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पाप
प्रतिभा राय


दुनिया के सारे पाप व्यक्तिगत होते हैं। मनुष्य किसी खास परिस्थिति में पड़कर निर्दिष्ट, निर्धारित पाप करता है, किन्तु उसका दंडविधान आम फैसले से होता है। मेरा पाप बिल्कुल व्यक्तिगत है। मेरी परिस्थितियाँ भी निजी और विशेष हैं। क्यों किया मैंने यह पाप? किसने दी इस पाप की प्रेरणा? क्या सचमुच मेरा पाप आकस्मिक था? दुनिया की कोई घटना अचानक नहीं घटती। इसलिए मेरा यह पाप भी आकस्मिक नहीं था। इस पाप का पूर्वापर सम्बन्ध कहने बैठ जाऊँ तो छठा वेद लिख जाएगा। परन्तु वह छठे वेद की मर्यादा नहीं पा सकेगा, क्योंकि मैं परमपिता ब्रह्मा नहीं। किन्तु मुझसे उस बारे में भला पूछा ही किसने? क्या किसी ने मुझे दर्द भरे दिल से कहा, … 'तेरा यह पाप आकस्मिक नहीं। इस पाप का कार्य, कारण तू अकेले नहीं, हम सभी हैं, अर्थात यह सारा समाज है। यह समाज-व्यवस्था ही तेरे पाप की प्रेरक है। इसलिए यह समाज भी तेरे पाप का भागीदार है?'

कहाँ, किसी ने तो नहीं दिया ऐसा आश्वासन! मेरे आकाशव्यापी पाप को देखकर पुण्य भी स्तब्ध रह गया।... भले ही मेरी शाप-मुक्ति हो जाए, पर क्या इस अनंत पाप से मुक्ति मिलेगी मुझे? शाप का काल निश्चित होता है, पर पाप का काल तो अनंत होता है। मानो मेरा पाप स्वयं ही महाकाल है। काल को निमित्त बनाकर मनुष्य पाप ही प्रकट करता चलता है। मन कमजोर पड़ जाने पर वासना हावी होने को बाध्य है। सुना है, ब्रह्मा के दाहिने हाथ से धर्म, पीठ से अधर्म, हृदय से काम, भौंहों से क्रोध, निचले होंठ से लोभ, मुख से वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती और पाँव से पाप का आश्रय असत्य उत्पन्न हुए हैं। यह भी सुना है कि ब्रह्मा की देह और मन से पूरे जगत की सृष्टि हुई है। फिर अज्ञानता की पाँच वृत्तियाँ सृष्टि कीं ब्रह्मा ने। तम, मोह, महामोह, तमिस्र और अंध तमिस्र ब्रह्मा ने ही रचे हैं। तो फिर सृष्टिकर्ता ने तमाम पापों और पापमय पृथ्वी की रचना ही की क्यों? जो पापमयी पृथ्वी का सृजन करता है, उसे पाप नहीं लगता - जिसने इस पापमयी पृथ्वी की विवशता भोगी, उसे पाप लगेगा।...

जिस तरह मृत्युहीन जीवन असम्भव है, सम्भवतः उसी तरह पापहीन जीवन भी असम्भव है। दीये की बाती जलने पर ही अपनी आयु के समय का उपभोग करती है और उसके जीवन का उद्देश्य सफल होता है। यदि मैं जीना चाहती हूँ तो हर क्षण किसी-न-किसी बहाने मुझे मरना होगा - प्रकाश के जन्म के लिए अन्तरिक्ष का वक्ष चीरना ही होगा। इसलिए पुण्य की महिमा से दीक्षित होने के लिए सम्भवतः हर क्षण पाप की ज्वाला से पिघलने की आवश्यकता पड़ती है - जीवन पुण्य के बिना सम्भव है, किन्तु पाप के बिना जीवन कहाँ? यदि चाहें तो सभी पुण्य कर सकते हैं किन्तु सभी पाप करना चाहें तो भी नहीं कर सकते। पाप करने के लिए मन में जो दृढ़ता और दुस्साहस होना चाहिए, वह सबमें नहीं होता। मनुष्य सुख पाने की आशा में पाप करता है, पर भोगता दुःख ही है। पाप के डैनों पर दुःख और अन्तर्दाह जो बैठे होते हैं, यह बात पाप करने से पहले भला किसे मालूम होती है।

(ओड़िया लेखक प्रतिभा राय के उपन्यास ' महामोह ' से। उपन्यास अहल्या के आत्मकथन के रूप में लिखा गया है। अनुवादक हैं डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र )


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