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ठगे जाने में संतोष
मंगलेश डबराल


मुझे अपनी कविताओं से भय होता है, जैसे मुझे घर जाते हुए भय होता है।

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अच्छे आदमी बनो - रोज मैं सोचता हूँ। क्या सोच कर अच्छा आदमी हुआ जा सकता है? अच्छा आदमी क्या होता है? कैसा होता है? किसकी तरह?

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यथार्थ! यह संसार का सबसे कठिन शब्द है। करोड़ों जीवन यथार्थ को समझते-समझाते बीत गए। यह तब भी सबसे विकट, गूढ़ और रहस्यमय शब्द है। अतियथार्थ और अयथार्थ भी दरअसल यथार्थ हैं। मानसिक यथार्थ भी भौतिक यथार्थ है। भाषा इसके सामने अपर्याप्त है। क्या 'पेड़' शब्द लिख कर हम पेड़ को पूरी तरह, उसके समूचेपन में व्यक्त कर सकते हैं? इसलिए हर अभिव्यक्ति, हर वर्णन, हर कविता हद से हद यथार्थ को कहने का एक तरीका, एक प्रयत्न है। एक संभव प्रयत्न। इसलिए मेरी कविता अपरिवर्तनशील, अकाट्य, अनश्वर और अंतिम-नहीं है।

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पहले मैं हर चीज की, हर व्यक्ति की प्रशंसा करता था। सोचता था शमशेर की तरह मैं भी चीजों का उजला पहलू ही पहले देखूँगा। पर अब मैं ज्यादातर चीजों की आलोचना और भर्त्सना करने लगा हूँ। मुझे उनका खोट ही सबसे पहले दिखता है।

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यह सभी की समस्या रहती होगी कि हम मनुष्य के रूप में कैसे हैं। मेरा व्यक्तित्व कैसा है? मुझे कैसा होना चाहिए? क्या मुझे खामोश रहना चाहिए या वाचाल? खामोश होता हूँ तो वैसी कविता नहीं लिख सकता जैसी लिखना चाहता हूँ और बातूनी होने पर खराब आदमी होने का भय है। क्या मुझे मुस्कराते रहना चाहिए या उदास बने रहना चाहिए? इसी द्वंद्व में मैं खुश होता हूँ तो उदास दिखता हूँ और उदास होता हूँ तो हास्यास्पद लगता हूँ।

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आप अचानक किसी संकट में फँस गए हैं। आपकी चोट साफ दिखाई दे रही है। काफी खून बहा होगा। कुछ खून अब भी बह रहा है। पीड़ा भी हम समझ सकते हैं। यह चोट इस बात का प्रमाण है कि आदमी अगर समझदार न हो तो उसके साथ इस समाज में क्या होता है। लेकिन चोट आपको लगी क्यों? इसकी कोई वजह साफ नहीं दिखाई देती। बस चोट ही दिखाई देती है। क्या कोई गलती आप से हुई है? आपके जीवन में कोई गड़बड़ है? विचारों में कोई दोष है? कृपया हमें बताएँ? अरे, आप तो चोट ही दिखलाए चले जा रहे हैं। क्या आप उसकी वजह नहीं जानना चाहते? बार-बार चोट दिखाते हैं पर नहीं बताते कारण; अब इस संकट का हम कैसे करें निवारण!

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मैं ऐसे छोटे-छोटे झूठ बोलता हूँ जिनसे दूसरों को कोई नुकसान नहीं होता। लेकिन उनसे मेरा नुकसान जरूर होता है। मसलन, झूठ बोलना ही एक अपने आप में बड़ा नुकसान है।

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जाने क्या है कि धोखा खाने, ठगे जाने में मुझे एक अजब-सा संतोष मिलता है। शायद थोड़ी खुशी भी होती है। कोई चीज खो जाए तो कुछ देर को अच्छा लगता है। बाजार से कोई चीज खरीदता हूँ - मसलन कमीज, जूता, बैग या माचिस - और वह खराब या नकली निकलती है तो एक राहत महसूस होती है। अमेरिका में मैंने एक बड़ा-सा महँगा-सा बैग लिया था जिसका कंधे पर लटकनेवाला फीता घर लौटते-लौटते टूट गया तो मुझे प्रसन्नता हुई कि अमेरिका की चीजें हमारी निगाह में बहुत टिकाऊ मानी जाती हैं पर वे भी जल्दी टूटती हैं। कहीं रास्ता भटक जाता हूँ तो घबराहट जरूर होती है लेकिन यह भी लगता है कि अच्छा है इस रास्ते ने मुझे ठग लिया। यानी यह एहसास कि यह वह नहीं है या था जो वह सचमुच होता या होना चाहिए था। यह 'वह' भी नहीं हैं जो 'वह' की शक्ल में प्राप्त हुआ। वह कुछ और है और उसे पाने की कोशिश में ठगा जाता हूँ। यह ठीक भी है। कोई उधार लिए पैसा लौटाता है तो अचानक लगता है कि मैंने कुछ ठगी कर ली है।

('लेखक की रोटी' में 'एक बेतरतीब डायरी से')


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