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विमर्श

जीने की कला
एपिक्टेटस

अनुवाद - राजकिशोर

अनुक्रम


प्रत्‍येक क्षण मूल्‍यवान है

चुनाव आपका है

सारगर्भित बनाम तुच्‍छ

जो आपके वश में है और जो नहीं है

जो नहीं मिल सकता, वह क्‍यों चाहें

जो दिखता है, वह दरअसल है क्‍या

आपके सरोकार ही आपकी सीमा हैं

प्रकृति से सामंजस्‍य

जो आपका अपना है

इच्‍छाओं और तथ्‍यों के बीच सामंजस्‍य

प्रशांति ही मानसिक प्रगति का लक्ष्‍य है

जो है, उसकी देखभाल करें जो नहीं रहा, उसकी चिंता छोड़ें

दुर्घटनाओं के प्रति दृष्टिकोण

शांति का रास्‍ता

कठिनाई का उपयोग

 

 

प्रत्‍येक क्षण मूल्‍यवान है

जो क्षण आपके सामने है, उसकी देखभाल करें।

उसकी बारीकियों में अपने आपको डुबा दीजिए। जो व्‍यक्ति आपके सामने है, जो चुनौती आपके सामने है, जो काम आपके सामने है, उस पर ध्‍यान दें।

इधर-उधर के बहकावों में न पड़ें। अपने आपको अनावश्‍यक कष्‍ट न दें।

जीवन क्षणों को मिला कर बनता है। अत: आप अपने को जिस क्षण में पा रहे हैं, उसे पूरी तरह से आबाद करें। तटस्‍थ दर्शक न बने रहें। हिस्‍सा लें। अपना सर्वोत्तम पेश करें। नियति के साथ अपनी साझेदारी का सम्‍मान करें। बार-बार अपने आपसे सवाल करें : यह काम मैं किस तरह करूँ कि यह प्रकृति की इच्‍छा के अनुकूल हो? जो उत्तर फूटता है, उसे ध्‍यान दे कर सुनें और काम में लग जाएँ।

यह न भूलें कि जब आपके दरवाजे बंद हैं और आपके कमरे में अँधेरा है, तब भी आप अकेले नहीं हैं। प्रकृति की इच्‍छा आपके भीतर मौजूद है, जैसे आपकी प्राकृतिक प्रतिभा आपके भीतर मौजूद है। उसके आग्रहों को सुनें। उसके निर्देशों का पालन करें।

जहाँ तक जीने की कला का सवाल है, यह सीधे आपके जीवन से ताल्‍लुक रखता है इसलिए आपको प्रतिक्षण सावधान रहना होगा।

लेकिन अधीर होने से कोई लाभ नहीं है। कोई भी बड़ी चीज अचानक नहीं तैयार होती। उसमें समय लगता है।

वर्तमान में आप जीवन को अपना सर्वोत्तम दें : भविष्‍य अपनी चिंता स्‍वयं करेगा।


चुनाव आपका है

अपने साथ ईमानदारी से पेश आएँ। अपनी शक्तियों और कमजोरियों का सटीक अनुमान लगाएँ। आप जो कुछ होना चाहते हैं, उसके लिए आवश्‍यक क्षमता क्‍या आपके पास है? उदाहरण के लिए, अगर आप पहलवान होना चाहते हैं, तो इसके लिए जरूरी है कि आपके कंधे, पीठ और जाँघें मजबूत हों। अत: अपने आपसे पूछें : सर्वश्रेष्‍ठ पहलवानों में एक होने के लिए जिस शारीरिक पराक्रम और चपलता की अपेक्षा है, क्‍या वह मुझमें है? किसी विशेष क्षेत्र में चैंपियन होने या कोई काम पूर्ण कुशलता के साथ करने की इच्‍छा रखना एक बात है और वस्‍तुत: चैंपियन होना तथा वह काम पूर्ण कुशलता से कर पाना दूसरी बात है।

किसी खास क्षेत्र में सफलता पाने के लिए जैसे कुछ खास योग्‍यताओं की आवश्‍यकता है, वैसे ही कुछ खास त्‍याग भी करने होते हैं। अगर आप बुद्धिमत्ता के साथ जीने की कला में पारंगत होना चाहते हैं, तो आपका क्‍या खयाल है- क्‍या आप खाने-पीने में अति कर सकते हैं? आपका क्‍या खयाल है, क्‍या गुस्‍सा करने और निराश तथा दुखी हो जाने की आम आदत के आगे समर्पण कर सकते हैं? नहीं। यदि वास्‍तविक रूप से बुद्धिमान होना आपका लक्ष्‍य है और आप अपने इस लक्ष्‍य को पाना चाहते हैं, तो आपको अपने व्‍यक्तित्‍व को निखारने के काम में लगाना होगा। आपको बहुत-सी अस्‍वस्‍थ इच्‍छाओं और स्‍वाभाविक मानी जाने वाली प्रतिक्रियाओं पर विजय पानी होगी। आपको यह भी सोचना होगा कि क्‍या आपके मित्र और सहयोगी कायदे के व्‍यक्ति हैं? क्‍या उनका प्रभाव- उनकी आदतें, मूल्‍य और व्‍यवहार- आपको ऊँचा उठाता है या उन क्षुद्र आदतों को मजबूत बनाता है, जिनसे आप छुटकारा पाना चाहते हैं?

किसी भी अन्‍य चीज की तरह बुद्धिमत्तापूर्ण जीवन की भी एक कीमत है। जब आप बुद्धिमत्तापूर्ण जीवन जीना शुरू करेंगे, तो हो सकता है आपका उपहास किया जाए। यह भी हो सकता है कि सार्वजनिक जीवन में आपकी स्थिति निकृष्‍टतम हो जाए। लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है। स्थितियाँ जल्‍द ही बदलने लगेंगी। आपको सफलता मिलेगी।

उच्‍चतर जीवन जीने के प्रयास में जो भी चीजें आवश्‍यक हैं, उन सभी पर विचार कर लेने के बाद, अपना पूरा जोर लगा कर आगे जाने की हिम्‍मत दिखाएँ। आपके लक्ष्‍य ऊँचे हैं- स्‍वतंत्रता, समरसता और प्रशांति हासिल करना। इसके लिए जो भी सांसारिक कीमत चुकाना आवश्‍यक हो, बेधड़क होकर चुकाएँ। लेकिन अपने स्वभाव का ईमानदारी से मूल्‍यांकन करने के बाद आपको लगे कि आप इसके लिए सक्षम या तैयार नहीं हैं, तो अपने आपको मुक्‍त कर लें और एक अलग, ज्‍यादा यथार्थ राह पर चलें।

आप एक ही आदमी हो सकते हैं-या तो अच्‍छे आदमी या फिर बुरे आदमी। यही दो वास्‍तविक चुनाव आपके सामने हैं। आप या तो अपने आपको, सत्‍य से जुड़े रहते हुए, अपनी बुद्धि का विकास करने के काम में लगा सकते हैं या बाहरी चीजों के पीछे भाग सकते हैं। चुनाव आपका है-सिर्फ आपका।


सारगर्भित बनाम तुच्‍छ

मानसिक प्रगति की माँग यह है कि जो सारगर्भित और मूल्‍यवान है, हम उसका सम्‍मान करें और अपने जीवन में उसे स्‍थान दें। इसके विपरीत, जो सारहीन और तुच्‍छ है, उसे अपने चित्त से निकाल फेंकें। जो चीजें हमारे मतलब की नहीं हैं, उनके बारे में लोग हमें नासमझ समझें तो इसमें कोई नुकसान नहीं है। आपके बारे में दूसरे क्‍या सोचते हैं, यह आपके सरोकार का विषय नहीं होना चाहिए। वे उसकी चकाचौंध में आ कर भ्रांत हैं, जो सतह पर दिखाई देता है। आप अपने उद्देश्‍य पर डटे रहें। इसी से आपकी इच्‍छाशक्ति मजबूत होगी और आपके जीवन में सुसंबद्धता आएगी।

अन्‍य लोगों का अनुमोदन और प्रशंसा प्राप्‍त करने की कोशिश करना छोड़ दें। एक क्षण के लिए भी न भूलें कि आप एक ऊँचे रास्‍ते पर जा रहे हैं। यह इच्‍छा न करें कि दूसरे आपको सुसंस्‍कृत, अनोखे या बुद्धिमान व्‍यक्ति के रूप में देखें। आवश्‍यकता इस बात की है कि आप दूसरों की नजर में विशिष्‍ट होने लगें, तो तुरंत शंकालु हो जाएँ। अपने आपको महान समझने के एहसास के प्रति हमेशा सावधान रहें।

सत्‍य के साथ अपनी इच्‍छाशक्ति का सामंजस्‍य बनाए रखना और जो चीज आपके वश में नहीं है, उससे सरोकार रखना-इन दोनों में कोई मेल नहीं है। जब तक आपका ध्‍यान इनमें से एक चीज में लगा हुआ है, आप दूसरी चीज की उपेक्षा करने को बाध्‍य हैं।


जो आपके वश में है और जो नहीं है

स्‍वाधीनता और प्रसन्‍नता, दोनों की शुरुआत इस एक सिद्धांत की साफ समझ से होती है कि कुछ चीजें हमारे वश में हैं और कुछ चीजें हमारे वश में नहीं हैं। जब आप इस मूलभूत नियम को भली भाँति समझकर आत्‍मसात कर लेंगे और यह जान लेंगे कि जो आपके वश में है और जो आपके वश में नहीं है, उनके बीच फर्क कैसे किया जाए, तभी आप आंतरिक शांति प्राप्‍त कर सकते हैं और बाह्य स्‍तर पर भी प्रभावशाली हो सकते हैं।

ये चीजें हमारे वश में हैं : हमारी अपनी राय, हमारी आकांक्षाएँ, अभिलाषाएँ और यह तय करना कि कौन-सी चीजें हमें आकर्षित नहीं करेंगी। इन सभी चीजों से हमारा सरोकार उचित ही है, क्‍योंकि इन्‍हें हम सीधे प्रभावित कर सकते हैं। हमारे आंतरिक जीवन की विषयवस्‍तु क्‍या होगी, उसका चरित्र क्‍या होगा - यह वह क्षेत्र है जहाँ हम चुनाव कर सकते हैं।

दूसरी तरफ, हमारे नियंत्रण के बाहर क्‍या है? इस तरह की चीजें, जैसे हमारा शरीर कैसा है, हमारा जन्‍म धनी परिवार में हुआ है या हम अपने प्रयास से धनी हुए हैं, दूसरे हमारा कितना सम्‍मान करते हैं, समाज में हमारी हैसियत क्‍या है आदि। यह याद रखना आवश्‍यक है कि ये सभी बाह्य मामले हैं, इन पर हमारा कोई वश नहीं है और इसलिए इनसे हमारा कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। जिस चीज को हम बदल नहीं सकते, उसे बदलने या नियंत्रित करने की कोशिश का अंत पीड़ा में ही होता है।

याद रखें : जिन चीजों पर हमारा वश है, वे कुदरती तौर पर हमारी इच्‍छा के अधीन हैं- किसी भी बाधा या बंधन से मुक्‍त; लेकिन जो चीजें हमारी शक्ति से परे हैं, उनका निर्धारण दूसरों की मर्जी से होता है। जो चीजें कुदरती तौर पर आपके नियंत्रण के बाहर हैं, उनके बारे में अगर आप सोचते हैं कि उन्‍हें आप अपनी इच्‍छा से चला सकते हैं, अथवा जिन मामलों का संबंध दूसरों से है, उन्‍हें आप अपना मामला बनाने की कोशिश करते हैं, तो आपके प्रयास निष्‍फल होंगे और आप एक कुंठित, उद्विग्न और दूसरों में दोष खोजते रहने वाला व्‍यक्ति बन जाएँगे।


जो नहीं मिल सकता, वह क्‍यों चाहें

हमारी अभिलाषाएँ ओर घृणाएँ पारे के मिजाजवाले शासक हैं। उनकी माँग हमेशा यह रहती है कि उन्‍हें खुश रखा जाए। अभिलाषा आदेश देती है कि हम भाग कर अपनी चाहत को पूरा करें। घृणा की जिद यह है कि जो चीजें हमें विकर्षित करती हैं, उनसे हम दूर रहें।

सामान्‍यत: जब हमें वह नहीं मिलता, जो हम चाहते हैं, तो हमें निराशा होती है, और जो हम नहीं चाहते, वह मिल जाता है, तो हमें कष्‍ट होता है।

ऐसी स्थिति में अगर आप उन अवांछित चीजों से दूर रहते हैं जो आपकी प्राकृतिक खुशहाली के प्रतिकूल हैं और आपके नियंत्रण के दायरे में भी हैं, तो आपको कभी भी किसी ऐसी चीज का सामना नहीं करना पड़ेगा जिसे आप सचमुच नहीं चाहते हैं। बहरहाल, अगर आप अपरिहार्य चीजों से दूर रहना चाहते हैं, जैसे बीमारी, मृत्‍यु या दुर्भाग्‍य, जिन पर आपका वास्‍तविक नियंत्रण नहीं है, तो आप अपने को ही नहीं, अपने आसपास के व्‍यक्तियों को भी तकलीफ में डालेंगे।

अभिलाषा और घृणा हैं तो ताकतवर, फिर भी आदतें ही हैं। और, हम बेहतर आदतें हासिल करने के लिए अपने को प्रशिक्षित कर सकते हैं। उन सभी चीजों से, जिन पर आपका नियंत्रण नहीं है, विकर्षित होने की आदत पर अंकुश लगाएँ और उन चीजों से मुठभेड़ करने पर अपने को केंद्रित करें जो आपके लिए अच्‍छी नहीं हैं और आपके वश में हैं।

अपनी इच्‍छाओं पर लगाम लगाने की पूरी कोशिश करें। क्‍योंकि, यदि आप कोई ऐसी चीज चाहते हैं जो आपके नियंत्रण में नहीं है, तो आपका निराश होना निश्चित है। साथ ही, इसके कारण आप उन चीजों की उपेक्षा कर रहे होंगे जो आपके नियंत्रण में हैं और अभिलाषा के योग्‍य भी हैं।

नि:संदेह ऐसे वक्‍त भी आते हैं जब व्‍यावसायिक कारणों से आपको कुछ पाने के लिए उद्यम करना पड़ता है या कुछ छोड़ना पड़ता है। ऐसे मौकों पर आपको शालीनता, परिष्‍कार और लचीलेपन का परिचय देना चाहिए।


जो दिखता है, वह दरअसल है क्‍या

अभी से, अप्रिय लगनेवाली हर एक चीज से यह कहने का अभ्‍यास शुरू कर दें : 'तुम महज एक आभास हो और वह नहीं हो जो प्रतीत होती हो।'

इसके बाद इस आधार पर मामले पर गहराई से विचार करें : इस आभास का संबंध क्‍या उन चीजों से है जो मेरे वश में हैं या उन चीजों से है जिन पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है? अगर उसका संबंध किसी ऐसी चीज से है, जो आपके नियंत्रण के दायरे के बाहर है, तो उसके बारे में चिंतित न होने के लिए अपने को प्रशिक्षित करें।


आपके सरोकार ही आपकी सीमा हैं

अपना ध्‍यान पूरी तरह से उस पर केंद्रित रखें जो सचमुच आपके सरोकार का विषय है और इस तरफ से बिलकुल स्‍पष्‍ट रहें कि जो दूसरों का है, वह उनका मामला है-आपका नहीं। जब आप ऐसा करेंगे, तब आप पर किसी का भी जोर नहीं चलेगा न ही आपको कोई रोक पाएगा। तब आप सचमुच स्‍वाधीन और प्रभावशाली होंगे, क्‍योंकि आपके प्रयास सदुपयोग में लगेंगे- दूसरों को दोषी ठहराने या उनका विरोध करने में नहीं।

आपके सरोकार का वास्‍तविक विषय क्‍या है, यह जानने और उसकी ओर ध्‍यान देने में ही निहित है कि आपसे आपकी इच्‍छा के विरुद्ध कुछ भी नहीं कराया जा सकता; दूसरे आपका आहत नहीं कर सकते, आप किसी को शत्रु नहीं बनाएँगे और न आपकी क्षति संभव है।

जब आप इन सिद्धांतों के आधार पर जीने का लक्ष्‍य बनाएँगे तो याद रखेंगे कि यह आसान तो नहीं होगा, आपको कुछ चीजें पूरी तरह छोड़नी होंगी ओर कुछ चीजें स्‍थगित करनी होंगी। यदि आप चाहते हैं कि प्रसन्‍नता और स्‍वाधीनता के स्‍वामी बनें, तो हो सकता है आपको धन और ताकत को भी भूल जाना पड़े। लेकिन इनके बदले में आपको जो मिलेगा, वह अन्‍य सभी चीजों से ज्‍यादा मूल्‍यवान होगा।


प्रकृति से सामंजस्‍य

अपने नियम बनाने की कोशिश मत करें।

सभी मामलों में, वे चाहे बड़े और सार्वजनिक मामले हों अथवा छोटे और घरेलू, प्रकृति के नियमों के अनुसार अपने को चलाएँ। अपनी अभिलाषाओं का सामंजस्‍य प्रकृति के साथ स्‍थापित करना आपका सर्वोच्‍च आदर्श होना चाहिए।

इस आदर्श पर आचरण की शुरुआत आपको कहाँ से करनी चाहिए? अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से, जहाँ सारे काम और कर्तव्‍य व्‍यक्तिगत होते हैं। जब आप अपना काम कर रहे होते हैं-मसलन स्‍नान करना, तो अपनी उच्‍चतम योग्‍यता के साथ और प्रकृति से सामंजस्‍य बनाए रख कर स्‍नान करें। जब आप भोजन कर रहे होते हैं, तो अपनी उच्‍चतम योग्‍यता के साथ और प्रकृति से सामंजस्‍य बनाए रख कर भोजन करें। दूसरी सभी चीजों पर यही नियम लागू होता है।

आप क्‍या कर रहे हैं-यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि आप कैसे कर रहे हैं। जब हम इस सिद्धांत को उचित ढंग से समझ लेते हैं और इसके अनुसार जीते हैं, तब भी कठिनाइयाँ पैदा होंगी-क्‍योंकि वे सृष्टि के विधान का अंग है-फिर भी हमारे लिए अपनी आंतरिक शांति को बनाए रखना संभव होगा।


जो आपका अपना है

दूसरों की तारीफ पर निर्भर न रहें। इसमें कोई सार नहीं है। व्‍यक्तिगत उत्‍कर्ष किसी बाहरी स्रोत से हासिल नहीं किया जा सकता। यह जीवन का एक कठोर तथ्‍य है कि दूसरे लोग-वे लोग भी, जिन्‍हें आप प्‍यार करते हैं-जरूरी नहीं कि आपके विचारों से सहमत हों, आपको समझें या जिन चीजों में आपको रस मिलता है, उनमें उन्‍हें भी रस मिले। गइराई से सोचिए और आप पाएँगे कि दूसरे लोग आपके बारे में क्‍या सोचते हैं, इसमें क्‍या रखा है!

अपने उत्‍कर्ष का सृजन आपको स्‍वयं करना है।

व्‍यक्तिगत उत्‍कर्ष महज श्रेष्‍ठ व्‍यक्तियों से संपर्क के द्वारा प्राप्‍त नहीं किया जा सकता। यह तो आपको स्‍वयं हासिल करना होगा। यह काम आप ही कर सकते हैं। अभी, तुरंत, इस काम को हाथ में लीजिए, उसमें अपना सर्वोत्तम उड़ेल दीजिए और इसकी चिंता छोडि़ए कि कौन आपके बारे में क्‍या सोचता है।

अपने जरूरी काम में लगे रहिए-इसकी परवाह किए बगैर कि इससे दूसरों की नजर में आपकी इज्‍जत कितनी बढ़ जाएगी या उनसे कितनी तारीफ मिलेगी।

इस पर विचार करें : आपका अपना क्‍या है? आप अपने विचारों, साधनों और अवसरों का जो इस्‍तेमाल करते हैं, बस उतना ही। क्‍या आपके पास किताबें हैं? उन्‍हें पढ़ें। उनसे सीखें। उनमें जो बुद्धिमत्ता है, उसका उपयोग करें। क्‍या आपके पास कोई विशेष ज्ञान है? उसका पूरा और अच्‍छा इस्‍तेमाल करें। क्‍या आपके पास औजार हैं? उन्‍हें निकालें और उनसे कुछ बनाएँ या टूट-फूट की मरम्‍मत करें। क्‍या आपके पास कोई अच्‍छा विचार है? उसे और आगे बढ़ाएँ और उसके जरिए अपना विकास करें। आपके पास जो है, जो सचमुच आपका है, उसका अधिकतम उपयोग करें।

आपका सचमुच अपना क्‍या है, यह पहचान कर जब आप अपनी क्रियाओं का सामंजस्‍य प्रकृति से बैठा लेंगे, तभी आप प्रसन्‍न और चिंता-मुक्‍त जीवन जीना शुरू कर सकेंगे।


इच्‍छाओं और तथ्‍यों के बीच सामंजस्‍य

जीवन और प्रकृति ऐसे नियमों से संचालित होते हैं जिन्‍हें हम बदल नहीं सकते। जितनी जल्‍द हम इसे स्‍वीकार कर लेंगे, आंतरिक शांति हासिल करना हमारे लिए उतना ही आसान होगा। आपका यह चाहना आपकी नासमझी है कि आपकी संतानें या आपका जीवन साथी हमेशा जीवित रहेंगे। जैसे आप मर्त्‍य हैं, वे भी मर्त्‍य हैं; और मृत्‍यु का यह नियम आपके नियंत्रण से पूरी तरह बाहर है।

इसी तरह, यह चाहना भी नासमझी है कि कोई कर्मचारी, रिश्‍तेदार या मित्र त्रुटिहीन हो सकता है। यह उन चीजों को नियंत्रित करने की चाह है जिन्‍हें आप, हकीकत में, नियंत्रित नहीं कर सकते।

यह जरूर हमारे वश में है कि हमें निराशा हाथ न लगे-अगर हम अपनी इच्‍छाओं से आप्‍लावित न हो जाएँ और तथ्‍यों के साथ उनका सामंजस्‍य स्‍थापित कर सकें। अगर आपको स्‍वतंत्रता की कामना है, तो ऐसी किसी चीज की इच्‍छा न करें जो दूसरों पर निर्भर है-अन्‍यथा आप हमेशा एक असहाय दास बने रहेंगे।

यह समझें कि स्‍वतंत्रता वस्‍तुत: है क्‍या और यह कैसे प्राप्‍त की जा सकती है। आपको जो भी अच्‍छा लगता है, वह करने या पाने का अधिकार स्‍वतंत्रता नहीं है। स्‍वतंत्रता आती है यह समझने से कि हमारी अपनी शक्ति की सीमा क्‍या है और प्राकृतिक विधान ने कौन-सी सीमाएँ हम सब पर आरोपित कर रखी हैं। जीवन की सीमाओं तथा अपरिहार्यताओं को स्‍वीकार कर और उनसे लड़ने-झगड़ने के बजाय उनके साथ संतुलन बना कर ही हम स्‍वतंत्र हो सकते हैं। इसके विपरीत यदि हम उन चीजों के लिए, जो हमारे वश में नहीं हैं, अपनी इच्‍छाओं के आगे घुटने टेक देते हैं, तो स्‍वतंत्रता तिरोहित हो जाती है।


प्रशांति ही मानसिक प्रगति का लक्ष्‍य है

उच्‍चतम जीवन का सबसे विश्‍वसनीय लक्षण है, प्रशांति। मानसिक प्रगति आंतरिक विक्षोभ से मुक्ति में प्रकट होती है। इस या उस चीज के बारे में परेशान होना आप त्‍याग सकते हैं।

अगर आपको उच्‍चतर जीवन चाहिए, तो सोचने के इन चालू ढर्रों से बचिए : 'अगर मैं कठोर परिश्रम नहीं करता, तो मैं कभी भी अच्‍छी जीविका अर्जित नहीं कर सकूँगा, मुझे कोई नहीं पहचानेगा, मैं किसी गिनती का नहीं रह जाऊँगा' आदि-आदि।

चिंता, डर, संदेह और सीमाहीन इच्‍छा से लदे रह कर समृद्धि में जीने से बहुत बेहतर है, पीड़ा और भय से मुक्‍त रहते हुए भूख से मर जाना।

आत्‍म-स्‍वामित्‍व के कार्यक्रम पर अमल करना तुरंत शुरू कर दें। लेकिन यह शुरुआत हल्‍की होनी चाहिए-उन छोटी-छोटी चीजों से, जो आपको परेशान करती हैं। क्‍या आपको अपना बटुआ बहुत खोजने पर भी नहीं मिल रहा है? ऐसी स्थिति में अपने आपसे कहें, 'इस असुविधा को शांतिपूर्वक सहन करना वह कीमत है जो मैं आंतरिक प्रशांति और उद्विग्‍नता से मुक्ति के लिए चुकाता हूँ। मैं जानता हूँ कि मुफ्त कुछ भी नहीं मिलता।'

जब आप अपने बच्‍चे को बुलाते हैं, तो इस बात के लिए प्रस्‍तुत रहिए कि वह आपको प्रत्‍युत्तर नहीं भी दे सकता है। वह प्रत्‍युत्तर देता भी है, तो जरूरी नहीं कि वह वही करेगा जो आप चाहते हैं कि वह करे। इन परिस्थितियों में अगर आप क्षुब्‍ध हो जाते हैं, तो इससे आपका या आपके बच्‍चे का कोई भला नहीं होगा। आपको विचलित कर दे, यह उसके बस की बात नहीं होनी चाहिए। आप विचलित होंगे या नहीं, यह आपके अपने हाथ में है।


जो है, उसकी देखभाल करें जो नहीं रहा, उसकी चिंता छोड़ें

हमसे वस्‍तुत: कुछ भी लिया नहीं जा सकता। इसलिए खोने को कुछ भी नहीं है। आंतरिक शांति उसी बिंदु से शुरू होती है, जब हम 'मैंने अमुक चीज खो दी है' यह कहना छोड़ कर यह कहना शुरू कर देते हैं कि 'अमुक चीज जहाँ से आई थी, वहीं वापस चली गई।' क्‍या आपके बच्‍चों की मृत्‍यु हो गई? वे वहाँ वापस चले गए जहाँ से आए थे। क्‍या आपका साथी नहीं रहा? वह वहीं चला गया जहाँ से वह आया था या आई थी। क्‍या आपकी धन-संपत्ति आपसे ले ली गई? वह भी वहीं लौट गई जहाँ से वह आई थी।

आप शायद इसलिए विचलित हैं कि एक बुरा आदमी आपकी चीजें ले गया। लेकिन यह आपकी चिंता का विषय क्‍यों होना चाहिए कि दुनिया ने आपको जो चीजें दी थीं, उन्‍हें दुनिया को वापस लौटाने का माध्‍यम कौन बना।

महत्वपूर्ण बात यह है कि जब तक दुनिया ने आपको कुछ दे रखा है, आप उसकी अच्‍छी तरह देखभाल करें-ठीक वैसे ही, जैसे कोई मुसाफिर किसी सराय में अपने कमरे की देखभाल करता है।


दुर्घटनाओं के प्रति दृष्टिकोण

वास्‍तव में कुछ भी आपको रोक नहीं सकता। वास्‍तव में कुछ भी आपको बाँध नहीं सकता। क्‍योंकि, आपकी अपनी इच्‍छाशक्ति सदैव आपके अपने नियंत्रण में होती है।

बीमारी आपके शरीर को बाधित कर सकती है। लेकिन क्‍या आप सिर्फ शरीर हैं? लँगड़ापन आपके पैरों की गति को प्रभावित कर सकता है। लेकिन आप सिर्फ पैर नहीं हैं।

आपकी इच्‍छाशक्ति किसी दुर्घटना से बाधित क्‍यों हो? आपके साथ जो दूसरी घटनाएँ होती हैं, उनके बारे में भी इसी तरह विचार करें।


शांति का रास्‍ता

न तो यह माँग करें और न ही उम्‍मीद कि घटनाएँ उस रूप में घटित होंगी जिस रूप में आप चाहते हैं कि वे घटित हों। घटनाओं को उसी रूप में स्‍वीकार करें जैसे वे घटित होती हैं।

शांति का रास्‍ता यही है।


कठिनाई का उपयोग

जीवन में आनेवाली प्रत्‍येक कठिनाई एक अवसर भी होती है : अपने भीतर झाँकने और अपने जलमग्‍न संसाधनों को खोजने का अवसर। जब हम किसी परीक्षा से गुजरते हैं, तो हमें अपन उन संसाधनों की याद आनी चाहिए जिन्‍हें हम भुला बैठे थे।

दूरदर्शी व्‍यक्ति दुर्घटना से परे देखते हैं और उसका उचित इस्‍तेमाल करने की आदत बनाते हैं।

दुर्घटना हो जाने पर दिशाहीन हो कर प्रतिक्रिया करने की जरूरत नहीं है : उस वक्‍त अपने भीतर झाँकना और यह पूछना न भूलें कि उससे निपटने के कौन-से संसाधन आपके पास हैं। खूब गहरे तक खुदाई करें। आपके पास ऐसी शक्तियाँ हैं, जिनका आभास, हो सकता है, आपको न हो। उन शक्तियों को जगाएँ। उनका भरपूर इस्‍तेमाल करें।

ये संसाधन किस प्रकार के हैं? अगर आपका सामना किसी आकर्षक व्‍यक्ति से होता है, तो उस वक्‍त जिस संसाधन की आवश्‍यकता है, वह है संयम। अगर दर्द या कमजोरी से मुकाबला है, तो ऊर्जस्विता दिखाएँ।

गाली-गलौज के सामने धैर्य का परिचय दें।

जैसे-जैसे समय बीतता है और प्रत्‍येक घटना के सामने उपयुक्‍त आंतरिक संसाधन का प्रयोग करने की आपकी आदत बनती जाती है, आप अप्रिय घटनाओं का मुकाबला करने में अधिकाधिक सक्षम होते जाते हैं। उसके बाद किसी भी घटना के लिए यह संभव न होगा कि वह आपको बहा ले जाए।

 


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