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स्पर्श के पल्लव
गो.वि. करंदीकर


अभी भी शाम पीछे रह गयी है। पृथ्‍वी का स्‍पर्श उससे छोड़ा नहीं जाता है। उसके सुनहरे रेशम के हाथ पृथ्‍वी के गले में अटक गये हैं। उसके स्‍पर्श से रेत भी रोमांचित हुई है। आज नारियल के पेड़ मोरपंख बने हैं। अपने पत्‍तों के पंख फुलाकर वे भी पश्चिम दिशा में घुल-मिल गये हैं... । अब अंधेरा भी नहीं रहा और प्रकाश भी नहीं रहा। उनका एक दूसरे से जो स्‍पर्श हो रहा है सिर्फ वही सब कुछ है। सोये बच्‍चे के बदन से माँ जैसे हौले-हौले अपना हाथ खींच लेती है वैसे ही शाम अपना हाथ हौले-हौले हटा रही है। उसकी उँगलियाँ तृप्‍त हैं, अगम्य स्‍पर्श से अभिभूत हैं।

पहले प्राण भी स्‍पर्शरूप था। उस समय इतराते सुवर्णचंपा को नाक नहीं थी। चमेली और जूही के साथ क्रीड़ा करती हवा की लहरों के कान नहीं थे। शर्मीली जबान की जड़ से स्वर नहीं टपकते थे। पहले पेड़ या पहले बीज, जैसा बेवकूफ सवाल कोई किसी से नहीं पूछता था। जिज्ञासा भी नहीं थी और ज्ञान भी नहीं था। मनुष्‍य की खोपड़ी बेधनेवाला वह बिजली का फल अभी तक नहीं दमका था। कोई बोल भी नहीं सकता था और कोई सुन भी नहीं सकता था। वास्‍तव में अभी तक 'कोई' नामक विचित्र जीव पैदा ही नहीं हुआ था। वह तो प्राण का प्रारम्भ था। उस समय सारी इन्द्रियाँ स्पर्श में समा गयी थीं। स्‍पर्श में ही एहसास फैल गया था। वासना अथाह थी, लबालब भरी हुई थी। सृजन का वह प्रभात था। जिस समय प्रथम स्‍पर्श की संवेदना हुई, उसी समय आत्‍मा का जन्‍म हुआ, उसी समय विश्‍व की प्रथम क्रान्ति घटित हुई। उस क्रान्ति का प्रारम्भ आज भी एक गर्भगूढ़ बना हुआ है।

इसलिए मैं स्पर्शवादी हूँ। मुझे लगता है कि हर कलाकार स्पर्शवादी ही होता है। उसकी प्रत्येक कलाकृति इस गर्भगूढ़ क्रान्ति का अनन्तोत्सव मानती रहती है। वस्तु के स्पर्श का भोग लिए बिना मैं पूरी तरह से उसे समझ नहीं सकता। सागौन की लकड़ी से बने चिकने टेबल पर बीच-बीच में हाथ फेरे बिना मुझे अपना कमरा पराया लगने लगता है। काँटा-चम्मच से खानेवाले लोग मेरी राय में हमेशा ही अधपेट ही रहते हैं। चाय पीते समय भी प्याले को हथेली में पकड़कर धीरे-धीरे चुस्कियाँ लेते-लेते चाय पीना ही मुझे अच्छा लगता है। बार-बार फेरे बिना किसी भी फूल की खुशबू को मैं पूरी तरह से महसूस नहीं कर सकता... यथार्थ रूप में नमस्कार करना भी मुझे नहीं आता, उससे कुछ प्रकट नहीं होता, इसलिए जब मैं कुछ कहना चाहता हूँ तब अपने दोस्तों के कंधों पर हाथ रख देता हूँ। फिर शब्दों को अपनी राह मिल सकती है। नहीं तो वे कहीं भी चले जाते हैं, भटकने लगते हैं, अपना ही चक्कर काटने लगते हैं। आसमान पर पीठ घिसने लगते हैं, यों पाताल में छिप जाते हैं, वे पृथ्वी से लिपटते नहीं, अस्तित्व में भीगते नहीं, वे सिर्फ नकली सिक्के रह जाते हैं, लेकिन कंधे पर हाथ रखते ही सब कुछ ठीक हो जाता है। उस स्पर्श के सहारे से शब्दों के होंठ भाव से लिपटने लगते हैं। मेरे सुख-दुख केवल स्पर्श पल्लव की ही भाषा बोल सकते हैं। वही प्राणी की आदिम भाषा है। उसे जब सब कुछ सच-सच ही कहना होता है तब वह स्पर्श के माध्यम से ही कहता रहता है, और वह जो याद करना चाहता है वह भी उसके स्पर्श में ही संचित रहता है।

(इसी शीर्षक के मराठी लेख से। अनुवाद : लीला बांदिबडेकर)


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