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कहानी

ठंडी दीवारें
गुरमुख सिंह जीत

अनुवाद - गुरचरण सिंह


ईश्वर दास ने एक घुटन सी महसूस की। मई का महीना , बेहद तेज गर्मी और लू। उसका दिल घबरा गया । उसने बाँयें हाथ के अँगूठे से माथे पर बहता हुआ पसीना पोंछा। फिर हाथ से पीठ खुजलाने लगा। जब इस तरह भी चैन न मिला तो बनियान उतारकर उससे पीठ रगड़ने लगा। पर उसको अन्दर की घबराहट बाहर की घबराहट से अधिक तंग कर रही थी। वह अपने मन में कई निर्णय कर रहा था। साथ-साथ ही वह उस सौदे को, लाभ-हानि को भी आँक रहा था। उसका दिमाग इस घटना के हर पक्ष पर विचार कर रहा था। उसका सिर भारी होने लगा।

तब पाकिस्तान बने मुश्किल से आठ साल ही हुए थे। कूचा नबी करीम में उनके पड़ोसी मोहनलाल के घर से हर समय आहें सुनाई देती रहती थी। मोहनलाल के घर से मायावन्ती की आहें कभी-कभी ऊँचे-ऊँचे रोने में बदल जाती थीं। पाकिस्तान बनने पर मुसीबत तो सब पर ही आयी थी, पर उनकी मुसीबत कुछ अलग और अधिक ही थी। पिंडी भटियाँ में सब कुछ खोकर वे सुक्खे की मंडी से गाड़ी पर चढ़ने लगे थे। उनके प्राण डर से सिकुड़े हुए थे और चेहरे रुई जैसे सफेद दिखाई देते थे। सुक्खे की मंडी का प्लेटफार्म वही था जहाँ से वे कई बार गाड़ी पर चढ़कर हांफिजाबाद, साँगला हिल या जड़ाँवाले गये थे। मोहनलाल हमेशा प्लेटफार्म पर लगे पीपल के नीचे बेंच पर बैठना पसन्द करता था। इस प्लेटफार्म के चप्पे-चप्पे को वह अच्छी तरह पहचानता था। पर उस दिन तो ऐसा लगता था मानो यह किसी ऍंधेरी घाटी का फिसलने वाला द्वार है। उनके मन पर डर का कुछ ऐसा ही दबदबा था।

और आखिर वह बात होकर ही रही। शाम का ऍंधेरा घिरने लगा। मोहनलाल और मायावन्ती का परिवार और भी सिकुड़ गया। शेष अनेक परिवार अपनी गठरियाँ आदि सम्भाल कर उन पर बैठ गये। उनके दिल धकधक कर रहे थे। गाड़ी आ गयी। वे सब उसमें किसी तरह घुस गये। बैठने का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता था। बस जरा पैर टिकने की जगह चाहिए थी। पर गाड़ी जैसे वहीं जम गयी हो, चलने का नाम ही नहीं लेती थी। डब्बों में बैठे पुरुष, औरतें और बच्चे घबराने लगे। कुलबुलाहट का मानो पहला स्वर उठा हो। इतने में स्टेशन से थोड़ी दूर पर ढोल बजने जैसी आवाज पास आती गयी और उसमें कई दूसरी भयानक व डरावनी चीखे मिलती गयीं।

गाड़ी में बैठे लोगों में खलबली मच गयी। माताओं ने अपने पुत्र छातियों से लगा लिये। पुरुषों ने अपना सामान और पास खींच लिया। हर तरफ चीख-पुकार होने लगी। प्लेटफार्म पर अब भाले और बल्लम भी दिखाई देने लगे। मशालें इधर-उधर दैड़ने लगीं। सर्वत्र एक बेचैनी-सी फैल गयी।

जाटों ने सारी गाड़ी लूट ली। जो उनके सामने आया उसे काटकर फेंक दिया। डब्बे लाशों से भर गये। लहू बह-बहकर फर्श पर जम गया। किसी को कुछ पता नहीं कौन मरा और बचा। जो कोई बच भी गया, उसने खुद को मृतकों में गिन लिया और साँस रोककर चुपचाप लेटा रहा।

जब अगले दिन गाड़ी अमृतसर पहुँची, स्टेशन पर कई सोसायटियों के सेवक रोटी-पानी लेकर पहुँच गये। जब उन्होंने गाड़ी पर हुए कत्लेआम को देखा तो एक कोहराम मच गया। मोहनलाल भी घायल हो गया था, पर होश में था। मायावन्ती एक कोने में घबराई बैठी थी। उन्होंने पहली बार एक-दूसरे को देखा। रो-रोकर उनके आँसू आँखों में ही सूख गये थे। बच्चों को सम्भाला। छोटे कृष्ण का सिर अलग पड़ा था और धड़ अलग। सोहनलाल बेंच के नीचे दुबककर लेटा हुआ था। मायावन्ती ने उसे छाती से लगा लिया। अब कान्ता की खोज शुरू हुई। सोहनलाल के पैर फर्श पर जमे रक्त से भर गये। उन्होंने एक-एक लाश को ध्यान से देखा। वह कहीं दिखाई न दी।

मायावन्ती मानो जिन्दा ही मर गयी। जाहिर था कि कान्ता को जालिम उठाकर ले गये थे। उस समय वह केवल बारह-तेरह वर्ष की थी। जिन्दगी का इतना बड़ा घाव वह कैसे भरेगी? मोहनलाल ने कृष्ण के सिर को उठाकर चूम लिया। मायावन्ती ने आँखों में बराबर मुक्के मारे, पर उनमें से एक आँसू भी न निकला। कितना बड़ा आघात था!

ऍंधेरे में उड़ते तिनकों की तरह वे दिल्ली पहुँच गये। धीरे-धीरे जीवन के स्वर थिरकने लगे। मोहनलाल ने चाँदनी चौक में घड़ियों की दुकान खोल ली। उसका काम अच्छा चलने लगा। सोहनलाल अब बी।ए। कर चुका था और कुछ समय से डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर में अच्छे पद पर था। पर आठ वर्षों में भी चन्द्रकाता वाले घाव पर पपड़ी न जम सकी। उसमें से गन्दा ंखून रिसता रहा और मायावन्ती को गश आते रहे। कोई ऐसा साधन न था जिसका सहारा मोहनलाल ने अपनी चन्द्रकान्ता को ढूँढ़ने के लिए न लिया हो। वह होम मिनिस्टर से मिला। उससे पाकिस्तान के होम मिनिस्टर को विशेष पत्र लिखवाया कि वह अपने रिकवरी स्टांफ की सहायता से कान्ता को ढूँढ़ें। फिर सोहनलाल ने डिप्टी कमिश्नर की सहायता से पाकिस्तान के हाई कमिश्नर को कहलवाया कि उसकी बहन को ढूँढ़ने के हरसम्भव यत्न किये जाएँ। हाई कमिश्नर ने अपनी सरकार से कहकर पाकिस्तान के अखबारों में इनाम के इश्तहार भी दिये। इन आठ वर्षों में उनके जिले की उठायी हुई लड़कियाँ बरामद हो गयी थीं। एक-दो से मायावन्ती को चन्द्रकान्ता के बारे में यह भी पता लगा कि उसे एक चौधरी ने घर बैठाया हुआ है। यह सुनकर उन्होंने प्रयत्न और तेंज कर दिये पर कोई सफलता न मिली। मायावन्ती अपना सिर पीट-पीटकर रोयी, ''इससे तो अच्छा था कि कान्ता मर ही जाती, गाड़ी में ही काट दी जाती।'' फिर ईश्वर के आगे मनौती करती, ''भगवान, मुझे उसके मरने की खबर सुना! उसकी बहलोलपुर के चौधरी निसार अहमद के घर बैठने की खबर बिलकुल निर्मूल हो।'' पर वह दिल का क्या करती जो हर समय चन्द्रकाता का नाम जपता रहता। चन्द्रकान्ता उसे अपने दोनों पुत्रों से भी अधिक प्यारी थी। कान्ता को उसने हथेली पर हुए छाले के समान पाला था और उसे गरम हवा लगने की बात वह कभी सपने में भी सोच नहीं सकती थी। ''कान्तो की बच्ची! इससे तो अच्छा था कि तू पैदा होते ही मर जाती या मैं ही तुझे जन्म देकर मार देती। यह दु:ख न देखती।''यह कहकर वह फिर सिसकने लगी। उसका लड़का सोहनलाल जो अभी दफ्तर से लौटा ही था, उसको धैर्य देने लगा।

जैसे किसी मच्छर ने ईश्वरदास को काट खाया हो, वह अनजाने ही चैतन्य हो गया। उसे पता ही न लगा कि कब उसकी आँख लग गयी थी। जागकर वह फिर पसीना पोंछने लगा और एक बार फिर उस पर नींद की मस्ती छाने लगी।

''चाचाजी, आपको पिताजी बुलाते हैं,'' अभी वह कचहरी से लौटा ही था कि मोहनलाल का लड़का उसे बुलाने आया, ''जरा जल्दी आओ, माताजी बेहोश हो गयी हैं।''

आगे जो कुछ उसने देखा, वह उसकी आशा के पूरी तरह से विपरीत तो नहीं था पर उसे एक धक्का-सा जरूर लगा था। मायावन्ती काफी देर से बेहोश पड़ी थी। मोहनलाल उसके दाँतों में चम्मच से पानी डालने का यत्न कर रहा था, पर उसके दाँत खुल ही नहीं रहे थे।

आज सुबह से ही मायावन्ती चन्द्रकान्ता को याद करके आहें भर रही थीं। डाक्टर आया, उसने मायावन्ती को टीका लगाया। अभी वह टीके का प्रभाव देख ही रहा था कि बाहर एक लॉरी आकर रुकी। ईश्वरदास जल्दी-जल्दी उठकर बाहर गया। उसने देखा, लॉरी पुलिस की थी और इसमें से एक थानेदार ने बाहर निकलकर उससे पूछा, ''मोहनलाल जी का घर यही है?''

ईश्वरदास ने उत्तर में केवल सिर हिला दिया।

इसके बाद उसने किसी को बाहर आने का इशारा किया। लॉरी में से एक युवती बाहर निकली और ईश्वरदास के मुँह की तरफ देखने लगी। इतने में मोहनलाल भी बाहर निकल आया। उसने जब इस युवती के रूप में चन्द्रकान्ता को अपने सामने देखा तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ। फिर उसने आगे बढ़कर बेटी को गले लगा लिया और उसका मुँह व सिर चूमने लगा।

उधर चन्द्रकान्ता के उदास चेहरे पर कोई भाव परिवर्तन न हुआ। वह वैसे ही बौखलायी-सी वातावरण को पहचानने का प्रयत्न कर रही थी। मोहनलाल उसे अन्दर ले गया। मायावन्ती थोड़ा-थोड़ा होश में आने लगी थी। जब मोहनलाल ने कहा, ''देख माया, कान्ता आ गयी है,'' तो उसे अपने कानों पर विश्वास न हुआ। उसने पलकें झपकाकर आँखें खोलीं। सामने सच ही चन्द्रकान्ता खड़ी थी। वही कान्ता जिसे वह स्वयं से भी अधिक प्यार करती थी, वही कान्ता जिसके वियोग में पिछले आठ वर्षों में वह अपनी सेहत खो बैठी थी। हाँ, यह वही चन्द्रकान्ता थी जिसके दु:ख को उसकी माँ नहीं भूल सकी, चाहे वह अपने पुत्र कृष्ण के विछोह को किस्मत की बात मान चुकी थी।

चन्द्रकान्ता माँ की तरफ खाली आँखों से देखने लगी। आखिर माँ ने उठकर उसे छाती से लगा लिया। आज कई वर्षों के बाद उसी आँखों में आँसुओं की बाढ़ आयी थी। मायावन्ती की आँखों के स्रोत, जो बिलकुल सूख चुके थे, अब फिर भरने लगे और उनमें से आँसुओं की दो नहरें बहने लगीं। पर कान्ता तो ठंडी राख थी, जैसे उसने घर के किसी व्यक्ति को न पहचाना हो। अपने भाई सोहनलाल से भी वह अच्छी तरह न मिली। माँ ने उसे प्यार से अपने पास बैठा लिया।

इतने में किसी को ध्यान आया कि थानेदार अभी खड़ा है। मोहनलाल ने उसे और उसके साथ के तीन आदमियों को आदर से बैठाया। रोशन कपूर रिकवरी स्टाफ में था और उसने खुद चन्द्रकान्ता बरामद करने के लिए छापा मारा था। वह धीरे-धीरे सारी बात सुनाने लगा। इतने में चाय बन गयी और सबने खुशी-खुशी उनको चाय पिलायी। बातों का सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। इस बीच चन्द्रकान्ता गुमसुम बैठी रही, जैसे वह अपने घर आकर कहीं और आयी हो। न उसके चेहरे पर प्रसन्नता की कोई किरण आयी और न ही उसकी आँखों में पानी छलका। जितनी देर थानेदार बातें करता रहा, वह सिर नीचा किये बैठी रही। बीच-बीच में मायावन्ती उसके सिर को थपथपा देती।

बरामदे में किसी के कदमों की आवांज आयी तो ईश्वरदास का स्वप्नजाल टूट गया। गरमी उसे अभी बेहाल कर रही थी। वह बनियान का पंखा बनाकर मुँह पर हवा करने लगा। ढलती दोपहर के तीखे ताप से उसे ऊँघ महसूस होने लगी।

कुछ दिनों में ही मायावन्ती का उत्साह धीमा पड़ गया। अब वह चन्द्रकान्ता को बुलाकर उससे बोलने की बजाय कुछ खिंची-खिंची-सी रहने लगी। कान्ता ने वर्षों की दु:ख-भरी गाथा पलों में सुना दी थी पर अपना दिल नहीं खोला था।।।

''जब वे डब्बे में भाले चमकाते और 'अल्लाह हो अकबर' कहते चढ़े तो मेरी चीखें निकल गयीं। कृष्ण मेरे पास बैठा था। एक दैत्य ने उसे हाथ से अपनी तरफ घसीटा और गँड़ासे से उसका सिर अलग कर दिया। मैं चीख पड़ी। किसी ने मुझे पकड़कर डब्बे से बाहर घसीटना शुरू कर दिया। मैं चीखती-चिल्लाती बेहोश हो गयी।''

और जब मुझे होश आया, मैंने स्वयं को एक घर में चारपाई पर लेटी पाया। मेरे पास एक और स्त्री बैठी थी। उसने मुझे पानी पीने के लिए दिया। उसे देखकर मैं फिर चीख पड़ी और मैंने फिर आँखें बन्द कर लीं, जैसे उसके अस्तित्व और अपने आसपास के वातावरण को स्वीकार करने में असमर्थ होऊँ। वह औरत मुझे पंखा करती रही। कुछ दिन इसी तरह अनमने, बिना खाये-पीये से बीत गये। कभी-कभी कोई युवक-सा लड़का भी मेरी तरफ निगाह मार जाता। मैं घुटनों में सिर छिपा लेती। मेरे आँसू पता नहीं किस वीराने में खो गये थे। मैं धीरे-धीरे पिघलती गयी और अन्त में मुझे स्वयं से समझौता करना पड़ा। मुझे पता लग चुका था कि सुक्खे की मंडी से उठाकर मुझे बहलोलपुर लाया गया था और मैं वहाँ के जैलदार चौधरी गुलाम कादिर के घर हँ। चौधरी साहिब की बेंगम ही इतने दिन मेरे पास बैठी रही थी। उसकी आँखों में सहानुभूति झाँकती थी। पर मैं तो अपने परिवार, विगत और संस्कारों से तोड़ी गयी थी। इस पर खुद मुझे सहज ही विश्वास नहीं हो रहा था।

धीरे-धीरे मुझ पर सारा रहस्य प्रकट हुआ और यह भी पता लगा कि मैं कभी बचकर अपने माँ-बाप के पास नहीं जा सकती। मेरी फड़फड़ाहट में से जोश और शक्ति कम होती गयी। रहमत बीबी ने मेरे साथ प्यार-भरा सलूक किया और मेरे दु:ख को भुलाने का यत्न किया। बड़े चौधरी साहब ने भी मेरे सिर पर शफक्त-भरा हाथ रखा और इस तरह साल-पर-साल बीतते गये।

हवा का एक तीखा झोंका आया और खिड़की के पट एक-दूसरे से टकराये। जलती लकड़ी-सा लू का झोंका ईश्वरदास के शरीर को जला-सा गया और वह'हाय राम' कहता, पसीना पोंछता फिर ऊँघने लगा।

ईश्वरदास की लड़की सन्तोष ने उसे कई बार बताया था कि कान्ता हर समय बड़ी उदास-सी रहती है और किसी से बातचीत तक नहीं करती। उसकी आँखें हर समय पथरायी रहती हैं और उसके चेहरे पर बेबसी की एक मोटी तह जमी होती है।

एक दिन सन्तोष ने कान्ता को घेर लिया, ''अरी कान्ता, तू तो कभी बाहर ही नहीं निकलती। इस तरह कब तक चलेगा?''

आगे एक सूनी चुप्पी और सन्तोष के फिर पूछने पर यह नपा-तुला-सा उत्तर, ''क्या करूँ! दिल नहीं मानता। इस दिल का क्या करूँ? फिर लोग मेरी तरफ देखकर दबी जबान में खुसर-फुसर करने लग जाते हैं। उस समय मेरा मन करता है मैं फौरन मर जाऊँ।''

सन्तोष ने उसे धैर्य देते हुए कहा, ''कभी हमारे घर आ जाएा कर, दिल लग जाएगा।''

इस तरह वे दोनों लड़कियाँ एक-दूसरे के निकट आ गयीं।

एक दिन सन्तोष ने कान्ता से उदासी का कारण पूछ ही लिया। वह मूड में थी, कहने लगी, ''केवल एक शर्त पर, तोषी, कि किसी को न बताना। दो-तीन साल मैं चौधरी गुलाम कादिर के घर आराम से ही रही। उन्होंने मुझे कभी तंग नहीं किया। मेरा नाम बदलकर उन्होंने सईदा खातून रख लिया। इस बात की मुझे पूरी सूझ आ गयी थी कि मुझे अब यहाँ की मिट्टी में ही मिलना है। रहमत बीबी मेरे साथ प्यार-भरा व्यवहार करती थीं। उनका लड़का चौधरी निसार अहमद लाहौर में पढ़ता था। वह जब कभी बहलोलपुर आता, मेरे साथ बड़ी मीठी-मीठी बातें करता और औरतों पर किये गये जुल्म आदि की निन्दा करता। मेरे दिल के किसी कोने में उसकी बातें सुनने की इच्छा जाग उठी। कभी-कभी वह मुझे शाम को चिनाब के किनारे सैर के लिए ले जाता जो कि हमारे गाँव से केवल कोस भर दूर था।''

तुझे क्या बताऊँ, सन्तोष, चिनाब में कितना आकर्षण है। हम दोनों शाम के ताँबा रंगे सूर्य को उसमें डूबते हुए देखते और फिर जब चाँद की टुकड़ी दूसरी तरफ से उसकी लहरों में नाचने लगती, ''हमारी बातें समाप्त हो जातीं और हम उसकी ओर देखते ही रहते। चिनाब के किनारे चाँदनी रात के जादू का मैं बयान नहीं कर सकती।'' और यह कहकर कान्ता ने एक लम्बी आह भरी, जैसे उसके अन्दर से कुछ धुआँ-सा बाहर निकला हो। उसने अपने होंठों को जीभ से तर किया।

सन्तोष की आँखें कान्ता के चेहरे पर गड़ गयीं जिसमें उसने पहली बार खुशी की थोड़ी-सी चमक देखी थी। वह अवाक् बैठी कान्ता की बात सुनती रही।

''चिनाब को तो वर्षा में देखना चाहिए जब उसका दूसरा किनारा ही नहीं दिखाई पड़ता। गढ़गढ़ करती, मटियाले पानी की फुँफकारती लहरें और उन पर तैरते झाग के गोले।।।इस दृश्य का केवल देखने वाला आनन्द उठा सकता है। छोटी होते हुए भी मैं पर्वों और बैशाखी को चिनाब पर जाएा करती थी पर तब मेरी सूझ बच्चों जैसी थी। अब चिनाब की लहरों के साथ मेरी छाती में भी भाव-उछाल उठते और मैं उन पर मोहित हुई, उनमें बँधी हुई कई बार यहाँ पहुँच जाती। फिर जब निसार अहमद मेरे साथ होता, उन पलों का तो कहना ही क्या!''

कान्ता ने चुन्नी से पलकें पोंछ लीं, उनके कोनों में नमी-सी उभर आयी थी। सन्तोष के लिए यह भी आश्चर्यजनक था कि कान्ता का पथरीला चेहरा रो सकने की सामर्थ्य भी रखता है।

''एक दिन रहमत बीबी ने जिसे मैं भी अम्मा कहने लगी थी, मुझे अपने पास बैठाकर बड़े प्यार से कहा, ''अब मैं ही तेरी अम्मा हँ। पहली माँ की तू समझ, वफात (मौत) हो चुकी है। तेरे लिए मेरा भी कुछ फर्ज है। अब मैं तुझे इस तरह और नहीं रख सकती।''

मैं क्या कहती! चुप रही। अम्मा इस बीच मेरी तरफ ध्यान से देखती रही। मेरी आँखों के आगे कई पुरानी और नई फिल्में चल रही थीं। अम्मा ने ही मेरी चुप्पी को तोड़ा, ''अगर तुझे एतराज न हो।।।''

उसने प्रश्नवाचक नंजरें मुझ पर फेंकी। मेरी छाती धकधक करती रही।

''मैं तुझे अपने से अलग नहीं कर सकती। यह खुदा ने मोह भी क्या चींज बनायी है? तेरा निकाह मैं निसार अहमद के साथ करना चाहती हँ। तुझे कबूल है?''

''मैं खुदा से और क्या माँग सकती थी! चुप रही। परन्तु मेरी आँखों से अम्मा को जवाब मिल गया। और, सन्तोष, तूने यह भी कभी नहीं देखा होगा कि एक ही औरत एक समय माँ भी हो सकती है और सास भी, एक ही आदमी अब्बा भी हो सकता है और ससुर भी। मेरा निकाह जिस धूमधाम से उन्होंने किया, वह मैं तुझे क्या बताऊँ। शायद ही बयान कर सकूँ।''

सन्तोष को कान्ता के चेहरे पर एक रोशनी-सी बिखरी दिखाई दी।

ईश्वरदास एकदम चौंककर उठा। बाहर दरवांजे को किसी ने जोर से खटखटाया था। पर उसे कोई भी दिखाई न दिया। साये गहरे होने लगे पर ताप अभी भी कम न हुआ था। उसकी आँखों से नींद भी नहीं गयी थी।

मोहनलाल एक दिन उससे कहने लगा, ''भाई साहब, आपसे एक सलाह लेनी है। कान्ता का क्या करें? वह हर समय उदास रहती है, किसी से बोलती नहीं। उसकी माँ हर समय खीझती रहती है।''

ईश्वरदास उनके घर जाकर बैठा ही था कि पास खड़ी मायावन्ती बिलख पड़ी, ''भाई साहब, परमात्मा से हमने माँगा तो यही कुछ था पर उसे हमारी माँग ही ठीक समझ नहीं आयी। हे भगवान! कहीं यह लड़की मर ही जाती। नहीं तो यह बरामद ही न होती और हमें बता देते कि कान्ता फसादों में ही मर गयी है!'' इतना कहकर वह फिर रोने लगी।

उसे धैर्य देते हुए ईश्वरदास ने कहा, ''बहन, भगवान के काम के आगे किस का जोर है? इसमें ही भला होगा। हाँ आप कहें, भाई साहब, क्या पूछने लगे थे?'' उसने मोहनलाल की ओर मुड़ते हुए कहा।

''मैंने सोचा था कि इसको कहीं ब्याह कर इसका जीवन नए सिरे से शुरू किया जाएे पर कोई इससे विवाह करने को तैयार ही नहीं होता। जिसको एक बार पता लगता है कि इसे पाकिस्तान से आठ साल बाद बरामद किया है, वह दोबारा इस तरफ कान भी नहीं करता। किसी को इस बात पर जरा भी लिहाज नहीं आता कि इसके विवाह पर हम बहुत-कुछ देने को तैयार हैं। आप ही कोई घर बताएँ।'' मोहनलाल ने निराश स्वर में कहा।

''आप सही कहते हैं। मैं आपके दुख को समझता हँ,'' ईश्वरदास ने बात बदलते हुए कहा, ''किया क्या जाएे! हमारा सारा समाज बेशक दागी पड़ा हो पर किसी अबला की चुन्नी पर निशान भी हो तो कोई उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं। आप कहेंगे तो सही कि ईश्वरदास कैसी पागलों जैसी बातें करता है पर मैं कहँगा कि अगर हमें उन्हें स्वीकार ही नहीं करना था, तो किस मुँह से हम सरकार को उधर रही स्त्रियों और लड़कियों को बरामद करने को कहते है हमने इनको वहाँ-वहाँ से तो उखाड़ लिया जहाँ वे कई वर्षों में जैसे-तैसे अपनी जड़ें जमाने में सफल हो पायी थीं पर हम इनको इधर लगाने को तैयार नहीं।''

मोहनलाल ने ईश्वरदास की बात की हामी भरी और उसके मुँह से एक ठण्डी साँस निकल गयी।

मायावन्ती की आँखों से आँसू बहने लगे और वह उन्हें दुपट्टे से सुखाकर कहने लगी, ''पर अगर यह कहीं अब मर ही जाएे तो मैं सुखी हो जाऊँ। हे भगवान, मैं तो जल गयी हँ। मेरा कलेजा कोयला हो गया है। पैदा ही ना होती कान्ता की बच्ची। किस जनम का बदला लिया है हमसे?''

ईश्वरदास उनको धैर्य देता हुआ उठ खड़ा हुआ और चलते-चलते कहने लगा, ''पर, बहन, यह बात भूलकर भी कान्ता के सामने न कहना। बता, इसमें उसका क्या अपराध है? मैं भी कोई लड़का ढूढ़ूँगा, आप भी ढूँढ़ो, मिल-जुलकर कोई-न-कोई तो मिल ही जाएगा पर भगवान के नाम पर चन्द्रकान्ता का दिल न तोड़ना। आपको क्या पता, उस पर क्या बीत रही है! कभी उसके दिल की गहराइयों में भी झाँककर देखा है?''

और वह जब कमरे से बाहर निकलने लगा, कान्ता उसे सामने से आती हुई मिली। उसे उसके पथराये हुए चेहरे पर तरस आ गया और उसने सहानुभूति से पूछा, ''क्या बात है, बेटी? क्या कर रही हो?''

कान्ता का चेहरा और रूखा हो गया। वह कुछ न बोली। ईश्वरदास को उसकी आँखों में कई सूखे हुए आँसू लटकते नंजर आये जैसे कि उसने उनकी सारी बातचीत सुन ली हो।

जब ईश्वरदास की आँख खुली, शाम के साये गहरे होने लगे थे और गरमी का ताप घट गया था। उसने उठकर कमरे का एक चक्कर लगाया और फिर अपनी जगह आकर बैठ गया। आज उसका दिमांग कुछ और नहीं सोच पा रहा था। वह फिर वहीं बहाव में बह गया।

चन्द्रकान्ता की जीभ से तभी ताला खुलता जब वह सन्तोष के पास आती। ईश्वरदास की हमदर्दी ने उसका मन जीत लिया था। वह अपने दु:ख उनके सामने कह देती और जो बात उससे न कर सकती, वह सन्तोष से कर लेती।

एक दिन वह सन्तोष के पास बैठी अपने घावों से पपड़ी उखाड़ बैठी और उनका असली रूप उसे दिखाने लगी।

''पिछले दो साल में जबसे मैं यहाँ आयी हँ, एक रात भी मैं आराम से नहीं सो सकी। दिन में हर समय उदासी के इस्पाती परदे की ओट में निसार अहमद खड़ा मुझसे बातें करता रहता है, जिसे केवल मैं ही सुन सकती हँ। रात को सपनों में वह मेरी बाँहें पकड़कर मुझे अपने साथ ले जाता है और चिनाब के किनारे की याद दिलाता है। इससे भी बढ़कर मेरे नईम और सलमा रो-रोकर मुझे आवाजें देते रहते हैं। उनके उतरे हुए चेहरों को मैं देख नहीं सकती। मैं माँ हँ, चाहे चन्द्रकान्ता होऊँ या सईदा ख़ातून। इससे मुझे कोई अन्तर नहीं पड़ता। ममता मेरी छाती में खींचातानी करती है, ममता मेरी आँखों को नम कर देती है, पर उसे किसी ने तोड़कर रख दिया है। बता तू मेरे लिए कुछ नहीं कर सकती?''

सन्तोष ने चुन्नी मुँह में डाल ली और ठंडी साँस को अन्दर रोककर उसकी बात सुनती रही।

''यह बात आज मैं तुझे बताने लगी हँ, यह मानकर कि दुनिया में तुझे छोड़कर इसका कभी किसी को पता नहीं लगेगा। मेरे खाविन्द निसार अहमद ने जो प्यार मुझे दिया, उसे इस जिन्दगी में तो मैं कभी भूल ही नहीं सकती। हमारी शादी के एक साल बाद हमारे घर नईम की पैदाइश हुई और उसके डेढ़ साल बाद सलमा मेरी बेटी की। हाय, अगर कभी मैं तुझे अपना जोड़ा दिखा सकती! फिर तू कहती, ''सईदा, जालिम! तू ऐसे खूबसूरत और प्यारे बच्चे छोड़ इधर कैसे आ गयी?'' वैसे तो उस सवाल का जवाब मेरे पास भी नहीं पर मैं तुझे बताने का यत्न जरूर करूँगी।

सलमा होने के बाद मेरे अब्बा की, खुदा उनकी रूह को जन्नत नसीब करे, वफात हो गयी थी। इसलिए निसार अहमद जैलदार बन गया। हमारी जमीन काफी थी। हमारे सारे इलाके में बड़ा रसूख था और चौधरी निसार अहमद का नाम हर तरफ इज्जत से लिया जाता था। सहज में कोई बड़े-से-बड़ा अफसर भी उन्हें नाराज नहीं कर सकता था। अपने इलाके की वह इज्जत-आबरू थे। यही कारण है कि जब कभी पाकिस्तान की पुलिस लड़कियाँ बरामद करने के लिए छापे मारती, वह हमारे घर की ओर मुँह करने का साहस भी न करती। उन्होंने मुझे स्वयं कई बार बताया कि 'सिविल एंड मिलिटरी गजट' और 'नाए वक्त' में मेरी बरामदी में मदद करने वाले को पाकिस्तान गवर्नमेंट ने एक हंजार रुपया इनाम देने का एलान किया है। उन्होंने मुझे कई बार बड़े प्यार से भी पूछा कि क्या मैं हिन्दुस्तान में अपने माँ-बाप के पास जाना चाहती हँ? अगर मैं चाहती तो वह खुद ही सरहद तक मुझे छोड़ जाते। जब कभी वह ऐसी बात कहने लगते, मैं उनके मुँह के आगे हाथ रखकर बिलखने लगती और कहती, ''अब शायद मैं आप पर भार हो गयी हँ। आप मुझे रखने को राजी नहीं। क्या आप मुझे नईम और सलमा की खातिर भी नहीं रख सकते?'' वह मुझे सीने से लगा लेते और हम एक लम्बे बोसे में यह सारी बात भूल जाते।

पर एक दिन साफ आसमान में एक काली स्याह अँधेरी आयी। गाँव में शोर मच गया कि पुलिस की बहुत-सी गारद आयी है और साथ में पुलिस कप्तान भी है। उसके साथ हिंदुस्तानी पुलिस अंफसर भी हैं। यह पार्टी हमारे घर के आगे पहुँची। उन्होंने पूछा, ''चौधरी साहब कहाँ हैं? यह बात अभी उनके मुँह में ही थी कि निसार अहमद भी बाहर से आ गया। बस, सन्तोष, बाकी की बात तो बताना भी मेरे लिए नामुमकिन है। मेरे खाबिन्द की एक बात न मानी गयी। मैंने मिन्नत की कि 'मैं नहीं जाना चाहती, मुझे न ले जाओ।' मैंने कहा, ''मेरे तो माँ-बाप मर चुके हैं। यह मेरे दो बच्चे हैं। इनकी तरफ देखो।'' मैंने इल्तजा की, ''मैं चौधरी साहब की बीवी हँ और अपनी मरजी से इनसे निकाह करवाया है।'' मैं रोयी, ''चन्द्रकान्ता मर चुकी है और उसमें से मैंने, सईदा ख़ातून ने,जन्म लिया है। आप भूलते हैं।'' मैंने नईम को आगे किया, ''आप इसकी शक्ल को मेरे से मिलाकर देखो। क्या यह आपको मेरा लख्तेजिगर नहीं लगता?'' पर वहाँ तो केवल एक जवाब था, ''हम कानून के हाथों मजबूर हैं। हमें पाकिस्तान गवर्नमेंट की सख्त हिदायत है कि आपको वापस हिन्दुस्तान पहुँचाया जाए।''

उस समय सूरज डूब नहीं रहा था, मैं सच कहती हँ, सन्तोष, उसका इनसानियत के कातिल खून कर रहे थे। वही लाल-काला खून सारे माहौल में बिखर गया था। जिस समय निसार अहमद ने मजबूर होकर मुझे जीप पर चढ़ने में मदद की, वह आप बेहोश होकर गिर पड़ा। रहमत अम्मा ने मेरी बलईयाँ लीं। नईम और सलमा रो रहे थे। उन्हें पुलिस के सिपाही पीछे हटा रहे थे और अम्मा उन्हें तसल्ली दे रही थी कि उनकी वालिदा कहीं बाहर जा रही है और शीघ्र ही वापस आ जाएगी। पर उन मासूमों के दिल को सच्चाई का अनुभव हो चुका था। मैं खुद उड़-उड़कर बाहर गिर रही थी। अचानक जीप चली और मेरे आगे कयामत का अँधेरा छा गया। उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं।

इतने में ईश्वरदास की रोटी आ गयी थी। वह चुपचाप खाने लगा। पर एक कौर भी उसके मुँह में नहीं जा पा रही थी। उसका हाथ वहीं रुक गया और वह विचारों के सागर में बह चला।

''पिताजी!'' एक दिन सन्तोष ने उससे कहा, ''क्या आप अपने हाथ से मेरा गला दबाकर मुझे मार सकोगे?''

वह कहने लगा, ''पागल तो नहीं हो गयी बेटी! भला ऐसा कौन पिता कर सकता है! साफ-साफ कह, क्या कहना चाहती है?''

''ऐसे माँ-बाप भी हैं जिनके अप्रत्यक्ष हाथ अपनी औलादों के गले घोंट देते हैं। कान्ता के दु:ख के हर पक्ष से आप जानकार हैं, मैं उसके लिए आपसे एक दया माँगती हँ। मेरी विनती है, इनकार न करना। वह मर तो पहले ही रही है, अब आपसे 'न' कराकर मरेगी।''

''कुछ बताएगी भी, तोषी?''

''आपसे एक आदमी मिलना चाहता है, मिलाऊँगी मैं।''

''कौन?''

''निसार अहमद! नहीं, नहीं, अब्दुल हमीद।''

''निसार अहमद।।।वह किस तरह यहाँ आ गया? उसे कान्ता का सन्देश किसने भेजा?'' एक ही साँस में कई प्रश्न पूछ लिए ईश्वरदास ने।

''इन सारे प्रश्नों की कोई आवश्यकता नहीं। मैं उसकी बहन हँ, समझ लो, मैं ही इसके लिए जिम्मेदार हँ।''

अचानक ईश्वरदास का हाथ घुटने से फिसलकर सामने थाली से जा टकराया और उसका किनारा उसे चुभ गया। उसने धीरे-से हाथ को मला और सिर को झटककर फिर खाना खाने लगा। आज वह कैसे इन विचारों में घिरा हुआ था, वह स्वयं पर हैरान हो गया।

ईश्वरदास को मजिस्ट्रेट की कचहरी में पेश किया गया। उसे हथकड़ी लगी हुई थी और पुलिस ने उस पर फौजदारी का मुकदमा दायर किया था। उसे उसका अपराध बढ़कर सुनाया गया, जिसका सार यह था कि उसने कूचा नबीकरीम की चन्द्रकान्ता नाम की एक लड़की को वकील होने की हैसियत से जिला गुजरात की सईदा खातून होने की पुष्टि की है और इस तरह उसे धोखे से परमिट दिलवाया है। इस प्रकार चन्द्रकान्ता के पाकिस्तान भाग जाने की साजिश में उसका हाथ है।

उसने देखा कि सामने मोहनलाल, मायावन्ती और सोहनलाल खड़े थे। और भी बहुत-से लोग मुकदमा सुनने आये हुए थे। मोहनलाल कह रहा था, ''देखो यारो, इस तरह का पड़ोसी तो भगवान दुश्मन को भी न दे। हमारी लड़की को इसने पाकिस्तान भगा दिया है। यह हिंदुस्तानी है या देशद्रोही?''

मायावन्ती मुँह ढक कर सुबक रही थी। उसकी आँखों से आँसुओं की धार रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

मोहनलाल चुप था और उसके चेहरे पर चिन्ता के निशान उभरे हुए थे।

सन्तोष बड़े धैर्य से खड़ी सारी कार्यवाही सुन रही थी।

ईश्वरदास ने अपने हक में कुछ भी न कहा। मजिस्ट्रेट ने उसको दो वर्ष की कैद की सजा सुना दी।

और अब ईश्वरदास की आँख तब ही खुली जब वार्डन रोटी के बरतन उठाने आया। उसके मन में कोई चिन्ता न थी, कोई अफसोस न था। जेल की कोठरी की गरमी, यह बेस्वाद रोटी, यह सलाखों वाली खिड़की जिसके पीछे वह बन्द था।।।सब कहीं पीछे रह गये थे। उसे फिर निसार अहमद का खिला हुआ चेहरा दिखाई दिया जिसके प्यार के आँगन में सईदा खातून की खुशी का पौधा फिर से लग गया था। वार्डन को बरतन पकड़ाते हुए वह उठ खड़ा हुआ और उसने सन्तोष से एक डकार ली।


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