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तीर्थ
अजित वडनेरकर


हिंदू परंपरा में तीन तरह के तीर्थ माने गए हैं - 1. जंगम, 2 . स्थावर और 3. मानस। जंगम का मतलब होता है जीवधारी, चलने-फिरनेवाला, हिलने-डुलनेवाला। जंगम बना है संस्कृत की गम् धातु से जिसमें जाना, प्रयाण करना वाले भाव हैं। गौरतलब है कि जनमानस में भारत भूमि की पावनतम नदी गंगा की व्युत्पत्ति इसी गम् धातु से मानी जाती है। (यह अलग बात है कि ज्यादातर भाषाविज्ञानी इसका जन्म आस्ट्रो-एशियाई भाषा परिवार से मानते हैं।) जंगम श्रेणी के अंतर्गत जो तीर्थ कहलाते हैं वे साधु, संन्यासी, परिव्राजक, श्रमण, भिक्षु आदि होते हैं। दूसरी श्रेणी है स्थावर तीर्थ की। इसमें सप्तपुरियाँ, चार धाम और देशभर में बिखरे अन्य तीर्थ आते हैं। तीर्थों का तीसरा वर्ग है मानस तीर्थ। धर्म जगत में भारतीय मनीषा की सबसे सुंदर कल्पना लगती है मुझे मानस तीर्थ। कहा गया है कि दुष्ट, कपटी, लोभी, लालची, विषयासक्त मनुष्य उपर्युक्त जंगम और स्थावर तीर्थों का कितना ही दर्शन लाभ क्यों न पा ले, मगर यदि उसमे सत्य, क्षमा, दया, इन्द्रिय संयम, दान और अन्य सदाचार नहीं हैं तो कितने ही तीर्थों का फेरा लगा ले, उसे पावनता नहीं मिल सकती। सार यही है कि ये तमाम सद्गुण ही तीर्थ हैं और सर्वोच्च तीर्थ मनःशुद्धि है। मानस तीर्थ की अवधारणा ही हमें सत्कर्मों के लिए प्रेरित करती है और किसी भी किस्म की कट्टरता, पाखंड और प्रकारांतर से प्रचार-प्रमाद से दूर रखती है। इसीलिए यही तीर्थ मुझे प्रिय है। सदाचारों की सूची में आप आज के युग के अनुरूप फेरबदल कर सकते हैं। बावजूद इसके आप खुद को हल्का ही महसूस करेंगे। पाकिस्तान जा बसे शायर जान एलिया की बुद्ध पर लिखी कविता की आखिरी पंक्तियाँ याद आ रही हैं -

 

घरबार हैं बीवी बच्चे हैं

आदर्श यही तो सच्चे हैं

वन की तपती धूप में हूँ

मैं खुद भगवान के रूप में हूँ

 

जीवन कर्म को छोड़ कर, सत्य की तलाश में पत्नी-बच्चों को त्याग यायावरी कर बुद्ध का दर्जा तो हासिल किया जा सकता है, मगर दुनियादारी में रच-बस कर तीर्थ का पुण्य प्राप्त कर लेना बड़ी बात है।


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