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कहानी

आखिरी तिनका
गुलज़ार सिंह संधु

अनुवाद - अशोक कोचर


पतझड़ के दिन थे। नई फसल की बोआई शुरू हो चुकी थी। मुर्गे की पहली बाँग ने चन्दन की आँख खोल दी। वैसे भी उसे झपकी आये अभी आध-पौन घंटा ही हुआ था। कई दिनों से उसे अच्छी तरह नींद नहीं आ रही थी। दिन-रात उसे फातमा की चिन्ता खाए जा रही थी। आँखें मलता हुआ वह उठकर बैठ गया। खेत में जाकर कोई काम ही करे, उसने सोचा और फावड़ा कन्धे पर रखकर चल दिया।

अपने विचारों में ही वह चलता जा रहा था कि उसका पाँव एक दलदल में जा फँसा। यह दलदल नई खोदी गयी नहर की मिट्टी का था, जिसमें गत रात्रि को वर्षा का पानी रिस आया था। पैर निकालकर और नहर की मिट्टी की ओर देखकर वह और भी उदास हो गया। उसे नहर के खोदे जाने की कोई खुशी न थी। आगे ही उसका खेत चकबन्दी के कारण गाँव से दूर झाड़ियों वाली भूमि में पड़ गया था और जो थोड़ी-बहुत अच्छी भूमि उसके पास बच रही थी, उसमें नहर खुद गयी थी। सबसे बड़ी दुख की बात तो यह थी कि इस नहर का पानी उसकी जमीन को नहीं मिलता था। उसके गाँव की भूमि नहर के पानी की सतह से बहुत ऊँची थी। यह पानी दस मील और आगे जाकर किसी निचली भूमि से गुजरता था। इसीलिए उसे नहर को देखकर क्रोध-सा आ जाता था। इस क्रोध को मिटाने के लिए वह अपना ध्यान काम में लगाने का यत्न करता। शायद चन्दन के लिए काम ही सब दुखों की दवा थी।

उस दिन भी वह अपना फावड़ा और कुल्हाड़ा लेकर खेत में चला गया था। चाँद की चाँदनी में उसे कुछ यूं लगा जैसे झाड़ियों आदि की सफाई हो जाने पर उसकी धरती उसे फिर अपने पैरों पर खड़ा कर देगी। उसकी अपने आप ही काम करने की इच्छा हो आयी। उसी तरह दलदली मिट्टी से सने पैरों के साथ वह उस बेर के पेड़ की जड़ें उखाड़ने लग गया, जहाँ से पिछली रात बहुत अँधेरा हो जाने के कारण फातमा उसे काम करते हुए ही हटा ले गयी थी। रात वाली जड़ पर प्रहार करते हुए उसे फातमा की याद आ गयी। यदि उसने विभाजन के दिनों में फातमा को अपने यहाँ शरण दी थी, तो उसने कौन-सी किसी की जायदाद मार ली थी!उसने सोचा। गाँववाले बेकार ही उससे उखड़े-से रहते थे। उसे अपने भाई-बन्धुओं की हर तरह की बात सहनी थी, लेकिन वह किसी का क्या खाता था जो उनकी परवाह करता। उन्हीं दिनों दो खेत निचाई में ठीक उसके घर के सामने थे। केवल उन दो खेतों की कमाई से ही उसका गुंजारा हो जाता था। तब वह नम्बरदार की भी परवाह नहीं करता था, परन्तु चकबन्दी ने उसकी लुटिया ही डुबो दी थी। शत्रुओं ने उसकी सारी जमीन गाँव से दूर उस भूमि में पड़वा दी थी, जहाँ अब नहर की खुदाई हो रही थी। सारा गाँव उसका बैरी हो गया था। चन्दन की बिरादरी मुसलमान लड़की फातमा का उसके घर बसना मांफ नहीं करती थी। और तो और, उसकी मां भी फातमा को अपनी बहू नहीं बनाना चाहती थी। यहाँ तक कि उसने नम्बरदार के लड़के को कहकर फातमा को ले जाने के लिए पुलिस को खबर करवा दी थी।

चन्दन को इस बात का पता लग चुका था। ंफातमा का विलग होना तो वह बिलकुल सहन नहीं कर सकता था। वह नम्बरदार की मिन्नत-खुशामद करके ंफातमा को अपने घर ही रख लेगा।उसने सोचा, नम्बरदार के कहने पर पुलिस वाले क्या नहीं कर सकते? इतना सोचकर वह अपने आपको हल्का-हल्का-सा अनुभव करने लगा।

हल्का-सा होकर वह पेड़ की खोदी गयी मिट्टी पर बैठ गया। अँधेरे में उसने चारों ओर देखा। चारों ओर मौन छाया हुआ था। पौ-फटने के कारण यह मौन और भी गहरा हो गया था। धीरे-धीरे उसे इस मौन में से बैलों की घंटियों आवांज सुनाई देने लगी। ये बैल उसके अपने खेत की ओर ही आ रहे थे। अब उसे हल और पट्टे के जमीन पर घिसटने की आवांज भी सुनाई देने लग गयी थी। उसने सोचा, उसकी मां बैल लेकर आ रही है। जिस जमीन से झाड़ियाँ उखाड़ी गयी थीं, उसमें वह सावनी की फसल बोना चाहता था और उस दिन बीज गिराने के लिए उसकी मां को ही वहां आना था। परन्तु यह बैल चन्दन के नहीं थे। ये तो पिछले खेत में ही रुक गये थे और चन्दन की मां अभी तक नहीं आयी थी। चन्दन को उस पर गुस्सा आ रहा था। काम के लिए देर हो रही थी। ठीक इसी समय किसी आगन्तुक की पदचाप चन्दन के बहुत ही पास आ गयी। चन्दन ने उसकी ओर देखे बगैर ही कहा, ''तुमने तो मेरी जान ले ली है। मैं क्रोध में आकर तेरा खून कर दूँगा।''

''मैं तो फातमा हूं चन्दन, क्या बात है? तुम इतने गुस्से में क्यों हो?'' फातमा ने कहा। वह चन्दन को यह कहने आयी थी कि वह पाकिस्तान नहीं जाना चाहती।

''मैं गुस्से में नहीं हूं फातमा। तुम जाकर अपना काम करो। मुझे अधिक तंग न किया करो।''

''पर तुम्हारी मां को...।''

''दफा करो मेरी मां को...।'' उसकी तो अक्ल मारी गयी है। उसका ंखयाल है कि मैं उम्र भर...''

''वह कहता है...''

''कुछ नहीं कहती वह। तुम कहीं भी नहीं जाओगी, यहीं रहोगी, मेरे पास। तुम्हें पचास बार बताया है मैंने कि तुम्हें मैं अपने साथ रखूँगा। यदि मुझसे दु:खी हो, तो जाओ जाकर मरो जहाँ मरना है, मुझे दिक न करो।''

''तुम भी चन्दन...तोबा-तोबा...। तुम्हें भी मुझ पर यकीन नहीं। तुम्हारी मां मुझे म्लेच्छ बताती है और तुम बेवफा, मेरे अल्ला मैं क्या करूँ?'' इतना कह कर फातमा सिसकियाँ लेने लगी।

''तुम रोओ न, फातमा, मेरी जान!'' चन्दन ने उसे आलिंगन में लेकर कहा। ''तुम्हें तो मालूम है कि मैं कितना परेशान हूं हर कोई मेरी जान को रोता है। यहाँ मैं मां से कह दूँगा आज कि वह तुम्हें कुछ न कहे। तुम जाओ और जाकर उसे भेज दो। बीज और बैल लेकर वह आये।''

''वह अफीम खाकर मर जाएगी वह कहती है।''

''मरने दे अगर मरती है तो। यदि न मरी तो मेरे हाथों मरेगी एक दिन।'' उसने फावड़े का एक जोर का प्रहार करते हुए कहा, ''तुम जाओ और जल्दी से भेज दो उसे। यदि बोआई में देर हो गयी तो एक बैल तो धूप चढ़ आने से ही बेकार हो जाएगा। वह पहले से ही बीमार है।''

इस समय पौ फूट चुकी थी और साथ ही ठंडी हवा भी चलनी बन्द हो गयी थी। चन्दन के खेती में उगी झाड़ियों के पत्ते तक नहीं हिल रहे थे। दूर उस ओर चिड़ियों के चहचहाने की आवांज आ रही थी।

''पर तुम जानते हो, चन्दन मैं पवित्र नहीं हूं। तुम्हारी मां कहती है कि वह तुम्हारे लिए कोई पवित्र और सुन्दर-सी बहू लाएगी।''

''मेरी मां को रखना है तुम्हें, या मुझे? तुम किसी की कुछ न सुनो। तुम जो कुछ हो, हो। मुझे अधिक तंग न करो।'' चन्दन ने तनिक ऊँची आवांज में कहा।

''मैं जो कुछ हूं , जानती हूं। परन्तु इसमें मेरा क्या दोष है?'' इतना कहते ही फातमा की आँखों से आँसू बहने लगे।

फातमा के आँसू देखकर चन्दन को देश के विभाजन के समय हुए दंगों के दिन याद आ गये। उसे वह घड़ी भी याद आयी, जब उसने फातमा को वहशियों के पंजों से छुड़ाया था। उसके कपड़े किस तरह चिथड़े-चिथड़े हो गये थे! उसके चेहरे पर मुर्दनी थी, उसका अंग-अंग थकावट से चूर था। उस समय का स्मरण होते ही चन्दन को जोश-सा आ गया। उसने अपने हाथ से पकड़े हुए फावड़े का हत्था जोर से जकड़ लिया। फातमा उसके पास के ही मुगलपुरे की लड़की थी। तब वह अपने गाँव का मान थी। उसके सौन्दर्य पर नंजर नहीं टिक पाती थी, परन्तु जिस समय चन्दन से उसे शरण दी थी, उस समय उसकी अवस्था दया के योग्य थी। फिर भी चन्दन के पास आकर फातमा अपने सारे कष्ट भूल गयी थी और वह उस जाति की व्यक्ति की हो गयी थी जिस जाति द्वारा उसके सौन्दर्य पर खरोंचें आयी थीं। चन्दन को जब वह भी घटना याद आ जाती, वह व्यर्थ में ही अपने आपे से बाहर हो जाता था। 'तुम जो कुछ हो, हो।' अभी-अभी चन्दन ने फातमा को कहा था।

''मैं अपनी इच्छा से तो नहीं गयी थी उनके पास, तुमने अभी तक मांफ नहीं किया मेरी बेबसी की?'' फातमा की सिसकियों में से ही आवांज आयी।

''तुम चली क्यों नहीं जाती, फातमा! तुम्हें कहा है मुझे तंग न करो। मैं गुस्से में न जाने क्या कर बैठूं।'' चन्दन ने चीखकर कहा और अपने हाथ में पकड़ा हुआ फावड़ा क्रोध के आवेश में दूर एक तरफ फेंक दिया।

''शायद भगवान को यही मंजूर था। खुदा तुम्हारा भला करे। मैं चलती हूं।'' फातमा ने सिसकी भरकर कहा और भारी मन से गाँव की ओर चल पड़ी।

फातमा के अन्तिम शब्द चन्दन को चुभ गये। इन शब्दों ने चन्दन की बेबसी से उत्पन्न हुए घावों पर नमक छिड़क दिया। वह वहीं पर अपना सिर घुटनों में रखकर बैठ गया। वह चाहता था कि वहीं धरती में समा जाए, परन्तु जल्दी ही उसे होश आया कि काम करके कमाने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं। एक बार फिर दिल कड़ा करके वह झाड़ियों से भरी भूमि को साफ करने लग गया।

अपने खयालों में डूबे चन्दन को यह पता ही न चला कि कब उसकी मां बीज और बैल लेकर आ गयी और कलेवा करने के समय तक किस तरह उसने आधे से ंज्यादा खेत की बोआई कर दी थी। चन्दन की मां उसके द्वारा बनायी गयी कूडों में बीज डालती जा रही थी। कलेवे के समय की धूप और उमस से चन्दन को पसीना आ गया। गर्मी और उमस के कारण उसके बैल भी आगे बढ़ने से कतराने लगे थे।

''क्या बकवास है!'' उसके मुंह से निकला। उसका दायां बैल थकावट से हाँफ रहा था। उसके हल की फाल किसी सख्त जड़ में फँस गयी थी। उसने हल को पीछे खींचकर फाल के साथ लगी लकड़ी को टूटने से बचाया और आप खड़ा होकर फातमा के बारे में सोचने लगा। उसे मालूम था कि एक-दो दिनों में फौजी पुलिस फातमा को लेने आ जाएगी। वह यह भी जानता था कि पुलिस वाले फातमा के साथ किस तरह का बर्ताव करेंगे। वह फातमा को फिर उस चक्कर में फंसाना नहीं चाहता था।

''मैं ऐसा बिलकुल नहीं होने दूँगा।'' जोश में आकर उसके मुंह से निकलगया।

''क्या नहीं होने देगा तू?'' उसकी मां बोली, ''मुझे लगता है तेरा दिमांग ठिकाने नहीं है आजकल।''

''तुम अपने को ही ठिकाने रखो,'' चन्दन बोला।

''पर तुझे हो क्या गया है चन्दन? मुझे मालूम है यह सब उस चुडैल के कारण है। उसके आने से पहले तू कभी मुझसे ऊँचा नहीं बोला था।''

चन्दन ने हल फिर उसी जड़ में फंसा दिया और जब बैलों से आगे न बढ़ा गया तब उसने बाएं बैल को एक चाबुक खींच मारी।

''इन बिचारों ने क्या बिगाड़ा है? यूँ ही मारते जाते हो बेंजुबानों को।'' उसकी मां बोली और उसने चन्दन के हाथों से हल को पकड़कर उसे जड़ से उखाड़ दिया, ''मेरे तो भाग्य ही फूट गये हैं, नहीं तो मैं क्यों जनती तेरे जैसों को। यदि तुम्हें धूल ही फांकनी है, तो फांको। मैं तेरा मुंह नहीं देखूंगी उम्र-भर।'' वह अपने आंचल से बीज झाड़कर खड़ी हो गयी।

मां के गुस्से ने चन्दन को ठंडा-सा कर दिया, ''अच्छा हम बोआई तो खत्म कर लें पहले।'' इतना कहकर उसने बैलों को हाँक दिया। दायीं ओर का बैल थकावट से और भी अधिक हांफने लगा।

बैलों को थका देखकर उसका रहा-सहा गुस्सा भी समाप्त हो गया और उसने बैलों को पुचकारना शुरू कर दिया। उसी समय उसकी बहन बन्तो दोपहर का खाना लेकर आ गयी।

''तुमने इतनी देर क्यों कर दी?'' उसने अपना गुस्सा अपनी छोटी बहन पर उतारना चाहा।

''वहाँ गाँव में...''

''अच्छा रहने दे तू इन सफाइयों को।''

''नहीं, बीर गाँव में...''

''मैंने कहा गोली मारो इस किस्से को, परन्तु याद रखना मैं आगे से ये बातें नहीं सुनूंगा।''

फिर अचानक ही चन्दन को अपनी युवा बहन पर दया-सी आ गयी। जैसे वह अपनी बहन के यौवन पर लज्जित-सा हो गया हो। उसको क्या अधिकार था अपने से छोटी को फटकारने का! उसे कौन-सी अधिक भूख लगी हुई थी! चिन्ताओं से उसकी आधी भूख तो वैसे ही मारी गयी थी। बन्तो अब जवान हो गयी है, उसने बाकी रोटी बैलों को खिलाते हुए सोचा। मुझे अब इसके ब्याह के लिए कमाना ही चाहिए और यह सोचकर उसने बोआई शुरू कर दी।

''गा/व में पुलिस आयी है।'' घर जाते हुए बन्तो बोली।

चन्दन भौचक्का होकर बन्तो की ओर देखने लगा।

''वे आ गये हैं फातमा को लेने, और फातमा शायद चली भी जाए।'' बन्तो ने अधीरता से कहा।

''और वह जाए भी क्यों न अब! उसे अब घर में थोड़े ही बिठाए रखना है।'' चन्दन की मां ने दृढ़ स्वर में कहा।

''कैसे भेज दोगी तुम उसको, मुझे बताओ तो सही!'' चन्दन ने अपनी चाबुक से फाल में फंसा हुआ घास-पात निकालते हुए कहा, ''उसे कहीं भी नहीं जाना, तुम घर जाओ बन्तो और उससे कहना कि मैं अभी आया। कुल आठ-दस कूड़े ही हैं ये।'' चन्दन जल्दी-जल्दी जोताई करने लगा।

''लेकिन यदि उसने मेरी कोई न सुनी?'' बन्तो ने पूछा।

''अच्छा तुम जाकर उसे कह दो जो कुछ मैंने कहा है।'' चन्दन ने आज्ञा-सी दी।

''तुम अपना काम करो बन्तो, जाओ किसी से कुछ न कहना।'' चन्दन की मां ने टोका।

''तुम बीज गिराती रहो, वह वही करेगी जो उसकी इच्छा होगी।'' चन्दन ने बन्तो पर भरोसा रखकर और भी जोर से कहा। वह जानता था कि बन्तो खुद फातमा से प्यार करती है। बन्तो को गाँव की ओर भेजकर चन्दन ने पीछे अपनी मां की ओर देखा और बोला, ''तुझे क्या कहती है फातमा बेचारी? घर का सारा काम करती है। तेरे पूछे बिना बाहर पैर नहीं धरती, लेकिन तुम बेकार में ही उससे तंग आयी हुई हो।''

''मैं जानता हूं कि वह बहुत अच्छी है। नहीं तो उसे रखता ही कौन था इतने दिन? पर फिर भी वह मुसलमानों की लड़की है, उसे अपने देश जाना ही चाहिए।''

''मुझे तुम्हारी यह बात समझ में नहीं आती। यह सब बकवास है। हिन्दू और मुसलमानों में अन्तर ही क्या होता है!''

''अच्छा यह बात भी मैं तुम्हारी मान लेती हूं लेकिन सत्य भी तो कोई चींज होती है आंखिर!'' चन्दन की मां ने कहा।

चन्दन एक बार फिर दुविधा में पड़ गया। पहले वह कुछ न बोला, फिर उसने कुछ रुककर कहा, ''तुम धो क्यों नहीं देती अपने मन के इस मैल को? तुम्हारे इन्हीं विचारों ने मेरा जीवन नष्ट कर दिया है और इसमें फातमा का भला क्या दोष है? मैं पहले ही बहुत दु:खी हूं। मैं तुम्हारे मुंह से फातमा के बारे में कुछ भी नहीं सुन सकता। इससे अच्छा तो यह है कि तू इसे छोड़कर, बन्तो के बारे में क्यों नहीं सोचती? कितनी जवान हो गयी! तुम्हें उसके ब्याह की कोई चिन्ता नहीं?'' यह कहकर उसने अपने बैलों को और तेजी से हाँका।

''बन्तो मेरी बेटी है। उसने तेरी तरह मेरा नाम बदनाम नहीं किया। तेरी फातमा चुड़ैल न होती हमारे यहाँ, तो सब-कुछ हो जाता।''

चन्दन की मां अपनी बेटी को बेचकर उन पैसों से बहू को अपने घर लाना चाहती थी और इस बात का ज्ञान चन्दन को हो चुका था।

''मैं जानता हूं सब कुछ, जो तुम्हारे दिल में है। तुम्हें शरम नहीं आती अपने ऊपर? तुम बेटी के दाम वसूल करना चाहती हो? उन पैसों की बहू तुम्हारा बहुत कल्याण कर देगी?''

''पर यह कोई अनहोनी नहीं है, बेटा। हमें अन्दर-अन्दर ही सब कुछ कर लेना है। तुम तो बेकार में नाराज होते हो मुझ पर।'' चन्दन की मां ने समझाना चाहा।

''बन्द करो बकवास। तुम हमारी मां नहीं। तुम तो सौतेली मां से भी बुरी हो। हमारे खानदान में किसी ने बेटी के दाम वसूल किये हैं कभी? यदि आगे बोली, तो अभी तुम्हारा गला धर दबाऊँगा।'' चन्दन आगबबूला हो गया।

''पर उस म्लेच्छ को घर में रखने में तुम्हारी बड़ी इंज्जत है...सारे जमाने की जूठन को।''

''तुम जूठन कहती हो उस बेजुबान को। यदि लाचारी जूठन है तो मुझे जूठन ही अच्छी लगती है।'' यह कहकर बैलों को वहीं जुता हुआ छोड़कर चन्दन गाँव की ओर भाग पड़ा।

हाँफता-हाँफता जब वह गाँव में पहुंचा, तब फातमा पहले ही जाने के लिए राजी हो चुकी थी। उसे चन्दन का सुबह वाला बर्ताव अच्छा नहीं लगा था। चन्दन को तंग करने की अपेक्षा उसने पाकिस्तान जाना ही बेहतर समझा। फातमा के पास पहुंचकर उसने वास्ते देने शुरू किये। उसने अपने सुबह के कड़े शब्दों के लिए माफी भी माँगी।

''मैं जीवन-भर तुम्हारा किया नहीं चुका सकती, परन्तु अब तुम मुझे जा लेने दो।'' फातमा चन्दन से अपनी बाजू छुड़ाते हुए कहा।

''तूने उसे रोका क्यों नहीं बन्तो?'' चन्दन ने फातमा के पीछे खड़ी सिसकती हुई बन्तो को झिड़का। परन्तु जल्दी ही उसका क्रोध उतर गया और उसने बन्तो से कहा, ''अच्छा, अब भी मना ले इसे। मेरे लिए इतना काम कर दे। मैं दिन-रात काम करूँगा तेरे लिए...तेरे ब्याह के लिए।'' वह पागलों की नाई बोलता गया। ''फातमा तेरी सहेली है, तेरा कहा मान जाएगी। तू मुझ पर इतना-सा एहसान कर दे।'' और फिर उसने पास खड़े गाँव के नम्बरदार की ओर देखकर कहा, ''नम्बरदार, तुम ही करो कुछ मेरे लिए!''

नम्बरदार का बेटा इस सब पर बड़ा खुश था। वह चन्दन की अनुनय सुनकर फूल रहा था। वह ंफातमा के कारण चन्दन से खार खाता था। फातमा उसकी ओर देखती भी नहीं थी।

चन्दन जैसे मंजबूत व्यक्ति की ऐसी हीन दशा देखकर फातमा के शरीर में एक सन्नाटा-सी दौड़ गयी। वह एकदम मोम हो गयी, मानो चन्दन के पास रहने के लिए मान गयी हो।

''यह न्याय नहीं हो रहा, हम ऐसा नहीं होने देंगे।'' भीड़ में से किसी की आवांज आयी। यह नम्बरदार के लड़के की थी।

''तुम चुप रहो शैतान के चरखे! दयालु नम्बरदार ने अपने बराबर के लड़के को फटकारा। इस फटकार से चारों ओर मौन छा गया।

इस समय ट्रक का इंचार्ज भले ही फातमा को ट्रक में बैठने के लिए कहता रहा, पर वह जाना नहीं चाहती थी। उधर पुलिस वाले भी ंफातमा को अपनी इच्छा निश्चित करने देना चाहते थे, कि ठीक इसी समय चन्दन की मां हांफती हुई आयी। उसने चन्दन के कान में कुछ कहा। कम ही सुना किसी और ने। फातमा को भी मां की बात सुनाई न दी। अचानक वह बहुत अधिक घबरा गया। उसके चेहरे पर एक क्षण गुस्सा आया और दूसरे क्षण उदासी। धीरे-धीरे उसका रंग उड़कर धुएं जैसा हो गया। ''जाओ सब जहन्नुम में !'' वह ऐसे बोला जैसे पागल हो गया हो।

फातमा जानना चाहती थी कि चन्दन को क्या हो गया है। उसने अपने बाजुओं से मुंह उठाकर उपेक्षा से चन्दन की ओर देखा। इस घबराहट के कारण वह बहुत सुन्दर लग रही थी। नम्बरदार के लड़के ने पुलिस अधिकारी को कुहनी मारी। फातमा का सौन्दर्य देखकर उसकी नीयत बदल गयी और उसने अपने हाथ से अफसराना इशारा करके फातमा को बरबस ट्रक में बिठा दिया।

''चन्दन को क्या हो गया?'' चन्दन के एक दोस्त ने ट्रक से दूर अपने पास खड़े नम्बरदार से धीरे पूछा। चन्दन की मां ने जो उसे आकर कहा था, वह इस दोस्त ने नहीं सुना था।

''बैल मर गया है बेचारे का।'' नम्बरदार ने धीरे से उत्तर दिया।

चन्दन ने पागलों की तरह पहले एक चीख मारी और फिर वह जोर-जोर से हँसने लगा।

ट्रक में फातमा की चीख निकल गयी। पुलिस ने ट्रक चला दिया पाकिस्तान की ओर।

 


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