाल क्या जानती हैं मैं तो समझती हूं कि कुछ भी नहीं जानतीं! खास अपने कमरे का मामूली दरवाजा भी आपसे नहीं खुलता और हम लोगों की जान मुफ्त में जाया चाहती है!

भीम - अब आपकी कोई कार्रवाई हम लोगों को भरोसा नहीं दिला सकती।

माया - इस समय मैं मजबूर हो रही हूं इसलिए टेढ़ी-सीधी जो जी में आवे सुनाओ लेकिन अगर इस मकान के नीचे उतरने की नौबत आयेगी तो दिखा दूंगी कि मैं क्या कर सकती हूं।

कुबेर - नीचे जाने की नौबत ही क्यों आवेगी! गैर लोग आवें और चले जायें मगर यहां की रानी होकर तुम कुछ न कर सकीं, यह बड़े शर्म की बात है।

मायारानी इसका जवाब कुछ दिया ही चाहती थी कि सीढ़ी की तरफ से आवाज आई, ''तुम लोगों के कलपने पर मुझे दया आती है, अच्छा हम दरवाजा खोल देते हैं, तुम लोग नीचे उतर आओ और अपनी जान बचाओ!'' इसके बाद सीढ़ी वाले दरवाजे के खुलने की आवाज आई।

सभों को ताज्जुब हुआ और सीढ़ी की तरफ जाते डर मालूम हुआ मगर यह सोचकर कि यहां पड़े रहने से भी जान बचने की आशा नहीं है सभों ने जी कड़ा करके नीचे उतरने का इरादा किया।

वास्तव में दरवाजे जो बन्द हो गये थे खुले हुए दिखाई दिए और सब कोई जल्दी के साथ नीचे उतर गये। उस समय मायारानी ने एक लम्बी सांस लेकर कहा, ''अब कोई चिन्ता नहीं।''

बाकर - मगर यह न मालूम हुआ कि दरवाजा खोलने वाला कौन था?

यारअली - और उसने हम लोगों के साथ वह नेकी का बर्ताव क्यों किया?

इतने ही में ऊपर से आवाज आई, ''दरवाजा खोलने वाला मैं हूं।''

सभों ने घबराकर ऊपर की तरफ देखा। एक आदमी मुंह पर नकाब डाले बरामदे में झांकता हुआ दिखाई दिया। कुबेरसिंह ने उससे पूछा, ''तुम कौन हो?'

नकाबपोश - मैं इस तिलिस्म का दारोगा हूं।

माया - इस तिलिस्म का दारोगा तो राजा वीरेन्द्रसिंह के कब्जे में है।

नकाब - वह तुम्हारा दारोगा था और मैं राजा गोपालसिंह का दारोगा हूं, आजकल यह बाग मेरे ही कब्जे में है।

माया - जिस समय हम लोग यहां आये तुम कहां थे?

नकाब - इसी बाग में।

माया - फिर हम लोगों को रोका क्यों नहीं?

नकाब - रोकने की जरूरत ही क्या थी यह तो मैं जानता ही था कि तुम लोग अपने पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हो। तुम लोगों की बेवकूफी पर मुझे हंसी आती है।

माया - बेवकूफी काहे की?

नकाब - एक तो यही कि तुम लोगों ने इतनी फौज को बाग के अन्दर घुसेड़ तो लिया मगर यह न सोचा कि इतने आदमी यहां आकर खायेंगे क्या अगर घास और पेड़-पत्तों को भी खाकर गुजारा किया चाहें तो भी दो-एक दिन से ज्यादे का काम नहीं चल सकता। क्या तुम लोगों ने समझा था कि बाग में पहुंचते ही राजा गोपालसिंह को मार लेंगे?

माया - गोपालसिंह को हम लोगों ने मार ही लिया, इसमें शक ही क्या है बाकी रही हमारी फौज तो एक दिन का खाना अपने साथ रखती है, कल तो हम लोग इस बाग के बाहर हो ही जायेंगे।

नकाब - दोनों बातें शेखचिल्ली की-सी हैं। न तो राजा गोपालसिंह का तुम लोग कुछ बिगाड़ सकते हो और न इस बाग के बाहर की हवा ही खा सकते हो।

माया - तो क्या गोपालसिंह किसी दूसरी राह से निकल जायेंगे?

नकाब - बेशक।

माया - और हम लोग बाहर न जा सकेंगे?

नकाब - कदापि नहीं क्योंकि मैंने सब दरवाजे अच्छी तरह बन्द कर दिए हैं। तुम तो तिलिस्म की रानी बनने का दावा व्यर्थ ही कर रही हो! तुम्हें तो यहां का हाल रुपये में एक पैसा भी नहीं मालूम है। अभी मैंने तुम लोगों के उतरने की राह रोक दी थी सो तुम्हारे किये कुछ भी न बन पड़ा! जब तुम लोग छत पर थे, पचीस आदमी तुम्हारे सामने से होकर नीचे चले आये, अगर तुम्हें तिलिस्म की रानी होने का दावा था तो उन्हें रोक लेतीं! मगर राजा साहब के हौसले को देखो कि तुम लोगों के यहां आने की खबर पाकर भी अकेले सिर्फ भैरोसिंह को साथ लेकर इस बाग में चले आए!

माया - उन्हें हमारे आने की खबर कैसे मिली?

नकाब - (जोर से हंसकर) इसके जवाब में तो इतना ही कहना काफी है कि तुम्हारी लीला इस बाग में आने के पहिले ही गिरफ्तार कर ली गई।

माधवी - तो क्या हम लोग किसी तरह अब इस बाग के बाहर नहीं जा सकते?

नकाब - जीते तो नहीं जा सकते मगर जब तुम लोग मर जाओगे तब सभों की लाशें जरूर फेंक दी जायेंगी!

जिस मकान से मायारानी उतरी थी उसी के बरामदे में वह नकाबपोश टहल रहा था। बरामदे के आगे किसी तरह की आड़ या रुकावट न थी। माया उससे बातें करती जाती और छिपे ढंग से अपने तिलिस्मी तमंचे को भी दुरुस्त करती जाती थी तथा रात होने के सबब यह बात उस नकाबपोश को मालूम न हुई। जब वह माधवी से बातें करने लगा उस समय मौका पाकर मायारानी ने तिलिस्मी तमंचा उस पर चलाया। गोली उसकी छाती में लगकर फट गई और बेहोशी का धुआं बहुत जल्द उसके दिमाग में चढ़ गया, साथ ही वह आदमी बेहोश होकर जमीन पर लुढ़कता हुआ मायारानी के आगे आ पड़ा। भीमसेन ने झपटकर उसकी नकाब हटा दी और चौंककर बोल उठा, ''वाह-वाह! यह तो राजा गोपालसिंह हैं।''

 

बयान - 11

कुंअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और सर्यू को बड़ा ही ताज्जुब हुआ जब उन्होंने एक-एक करके सात आदमियों को तिलिस्मी बाग में पहुंचाए जाते देखा। जब उस मकान की खिड़की बन्द हो गई और चारों तरफ सन्नाटा छा गया तब इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, ''उस तरफ चलकर देखना चाहिए कि ये लोग कौन हैं।''

आनन्द - जरूर चलना चाहिए।

सर्यू - कहीं हम लोगों के दुश्मन न हों।

आनन्द - अगर दुश्मन भी होंगे तो हमें कुछ परवाह न करनी चाहिए, हम लोग हजारों से लड़ने वाले हैं।

इन्द्र - अगर हम लोग दस-बीस आदमियों से डरकर चलेंगे तो कुछ भी न कर सकेंगे।

इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने उस तरफ कदम बढ़ाया। आनन्दसिंह उनके पीछे-पीछे रवाना हुए मगर सर्यू को साथ आने की आज्ञा न दी और वह उसी जगह खड़ी रह गई।

पास पहुंचकर कुमारों ने देखा कि सात आदमी जमीन पर बेहोश पड़े हैं। सभों के बदन पर स्याह लबादा और चेहरों पर स्याह नकाब था। थोड़ी देर तक दोनों भाई ताज्जुब की निगाह से उन सभों की ओर देखते रहे और इसके बाद एक के चेहरे पर से नकाब हटाने का इरादा किया मगर उसी समय ऊपर से पुनः दरवाजा या खिड़की खुलने की आवाज आई।

आनन्द - मालूम होता है कि और भी दो-चार आदमी वहां उतारे जायेंगे।

इन्द्र - शायद ऐसा ही हो, यहां से हटकर और आड़ में होकर देखना चाहिए।

आनन्द - (सातों बेहोशों की तरफ इशारा करके) यदि इन लोगों को इनके किसी दुश्मन ने यहां पहुंचाया हो और अबकी दफे कोई आकर इनकी जान...।

इन्द्र - नहीं-नहीं, अगर ये लोग मारे जाने लायक होते और जिन लोगों ने इन्हें नीचे उतारा है वे इनके जानी दुश्मन होते तो धीरे से उतारने के बदले ऊपर से धक्का देकर नीचे गिरा देते। खैर ज्यादे बातचीत का मौका नहीं है, इस पेड़ की आड़ में हो जाओ फिर देखो हम सब पता लगा लेते हैं, बस हटो जल्दी करो।

बेचारे आनन्दसिंह कुछ जवाब न दे सके और वहां से थोड़ी दूर हटकर एक पेड़ की आड़ में हो गए। इस समय चन्द्रदेव अपनी छावनी की तरफ जा रहे थे और पेड़ों की आड़ पड़ जाने के कारण उस जगह कुछ अन्धकार-सा छा गया था जहां वे सातों बेहोश पड़े हुए थे और इन्द्रजीतसिंह खड़े थे।

इन्द्रजीतसिंह हाथ में तिलिस्मी खंजर लेकर फुर्ती से इन सातों के बीच में छिपकर लेट रहे, दोनों तरफ से दो आदमियों के लबादे को भी अपने बदन पर ले लिया और पड़े-पड़े ऊपर की तरफ देखने लगे। एक आदमी कमन्द के सहारे नीचे उतरता हुआ दिखाई दिया। जब वह जमीन पर उतरकर उन सातों आदमियों की तरफ आया तो इन्द्रजीतसिंह ने फुर्ती से हाथ बढ़ाकर तिलिस्मी खंजर उसके पैर से लगा दिया, साथ ही वह आदमी कांपा और बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। इन्द्रजीतसिंह पुनः उसी तरह लेट ऊपर की तरफ देखने लगे। थोड़ी देर बाद और एक आदमी उसी कमन्द के सहारे नीचे उतरा और घूम-घूम के गौर से उन सातों को देखने लगा। जब वह कुमार के पास आया कुमार ने उसके पैर से भी तिलिस्मी खंजर लगा दिया और वह भी पहिले की तरह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। कुंअर इन्द्रजीतसिंह लेटे-लेटे और भी किसी के आने का इन्तजार करने लगे मगर कुछ देर हो जाने पर कोई तीसरा दिखाई न पड़ा। कुमार उठ खड़े हुए और आनन्दसिंह भी उनके पास चले आये।

इन्द्रजीत - तुम इसी जगह मुस्तैद रहकर इन सभों की निगहबानी करो, हम इसी कमन्द के सहारे ऊपर जाकर देखते हैं कि वहां क्या है।

आनन्द - आपका अकेले ऊपर जाना ठीक न होगा, कौन ठिकाना वहां दुश्मनों की बारात लगी हो!

इन्द्रजीत - कोई हर्ज नहीं, जो कुछ होगा देखा जाएगा मगर तुम यहां से मत हिलना।

इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह उसी कमन्द के सहारे बहुत जल्द ऊपर चढ़ गये और खिड़की के अन्दर जाकर एक लम्बे-चौड़े कमरे में पहुंचे जहां यद्यपि बिल्कुल सन्नाटा था मगर एक चिराग जल रहा था। इस कमरे में दूसरी तरफ बाहर निकल जाने के लिए एक बड़ा-सा दरवाजा था, कुमार वहां चले गये और एक पैर दरवाजे के बाहर रख झांकने लगे। एक दूसरा कमरा नजर पड़ा जिसमें चारों तरफ छोटे-छोटे कई दरवाजे थे मगर सब बन्द थे और सामने की तरफ एक बड़ा-सा खुला हुआ दरवाजा था। कुमार उस खुले हुए दरवाजे में चले गये और झांककर देखने लगे। एक छोटा-सा नजरबाग दिखाई दिया जिसके चारों तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें और बीच में एक छोटी-सी बावली थी। बाग में दो बिगहे से ज्यादे जमीन न थी और फूल-पत्तों के पेड़ भी कम थे, बावली के पूरब तरफ एक आदमी हाथ में मशाल लिये खड़ा था और उस मशाल में से बिजली की तरह बहुत ही तेज रोशनी निकल रही थी। वह रोशनी स्थिर थी अर्थात् हवा लगने से हिलती न थी और केवल उस एक ही रोशनी से तमाम बाग में ऐसा उजाला हो रहा था कि वहां का एक-एक पत्ता साफ-साफ दिखाई दे रहा था। कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने बड़े गौर से उस आदमी को देखा जिसके हाथ में मशाल थी और उनको निश्चय हो गया कि यह आदमी असली नहीं है बनावटी है, अस्तु ताज्जुब से कुछ देर तक वे उसकी तरफ देखते रहे। इसी बीच में बाग के उत्तर वाले दालान में से एक आदमी निकलकर बावली की तरफ आता हुआ दिखाई पड़ा और कुमार ने उसे देखते ही पहिचान लिया कि यह राजा गोपालसिंह हैं। कुमार ने उन्हें पुकारने का इरादा किया ही था कि उसी दालान में से और चार आदमी आते हुए दिखाई दिए और इनकी सूरत-शक्ल भी पहिले आदमी के समान ही थी अर्थात् ये चारों भी राजा गोपालसिंह ही मालूम पड़ते थे जिससे कुंअर इन्द्रजीतसिंह को बहुत आश्चर्य हुआ और वे बड़े गौर से इनकी तरफ देखने लगे।

वे चारों आदमी जो पीछे आये थे खाली हाथ न थे बल्कि दो आदमियों की लाशें उठाए हुए थे। धीरे-धीरे चलकर वे चारों आदमी उस बनावटी मूरत के पास पहुंचे जिसके हाथ में मशाल थी, वे दोनों लाशें उसी के पास जमीन पर रख दीं और तब पांचों गोपालसिंह मिलकर धीरे-धीरे कुछ बातें करने लगे जिसे कुंअर इन्द्रजीतसिंह किसी तरह सुन नहीं सकते थे।

पहिले आदमी को देखकर, गोपालसिंह समझकर कुमार ने आवाज देना चाहा था मगर जब और भी चार गोपालसिंह निकल आए तब उन्हें ताज्जुब मालूम हुआ और यह समझकर कि कदाचित इन पांचों में से एक भी गोपालसिंह न हो वे चुप रह गये। उन पांचों गोपालसिंह की पोशाकें एक ही रंग-ढंग की थीं, बल्कि उन दोनों लाशों की पोशाक भी ठीक उन्हीं की तरह थी। यद्यपि उन लाशों का सिर कटा हुआ था और वहां मौजूद न था। मगर उन पांचों गोपालसिंह की तरफ खयाल करके देखने वाला उन लाशों को भी गोपालसिंह बता सकता था।

कुमार को चाहे इस बात का खयाल हो गया हो कि इन सभों में से कोई भी असली गोपालसिंह न होंगे मगर फिर भी वे उन सभों को बड़े ताज्जुब और गौर की निगाह से देखते हुए सोच रहे थे कि इतने गोपालसिंह बनने की जरूरत क्या पड़ी थी, उन दोनों लाशों के साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया गया या किसने किया!

जिस दरवाजे में कुंअर इन्द्रजीतसिंह खड़े थे उसी के आगे बाईं तरफ घूमती हुई छोटी सीढ़ियां नीचे उतर जाने के लिए थीं। कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने कुछ सोच-विचारकर चाहा कि इन सीढ़ियों की तरफ नीचे उतरकर पांचों गोपालसिंह के पास जायें और उन्हें जबर्दस्ती रोककर असल बात का पता लगावें मगर इसके पहले किसी के आने की आहट मालूम हुई और पीछे घूमकर देखने से कुंअर आनन्दसिंह पर निगाह पड़ी।

इन्द्रजीत - तुम क्यों चले आये?

आनन्द - आपको मैंने कई दफे नीचे से पुकारा मगर आपने कुछ जवाब न दिया तो लाचार यहां आना पड़ा।

इन्द्रजीत - क्यों?

आनन्द - राजा गोपालसिंह की आज्ञा से।

इन्द्रजीत - राजा गोपालसिंह कहां हैं?

आनन्द - उन दोनों आदमियों में से जो नीचे उतरे थे और जिन्हें आपने बेहोश कर दिया था एक राजा गोपालसिंह थे। जब आप ऊपर चढ़ आए तब मैंने एक का नकाब हटाया और तिलिस्मी खंजर की रोशनी में चेहरा देखा तो मालूम हुआ कि गोपालसिंह हैं। उस समय मुझे इस बात का अफसोस हुआ कि बेहोश करने के बाद आपने उनकी सूरत नहीं देखी, अगर देखते तो उन्हें छोड़कर यहां न आते। खैर जब मैंने उन्हें पहिचाना तो होश में लाने के लिए उद्योग करना उचित जाना, अस्तु तिलिस्मी खंजर के जोड़ की अंगूठी उनके बदन में लगाई जिसके थोड़ी ही देर बाद वह होश में आये और उठ बैठे। होश में आने के बाद पहिले-पहिले जो कुछ उनके मुंह से निकला वह यह था कि 'कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने धोखा खाया, मुझे बेहोश करने की क्या जरूरत थी मैं खुद उनसे मिलने के लिए आया था!' इतना कहकर उन्होंने मेरी तरफ देखा, यद्यपि उस समय चांदनी वहां से हट गई थी मगर उन्होंने मुझे बहुत जल्द पहिचान लिया और पूछा कि 'तुम्हारे बड़े भाई कहां हैं मैंने उनसे कुछ छिपाना उचित न जाना और कह दिया कि 'इसी कमन्द के सहारे ऊपर चले गए हैं।' सुनकर वे बहुत रंज हुए और क्रोध से बोले कि 'सब काम लड़कपन और नादानी का किया करते हैं! उन्हें बहुत जल्द ऊपर से बुला लो।' मैंने आपको कई दफे पुकारा मगर आप न बोले तब उन्होंने घुड़कके कहा कि 'क्यों व्यर्थ देर कर रहे हो, तुम खुद ऊपर जाओ और जल्द बुला लाओ।' मैंने कहा कि मुझे यहां से हटने की आज्ञा नहीं है आप खुद जाइये और बुला लाइये, मगर इतना सुनकर वे और भी रंज हुए और बोले, 'अगर मुझमें ऊपर जाने की ताकत होती तो मैं तुम्हें इतना कहता ही नहीं! बेहोशी के कारण मेरी रग-रग कमजोर हो रही है, तुम अगर उनको बुला लाने में विलम्ब करोगे तो पछताओगे, बस अब मैं इससे ज्यादे और कुछ न कहूंगा, जो ईश्वर की मर्जी होगी और जो कुछ तुम लोगों के भाग्य में लिखा होगा सो होगा।' उनकी बातें ऐसी न थीं कि मैं सुनता और चुपचाप खड़ा रह जाता, आखिर लाचार होकर आपको बुलाने के लिए आना पड़ा अब आप जल्द चलिए देर न कीजिए।

आनन्दसिंह की बातें सुनकर इन्द्रजीतसिंह को बहुत रंज हुआ और उन्होंने क्रोध भरी आवाज में कहा -

इन्द्र - आखिर तुमसे नादानी हो ही गई।

आनन्द - (आश्चर्य से) सो क्या?

इन्द्र - तुमने उस दूसरे के चेहरे पर की भी नकाब हटाकर देखा कि वह कौन था?

आनन्द - जी नहीं।

इन्द्र - तब तुम्हें कैसे विश्वास हुआ कि वह राजा गोपालसिंह ही हैं जब चेहरे पर से नकाब हटाकर देखा ही था तो पानी से मुंह धोकर भी देख लेना था! क्या तुम भूल गये कि राज गोपालसिंह के पास भी इसी तरह का तिलिस्मी खंजर मौजूद है, अस्तु उनके ऊपर इस खंजर का असर क्यों होने लगा था?

आनन्द - (सिर नीचा करके) बेशक मुझसे भूल हुई!

इन्द्र - भारी भूल हुई! (छोटे बाग की तरफ बताकर) देखो यहां पांच राजा गोपालसिंह हैं! क्या तुम कह सकते हो कि ये पांचों राजा गोपालसिंह हैं?

आनन्दसिंह ने उस छोटे बागीचे की तरफ झांककर देखा और कहा, ''बेशक मामला गड़बड़ है!''

इन्द्र - खैर अब तो हमें लौटना ही पड़ा, हम चाहते थे कि इन सभों का कुछ भेद मालूम करें मगर खैर...।

इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह लौट पड़े और उस कमरे को लांघकर दूसरे कमरे में पहुंचे जिसमें वे सातों खिड़कियां थीं। यकायक इन्द्रजीतसिंह की निगाह एक लिफाफे पर पड़ी जिसे उन्होंने उठा लिया और चिराग के पास ले जाकर पढ़ा। लिफाफा बन्द था और उस पर यह लिखा हुआ था - ''इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह जोग लिखी गोपालसिंह।''

कुमार ने लिफाफा फाड़कर चीठी निकाली और देखते ही कहा, ''इस चीठी पर किसी तरह का शक नहीं हो सकता, बेशक यह भाई साहब के हाथ की लिखी है और मालूमी निशान भी है।'' इसके बाद वे चीठी पढ़ने लगे।

आनन्दसिंह ने देखा कि चीठी पढ़ते-पढ़ते इन्द्रजीतसिंह के चेहरे का रंग कई दफे बदला और जैसे-जैसे पढ़ते जाते थे रंज की निशानी बढ़ती जाती थी। वे जब कुल चीठी पढ़ चुके तो एक लम्बी सांस लेकर बोले, ''अफसोस, बड़ी भूल हुई'' और वह चीठी पढ़ने के लिए आनन्दसिंह के हाथ में दे दी।

आनन्द ने चीठी पढ़ी, यह लिखा हुआ था -

''किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी, कमला, लाडिली और इन्दिरा को आपके पास तिलिस्म में भेजते हैं। देखिये इन्हें सम्हालिए और एक क्षण के लिए भी इनसे अलग न होइए। मुन्दर हमारे तिलिस्मी बाग में घुसी हुई है, हम आठ आना उसके कब्जे में आ गये हैं। लीला ने धोखा देकर हमारे कुछ भेद मालूम कर लिए जिसका सबब और पूरा-पूरा हाल लक्ष्मीदेवी या कमलिनी की जुबानी आपको मालूम होगा जिन्हें हमने सब-कुछ बता और समझा दिया है। कई बातों के खयाल से सभों को बेहोश करके कमन्द द्वारा आपके पास पहुंचाते हैं, खबरदार एक क्षण के लिए भी इन लोगों से अलग न हों और किसी बनावटी गोपालसिंह का विश्वास न करें। आज कम-से-कम बीस-पचीस आदमी गोपालसिंह बने हुए कार्रवाई कर रहे हैं। हम जरा तरद्दुद में पड़े हुए हैं मगर कोई चिन्ता नहीं, भैरोसिंह हमारे साथ है। आप बाग के इस दर्जे को तोड़कर दूसरी जगह पहुंचिये और यह काम रात भर के अन्दर होना चाहिए।

- शिवरामे गोपाल मेरावशि शुलेख''

चीठी पढ़कर आनन्दसिंह को बड़ा अफसोस हुआ और अपने किए पर पछताने लगे। सच तो यों है कि दोनों ही भाइयों को इस बात का अफसोस हुआ कि किशोरी, कामिनी इत्यादि को अपने पास आ जाने पर भी देखे और होश में लाये बिना छोड़कर इधर चले आये और व्यर्थ की झंझट में पड़े, क्योंकि दोनों कुमार किशोरी और कामिनी की मुलाकात से बढ़कर दुनिया में किसी चीज को पसन्द नहीं करते थे।

दोनों कुमार जल्दी-जल्दी उस कमरे के बाहर हुए और खिड़की में पहुंचे जिसमें कमन्द लगा हुआ छोड़ आये थे मगर आश्चर्य और अफसोस की बात है कि अब उन्होंने उस कमन्द को खिड़की में लगा हुआ न पाया जिसके सहारे वे नीचे उतर जाते, शायद किसी नीचे वाले ने उस कमन्द को छुड़ा लिया था।

 

बयान - 12

राजा गोपालसिंह ने जब रामदीन को चीठी और अंगूठी देकर जमानिया भेजा था तो यद्यपि चीठी में लिख दिया था कि परसों रविवार को शाम तक हम लोग वहां (पिपलिया घाटी) पहुंच जायेंगे, मगर रामदीन को समझा दिया था कि रविवार को पिपलिया घाटी पहुंचना हमने यों ही लिख दिया है। वास्तव में हम वहां सोमवार को पहुंचेंगे अस्तु तुम भी सोमवार को पिपलिया घाटी पहुंचना, जिससे ज्यादे देर तक हमारे आदमियों को वहां ठहरकर तकलीफ न उठानी पड़े, और दो सौ सवारों की जगह केवल बीस सवार लाना। यह बात असली रामदीन को तो मालूम थी और वह मारा ना जाता तो बेशक रथ और सवारों को लेकर राजा साहब की आज्ञानुसार सोमवार को ही पिपलिया घाटी पहुंचता, मगर नकली रामदीन अर्थात् लीला तो उन्हीं बातों को जान सकती थी जो चीठी में लिखी हुई थीं अस्तु वह रविवार को ही रथ और दो सौ फौज लेकर पिपलिया घाटी जा पहुंची और जब सोमवार को राजा साहब वहां पहुंचे तो बोली, ''आश्चर्य है कि आपके आने में पूरे आठ पहर की देर हुई!'' यह सुनते ही राजा साहब समझ गए कि यह असली रामदीन नहीं है। उसी समय से उन्होंने अपनी कार्रवाई का ढंग बदल दिया और लीला तथा मायारानी का सब बन्दोबस्त मिट्टी में मिल गया। वे उसी समय दो-चार बातें करके पीछे लौट गए और दूसरे दिन औरतों को अपने साथ न लाकर केवल भैरोसिंह और इन्द्रदेव को साथ लिये हुए पिपलिया घाटी में आए।

इस जगह यह भी लिख देना उचित जान पड़ता है कि दूसरे दिन पिपलिया घाटी में पहुंचकर लीला के लाये हुए सवारों के साथ रथ पर चढ़कर जमानिया पहुंचने वाले गोपालसिंह असली न थे बल्कि नकली थे और भैरोसिंह ने लीला के साथ जो सलूक किया वह असली राजा गोपालसिंह के इशारे से था। अब हमारे पाठक यह जानना चाहते होंगे कि यदि वह राजा गोपालसिंह नकली थे तो असली गोपालसिंह कहां गये, या वह किस सूरत में गये तो इसके जवाब में केवल इतना ही कह देना काफी होगा कि असली गोपालसिंह नकली गोपालसिंह के साथ इन्द्रदेव की सूरत बनकर रथ पर सवार हुए थे और जमानिया पहुंचने के पहिले ही नकली गोपालसिंह को समझा-बुझाकर रथ से उतर किसी तरफ चले गये थे। यह सब हाल यद्यपि पिछले बयानों से पाठकों को मालूम हो गया होगा परन्तु शक मिटाने के लिए यहां पुनः लिख दिया गया।

राजा गोपालसिंह के होशियार हो जाने के कारण मायारानी ने तिलिस्मी बाग में तरह-तरह के तमाशे देखे जिसका कुछ हाल तो लिखा जा चुका है और बाकी आगे चलकर लिखा जायेगा क्योंकि इस समय हम इन्द्रजीतसिंह आनन्दसिंह का हाल लिखना उचित समझते हैं।

कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने जब खिड़की में कमन्द लगा हुआ न पाया तो उन्हें ताज्जुब और रंज हुआ। थोड़ी देर तक खड़े उसी बाग की तरफ देखते रहे और तब इन्द्रजीत आनन्दसिंह से बोले, ''क्या हम लोग यहां से कूद नहीं सकते?'

आनन्द - क्यों नहीं कूद सकते! अगर इस बात का खयाल हो कि नीचा बहुत है तो कमरबन्द खोलकर इस दरवाजे के सींकचे में बांध और उसके सहारे कुछ नीचे लटककर कूदने में मालूम भी न पड़ेगा।

इन्द्र - हां तुमने यह बहुत ठीक कहा, कमरबन्दों के सहारे हम लोग आधी दूर तक जो जरूर ही लटक सकते हैं मगर खराबी यह है कि दोनों कमरबन्दों से हाथ धोना पड़ेगा और इस तिलिस्म में नहाने-धोने का सुभीता इन्हीं की बदौलत है। खैर कोई चिन्ता नहीं लंगोटे से भी काम चल सकता है, अच्छा लाओ कमरबन्द खोलो।

दोनों भाइयों ने कमरबन्द खोलने के बाद दोनों को एक साथ जोड़ा और उसका एक सिरा दरवाजे में लगे हुए सींकचे के साथ बांधकर दोनों भाई बारी-बारी से नीचे लटक गये।

कमरबन्द ने आधी दूर तक दोनों भाइयों को पहुंचा दिया इसके बाद दोनों भाइयों को कूद जाना पड़ा। कूदने के साथ ही नीचे एक झाड़ी के अन्दर से आवाज आई, ''शाबाश! इतनी ऊंचाई से कूद पड़ना आप ही लोगों का काम है। मगर अब किशोरी, कामिनी इत्यादि से मुलाकात नहीं हो सकती।''

जितने आदमी कमन्द के सहारे इस बाग में लटकाये गये थे और जिन सभों को यहां छोड़ आनन्दसिंह अपने भाई को बुलाने के लिए ऊपर गये थे उन सभों को मौजूद न पाकर और इस शाबाशी देने वाली आवाज को सुनकर दोनों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ। दोनों भाई चारों तरफ घूम-घूमकर देखने लगे मगर किसी की सूरत नजर न पड़ी, हां एक पेड़ के नीचे सर्यू को बेहोश पड़े हुए जरूर देखा जिससे उन दोनों का ताज्जुब और भी ज्यादे हो गया।

इन्द्र - (आनन्दसिंह से) यह सब खराबी तुम्हारी जरा-सी भूल के सबब से हुई!

आनन्द - निःसन्देह ऐसा ही है।

इन्द्र - पहिले सर्यू को होश में लाने की फिक्र करो, शायद इसकी जुबानी कुछ मालूम हो।

आनन्द - जो आज्ञा।

इतना कहकर आनन्दसिंह सर्यू को होश में लाने का उद्योग करने लगे। थोड़ी देर में सर्यू की बेहोशी जाती रही और इतने ही में सुबह की सफेदी ने भी अपनी सूरत दिखाई।

इन्द्रजीत - (सर्यू से) तुम्हें किसने बेहोश किया?

सर्यू - एक नकाबपोश ने आकर एक चादर जबर्दस्ती मेरे ऊपर डाल दी जिससे मैं बेहोश हो गई। मैं दूर से सब तमाशा देख रही थी। जब आप कमन्द के सहारे ऊपर चढ़ गये और उसके कुछ देर बाद छोटे कुमार भी आपको कई दफे पुकारने के बाद उसी कमन्द के सहारे ऊपर चढ़ गये तब उन्हीं में से एक नकाबपोश ने उन सभों को सचेत किया जो (हाथ का इशारा करके) उस जगह बेहोश पड़े हुए थे या जो ऊपर से लटकाए गये थे। इसके बाद सब कोई मिलकर उस (हाथ से बताकर) दीवार की तरफ गए और कुछ देर तक आपस में बातें करते रहे। इसी बीच में छिपकर उनकी बातें सुनने की नीयत से मैं भी धीरे-धीरे अपने को छिपाती हुई उस तरफ बढ़ी मगर अफसोस वहां तक पहुंचने भी न पाई थी कि एक नकाबपोश मेरे सामने आ पहुंचा और उसने उसी ढंग से मुझे बेहोश कर दिया जैसा कि मैं अभी कह चुकी हूं। शायद उसी बेहोशी की अवस्था में मैं इस जगह पहुंचाई गई।

सर्यू की बातें सुनकर दोनों कुमार कुछ देर तक सोचते रहे, इसके बाद सर्यू को साथ लिए उसी दीवार की तरफ गये जिधर उन लोगों का जाना सर्यू ने बताया था जो कमन्द के सहारे इस बाग में उतरे या उतारे गये थे। जब वहां पहुंचे तो देखा कि दीवार की लम्बाई के बीचोंबीच में एक दरवाजे का निशाना बना हुआ है और उसके पास ही में नीचे की जमीन कुछ खुदी हुई है।

आनन्द - (इन्द्रजीतसिंह से) देखिए यहां की जमीन उन लोगों ने खोदी और तिलिस्म के अन्दर जाने का दरवाजा निकाला है क्योंकि दीवार में अब वह गुण तो रहा नहीं जो उन लोगों को ऐसा करने से रोकता।

इन्द्र - बेशक यह वही दरवाजा है जिस राह से हम लोग तिलिस्म के दूसरे दर्जे में जाने वाले थे! मगर इससे तो जाना जाता है कि वे लोग तिलिस्म के अन्दर घुस गये!

आनन्द - जरूर ऐसा ही है और यह काम सिवाय गोपाल भाई के दूसरा कोई नहीं कर सकता, अस्तु अब मैं जरूर यह कहने की हिम्मत करूंगा कि वह कोई दूसरा नहीं था जिसके कहे मुताबिक मैं आपको बुलाने के लिए मकान के ऊपर चला गया था।

इन्द्र - तुम्हारी बात मान लेने की इच्छा तो होती है मगर क्या तुम उस खास निशान को देखकर भी कह सकते हो कि वह चीठी गोपाल भाई की नहीं थी जो मुझे मकान में कमरे के अन्दर मिली थी!

आनन्द - जी नहीं, यह तो मैं कदापि नहीं कह सकता कि वह चीठी किसी दूसरे की लिखी हुई थी, मगर यह खयाल भी मेरे दिल से दूर नहीं हो सकता कि उन्हीं (गोपालसिंह) की आज्ञा से आपको बुलाने गया था।

इन्द्र - हो सकता है, तो क्या उन्होंने हम लोगों के साथ चालाकी की!

आनन्द - जो हो!

इन्द्र - यदि ऐसा ही है तो उनकी लिखावट पर भरोसा करके यही हम कैसे कह सकते हैं कि किशोरी, कामिनी इत्यादि इस बाग में पहुंच गई थीं।

आनन्द - क्या यह हो सकता है कि वह तिलिस्मी किताब जो गोपाल भाई के पास थी हमारे किसी दुश्मन के हाथ लग गई और वह उस किताब की मदद से अपने साथियों सहित यहां पहुंचकर हम लोगों को नुकसान पहुंचाने की नीयत से तिलिस्म के अन्दर चला गया है?

इन्द्र - यह तो हो सकता है कि उनकी किताब किसी दुश्मन ने चुरा ली हो मगर यह नहीं हो सकता कि उसका मतलब भी हर कोई समझ ले। खुद मैं ही 'रक्तग्रंथ' का मतलब ठीक-ठीक नहीं समझ सकता था, आखिर जब उन्होंने बताया तब कहीं तिलिस्म के अन्दर जाने लायक हुआ। (कुछ रुककर) आज के मामले तो कुछ अजब बेढंगे दिखाई दे रहे हैं... खैर कोई चिन्ता नहीं, आखिर हम लोगों को इस दरवाजे की राह तिलिस्म के अन्दर जाना ही है, चलो फिर जो कुछ होगा देखा जायेगा!

आनन्द - यद्यपि सूर्योदय हो जाने के कारण प्रातः कृत्य से छुट्टी पा लेना आवश्यक जान पड़ता है, यह सोचकर कि जाने कैसा मौका आ पड़े तथापि आज्ञानुसार तिलिस्म के अन्दर चलने के लिए मैं तैयार हूं, चलिए।

आनन्दसिंह की बात सुनकर इन्द्रजीतसिंह कुछ गौर में पड़ गए और कुछ सोचने के बाद बोले, ''कोई चिन्ता नहीं, जो कुछ होगा देखा जायगा।''

दीवार के नीचे जो जमीन खुदी हुई थी उसकी लम्बाई-चौड़ाई पांच-पांच गज से ज्यादे न थी। मिट्टी हट जाने के कारण एक पत्थर की पटिया (ताज्जुब नहीं कि वह लोहे या पीतल की हो) दिखाई दे रही थी और उसे उठाने के लिए बीच में लोहे की कड़ी लगी हुई थी जिसका एक सिरा दीवार के साथ सटा हुआ था। इन्द्रजीतसिंह ने कड़ी में हाथ डालकर जोर किया और उस पटिया (छोटी चट्टान) को उठाकर किनारे पर रख दिया। नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां दिखाई दीं और दोनों भाई सर्यू को साथ लिए नीचे उतर गए।

लगभग बीस सीढ़ी के नीचे उतर जाने के बाद एक छोटी कोठरी मिली जिसकी जमीन किसी धातु की बनी हुई थी और खूब चमक रही थी। ऊपर दो-तीन सुराख (छेद) भी इस ढंग से बने हुए थे जिससे दिन भर उस कोठरी में कुछ - कुछ रोशनी रह सकती थी। आनन्दसिंह ने चारों तरफ गौर से देखकर इन्द्रजीतसिंह से कहा, 'भैया, रक्तग्रंथ में लिखा था कि यह कोठरी तुम्हें तिलिस्म के अन्दर पहुंचावेगी, मगर समझ में नहीं आता कि यह कोठरी किस तरह से हम लोगों को तिलिस्म के अन्दर पहुंचावेगी क्योंकि इसमें न तो कहीं दरवाजा दिखाई देता है और न कोई ऐसा निशान ही मालूम पड़ता है जिसे हम लोग दरवाजा बनाने के काम में लावें।''

इन्द्र - हम भी इसी सोच-विचार में पड़े हुए हैं मगर कुछ समझ में नहीं आता है।

इसी बीच में दोनों कुमार और सर्यू के पैरों में झुनझुनी और कमजोरी मालूम होने लगी और वह बात की बात में इतनी ज्यादे बढ़ी कि वे लोग वहां से हिलने लायक भी न रहे। देखते-देखते तमाम बदन में सनसनाहट और कमजोरी ऐसी बढ़ गई कि वे तीनों बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े और फिर तनोबदन की सुध न रही।

घण्टे भर के बाद कुंअर इन्द्रजीतसिंह की बेहोशी जाती रही और वह उठकर बैठ गए मगर चारों तरफ घोर अन्धकार छाया रहने के कारण यह नहीं जान सकते थे कि वे किस अवस्था में या कहां पड़े हुए हैं। सबसे पहिले उन्हें तिलिस्मी खंजर की फिक्र हुई, कमर में हाथ लगाने पर उसे मौजूद पाया अस्तु उसे निकालकर और उसका कब्जा दबाकर रोशनी पैदा की और ताज्जुब की निगाह से चारों तरफ देखने लगे।

जिस स्थान में इस समय कुमार थे वह सुर्ख पत्थर से बना हुआ था और यहां की दीवारों पर पत्थर के गुलबूटों का काम बहुत खूबी, खूबसूरती और कारीगरी का अनूठा नमूना दिखाने वाला बना हुआ था। चारों तरफ की दीवार में चार दरवाजे थे मगर उनमें किवाड़ के पल्ले लगे हुए न थे। पास ही कुंअर आनन्दसिंह भी पड़े हुए थे। परन्तु सर्यू का कहीं पता न था जिससे कुमार को बहुत ही ताज्जुब हुआ। उसी समय आनन्दसिंह की बेहोशी भी जाती रही और वे उठकर घबराहट के साथ चारों तरफ देखते हुए कुंअर इन्द्रजीत के पास आकर बोले -

आनन्द - हम लोग यहां क्योंकर आये?

इन्द्रजीत - मुझे मालूम नहीं तुमसे थोड़ी ही देर पहिले मैं होश में आया हूं और ताज्जुब के साथ चारों तरफ देख रहा हूं।

आनन्द - और सर्यू कहां चली गई?

इन्द्रजीत - यह भी नहीं मालूम, तुम चारों तरफ की दीवारों में चार दरवाजे देख रहे हो, शायद वह हमसे पहिले होश में आकर इन दरवाजों में से किसी एक के अन्दर चली गई हो।

आनन्द - शायद ऐसा ही हो, चलकर देखना चाहिए। रक्तग्रंथ का कहा बहुत ठीक निकला, आखिर उसी कोठरी ने हम लोगों को यहां पहुंचा दिया मगर किस ढंग से पहुंचाया सो मालूम नहीं होता! (छत की तरफ देखकर) शायद वह कोठरी इसके ऊपर हो और उसकी छत ने नीचे उतरकर हम लोगों को यहां लुढ़का दिया हो!

इन्द्रजीत - (कुछ मुस्कुराकर) शायद ऐसा ही हो, मगर निश्चय नहीं कह सकते, हां अब व्यर्थ न खड़े रहकर सर्यू और नकाबपोशों का पता लगाना चाहिए।

इन्द्रजीतसिंह ने इतना कहा ही था कि दीवार वाले एक दरवाजे के अन्दर से आवाज आई, ''बेशक, बेशक!!''

 

बयान - 13

''बेशक, बेशक'' की आवाज ने दोनों कुमारों को चौंका दिया। वह आवाज सर्यू की न थी और न किसी ऐसे आदमी की थी जिसे कुमार पहिचानते हों, यह सबब उनके चौंकने का और भी था। दोनों कुमारों को निश्चय हो गया कि यह आवाज उन्हीं नकाबपोशों में से किसी की है जो तिलिस्म के अन्दर लटकाये गये थे और जिन्हें हम लोग खोज रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि सर्यू भी इन्हीं लोगों के सबब से गायब हो गई हो क्योंकि एक कमजोर औरत की बेहोशी हम लोगों की बनिस्बत जल्द दूर नहीं हो सकती।

दोनों भाइयों के विचार एक से थे अतएव दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और इसके बाद इन्द्रजीतसिंह और उनके पीछे-पीछे आनन्दसिंह उस दरवाजे के अन्दर चले गए जिसमें किसी के बोलने की आवाज आई थी।

कुछ आगे जाने पर कुमार को मालूम हुआ कि रास्ता सुरंग के ढंग का बना हुआ है मगर बहुत छोटा और केवल एक ही आदमी के जाने लायक है अर्थात् इसकी चौड़ाई डेढ़ हाथ से ज्यादे नहीं है।

लगभग बीस हाथ जाने के बाद दूसरा दरवाजा मिला जिसे लांघकर दोनों भाई एक छोटे से बाग में गये जिसमें सब्जी की बनिस्बत इमारत का हिस्सा बहुत ज्यादे था अर्थात् उसमें कई दालान-कोठरियां और कमरे थे जिन्हें देखते ही इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, ''इसके अन्दर थोड़े आदमियों का पता लगाना भी कठिन होगा।''

दोनों कुमार दो ही चार कदम आगे बढ़े थे कि पीछे से दरवाजे के बन्द होने की आवाज आई, घूमकर देखा तो उस दरवाजे को बन्द पाया जिसे लांघकर इस बाग में पहुंचे थे। दरवाजा लोहे का और एक ही पल्ले का था जिसने चूहेदानी की तरह ऊपर से गिरकर दरवाजे का मुंह बन्द कर दिया। उस दरवाजे के पल्ले पर मोटे-मोटे अक्षरों में यह लिखा हुआ था -

''तिलिस्म का यह हिस्सा टूटने लायक नहीं है, हां तिलिस्म को तोड़ने वाला यहां का तमाशा जरूर देख सकता है।''

इन्द्रजीत - यद्यपि तिलिस्मी तमाशे दिलचस्प होते हैं मगर हमारा यह समय बड़ा नाजुक है और तमाशा देखने योग्य नहीं क्योंकि तरह-तरह के तरद्दुदों ने दुःखी कर रक्खा है। देखा चाहिए इस तमाशाबीनी से छुट्टी कब मिलती है।

आनन्द - मेरा भी यही खयाल है बल्कि मुझे तो इस बात का अफसोस है कि इस बाग में क्यों आए, अगर किसी दूसरे दरवाजे के अन्दर गये होते तो अच्छा होता।

इन्द्रजीत - (कुछ आगे बढ़कर ताज्जुब से) देखो तो सही उस पेड़ के नीचे कौन बैठा है! कुछ पहिचान सकते हो?

आनन्द - यद्यपि पोशाक में बहुत बड़ा फर्क है मगर सूरत भैरोसिंह की-सी मालूम पड़ती है!

इन्द्रजीत - मेरा भी यही खयाल है, आओ इसके पास चलकर देखें।

आनन्द - चलिये।

इस बाग के बीचोंबीच में एक कदम्ब का बहुत बड़ा पेड़ था जिसके नीचे एक आदमी गाल पर हाथ रक्खे बैठा हुआ कुछ सोच रहा था। उसी को देखकर दोनों कुमार चौंके थे और उस पर भैरोसिंह के होने का शक हुआ था। जब दोनों भाई उसके पास पहुंचे तो शक जाता रहा और अच्छी तरह पहिचानकर इन्द्रजीतसिंह ने पुकारा और कहा, ''क्यों यार भैरोसिंह, तुम यहां कैसे आ पहुंचे?'

बस आदमी ने सिर उठाकर ताज्जुब से दोनों कुमारों की तरफ देखा और तब हलकी आवाज में जवाब दिया, ''तुम दोनों कौन हो मैं तो सात वर्ष से यहां रहता हूं मगर आज तक किसी ने भी मुझसे यह न पूछा कि तुम यहां कैसे आ पहुंचे?'

आनन्द - कुछ पागल तो नहीं हो गये हो?

इन्द्रजीत - क्योंकि तिलिस्म की हवा बड़े-बड़े चालाकों और ऐयारों को पागल बना देती है!

भैरो - (शायद वह भैरोसिंह ही हो) कदाचित् ऐसा ही हो मगर मुझे आज तक किसी ने यह भी नहीं कहा कि तू पागल हो गया है! मेरी स्त्री भी यहां रहती है। वह भी मुझे बुद्धिमान ही समझती है।

आनन्द - (मुस्कराकर) तुम्हारी स्त्री कहां है उसे मेरे सामने बुलाओ, मैं उससे पूछूंगा कि वह तुम्हें पागल समझती है या नहीं।

भैरो - वाह-वाह, तुम्हारे कहने से मैं अपनी स्त्री को तुम्हारे सामने बुला लूं! कहीं तुम उस पर आशिक हो जाओ या वही तुम पर मोहित हो जाय तो क्या हो?

इन्द्रजीत - (हंसकर) वह भले ही मुझ पर आशिक हो जाय मगर मैं वादा करता हूं कि उस पर मोहित न होऊंगा।

भैरो - सम्भव है कि मैं तुम्हारी बातों पर विश्वास कर लूं मगर उसकी नौजवानी मुझे उस पर विश्वास नहीं करने देती। अच्छा ठहरो, मैं उसे बुलाता हूं। अरी ए री मेरी नौजवान स्त्री भोली ई...ई...ई...!!

एक तरफ से आवाज आई, ''मैं आप ही चली आ रही हूं, तुम क्यों चिल्ला रहे हो कम्बख्त को जब देखो 'भोली भोली' करके चिल्लाया करता है!''

भैरो - देखो कम्बख्त को! साठ घड़ी में एक पल भी सीधी तरह से बात नहीं करती, खैर नौजवान औरतें ऐसी हुआ ही करती हैं!

इतने में दोनों कुमारों ने देखा कि बाईं तरफ से एक नब्बे वर्ष की बुढ़िया छड़ी टेकती धीरे-धीरे चली आ रही है जिसे देखते ही भैरोसिंह उठा और यह कहता हुआ उसकी तरफ बढ़ा, ''आओ मेरी प्यारी भोली, तुम्हारी नौजवानी तुम्हें अकड़कर चलने नहीं देती तो मैं अपने हाथों का सहारा देने के लिए तैयार हूं।''

भैरोसिंह ने बुढ़िया को हाथ का सहारा देकर अपने पास ला बैठाया और आप भी उसी जगह बैठकर बोला, ''मेरी प्यारी भोली, देखो ये दो नये आदमी आज यहां आये हैं जो मुझे पागल बताते हैं। तू ही बता कि क्या मैं पागल हूं?'

बुढ़िया - राम-राम, ऐसा भी कभी हो सकता है मैं अपनी नौजवानी की कसम खाकर कहती हूं कि तुम्हारे ऐसे बुद्धिमान बुड्ढे को पागल कहने वाला स्वयं पागल है! (दोनों कुमारों की तरफ देखकर) ये दोनों उजड्ड यहां कैसे आ पहुंचे क्या किसी ने इन्हें रोका नहीं?

भैरो - मैंने इनसे अभी कुछ भी नहीं पूछा कि ये कौन हैं और यहां कैसे आ पहुंचे क्योंकि मैं तुम्हारी मुहब्बत में डूबा हुआ तरह-तरह की बातें सोच रहा था, अब तुम आई हो तो जो कुछ पूछना हो स्वयं पूछ लो।

बुढ़िया - (कुमारों से) तुम दोनों कौन हो?

भैरो - (कुमारों से) बताओ-बताओ, सोचते क्या हो आदमी हो, जिन्न हो, भूत हो, प्रेत हो, कौन हो, कहते क्यों नहीं! क्या तुम देखते नहीं कि मेरी नौजवान स्त्री को तुमसे बात करने में कितना कष्ट हो रहा है?

भैरोसिंह और उस बुढ़िया की बातचीत और अवस्था पर दोनों कुमारों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और कुछ सोचने के बाद इन्द्रजीतसिंह ने भैरोसिंह से कहा, ''अब मुझे निश्चय हो गया कि जरूर तुम्हें किसी ने इस तिलिस्म में ला फंसाया है और ऐसी चीज खिलाई या पिलाई है कि जिससे तुम पागल हो गए हो, ताज्जुब नहीं कि यह सब बदमाशी इसी बुढ़िया की हो, अब अगर तुम होश में न आओगे तो मैं तुम्हें मार-पीटकर होश में लाऊंगा।'' इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह भैरोसिंह की तरफ बढ़े, मगर उसी समय बुढ़िया ने यह कहकर चिल्लाना शुरू किया, ''दौड़ियो दौड़ियो, हाय रे, मारा रे, मारा रे, चोर चोर, डाकू डाकू, दौड़ो दौड़ो, ले गया, ले गया, ले गया!''

बुढ़िया चिल्लाती रही मगर कुमार ने उसकी एक भी न सुनी और भैरोसिंह का हाथ पकड़के अपनी तरफ खेंच ही लिया, मगर बुढ़िया का चिल्लाना भी व्यर्थ न गया। उसी समय चार-पांच खूबसूरत लड़के दौड़ते हुए वहां आ पहुंचे जिन्होंने दोनों कुमारों को चारों तरफ से घेर लिया। उन लड़कों के गले से छोटी-छोटी झोलियां लटक रही थीं और उनमें आटे की तरह की कोई चीज भरी हुई थी। आने के साथ ही इन लड़कों ने अपनी झोली में से वह आटा निकाल-निकालकर दोनों कुमारों की तरफ फेंकना शुरू किया।

निःसन्देह उस बुकनी में तेज बेहोशी का असर था जिसने दोनों कुमारों को बात की बात में बेहोश कर दिया और दोनों चक्कर खाकर जमीन पर लेट गये। जब आंख खुली तो दोनों ने अपने को एक सजे-सजाये कमरे में फर्श के ऊपर पड़े पाया।

 

बयान - 14

जिस कमरे में दोनों कुमारों की बेहोशी दूर हो जाने के कारण आंख खुली थी वह लम्बाई में बीस और चौड़ाई में पन्द्रह गज से कम न था। इस कमरे की सजावट कुछ विचित्र ढंग की थी और दीवारों में भी एक तरह का अनूठापन था। रोशनी के शीशों (हंडों और कन्दीलों) की जगह उसमें दो-दो हाथ लम्बी तरह-तरह की खूबसूरत पुतलियां लटक रही थीं और दीवारगीरों की जगह पचासों किस्म के जानवरों के चेहरे दीवारों से लगे हुए थे। दीवारें इस कमरे की लहरदार बनी हुई थीं और उन पर तरह-तरह की चित्रकारी की हुई थी। ऊपर की तरफ छत से कुछ नीचे हटकर चारों तरफ छोटी-छोटी खिड़कियां थीं जिससे जान पड़ता था कि ऊपर की तरफ गुलामगर्दिश या मकान है मगर इस समय सब खिड़कियां बन्द थीं और इस कमरे में से कोई रास्ता ऊपर जाने का नहीं दिखाई देता था।

कुंअर आनन्दसिंह ने इन्द्रजीतसिंह से कहा, ''भैया, वह बुढ़िया तो अजब आफत की पुड़िया मालूम होती है। और उन लड़कों की तेजी भी भूलने योग्य नहीं है।''

इन्द्रजीत - बेशक ऐसा ही है! ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने हम लोगों को जीता छोड़ दिया। मगर हमें भैरोसिंह की बातों पर आश्चर्य मालूम होता है! क्या हम उसे वास्तव में कोई ऐयार समझें?

आनन्दसिंह - यदि वह ऐयार होता तो निःसन्देह हम लोगों को धोखा देने के लिये भैरोसिंह बना होता और साथ ही इसके पोशाक भी वैसी ही रखता जैसी भैरोसिंह पहिरा करता है, इसके सिवाय वह स्वयं अपने को भैरोसिंह प्रकट करके हम लोगों का साथी बनता, ऐसा न कहता कि मैं भैरोसिंह नहीं हूं। मगर उसकी नौजवान औरत (बुढ़िया) के विषय में...।

इन्द्रजीत - उस बुढ़िया की बात जाने दो, अगर वह वास्तव में भैरोसिंह है तो ताज्जुब नहीं कि मसखरापन करता है या पागल हो गया है और अगर वह पागल हो गया है तो निःसंदेह उस बुढ़िया की बदौलत जो उसकी आंखों में अभी नौजवान बनी हुई है।

आनन्द - उस बुढ़िया को जिस तरह हो गिरफ्तार करना चाहिए।

इन्द्रजीत - मगर उसके पहिले अपने को बेहोशी से बचाने का बन्दोबस्त कर लेना चाहिए क्योंकि लड़ाई-दंगे से तो हम लोग डरते ही नहीं।

आनन्द - जी हां, जरूर ऐसा करना चाहिए। दवा तो हम लोगों के पास मौजूद ही है और ईश्वर की कृपा से कमरे का दरवाजा भी खुला है।

दोनों भाइयों ने कमर से एक डिबिया निकाली जिसमें किसी तरह की दवा थी और उसे खाने के बाद कमरे के बाहर निकला ही चाहते थे कि ऊपर वाले छोटे-छोटे दरवाजों में से एक दरवाजा खुला और पुनः उसी नौजवान बुढ़िया के खसम भैरोसिंह की सूरत दिखाई दी। दोनों भाई रुक गये और आनन्दसिंह ने उसकी तरफ देखकर कहा, ''अब आप यहां क्यों आ पहुंचे?'

भैरो - आपके हालचाल की खबर लेने और साथ ही इसके अपनी नौजवान औरत की तरफ से आपको ज्याफत का न्योता देने आया हूं। मालूम होता है कि वह तुम लोगों पर आशिक हो गई है तभी खातिरदारी का बन्दोबस्त कर रही है। उसने तुम लोगों के लिए कितनी अच्छी-अच्छी चीजें खाने की तैयार की हैं और अभी तक बनाती ही जाती है।

आनन्द - (हंसकर) और उन चीजों में जहर कितना मिलाया है?

भैरो - केवल डेढ़ छटांक, मैं उम्मीद करता हूं कि इतने से तुम लोगों की जान न जायेगी।

आनन्द - आपकी इस कृपा के लिए मैं धन्यवाद देता हूं और आपसे बहुत ही प्रसन्न होकर आपको कुछ इनाम दिया चाहता हूं, आप मेहरबानी करके जरा यहां आइये तो अच्छी बात है।

भैरो - बहुत अच्छा, इनाम लेने में देर करना भले आदमियों का काम नहीं है।

इतना कहकर भैरोसिंह वहां से हट गया और थोड़ी ही देर बाद सदर दरवाजे की राह से कमरे के अन्दर आता हुआ दिखाई दिया। जब कुंअर आनन्दसिंह के पास आया तो बोला, ''लाइये क्या इनाम देते हैं।''

आनन्दसिंह ने फुर्ती से तिलिस्मी खंजर उसके हाथ पर रख दिया जिसके असर से वह एक दफे कांपा और बेहोश होकर जमीन पर लम्बा हो गया। तब आनन्दसिंह ने अपने भाई से कहा, ''अब इसे अच्छी तरह जांचकर देख लेना चाहिए कि यह भैरोसिंह ही है या कोई और?'

इन्द्रजीत - हां, अब बखूबी पता लग जायगा, पहिले इसके दाहिनी बगल वाला मसा देखो।

आनन्द - (भैरोसिंह की बगल देखकर) देखिये मसा मौजूद है। अब कमर वाला दाग देखिये - लीजिए यह भी मौजूद है। इसके भैरोसिंह होने में अब मुझे तो किसी तरह का सन्देह नहीं रहा।

इन्द्रजीत - अब सन्देह हो ही नहीं सकता, मैंने इस मसे को अच्छी तरह खेंचकर भी देख लिया, अच्छा इसे होश में लाना चाहिए।

इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने अपना वह हाथ जिसमें तिलिस्मी खंजर के जोड़ की अंगूठी थी भैरोसिंह के बदन पर फेरा भैरोसिंह तुरन्त होश में आकर उठ बैठा और ताज्जुब से चारों तरफ देखता हुआ बोला, ''वाह-वाह! मैं यहां क्योंकर आ गया और आप लोगों ने मुझे कहां पाया?'

आनन्द - मालूम होता है अब आपका पागलपन उतर गया?

भैरो - (ताज्जुब से) पागलपन कैसा?

इन्द्रजीत - इसके पहिले तुम किस अवस्था में थे और क्या करते थे, कुछ याद है?

भैरो - मुझे कुछ भी याद नहीं।

इन्द्रजीत - अच्छा बताओ कि तुम इस तिलिस्म के अन्दर कैसे आ पहुंचे?

भैरो - केवल मुझी को नहीं बल्कि किशोरी, कामिनी, कमला, लक्ष्मीदेवी, लाडिली, कमलिनी और इन्दिरा को भी राजा गोपालसिंह ने इस तिलिस्म के अन्दर पहुंचा दिया है, बल्कि मुझे तो सबके आखीर में पहुंचाया है। आपके नाम की एक चीठी भी दी थी मगर अफसोस! आपसे मुलाकात होने न पाई और मेरी अवस्था बदल गई।

इन्द्रजीत - वह चीठी कहां है?

भैरो - (इधर-उधर देखकर) जब मेरे बटुए ही का पता नहीं तो चीठी के बारे में क्या कह सकता हूं।

आनन्द - मगर यह तो तुम्हें याद होगा कि उस चीठी में क्या लिखा था?

भैरो - क्यों नहीं, मेरे सामने ही तो वह लिखी गई थी। उसमें कोई विशेष बात न थी, केवल इतना ही लिखा था कि 'उस गुप्त स्थान से किशोरी, कामिनी इत्यादि को लेकर मैं जमानिया जा रहा था मगर मायारानी की कुटिलता के कारण अपने इरादे में बहुत कुछ उलट-फेर करना पड़ा। जब यह मालूम हुआ कि मायारानी तिलिस्मी बाग के अन्दर घुस गई है तब लाचार सब औरतों को तिलिस्म के अन्दर पहुंचाता हूं। बाकी हाल भैरोसिंह से सुन लेना' - बस इतना लिखा था। मालूम होता है कि पहिले का हाल वह आपसे कह चुके हैं।

इन्द्रजीत - हां पहिले का बहुत कुछ हाल वह हमसे कह चुके हैं।

भैरो - क्या यह भी कहा था कि कृष्णाजिन्न का रूप भी उन्हीं कृपानिधान ने धारण किया था?

आनन्द - नहीं सो तो साफ नहीं कहा था मगर उनकी बातों से हम लोग कुछ-कुछ समझ गये थे कि कृष्णाजिन्न वही बने थे, खैर अब तुम खुलासा बताओ कि क्या हुआ?

भैरोसिंह ने वह सब हाल दोनों कुमारों से कहा जो ऊपर के बयानों में लिखा जा चुका है और जिसका बहुत कुछ हाल राजा गोपालसिंह की जुबानी दोनों कुमार सुन चुके थे। इसके बाद भैरोसिंह ने कहा - ''जब राजा गोपालसिंह को मालूम हो गया कि मायारानी बहुत से आदमियों को लेकर तिलिस्मी बाग के अन्दर जा छिपी है तब वे एक गुप्त राह से छिपकर सब औरतों को साथ लिये हुए उस मकान में पहुंचे जिसमें से कमन्द के सहारे सभों को लटकाते हुए शायद आपने देखा होगा।''

इन्द्रजीत - हां देखा था, तो क्या उस समय वे औरतें बेहोश थीं?

भैरो - जी हां, न मालूम किस खयाल से उन्होंने सब औरतों को बेहोश कर दिया था मगर इसके पहिले यह कह दिया था कि तुम्हें तिलिस्म के अन्दर पहुंचा देते हैं जहां दोनों कुमार हैं। यद्यपि वहां पहुंचना बहुत कठिन था मगर अब एक दीवार वाले तिलिस्म को दोनों कुमार तोड़ चुके हैं इसलिए वहां तक पहुंचा देने में कोई कठिनता न रही!

इन्द्र - तो क्या तुम भी उन औरतों के साथ ही उस बाग में उतारे गये थे?

भैरो - पहिले तो उन्होंने इन्द्रदेव को बहुत-सी बातें समझाईं-बुझाईं जिन्हें मैं समझ न सका। इसके बाद इन्द्रदेव को तो गोपालसिंह बनाया और इन्द्रदेव के एक ऐयार को भैरोसिंह बनाकर दोनों को खास बाग के अन्दर भेजा। इस काम से छुट्टी पाकर सब औरतों को और मुझे एक साथ लिए उस मकान में आये। सभों को तो उस कमरे में बैठा दिया जिसमें से कमंद के सहारे सबको लटकाया था और मुझे उनकी हिफाजत के लिए छोड़ने के बाद कमलिनी को साथ लिये हुए कहीं चले गये और घण्टे-भर के बाद वापस आये। उस समय कमलिनी के हाथ में एक छोटी-सी किताब थी जिसे उन्होंने कई दफे तिलिस्मी किताब के नाम से सम्बोधन किया था। इसके बाद उन्होंने सभी को बेहोश करके नीचे लटका दिया। इस काम से छुट्टी पाकर उन्होंने आपके नाम की दो चीठियां लिखीं, एक तो उसी कमरे में रक्खी और दूसरी चीठी जिसका मैं अभी जिक्र कर चुका हूं मुझे देकर कहा कि 'जब कुमारों से तुम्हारी मुलाकात हो तो यह चीठी उन्हें देना और सब काम कमलिनी की आज्ञानुसार करना, यहां तक कि यदि कमलिनी तुम्हें सामना हो जाने पर भी कुमारों से मिलने के लिए मना करे तो तुम कदापि न मिलना' इत्यादि कहकर मुझे नीचे उतर जाने के लिए कहा (कुछ रुककर) नहीं-नहीं, मैं भूलता हूं, मुझे उन्होंने पहिले ही नीचे उतार दिया था क्योंकि सभों की गठरी मैंने ही नीचे से थामी थी, सभों को नीचे उतार देने के बाद जब मैं उनकी आज्ञानुसार पुनः ऊपर गया तब उन्होंने ये सब बातें मुझे समझाईं और आपके इन्द्रदेव भी वहां आ पहुंचे जो गोपालसिंह की सूरत बने हुए थे। इन्द्रदेव ने राजा गोपालसिंह से कुछ कहना चाहा मगर उन्होंने रोक दिया और मुझसे कहा कि अब तुम भी कमन्द के सहारे नीचे उतर जाओ और इन्द्रदेव के आने का इन्तजार करो। मैं उनकी आज्ञानुसार नीचे उतर आया। मैं अन्दाज से कहता हूं कि उन बेहोशों में आप या छोटे कुमार छिपे थे और आप ही दोनों में से किसी ने मेरे बदन के साथ तिलिस्मी खंजर लगाया था जिससे मैं बेहोश हो गया।

इन्द्र - हां ठीक है, ऐसा ही हुआ था।

भैरो - फिर तो मैं बेहोश हो ही गया, मुझे कुछ भी नहीं मालूम कि इन्द्रदेव जो गोपालसिंह की सूरत में थे कब नीचे आये या क्या हुआ।

आनन्द - ठीक है, वह भी थोड़ी ही देर बाद नीचे उतरे और तुम्हारी तरह से वह भी बेहोश किए गए। (इन्द्रजीतसिंह से) अब मालूम हुआ कि इन्द्रदेव ही के कहे मुताबिक मैं आपको बुलाने के लिए ऊपर गया था।

भैरो - हां जब हम लोगों को उन्होंने चैतन्य किया तो कहा था कि दोनों कुमार ऊपर गए हैं। आखिर इन्द्रदेव ने कमन्द खींच ली और हम लोगों को लिये हुए दूसरी दीवार की तरफ गए। वहां कमलिनी ने जमीन खोदकर एक दरवाजा पैदा किया। ताज्जुब नहीं कि उसी दरवाजे की राह से आप लोग भी यहां तक आये हों और अगर ऐसा है तो उस कोठरी में भी अवश्य पहुंचे होंगे जहां की जमीन लोगों को बेहोश करके तिलिस्म के अन्दर पहुंचा देती है!

आनन्द - हम लोग भी उसी रास्ते से यहां तक आये हैं, अच्छा तो क्या इन्द्रदेव भी तुम लोगों के साथ यहां आये हैं?

भैरो - जी नहीं, वह तो ऊपर ही रह गये, बोले कि मुझे तिलिस्म के अन्दर जाने की आज्ञा नहीं है। तुम लोग जाओ मैं इसी बाग में छिपकर रहूंगा, जब दोनों कुमार यहां आ जायेंगे तब उनसे छिपकर पुनः कमन्द के सहारे ऊपर जाऊंगा और राजा गोपालसिंह के साथ मिलकर काम करूंगा।

आनन्द - (इन्द्रजीतसिंह से) तब ताज्जुब नहीं कि इन्द्रदेव ने ही सर्यू को बेहोश किया हो!

इन्द्र - जरूर ऐसा ही है, (भैरो से) अच्छा तब क्या हुआ?

भैरो - नीचे उतरकर जब हम लोग उस कोठरी में पहुंचे जहां की जमीन थोड़ी ही देर में लोगों को बेहोश कर देती है तब नियमानुसार सभों के साथ मैं भी बेहोश हो गया। उस समय से इस समय तक का हाल मुझे कुछ भी मालूम नहीं है, मैं बिल्कुल नहीं जानता कि इसके बाद क्या हुआ और मैं किस अवस्था में होकर क्यों इस तरह अपने को यहां पाता हूं।

 

बयान - 15

भैरोसिंह की बातें सुनकर दोनों कुमार देर तक तरह-तरह की बातें सोचते रहे और तब उन्होंने अपना किस्सा भैरोसिंह से कह सुनाया। बुढ़िया वाली बात सुनकर भैरोसिंह हंस पड़ा और बोला, ''मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है कि वह बुढ़िया कौन और कहां है, यदि अब मैं उसे पाऊं तो जरूर उसकी बदमाशी का मजा उसे चखाऊं। मगर अफसोस तो यह है कि मेरा ऐयारी का बटुआ मेरे पास नहीं है जिसमें बड़ी-बड़ी अनमोल चीजें थीं। हाय, वे तिलिस्मी फूल भी उसी बटुए में थे जिसके देने से मेरा बाप भी मुझे टल्ली बताया चाहता था मगर महाराज ने दिलवा दिया। इस समय बटुए का न होना मेरे लिए बड़ा दुखदाई है। क्योंकि आप कह रहे हैं कि ''उन लड़कों ने एक तरह की बुकनी उड़ाकर हमें बेहोश कर दिया। कहिए अब मैं क्योंकर अपने दिल का हौसला निकाल सकता हूं?'

इन्द्र - निःसन्देह उस बटुए का जाना बहुत ही बुरा हुआ! वास्तव में उसमें बड़ी अनूठी चीजें थीं, मगर इस समय उसके लिए अफसोस करना फजूल है, हां इस समय मैं दो चीजों से तुम्हारी मदद कर सकता हूं।

भैरो - वह क्या?

इन्द्र - एक तो वह दवा हम दोनों के पास मौजूद है जिसके खाने से बेहोशी असर नहीं करती और वह मैं तुम्हें खिला सकता हूं, दूसरे हम लोगों के पास दो-दो हर्बे मौजूद हैं बल्कि यदि तुम चाहो तो तिलिस्मी खंजर भी दे सकता हूं।

भैरो - जी नहीं, तिलिस्मी खंजर मैं न लूंगा क्योंकि आपके पास उसका रहना तब तक बहुत ही जरूरी है जब तक आप तिलिस्म तोड़ने का काम समाप्त न कर लें। मुझे बस मामूली तलवार दे दीजिए। मैं अपना काम उसी से चला लूंगा। और वह दवा खिलाकर मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं उस बुढ़िया के पास से अपना बटुआ निकालने का उद्योग करूं।

दोनों कुमारों के पास तिलिस्मी खंजर के अतिरिक्त एक-एक तलवार भी थी। इन्द्रजीतसिंह ने अपनी तलवार भैरोसिंह को दी और डिबिया में से निकालकर थोड़ी-सी दवा भी खिलाने के बाद कहा, ''मैं तुमसे कह चुका हूं कि जब हम दोनों भाई इस बाग में पहुंचे तो चूहेदानी के पल्ले की तरह वह दरवाजा बन्द हो गया जिस राह से हम दोनों आये थे और उस दरवाजे पर लिखा हुआ था कि यह तिलिस्म टूटने लायक नहीं है।

भैरो - हां आप कह चुके हैं।

आनन्द - (इन्द्रजीत से) भैया, मुझे तो उस लिखावट पर विश्वास नहीं होता।

इन्द्रजीत - यही मैं भी कहने को था क्योंकि रक्तग्रंथ की बातों से तिलिस्म का यह हिस्सा भी टूटने योग्य जान पड़ता है, (भैरोसिंह से) इसी से मैं कहता हूं कि इस बाग में जरा समझ-बूझ से घूमना।

भैरो - खैर इस समय तो मैं आपके साथ चलता हूं, चलिए बाहर निकलिए।

आनन्द - (भैरो से) तुम्हें याद है कि तुम ऊपर से उतरकर इस कमरे में किस राह से आए थे?

भैरो - मुझे कुछ भी याद नहीं।

इतना कहकर भैरोसिंह उठ खड़ा हुआ और दोनों कुमार भी उठकर कमरे के बाहर निकलने के लिए तैयार हो गये।

बयान - 16

तीनों आदमी कमरे के बाहर निकलकर सहन में आये, उस समय कुमार को मालूम हुआ कि यह कमरा बाग के पूरब तरफ वाली इमारत के सबसे निचले हिस्से में बना हुआ है और इस कमरे के ऊपर और भी दो मंजिल की इमारत है मगर वे दोनों मंजिलें बहुत छोटी थीं और उनके साथ ही दोनों तरफ इमारतों का सिलसिला बराबर चला गया था। दिन चढ़ आया था और नित्यकर्म न किए जाने के कारण कुमारों की तबियत कुछ भारी हो रही थी।

जिस तरह इस तिलिस्म में पहिले-दूसरे बाग के अन्दर नहर की बदौलत पानी की कमी न थी उसी तरह इस बाग में भी नहर का पानी छोटी नालियों के जरिए चारों ओर घूमता हुआ आता था और दस-पांच मेवों के पेड़ भी थे जिनमें बहुतायत के साथ मेवे लगे हुए थे।

दोनों कुमार और भैरोसिंह टहलते हुए बाग के बीचोंबीच से उसी कदम्ब के पेड़ तले आए जिसके नीचे पहिले-पहिल भैरोसिंह के दर्शन हुए थे। बातचीत करने के बाद तीनों ने जरूरी कामों से छुट्टी पा हाथ-मुंह धोकर स्नान किया और संध्योपासन से छुट्टी पाकर बाग के मेवे और नहर के जल से संतोष करने के बाद बैठकर यों बातचीत करने लगे -

इन्द्रजीत - मैं उम्मीद करता हूं कि कमलिनी, किशोरी और कामिनी वगैरह से इसी बाग में मुलाकात होगी।

आनन्द - निःसन्देह ऐसा ही है, इस बाग में अच्छी तरह घूमना और यहां की हर एक बातों का पूरा - पूरा पता लगाना हम लोगों के लिए जरूरी है।

भैरो - मेरा दिल भी यही गवाही देता है कि वे सब जरूर इसी बाग में होंगी मगर कहीं ऐसा न हुआ हो कि मेरी तरह से उन लोगों का दिमाग भी किसी कारण विशेष से बिगड़ गया हो।

इन्द्रजीत - कोई ताज्जुब नहीं अगर ऐसा ही हुआ हो, मगर तुम्हारी जुबानी मैं सुन चुका हूं कि राजा गोपालसिंह ने कमलिनी को बहुत कुछ समझा-बुझाकर एक तिलिस्मी किताब भी दी है।

भैरो - हां बेशक मैं कह चुका हूं और ठीक कह चुका हूं।

इन्द्रजीत - तो यह भी उम्मीद कर सकता हूं कि कमलिनी को इस तिलिस्म का कुछ हाल मालूम हो गया हो और वह किसी के फंदे में न फंसे।

भैरो - इस तिलिस्म में और है ही कौन जो उन लोगों के साथ दगा करेगा?

आनन्द - बहुत ठीक! शायद आप अपनी नौजवान स्त्री और उसके हिमायती लड़कों को बिल्कुल ही भूल गए, या हम लोगों की जुबानी सब हाल सुनकर भी आपको उसका कुछ खयाल न रहा!

भैरो - (मुस्कुराकर) आपका कहना ठीक है मगर उन सभों को...।

इतना कहकर भैरोसिंह चुप हो गया और कुछ सोचने लगा। दोनों कुमार भी किसी बात पर गौर करने लगे और कुछ देर बाद भैरोसिंह ने इन्द्रजीतसिंह से कहा -

भैरो - आपको याद होगा कि लड़कपन में एक दफे मैंने पागलपन की नकल की थी।

इन्द्र - हां याद है, तो क्या आज भी तुम जान-बूझकर पागल बने हुए थे?

भैरो - नहीं-नहीं, मेरे कहने का मतलब यह नहीं बल्कि मैं यह कहता हूं कि इस समय भी उसी तरह का पागल बनके शायद कोई काम निकाल सकूं।

आनन्द - हां ठीक तो है, आप पागल बनके अपनी नौजवान स्त्री को बुलाइए जिस ढंग से मैं बताता हूं।

कुमार के बताए हुए ढंग से भैरोसिंह ने पागल बनके अपनी नौजवान स्त्री को कई दफे बुलाया मगर उसका नतीजा कुछ न निकला, न तो कोई उसके पास आया और न किसी ने उसकी बात का जवाब ही दिया, आखिर इन्द्रजीतसिंह ने कहा, ''बस करो, उसे मालूम हो गया कि तुम्हारा पागलपन जाता रहा, अब हम लोगों को फंसाने के लिए वह जरूर कोई दूसरा ही ढंग लावेगी।''

आखिर भैरोसिंह चुप हो रहे और थोड़ी देर बाद तीनों आदमी इधर-उधर का तमाशा देखने के लिए यहां से रवाना हुए। इस समय दिन बहुत कम बाकी था।

तीनों आदमी बाग के पश्चिम तरफ गये जिधर संगमर्मर की एक बारहदरी थी। उसके दोनों तरफ दो इमारतें थीं जिनके दरवाजे बन्द रहने के कारण यह नहीं जाना जाता था कि उसके अन्दर क्या है मगर बारहदरी खुले ढंग की बनी हुई थी अर्थात् उसके पीछे की तरफ दीवानखाना और आगे की तरफ केवल तेरह खम्भे लगे हुए थे जिनमें दरवाजा चढ़ाने की जगह न थी।

इस बारहदरी के मध्य में एक सुन्दर चबूतरा बना हुआ था जिस पर कम-से-कम पन्द्रह आदमी बखूबी बैठ सकते थे। उस चबूतरे के ऊपर बीचोंबीच में लोहे का चौखूटा तख्ता था जिसमें उठाने के लिए कड़ी लगी हुई थी और चबूतरे के सामने की दीवार में एक छोटा-सा दरवाजा था जो इस समय खुला हुआ था और उसके अन्दर दो-चार हाथ के बाद अन्धकार-सा जान पड़ता था। भैरोसिंह ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, ''यदि आज्ञा हो तो इस छोटे-से दरवाजे के अन्दर जाकर देखूं कि इसमें क्या है?'

इन्द्रजीत - यह तिलिस्म का मुकाम है खिलवाड़ नहीं है, कहीं ऐसा न हो कि तुम जाओ और दरवाजा बन्द हो जाय! फिर तुम्हारी क्या हालत होगी सो तुम्हीं सोच लो।

आनन्द - पहिले यह तो देखो कि दरवाजा लकड़ी का है या लोहे का?

इन्द्रजीत - भला तिलिस्म बनाने वाले इमारत के काम में लकड़ी क्यों लगाने लगे जिसके थोड़े ही दिन में बिगड़ जाने का खयाल होता है, मगर शक मिटाने के लिए यदि चाहो तो देख लो।

भैरो - (उस दरवाजे को अच्छी तरह जांचकर) बेशक यह लोहे का बना हुआ है। इसके अन्दर कोई भारी चीज डालकर देखना चाहिए कि बन्द होता है या नहीं, यदि किसी आदमी के जाने से बंद हो जाता होगा तो मालूम हो जाएगा।

आनन्द - (चबूतरे की तरफ इशारा करके) पहिले इस तख्ते को उठाकर देखो कि इसके अन्दर क्या है!

''बहुत अच्छा'' यह कह भैरोसिंह चबूतरे के ऊपर चढ़ गया और कड़ी में हाथ डालके उस तख्ते को उठाने लगा। तख्ता किसी कब्जे या पेंच के सहारे उसमें जड़ा हुआ न था बल्कि चारों तरफ से अलग था। इसलिए भैरोसिंह ने उसे उठाकर चबूतरे के नीचे रख दिया, इसके बाद झांककर देखने से मालूम हुआ कि नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं।

भैरोसिंह ने नीचे उतरने के लिए आज्ञा मांगी मगर कुंअर इन्द्रजीतसिंह उसे रोककर स्वयं नीचे उतर गये और भैरोसिंह तथा आनन्दसिंह को ऊपर मुस्तैद रहने के लिए ताकीद कर गये।

नीचे उतरने के लिए चक्करदार सीढ़ियां बनी हुई थीं और हर एक सीढ़ी के दोनों तरफ बनावटी पेड़ गेंदे के बने हुए थे जो सीढ़ी पर पैर रखने के साथ ही झुक जाते और पैर (या बोझ) हट जाने से पुनः ज्यों-के-त्यों खड़े हो जाते थे। इस तमाशे को देखते हुए इन्द्रजीतसिंह कई सीढ़ियां नीचे उतर गये और जब अंधेरे में पहुंचे तो एक बन्द दरवाजा मिला जिसे उस समय कुमार ने कुछ खुला हुआ देखा था जब वहां तक पहुंचने में तीन-चार सीढ़ियां बाकी थीं अर्थात् कुमार के देखते ही देखते वह दरवाजा बन्द हो गया था।

कुमार को ताज्जुब मालूम हुआ और जब उद्योग करने पर भी दरवाजा नहीं खुला तो कुमार ऊपर की तरफ लौटे। तीन सीढ़ियां ऊपर चढ़ने के बाद घूमकर देखा तो दरवाजे को पुनः कुछ खुला हुआ देखा मगर जब नीचे उतरे तो फिर बन्द हो गया।

इन्द्रजीतसिंह को विश्वास हो गया कि इस दरवाजे का खुलना और बन्द होना भी इन्हीं सीढ़ियों के आधीन है। आखिर लाचार होकर कुछ सोचते-विचारते चले आए। ऊपर आते समय भी सीढ़ियों के दोनों तरफ वाले पेड़ों की वही दशा हुई अर्थत् जिस सीढ़ी पर पैर रक्खा जाता उसके दोनों तरफ वाले पेड़ झुक जाते और जब उस पर से पैर हट जाता तो फिर ज्यों-के-त्यों हो जाते।

ऊपर आकर इन्द्रजीतसिंह ने कुल हाल आनन्दसिंह और भैरोसिंह से कहा और इस बात पर विचार करने की आज्ञा दी कि 'हम नीचे उतरकर किस तरह उस दरवाजे को खुला हुआ पा सकते हैं।'

थोड़ी देर बाद भैरोसिंह ने कहा, ''मैं पेड़ों का मतलब समझ गया, यदि आप मुझे अपने साथ ले चलें तो मैं ऐसी तर्कीब कर सकता हूं कि वह दरवाजा आपको खुला मिले।''

इस समय संध्या हो चुकी थी इसीलिए सभों की राय नीचे उतरने की न हुई। कुमार की आज्ञानुसार भैरोसिंह ने उस गड्ढे का मुंह ज्यों-का-त्यों ढांक दिया और उस बारहदरी में निश्चिन्ती के साथ बैठ बातचीत करने लगे, क्योंकि आज की रात इसी बारहदरी में होशियारी के साथ रहकर बिताने का निश्चय कर लिया था और भैरोसिंह के जिद करने से यह बात भी तै पाई थी कि इन्द्रजीतसिंह आराम के साथ सोएं और भैरोसिंह तथा आनन्दसिंह बारी-बारी से जागकर पहरा दें।

 

बयान - 17

आधी रात का समय है, तिलिस्मी बाग में चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, इमारत के ऊपरी हिस्से पर चन्द्रमा की कुछ थोड़ी-सी चांदनी जरा झलक मार रही है। बाकी सब तरफ अंधकार छाया हुआ है। कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह सोए हुए है। और भैरोसिंह एक खम्भे के सहारे बैठे हुए बारहदरी के सामने वाली इमारत को देख रहे हैं।

बारहदरी के सामने वाली इमारत दो मंजिली थी और उसकी लम्बाई तो बहुत ज्यादे थी मगर चौड़ाई बहुत कम थी। इमारत के ऊपर वाली मंजिल में बाग की तरफ छोटे-छोटे दरवाजे एक सिरे से दूसरे सिरे तक बराबर एक ही रंग-ढंग के बने हुए थे। दरवाजों के बीच में केवल एक खम्भे का फासला था और वे सब खम्भे भी एक ही ढंग के नक्काशीदार बने हुए थे जिसकी खूबी इस समय कुछ भी मालूम नहीं पड़ती थी मगर एक दरवाजे के अन्दर यकायक कुछ रोशनी की झलक पड़ जाने के कारण भैरोसिंह एकटक उसी तरफ देख रहे थे।

थोड़ी ही देर बाद ऊपर वाली मंजिल का एक दरवाजा खुला और पीठ पर गठरी लादे हुए एक आदमी बाईं तरफ से दाहिनी तरफ जाता हुआ दिखाई दिया। भैरोसिंह चैतन्य होकर सम्हलकर बैठ गये और बड़ी दिलचस्पी के साथ ध्यान देकर उस तरफ देखने लगे। कुछ देर बाद दरवाजा बन्द हो गया और उसके दाहिनी तरफ चार दरवाजे छोड़कर पांचवां दरवाजा खुला जिसके अन्दर हाथ में चिराग लिये हुए एक और आदमी इस तरह खड़ा दिखाई दिया जैसे किसी के आने का इन्तजार कर रहा हो। थोड़ी देर में चार-पांच औरतें मिलकर किसी लटकते बोझ को लिये हुए उसी आदमी के पास से निकल गईं जिसके हाथ में चिराग था और उन्हीं के पीछे-पीछे वह आदमी भी चिराग लिए चला गया। दरवाजा बन्द नहीं हुआ मगर उसके अन्दर अंधकार हो गया।

भैरोसिंह ने यह समझकर कि शायद हम और भी कुछ तमाशा देखें दोनों कुमारों को चैतन्य कर दिया और जो कुछ देखा था बयान किया।

हम कह आये हैं कि इस बारहदरी की पिछली दीवार के नीचे बीचोंबीच में अर्थात् चबूतरे के सामने एक छोटा दरवाजा था जिसके अन्दर भैरोसिंह ने जाने का इरादा किया था। इस समय यकायक उसी दरवाजे के अन्दर चिराग की रोशनी देखकर भैरोसिंह और दोनों कुमार चौंक पड़े और उठकर उस दरवाजे के सामने जा झांककर देखने लगे। मालूम हुआ कि इस छोटे से दरवाजे के अन्दर एक बहुत बड़ा कमरा है जिसके दोनों तरफ की लोहे वाली शहतीरें (बड़ी धरनें) बड़े-बड़े चौखूटे खम्भों के ऊपर हैं और उसकी छत लदाव की बनी हुई है। उस कमरे के दोनों तरफ के खम्भों के बाद भी एक दालान है और दालान की दीवारों में कई बड़े दरवाजे बने हैं जिनमें कुछ खुले और कुछ बन्द हैं।

दोनों कुमारों और भैरोसिंह ने देखा कि उसी कमरे के मध्य में एक आदमी जिसके चेहरे पर नकाब पड़ी थी, हाथ में चिराग लिए हुए खड़ा छत की तरफ देख रहा है। कुछ देर तक देखने के बाद वह आदमी एक खम्भे के सहारे चिराग रखकर पीछे की तरफ लौट गया।

भैरोसिंह और दोनों कुमार आड़ में खड़े होकर सब तमाशा देख रहे थे और जब वह आदमी चिराग रखकर हट गया तब भी यह सोचकर खड़े ही रहे कि 'जब चिराग रखकर गया है तो पुनः आवेगा ही।'

उस नकाबपोश को चिराग रखकर गये हुए दस-बारह पल से ज्यादे न बीते होंगे कि दूसरी तरफ वाले दरवाजे के अन्दर से कोई दूसरा आदमी निकलकर तेजी के साथ इस कमरे के मध्य में आ पहुंचा और हाथ की हवा देकर उस चिराग को बुझा दिया जिसे पहिला आदमी एक खम्भे के सहारे रखकर चला गया था, और इसके बाद कमरे में अंधकार हो जाने के कारण कुछ मालूम न हुआ कि यह दूसरा आदमी चिराग बुझाकर चला गया या उसी जगह कहीं आड़ देकर छिप रहा।

यह दूसरा आदमी भी जिसने कमरे में आकर चिराग बुझा दिया था अपने चेहरे पर स्याह नकाब डाले हुए था, केवल नकाब ही नहीं, उसका तमाम बदन भी स्याह कपड़े से ढंका हुआ था और कद में छोटा रहने के कारण इसका पता नहीं लग सकता था कि वह मर्द है या औरत।

थोड़ी ही देर बाद दोनों कुमारों और भैरोसिंह के कान में किसी के बोलने की आवाज सुनाई दी जैसे किसी ने उस अंधेरे में आकर ताज्जुब के साथ कहा हो कि 'हैं! चिराग कौन बुझा गया

इसके जवाब में किसी ने कहा, ''अपने को सम्हाले रहो और जल्दी से हट जाओ, कोई दुश्मन न आ पहुंचा हो।''

इसके बाद चौथाई घड़ी तक न तो किसी तरह की आवाज ही सुनाई दी और न कोई दिखाई ही पड़ा मगर दोनों कुमार और भैरोसिंह अपनी जगह से न हिले।

आधी घड़ी के बाद वह आदमी पुनः हाथ में चिराग लिये हुए आया जो पहिले खम्भे के सहारे चिराग रखकर चला गया था। इस आदमी का बदन गठीला और फुर्तीला मालूम पड़ता था। इसका पायजामा, अंगा, पटूका, मुड़ासा और नकाब ढीले कपड़े का बना हुआ था। अबकी दफे वह बायें हाथ में चिराग और दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिये हुए था, शायद उसे पहले दुश्मन का खयाल था जिसने चिराग बुझा दिया था इसलिये उसने चिराग जमीन पर रख दिया और तलवार लिए चारों तरफ घूम-घूमकर किसी को ढूंढ़ने लगा। वह आदमी जिसने चिराग बुझा दिया था एक खम्भे की आड़ में छिपा हुआ था। जब पीले कपड़े वाला उस खम्भे के पास पहुंचा तो उस आदमी पर निगाह पड़ी, उसी समय वह नकाबपोश भी सम्हल गया और तलवार खेंचकर सामने खड़ा हो गया। पीले कपड़े वाले ने तलवार वाला हाथ ऊंचा करके पूछा, ''सच बता तू कौन है?'

इसके जवाब में स्याह नकाबपोश ने यह कहते हुए उस पर तलवार का वार किया कि 'मेरा नाम इसी तलवार की धार पर लिखा हुआ है।

पीले कपड़े वाले ने बड़ी चालाकी से दुश्मन का वार बचाकर अपना वार किया और इसके बाद दोनों में अच्छी तरह लड़ाई होने लगी।

दोनों कुमार और भैरोसिंह लड़ाई के बड़े ही शौकीन थे इसलिए बड़ी चाह से ध्यान देकर उन दोनों की लड़ाई देखने लगे। निःसन्देह दोनों नकाबपोश लड़ने में होशियार और बहादुर थे, एक-दूसरे के वार को बड़ी खूबी से बचाकर अपना वार करता था जिसे देख इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, ''दोनों अच्छे हैं, चिराग की रोशनी एक ही तरफ पड़ती है दूसरी तरफ सिवाय तलवार की चमक के और कोई सहारा वार बचाने के लिए नहीं हो सकता, ऐसे समय में इस खूबी के साथ लड़ना मामूली काम नहीं है!''

इसी बीच यकायक स्याह नकाबपोश ने अपने हाथ की तलवार जमीन पर फेंक दी और एक खम्भे की आड़ घूमता हुआ खंजर खींच और उसका कब्जा दबाकर बोला, ''अब तू अपने को किसी तरह नहीं बचा सकता।''

निःसन्देह वह तिलिस्मी खंजर था जिसकी चमक से उस कमरे में दिन की तरह उजाला हो गया। मगर पीले नकाबपोश ने भी उसका जवाब तिलिस्मी खंजर से ही दिया क्योंकि उसके पास भी तिलिस्मी खंजर मौजूद था। तिलिस्मी खंजरों से लड़ाई अभी पूरी तौर से होने भी न पाई थी कि एक तरफ से आवाज आई, ''पीले मकरंद, लेना, जाने न पावे! अब मुझे मालूम हो गया कि भैरोसिंह के तिलिस्मी खंजर और बटुए का चोर यही है, देखो इसकी कमर से वह बटुआ लटक रहा है, अगर तुम इस बटुए के मालिक बन जाओगे तो फिर इस दुनिया में तुम्हारा मुकाबला करने वाला कोई भी न रहेगा क्योंकि यह तुम्हारे ही ऐसे ऐयारों के पास रहने योग्य है!''

यह एक ऐसी बात थी जिसने सबसे ज्यादे भैरोसिंह को चौंका ही नहीं दिया बल्कि बेचैन कर दिया। उसने कुंअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, ''बस आप कृपा करके अपना तिलिस्मी खंजर मुझे दीजिये, मैं स्वयं उसके पास जाकर अपनी चीज ले लूंगा, क्योंकि यहां पर तिलिस्मी खंजर के बिना काम न चलेगा और यह मौका भी हाथ से गंवा देने लायक नहीं है।''

इन्द्र - हां बेशक ऐसा ही है, अच्छा चलो मैं तुम्हारे साथ चलता हूं।

आनन्द - और मैं?

इन्द्रजीत - तुम इसी जगह खड़े रहो, दोनों भाइयों का एक साथ वहां चलना ठीक नहीं, अकेला मैं ही उन दोनों के लिए काफी हूं।

आनन्द - फिर भैरोसिंह जाकर क्या करेंगे तिलिस्मी खंजर की चमक में इनकी आंख खुली नहीं रह सकती।

इन्द्रजीत - सो तो ठीक है।

भैरो - अजी आप इस समय ज्यादे सोच-विचार न कीजिए! आप अपना खंजर मुझे दीजिए बस मैं निपट लूंगा।

इन्द्रजीतसिंह ने खंजर जमीन पर रख दिया और उसके जोड़ की अंगूठी भैरोसिंह की उंगली में पहिरा देने के बाद खंजर उठा लेने के लिए कहा। भैरोसिंह ने तिलिस्मी खंजर उठा लिया और उस छोटे दरवाजे के अन्दर जाकर बोला, ''मैं भैरोसिंह स्वयं आ पहुंचा!''

भैरोसिंह के अन्दर जाते ही दरवाजा आप से आप बन्द हो गया और दोनों कुमार ताज्जुब से एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

(सत्रहवां भाग समाप्त)



[1] . देखिए चंद्रकान्ता सन्तति, नौवां भाग, आठवां बयान।

[2] देखिए चंद्रकान्ता सन्तति , चौदहवां भाग, दूसरा बयान।

 


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