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मौन
दिनकर बेडेकर


मौन। होना तो यह चाहिए कि इस शब्द को लिख़ कर, पूर्ण विराम दे कर, रुक जाएँ। जो भी गूँजना हो वह बाद की स्तब्धता में गूँजता रहे। लेकिन ऐसा होता नहीं। शब्दों का बड़ा मोह होता है हमें। इसी मोह में लिप्त होकर हम हमारी अभिव्यक्ति को कई बार विकृत, अनैसर्गिक और मर्यादित कर देते हैं।

असल में मौन को संवाद का पाइंट ऑफ रेफरंस होना चाहिए, लेकिन हमारी सारी कोशिश इस विराम को टालने की होती है।

ख़ामोशी खुद अपनी सदा हो

ऎसा भी हो सकता है...

सन्नाटा ही गूँज रहा हो

ऎसा भी हो सकता है...

मौन का सही सामर्थ्य कभी कभार ऐसी लाइनों में प्रतीत होता है और फिर उसकी अनेक छटाओं को ख़ोजने की आदत सी बन जाती है। साथ ही, यह भी महसूस होता है कि यह आदत, आजकल, लोगों की समझ से परे हो गयी है।

संवाद के साधन अधिक से अधिक अद्ययावत और वेगवान होते जा रहे हैं, और हम उनकी ही ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जूँझ रहे है।

निजी पत्रों में जो हुआ करता था वह खुला पन, टेलिफोनिक संभाषण में महसूस नहीं होता। वहां मिनिटों का हिसाब हुआ करता है। जितना जरूरी हो उतना ही बोला जाता है। यह हिसाब, संवाद में जरूरी 'ह्यूमन टच' को नष्ट कर देता है। अब तो टेलीफोन भी पुराना हो गया है, आज मोबाइल का, एसएमएस का, और इमेल का जमाना है। खत की जगह इ मेल ने और बातचीत की जगह एसएमएस ने ले ली है। कहा जाता है,'कंव्हिनिअंट' लगता है। लेकिन कभी यह मह्सूस ही नहीं होता कि जितने अधिक संवाद के संसाधन उपलब्ध होते जा रहे है, संवाद की घनता कम होती जा रही है। हम अब संवाद के साधन से संवाद का दर्जा तय करने लगे हैं।

स्वाभाविक है कि ऐसी परिस्थिति में मौन लोगों को अस्वस्थ कर देता है। मूलत: हमारा व्यक्तिगत संवाद प्रश्न से शुरू होता है। लोगों को सवाल पूछते रहना अच्छा लगता है। अगर कोई मौन रहे तो औरों को लगता है कि वह चिढ़ा हुआ है या नाराज है । किसी का मौन औरों को अस्वस्थ कर देता है क्योंकि मौन हमें खुद के तथा औरों के मन में प्रवेश करने का मौका देता है। यह एह्सास ही औरों को अस्वस्थ कर देता है।

आज के माहौल में हर व्यक्ति खुद को अभिव्यक्त करने के नहीं; औरों का ध्यान उसकी ओर आकर्षित करने के प्रयास में छटपटाता नजर आता है। जैसे कोई बच्चा बड़ों की बातचीत में अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए ऊँचे सुर में बोलता है वैसा ही कुछ शायद हमारे साथ भी हो रहा है। टीवी देखते हुए ध्यान दीजिए तो महसूस होगा कि विज्ञापनों की आवाज अलग ऊंचे स्वर में होती है ताकि आपका ध्यान तुरंत आकर्षित किया जा सके। जाने-अनजाने इन बातों का प्रभाव तो होता ही है। शायद इसी का नतीजा है कि आज हर व्यक्ति खुद चलता फिरता विज्ञापन हो बैठा है।

इन दिनों संवाद माध्यमों का प्रभाव इतना जबरदस्त है कि उनकी दिन-ब-दिन बढ़ती मांग पूरी करने में ही हमारी बहुत सी शक्ति जाया हो रही है। औरों से संवाद करने के इतने सारे साधन हमारे पास है, लेकिन हम उनका पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं कर पा रहें है, यह विफलता हमें घेरे जा रही है। हमारे पास कहने- बताने लायक कुछ खास बचा ही नहीं है इसका एहसास हमें नहीं होता। ऐसी स्थिती में लगता है कि संवाद माध्यमों ने हमें पूरी तरह परास्त कर दिया है और हम प्रतिक्रियावश खुद को 'अभिव्यक्त ' करने की जीतोड़ कोशिश में लगे हुए है। इस संघर्ष का नतीजा अभिव्यक्ति नहीं, केवल कोलाहल होता है। हम इस कोलाहल के शिकार हैं।

इन सब में मौन कहां है ? वह दुर्लक्षित और संदर्भहीन हो गया है। वास्तव में सृष्टि का मूल स्वर मौन ही है। निसर्ग के सान्निध्य में इसका प्रमाण मिलता है। वहां मौन का खंडित होना क्षणिक, तात्कालिक अवस्था होती है। हम है कि विपरीत दिशा में दौड़ रहे हैं। भावनाओं, विचारों, संवेदनाओं को इंटर्नलाइज करना आउट्डेटेड हो गया है। भावना, विचार, मन में आने से पहले अभिव्यक्त करते आना चाहिए तभी आपको कुछ कहने का मौका मिलेगा। आप और आप के सेलफोन्स, फैक्स, इमेल्स इस संवादयुद्ध में टिके रहेंगे। संवाद के इस ख़ोख़ले आडंबर ने व्यक्ति-व्यक्ति के दरमियान कितना कूडा भर रखा है इसकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं है।

ऐसे माहौल में कभी कभार अच्छे क्षण भी आते हैं। कभी देर रात आपकी नींद खुलती है, सब शांत है, आप उठिये, घर का दरवाजा खोलकर, बाहर निकलकर, स्तब्ध खडे हो जाइये- आपको जो कहना होता है; आसपास के घरों को, पेडपौधों को, रास्तों को, अंधेरे को बराबर समझ आता है क्यों कि इनके बीच में हेराफेरी करने के लिए कोई संवाद का जरिया नहीं होता।


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