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नाटक

नीलदेवी -
भारतेंदु हरिश्चंद्र

अनुक्रम

अनुक्रम अध्याय 1     आगे

।। ऐतिहासिक गीतिरूपक ।।



‘गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ मधु यावत्पिवाम्यहं।
मयात्वयिहतेऽत्रैव गर्जिष्यन्याशु देवताः।: ’
‘त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः।
यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ।।’
‘इत्थं सदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
तदातदाऽवतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ।।
‘स्त्रियः सस्ताः सकलाः जगत्सु त्वयैका पूरितमम्बमेतत्,
नाटकस्थ पात्रगण
सूर्य देव : पंजाब प्रान्त का राजा।
सोमदेव : सूर्यदेव का पुत्र।
अब्दुश्शरीफ खाँ सूर : दिल्ली के बादशाह का सिपहसालार।
बसन्त : पागल बना हुआ महाराज सूर्यदेव का नौकर।
पं. विष्णु शर्मा : मौलवी के भेष में राजा का पंडित।
नीलदेवी : महाराज सूर्यदेव की रानी।
चपरगटटू और पीकदान अली दो मुफ्तखोरे।
देवसिंह इत्यादि सिपाही, राजपूत सर्दार।
मुसल्मान मुसाहिब, काजी, भटियारी, देवता, अप्सरा इत्यादि
मातृ भगिनी सखी तुल्या आर्य ललना गण।
आज बड़ा दिन है। क्रिस्तान लोगों को इससे बढ़कर कोई आनन्द का दिन नहीं है। किन्तु मुझ को आज उलटा और दुख है। इस कारण मनुष्य स्वभाव सुलभ ईर्षा मात्र है। मैं कोई सिद्ध नहीं कि रागद्वेषू से विहीन हूँ। जब मुझे अंगरेजी रमणी लोग मेदसिंचित केश राशि कृतृम (त्रि?) कुन्तलजूट, मिथ्या रत्नाभरण और विविध वर्ण वसन से भूषित क्षीण कटि देश कसे, निज निज पति गण के साथ, प्रसन्न बदन इधर से उधर फर फर कल की पुतली की भाँति फिरती हुई दिखलाई पड़ती हैं तब इस देश की सीधी साधी स्त्रियों की हीन अवस्था मुझको स्मरण आती है और यही बात मेरे दुख का कारण होती है। इससे यह शंका किसी को न हो कि मैं स्वप्न में भी यह इच्छा करता हूँ कि इन गौरांगी युवती समूह की भाँति हमारी कुललक्ष्मी गण भी लज्जा को तिलांजलि देकर अपने पति के साथ घूमै; किंतु और बातों में जिस भांति अंगरेजी स्त्रियाँ सावधान होती हैं, पढ़ी लिखी होती हैं, घर का काम काज सम्हालती हैं, अपने संतान गण को शीक्षा (शि?) देती हैं, अपना स्वत्व पहचानती हैं, अपनी जाति और अपने देश की सम्पत्ति विपत्ति को समझती हैं, उसमें सहाय देती हैं, और इतने समुन्नत मनुष्य जीवन को व्यर्थ ग्रह (गृ?) दास्य और कलह ही में नहीं खोतीं उसी भाँति हमारी गृह देवता भी वत्र्तमान हीनावस्था को उल्लंघन करके कुछ उन्नति प्राप्त करें, यही लालसा है। इस उन्नति पथ की अवरोधक हम लोगों की वर्तमान कुल परंपरा मात्र है और कुछ नहीं है। आय्र्य जन मात्र को विश्वास है कि हमारे यहाँ सव्र्वदा स्त्रीगण इसी अवस्था में थीं। इस विश्वास को भ्रम को दूर करने ही के हेतु यह ग्रंथ विरचित हो कर आप लोगों के कोमल कर कमलों में समर्पित होता है। निवेदन यही है कि आप लोग इन्हीं पुण्यरूप स्त्रियों के चरित्र को पढें, सुनें और क्रम से यथा शक्ति अपनी वृद्धि करें।
25 दिसंबर 1881 गं्रथकत्र्ता


 

नीलदेवी



ऐतिहासिक गीतिरूपक



वियोगांत


प्रथम दृश्य


हिमगिरि का शिखर
(तीन अप्सरा गान करती हुई दिखाई देती हैं)
अप्सरागण.. (झिंझोटी जल्द तिताला)
धन धन भारत की छत्रनी।
वीरकन्यका वीरप्रसविनी वीरवधू जग जानी।।
सती सिरोमनि धरमधुरन्धर बुधि बल धीरज खानी।
इन के जस की तिहँू लोक में अमल धुजा फहरानी ।।
सब मिलि गाओ प्रेम बधाई।
यह संसार रतन इक प्रेमहिं और बादि चतुराई ।।
प्रेम बिना फीकी सब बातैं कहहु न लाख बनाई।
जोग ध्यान जप तप व्रत पूजा प्रेम बिना बिनसाई ।।
हाव भाव रस रंग रीति बहु काव्य केलि कुसलाई।
बिना लोन विंजन सो सबही प्रेम रहित दरसाई ।।
प्रेमहि सो हरिहू प्रगटत हैं जदपि ब्रह्म जगराई।
तासों यह जग प्रेमसार है और न आन उपाई ।।


 

दूसरा दृश्य


युद्ध के डेरे खड़े हैं।
एक शामियाने के नीचे अमीर अबदुश्शरीफ खाँ सूर बैठा है और मुसाहिब लोग इर्द गिर्द बैठे हैं।
शरीफ : एक मुसाहिब से, अबदुस्समद! खूब होशियारी से रहना। यहाँ के राजपूत बड़े काफिर हैं। इन कमबख्तों से खुदा बचाए। ख्दूसरे मुसाहिब से, मलिक सज्जाद! तुम शव के पहरों का इन्तिजाम अपने जिम्में रक्खो न हो कि सूरजदेव शबेखून मारे। ख्काजी से, काजी साहब! मैं आप से क्या बयान करूँ, वल्लाही सूरजदेव एक ही बदबला है। इहातए पंजाब में ऐसा बहादुर दूसरा नहीं।
काजी : बेशक हुजूर! सुना गया है कि वह हमेशा खेमों ही में रहता है। आसमान शामियाना और जमीन ही उसे फर्श है। हजारों राजपूत उसे हरवक्त घेरे रहते हैं।
शरीफ : वल्लाह तुमने सच कहा, अजब बदकिरदार से पाला पड़ा, जाना तंग है। किसी तरह यह कमबख्त हाथ आता तो और राजपूत खुद बखुद पस्त हो जाते।
1 मुसाहिब: खुदाबन्द! हाथ आना दूर रहा उसके खौफ से अपने खेमे में रह कर भी खाना सोना हराम हो रहा है।
शरीफ : कभी उस बेईमान से सामने लड़ कर फष्तह नहीं मिलनी है। मैंने तो अब जी में ठान ली है कि मौका पाकर एक शब उसको सोते हुए गिरफ्तार कर लाना। और अगर खुदा को इस्लाम की रोशनी का जिल्वा हिन्दोस्तान जुल्मत निशान में दिखलाना मंजूर है तो बेशक मेरी मुराद बर आएगी।
काजी : इन्शा अल्लाह तआला।
शरीफ : कसम है कलामे शरीफ को मेरी खुराक आगे से इस तफक्कुर में आधी हो गई है। सब लोगों से, देखो अब मैं सोने जाता हूँ तुम सब लोग होशियार रहना।
गजल,
उठ कर सब की तरफ देख कर,
इस राजपूत से रहो हुशियार खबरदार।
गफलत न जष्रा भी हो खबरदार खबरदार ।।
ईमाँ की कसम दुश्मने जानी है हमारा।
काफिर है य पंजाब का सरदार है खबरदार ।।
अजदर है भभूका है जहन्नुम है बला है।
बिजली है गजब इसकी है तलवार खबरदार ।।
दरबार में वह तेग़े शररवार न चमके।
घरबार से बाहर से भी हर बार खबरदार ।।
इस दुश्मने ईमाँ को है धोखे से फँसाना।
लड़ना न मुकाबिल कभी जिनहार खबरदार ।।
(सब जाते हैं)

 

तीसरा दृश्य


पहाड़ की तराई
(राजा सूर्यदेव, रानी नीलदेवी और चार राजपूत बैठे हैं)
सू : कहो भाइयो इन मुसलमानों ने तो अब बड़ा उपद्रव मचाया है।
1 ला. : तो महाराज! जब तक प्राण हैं तब तक लडे़ंगे।
2 रा : महाराज! जय पराजय तो परमेश्वर के हाथ है परंतु हम अपना धम्र्म तो प्राण रहे तक निवाहैं ही गे।
सू. : हाँ हाँ, इसमें क्या संदेह है। मेरा कहने का मतलब यह है कि सब लोग सावधान रहैं।
3 रा. : महाराज! सब सावधान हैं। धम्र्म युद्ध में तो हमको जीतने वाला कोई पृथ्वी पर नहीं है। 
नी.दे. : पर सुना है कि ये दुष्ट अधम्र्म से बहुत लड़ते हैं।
सू. : प्यारी। वे अधम्र्म से लडें़ हम तो अधम्र्म नहीं न कर सकते। हम आर्यवंशी लोग धम्र्म छोड़ कर लड़ना क्या जानैं? यहां तो सामने लड़ना जानते हैं। जीते तो निज भूमि का उद्धार और मरे तो स्वर्ग। हमारे तो दोनों हाथ लड्डू हैं; और यश तो जीतै तो भी हमारा साथ है और मरैं तो भी। 
4 था. : महाराज। इसमें क्या संदेह है, और हम लोगों को एकाएकी अधम्र्म से भी जीतना कुछ दाल भात का गस्सा नहीं है।
नी.दे. : तो भी इन दुष्टों से सदा सावधान ही रहना चाहिए। आप लोग सब तरह चतुर हो मैं इसमें विशेष क्या कहूँ स्नेह कुछ कहलाए बिना नहीं रहता।
सू. दे. : (आदर से) प्यारी। कुछ चिंता नहीं है अब तो जो कुछ होगा देखा ही जायगा न। (राजपूतों से)।
सावधान सब लोग रहहु सब भाँति सदाहीं।
जागत ही सब रहैं रैनहूँ सोअहिं नाहीं ।।
कसे रहैं कटि रात दिवस सब वीर हमारे।
असव पीठ सो होंहि चारजामें जिनि न्यारे ।।
तोड़ा सुलगत चढ़े रहैं घोड़ा बंदूकन।
रहै खुली ही म्यान प्रतंचे नहिं उतरें छन ।।
देखि लेहिंगे कैसे पामर जवन बहादुर।
आवहिं तो चड़ि सनमुख कायर कूर सबै जुर ।।
दैहैं रन को स्वाद तुरंतहि तिनहिं चखाई।
जो पै इक छन हू सनमुख ह्नै करिहिं लराई ।।
(जवनिका पतन)

 

चौथा दृश्य


सराय
(भठियारी, चपरगट्टू खाँ और पीकदान अली)
चप. : क्यों भाई अब आज तो जशन होगा न? आज तो वह हिंदू न लड़ेगा न।
पीक. : मैंने पक्की खबर सुनी है। आज ही तो पुलाव उड़ने का दिन है। 
चप. : भई मैं तो इसी से तीन चार दिन दरबार में नहीं गया। सुना वे लोग लड़ने जायंगे। मैंने कहा जान थोड़ी ही भारी पड़ी है। यहाँ तो सदा भागतों के आगे मारतों के पीछे। जबान की तेग कहिए दस हजार हाथ झारूँ।
पीक. : भई इसी से तो कई दिन से मैं भी खेमों की तर्प$ नहीं गया। अभी एक हफ्ता हुआ मैं उस गाँव में एक खानगी है उसके यहाँ से चला आता था कि पाँच हिन्दुओं के सवारों ने मुझे पकड़ लिया और तुरक तुरक करके लगे चपतियाने। मैंने देखा कि अब तो बेतरह फँसे मगर वल्लाह मैंने भी अपने कौम और दीन की इतनी मजष्म्मत और हिन्दुओं की इतनी तारीफ की कि उन लोगों को छोड़ते ही बन आई। ले ऐसे मौके पर और क्या करता? मुसल्मानी के पीछे अपनी जान देता? 
चप. : हाँ जी किसकी मुसल्मानी और किसका कुफ्र। यहाँ अपने मांडे़ हलुए से काम है।
भठि. : तो मियाँ आज जशन में जाना तो देखो मुझको भूल मत जाना। जो कुछ इनाम मिलै उसमं भी कुछ देना। हाँ! देखो मैंने कई दिन खिदमत की है।
पीक. : जरूर जरूर जान छल्ला। यह कौन बात है तुम्हारे ही वास्ते तो जी पर खेलकर यहाँ उतरें हैं। (चपरगट्टू से कान में) यह सुनिए जान झोवें$ हम माल चाभैं बी भटियारी। यह नहीं जानतीं कि यहाँ इनकी ऐसी ऐसी हजारों चरा कर छोड़ दी हैं।
चप. : (धीरे से) अजी कहने दो कहने से कुछ दिये ही थोड़े देते हैं। भटियारी हो चाहे रंडी, आज तो किसी को कुछ दिया नहीं है उलटा इन्हीं लोगों का खा गए हैं (भटियारी से) वाह जान तक हाजिर है। जब कहो गरदन काट कर सामने रख दूँ। (खूब घूरता है।)
भटि. : (आँखें नचाकर) तो मैं भी तो मियाँ की खिदमत से किसी तरह बाहर नहीं हौं।
दोनो गाते हैं, 
पिकदानों चपरगट्टू है बस नाम हमारा।
इक मुुफ्त का खाना है सदा काम हमारा ।।
उमरा जो कहै रात तो हम चाँद दिखा दें।
रहता है सिफारिश से भरा जाम हमारा ।।
कपड़ा किसी का खाना कहीं सोना किसी का।
गैरों ही से है सारा सरंजाम हमारा ।।
हो रंज जहाँ पास न जाएँ कभी उसके।
आराम जहाँ हो है वहाँ काम हमारा ।।
जर दीन है कुरप्रान है ईमां है नबी है।
जर ही मेरा अल्लाह है जर राम हमारा ।। 
भटि. : ले मैं तो मियाँ के वास्ते खाना बनाने जाती हूँ।
पिकदान : तो चलो भाई हम लोग भी तब तक जरा ‘रहे लाखों बरस साकी तेरा आबाद मैखाना’।
चपर. : चलो।
(जवनिका पतन)

 

पंचम दृश्य


(सूर्यदेव के डेरे का बाहरी प्रान्त)
(रात्रि का समय)
देवा सिंह सिपाही पहरा देता हुआ घूमता है।
नेपथ्य में गान
(राग कलिगड़ा)
सोंओ सुख निंदिया प्यारे ललन।
नैनन के तारे दुलारे मेरे बारे 
सोओ सुख निंदिया प्यारे ललन।
भई आधी रात बन सनसनात, 
पथ पंछी कोउ आवत न जात,
जग प्रकृति भई मनु थिर लखात 
पातहु नहिं पावत तरुन हलन ।।
झलमलत दीप सिर धुनत आय, 
मनु प्रिय पतंग हित करत हाय,
सतरात अंग आलस जनाय, 
सनसन लगी सिरी पवन चलन।
सोए जग के सब नींद घोर, 
जागत काम चिंतित चकोर,
बिरहिन बिरही पाहरू चोर, 
इन कहं छन रैनहूं हाय कल न ।।
सिपाही : बरसों घर छूटे हुए। देखें कब इन दुष्टों का मुँह काला होता है। महाराज घर फिर कर चलैं तो देस फिर से बसै। रामू की माँ को देखे कितने दिन हुए। बच्चा की खबर तक नहीं मिली (चैंक कर ऊँचे स्वर से) कौन है? खबरदार जो किसी ने झूटमूठ भी इधर देखने का विचार किया। (साधारण स्वर से) हां-कोई यह न जानै कि देवासिंह इस समय जोरू लड़कों की याद करता है इससे भूला है। क्षत्री का लड़का है। घर की याद आवै तो और प्राण छोड़कर लडै़। (पुकारकर) खबरदार। जागते रहना।
(इधर उधर फिर कर एक जगह बैठकर गाता है)
(कलिगड़ा)
प्यारी बिन कटत न कारी रैन।
पल छिन न परत जिय हाय चैन ।।
तन पीर बढ़ी सब छुटयो धीर,
कहि आवत नहिं कछु मुखहु बैन।
जिय तड़फड़ात सब जरत गात,
टप टप टकत दुख भरे नैन ।।
परदेस परे तजि देस हाय,
दुख मेटन हारो कोउ है न।
सजि विरह सैन यह जगत जैन,
मारत मरोरि मोहि पापी मैन ।।
प्यारी बिन कटत न कारी रैन।
(नेपथ्य में कोलाहल)
कौन है। यह कैसा शब्द आता है। खबरदार।
(नेपथ्य में विशेष कोलाहल)
(घबड़ाकर) हैं यह क्या है? अरे क्यों एक साथ इतना कोलाहल हो रहा है। बीर सिंह! बीर सिंह! बीर सिंह जागो। गांविद सिंह दौड़ो!
नेपथ्य में बड़ा कोलाहल और मार मार का शब्द। शस्त्र खींचें हुए अनेक यवनों का प्रवेश। अल्ला अकबर का शब्द। देवासिंह का युद्ध और पतन। यवनों का डेरे में प्रवेश। पटाक्षेप।


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