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संस्मरण

ग़ालिब छुटी शराब
रवींद्र कालिया


कथा लेखन के साथ कथा गोष्‍ठियों का ऐसा क्रम शुरू हुआ जो आज तक जारी है। यह कहना भी गलत न होगा, मैंने जीवन में जो कुछ भी पाया है कथा लेखन के कारण। जितना भी भारत देखा कहानी ने दिखा दिया। जिंदगी में शादी से ले कर नौकरियाँ और छोकरियाँ तक गर्ज यह कि जो कुछ भी मिला, कहानी के माध्‍यम से ही। कहानी ओढ़ना-बिछौना होती गई, जरियामाश बन गई। कहानी ने नौकरियाँ दिलवाईं तो छुड़वाईं भी। कहानी ने ही प्रेस के कारोबार में झोंक दिया। कहानी के कारण घाट-घाट का पानी पीने का ही नहीं, घाट-घाट का दारू पीने का भी अवसर मिला। अपने बारे में मैं निःसंकोच कह सकता हूँ कि मैंने घाट-घाट का दारू पिया है। आजकल झटपट का जमाना है। झटपट वैभव, वित्‍त और सफलता का जमाना। साहित्‍य में भी लोगों ने झटपट नाम कमाया, चर्चा में आए, मगर झटपट ही परिदृश्‍य से ओझल हो गए। संगीत की तरह साहित्‍य में भी लंबे रियाज की जरूरत है। जो घर जारे आपना चले हमारे साथ। सफर के शुरू में एक लंबा कारवाँ साथ होता है, अमरनाथ की इस दुर्गम यात्रा में बहुत से सहयात्री बीच राह में दम तोड़ देते हैं या चुपचाप बहिर्गमन कर जाते हैं। पग-पग पर झंझा, आँधी और तूफान और मंजिल एक मरिचिका। मगर किसी भी यात्रा की तरह यह यात्रा है बहुत दिलचस्‍प रही। जिंदगी के अनेक रंग देखने को मिले - रंग और बदरंग दोनों। चालीस वर्ष लंबी यात्रा के बाद भी एहसास होता है कि अभी तो मीलों मुझको चलना है। एक अंतहीन यात्रा है यह। एक ऐसी यात्रा कि पाथेय का भी भरोसा नहीं रहता।

मेरे पास तो एक नौकरी थी। अनेक सहयात्री ऐसे भी थे, जिनकी हर सुबह एक नए संघर्ष की सुबह होती थी। वे जेब में बस का पास ठूँस कर निकल जाते थे, एक अनजाने सफर पर। कोई लंबी-चौड़ी महत्वाकांक्षाएँ भी नहीं थीं उनकी। जिंदा थे कि रचनाकर्म से जुड़े थे, इसी के लिए पूरा संघर्ष था। उन दिनों दिल्‍ली में लेखकों की कई जमातें थी। एक जमात साधन संपन्‍न लेखकों की थी और एक जमात फकीर लेखकों की। एक दुनिया अफसर लेखकों की और एक दुनिया मातहत लेखकों की। एक वर्ग समर्पित लेखकों का और एक वर्ग शौकिया लेखकों का। हर कोई इस दौड़ में शामिल था, साथी लेखकों का कंधा छीलते हुए आगे निकल जाने की होड़ थी। प्रत्‍येक रचनाकार रोज एक नए अनुभव से गुजरता था।

एक जमात पुरानी दिल्‍ली के कथाकारों की थी। जैनेंद्र कुमार इस जमात के सरगना थे। जैनेंद्र का जमाना था, अनेक छोटे-मोटे जैनेंद्र कॉफी हाउस में नजर आते थे। पुरानी दिल्‍ली के ठेठ नए रचनाकारों में योगेश गुप्त, भूषण बनमाली, शक्‍तिपाल केवल, अतुल भारद्वाज, और कुछ-कुछ हरिवंश कश्‍यप और सौमित्र मोहन प्रमुख थे। इन में से अधिसंख्‍य कथाकार मसिजीवी थे। कोई चावड़ी बाजार या नई सड़क में प्रूफ पढ़ कर काम चला रहा था तो कोई जैनेंद्र जी की डिक्‍टेशन ले कर अपने को धन्‍य समझ रहा था। वे जैनेंद्र का अनुकरण करने की कोशिश करते, मगर दारू के दो पेग पी कर ही मंटो का अवतार बन जाते। ऊपर से देखने पर जैनेंद्र और मंटो में कोई समानता नजर नहीं आती, मगर दोनों में एक महीन सी समानता थी। सैक्‍स के अँधेरे बंद कमरों में दोनों ताकझाँक करते थे। जैनेंद्र अभिजात में लपेट कर सैक्‍स परोसते थे और मंटो के यहाँ पूरी मांसलता के साथ सैक्‍स मौजूद था - कच्‍चा, फड़फड़ाता हुआ, धड़कता हुआ, जिंदगी के ताजा कटे स्‍लाइस की तरह जीवंत। लेखकों की पुरानी दिल्‍ली की यह जमात जैनेंद्र और मंटो की काकटेल थी। वे साठोत्‍तरी पीढ़ी के बुजुर्ग रचनाकार थे। वे नए कथाकारों के हमउम्र थे, मगर नई कहानी की बस उनसे छूट गई थी। वे साठोत्‍तरी पीढ़ी की बस में भी सवार न हो पाए। कल के लौंडों के साथ सफर करने में उनकी तौहीन थी। इसी क्रम में वह डगर से बिछुड़ गए थे, उनकी अपनी डगर थी। साहित्‍य के नभ में उनका अपना झुंड था। सच तो यह है उनका अपना आकाश था। अपनी परवाज थी। समय भी उनकी रचनाशीलता के साथ न्‍याय नहीं कर पा रहा था। नतीजा यह निकला कि दिल्‍ली में ऐसे लेखकों की एक अलग श्रेणी बन गई जिनकी कहानियाँ स्‍थापित पत्र-पत्रिकाओं में तो स्‍थान प्राप्‍त न कर सकीं, उनके विषबुझे तिक्‍त पत्र खूब प्रकाशित होते थे।

कुछ लेखकों ने तो मुझे ऐसा निशाना बनाया कि मेरी कहानी जिस भी पत्रिका में प्रकाशित होती उसके अगले ही अंक में मेरी कहानी के खिलाफ मोर्चा खुल जाता। मेरी कहानी के साथ-साथ संपादक की भी शामत आ जाती। उसकी भर्त्‍सना करते हुए कहा जाता कि ऐसी घटिया और बेतुकी कहानियाँ छाप कर वे पाठकों का अमूल्‍य समय ही नहीं पत्रिका के पन्‍ने भी नष्‍ट कर रहे हैं। मुझे घुट्‌टी में ही यह महामंत्र पिलाया गया था कि प्रशंसा से बड़े-बड़े लेखकों की लुटिया डूब जाती है, तीखी आलोचना और विवाद से ही लेखक चर्चित होता है। राकेश का तो तकिया कलाम था कि आल सेड एंड डन, मरे हुए घोड़े को कोई नहीं पीटता। बाद में मैंने अपने अनुभव से भी जाना कि प्रशंसा नए लेखकों को प्रायः चर्चा से बाहर कर देती है। यह बात लेखक को समझ में तो आ जाती है मगर तब, जब बहुत देर हो चुकी होती है। मेरे लिए यह सुखद अनुभव था कि मेरी कहानियों के खिलाफ जितने पत्र प्रकाशित होते, कहानियों की जितनी तीखी प्रतिक्रिया होती, उसी अनुपात में मेरी कहानियाँ चर्चा के केंद्र में आ जातीं और उनकी माँग बढ़ जाती। यह दूसरी बात है कि मैंने अथवा मेरी पीढ़ी के अन्‍य कथाकारों ने कभी भी माँग और पूर्ति के हिसाब से लेखन नहीं किया। व्‍यवसायिक पत्रिकाओं के रंगीन चिकने पन्‍नों पर भी साठोत्‍तरी पीढ़ी के रचनाकारों की रचनाएँ सब से कम छपी हैं। अधिसंख्‍य कथाकारों ने अव्‍यावसायिक लघु पत्रिकाओं से ही अपनी पहचान बनाई।

दिल्‍ली के खाँटी नए रचनाकारों में सौमित्र मोहन और अतुल भारद्वाज तालीमयाफ्ता थे और विश्‍वविद्यालय में पढ़ते थे। कभी-कभी ये लोग जगदीश चतुर्वेदी से मिलने दफ्तर आया करते थे। जगदीश पर उन दिनों अकविता का भूत सवार था। वह हमेशा आंदोलित रहता। उन दिनों राजस्‍थान से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका 'लहर' पर जगदीश और उसके गिरोह का कब्जा था। पर्दे के पीछे से प्रभाकर माचवे वगैरह भी देशी -विदेशी एजेंसियों की मदद से 'लहर' के लिए वित्‍त की व्‍यवस्‍था करते रहते। मेरा और जगदीश का दिन भर का साथ रहता, मुझे बहुत-सी जानकारी अनायास ही मिल जाती। एक दिन दिल्‍ली के लेखकों से सूचना मिली कि आगामी सात दिसंबर को योगेश गुप्‍त का जन्‍म दिन है। पता चला कि इस बार वह बहुत धूमधाम से अपना जन्‍मदिन मनाने की तैयारी कर रहा है। उसके मित्र इस बात से बहुत उत्‍तेजित थे। अभी से मदिरा और डिनर की व्‍यवस्‍था की जा रही थी। शाम को कनाट प्‍लेस में घूमते हुए मुझे ख्‍याल आया कि योगेश गुप्‍त के लिए एक अच्‍छा सा बधाई कार्ड खरीदा जाए। खोजते-खोजते मुझे एक उपयुक्‍त कार्ड पसंद आ गया। मैंने कार्ड खरीदा और योगेश गुप्‍त के पते पर पोस्‍ट कर दिया। वह उन दिनों भी यमुनापार के किसी उपनगर में रहता था। कार्ड भेज कर मैं भूल गया। योगेश गुप्‍त कभी मेरे पक्ष में नहीं रहा था, मेरे विरुद्ध यदा-कदा उसके भी पत्र प्रकाशित होते रहते थे, मगर उसका संघर्षशील जीवन मुझे हमेशा चमत्‍कृत करता। वह कभी बहुत ऊँची कला में होता और कभी गहरे अवसाद में। वह तन, मन और धन से साहित्‍य को समर्पित था, जबकि तन मन और धन से वह खस्‍ताहाल ही दिखाई देता था।

शाम को जब चरणमसीह टी-हाउस के दरवाजे बंद करने लगता तो हम लोग टहलते हुए पैदल ही घर की तरफ चल देते। रास्‍ते में थकान महसूस होती तो अगले स्‍टॉप से बस पकड़ लेते। लौटते में कभी-कभी रमेश बक्षी भी साथ हो लेता। उसने उन दिनों एक मोर पाला हुआ था उसे अपने पेट की कम, मोर की ज्यादा चिंता रहती। वह बहुत खुश होता अगर हम भी उसके साथ मोर का हाल-चाल पूछने चल देते। घर में दारू होती तो वह आखिरी बूँद तक इस खुशी में लुटा देता। वह मोर के प्रेम में पड़ चुका था। बिना प्रेम के वह जिंदा ही न रह सकता था। उसका दिल अक्‍सर किराए पर उठा रहता, जिन दिनों दिल किराए के लिए खाली रहता, वह अपने मोर पर दिलोजान से फिदा रहता। वह मूल रूप से एक प्रेमी जीव था। मात्र प्रेम करने से उसका जी न भरता, वह अपने प्रेम का प्रदर्शन करने में भी आनंद उठाता। कई बार वह झूठमूठ का प्रेम प्रपंच भी करता। छुट्‌टी के एक दिन मैं उसके कमरे में डटा हुआ था, वह बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था।

'क्‍यों कोई आनेवाली है क्‍या? ' मैंने पूछा।

'हाँ यार, एक बजे पाँच नंबर की बस के स्‍टॉप पर मिलने को कहा था।'

एक बजने में दस मिनट बाकी थे, हम लोग टहलते हुए अजमल खाँ रोड की तरफ चल दिए। चलते-चलते मुझे अचानक आभास हुआ कि वह सिर्फ अपने प्रेम की धौंस जमाना चाहता है, कोई लड़की-वड़की आनेवाली नहीं। ठीक एक बजे हम लोग बस स्‍टॉप पर थे। बसें लगातार आ-जा रही थीं। उनमें से लड़कियाँ भी उतर रही थी, हर बार वह उचक कर देखता और मेरे साथ रेलिंग पर बैठ जाता।

कोई आधा घंटा तक प्रतीक्षा करने के बाद उसने कहा कि लगता है लड़की किसी जरूरी काम में फँस गई है।

'धीरज रखो, उसने वादा किया है तो जरूर आएगी।' मैंने कहा, 'हो सकता है उस की बस छूट गई हो।'

उसने पंद्रह-बीस मिनट और इंतजार किया और बोला कि उसे भूख लग रही है, कहीं जा कर खाना खाते हैं।

'यार तुम बहुत गैरजिम्‍मेदार आशिक हो। दिल्‍ली में एकाध घंटे की देर तो मामूली-सी बात है। रुको थोड़ी देर और इंतजार करते हैं।' मैंने कहा।

रमेश ने सिगरेट सुलगा ली और कहा कि लड़की को सिगरेट से बेहद एलर्जी है इस वक्‍त सिगरेट पी कर उसे यही दंड दिया जा सकता है। वह लंबे-लंबे कश खींचने लगा। इंतजार में एक घंटा बीत गया, लड़की को नहीं आना था, नहीं आई। मुझे मालूम था, उन दिनों उसके जीवन में कोई लड़की नहीं थी। इसकी एक छोटी-सी पहचान थी। जिन दिनों उसके जीवन में लड़की नहीं होती थी, वह मोर से बहुत प्‍यार करता था। घर से चलते समय उसने मोर से वादा किया था कि वह जल्‍द ही उसके लिए मोतीचूर का लड्‌डू ले कर लौटेगा। वह अब सचमुच लौटना चाहता था, मगर मैंने भी तय कर रखा था कि इतनी आसानी से उसे बस स्‍टॉप से हटने न दूँगा। मैं नितांत फुर्सत में था। तीन बजे तक उसका धैर्य जवाब दे गया, 'मैं अब एक पल न रुकूँगा। भूख के मारे मेरी जान निकल रही है और मेरा मोर भी भूखा होगा।' रमेश ने कहा और पिंड छुड़ा कर यों भागा जैसे कोई गैया खूँटा उखाड़ कर भागती है। वास्‍तव में रमेश बक्षी नादानी की हद तक सरल व्‍यक्‍ति था। उसकी प्रेमिका उससे रूठ जाती तो वह रोने लगता। वह 'माई डियर' किस्‍म का दोस्‍त था। यके बाद दीगरे उसकी कई प्रेमिकाओं ने शादी कर ली थी और वह हाथ मलता रह गया था। एक बार उसने अपनी एक प्रेमिका को मुझसे पत्र लिखवाया कि वह उसे दिलोजान से चाहता है और उससे शादी करना चाहता है। जब तक मेरा पत्र पहुँचता उसकी प्रेमिका की शादी की खबर आ गई। रमेश बक्षी अपने मोर को बाहों में भर कर देर तक बच्‍चों की तरह सिसकियाँ भरता रहा।

जाड़े के दिन थे। हम लोग मूँगफली जेबों में भरे पैदल ही घर लौट रहे थे। मूँगफली खत्‍म हो गई तो बस पकड़ ली। अजमल खाँ रोड पर उतर कर पैदल ही ढाबे तक पहुँचे, जिसे हम 'साँझा चूल्‍हा' के नाम से पुकारा करते थे। हम लोगों ने कई महीनों तक उस ढाबे में भोजन किया था मगर कभी हिसाब की नौबत न आई थी। विमल, हमदम और मुझे कभी मालूम न हुआ कि ढाबे का पैसा हमारे ऊपर निकलता है या हमारा ढाबे के ऊपर। हमदम को लगता कि कर्ज बढ़ गया है तो वह किसी 'एड एजेंसी' में दो-तीन महीने काम करके एकमुश्‍त हजार पाँच सौ रुपए चुका देता। विमल और मैं बारोजगार थे, पहली तारीख को अपनी जेब के मुताबिक भुगतान कर देते। भोजन के समय हमदम हमारे साथ होता वरना ढाबे पर मिल जाता। उस दिन वह ढाबे पर नजर नहीं आया। संत नगर पहुँचे तो कमरे पर मिल गया। कमरे का माहौल गुलजार था। तख्‍त पर योगेश गुप्त, भूषण बनमाली और शक्‍तिपाल केवल आलथी-पालथी मार कर बैठे थे और बेचारा हमदम गिलास, सोडा, बर्फ की व्यवस्‍था में मशगूल था। बीचों-बीच नाथू स्‍वीट्‌स के खुले हुए डिब्‍बे में ढेर-सा तला हुआ काजू रखा था। हमेशा गुरबत की गवाही देनेवाले कमरे में पीटर स्कॉट की बोतलें और गोल्‍ड फ्लेक के पैकट बिखरे हुए था। धुएँ और दारू की गंध से कमरा सुवासित था।

मुझे देखते ही योगेश गुप्‍त बाहें फैलाए मेरी तरफ बढ़ा। मुझे याद आने में एक क्षण की भी देर न लगी कि आज जरूर सात दिसंबर है। मैंने भी जवाबी गर्मजोशी से योगेश को बाहों में भर लिया - मैनी हैप्‍पी रिटर्न्स ऑफ द डे। भूषण बनमाली ने मेरे हाथ में गिलास थमा दिया और सबके गिलास एक दूसरे से टकराए - चीयर्स।

योगेश ने मेरा एक हाथ लिया और दूसरा हाथ मेरे कंधों पर गमछे की तरह फैला दिया - 'दोस्त, मैंने तुझे गलत समझा था। तुम सही मायने में यारों के यार हो। इतनी बड़ी दिल्‍ली में सिर्फ तुम्‍हें मेरा जन्‍म दिन याद रहा। आज सुबह की डाक से तुम्‍हारा बधाई कार्ड मिला तो मुझे बेहद अच्‍छा लगा। अचानक महसूस हुआ कि क्‍लर्कों का यह बेरहम शहर संवेदनशून्‍य हो चुका है। संवेदना का स्‍पर्श सिर्फ बाहर से आनेवाले लोगों में ही शेष है। आज मेरे जेहन में बहुत-सी बातें स्‍पष्‍ट हो गई हैं। आज समझ में आया कि तुमने इतनी जल्दी दिल्‍ली में अपने लिए कैसे जगह बना ली। आज की शाम तुम्‍हारे नाम।'

भोजन के बाद शराब पीने का मुझे अभ्‍यास नहीं था। भूषण बनमाली ने सबके लिए नया पेग ढाल दिया और अपना गिलास सिर के ऊपर ले जाते हुए कहा 'चियर्स।' भूषण बनमाली इन तमाम लोगों में सबसे अधिक वाचाल और तेज-तर्रार था। वह जवाहर चौधरी की तरह खास दिल्ली के अंदाज में बातें करता था - उसे सुन कर कोई भी कह सकता था कि वह ग़ालिब और ज़ौक के शहर का बाशिंदा है। अपनी इन्‍हीं विशेषताओं की बदौलत वह विख्‍यात शायर और फिल्‍म निर्देशक गुलजार के इतना नजदीक चला गया कि दिल्‍ली से मुंबई जा बसा और गुलजार के साथ कई फिल्‍मों पर काम किया, बाद में फिल्‍मी लेखक-निर्देशक के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाई। मैंने भूषण से पूछा कि आजकल वह क्‍या लिख रहा है तो उसने बताया कि वह आजकल हनुमान चालीसा लिख रहा है। चावड़ी बाजार और नई सड़क के प्रकाशक उन दिनों इसी प्रकार की पुस्‍तकें प्रकाशित किया करते थे। भूषण बनमाली राम की कमाई खा रहा था, कभी हनुमान चालीसा का प्रूफ संशोधन करके और कभी रामचरित मानस का। शक्‍तिपाल केवल बहुरूपिया था, कभी लेखक बन जाता, कभी संपादक, कभी प्रकाशक और कभी प्रूफ रीडर। बोतल खत्‍म हो गई तो योगेश गुप्‍त ने जादूगर की तरह पीटर स्‍कॉट की दूसरी बोतल हाजिर कर दी। शाक्‍तिपाल केवल तख्‍त पर नाचने लगा जिओ मेरे राजा। तुम इसी तरह पिलाते रहो हजारों साल।

योगेश गुप्‍त ने अपनी अब तक प्रकाशित तमाम पुस्‍तकों का एक सेट मुझे भेंट किया। मुझे तब तक मालूम ही नहीं था कि योगेश की तब तक इतनी पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वजन में वह किलो से कम न होंगी। वह सचमुच गुदड़ी का लाल था। बाद में मैं दिल्‍ली से मुंबई चला गया तो अपने अमूल्‍य संग्रह की तमाम पुस्‍तकें गंगाप्रसाद विमल की सुरक्षा अभिरक्षा में रखा गया। विमल की रचनात्‍मकता पर इन पुस्‍तकों का गहरा प्रभाव पड़ा, जो आज भी उसकी रचनाओं में चिह्नित किया जा सकता है।

नीचे टैक्‍सीवाला बार-बार हार्न बजा रहा था। योगेश ने आठ घंटे के लिए टैक्‍सी भाड़े पर ले रखी थी। हम लोग देर रात तक दिल्‍ली की खुली वीरान सड़कों पर टैक्‍सी दौड़ाते रहे और बाद में पंढारा रोड पर जा कर भोजन किया। योगेश गुप्‍त ने उस वर्ष जन्‍म दिन पर जैसे तय कर लिया था कि वह सब कुछ लुटा कर ही होश में आएगा। अगले रोज उसके होश ठिकाने लग गए होंगे। वह दिन था और आज का दिन योगेश गुप्‍त की छवि मेरे मन मंदिर में बसी हुई है। उस दिन के बाद किसी भी पत्रिका में मेरे खिलाफ उसका पत्र नहीं छपा। छद्म नाम से जो पत्र इधर पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होते हैं, जानकार लोगों का अनुमान है कि उसके पीछे योगेश गुप्‍त का नहीं, दूसरे रकीबों का हाथ है।

उन दिनों योगेश गुप्‍त दरियागंज का गोर्की था। कुछ दौर ही ऐसा था कि हर शहर का अपना गोर्की होता था। दिल्‍ली चूँकि महानगर था, इसलिए दिल्‍ली के कई गोर्की थे। भूषण बनमाली बिल्‍ली मारान का गोर्की था तो शक्‍तिपाल केवल लाजपत नगर का। दिल्‍ली में उन दिनों कुछ जदीद किस्‍म के कथाकार भी सिर उठा रहे थे। इस लिहाज से उर्दू अफसानानिगार बलराज मेनरा किंग्जवे कैंप का आल्‍बेयर कामू था। उर्दू कथाकारों की एक जमात ऐसी भी थी जो शाम को गजरा लिए जी.बी. रोड के चक्‍कर लगाती थी और उसके सिपहसालार शाम को शराब में धुत्‍त हो कर गिर पड़ते थे, अपने को सआदत हसन मंटो के अवतार से कम न समझते थे। उन दिनों दिल्‍ली का इतना राजनीतिकरण न हुआ था, वहाँ की फिजा शायराना थी। राजकमल चौधरी दिल्‍ली आता तो उसकी उर्दू के शायरों और अफसानानिगारों से ज्यादा छनती, हिंदी के लेखकों की नजर में वह शरतचंद्र का चरित्रहीन था। वह बहुत भावुक किस्‍म का आदमी था, मगर अपने चरित्र की खुद ही धज्जियाँ उड़ाता रहता था। उर्दू के शायर लोग शाम को उसकी तलाश में कनाट प्‍लेस में दर-बदर भटका करते थे। पीने के लिए वह एक बेहतर साथी था। मुद्राराक्षस का उससे कलकत्‍ता का साथ था। उस वक्‍त लग रहा था कि मुद्रा भी राजकमल के पथ का दावेदार है, मगर मुद्रा ने अपने को बहुत सँभाला। उसने धीरे से अपना काँटा बदल लिया।

नई कहानी आंदोलन की और कोई उपलब्‍धि हो न हो, इतना जरूर है उसने कहानी को साहित्‍य की केंद्रीय विधा के रूप में स्‍थापित कर दिखाया था। साहित्‍य में कहानी की तूती बोलती थी। जैनेंद्र कुमार तक परेशान हो उठे थे कि आखिर क्‍या हो गया है जो कहानी की इतनी अधिक चर्चा हो रही है। राकेश, कमलेश्वर और यादव नई कहानी के राजकुमार थे, जिन्‍होंने कहानी के शहंशाओं को धूल चटा कर सिंहासन पर कब्जा कर लिया था। लग रहा था कि वे किसी बिजनेस इंस्टीट्‌यूट से मार्केटिंग का डिप्‍लोमा हासिल करके कथा क्षेत्र में उतरे हैं। समय-समय पर तीनों किसी न किसी महत्‍वपूर्ण कहानी पत्रिका के संपादक रहे, इसके अलावा अन्‍य अनेक पत्रिकाओं का भी वे 'रिमोट कंट्रोल' से संपादन करते रहे। दरियागंज उन दिनों भी साहित्‍य की राजधानी था। 'नई कहानियाँ' का कार्यालय राजकमल प्रकाशन में था और अक्षर प्रकाशन की भी नींव पड़ चुकी थी। 'हंस' का जन्‍म पुनर्जन्‍म नहीं हुआ था, मगर पेट में आ चुका था। योगेश गुप्‍त की टीम राजेंद्र यादव के दरबार में प्रायः दिखाई देती थी। यह कहना ज्यादा गलत न होगा कि योगेश गुप्‍त उन दिनों राजेंद्र यादव का मैत्रेयी पुष्‍पा था और कुछ लोग उसे छोटा जैनेंद्र भी कहते थे। जैनेंद्र जी से मुझे पहली बार योगेश गुप्‍त ने ही मिलवाया था। जैनेंद्र जी अत्यंत स्‍नेह से मिले, अंदाज वही फिलासफराना था, पोशाक गांधीवादी। वह बहुत बारीक कातते थे, कई बार तो सूत दिखाई भी न पड़ता था। मेरा मतलब है उनकी बात पल्‍ले ही न पड़ती थी। उनकी बात योगेश ही समझ सकता था, खग जाने खग ही की भाषा। जैनेंद्र और अज्ञेय में कोई न कोई समानता थी। एक तो यही कि दोनों स्‍नॉब थे। जैनेंद्र जी को अगर गांधीवादी स्‍नॉब कहा जा सकता है तो अज्ञेय को अस्‍तित्‍ववादी स्‍नॉब। उन दिनों मेरा कार्यालय भी दरियागंज में था। नई कहानियाँ का कार्यालय भी, अक्षर प्रकाशन, राजकमल, राधाकृष्ण, भारतीय ज्ञानपीठ, कमलेश्वर, यादव, जैनेंद्र सब दरियागंज में ही थे। मैं दफ्तर की कुर्सी के पीछे अपना कोट टाँग कर ज्यादातर समय इन्‍हीं केंद्रों पर बिताया करता था। शाम को यहीं से हिंदी कहानी के सूरमे फटफटिया पर सवार हो कर कनाट प्‍लेस के लिए निकलते थे।

उन दिनों भी दरियागंज की सड़कों और गलियों में किसी न किसी लेखक से अचानक भेंट हो जाया करती थी। एक दिन दफ्तर से नीचे उतरा तो देखा नीचे पट्‌टी पर राजकमल चौधरी पत्रिकाएँ पलट रहा था।

'किसी का इंतजार कर रहे हो क्‍या?'

'हाँ, तीन बजे लंच है मोती महल में।'

'मोती महल तो तीन बजे बंद हो जाता है।'

'हमारी किस्‍मत में यही बदा है। वक्‍त पर कभी कोई चीज नहीं मिली। आज बियर, जिन और चिकेन का लंच है। यही समझ लो, लंच के बाद लंच है।'

सन साठ के आस-पास दरियागंज के मोतीमहल रेस्‍तराँ का बहुत नाम था। कहा जाता था, कि कभी-कभी पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने मेहमानों के लिए वहाँ से चिकेन मँगवाया करते थे। उन दिनों मोतीमहल की वही साख थी जो आजकल जामा मस्‍जिद के करीम होटल की है। रात को गजल, कव्‍वाली और रंगारंग कार्यक्रमों के बीच मोतीमहल के मुक्‍तांगन में डिनर होता था और लोग गाड़ी में बैठे-बैठे जगह मिलने का इंतजार किया करते थे। आम जनता के लिए मोतीमहल की ही पटरी पर मोतीमहल के नाम से मिलते-जुलते कई ढाबे खुल गए थे, जहाँ किफायती और टिकाऊ भोजन की व्‍यवस्‍था रहती थी। जो लोग मोतीमहल में जाने की हैसियत न रखते, इन्‍हीं ढाबों की शोभा बढ़ाते थे। हम लोग दूसरी कोटि के लोगों में से थे। मोतीमहल तो दूर, हमें ये ढाबे भी महँगे लगते थे। बाहर से कोई लेखक आ जाता तो हम लोग इन्‍हीं ढाबों पर उसकी मेहमाननवाजी करते थे।

राजकमल ने जेब से 'जिन' का अद्धा निकाला और उसकी सील तोड़ कर दोबारा जेब में रख लिया। 'जिन' देख कर मेरी लार टपकने लगी। मुझे लगा, उसकी लाटरी खुल गई है। राजकमल प्रकाशन से उसका उपन्‍यास 'मछली मरी हुई' छप कर आनेवाला था या आ चुका था, मैंने कहा, 'कब तक मरी हुई मछलियों की तिजारत करते रहोगे?'

मेरी बात सुन कर उसने जोरदार ठहाका लगाया, 'आजकल सड़े हुए गलीज माल का ही बाजार गर्म है। कुछ दिनों में इस्‍तेमाल किए हुए सेनेटरी टावल बिका करेंगे।'

'जगदीश को मत बता देना, वह इसी पर एक दर्जन कविताएँ लिख देगा।'

'चलो आज तुम्‍हारी भी ऐश करा देते हैं।' राजकमल ने पूछा, 'सुरेंद्र प्रकाश को जानते हो?'

सुरेंद्र को मैं राजकमल से तो ज्यादा ही जानता था। तब से जानता था जब कहानीकार के तौर पर उसकी मसें भीगनी शुरू हुई थीं। वह सत्‍यपाल आनंद का मित्र था और सत्‍यपाल आनंद की सिफारिश से मैंने उसकी कुछ प्रारंभिक कहानियों का हिंदी अनुवाद किया था। उसकी कहानियों में उन दिनों बहुत लफ्फाजी रहती थी - समुद्र, चाँद, रेत वगैरह-वगैरह। बाद में दिल्‍ली आया तो टी-हाउस में उससे रोज मुलाकात होने लगी। बलराज मेनरा और सुरेंद्र प्रकाश में लिखने की होड़ लगी रहती थी। उर्दू अफसाने की दौड़ में ये दोनों धावक मुँह में रूमाल खोंस कर बेतहाशा भाग रहे थे। कभी मेनरा आगे निकल जाता और कभी सुरेंद्र प्रकाश। दौड़ते-दौड़ते सुरेंद्र प्रकाश तो साहित्‍य अकादमी का पुरस्‍कार प्राप्‍त करने में सफल हो गया, मेनरा का क्‍या हुआ, किसी दिन अकील साहब या फारूकी साहब से दरियाफ्त करूँगा।

'सुरेंद्र प्रकाश को मैं आज से नहीं, बहुत अर्से से जानता हूँ' मैंने राजकमल को बताया।

'खाक जानते हो।' राजकमल ने पूछा, 'उसने तुम्‍हें कभी मोतीमहल में आमंत्रित किया कि नहीं?'

'मैं समझा नहीं।'

'समझोगे भी नहीं।' राजकमल ने कहा। उसी की जु़बानी पता चला, कि सुरेंद्र प्रकाश मोतीमहल के मालिकों का रिश्‍ते में दामाद लगता है और आजकल मोती महल के स्‍टोर का इंचार्ज है। उसने एक नई कहानी लिखी है और उसे सुनाने के लिए राजकमल को लंच पर आमंत्रित किया है। दोपहर को रेस्‍तराँ की सफाई के बाद स्‍वच्‍छ वातानुकूलित माहौल में जिन और बियर की जुगलबंदी के बीच सर्वोत्‍तम भोजन की व्यवस्‍था रहेगी। 'अब तुम्‍हीं बताओ ऐसे मुबारक माहौल के बीच कौन बेवकूफ कहानी सुनेगा? वैसे कितनी अच्‍छी बात है सुरेंद्र प्रकाश छोटी-छोटी कहानियाँ ही लिखता है।'

मुझे यह सोच कर बहुत तकलीफ हो रही थी कि सुरेंद्र प्रकाश से इतने नजदीकी ताल्‍लुकात होने के बावजूद मैं उसके बारे में उतना भी नहीं जानता था जितना यह परदेसी बाबू जानता है। छुट्‌टी के रोज कई बार सुरेंद्र प्रकाश पूरा-पूरा दिन हमारे यहाँ बिताता था, मगर उसने आज तक भनक न लगने दी थी कि वह किसका दामाद है और क्‍या करता है।

'तुम चाहो तो मेरे साथ दावत में शरीक हो सकते हो।' राजकमल ने कहा।

'मैं बिन बुलाए मेहमान की तरह कहीं नहीं जाता।' मैंने कहा और दफ्तर की सीढ़ियाँ चढ़ गया।

दफ्तर में कोई कामधाम नहीं था। मैं और जगदीश कभी श्‍याममोहन श्रीवास्‍तव के कमरे में समय बिताते तो कभी शेरजंग गर्ग और रमेश गौड़ के साथ गप्प लड़ाते। कुलभूषण भी दफ्तर में थे, शायद सहायक निदेशक के पद पर। उन्‍हें नई कहानी को कोसना होता तो वह हम लोगों को बुलवा लेते। उन्‍हें अफसोस था कि उन्‍होंने साहित्‍य में गुटबाजी नहीं की वरना वह राकेश, कमलेश्‍वर और यादव से कहीं आगे निकल जाते। उन्‍हें विश्‍वास था कि इतिहास एक दिन दूध का दूध और पानी का पानी कर देगा। ये लोग बहुत बड़े कथाकार बनते हैं पहले 'ललक' और 'तंत्र' की टक्‍कर की एक भी कहानी लिख कर दिखा दें। यही वह नाजुक क्षण होता था, जब कुलभूषण चपरासी को चाय नाश्‍ता लाने का संकेत करते। जगदीश 'तंत्र' की तारीफ के पुल बाँधता और मैं 'ललक' की। 'ललक' और 'तंत्र' को ले कर मैं और जगदीश आपस में भिड़ जाते। कुलभूषण हम लोगों को शांत करते हुए कहते, 'दरअसल, आप दोनों ठीक फरमा रहे हैं। आप लोग अपनी बात छोड़ दें अभी तक ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास भी तय नहीं कर पाए कि दोनों कहानियों में से कौन बेहतर है।'

'एक सेर है तो दूसरी सवा सेर।' मैं कहता।

कुलभूषण अपने ड्राअर में हम लोगों के लिए विल्‍स का पैकेट रखा करते थे। वह गदगद भाव से हम लोगों को सिगरेट पेश करते। कहानी की तारीफ सुन कर वह बच्‍चों की तरह निहाल हो जाते। बाद में ऐसा वक्‍त आया, उन्‍होंने कहानी पर बातचीत करना एकदम बंद कर दिया। पता चला जीवन में उनसे एक भारी भूल हो गई थी। उन्‍होंने बहुत मेहनत और चाव से बनाया अपना मकान किराए पर उठा दिया था और किराएदार भी ऐसा मिला था, जो न केवल बेदर्दी से मकान का इस्‍तेमाल कर रहा था, अनुबंध के मुताबिक मकान खाली भी नहीं कर रहा था। कुलभूषण मुकदमेबाजी में ऐसा उलझ गए कि दिन भर इसी चिंता में बेहाल रहते। दिन भर वकीलों और कोर्ट कचेहरी के चक्‍कर काटते। उन्‍हें भूख लगती न प्‍यास। उनके पास अच्‍छी-खासी नौकरी थी, भरापूरा परिवार था, पंडित सुदर्शन जैसे विख्‍यात कथाकार का पुत्र होने का गौरव प्राप्‍त था। मेरे मित्र कपिल अग्‍निहोत्री के बड़े भाई दिल्‍ली की न्‍यायिक सेवा में उच्‍चाधिकारी थे। मैं कुलभूषण जी को उनसे मिलाने ले गया। उन दिनों वह दरियागंज में ही डॉ. सुरेश अवस्‍थी के ऊपरवाले फ्लैट में रहते थे। कुलभूषण उन्‍हें अपना केस बताते हुए फफक कर रोने लगे। उन्‍हें देख कर किसी भी संवेदनशील आदमी को किराएदार पर गुस्‍सा आ जाता कि वह एक मासूम, नेकदिल और सीधे-सादे इनसान पर जुल्‍म ढा रहा है। मालूम नहीं कि बाद में उनका मकान खाली हुआ कि नहीं। जब से मकान का बवाल शुरू हुआ, उनका लिखना-पढ़ना चौपट हो गया। उन्‍होंने चाय पिलाना नहीं, पीना भी छोड़ दिया।

सुरेंद्र प्रकाश ने उलाहने का अवसर न दिया और अगले सप्‍ताह मुझे भी कहानी और लंच का निमंत्रण मिल गया। निर्धारित समय पर जब मोतीमहल लंच के लिए बंद हो गया, मैं रेस्‍तराँ की बगल के छोटे द्वार से भीतर घुसा। सबसे पहले सुरेंद्र प्रकाश पर ही नजर पड़ी। उसके सामने एक बड़े से टोकरे में छिले हुए चूजों का ढेर लगा था और वह बैलेंस पर एक-एक चूजे का वजन नोट कर रहा था। जो चूजे मानक के अनुरूप न निकलते, उन्‍हें एक दूसरे टोकरे में फेंक देता। उसने मेरे लिए भी एक स्‍टूल मँगवा लिया और मैं भी तमाशबीन की तरह उसके साथ बैठ गया। चूजों के व्‍यापारी से उसकी बातचीत सुन कर मुझे लगा कि उसे चूजों के बारे में काफी प्रमाणिक जानकारी है। उसे मुर्गे तौलते हुए देख कर मुझे पल भर के लिए यह नहीं लगा कि वह मोतीमहल के मालिकों का दामाद है। अगर वह दामाद था तो जाहिर है वे बहुत बड़े जाहिल होंगे जो अपने दामाद से दो कौड़ी का काम ले रहे थे। काम निपटाने में उसे आधा घंटा का समय और लगा होगा। उसने वाशबेसिन पर हाथ धोए और एक बैरे से कहा कि फौरन से पेश्‍तर खाना लगाए। हम रेस्तराँ में पहुँचे तो खाना लग रहा था। सुरेंद्र प्रकाश ने मेरे लिए भी एक प्‍लेट मँगवाई। उसने पानी का गिलास पिया, सिगरेट सुलगाई और पाँच सात मिनट में छोटी-सी कहानी सुना डाली। मैंने कहानी का अनुवाद करने और उसे हिंदी में छपवाने का आश्‍वासन दिया।

धीरे-धीरे मोतीमहल में लेखकों का आना-जाना बढ़ने लगा। एक दिन मैंने कमलेश्‍वर को मुँह पोंछते हुए रेस्तराँ से निकलते देखा। मुझे लगा, सुरेंद्र प्रकाश अब मोतीमहल का ज्यादा दिन का मेहमान नहीं है। वह इस काम के लिए पैदा भी न हुआ था। कुछ ही दिनों बाद खबर लगी कि वह मोतीमहल से अलग हो गया है। वह टी-हाउस में नियमित रूप से दिखाई देने लगा। बलराज मेनरा से उसकी अदावते फित्री थी। अक्‍सर दोनों में फिक्रःबाजी चलती।

मैं मुंबई चला गया तो वहाँ कुछ दिन सुरेंद्र प्रकाश हमारा मेहमान रहा। शीतलादेवी टेंपल रोड पर ममता और मैं अपना नीड़ बना रहे थे। वह सुबह तैयार हो कर निकल जाता। दिन भर प्रोड्‌यूसरों से मिलता। वह फिल्‍म उद्योग में एक कथाकार के रूप में कम कैरेक्‍टर एक्‍टर के रूप में प्रवेश पाने को अधिक आतुर था। सुबह तैयार होने में काफी समय लगाता, लंबे-लंबे संवादों की रिहर्सल करता। गाँव में पनाले को ले कर पड़ोसियों में कैसे वाक्‌युद्ध होता है, इसका उसने एक लंबा रूपक बाँधा था। सुनते-सुनते पेट में बल पड़ जाते। कुछ वर्षों बाद उसे फिल्‍मों में प्रवेश मिला मगर एक कहानीकार के रूप में। उसने संजीव कुमार और जया भादुड़ी के लिए प्रसिद्ध फिल्म 'अनामिका' का पटकथा लेखन किया था। उसके आगे के संघर्ष के बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं है। एक बार इलाहाबाद में उससे जरूर भेंट हुई थी, जब वह 'शबखून' द्वारा आयोजित किसी विचार गोष्‍ठी में हिस्‍सा लेने आया था।

उन दिनों वयोवृद्ध कथाकार देवेंद्र सत्‍यार्थी भी संतनगर में हमारे यहाँ आया करते थे। उनके व्‍यक्‍तित्‍व पर रवींद्रनाथ ठाकुर के व्‍यक्‍तित्‍व की गहरी छाप थी। वैसी ही लंबी दाढ़ी और फिलासफराना अंदाज। उन्‍हें देख कर लगता था, वह एक गरीब रवींद्रनाथ ठाकुर हैं। उन्‍हें उत्‍तर भारत का आवारा मसीहा भी कहा जा सकता था। वह बहुत सहज इनसान थे। गले में झोला लटकाए किसी समय भी कमरे में नमूदार हो जाते। उनकी एक ही कमजोरी थी। कमजोरी क्‍या, उसे मर्ज ही कहा जाएगा। वह मौके-बेमौके कभी भी बिना किसी भूमिका के झोले से कागजों का पुलिंदा निकाल कर अपनी रचना सुना सकते थे। शुरू-शुरू में तो हम लोगों ने अत्यंत आदरपूर्वक उन की रचनाएँ सुनीं, मगर कुछ ही दिनों बाद यह कसरत अझेल हो गई। उन्‍हें देखते ही हम लोग जूते पहनने लगते, जैसे किसी जरूरी काम से बस निकल ही रहे हों। ऐसा भी समय आया कि वह अपनी इस आदत का खुद ही मजाक उड़ाने लगे। उन्‍होंने अपने बहुत से अनुभव सुनाए कि कहानी सुनाने के चक्‍कर में उन्‍हें कहाँ-कहाँ जलील होना पड़ा। बाद में 'धर्मयुग' में मैं उनके इन चटपटे संस्‍मरणों को प्रकाशित भी करना चाहता था, मगर सत्‍यार्थी जी से संपर्क न हो सका। वह अपने इस मर्ज के बारे में कोई नया लतीफा सुनते तो उसे सुनाने भी चले आते। सत्‍यार्थी ने खुद ही सुनाया था कि एक बार जब उन्‍हें कहानी सुनने के लिए कोई उपयुक्‍त पात्र न मिला तो उन्‍होंने तय किया कि सीधा जनता के बीच जा कर कहानी का पाठ करना चाहिए। इस प्रयोग के लिए उन्‍होंने सबसे पहले गुरूद्वारा रोड को चुना। एक मध्‍यवर्गीय घर के सामने जा कर वह रुके। घर के कपाट खुले थे, जैसे भीतर आने का निमंत्रण दे रहे हों। सामने आँगन था और आँगन में मध्‍यम आयु की एक महिला चूल्‍हे पर रोटियाँ सेंक रही थी। सत्‍यार्थी ने हाथ जोड़ कर विनम्रतापूर्वक उसे नमस्‍कार किया और बताया कि वह एक कहानीकार हैं और एक छोटी-सी कहानी सुनाने की इजाजत चाहते हैं। महिला कुछ समझती, इससे पूर्व ही सत्‍यार्थी जी सामने पड़े पटरे पर बैठ गए और अपने झोले से कहानी का मसविदा निकालने लगे। अचानक उस महिला के तेवर बदल गए, सीधी-सादी उस गृहिणी ने अचानक चंडी का रूप धारण कर लिया। उसने शायद यह सोचा कि कोई पाखंडी साधु बाबा उसे ठगने के लिए घर में घुस आया है। जब तक सत्‍यार्थी अपनी किताब में से अपना चित्र दिखा कर कुछ विश्‍वसनीयता अर्जित करते, उस महिला ने चूल्‍हे की जलती हुई लकड़ी भाँजते हुए सत्‍यार्थी जी को दौड़ा लिया। वह किसी तरह अपनी जान बचा कर गुरुद्वारा रोड से भागे।

उन दिनों टी-हाउस में सत्‍यार्थी के बारे में एक लतीफा बहुत लोकप्रिय हो रहा था। सत्‍यार्थी खुद भी इसे बहुत चाव से सुनते थे। एक बार देवेंद्र सत्‍यार्थी अपना झोला टी-हाउस में भूल आए। आधी रात को उन्‍हें अपने झोले का ध्‍यान आया, जिसमें उनके उपन्‍यास की पांडुलिपि थी। वह उसी समय करोल बाग से कनाट प्‍लेस के लिए चल दिए। धड़कते दिल से उन्‍होंने टी-हाउस का दरवाजा पीटना शुरू किया। उन दिनों टी-हाउस का बैरा चरणमसीह रात को टी-हाउस में ही सोता था। दस्तक सुन कर उसने बत्‍ती जलाई और काँच में से देखा, सत्‍यार्थी सामने खड़े हाँफ रहे थे। उन दिनों लेखकों को कॉफी पिलाते-पिलाते चरणमसीह भी कविताएँ लिखने लगा था। वह सत्‍यार्थी जी से भी परिचित था। उसने दरवाजा खोला और उनकी खैरियत पूछी। सत्‍यार्थी ने झोले की बात बताई तो चरणमसीह ने हामी भरी कि झोला तो मिला है, उसमें कुछ कागजात भी हैं, मगर यह कैसे पता चले कि वह आप का झोला है।

'यह तो बहुत आसान है।' सत्‍यार्थी जी ने कहा, 'तुम झोला ले आओ, मैं तुम्‍हें बता देता हूँ, उसमें क्‍या-क्‍या दस्‍तावेज हैं।'

चरणमसीह झोला लाया तो सत्यार्थी जी ने उसे एक मोटा मसविदा निकालने को कहा और उसका पहला पृष्‍ठ मुँह जुबानी सुना दिया। चरणमसीह ने आश्‍वस्‍त हो कर उनका झोला लौटा दिया। सत्‍यार्थी जी बिगड़ गए, 'ऐसे कैसे ले लूँ। अब तो तुम्‍हें पूरा उपन्‍यास सुनना पड़ेगा....'

अभी अंतर्दृष्‍टि (संपादक : विनोद दास) के नए अंक में मुद्राराक्षस ने दिल्‍ली के उन खुराफाती दिनों की याद करते हुए सत्‍यार्थी जी के एक और बहु प्रचारित लतीफे का जिक्र किया है : सत्‍यार्थी जी को कनाट-प्‍लेस आना था। करोल बाग में उन्‍होंने एक ताँगेवाले से पैसे पूछे। उसने एक रुपया बताया। यह ज्यादा था। सत्‍यार्थी जी ने आठ आने कहे, पर वह राजी नहीं हुआ। तब सत्‍यार्थी जी बोले-ठीक है एक रुपया दूँगा, पर शर्त यह है कि तुम्‍हें मेरी कहानी सुननी पड़ेगी। ताँगेवाला कहानी सुनता हुआ ताँगा चलाता रहा। थोड़ी दूर जा कर ताँगा रुक गया। सत्‍यार्थी जी ने पूछा - भाई ताँगा क्‍यों रोक दिया। ताँगेवाला बोला - ताँगा आगे नहीं जाएगा। आगे जाना चाहते हैं तो कहानी सुनाना बंद कीजिए। सत्‍यार्थी जी नाराज हो गए - तुम से तय हुआ था कि कहानी सुनोगे तभी एक रुपया दूँगा। ताँगेवाला बोला - क्‍या करूँ साहब, मैं तो सुनने को तैयार हूँ, पर यह घोड़ा नहीं मानता।

सत्‍यार्थी जी से मेरी प्रथम भेंट कपिल अग्‍निहोत्री ने करवाई थी। वह उन दिनों सूचना प्रसारण मंत्रालय में काम करता था और दफ्तर में उन की कई रचनाएँ सुनने का गौरव प्राप्‍त कर चुका था। एक दिन कपिल और मैं टी-हाउस के बाहर रेलिंग पर बैठे हुए थे कि अचानक सत्‍यार्थी जी दिखाई दिए। वह लपक कर उनके पास गया और उनसे मेरा परिचय करवाया सत्‍यार्थी जी गर्मजोशी से मेरा हाथ थामते हुए बोले, 'आप से मिल कर बहुत खुशी हुई।' फिर वह कपिल की तरफ घूम गए, 'और आपका परिचय?'

अब कपिल को काटो तो खून नहीं। उसने खुद ही अपना परिचय दिया और उन्‍हें याद दिलाया कि दफ्तर में उनकी कई कहानियाँ सुन चुका है। सत्यार्थी जी ने अपनी डायरी में मेरा पता नोट किया और अगले रविवार को घर आने का वादा कर चले गए।

कपिल के साथ इस तरह की घटनाएँ होती रहती थीं। वह हर समय किसी न किसी काम में व्‍यस्त रहता था। कभी प्रेम में व्‍यस्‍त हो जाता तो कभी किसी नाटक की रिहर्सल में। उसके बारे में चौंकानेवाली सूचनाएँ मिलती रहती थीं। एक बार पता चला कि मुद्राराक्षस किसी नाटक का निर्देशन कर रहे हैं और उन्‍होंने बतौर नायक कपिल का चुनाव किया है। उसकी शामें रिहर्सल में बीतने लगीं। नाटक में कुछ रोमांटिक दृश्‍य थे। वह दिन भर अपने संवाद रटता और आईने के सामने खड़ा हो कर घंटों रिहर्सल करता। रोमांटिक दृश्‍यों में उसका अभिनय इतना स्‍वाभाविक और सजीव होता कि एक दिन मुद्राराक्षस ही उखड़ गए। नाटक की नायिका उनकी कमजोरी थी। मुद्रा को याद होगा कि नहीं कह नहीं सकता, मगर मुझे आज भी याद है वह कौन थी। एक दिन रिहर्सल के दौरान मुद्रा ने उछल कर कपिल का गिरेबान पकड़ लिया और उसे उसी समय नाटक से बाहर कर दिया। कपिल की हरकतें ही कुछ ऐसी थीं कि वह बहुत जल्‍द विवादों के घेरे में आ जाता। कुछ दिनों तक वह दूरदर्शन का समाचार संपादक भी रहा और वहाँ भी खुद खबर बन गया, जब उसने पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश के एक अति संवेदनशील नगर के सांप्रदायिक दंगे की रिपोर्ट पेश करते हुए समाचार में सुअरों का 'विजुअल' दिखा दिया था। उसे उस पद से भी हाथ धोना पड़ा था। मगर नौकरी करते-करते एक दिन वह मुंबई में सेंसर बोर्ड तक पहुँच गया और एक अर्से तक उसके दस्‍तखतों से सेंसर प्रमाणपत्र जारी होते रहे। उससे मेरी अंतिम भेंट महाकुंभ के दौरान प्रयाग में हुई थी। मुझे खुशी हुई कि उसका पुराना तेवर और अंदाज बरकरार था। दिल्‍ली में हम लोग लगभग दो वर्ष तक साथ-साथ रहे, मगर वह अचानक लापता हो गया।

वह उम्र ही ऐसी थी कि जो भी दोस्‍त प्‍यार में मुब्‍तिला होता, सबसे पहले अपने दोस्‍तों से कट जाता। उन दिनों उसका भी प्रेम चल रहा था और वह उसी में ओवर टाइम करने लगा। ममता से मेरा सान्‍निध्‍य बढ़ा तो मैंने भी यकायक टी-हाउस से कन्‍नी काट ली। एक दिन मोहन राकेश ने शरारत से मेरी आँखों में झाँकते हुए कहा कि यह कहाँ की दोस्‍ती है कि तुम लाबोहीम में कापूचिनो सिप करते हुए दिखाई पड़ते हो। दरअसल लाबोहीम के अँधेरे कोने ममता को कुछ ज्यादा ही रास आ रहे थे। ममता उन दिनों दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से संबद्ध एक कॉलिज में अंग्रेजी की लेक्‍चरर थी। उसे प्रभावित करने के इरादे से मैं चार छह-रोज में ही अपना वेतन फूँक देता। उसे टैक्‍सी में शक्‍ति नगर छोड़ता और खुद बस में धक्‍के खाते हुए घर लौटता। कृष्‍ण सोबती भी कभी-कभी 'लाबोहीम' में दिखाई देतीं, वह एक कोने में चुपचाप कॉफी सिप करतीं। उनके हाथों में अंग्रेजी की कोई न कोई मोटी पुस्‍तक जरूर दिखाई देती। ममता उन दिनों ममता अग्रवाल थी और उसे उन दिनों अपना पर्स खोलने का अभ्‍यास ही नहीं था। मुझे लगता कि वह केवल शोभा के लिए पर्स हाथ में ले कर चलती थी। शादी के बाद ही उसे पर्स खोलने का शऊर आया, मेरा मतलब है उसकी पैसा खर्च करने की झिझक खुली।

केंद्रीय हिंदी निदेशालय दरियागंज से प्रगति मैदान में चला गया तो दफ्तर में फोन की सुविधा कम हो गई। शुरू-शुरू में केवल अधिकारियों के फोन शिफ्ट हो पाए। दफ्तर में ममता का फोन आता तो उपनिदेशक महोदय लड़की की आवाज सुन कर बेरहमी से फोन काट देते। उन्‍होंने एक लड़की गोद ली थी और अब वह लड़की जवान हो गई थी। वह उसकी शादी के लिए योग्य वर ढ़ूँढ़ रहे थे। मुझे भी शादी और प्रमोशन के प्रलोभन मिल रहे थे। उन्‍होंने मुझे फोन पर बुलाना ही छोड़ दिया, चाहे वह मोहन राकेश का ही फोन क्‍यों न हो। मिसेज तिक्‍कू दिल्‍ली में अकेली रहतीं थीं। मिस्‍टर तिक्‍कू कौन थे, कहाँ थे, कोई नहीं जानता था, मगर इतना स्‍पष्‍ट था कि उनके दांपत्‍य में कोई सलवट जरूर आ चुकी थी। वह अपने में मस्‍त रहतीं, उनकी साख भी बहुत अच्‍छी थी। दफ्तर में हर कोई बहुत आदरपूर्वक उनका नाम लेता। मैंने मिसेज तिक्‍कू को बताया कि मैं शादी-ब्‍याह के झंझट में पड़ना नहीं चाहता। उन्‍हें प्रसन्‍न करने के लिए मैंने यहाँ तक कहा कि कैसे दो इनसान जिंदगी भर साथ-साथ रहने की कल्‍पना कर सकते हैं। मुझे तो यह संभव ही नहीं लगता। वही लोग शादी करते होंगे जो अपनी स्वतंत्रता के दुश्‍मन हो जाते हैं। मिसेज तिक्‍कू मेरे विचारों से बहुत प्रसन्‍न हुईं और उन्‍होंने किसी तरह उपनिदेशक महोदय से मेरा पिंड छुड़वाया, जो मेरी शादी में ही नहीं, मेरी पदोन्‍नित में भी गहरी दिलचस्‍पी ले रहे थे। उन दिनों भारतीय ज्ञानपीठ का कार्यालय भी दरियागंज में था। जवाहर चौधरी उसके व्‍यवस्थापक थे। ममता को कोई संदेश देना होता तो वह भारतीय ज्ञानपीठ में फोन कर देती और जवाहर चौधरी मुझे उसका संदेश पहुँचा देते। उन दिनों 'भाषा' का मुद्रण नासिक के राजकीय मुद्रणालय में होता था। अफसर तो अफसर होता है, आहत हो जाए तो साँप से भी ज्यादा खतरनाक होता है। मुझे न्‍यूनतम दंड यही दिया जा सकता था कि 'भाषा' के अगले अंक का मुद्रण करवाने नासिक रवाना कर दिया जाय। इस क्षेत्र में मेरा कोई अनुभव नहीं था। जाहिर है किसी भी अनुभवहीन व्‍यक्‍ति से भूलें होंगी और भूलें नहीं होंगी तो स्‍पष्‍टीकरण कैसे माँगा जा सकता है। कुछ लोग हर सरकारी काम को आमदनी का जरिया बना लेते हैं। एक अधिकारी ने मेरे साथ जाने के लिए तरकीब निकाल ही ली। इससे मुझे बहुत राहत मिली


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