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उपन्यास

अपराध और दंड
फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की

अनुवाद - नरेश नदीम


1

रस्कोलनिकोव के लिए एक अजीब दौर का आरंभ हुआ : लगता था, उसके ऊपर घना कुहरा उतर आया हो जिसने उसे घोर निराशा भरे अकेलेपन की चादर में लपेट दिया हो और उससे निकलने का कोई रास्ता न हो। बाद में - बहुत बाद में - इस जमाने को याद करके उसने महसूस किया कि इसमें ऐसे पल भी आए थे जब चीजों को देखने-समझने की क्षमता धुँधलाती महसूस हो रही थी, और यह सिलसिला आखिरी तबाही आने तक चलता रहा था, बस बीच में कभी-कभी ठहर जाता था। उसे यकीन हो चला था कि उस जमाने में, कई बातों के बारे में उसके विचार गलत थे, मसलन कुछेक घटनाओं की तारीख और अवधि के बारे में। बहरहाल, बाद में जब उसने उन घटनाओं को याद किया और उनकी वजह तलाश करने की कोशिश की तो दूसरे लोगों से हासिल की गई जानकारी को बाँध-जोड़ कर उसने अपने बारे में कई ऐसी बातों का पता लगाया जो उसे पहले नहीं मालूम थीं। मिसाल के तौर पर वह एक घटना को कोई दूसरी घटना का नतीजा समझ लेता था, जिसका अस्तित्व केवल उसकी कल्पना में था। कभी-कभी उस पर चिंता की ऐसी दुखदायी और बीमार भावना छा जाती थी, जो बौखलाहट का रूप ले लेती थी। लेकिन उसे ऐसे पल भी याद थे, ऐसे घंटे, बल्कि पूरे-पूरे दिन, जब उस पर गोया पहलेवाली बौखलाहट के विपरीत भरपूर उदासीनता छा जाती थी, उसी बीमार लाचारी जैसी उदासीनता, जो कभी-कभी मरने से फौरन पहले कुछेक लोगों पर छा जाती है। उन अंतिम दिनों में, कुल मिला कर, ऐसा लगता था कि वह अपनी स्थिति को पूरी तरह और साफ-साफ समझने से कतराने की चिंता करता रहता था। उन दिनों तात्कालिक महत्व की कुछ ऐसी बातें दिमाग पर खास तौर पर बोझ बनी रहती थीं, जिनकी वजह को फौरन समझना जरूरी होता था। लेकिन उसे अपनी चिंताओं से बच निकलने से कितनी ही खुशी क्यों न होती रही हो, उसने इतना जरूर महसूस किया कि जो आदमी उस जैसी स्थिति में हो, उसके लिए उन चिंताओं की ओर एकदम ध्यान न देना लाजमी तौर पर तबाही का कारण बन सकता था।

वह खास कर स्विद्रिगाइलोव की वजह से चिंतित था, बल्कि यह कहना गलत न होगा कि उसके सारे विचार स्विद्रिगाइलोव पर केंद्रित थे। जब से स्विद्रिगाइलोव ने कतेरीना इवानोव्ना की मौत के समय सोन्या के कमरे में रस्कोलनिकोव के आगे उन धमकी भरे और उसकी नजरों में असंदिग्ध, शब्दों का इस्तेमाल किया था, तब से ऐसा लगने लगा था कि उसके विचारों का स्वाभाविक प्रवाह टूट चुका था। वैसे इस नई बात से रस्कोलनिकोव को बेहद चिंता हुई थी, फिर भी उसे इसका कारण जानने की कोई जल्दी महसूस नहीं होती थी। कभी-कभी जब वह शहर के किसी दूर-दराज, एकांत हिस्से में, किसी घटिया शराबखाने की मेज पर अपने आपको विचारों में खोया हुआ पाता और उसे ठीक से यह भी याद नहीं आता कि वह वहाँ पहुँचा कैसे, तब वह अचानक स्विद्रिगाइलोव के बारे में सोचने लगता था। वह अचानक हैरानी के साथ और बहुत स्पष्ट रूप से यह महसूस करने लगा था कि उसे जितनी जल्दी हो सके, उस आदमी के साथ मेल-जोल पैदा करना चाहिए, उससे कोई पक्का समझौता कर लेना चाहिए। अपने आपको एक दिन शहर के बाहर पा कर वह यह भी कल्पना करने लगा कि वह स्विद्रिगाइलोव का इंतजार कर रहा था, कि उसने उससे वहीं मिलने की बात तय की थी। फिर एक बार ऐसा भी हुआ कि पौ फटने से पहले उसकी आँख खुली, तो वह झाड़ियों के बीच जमीन पर पड़ा था और उसे यह भी याद नहीं आ रहा था कि वह वहाँ पहुँचा कैसे था। लेकिन कतेरीना इवानोव्ना की मौत के दो-तीन दिनों के अंदर वह स्विद्रिगाइलोव से कई बार मिला था, और लगभग हर बार सोन्या के कमरे में मिला था, जहाँ वह देखने में बिना किसी काम के जाता था। ऐसी हर भेंट लगभग हमेशा ही बस एक मिनट के लिए हुई। वे एक-दूसरे से कुछ शब्द कहते थे लेकिन कभी उस चीज के बारे में बातें नहीं करते थे, जिसमें उन दोनों को सबसे ज्यादा दिलचस्पी थी, गोया दोनों के बीच अपने आप फिलहाल उस बारे में कुछ भी न कहने का फैसला हो गया हो। कतेरीना इवानोव्ना की लाश अभी तक ताबूत में रखी थी। स्विद्रिगाइलोव कफन-दफन के इंतजाम में लगा हुआ था। सोन्या भी बहुत व्यस्त थी। पिछली मुलाकात में स्विद्रिगाइलोव ने रस्कोलनिकोव को बताया था कि उसने कतेरीना इवानोव्ना के बच्चों का पूरा-पूरा बंदोबस्त और बहुत ही संतोषजनक बंदोबस्त कर दिया था। अपनी जान-पहचान के कुछ लोगों से पूछताछ करके उसने कुछ ऐसे लोगों का पता लगाया था जिनकी मदद से उन तीन अनाथ बच्चों को उचित संस्थाओं में फौरन रखा जा सकता था। उसने यह भी बताया कि उसने उनके नाम जो पैसा जमा कराया था, उसकी वजह से भी बहुत मदद मिली क्योंकि जिन बच्चों के पास अपना कुछ पैसा होता है, उनका बंदोबस्त कंगाल बच्चों की अपेक्षा कहीं ज्यादा आसानी से हो जाता है। उसने सोन्या के बारे में भी कुछ कहा था, एक-दो दिन में रस्कोलनिकोव से खुद आ कर मिलने का वादा किया था, और इस बात का जिक्र किया था कि वह उसकी 'सलाह' लेना चाहता है, कि वह उसके साथ 'सारी बातें सुलझा लेने' के लिए बहुत ही बेचैन है, और यह कि उसे उससे कुछ 'काम की' बातें करनी हैं। यह बातचीत ड्योढ़ी में या सीढ़ियों पर होती थी। स्विद्रिगाइलोव ने एक बार एक पल रस्कोलनिकोव की आँखों में आँखें डाल कर बड़े गौर से देखा और फिर अपनी आवाज नीची करके उसने अचानक पूछा :

'लेकिन रोदिओन रोमानोविच, तुम इतने परेशान क्यों दिखाई दे रहे हो तुम तो लगता है कहीं खोए हुए हो, सचमुच! सब कुछ देखते रहते हो और सुनते रहते हो लेकिन लगता है, तुम्हारी समझ में कुछ भी नहीं आता। चिंता छोड़ो यार, खुश रहो! हम लोगों की बातचीत होने के बाद देखना; अफसोस की बात है कि इस वक्त मैं खुद अपने और दूसरे लोगों के मुआमलों में बुरी तरह उलझा हुआ हूँ।' उसने अचानक कहा, 'हर इनसान को खुली हवा की जरूरत होती है, हवा की, हवा की! ...सबसे बढ़ कर बस इसी एक चीज की!'

अचानक वह पादरी और उसके सहायक को रास्ता देने के लिए एक ओर को हट गया। वे लोग मृतात्मा के लिए प्रार्थना करने सीढ़ियों से ऊपर आ रहे थे। स्विद्रिगाइलोव ने इसका बंदोबस्त कर दिया था कि रोज दो बार यह प्रार्थना हुआ करे। स्विद्रिगाइलोव तो अपने काम से चला गया लेकिन रस्कोलनिकोव कुछ पल खड़ा सोचता रहा और फिर पादरी के पीछे-पीछे सोन्या के कमरे में चला गया।

वह चौखट पर ठिठक गया। प्रार्थना शुरू हुई - मंद गति से, शांत और उदास भाव से। बचपन के दिनों से ही वह हमेशा यह महसूस करता आया था कि मृत्यु के विचार में और मृत्यु की उपस्थिति की चेतना में कोई बहुत ही मनहूस और रहस्यमय, डरावनी चीज थी। इसके अलावा यह बात भी कि किसी मृत के शोक की प्रार्थना में गए उसे बहुत दिन हो गए थे। पर यहाँ तो कुछ और भी था - कोई बहुत ही भयानक और बेचैन करनेवाली बात। उसने बच्चों की ओर देखा : वे सभी ताबूत के पास घुटनों के बल बैठे थे। पोलेच्का रो रही थी। उनके पीछे सोन्या चुपके-चुपके, डरते-डरते, रोते हुए प्रार्थना कर रही थी। 'बात क्या है,' रस्कोलनिकोव ने अचानक सोचा, 'कि पिछले कुछ दिनों से उसने मेरी ओर देखा तक नहीं और न ही मुझसे कोई बात की!' कमरे में धूप फैली हुई थी; लोबान के धुएँ के बादल उठ रहे थे; पादरी एक आयत पढ़ रहा था, 'हे प्रभु, इसे चिर शांति दो'। पूरी प्रार्थना के दौरान रस्कोलनिकोव वहीं मौजूद रहा। उन्हें आशीर्वाद देने और उनसे विदा लेने के समय लगा कि पादरी ने एक अजीब ढंग से मुड़ कर अपने चारों ओर देखा। रस्कोलनिकोव प्रार्थना के बाद सोन्या के पास गया और सोन्या ने अचानक उसके हाथ अपने हाथों में ले कर सर उसके कंधे पर टिका दिया। उसके जरा देर की इस दोस्ताना अदा से रस्कोलनिकोव हैरत में पड़ गया; उसे यह बात बेहद अजीब लगी। हे भगवान, तो क्या उसके दिल में मेरे लिए जरा भी घृणा और तिरस्कार का भाव नहीं था उसके हाथ कतई काँप नहीं रहे थे... यह तो अपने आपको अपमानित करने की चरम सीमा है। उसने कम-से-कम इसे इसी रूप में समझा। सोन्या ने कुछ नहीं कहा। रस्कोलनिकोव ने उसका हाथ धीरे से दबाया और बाहर चला गया। वह बहुत कुढ़न का अनुभव कर रहा था। अगर वह उस पल कहीं चला जाता और वहाँ बाकी जीवन एकदम अकेला रहता, तो भी अपने आपको धन्य समझता। लेकिन मुसीबत यह थी कि इधर कुछ समय से यूँ तो वह निपट अकेला रहा, पर फिर भी वह कभी यह महसूस नहीं किया कि वह अकेला है। कभी-कभी वह शहर से बाहर निकल जाता, शाहराह पर चलता रहता, और एक दिन तो एक छोटे से जंगल में भी जा पहुँचा लेकिन जगह जितनी ही सुनसान होती थी, उसे पास ही किसी की डरावनी मौजूदगी का उतना ही अधिक एहसास होता था, किसी की ऐसी मौजूदगी का जो उसमें भय उतना पैदा नहीं करती थी जितना उसे झुँझला देती थी। तब वह जल्दी से वापस शहर आ जाता, भीड़ में घुल-मिल जाता, किसी रेस्तराँ या शराबखाने में जा कर बैठ जाता, या पैदल चलता हुआ कबाड़ी बाजार या भूसामंडी पहुँच जाता। वहाँ उसे अधिक शांति मिलती और वह अधिक अकेला भी महसूस करता। एक शाम एक शराबखाने में लोग गीत गा रहे थे। वहाँ वह लगभग घंटे भर बैठा गीत सुनता रहा, और उसे याद था कि उसे उसमें बहुत आनंद आया था। लेकिन अंत में वह फिर बेचैन हो उठा, गोया उसका जमीर उसे कचोके दे रहा हो : 'यहाँ बैठा मैं गाने सुन रहा हूँ जबकि मुझे यही नहीं करना चाहिए, क्यों?' वह बरबस सोचने लगा। लेकिन उसे फौरन लगा कि उसे अकेले यही बात परेशान नहीं कर रही थी। कोई बात ऐसी भी थी जिसे फौरन तय करना जरूरी था लेकिन बात क्या थी, इसे वह न तो साफ तौर पर देख सका और न शब्दों से व्यक्त कर सका। हर चीज कैसी बुरी तरह उलझी हुई मालूम होती थी। 'नहीं,' उसने सोचा, 'इससे तो लड़ना कहीं बेहतर होगा! इससे कहीं बेहतर यह होगा कि वह फिर पोर्फिरी से टक्कर ले... या स्विद्रिगाइलोव से टकरा जाए... या किसी समन का, किसी हमले का सामना करे!' वह शराबखाने से बाहर निकल गया और लगभग दौड़ने लगा। न जाने क्यों दुनिच्का और अपनी माँ का खयाल आने पर वह अचानक बौखला उठा। यह उसी रात की बात है जब उसकी आँख पौ फटने से पहले क्रेस्तोव्स्की द्वीप की कुछ झाड़ियों के बीच खुली थी, उसकी हड्डियों तक में सर्दी समा गई थी और उसे बुखार महसूस हो रहा था। वह घर की तरफ बढ़ चला था और बहुत तड़के वहाँ पहुँचा था। कुछ घंटे सोने के बाद उसका बुखार तो उतर चुका था, लेकिन वह काफी देर तक सो कर उठा था : तीसरे पहर के दो बजे।

उसे याद आया उसी दिन कतेरीना इवानोव्ना को दफन किया जानेवाला था और उसे इसी बात की खुशी थी कि वह उसके जनाजे में नहीं गया। नस्तास्या उसके लिए जब कुछ खाना लाई तो उसने जी भर कर खाया-पिया, किसी मरभुक्खड़ की तरह। दिमाग में पहले से ज्यादा ताजगी आ गई थी, और तब वह जितनी शांति अनुभव करने लगा था, उतनी उसने उससे पहले तीन दिन में कभी नहीं की थी। एक पल के लिए उसे उससे पहले के बौखलानेवाले खौफ के दौरों पर कुछ आश्चर्य भी हुआ। इतने में दरवाजा खुला और रजुमीखिन अंदर आया।

'खूब, तो खाना खा रहे हो... इसका मतलब है कि बीमार नहीं हो,' रजुमीखिन ने कुर्सी खींच कर मेज की दूसरी तरफ रस्कोलनिकोव के सामने बैठते हुए कहा। वह बहुत परेशान था और उसने इसे छिपाने की कोशिश नहीं की। वह स्पष्ट झुँझलाहट के साथ बोल रहा था, लेकिन बिना किसी जल्दी के बिना आवाज ऊँची किए हुए। साफ था कि वह किसी खास, बल्कि गैर-मामूली, काम से आया था।

'देखो,' उसने सधी आवाज में कहना शुरू किया, 'जहाँ तक मेरा सवाल है, मेरी बला से तुम सब लोग भाड़ में भी जाओ... लेकिन मैं अब उस जगह पहुँच चुका हूँ जहाँ मैं यह महसूस करने लगा हूँ कि मेरी समझ में कुछ भी नहीं आता। भगवान के लिए, यह मत समझना कि मैं तुमसे जवाब माँगने आया हूँ। मेरी बला से! ऐसा करने का मेरा कोई इरादा नहीं! अगर तुम मुझे खुद अपनी सारी बातें, सारे मनहूस भेद, बताना चाहो तब भी ऐन मुमकिन यही है कि मैं सुनने के लिए न रुकूँ। मैं उठ कर फौरन चला जाऊँगा। मैं निजी तौर पर सबसे पहले और आखिरी बार जिस बात का पता लगाने आया हूँ वह यह है कि तुम सचमुच पागल हो कि नहीं। देखो, कुछ लोग तुम्हारे बारे में यही राय रखते हैं (यहाँ भी और वहाँ भी) कि तुम या तो पागल हो या पागल होनेवाले हो। मैं तुम्हें साफ-साफ बता दूँ, मैं खुद इस राय को मानने को तैयार था। पहली बात तो यह कि तुम्हारी बेवकूफी भरी और कुछ हद तक नफरत पैदा करनेवाली हरकतों की वजह से (मैं लगे हाथ यह भी कह दूँ कि उनकी कोई वजह समझ में नहीं आती), और दूसरी यह कि इधर हाल में अपनी माँ और बहन के साथ तुम्हारा बर्ताव ही ऐसा था। जैसा बर्ताव तुमने किया, वैसा तो महज कोई पिशाच, कोई नीच या कोई पागल ही कर सकता था। इससे साबित होता है कि तुम जरूर पागल हो...'

'क्या तुम उनसे हाल में भी मिले?'

'अभी-अभी। तो क्या उस दिन के बाद तुम उनसे नहीं मिले? तुम आखिर भटकते कहाँ रहते हो, मैं तो यह जानना चाहता हूँ। मैं यहाँ तीन बार पहले भी आ चुका। तुम्हारी माँ बीमार हैं। कल से उनकी तबीयत बहुत खराब है। वे तुम्हारे पास आना चाहती थीं। तुम्हारी बहन ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन वह किसी तरह सुनती ही नहीं थीं। बोलीं : अगर वह बीमार है, अगर पागल हो रहा है, तो उसकी मदद करना उसकी माँ का फर्ज है। इसलिए हम सब यहाँ साथ आए क्योंकि उन्हें अकेले तो नहीं आने देते। रास्ते भर उनसे हम शांत रहने की मिन्नतें करते रहे। हम अंदर भी आए, लेकिन तुम कहीं बाहर गए हुए थे। वे दस मिनट तक यहीं बैठी राह देखती रहीं, और हम लोग चुपचाप पास में खड़े रहे। फिर वे उठीं और बोलीं : अगर वह बाहर गया हुआ है तो मतलब यह है कि वह चंगा होगा या अपनी माँ को भूल गया है। यह उसकी माँ के लिए बड़े अपमान की बात है और उसे यह शोभा नहीं देता कि माँ उसके दरवाजे पर खड़ी हो कर उससे प्यार की भीख माँगे। घर वापस आते ही उन्होंने चारपाई पकड़ ली। अब उन्हें बुखार है। कहती हैं : मैं देख रही हूँ, 'उसके पास अपनी छोकरी के लिए काफी वक्त है'। उन्हें विश्वास है कि तुम्हारी छोकरी वह सोफ्या सेम्योनोव्ना है और उसे वे तुम्हारी मँगेतर या रखैल, मुझे नहीं मालूम क्या समझती हैं। मैं फौरन सोफ्या सेम्योनोव्ना के यहाँ गया। बात यह है यार कि मैं एक पूरे मामले की तह तक पहुँचना चाहता हूँ। वहाँ पहुँच कर मैंने एक ताबूत रखा हुआ देखा। बच्चे रो रहे थे और सोफ्या सेम्योनोव्ना उन्हें मातमी कपड़े पहना रही थी। तुम वहाँ नहीं थे। मैंने एक नजर झाँक कर देखा, फौरन माफी माँग कर वापस चला आया और फौरन जा कर तुम्हारी बहन को सारी बात बता दी। लिहाजा यह सारी बात बकवास ही है। तुम्हारी कोई छोकरी नहीं है, और तुम शायद सरासर, पूरी तरह पागल हो। और अब तुम यहाँ बैठे उबले गोश्त से यूँ चिपके हुए हो जैसे तीन दिन से मुँह में कौर न गया हो। माना कि खाना तो पागल भी खाते हैं, पर मैं देख सकता हूँ कि तुम... पागल नहीं हों। हालाँकि तुमने मुझसे अभी तक एक शब्द भी नहीं कहा है! मैं कसम खा कर कह सकता हूँ कि तुम कतई पागल नहीं हो। इसलिए तुम सब जाओ भाड़ में क्योंकि जाहिर है इसमें कोई भेद है, कोई रहस्य है और अगर मैं तुम्हारे रहस्यों का पता लगाने में अपना सर खपाऊँ, तो मुझ पर लानत बरसे। इसलिए मैं तुमसे बस यह बताने आया हूँ कि तुम्हारे बारे में मैं क्या सोचता हूँ,' उसने उठते हुए अपनी बात खत्म की। '...अपने दिमाग पर से बोझ उतारने के लिए। इसलिए कि अब मुझे मालूम है कि मुझे क्या करना है!'

'तुम अब क्या करनेवाले हो?'

'तुमसे मतलब कि मैं क्या करनेवाला हूँ?'

'देखो, खबरदार! तुम शराब पीना न शुरू कर दो!'

'कैसे... तुमने कैसे अंदाजा लगाया?'

'हे भगवान, यह तो सीधी-सी बात है!'

रजुमीखिन कुछ पलों तक चुप रहा।

'तुम हमेशा बहुत समझदार रहे,' अचानक उसने जोश में कहा, 'और कभी पागल नहीं रहे... कभी नहीं। तुम एकदम ठीक कहते हो : मैं शराब ही पीने लगूँगा। तो लो, मैं चला।' यह कह कर वह दरवाजे की ओर बढ़ा।

'रजुमीखिन, मैं अपनी बहन से तुम्हारे बारे में ही बातें कर रहा था। मेरा खयाल है परसों।'

'मेरे बारे में! लेकिन परसों तुम उनसे कहाँ मिले?' रजुमीखिन अचानक ठिठका। उसके चेहरे का रंग जरा उतर गया। साफ लग रहा था कि उसका दिल धीरे-धीरे लेकिन भारीपन के साथ धड़क रहा था।

'वह यहाँ अकेली आई थी। यहीं बैठ कर मुझसे बातें करती रही।'

'यह बात?'

'हाँ।'

'उनसे तुमने क्या बातें की... मेरा मतलब है, मेरे बारे में क्या कहा?'

'मैंने उसे बताया कि तुम बहुत भले, ईमानदार और मेहनती इनसान हो। हाँ, उसे मैंने यह नहीं बताया कि तुम उससे प्यार करते हो, क्योंकि यह तो वह आप ही जानती है।'

'आप ही जानती हैं?'

'बिलकुल! तो मैं कहीं भी जाऊँ, मेरा जो भी हाल हो, तुम उन लोगों के साथ ही रहना, उनकी देखभाल करना। यह समझ लो रजुमीखिन कि उन्हें मैं तुम्हारे हवाले कर रहा हूँ... कि मुझे पता है, तुम्हें उससे कितना प्यार है और इसलिए कि मुझे पक्का यकीन है कि तुम एक नेक इनसान हो। मुझे यह भी पता है कि अगर इस वक्त उसे तुमसे प्यार नहीं भी हो, तो भी आगे चल कर वह तुमसे प्यार कर सकती है। अब तुम खुद ही फैसला करो कि तुम्हें शराब शुरू करनी चाहिए या नहीं।'

'रोद्या... देखो... खैर... जाने दो यह बात! लेकिन तुम भला कहाँ जाने की सोच रहे हो मेरा मतलब है, अगर यह कोई भेद की बात है तो मैं जवाब के लिए तुम पर जोर नहीं डालूँगा। हाँ, मैं... मैं इस भेद का पता तो लगा ही लूँगा... और मुझे पूरा यकीन है कि यह सब खुराफात है... सरासर बकवास है, और यह सारा सिलसिला तुमने ही शुरू किया है। फिर भी, तुम आदमी बहुत अच्छे हो! बहुत अच्छे...'

'खैर, मैं तो आप ही तुम्हें बताने जा रहा था, लेकिन तुमने मेरी बात बीच में ही काट दी। अभी एक मिनट पहले तुम्हारे मुँह से यह सुन कर मैं बहुत खुश हुआ था कि तुम मेरे किसी भेद का पता लगाने की कोशिश नहीं करोगे। फिलहाल तो भेद को भेद ही रहने दो। तुम बड़े अच्छे हो, और उसके बारे में परेशान मत हो। वक्त आने पर हर बात तुम्हें मालूम हो जाएगी... मेरा मतलब है, जब तुम्हारे जानने का वक्त आएगा। कोई मुझे कल बता रहा था कि आदमी के लिए जो चीज जरूरी है, वह है ताजा हवा, हवा! मैं अभी उसके पास जा कर यही मालूम करना चाहता था कि इससे उसकी मुराद क्या थी।'

रजुमीखिन विचारमग्न और अंदर से हिला हुआ नजर आ रहा था। लग रहा था, वह किसी बात के बारे में सोच रहा है।

'यह एक राजनीतिक षड्यंत्रकारी है, इसमें कोई शक नहीं! और यह भी तय है कि यह जान की बाजी लगा कर कुछ करनेवाला है... इसके अलावा कुछ और हो भी नहीं सकता और... और दुनिच्का इस बात को जानती है,' उसने मन-ही-मन सोचा।

'तो तुम्हारी बहन तुमसे मिलने आती हैं,' उसने एक-एक शब्द पर जोर दे कर कहा, 'और तुम खुद ऐसे किसी आदमी से मिलने के लिए बेचैन हो जो कहता है कि हमें हवा की और ज्यादा जरूरत है, हवा की और... मैं समझता हूँ कि वह खत भी इसी तरह की कोई चीज है,' उसने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, गोया अपने आपसे बातें कर रहा हो।

'कौन-सा खत?'

'आज सबेरे उनके पास एक खत आया जिसे पढ़ कर वे बहुत परेशान हो गईं। बहुत ही परेशान। मैं तुम्हारे बारे में बातें करने लगा तो मुझे लगभग डाँट कर चुप करा दिया। फिर... फिर बोलीं कि शायद जल्दी ही हमको एक-दूसरे से अलग होना पड़े। फिर किसी बात के लिए मेरा शुक्रिया अदा करने लगीं, और उसके बाद अपने कमरे में जा कर कमरा अंदर से बंद कर लिया।'

'उसके पास कोई खत आया था?' रस्कोलनिकोव ने कुछ सोचते हुए कहा।

'हाँ। तुम्हें नहीं मालूम हूँ!'

दोनों चुप रहे।

'तो रोद्या, मैं चला। देखो यार... एक जमाना वह भी था जब... खैर, चलता हूँ! मुझे जाना भी है। मैं शराब के चक्कर में नहीं पड़ूँगा, अब उसकी कोई जरूरत नहीं रही... खतरे की कोई बात नहीं।'

उसे जाने की जल्दी थी, लेकिन बाहर निकलते हुए जब वह दरवाजा बंद करने लगा तो अचानक दरवाजा फिर खोल कर रस्कोलनिकोव की ओर देखे बिना बोला :

'अरे हाँ, तुम्हें वह कत्ल तो याद है न पोर्फिरी और... वह बुढ़िया तो मैं तुम्हें यह बता दूँ कि हत्यारे का पता चल चुका है। उसने अपना अपराध मान लिया है और सारे सबूत भी बरामद करा दिए हैं। वह उन्हीं मजदूरों में से था जो घर की रंगाई-पुताई कर रहे थे। कमाल की बात है न? याद है, मैं यहीं पर, उन्हीं की पैरवी कर रहा था। तुम यकीन करोगे कि जिस वक्त दरबान और दो गवाह सीढ़ियों से ऊपर जा रहे थे तब उसने जान-बूझ कर अपने पर से शक हटाने के लिए अपने साथी के साथ सीढ़ियों पर मार-पीट और हँसी-मजाक का वह नाटक रचा था। ऐसी नौजवानी में इतनी चालाकी ऐसी हाजिर-दिमागी! यकीन नहीं आता किसी तरह, लेकिन उसने हर बात की वजह साफ कर दी है और सब कुछ साफ तौर पर कबूल कर लिया है। पर मैं भी कैसा बेवकूफ बना! मैं तो समझता हूँ कि मक्कारी और सूझबूझ में उसका जवाब नहीं है। वह हमारे बड़े-बड़े कानून के पंडितों की आँखों में धूल झोंकने में उस्ताद है, सो ताज्जुब की कोई बात नहीं है इसमें! बहरहाल, ऐसे लोग भी इस दुनिया में क्यों न मिलें जहाँ तक इस नाटक को जारी न रख पाने और अपना अपराध कबूल कर लेने की बात है, तो यह भी एक वजह है कि उसका यकीन किया जाए। बात और भी यकीन के लायक हो जाती है... लेकिन उस दिन मैं कैसा बेवकूफ बना! उसकी पैरवी में जमीन-आसमान के कुलाबे मिला दिए!'

'आह... पर यह तो बताओ कि ये सब बातें तुम्हें कैसे मालूम हुईं, और तुम्हें इसमें इतनी दिलचस्पी क्यों है?' रस्कोलनिकोव ने साफ तौर पर उत्तेजित हो कर पूछा।

'हे भगवान, इसमें मेरी दिलचस्पी की भी एक ही कही! क्या सवाल है! मुझे यह बात औरों के अलावा पोर्फिरी से भी मालूम हुई। सच तो बल्कि यह है कि लगभग सारी बातें उसी ने बताईं।'

'पोर्फिरी ने'

'हाँ, पोर्फिरी ने।'

'हूँ तो क्या... क्या कहा उसने?' रस्कोलनिकोव ने चौंक कर पूछा।

'अरे उसने तो सारी बातें बड़े ही खूबसूरत ढंग से समझाईं। मनोवैज्ञानिक ढंग से, अपने ही खास ढंग से।'

'उसने समझाया... तुम्हें उसने खुद समझाया?'

'हाँ, खुद उसने। तो मैं चला। बाद में तुम्हें और भी बातें बताऊँगा। माफ करना, अब मैं भागूँगा। देखो, बात यह है कि एक जमाना था जब मैं सोच करता था... पर जाने दो, अभी नहीं बाद में बताऊँगा... अब मैं नशे में चूर होना नहीं चाहता, तुमने तो मुझे शराब के बिना ही मदहोश कर दिया है। मैं नशे में हूँ, रोद्या! एक बूँद भी पिए बिना नशे में हूँ। खैर, फिर मिलेंगे। बहुत जल्द मैं फिर आऊँगा।'

वह चला गया।

'किसी राजनीतिक षड्यंत्र में यह शामिल है, यह तो तय बात है... एकदम पक्की,' रजुमीखिन ने धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरते हुए आखिरी तौर पर सोचा। 'और इसने अपनी बहन को भी उसमें घसीट लिया है। दुनिच्का जैसी लड़की के साथ ऐसा होना ऐन मुमकिन है। दोनों छिप-छिप कर मिलने भी लगे हैं... और उसने भी इशारे-इशारे में मुझसे यह बात कही! हाँ, उसकी बातों से... उसके हाव-भाव से... और उसके इशारों से तो यही लगता है कि यह बात सच होगी! वरना इस गुत्थी का और क्या हल हो सकता है मैं सोचता था... हे भगवान, मैंने ऐसी बात सोची कैसे! मैं पागल था कि मैंने इस तरह की बात सोची और इस तरह उसके साथ बड़ी ही ज्यादती की। उस दिन रात को गलियारे में लैंप के नीचे उसी ने मुझे ऐसा सोचने पर मजबूर किया। लानत है! कैसा बेहूदा, भोंडा और कायरता भरा विचार था! भला हो उस निकोलाई का कि उसने अपना अपराध मान लिया! उसकी वजह से कितनी मदद मिली है सारी बात समझने में। इसकी बीमारी, इसकी अजीब-अजीब हरकतें... यूनिवर्सिटी में भी यह उखड़ा-उखड़ा और उदास रहा था... लेकिन उस खत का भेद क्या है मैं समझता हूँ, उसमें भी कोई बात जरूर है। किसका खत था? मुझे तो शक है... खैर, पता तो मैं लगा ही लूँगा!'

दुनिच्का का अजीब-गरीब व्यवहार याद करके उसका दिल डूबने लगा। वह तेज कदम बढ़ाता हुआ चलता रहा।

रजुमीखिन के जाते ही रस्कोलनिकोव उठा, खिड़की की ओर घूमा और कमरे में एक कोने से दूसरे कोने तक टहलने लगा, गोया उसे यह याद भी न रहा हो कि कमरा कितना छोटा था, और... वह एक बार फिर सोफे पर बैठ गया। लग रहा था, वह बिलकुल बदल गया है। तो आगे एक संघर्ष और भी है... मतलब कि बाहर निकलने का रास्ता भी है!

'हाँ, रास्ता तो है! हवा की बेहद कमी हो रही है... काफी घुटन है यहाँ!' उसे लगा, वह किसी बहुत बड़े बोझ के नीचे दबा हुआ है जो उसे जमीन से उठने नहीं दे रहा, गोया उसे किसी ने नशीली दवा पिला दी हो। उस दिन पोर्फिरी के दफ्तर में निकोलाई के साथ जो कुछ हुआ था, उसके बाद से वह बहुत जकड़ा हुआ, घुटा-घुटा महसूस करने लगा था। उसी दिन निकोलाईवाली घटना के बाद सोन्या के कमरेवाली बात हुई थी। उस घटना में उसने जो कुछ किया और अंत में जो कुछ कहा, उसकी उसने पहले से कल्पना तक नहीं की थी... हाँ, वह कमजोर हो गया था, और सो भी अचानक और पूरी तरह! एक ही झटके में! उस वक्त वह सोन्या की इस बात से सहमत था कि अपने अंतःकरण पर ऐसी चीज का बोझ ले कर वह चल नहीं सकेगा! और स्विद्रिगाइलोव? स्विद्रिगाइलोव एक पहेली था... यह सच था कि उसे स्विद्रिगाइलोव की वजह से काफी चिंता रहती थी, लेकिन न जाने क्यों यह उस तरह की चिंता नहीं थी। शायद उसे स्विद्रिगाइलोव से भी टकराना पड़े। शायद उसके लिए स्विद्रिगाइलोव को पछाड़ देने की गुंजाइश भी बहुत थी। लेकिन पोर्फिरी की बात एकदम अलग थी।

तो पोर्फिरी ने रजुमीखिन को सारी बात समझाई। मनोवैज्ञानिक ढंग से... उसने फिर अपना वही मनहूस मनोविज्ञान घुसेड़ा! पोर्फिरी उस दिन उसके दफ्तर में उन दोनों के बीच जो कुछ हुआ था उसके बाद, और निकोलाई के आने से पहले उन दोनों में जो झड़प हुई थी उसके बाद, जिसकी बस एक वजह हो सकती थी... क्या यह मुमकिन था कि पोर्फिरी एक पल के लिए भी यह यकीन कर ले कि निकोलाई अपराधी था! (पिछले कुछ दिनों में रस्कोलनिकोव को पोर्फिरी के साथ उस झड़प के अलग-अलग टुकड़े कई बार याद आए थे; पूरी घटना को याद करना उसकी बर्दाश्त से बाहर था।) उस दिन ऐसी बातें भी कही गई थीं, दोनों के बीच इस तरह के इशारे भी हुए थे, दोनों ने ऐसी नजरों से एक-दूसरे को देखा था, ऐसे लहजे में बातें कही गई थीं और आखिर में यहाँ तक नौबत पहुँच गई थी कि इतना सब कुछ होने के बाद निकोलाई (जिसे पोर्फिरी ने उसके पहले ही शब्द और उसकी पहली ही मुद्रा से एक खुली किताब की तरह पढ़ लिया था) उसके विश्वास को डिगा नहीं सकता था।

पर कमाल तो यह था कि अब रजुमीखिन भी शक करने लगा था! उस दिन गलियारे में लैंप के नीचे जो कुछ हुआ उसका भी असर पड़े बिना नहीं रहा इसीलिए तो वह भागा-भागा पोर्फिरी के पास गया था। ...लेकिन पोर्फिरी क्यों उसे धोखे में रखना चाहता था? रजुमीखिन का ध्यान निकोलाई की ओर मोड़ने के पीछे उसकी क्या चाल थी? उसके मन में कोई तो बात होगी। उसके कुछ इरादे तो होंगे! तो वे इरादे क्या थे? वह सच है कि उस सुबह के बाद से बहुत सारा वक्त गुजर गया था - बहुत अधिक वक्त - और पोर्फिरी की तरफ से कोई भी बात नहीं कही गई थी। यह यकीनन कोई बहुत अच्छा संकेत नहीं है...' रस्कोलनिकोव गहरी सोच में डूबा हुआ था। बाहर जाने के इरादे से उसने अपनी टोपी उठाई। इतने दिनों में पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसके दिमाग पर जो बादल छाए हुए थे, वे छँट गए हैं। 'मुझे स्विद्रिगाइलोव से तो निबटना ही होगा,' उसने सोचा, 'हर कीमत पर और जल्द से जल्द निबटना होगा। शायद वह भी इसी की राह देख रहा है कि मैं उसके पास आऊँ।' उस पल उसके थके हुए मन में इतनी नफरत भर गई कि वह उन दो में से किसी को कत्ल भी कर सकता था : स्विद्रिगाइलोव को या फिर पोर्फिरी को। उसने कम-से-कम यही महसूस किया कि अभी नहीं तो बाद में तो वह ऐसा कर ही सकता है। 'देखेंगे... देखेंगे,' वह बार-बार मन ही मन कहता रहा।

लेकिन उसने अभी दरवाजा खोला ही था कि उसकी मुठभेड़ पोर्फिरी से हो गई। वह उससे ही मिलने आ रहा था। एक पल के लिए रस्कोलनिकोव भौंचक रह गया, लेकिन बस एक पल के लिए। अजीब बात है कि उसे पोर्फिरी को देख कर ताज्जुब तक नहीं हुआ और उससे कुछ खास डर भी नहीं लगा। वह बस चौंक पड़ा लेकिन जल्द ही, लगभग फौरन ही, अपने आपको इस बात के लिए तैयार कर लिया कि जो भी होना हो, वह हो ही ले। 'शायद यही अंत है! लेकिन वह इस तरह, चूहे की तरह चुपके-चुपके ऊपर कैसे आया कि उसकी आहट तक मैंने नहीं सुनी! कहीं छिप कर कान लगाए सुन तो नहीं रहा था!'

'तुम्हें एक मेहमान के आने की उम्मीद तो रही नहीं होगी, दोस्त' पोर्फिरी जोर-से हँस कर बोला। 'मैं एक अरसे से तुमसे मिलने का इरादा कर रहा था। इधर से गुजर रहा था तो सोचा कि क्यों न पाँच मिनट के लिए मिलता चलूँ और देखूँ कि तुम्हारा क्या हाल है। बाहर जा रहे हो? मैं ज्यादा वक्त नहीं लूँगा। अगर तुम्हें एतराज न हो तो एक सिगरेट पी लूँ।'

'कृपा करके आसन लीजिए पोर्फिरी पेत्रोविच, तशरीफ रखिए!' रस्कोलनिकोव इतनी शिष्टता और मित्रता के भाव से मेहमान से बैठने को कह रहा था कि वह खुद अगर देखता तो उसे ताज्जुब होता। तो अब टकराव का वक्त करीब आ रहा है! आदमी आध घंटा किसी कातिल के साथ बिताता है और उसकी साँस अटकी रहती है, लेकिन जब छुरा उसकी गर्दन पर रख दिया जाता है तो उसे कतई कोई डर नहीं लगता। रस्कोलनिकोव पोर्फिरी के सामने आन बैठा और पलक झपकाए बिना उसे देखने लगा। पोर्फिरी ने आँखें सिकोड़ कर देखा और सिगरेट जलाने लगा।

'खैर, तो कहिए, कुछ कहिए तो सही!' लग रहा था कि शब्द रस्कोलनिकोव के दिल से फूटे पड़ रहे थे। 'आप कुछ बोलते क्यों नहीं, जनाब!'

2

'इन सिगरेटों को ही देखो,' पोर्फिरी ने सिगरेट जला लेने के बाद धुआँ फूँकते हुए कहना शुरू किया। 'मुझे पता है कि ये मेरे लिए अच्छी नहीं हैं लेकिन इन्हें मैं नहीं छोड़ सकता। हर वक्त खाँसी आती रहती है, गले में खराश रहती है, दम फूलता है। तुम जानते ही हो, मैं जरा डरपोक किस्म का बंदा हूँ। अभी उस दिन मैं एक स्पेशलिस्ट के पास गया था - डॉ. बोतकिन के पास। वे हर मरीज को देखने में कम-से-कम आधा घंटा लगाते हैं, लेकिन मुझे देख कर बस हँस पड़े। ठोंक-बजा कर देखा, सीने पर आला लगा कर देखा। फिर मुझसे बोले, तंबाकू तुम्हारे लिए बुरी है, फेफड़ों पर असर हो गया है। लेकिन मैं इसे छोड़ूँ कैसे... इसकी जगह ले सके, ऐसी क्या चीज है मुसीबत यह है कि शराब मैं छूता नहीं, हा-हा-हा! मैं तो समझता हूँ सारी मुसीबत यही है। देखो, बात यह है कि अपने आप में कोई भी चीज अच्छी या बुरी नहीं होती; आदमी-आदमी की और वक्त-वक्त की बात होती है!'

'अपनी वही कानूनी चालें फिर तो नहीं चल रहा?' रस्कोलनिकोव ने झुँझला कर सोचा। पिछली मुलाकात का सारा दृश्य अचानक उसकी आँखों के सामने आ गया और एक बार फिर उसने उसी भावना को तेजी से उभरता हुआ महसूस किया जिसे उसने उस समय महसूस किया था।

'परसों भी तुमसे मिलने आया था मैं, शाम को,' पोर्फिरी कमरे में चारों ओर नजरें दौड़ाते हुए कहता रहा। 'तुम्हें पता नहीं, यहाँ आया था, इसी कमरे में। इधर से हो कर गुजर रहा था... आज ही की तरह, सो दिल में सोचा, क्यों न एक मिनट के लिए मिलता चलूँ सो मैं आया। तुम्हारे कमरे का दरवाजा भाड़ के मुँह जैसा खुला हुआ था। मैंने इधर-उधर देखा, तुम्हारी नौकरानी तक को नहीं बताया, और वापस चला गया। तुम दरवाजे में ताला नहीं लगाते, क्यों?'

रस्कोलनिकोव का चेहरा और भी गंभीर हो गया। लगता था, पोर्फिरी ने उसके विचारों को भाँप लिया था।

'मैं तुमसे ही बातें करने आया हूँ, दोस्त! लेकिन सिर्फ बातें करने! यहाँ आने की वजह बताना मेरे लिए जरूरी है, बल्कि मेरा फर्ज है,' वह कुछ मुस्कराते हुए कहता रहा, और उसने धीरे से रस्कोलनिकोव का घुटना थपथपाया। लेकिन लगभग उसी पल उसका चेहरा गंभीर और विचारमग्न हो गया। रस्कोलनिकोव को यह देख कर आश्चर्य हुआ कि उसकी भंगिमा में उदासी की भी जरा-सी परछाईं थी। उसे उसने कभी ऐसा नहीं देखा था, बल्कि कभी सोचा तक नहीं था कि वह कभी ऐसा भी नजर आ सकता है। 'मैं समझता हूँ पिछली मुलाकात के वक्त हम दोनों के बीच झड़प जैसी कोई बात हो गई थी। यह सच है कि पहली मुलाकात में भी हम दोनों के बीच कुछ झड़प-सी हुई थी... लेकिन अब एक ही बात करनी है। अब मैं तुमसे बस इतना कहना चाहता हूँ कि मैंने तुम्हारे साथ शायद ज्यादती की है। हाँ, मुझे यही खयाल आता रहता है कि मैंने ज्यादती की है। तुम्हें याद है, हम लोग पिछली बार किस तरह एक-दूसरे से अलग हुए थे, कि नहीं याद है तुम बुरी तरह झुँझलाए हुए थे। तुम्हारी टाँगें बुरी तरह काँप रही थीं, और मेरी भी। देखो, मैं समझता हूँ कि उस दिन जो कुछ भी हुआ वह बहुत भद्दा था; उसमें शरीफों जैसी कोई बात नहीं थी। हम लोग तो शरीफ ही हैं, कि नहीं कुछ भी हो जाए हम सबसे पहले और सबसे बढ़ कर शरीफ ही रहेंगे। यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। लेकिन तुम्हें याद होगा, हम लोग किस हद तक आगे बढ़ गए थे... सच पूछो तो बेहूदगी की हद तक।'

'कहना क्या चाहता है? यह मुझे समझता क्या है?' रस्कोलनिकोव आश्चर्य में पड़ा सोचता रहा, और सर उठा कर नजरें जमाए हुए पोर्फिरी को घूरता रहा।

'अब मैंने तय किया है कि हमारे लिए यही बेहतर होगा कि हम दोनों एक-दूसरे से दिल खोल कर बातें करें,' पोर्फिरी अपना सर थोड़ा पीछे करके कहता रहा, गोया उसे अपने पुराने शिकार को परेशान करना अच्छा न लग रहा हो और जैसे उसने तिरस्कार के साथ अपने पुराने तरीकों और तरकीबों को दूर फेंक दिया हो। 'तो इस तरह की झड़पें और शंकाएँ बहुत दिन तक नहीं चल सकतीं। वह तो कहो कि निकोलाई ने आ कर उस झड़प को खत्म करा दिया, वरना हम दोनों के बीच न जाने क्या हो जाता। वह कमीना पूरे वक्त मेरे कमरे के पीछे ही जमा रहा... कभी तुम सोच भी सकते थे जाहिर है तुम्हें भी यह बात मालूम है, और मैं यह भी जानता हूँ कि वह बाद में तुमसे मिलने आया था। लेकिन उस वक्त तुम जो समझते थे, वैसा कुछ भी नहीं हुआ था। मैंने किसी को नहीं बुलवाया था और उस वक्त किसी तरह का कोई हुक्म नहीं दिया था। तुम पूछोगे -क्यों नहीं पर मैं तुम्हें क्या बताऊँ इस सबका असर मुझ पर भी पड़ा था। दरबानों को भी मैं मुश्किल से बुलवा सका था। (मैं समझता हूँ, तुमने बाहर जाते वक्त दरबानों को देखा होगा।) देखो, बात यह है कि उस वक्त मुझे कोई बात सूझी थी - बिजली की तरह ही वह विचार मेरे दिमाग में कौंधा था। जैसा कि तुम देखोगे दोस्त, मुझे तो उसी वक्त पक्का यकीन हो चुका था। मैंने सोचा, क्यों न आजमा कर देखूँ। हो सकता है कोई चीज थोड़ी देर के लिए मेरे हाथों से निकल जाए, लेकिन आखिर में यकीनन कोई दूसरी चीज हाथ लग जाएगी, और दोस्त, कम-से-कम मैं जो चीज चाहता हूँ उसे हाथ से निकलने नहीं दूँगा। मैं समझता हूँ दोस्त, कि तुम स्वभाव से ही चिड़चिड़े हो। तुम्हारी दूसरी खूबियों को देखें तो जरूरत से कुछ ज्यादा ही चिड़चिड़े हो और इसे मैं अपनी बहुत बड़ी कामयाबी समझता हूँ कि मैंने कुछ हद तक उसकी थाह पा ली है। तो यह बात मुझे उसी वक्त समझ लेनी चाहिए थी कि आदमी उठे और अपने बारे में सारी सच्चाई उगल दे, ऐसा हमेशा नहीं होता। कभी-कभी जरूर होता है, अगर आप किसी तरकीब से उसे इतना गुस्सा दिला दें कि वह आपे से एकदम बाहर हो जाए, लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं होता। यह बात मुझे समझ लेनी चाहिए थी। खैर, मैंने सोचा था कि मुझे तो असल में एक छोटे से तथ्य की, एक बहुत ही छोटे-से तथ्य की, कुल जमा एक तथ्य की जरूरत है, किसी ऐसी चीज की जो मेरे काम आ सके, कोई ऐसी चीज जो ठोस हो, बस निरा मनोविज्ञान न हो। इसलिए कि मैं सोचता था, अगर कोई आदमी अपराधी है तो वक्त आने पर आपको उससे उसी के बारे में कोई ठोस नतीजा हासिल होना चाहिए; और आपको ऐसा कोई नतीजा मिलने का भी भरोसा रखने का हक है, जिसकी आपको कतई कोई उम्मीद न हो। मैं आपके स्वभाव पर उम्मीद लगाए बैठा था जनाब, सबसे बढ़ कर आपके स्वभाव पर। लेकिन मैं समझता हूँ, मुझे उस वक्त तुम्हारा जरूरत से ज्यादा भरोसा था।'

'लेकिन... लेकिन आप अभी भी उसी तरह की बातें क्यों ठोंके जा रहे हैं,' रस्कोलनिकोव ने आखिर बड़बड़ा कर पूछा। उसे ठीक से यह भी नहीं मालूम था कि उससे पूछा क्यों जा रहा है। 'यह भला किस चीज के बारे में बातें कर रहा है,' उसने कुछ भी न समझ कर अपने आपसे पूछा। 'क्या यह मुझे सचमुच बेकुसूर समझता है?'

'तो मैं इस तरह की बातें क्यों कर रहा हूँ? बात यह है कि मैं अपनी सफाई देने आया हूँ; यूँ कहो कि मैं इसे अपना फर्ज समझता हूँ। तुम्हें मैं सब कुछ बता देना चाहता हूँ, हर बात जिस तरह से हुई ऐन उसी तरह। मैं समझता हूँ, मेरे दोस्त, कि मैंने तुम्हें बहुत तकलीफ पहुँचाई है। मैं कोई दानव नहीं हूँ। मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि उस आदमी के लिए इन सब बातों को झेलने का क्या मतलब होता है, जो निराश होने के बावजूद स्वाभिमानी हो, होशियार हो और बेचैन, खास कर बेचैन हो। बहरहाल, मैं तुम्हें बहुत ही इज्जतदार समझता हूँ, बल्कि तुम्हारे स्वभाव से उदारता की एक झलक भी है। वैसे मैं तुम्हारी हर राय से सहमत नहीं हूँ, और यही मुनासिब समझता हूँ कि मैं फौरन तुम्हें साफ-साफ और पूरी ईमानदारी के साथ यह बात बता दूँ, क्योंकि सबसे बड़ी बात तो यह है कि मैं तुम्हें धोखा देना नहीं चाहता। यह पता लगा लेने के बाद कि तुम किस तरह के आदमी हो, मुझे आप ही तुमसे कुछ लगाव जैसा हो गया। शायद मेरे इस तरह बातें करने की वजह से तुम मुझ पर हँसोगे! खैर, इसका तुम्हें अधिकार है। मैं जानता हूँ, मुझे तुम शुरू से ही नापसंद करते थे, क्योंकि सच तो यह है कि तुम मुझे पसंद करो भी तो क्यों करो! मेरे बारे में तुम चाहे जो सोचो, मैं अपनी तरफ से कोई कोशिश उठा रखना नहीं चाहता कि मेरे बारे में तुम्हारी जो राय बन गई है, उसे मिटा दूँ और तुम्हें बता दूँ कि मैं एक ऐसा आदमी हूँ जिसके दिल में भावनाएँ भी हैं, जिसके पास एक जमीर है। सच कह रहा हूँ मैं।'

पोर्फिरी गरिमा के साथ ठहर गया। रस्कोलनिकोव के दिल में अचानक एक नया डर समा गया। वह अचानक यह सोच कर सहम गया कि पोर्फिरी उसे बेकुसूर समझता है।

'मैं सारी बातें तुम्हें उसी तरह सिलसिलेवार बताऊँ जिस तरह कि वे हुईं, यह तो शायद ही जरूरी हो' पोर्फिरी कहता रहा। 'मुझे डर है कि अगर मैं चाहूँ भी तो मैं ऐसा नहीं कर सकूँगा। भला बातों को विस्तार से कैसे समझाया जा सकता है शुरू में तरह-तरह की अफवाहें फैली थीं। वे किस तरह की अफवाहें थीं और उन्हें कब या किसने फैलाया था, किस तरह... फैलाया था तुम किस तरह इस चक्कर में आ गए - यह सब भी बताने की, मैं समझता हूँ, कोई खास जरूरत नहीं है। जहाँ तक मेरा सवाल है, पूरा सिलसिला इत्तफाक से शुरू हुआ, जो हो भी सकता था और नहीं भी। कौन-सा इत्तफाक मैं समझता हूँ इस बात की चर्चा करने की भी कोई जरूरत नहीं है। इन सब बातों से - इन अफवाहों और इत्तफाकों से - मेरे मन में एक विचार उठा। मैं साफ-साफ मानने को तैयार हूँ - क्योंकि अगर मुझे मानना ही है तो सारी बातें ही मैं क्यों न मान लूँ - कि मुझे सबसे पहले तुम पर शक हुआ था। बात यह है कि गिरवी रखी गई चीजों के साथ बुढ़िया जो सुराग छोड़ गई थी वे बिलकुल बेकार हैं। इस तरह के तो सैकड़ों सुराग मिल सकते हैं। पुलिस थाने में जो कुछ हुआ, उसका ब्योरा भी मुझे उसी वक्त मालूम हुआ। वह भी बिलकुल इत्तफाक से। लेकिन ये बातें मुझे ऐसे आदमी से मालूम हुईं जो ऐसी बातों को बयान करने का खास गुर जानता है और जिसने, खुद इस बात को जाने बिना, मुझे उस घटना का एक बहुत ही उम्दा ब्योरा दिया। यह सब भी बस ताबड़तोड़ हुआ। एक चीज से दूसरी चीज निकलती गई, मेरे दोस्त, यहाँ तक कि मेरे लिए अपना ध्यान एक खास दिशा में मोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया। सौ खरगोशों से जिस तरह एक घोड़ा नहीं बन सकता, उसकी तरह सौ शुबहों को मिला कर एक सबूत नहीं बनता। मैं समझता हूँ यह अंग्रेजी की एक कहावत है, और यह सीधी-सादी समझदारी की बात है। लेकिन किसी आदमी को जिस चीज की धुन हो जाए, उस पर वह काबू नहीं पा सकता... खुद अपनी धुन पर। फिर छानबीन करनेवाला वकील भी तो आदमी ही होता है। मुझे उस पत्रिका में तुम्हारा लेख भी याद था। तुम्हें याद होगा, तुम जब पहली बार आए थे तो हम लोगों ने उस पर विस्तार से बहस की थी। उस वक्त मैंने उसका मजाक उड़ाया था, लेकिन वह मैंने तुम्हें उकसाने के लिए किया था कि तुम मुझे कुछ और बातें बताओ। मैं एक बार फिर कहता हूँ, तुम जरूरत से ज्यादा बेसब्रे हो, मेरे दोस्त, और बीमार भी... बहुत ज्यादा बीमार। तुम बहादुर हो, स्वाभिमानी और जिद्दी हो, गंभीर विचारोंवाले हो, और... और भारी मुसीबत झेल चुके हो। यह सब कुछ मुझे काफी दिनों से मालूम है... मेरे लिए भी ये भावनाएँ अनजानी नहीं हैं, और इसलिए मैंने तुम्हारा लेख अपनी किसी जानी-पहचानी चीज की तरह पढ़ा था। वह सब तो तुमने अपनी रातों की नींद हराम करके, बहुत उत्तेजना की हालत में, धड़कते दिल से और अपने उत्साह को दबा कर सोचा होगा। पर नौजवानों के लिए यह दबा हुआ, स्वाभिमान से भरा उत्साह बहुत खतरनाक होता है! उस वक्त मैंने तुम्हारे लेख का मजाक उड़ाया, लेकिन इतना मैं बता दूँ कि साहित्यप्रेमी होने के नाते नौजवानों की सच्ची लगन से की गई इन पहली साहित्यिक कोशिशों के बारे में मेरे अंदर एक कमजोरी भी रही है। धुआँ, कुहासा, और उस कुहासे में एक टूटती हुई तान की आवाज। तुम्हारा लेख कल्पनातीत और बेतुका है, लेकिन उसमें सच्ची लगन की कैसी ताजगी है, कितना निष्कलंक, नौजवानों जैसा स्वाभिमान है... सब कुछ दाँव पर लगा देने का साहस है। वह एक बीभत्स लेख जरूर है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने तुम्हारा लेख पढ़ा और अलग रख दिया और... और उसे अलग रखते ही सोचा : यह आदमी किसी दिन मुसीबत में पड़ेगा! इसलिए तुम्हीं बताओ कि पहले जो कुछ हो चुका था, उसे देखते हुए यह कैसे मुमकिन था कि बाद में जो कुछ हुआ मैं उसकी धारा में न बह जाता लेकिन भगवान जानता है, मैं कुछ नहीं कह रहा। इस वक्त मैं किसी भी खास बात का दावा नहीं कर रहा। मैंने तो बस उस वक्त अपने दिमाग में कुछ टाँक लिया था। मैंने सोचा, आखिर क्या है इसमें कुछ भी तो नहीं है, मेरा मतलब है कतई कुछ नहीं। शायद रत्ती भर भी नहीं। फिर मेरे जैसे छानबीन करनेवाले वकील के लिए यह ठीक भी नहीं कि वह इस तरह की बातों की धार में बह जाए। मुझे तो उस आदमी, निकोलाई से निबटना है और मेरे पास ऐसे ठोस तथ्य हैं जिनसे उसके अपराधी होने का संकेत मिलता है... और कोई कुछ भी कहे, तथ्य तो तथ्य ही होता है। वह भी तो मेरे पास अपनी मनोदशा ले कर ही आया था। मुझे उससे इसलिए निबटना है कि यह जिंदगी और मौत का सवाल है। इस वक्त मैं यह सफाई क्यों दे रहा हूँ। इसलिए कि मैं चाहता हूँ तुम्हें हर बात मालूम हो जाए, और यह भी मैं नहीं चाहता कि उस मौके पर मैंने तुम्हारे साथ दुश्मनी का जो सुलूक किया था, उसकी वजह से तुम्हारे दिल से मेरे खिलाफ कोई शिकायत बनी रहे। मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि उसमें दुश्मनीवाली कोई बात नहीं थी... हा-हा! क्या खयाल है तुम्हारा उस वक्त तुम्हारे कमरे की तलाशी ली गई थी, कि नहीं ली गई थी... हा-हा! सो भी उस वक्त, जब तुम बीमार थे। लेकिन याद रखना, सरकारी तौर पर नहीं... तलाशी भी मैंने खुद नहीं ली थी, लेकिन तलाशी ली गई थी। तुम्हारे कमरे की एक-एक चीज, एक-एक तिनके को उलट-पुलट कर देखा गया था, और सो भी उस वक्त जब मामला अभी ताजा-ताजा था, लेकिन बेकार। मैंने सोचा, अब वह आदमी मेरे पास आएगा, खुद मेरे पास आएगा, और बहुत जल्द आएगा। दोषी होगा तो जरूर ही आएगा। कोई दूसरा होता तो न आता, लेकिन यह जरूर आएगा। तुम्हें याद है किस तरह तुम्हारे साथ अपनी बातचीत के दौरान रजुमीखिन ने सारा भेद उगल दिया था... यही सोच कर हमने यह मंसूबा बनाया था ताकि तुम भड़को। इसीलिए जान-बूझ कर अफवाहें फैलाईं ताकि तुमसे बातें करते वक्त रजुमीखिन सारा भेद खोल दे, क्योंकि वह ऐसा शख्स है कि अपने गुस्से पर काबू नहीं रख सकता। तुम्हारे गुस्से और खुली ढिठाई का निशाना सबसे पहले बना जमेतोव : समझ में नहीं आता, शराबखाने में तुमने उसके सामने साफ-साफ कैसे कह दिया कि उसे मैंने मारा है! बेहद हिम्मत और ढिठाई की बात थी, और मैं मन में यह सोचने पर मजबूर हो गया कि यह आदमी अगर सचमुच अपराधी है तो डट कर लड़ेगा! तब मैंने यही सोचा था। इसीलिए मैं इंतजार करता रहा... बड़ी बेचैनी से तुम्हारा इंतजार करता रहा। रहा जमेतोव तो उस दिन तो तुमने उसकी धज्जियाँ उड़ा कर रख दी थीं, और... देखो, मुसीबत यह है कि यह सारा कमबख्त मनोविज्ञान... इसकी भी काट दोहरी होती है! तो मैं तुम्हारा इंतजार करता रहा, और इतने में क्या देखता हूँ कि तुम आ गए! मेरा दिल धक से रह गया। आह! मैं पूछता हूँ, उस दिन सबेरे तुम्हारे आने की जरूरत ही क्या थी तुम क्यों आए तुम्हारी हँसी... जिस वक्त तुम अंदर आए उस वक्त की हँसी... याद है मैंने तो फौरन ही उसके पीछे छिपा हुआ भेद ताड़ लिया था। लेकिन अगर मैं उस तरह तुम्हारा इंतजार न कर रहा होता तो तुम्हारी उस हँसी में मुझे कभी कोई खास बात न दिखाई देती। सही दिमागी हालत का मतलब यही होता है... रजुमीखिन... अरे हाँ, वह पत्थर! तुम्हें उस पत्थर की याद है वह पत्थर जिसके नीचे चीजें छिपाई गई थीं पूरी तरह ऐसा लगता था कि मैंने किसी के बगीचे में उसे देखा है... किसी के बगीचे की बात तुमने जमेतोव से कही थी, और फिर दूसरी बार मेरे दफ्तर में कही थी, कि नहीं फिर जब हमने तुम्हारे लेख की छानबीन शुरू की, जब तुमने उसका मतलब समझाना शुरू किया, तो तुम्हारे हर शब्द में मुझे दो अर्थ नजर आने लगे, जैसे हर शब्द के नीचे कोई दूसरा शब्द छिपा हो! तो मेरे दोस्त, इसी तरह से मैं मील के आखिरी पत्थर तक पहुँचा और उससे जब मैंने सर टकराया तब मुझे होश आया। हे भगवान, मैंने अपने आपसे कहा, मैं कर क्या रहा हूँ! इसलिए अगर कोई चाहे तो इस पूरे सिलसिले को सर के बल खड़ा कर दे और वही स्वाभाविक लगने लगेगी। मैं परेशान हो कर तड़प उठा। मैंने अपने मन में कहा : नहीं, इससे काम नहीं चलेगा। मेरे पास कुछ ठोस होना चाहिए जिसका मैं सहारा ले सकूँ। इसलिए जब मुझे दरवाजे की घंटीवाली बात पता चली तो मैं सन्न रह गया। अंदर ऐसी खलबली मची कि मैं काँपने लगा। मैंने दिल में सोचा, आखिरकार कोई ठोस चीज हाथ आई। यही है वह! तब मैंने इस बात पर पूरी तरह सोच-विचार करने की भी जरूरत नहीं समझी। बस जी ही नहीं चाहा। उस पल काश मैं अपनी आँखों से देख पाता कि तुम किस तरह सौ गज तक उस कमबख्त के साथ गए जिसने तुम्हारे मुँह पर तुम्हें 'हत्यारा' कहा था और रास्ते भर तुम्हें उससे एक भी सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हुई! ...रीढ़ की हड्डी में ऊपर से नीचे तक सिहरन का दौड़ना! और दरवाजे की घंटी बजाना! क्या यह सब कुछ उस वक्त हुआ था जब तुम बीमार थे जब तुम नीमबेहोशी की हालत में थे? इसलिए, मेरे दोस्त, तुम्हारे साथ मैंने जिस तरह के मजाक किए थे, उन पर तुम्हें कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए। पर तुम ठीक उसी वक्त क्यों आए क्या, एक मानी में ऐसा नहीं था कि गोया कोई तुम्हें भी पीछे से धकेल रहा हो! धकेल रहा था न? अब अगर निकोलाई हम दोनों के बीच में न आया होता... निकोलाई की याद तो है न? अच्छी तरह याद है न? उसकी गोया आसमान से टपक पड़ा था! तूफानी बादल से बिजली टूटी हो! कड़कती हुई बिजली! और मैं उससे मिला किस तरह था बिजली के टूट कर गिरने पर मेरा कोई यकीन नहीं था। रत्तीभर नहीं! तुमने खुद भी देखा था! लेकिन, भगवान जानता है, बाद में भी... तुम्हारे चले आने के बाद भी, जब वह मेरे कुछ सवालों के समझदारी भरे ऐसे जवाब देने लगा कि मुझे भी उस पर ताज्जुब होने लगा, तब भी मैंने उसकी किसी बात का यकीन नहीं किया! अटल रहने का मतलब यही होता है। नहीं, मैंने मन में सोचा, ऐसा नहीं हो सकता! इसमें निकोलाई का कोई हाथ नहीं।'

'रजुमीखिन ने मुझे अभी-अभी बताया कि आपको अभी तक निकोलाई के ही अपराधी होने का यकीन है और यह भी कि रजुमीखिन को खुद आपने यकीन दिलाया है कि निकोलाई ही अपराधी है...'

उसकी साँस फूलने लगी। अपनी बात वह पूरी नहीं कर सका। एक अवर्णनीय उत्तेजना के साथ वह उस आदमी की बातें सुनता रहा था, जिसने उसके भेद का पता लगा लिया था पर जो अब अपनी ही पिछली बात से मुकर रहा था। वह इस पर यकीन कर भी नहीं पा रहा था और उसे यकीन था भी नहीं। उसके शब्दों में, जो अभी तक अस्पष्ट थे, वह किसी ठोस, अकाट्य चीज की लगातार तलाश कर रहा था।

'मिस्टर रजुमीखिन!' पोर्फिरी चिल्लाया, गोया रस्कोलनिकोव के मुँह से, जो अभी तक बिलकुल चुप था, यह सवाल सुन कर उसे बहुत खुशी हुई हो। 'हा-हा-हा! अरे! मुझे मिस्टर रजुमीखिन को रास्ते से तो हटाना ही था : दो आदमी हों तो संगत कहलाती है, तीन हों तो भीड़। मिस्टर रजुमीखिन का इस मामले से कोई संबंध नहीं है। बाहर का आदमी है वह। मेरे पास वह भागा-भागा आया था, चेहरा बिलकुल उतरा हुआ... लेकिन, छोड़ो भी उसे, इस मामले में उसे क्यों लाते हो रहा निकोलाई, तो क्या तुम जानना चाहोगे कि वह किस तरह का आदमी है... मेरा मतलब उसके बारे में मेरी क्या राय है पहली बात तो यह है कि वह अभी बच्चा है, अभी बालिग भी नहीं हुआ... मैं यह तो नहीं कहूँगा कि वह सचमुच बुजदिल है, लेकिन मेरा मतलब है... यूँ समझ लो... कि वह एक तरह से कलाकार है। उसके बारे में मेरी इस तरह की राय पर हँसो मत। वह मासूम है और जल्द ही किसी भी बात के असर में आ सकता है। बहुत ही भावुक है... कमाल का आदमी। गाना जानता है, नाचना जानता है, और किसी ने मुझे बताया कि परियों की कहानियाँ तो इतनी अच्छी सुनाता है कि लोग मीलों दूर से सुनने आते हैं। अभी तक स्कूल जाता है, और तुम उसकी ओर उँगली भी उठा दो तो हँसते-हँसते उसके आँसू निकल आते हैं। शराब इतनी पीता है कि उसे कुछ सुझाई नहीं देता। इसलिए कि शराब पिए बिना नहीं रह सकता, बल्कि जब मौत आती है तब पीता है। इसलिए कि लोग उसे शराब पिलाते हैं। एकदम बच्चों जैसा है! उसने कानों की बालियाँ तो चुरा ली थीं लेकिन यह नहीं समझा था कि वह कोई गलत काम कर रहा है... उसका कहना तो यह है कि जो चीज पड़ी मिल जाए उसे रख लो! जानते हो, वह पुरातनपंथियों में से है, और पुरातनपंथी भी क्या, बस किसी पंथ का है। उसके परिवार में कुछ लोग 'भगोड़े' भी थे, और अभी हाल में वह खुद गाँव में दो साल तक किसी पहुँचे हुए फकीर का मुरीद रह चुका है। ये सारी बातें मुझे खुद निकोलाई से और उसके जरायस्क साथियों से मालूम हुईं। अरे, एक वक्त तो ऐसा भी था जब यह आदमी भाग कर जंगल में चले जाना और संन्यासी बन जाना चाहता था। बड़ा जोश था उसमें, रात-रात भर पूजा-पाठ किया करता था, पुरानी 'सच्ची' किताबें पढ़ता रहता था और उनके पीछे सब कुछ भूल जाता था। पीतर्सबर्ग ने उस पर बहुत असर डाला। खास तौर पर यहाँ की औरतों का असर पड़ा और जाहिर है, शराब का भी। बहुत जल्दी ही असर में आ जाता है। सो फकीर-वकीर सब कुछ भूल गया। मैं पक्के तौर पर जानता हूँ कि उसे एक कलाकार बहुत पसंद करने लगा था, उससे मिलने जाया करता था, और इसलिए वह इसी चक्कर में फँस गया। तो हुआ यह कि उसके दिल में ऐसा डर समाया कि उसने फाँसी लगा कर मर जाने की कोशिश की फिर उसके बाद भाग जाने की भी कोशिश की। हमारी कानूनी कार्रवाइयों के बारे में आम लोगों में जो विचित्र धारणाएँ बुरी तरह फैल गई हैं, उनका भला कोई क्या करे! कुछ लोग तो अदालत के ही नाम से डरते हैं। मुझे नहीं मालूम कि इसमें किसका कुसूर है। मैं तो बस यह उम्मीद किए बैठा हूँ कि हमारी नई अदालतें इस हालत को बदलेंगी। मैं भगवान से भी यही मनाता रहता हूँ कि वे ऐसा कर सकें। खैर, लगता है निकोलाई को जेल में उस फकीर की याद आई। वह बाइबिल भी पढ़ने लगा। क्या तुम्हें मालूम है दोस्त, कि कुछ लोग तकलीफ उठाने का क्या मतलब समझते हैं सवाल किसी की खातिर तकलीफ उठाने का नहीं होता, बल्कि महज तकलीफ उठाने की खातिर तकलीफ उठाने का हो जाता है। मतलब यह कि आदमी को तकलीफ तो उठाना ही चाहिए, और अगर तकलीफ हाकिमों की तरफ से मिले तो फिर क्या पूछना! मुझे एक कैदी का मामला याद आता है... बहुत ही सीधा-सादा आदमी था बेचारा, जेल में पूरा साल आतिशदान पर बैठ कर रात-रातभर बाइबिल पढ़ते हुए काट दिया और बाइबिल पढ़ने का ऐसा असर हुआ उस पर कि एक दिन उसने ईंट का टुकड़ा उठाया और बिना किसी वजह के जेलर को दे मारा, जिसने उसे किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाया था। और ईंट फेंका भी तो कैसे! जान-बूझ कर उससे कई गज दूर-इस बात का पक्का हिसाब लगा कर कि उसे कोई चोट न लगे। यह तो तुम जानते ही हो कि कोई कैदी अगर जेल के किसी अफसर पर घातक हमला करता है तो उसके साथ क्या सुलूक किया जाता है। तो उसने 'तकलीफ' उठाई और... इसीलिए मुझे शक होता है कि निकोलाई भी उठाना चाहता है... या इसी तरह की कोई और बात है। मैं यह बात पक्के तौर पर जानता हूँ... ठोस सबूतों की बुनियाद पर। लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि मैं जानता हूँ। तो क्या तुम यह नहीं मानते कि इनमें से ऐसे अनोखे लोगों का निकल आना पूरी तरह मुमकिन है अरे... ऐसा तो जहाँ देखो, वहीं होता रहता है। अब वह फिर उसी फकीर के चक्कर में पड़ रहा है... फाँसी लगा कर मरने की कोशिश के बाद उसे उसके बारे में सब कुछ याद आने लगा। लेकिन मुझे यकीन है कि मुझे वह खुद ही सब कुछ बताएगा। खुद आ कर मुझे बताएगा। क्या तुम समझते हो कि वह ऐसा नहीं करेगा? बस देखते जाओ... अपराध स्वीकार करते हुए उसने जो बयान दिया है, उसे वह वापस ले लेगा! मुझे उम्मीद है कि अब वह किसी भी वक्त आ कर ऐसा कर सकता है। मुझे यह निकोलाई बहुत ही अच्छा लगने लगा है, और मैं उसे बखूबी समझने की कोशिश कर रहा हूँ। क्यों, क्या खयाल है तुम्हारा? हा-हा-हा! तो कुछ बातों के बारे में उसके जवाब सचमुच समझदारी के थे। साफ जाहिर है कि उसने सारी जरूरी जानकारी जमा कर रखी थी और काफी होशियारी से तैयारी की थी। लेकिन कुछ दूसरी बातों के बारे में वह एकदम कोरा मालूम होता है; उनके बारे में उसे कुछ भी नहीं मालूम और उसे शक भी नहीं होता कि उसे कुछ नहीं मालूम। नहीं, दोस्त, यह करतूत निकोलाई की नहीं है! हमारा साबका एक पूरी तरह अनोखे मामले से पड़ा है, एक बहुत ही निराशाजनक मामले से, बिलकुल आजकल के मामले से, एक ऐसे मामले से जो ठेठ हमारे इस जमाने का है, जब लोगों के दिलों में खोट और बदी पैदा हो गई है, जब बार-बार हमें यह सुनने को मिलता है कि इससे खून में नई जान पड़ जाती है, जब ऐश-आराम को जिंदगी में काम की अकेली चीज समझा जाने लगा है, इस मामले में हमारा साबका पड़ा है किताबी सपनों से, एक ऐसे दिल से जो सिद्धांतों के चक्कर में पड़ कर छलनी हो चुका है... हमारा साबका पड़ा है पहला कदम उठाने के पक्के संकल्प से, लेकिन यह एक खास किस्म का संकल्प है; उस आदमी ने यह काम करने की ठानी, और फिर गोया कि वह किसी पहाड़ी से नीचे गिर पड़ा, या गिरजाघर की मीनार से नीचे कूद पड़ा, और अपराध के स्थल पर इस तरह प्रकट हुआ, गोया उसको उसकी मर्जी के खिलाफ वहाँ लाया गया हो। वह सामनेवाला दरवाजा बंद करना तो भूल गया लेकिन कत्ल कर दिया... एक सिद्धांत की खातिर दो जानें ले लीं। उसने उन्हें कत्ल तो कर दिया लेकिन दौलत समेटने की अक्ल नहीं आई... तब जो कुछ उसने लिया भी उसे भी पत्थर के नीचे छिपा दिया। जब बाहर से लोग दरवाजा भड़भड़ा रहे थे और घंटी बजा रहे थे, दरवाजे के पीछे खड़े उसने घोर कष्ट के क्षण बिताए। पर वे भी उसके लिए काफी नहीं थे - नहीं, वह आधी बेहोशी की हालत में एक बार फिर उसी खाली फ्लैट में गया... एक बार फिर उसे घंटी की आवाज को याद करने और एक बार फिर रीढ़ की हड्डी में ऊपर से नीचे तक सिहरन की लहर महसूस करने की जरूरत महसूस हुई... हो सकता है यह सब उसने बीमारी के दौरान किया हो; लेकिन इसके बारे में तुम क्या कहोगे... उसने कत्ल किया है, लेकिन अब भी अपने आपको ईमानदार समझता है; दूसरे लोगों को नफरत की नजर से देखता है; उतरा हुआ चेहरा लिए शहीद बना फिरता है। नहीं रोदिओन रोमानोविच, ये सब बातें मैं निकोलाई के बारे में नहीं कह रहा। निकोलाई का इन सबसे क्या लेना। इससे पहले जो कुछ भी कहा जा चुका था, वह सुनने से लगता था कि कोई आदमी अपनी ही बातों का खंडन कर रहा है। इसलिए उसके बाद ये अंतिम शब्द बहुत ही अप्रत्याशित थे।' रस्कोलनिकोव बुरी तरह काँप उठा, गोया उसके दिल में किसी ने छुरा उतार दिया हो।

'फिर कौन... कौन कातिल है?' उसने हाँफते हुए पूछा, गोया वह अपने आप पर काबू न रख पा रहा हो। पोर्फिरी को इस सवाल पर इतना गहरा ताज्जुब हुआ कि वह अपनी कुर्सी में धँस कर बैठ गया, मानो उसे इस सवाल की उम्मीद भी न रही हो।

'मतलब क्या है तुम्हारा कि कातिल कौन है...?' उसने रस्कोलनिकोव की ही बात दोहराई, मानो उसे अपने कानों पर विश्वास न हो रहा हो। 'क्यों, कातिल तुम हो, दोस्त! तुम हो,' उसने रस्कोलनिकोव के कान में फुसफुसा कर विश्वास के स्वर में कहा।

रस्कोलनिकोव सोफे से उछल पड़ा, कुछ पलों तक स्थिर खड़ा रहा, और फिर एक शब्द भी बोले बिना फिर बैठ गया। चेहरा रह-रह कर फड़क रहा था।

'तुम्हारे होठ पहले की ही तरह फिर फड़क रहे हैं,' पोर्फिरी कुछ सहानुभूति के साथ बुदबुदाया, 'मुझे लगता है, प्यारे कि तुम मेरी बात ठीक से नहीं समझे,' कुछ देर रुक कर उसने फिर कहा। 'इसीलिए तुम इतने हैरान हुए हो। मैं यहाँ जान-बूझ कर तुम्हें सब कुछ बताने और अपने सारे पत्ते तुम्हारे सामने रखने के लिए ही आया था।'

'मैंने नहीं किया यह काम,' रस्कोलनिकोव ने शरारत करते हुए पकड़े गए और सहमे हुए बच्चे की तरह बहुत ही धीमे लहजे में कहा।

'नहीं, दोस्त, यह तुम्हारा ही काम है। कोई दूसरा हो ही नहीं सकता,' पोर्फिरी ने कठोरता से और अटल विश्वास के साथ कहा।

दोनों चुप हो गए। उनकी यह खामोशी एक असाधारण देरी तक बनी रही, कोई दस मिनट तक। रस्कोलनिकोव ने अपनी कुहनियाँ मेज पर टिका दीं और चुपचाप अपने बालों में उँगलियाँ फेरने लगा। पोर्फिरी चुपचाप बैठा उसकी ओर देखता रहा। अचानक रस्कोलनिकोव ने तिरस्कार के साथ पोर्फिरी की ओर देखा।

'आप फिर वही खेल शुरू कर बैठे, पोर्फिरी पेत्रोविच' वह बोला, 'वही पुराने हथकंडे ताज्जुब होता है कि आप उनसे तंग क्यों नहीं हुए।'

'हे भगवान, हथकंडे इस वक्त मेरे किस काम के अगर यहाँ गवाह मौजूद होते तब कोई बात भी होती, लेकिन हम लोग तो दबे-दबे लहजे में एक-दूसरे से अपने दिल की बात कह रहे हैं। तुम देख ही रहे हो कि मैं यहाँ तुम्हारा पीछा करने, तुम्हें खरगोश की तरह पकड़ने नहीं आया। इस वक्त मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम अपना अपराध मानते हो कि नहीं। अपनी हद तक तो मुझे वैसे भी पक्का यकीन हो चुका है।'

'अगर ऐसी बात है तो आप यहाँ आए किसलिए थे?' रस्कोलनिकोव ने चिढ़ कर पूछा। 'मैं आपसे वही सवाल एक बार फिर पूछना चाहूँगा : अगर आप समझते हैं कि मुजरिम मैं हूँ तो मुझे गिरफ्तार क्यों नहीं कर लेते?'

'मुनासिब सवाल है। मैं एक-एक बात करके इसका जवाब दूँगा : सबसे पहली बात तो यह है कि मैं नहीं समझता, तुम्हें फौरन गिरफ्तार करने से मुझे कोई फायदा होगा।'

'मतलब क्या है आपका कि आपको कोई फायदा नहीं होगा? अगर आपको पक्का यकीन है कि मैं अपराधी हूँ तो आपका फर्ज बनता है कि...'

'आह, इस बात से मेरे पक्के यकीन का क्या लेना-देना? इस वक्त तो ये अटकल की बातें हैं। मैं तुम्हें आराम करने के लिए जेल में क्यों डालूँ? तुम अगर खुद मुझसे ऐसा करने को कह रहे हो, तो यह बात तुम जानते होगे। मिसाल के लिए मैं अगर अभी उस कमबख्त कारीगर से तुम्हारा सामना करा दूँ तो तुम्हारे लिए उससे बस इतना कहना काफी होगा कि 'पिए हुए तो नहीं हो? मुझे किसने देखा तुम्हारे साथ? मैंने तो तुम्हें बस शराब के नशे में चूर समझा था, और तुम सचमुच पिए हुए थे!' तो इसके जवाब में मैं तुमसे कहता तो क्या... खास तौर पर इसलिए कि तुम्हारे बयान पर उसकी बात के मुकाबले ज्यादा आसानी से यकीन किया जा सकता था। इसलिए कि उसकी बात के पक्ष में मनोविज्ञान के अलावा कुछ भी नहीं होता, जिसकी उस तरह के आदमी से बहुत उम्मीद नहीं की जाती, जबकि तुम्हारा तीर ठीक निशाने पर बैठता, क्योंकि वह बदमाश पीता तो पानी की तरह है और सारे इलाके में पक्के शराबी के रूप में बदनाम है। इसके अलावा मैं खुद तुम्हारे सामने साफ-साफ मान चुका हूँ कि यह मनोविज्ञान दोधारी तलवार है, जिसकी एक धार दूसरी से ज्यादा पैनी है। इसके अलावा अभी तक तुम्हारे खिलाफ कोई भी सबूत मेरे पास नहीं है। हालाँकि मैं तुम्हें गिरफ्तार तो करूँगा, और सच तो यह है कि मैं - कायदे-कानून के खिलाफ जा कर - तुम्हें इसकी चेतावनी देने के लिए ही यहाँ आया हूँ, फिर भी मैं तुमसे साफ-साफ कहता हूँ - और यह भी कायदे-कानून के खिलाफ है - कि ऐसा करने से मुझे कोई फायदा नहीं होगा। दूसरे, मैं यहाँ इसलिए आया कि...'

'यह 'दूसरे' किसलिए?' रस्कोलनिकोव अब भी हाँफ रहा था।

'इसलिए कि, जैसाकि मैं पहले ही बता चुका हूँ, मैं तुम्हारे सामने अपनी सफाई पेश करना अपना फर्ज समझता हूँ। मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे राक्षस समझो, खास कर इसलिए कि, तुम मानो या न मानो, मैं सच्चे दिल से तुम्हारा भला चाहता हूँ। इसी वजह से मैं यहाँ, तीसरी बात, तुम्हारे पास एक बहुत दो-टूक और सीधा सुझाव ले कर आया हूँ - तुम पुलिस के पास जाओ और सारी बातें साफ-साफ मान लो। इससे तुम्हारा भला तो होगा ही, मुझे भी खयाल है, फायदा होगा क्योंकि मुझे इस सारे लफड़े से छुटकारा मिल जाएगा। मैं तुमसे दिल खोल कर साफ बात कह रहा हूँ कि नहीं?'

रस्कोलनिकोव एक मिनट तक सोचता रहा।

'देखिए,' वह बोला, 'आप खुद ही मान रहे हैं कि आपने मेरे खिलाफ जो भी मामला बनाया है, उसकी बुनियाद सिर्फ मनोविज्ञान पर है। लेकिन फिर भी लगता ऐसा है कि आप अचानक गणित में घुस पड़े हैं। अगर आप इस वक्त गलती कर रहे हों तो...।'

'नहीं दोस्त, मैं गलती नहीं कर रहा। मेरे पास एक सुराग है, एक छोटा-सा सुराग जो अचानक मेरे हाथ लग गया था। तकदीर ने साथ दिया!'

'किसी तरह का सुराग?'

'मैं नहीं बताऊँगा। बहरहाल, अब मुझे और ज्यादा ढील देने का कोई हक भी नहीं। मुझे तुमको गिरफ्तार करना ही पड़ेगा। इसलिए देखो, अब मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, और मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ वह तुम्हारी भलाई के लिए कर रहा हूँ। मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ दोस्त, कि यही बेहतर होगा।'

रस्कोलनिकोव एक कड़वी हँसी हँसा।

'यह हँसी की बात नहीं, सरासर ढिठाई है। समझ लीजिए कि मैं अपराधी हूँ (जिसे मैं कतई नहीं मानता), तो मैं आपके पास आ कर अपना अपराध क्यों मानूँ, जबकि आप खुद कह रहे हैं कि अगर मुझे जेल भेजा भी गया तो यह ऐसी ही बात होगी जैसे मुझे वहाँ आराम करने के लिए बिठा दिया गया हो?'

'आह, मेरे दोस्त, शब्दों पर पूरी तरह यकीन मत किया करो। जेल जाना शायद आराम के लिए तो नहीं ही हो! बहरहाल, यह तो बस एक सिद्धांत है, और सो भी मेरा सिद्धांत; और तुम्हारे लिए मेरी बात कोई प्रामाणिक तो है नहीं! हो सकता है मैं इस वक्त भी तुमसे कुछ छिपा रहा हूँ। तुम कहीं यह उम्मीद तो नहीं करते कि मैं तुम्हारे सामने अपने सारे पत्ते खोल कर रख दूँगा हा-हा! दूसरे, इस बात से तुम्हारा क्या मतलब कि तुम्हें क्या फायदा होगा यह बात तुम्हारी समझ में नहीं आती कि अगर अपना अपराध मान लोगे तो तुम्हारी सजा कितनी कम हो जाएगी जरा सोचो तो सही कि तुम अपना अपराध कब स्वीकार कर रहे होगे... किस वक्त सोचो! ठीक उस वक्त जब एक दूसरा आदमी मान चुका है कि अपराध उसने किया है और सारे मामले को बुरी तरह उलझा कर रख दिया है। मैं तुमसे भगवान की कसम खा कर कहता हूँ कि मैं 'वहाँ' ऐसा बंदोबस्त कर दूँगा कि तुम्हारा अपराध स्वीकार करना सबके लिए एक अचंभे की बात बन जाएगा। हम लोग मनोविज्ञान के बारे में सब कुछ भूल जाएँगे और मैं तुम्हारे बारे में सभी शुबहों को बेबुनियाद बताऊँगा ताकि तुम्हारा अपराध एक तरह का दिमागी उलझाव मालूम हो; सच पूछो तो वह उलझाव ही था। मैं ईमानदार आदमी हूँ, दोस्त, और अपना वचन पूरा करूँगा।'

रस्कोलनिकोव चुप रहा। उसने उदासी के साथ अपना सर झुका लिया, देर तक कुछ सोचता रहा और आखिरकार फिर मुस्कराया। लेकिन इस बार उसकी मुस्कराहट बहुत उदास और फीकी-फीकी थी।

'मुझे यह सब नहीं चाहिए,' उसने कहा, मानो वह पोर्फिरी से अपना अपराध छिपाने की कोशिश भी न कर रहा हो। 'ऐसा करने से कोई फायदा नहीं! मुझे सजा में आपकी यह कमी नहीं चाहिए!'

'आह, मुझे इसी का डर था!' पोर्फिरी ने अनायास ही सहृदयता से कहा। 'मुझे डर था कि तुम अपनी सजा में कमी करवाना नहीं चाहोगे।'

रस्कोलनिकोव ने उदासी और गंभीरता से उसकी ओर देखा।

'जिंदगी को इस तरह मत ठुकराओ, दोस्त,' पोर्फिरी कहता रहा, 'अभी तो तुम्हारे सामने सारी जिंदगी पड़ी है। यह कहने का भला क्या मतलब कि तुम अपनी सजा कम करवाना नहीं चाहते तुम भी बहुत बेसब्रे हो!'

'अभी क्या चीज मेरे आगे पड़ी है?'

'जिंदगी! पैगंबर बने फिरते तो हो पर तुम्हें मालूम क्या है? ढूँढ़ो और तुम्हें मिलेगा : शायद यह ईश्वर का तुम्हें अपने पास तक पहुँचने का रास्ता बताने का ढंग था। फिर यह कोई हमेशा के लिए तो होगा नहीं... मेरा मतलब है, पाँवों में बेड़ियाँ...'

'आप मेरी सजा कम करवाएँगे...?' रस्कोलनिकोव हँसा।

'आह, कहीं बदनामी का बुर्जुवा विचार तो तुम्हें परेशान नहीं कर रहा? मैं समझता हूँ तुम इसी बात से डर रहे हो, चाहे तुम्हें खुद इसका पता न हो, क्योंकि तुम अभी नौजवान हो। तो भी, कम-से-कम तुम्हारे लिए अपना अपराध मान लेने में डर या शर्म की कोई बात नहीं है।'

'भाड़ में जाए!' रस्कोलनिकोव ने तिरस्कार और घोर विरक्ति के भाव से धीमे स्वर में कहा, जैसे वह इस बारे में बात भी करना न चाहता हो। वह एक बार फिर उठा, गोया कमरे से बाहर चला जाना चाहता हो, लेकिन फिर बैठ गया। उसके चेहरे पर घोर निराशा का भाव एकदम स्पष्ट था।

'भाड़ में जाए, क्यों यही बात है न... तुम्हारे साथ मुसीबत की बात यह है कि तुम्हें अब किसी चीज पर भरोसा नहीं रहा, और शायद तुम यह समझते हो कि मैं खुल्लमखुल्ला तुम्हारी खुशामद कर रहा हूँ। लेकिन तुम्हें जिंदगी का अभी तजरबा ही कितना है तुम सचमुच कितनी बातें समझते हो... बस एक सिद्धांत गढ़ लिया, और अब यह सोच कर शरमा रहे हो कि वह गलत साबित हो गया और बहुत मौलिक भी नहीं निकला। वह भले ही पक्का दुष्ट निकला हो लेकिन तुम तो ऐसे दुष्ट नहीं हो! तुम कतई ऐसे दुष्ट नहीं हो। तुम कम-से-कम अपने को एक अरसे से धोखा तो नहीं देते आ रहे हो... तुम तो एकदम से राह के आखिरी छोर पर जा पहुँचे। जानते हो, तुम्हारे बारे में मेरी क्या राय है? मेरी राय में तुम इस तरह के आदमी हो कि आँतें भी बाहर निकाल ली जाएँ तो वह अपने सतानेवालों को मुस्करा कर देखेगा... मानो उसे कोई ऐसी चीज मिल गई हो जिस पर वह विश्वास रख सकता हो या उसे भगवान मिल गया हो। तो, उसे खोजो और तुम जिंदा रहोगे। तुम्हें बहुत अरसे से जिस चीज की जरूरत रही है वह है, हवा-पानी में बदलाव। लेकिन तकलीफ उठाना भी कोई ऐसी बुरी बात नहीं। उठाओ तकलीफ! अगर निकोलाई तकलीफ उठाना चाहता है तो शायद ठीक ही चाहता है। मैं जानता हूँ किसी चीज पर विश्वास रखना इतना आसान नहीं है, लेकिन बहुत ज्यादा चालाक मत बनो। अपने को बिना सोच-विचार किए जिंदगी के हवाले कर दो, चिंता मत करो, और जिंदगी तुम्हें सीधे किनारे पर पहुँचा देगी, तुम्हें अपने पाँव खड़ा कर देगी। किस किनारे पर यह मैं क्या जानूँ, मैं तो बस इतना जानता हूँ कि अभी तुम्हारे आगे काफी लंबी जिंदगी पड़ी है। मैं जानता हूँ, तुम इस वक्त मेरी बातों को एक रटे-रटाए उपदेश का हिस्सा समझ रहे हो, लेकिन बाद में चल कर शायद तुम्हें इनकी याद आएगी, शायद ये ही बातें किसी दिन तुम्हारे काम आएँ। इसीलिए मैं तुमसे इस वक्त बातें कर रहा हूँ। मैं समझता हूँ, यह अच्छा ही हुआ कि तुमने एक बुढ़िया की जान ली। अगर तुम्हें कोई और सिद्धांत सूझा होता तो शायद तुम इससे भी हजार गुनी बदतर कोई हरकत कर बैठते। तुम्हें भगवान का उपकार मानना चाहिए। कौन जाने, शायद भगवान किसी काम के लिए तुम्हें जिंदा रखे हुए हो। तुम्हें अपना दिल छोटा करना नहीं चाहिए, न इतना डरना चाहिए। या ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे सामने जो महान प्रायश्चित है उससे डर रहे हो... नहीं, उससे डरना तुम्हारे लिए शर्म की बात होगी। ऐसा कदम उठाने के बाद तुम्हें हिम्मत रखनी चाहिए। अब यह न्याय का सवाल बन चुका है। इसलिए वही करो जो न्याय का तकाजा है। मैं जानता हूँ तुम किसी चीज में विश्वास नहीं रखते, लेकिन मेरी बात मानो, जिंदगी तुम्हें हर मुसीबत से बाहर निकाल ले जाएगी। कुछ वक्त बीतेगा तो वह तुम्हें अच्छी भी लगने लगेगी। तुम्हें बस जिस चीज की जरूरत है वह है हवा, हवा, हवा!'

रस्कोलनिकोव न चाहते हुए भी चौंक पड़ा।

'आप हैं कौन?' वह जोर से चीखा। 'आप भला कहाँ के पैगंबर हैं? आप शांति के किस ऊँचे शिखर पर खड़े हो कर मुझसे ये भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं?'

'मैं कौन हूँ मैं ऐसा आदमी हूँ जिसे जिंदगी से अब और कुछ नहीं चाहिए। ऐसा आदमी जो फिर भी महसूस करता और हमदर्दी रखता है... जिसे शायद कुछ बातें मालूम भी हैं, लेकिन जिसे जिंदगी से अब कुछ और नहीं चाहिए। मगर तुम्हारी बात बिलकुल दूसरी है : भगवान ने तुम्हें जिंदगी दी है। (यूँ भगवान ही जानता है कि कहीं तुम्हारी जिंदगी भी तो महज एक धुआँ बन कर खत्म नहीं हो जाएगी और तुम्हारा कुछ भी नहीं बनेगा।) अगर तुम अपने आपको दूसरी ही श्रेणी के लोगों में गिनते हो तो इससे क्या होता है? तुम्हारे जैसे आदमी को इसका अफसोस तो हो नहीं सकता कि तुमसे तुम्हारा ऐश-आराम छिन जाएगा। कोई अगर बहुत दिनों तक तुम्हें नहीं भी देखे तो क्या हो जाएगा असल चीज समय नहीं बल्कि खुद तुम हो। सूरज बनो, हर आदमी तुम्हें देखेगा। लेकिन सूरज को सबसे पहले सूरज तो होना पड़ेगा। अब तुम किस बात पर मुस्करा रहे हो कि मैं शिलर जैसा कोई आदमी हूँ... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, तुम यह सोच रहे हो कि मैं तुम्हारी खुशामद करने की कोशिश कर रहा हूँ। शायद ऐसा ही हो... हा-हा-हा! बेहतर शायद यही हो दोस्त कि तुम मेरी हर बात ज्यों का त्यों न मान लो! शायद तुम्हें मेरा यकीन करना नहीं भी चाहिए - पूरी तरह तो हरगिज नहीं - मैं हूँ ही ऐसा शख्स। लेकिन इतना मैं और कहना चाहूँगा : मैं समझता हूँ, तुम खुद इसका फैसला कर सकते हो कि मैं ईमानदार हूँ या नहीं।'

'आप मुझे कब गिरफ्तार करेंगे?'

'मैं समझता हूँ, डेढ़ या दो दिन तुम्हें मैं और आजादी से घूमने दूँगा। सोच लो, दोस्त! भगवान से प्रार्थना करो और याद रखो कि इससे तुम्हारा भला ही होगा। मैं इसका तुम्हें यकीन दिलाता हूँ।'

'और अगर मैं भाग जाऊँ तो?' रस्कोलनिकोव ने कुछ विचित्र ढंग से मुस्करा कर पूछा।

'नहीं, तुम नहीं भागोगे। कोई किसान होता तो भाग जाता, कोई फैशनेबुल समाज का होता तो भाग जाता, वह किसी दूसरे के विचारों का गुलाम है, क्योंकि उसकी तरफ तुम अपनी कानी उँगली से भी इशारा कर दो तो वह जिंदगी भर किसी भी चीज पर विश्वास करने को तैयार हो जाएगा। लेकिन तुम अब अपने सिद्धांत पर विश्वास नहीं रख सकोगे, इसलिए अपने साथ क्या ले कर भागोगे और भागते रहने से भी तुम्हें क्या मिलेगा... भागते रहना बहुत ही गंदा और मुश्किल काम है, और तुम्हें जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है वह है जिंदगी में एक खास हैसियत... और मुनासिब हवा। जिस तरह की हवा तुम चाहते हो, क्या वह तुम्हें वहाँ मिल सकेगी? तुम भाग भी जाओ तो अपने आप वापस आओगे। हम लोगों के बिना तुम्हारा काम नहीं चलेगा। मैं अगर तुम्हें कालकोठरी में डाल दूँ तो वहाँ तुम महीने, दो महीने, या शायद तीन महीने रहोगे, और तब तुम्हें याद आएगा कि मैंने तुमसे क्या कहा था। तब तुम खुद मेरे पास आओगे, और बहुत मुमकिन है कि तुम खुद भी इस बात पर ताज्जुब करो। आने से एक घंटा पहले तक भी तुम्हें यह पता नहीं होगा कि तुम मेरे पास अपना अपराध स्वीकार करने आ रहे हो। सच... मैं यह सोचे बिना नहीं रह सकता कि आखिर में तुम 'तकलीफ ही स्वीकार करने' का फैसला करोगे। तुम इस वक्त मेरी बात नहीं मानोगे, लेकिन यह बात खुद तुम्हारी समझ में आ जाएगी क्योंकि मेरे दोस्त, तकलीफ उठाना बहुत बड़ी बात है। इस तरह मुझे मत देखो। मैं जानता हूँ, मैं मोटा हो गया हूँ। लेकिन कोई बात नहीं। मैं जानता हूँ - मेरी बात पर हँसो नहीं - कि तकलीफ उठाने में कोई बात जरूर है। हाँ, निकोलाई ठीक कहता है। नहीं दोस्त, तुम नहीं भाग सकोगे।'

रस्कोलनिकोव उठ खड़ा हुआ और अपनी टोपी उठा ली। पोर्फिरी भी उठ खड़ा हुआ।

'खुली हवा लेने जा रहे हो? सुहानी शाम है, बस आँधी न आए। लेकिन आई भी तो कुछ खास बुरा न होगा। हवा साफ हो जाएगी...'

पोर्फिरी ने भी अपनी टोपी उठा ली।

'कहीं यह न समझ लीजिएगा,' रस्कोलनिकोव ने कठोर स्वर में जोर दे कर कहा, 'कि आपके सामने आज मैंने कोई अपराध स्वीकार किया है। आप बहुत अजीब आदमी हैं और मैंने आपकी बातें कौतूहल के मारे ही सुनी हैं, कोई अपराध नहीं स्वीकार किया है। याद रखिएगा।'

'जाहिर है, जाहिर है, इतना मैं जानता हूँ... याद रखूँगा मैं। देखो तो सही कितना काँप रहे हो। फिक्र न करो दोस्त, जैसा तुम चाहोगे वैसा ही होगा। थोड़ा-बहुत घूम-फिर लो; लेकिन यह याद रखना कि मैं तुम्हें बहुत दिनों तक इस तरह घूमने नहीं दूँगा। बहरहाल, मैं तुमसे मेरे साथ एक एहसान करने को जरूर कहूँगा,' पोर्फिरी ने अपनी आवाज नीची करते हुए कहा। 'बात कुछ टेढ़ी है, लेकिन है जरूरी। मेरा मतलब यह है कि अगर कभी तुम यह फैसला करो (याद रहे, मैं एक पल के लिए भी ऐसा नहीं समझता कि तुम ऐसा फैसला करोगे, और सच तो यह है कि मेरी राय में तुममें इसकी क्षमता भी नहीं है), लेकिन अगर तुम अगले कोई चालीस या पचास घंटों में यह फैसला करो कि तुम इस मामले को किसी दूसरे तरीके से खत्म करना चाहते हो - मेरा मतलब है, अपने आपको खत्म कर देना चाहते हो (एकदम बेतुका विचार है, और मैं माफी चाहता हूँ कि मैं इस तरह का इशारा कर रहा हूँ), तो मुझे बहुत खुशी होगी अगर तुम एक छोटी-सी पर्ची पर पूरा ब्यौरा लिख कर मेरे लिए छोड़ जाओ। बस दो लाइनें - दरअसल, दो छोटी लाइनों से ज्यादा मुझे कुछ चाहिए भी नहीं... और बराय मेहरबानी उस पत्थर की बात लिखना न भूलना। इसी में तुम्हारी सज्जनता होगी। अच्छा, तो मैं चलता हूँ। कोई बुरी बात न सोचना और कोई गलत फैसला न करना!'

पोर्फिरी झुक कर, रस्कोलनिकोव से नजरें चुराता हुआ बाहर चला गया। रस्कोलनिकोव खिड़की के पास जा कर चिड़चिड़ाहट के साथ और बेसब्री से उस वक्त तक इंतजार करता रहा जब तक उसके हिसाब से पोर्फिरी काफी दूर न चला गया हो। फिर वह भी जल्दी से कमरे के बाहर चला गया।

3

उसे स्विद्रिगाइलोव से जल्द से जल्द मिलने की बेचैनी थी। उस आदमी से वह क्या पाने की उम्मीद कर सकता था, यह तो उसे भी नहीं मालूम था, लेकिन लगता था उस पर उस शख्स का किसी न किसी तरह का दबाव था। इस बात को एक बार समझ लेने के बाद वह अब चैन से नहीं बैठ सकता था। अलावा इसके, अब वक्त भी आन पहुँचा था।

रास्ते में एक सवाल उसे खास तौर पर परेशान करता रहा : क्या स्विद्रिगाइलोव पोर्फिरी से मिलने गया था?

जहाँ तक वह समझ पा रहा था - और यह बात वह कसम खा कर कहने को तैयार था - वह नहीं गया था। उसने एक बार फिर ध्यान से इस सवाल पर सोचा, पोर्फिरी के साथ अपनी मुलाकात की छोटी से छोटी बात को भी याद किया, और इसी नतीजे पर पहुँचा : वह नहीं गया था; कतई नहीं गया था!

लेकिन अगर वह पोर्फिरी के पास अभी तक नहीं गया था तो क्या अब जाएगा या नहीं?

उस वक्त उसे पूरा-पूरा यकीन था कि वह नहीं जाएगा। क्यों... इसकी कोई वजह वह नहीं बता सकता था, लेकिन अगर बता भी सकता तो इस वक्त वह इस पर ज्यादा वक्त खराब करने को तैयार नहीं था। ये सारी बातें उसे परेशान तो करती थीं, पर न जाने क्यों ऐसा लगता था कि उसे इनकी कोई परवाह नहीं है। यह एक अजीब बात थी, और इस पर शायद कोई यकीन भी न करता, लेकिन उसे न तो अपनी वर्तमान स्थिति की बहुत चिंता थी और न अपने निकट भविष्य की। उसे चिंता किसी और ही बात की थी, एक ऐसी बात की जो कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी, एक ऐसी बात की जो खास अहमियत रखती थी। एक ऐसी बात की जिसका किसी दूसरे से कोई संबंध नहीं था; लेकिन वह बिलकुल ही दूसरी बात थी और उसका महत्व भी बहुत खास था। अलावा इसके वह एक गहरे नैतिक पतन का एहसास भी कर रहा था, हालाँकि आज उसका दिमाग जितनी अच्छी तरह काम कर रहा था, उतनी अच्छी तरह इधर हाल में कभी नहीं किया था।

खैर, जो कुछ हो चुका था उसके बाद इन छोटी-मोटी कठिनाइयों पर काबू पाने का क्या सचमुच कोई फायदा था... मिसाल के लिए, क्या इस बात का कोई फायदा था कि स्विद्रिगाइलोव को पोर्फिरी से मिलने से रोकने की योजना बनाई जाए और उसके लिए कोई साजिश की जाए या स्विद्रिगाइलोव जैसे आदमी को समझने, उसके बारे में मालूम करने की कोशिश करने और उस पर वक्त खराब करने का

आह, इन सब बातों से वह कितना तंग आ चुका था!

फिर भी, इन तमाम बातों के बावजूद वह स्विद्रिगाइलोव से मिलने के लिए भागा चला जा रहा था; कहीं ऐसा तो नहीं था कि वह उससे किसी नई बात की उम्मीद रख कर जा रहा था कुछ हिदायतों की बच निकलने के किसी रास्ते की डूबते को तिनके का सहारा होता है! क्या नियति या कोई सहज भावना, उन दोनों को एक-दूसरे के करीब ला रही थीं? शायद वह सिर्फ महसूस कर रहा था। शायद यह घोर निराशा थी। शायद उसे स्विद्रिगाइलोव की नहीं, किसी दूसरे ही आदमी की जरूरत थी और स्विद्रिगाइलोव तो बस रास्ते में आ गया था। सोन्या की लेकिन अब वह सोन्या के पास क्यों जाए? एक बार फिर आँसुओं की भीख माँगने? अलावा इसके उसे सोन्या से डर भी लग रहा था। उसकी निगाह में सोन्या एक निर्मम भर्त्सना की, एक अटल निर्णय की प्रतीक थी। वहाँ तो बस यह था कि या तो सोन्या का रास्ता हो या उसका अपना। खास तौर पर उस समय वह अपने को उसने मिलने के लिए तैयार नहीं कर पा रहा था। इससे कहीं अच्छा शायद यह होता कि वह स्विद्रिगाइलोव को आजमा कर देखे और यह मालूम करे कि वह किस किस्म का आदमी है। वह अपने दिल की गहराई में इस बात को मानने पर मजबूर था कि उसे बहुत अरसे से किसी वजह से उसकी जरूरत थी।

तो भी ऐसी क्या चीज थी जो उन दोनों के बीच एक जैसी थी उन दोनों ने जो कत्ल किए थे वे भी तो एक ही तरह के नहीं थे। अलावा इसके वह आदमी बेहद आपत्तिजनक, बेहद अनैतिक, परले दर्जे का कमीना और धोखेबाज, और शायद कीने से भरा हुआ भी था। उसके बारे में कैसे-कैसे भयानक किस्से कहे जाते थे। यह सच था कि कतेरीना इवानोव्ना के बच्चों के लिए वह अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा था, लेकिन कौन जाने उसका मकसद क्या था या इन बातों के पीछे रहस्य क्या था उस आदमी के पास तरह-तरह के मंसूबों की कभी कोई कमी तो रही नहीं।

उन दिनों रस्कोलनिकोव के दिमाग पर एक और विचार छाया हुआ था जिसने उसे बहुत परेशान कर रखा था, हालाँकि उसने उसे अपने दिमाग से निकालने की पूरी कोशिश की थी क्योंकि वह उसके लिए बहुत कष्टदायक था। कभी-कभी वह यह सोचे बिना रह नहीं सकता था कि स्विद्रिगाइलोव उसका पीछा करता आ रहा था और अब भी कर रहा था, कि स्विद्रिगाइलोव ने उसका भेद पा लिया था, कि स्विद्रिगाइलोव के दिल में दूनिया के बारे में भी कुछ मंसूबे रह चुके थे। और अगर ये मंसूबे अब भी हों तो यह लगभग तय था कि उसके दिल में ऐसे मंसूबे अब भी थे। अगर उसका भेद पा लेने और इस तरह उसे अपने शिकंजे में कस लेने के बाद, वह इसे दूनिया के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल करे तो क्या होगा?

यह विचार जो उसे सपने में भी सताता रहता था, उसके मन में कभी इतने जोरदार ढंग से नहीं उठा था जिस तरह इस वक्त उठ रहा था जबकि वह स्विद्रिगोइलोव के पास जा रहा था। इस विचार के उठते ही वह गुस्से से पागल हो उठता था। पहली बात तो यह थी कि इससे हर चीज बदल जाएगी, उसकी अपनी स्थिति भी। उसे अपना भेद दूनिया को फौरन बता देना होगा। उसे शायद पूरी तरह आत्मसमर्पण कर देना होगा ताकि दूनिया को कोई नासमझी का कदम उठाने से रोका जा सके। वह खत दूनिया को उसी दिन सबेरे कोई खत मिला था। पीतर्सबर्ग में भला उसे किसने खत भेजा होगा (शायद लूजिन ने?), यह सच था कि रजुमीखिन वहाँ नजर रख रहा था, लेकिन रजुमीखिन कुछ नहीं जानता। क्या उसे रजुमीखिन को फौरन अपना भेद बता देना चाहिए? यह विचार रस्कोलनिकोव के लिए काफी अप्रिय था।

बहरहाल, उसे स्विद्रिगाइलोव से जल्द-से-जल्द मिलना होगा। उसने मन-ही-मन अंतिम निर्णय किया। खैरियत की बात यह थी कि इस बारे में ब्यौरे की बातों का उतना महत्व नहीं था जितना मुख्य बात का। लेकिन अगर... अगर वह सचमुच ऐसा कुछ कर सकता हो, अगर दूनिया के खिलाफ स्विद्रिगाइलोव सचमुच कोई मंसूबा बना रहा हो तो...

पिछले एक महीने की घटनाओं से थक कर रस्कोलनिकोव इतना चूर हो चुका था कि इस तरह के सवालों का एक ही फैसला कर सकता था - 'फिर तो मैं उसे मार डालूँगा।' उसने क्रूर निराशा के भाव से यह बात सोची। और बेहद उदास हो गया। यह देखने के लिए कि वह किधर जा रहा था और कहाँ तक पहुँच चुका था, वह सड़क के बीच में रुक गया। वह ओबुखोव्स्की एवेन्यू में था, भूसामंडी से कोई तीस-चालीस गज दूर, जहाँ से वह चला था। बाईं ओर के मकान की पूरी दूसरी मंजिल में एक रेस्तराँ था। सारी खिड़कियाँ पूरी खुली हुई थीं। खिड़कियों के रास्ते जो कुछ नजर आ रहा था उससे पता चलता था कि रेस्तराँ खचाखच भरा हुआ है। खाने के कमरे से गाने की; एक वायलिन और क्लेरिनैट की आवाजें और एक तुर्की ढोल की ढम-ढम की आवाजें आ रही थीं। औरतों की चीखें सुनाई दे रही थीं। यह सोच कर कि वह ओबुखोव्स्की एवेन्यू में मुड़ा ही क्यों था, वह वापस जाने ही वाला था कि उसे अचानक स्विद्रिगाइलोव दिखाई पड़ गया। रेस्तराँ की एक सबसे दूरवाली खुली खिड़की के पास वह मुँह में पाइप लगाए, चाय की मेज के सामने बैठा हुआ था। इस संयोग पर उसे बेहद आश्चर्य हुआ, बल्कि यूँ कहिए कि वह धक से रह गया। स्विद्रिगाइलोव उसे चुपचाप देख रहा था। रस्कोलनिकोव को यह बात बरबस खटकी : उसे ऐसा क्यों लगा कि स्विद्रिगाइलोव उठना चाह रहा था ताकि इससे पहले कि उसे देखा जा सके, वह वहाँ से चपुचाप खिसक जाए। रस्कोलनिकोव ने भी फौरन यूँ जताया कि जैसे उसने उसे देखा न हो, बल्कि किसी दूसरी ही दिशा में किसी दूसरी ही चीज को देख रहा हो, लेकिन वह कनखियों से बराबर उसे देखे जा रहा था। उसका दिल बेचैनी से धड़क रहा था। उसका अनुमान ठीक था। स्विद्रिगाइलोव साफ तौर पर यह नहीं चाहता था कि कोई उसे देख सके। उसने मुँह से पाइप निकाला और छिपाने की कोशिश करने लगा। लेकिन ज्यों ही वह उठा और अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई, उसे जरूर यह एहसास हुआ होगा कि रस्कोलनिकोव ने उसे देख लिया था और लगातार उस पर नजर रखे हुए था। इस समय उन दोनों के बीच जो कुछ हुआ वह बहुत कुछ उस दृश्य जैसा ही था जो रस्कोलनिकोव के कमरे में उनकी पहली मुलाकात के समय सामने आया था, जब रस्कोलनिकोव सो रहा था। स्विद्रिगोइलोव के चेहरे पर एक कमीनी मुस्कराहट उभरी जो धीरे-धीरे फैल कर चौड़ी होती गई। दोनों को ही मालूम था कि दूसरे ने उसे देख लिया है और उस पर नजर रख रहा है। आखिरकार स्विद्रिगाइलोव ठहाका मार कर हँसा।

'खूब! जी चाहे तो अंदर आ जाओ... मैं यहाँ हूँ!' उसने खिड़की में से पुकार कर कहा।

रस्कोलनिकोव सीढ़ियाँ चढ़ कर रेस्तराँ में जा पहुँचा।

उसने देखा, स्विद्रिगाइलोव खाने के बड़े कमरे से लगे और उसके पीछे एक बहुत ही छोटे कमरे में बैठा था जिसमें बस एक खिड़की थी। खाने के बड़े कमरे में कई व्यापारी, सरकारी नौकर और बहुत से दूसरे लोग जान लड़ा कर गानेवालों की टोली के शोर के बीच बीस छोटी-छोटी मेजों पर बैठे चाय निगल रहे थे। कहीं से बिलियर्ड की गेंदों के टकराने की आवाज आ रही थी। स्विद्रिगाइलोव के सामने मेज पर शैंपेन की एक खुली बोतल और एक आधा भरा गिलास रखा हुआ था। उसी कमरे में हाथ में छोटा-सा आर्गन लिए हुए एक लड़का था और कोई अठारह साल की, तंदुरुस्त और लाल-लाल गालोंवाली एक लड़की भी थी, जो धारीदार स्कर्ट उड़स कर पहने हुए थी और सर पर फीतों से सजी टाइरोलियन हैट लगाए हुए थी। बगलवाले कमरे में गाने के शोर के बावजूद वह आर्गन की धुन पर ऊँची भर्राई हुई आवाज में कोई बाजारू गाना गा रही थी...

'अच्छा, अब रहने दो!' रस्कोलनिकोव के अंदर आते ही स्विद्रिगाइलोव ने उसे टोकते हुए कहा।

लड़की ने गाना फौरन बंद कर दिया और बड़े अदब से खड़ी इंतजार करती रही। बाजारू गाना गाते समय भी उसके चेहरे पर आदर और गंभीरता का यही भाव था।

'फिलिप, एक गिलास लाना!' स्विद्रिगाइलोव ने आवाज दी।

'मैं शराब नहीं पिऊँगा,' रस्कोलनिकोव ने कहा।

'जैसी तुम्हारी मर्जी, लेकिन गिलास तुम्हारे लिए माँगा भी नहीं। लो पियो, कात्या! आज मैं कोई और गाना नहीं सुनूँगा। तुम जा सकती हो!' उसने कात्या के लिए एक गिलास भरा और एक पीला नोट निकाल कर उसे दिया। कात्या ने एक घूँट में गिलास खाली कर दिया, जैसा कि औरतें आम तौर पर करती हैं यानी बीस चुस्कियाँ लेने के लिए बीच में रुके बिना, नोट लिया, स्विद्रिगाइलोव का हाथ चूमा, जो स्विद्रिगाइलोव ने बड़ी गंभीर मुद्रा बना कर उसे करने दिया, और कमरे के बाहर चली गई। लड़का भी आर्गन लिए हुए उसके पीछे-पीछे चला गया। उन दोनों को सड़क पर से लाया गया था। स्विद्रिगाइलोव को पीतर्सबर्ग आए अभी मुश्किल से एक हफ्ता हुआ था, लेकिन इन थोड़े दिनों में ही उसके सारे तौर-तरीके एक खास ढंग के बन चुके थे। वेटर फिलिप जल्द ही उसका 'पुराना दोस्त' बन चुका था, और बड़ी मुस्तैदी से उसका हर हुक्म बजा लाने को तैयार रहता था। खाने के कमरे में जानेवाला दरवाजा आम तौर पर बंद रहता था। इस छोटे कमरे में स्विद्रिगाइलोव को हर तरह की सुख-सुविधा मिलती थी और वह शायद पूरा-पूरा दिन उसी में काट देता था। रेस्तराँ बहुत गंदा और सस्ता था; शायद दूसरे दर्जे का भी नहीं था।

'मैं आप ही से मिलने जा रहा था,' रस्कोलनिकोव ने कहना शुरू किया। 'आपकी खोज में। लेकिन न जाने क्यों मैं भूसामंडी से ओबुखोव्स्की एवेन्यू की तरफ मुड़ गया। मालूम नहीं, किसलिए। मैं इधर कभी नहीं आता। आम तौर पर भूसामंडी से दाहिनी ओर मुड़ जाता हूँ। फिर यह आपके यहाँ जाने का रास्ता भी तो नहीं है। सड़क का नुक्कड़ मुड़ते ही आप पर मेरी नजर पड़ी! अजीब बात है!'

'साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि चमत्कार है?'

'इसलिए कि शायद यह महज इत्तफाक है।'

'आह, तुम लोग भी अजीब हो,' स्विद्रिगाइलोव ठहाका मार कर हँसा। 'मानोगे नहीं, हालाँकि दिल में चमत्कारों में विश्वास रखते हो। तुमने अभी कहा कि 'शायद' यह इत्तफाक था। पर मेरे दोस्त, जब खुद अपनी राय जाहिर करने का सवाल आता है तो तुम यहाँ के लोग इतने बुजदिल हो जाते हो कि सोचा भी नहीं जा सकता। मैं तुम्हारी बात नहीं कर रहा। तुम अपने दिमाग से सोचते हो और इस बात से डरते भी नहीं। यही वजह है कि मेरे मन में तुम्हारे बारे में जानने की इच्छा पैदा हुई।'

'इसके अलावा और कोई बात नहीं थी?'

'क्यों, क्या इतना काफी नहीं है?'

स्विद्रिगाइलोव सचमुच तरंग में था, हालाँकि थोड़ा ही था। उसने आधा गिलास शराब ही पी थी।

'मुझे तो लगता है कि आप जिस चीज को मेरा अपना दिमाग कहते हैं उसका पता लगने से पहले ही आप मुझसे मिलने आए थे,' रस्कोलनिकोव ने अपनी राय जाहिर की।

'खैर, दूसरी ही बात थी उस वक्त। हर किसी का काम करने का अपना ढंग होता है। जहाँ तक चमत्कार का सवाल है, तो मैं तुम्हें इतना ही बता सकता हूँ कि तुम पिछले दो-तीन दिन से सोते रहे हो। इस रेस्तराँ के बारे में मैंने खुद तुम्हें बताया था, और यहाँ तुम्हारे आने में ऐसी कोई चमत्कार की बात नहीं है। मैंने तुम्हें यहाँ आने का रास्ता बताया था, इस जगह के बारे में बताया था, यह बताया था कि यह जगह कहाँ है और यह भी बताया था कि मैं यहाँ किस वक्त मिल सकता हूँ। याद नहीं?'

'मुझे याद नहीं पड़ता,' रस्कोलनिकोव ने हैरान हो कर जवाब दिया।

'चलो, तुम्हारी बात माने लेता हूँ। मैंने दो बार तुम्हें इसके बारे में बताया था। सो पता अनजाने ही तुम्हारे दिमाग में चिपका रह गया होगा और तुम आप ही मेरे बताए हुए रास्ते पर चलते हुए इस सड़क पर मुड़े होगे, हालाँकि यह बात तुम्हें खुद मालूम नहीं रही होगी। तुम्हें इसके बारे में अभी उस दिन जब मैं बता रहा था तब मेरे खयाल में तुम समझे नहीं थे। दोस्त, तुम खुद अपना भेद बहुत ज्यादा खोलते चलते हो। एक बात और। मुझे पूरा यकीन है कि पीतर्सबर्ग में ऐसे बहुत से लोग हैं जो चलते-चलते अपने से बातें करते रहते हैं। यह आधे पागलों का शहर है। अगर यह वैज्ञानिकों का राष्ट्र होता तो हमारे डॉक्टर, वकील और यह दार्शनिक यहाँ पीतर्सबर्ग में अपने-अपने क्षेत्रों में बहुमूल्य खोजें कर सकते थे। तुम्हें पीतर्सबर्ग जैसी जगह आसानी से नहीं मिलेगी जहाँ आदमी के दिमाग पर इतनी सारी विचित्र, कठोर और निराशाजनक चीजों का असर पड़ता रहता है। जरा सोचो, अकेले यहाँ की जलवायु का ही कितना असर पड़ता होगा! और यह रूस के प्रशासन का केंद्र भी है, और इसके चरित्र की झलक हर चीज में दिखाई देना लाजमी है। लेकिन इस वक्त मैं यह बात समझाना नहीं चाहता। बात यह है कि तुम्हारे जाने बिना ही मैं अब तक कई बार तुम्हें गौर से देख चुका हूँ। जब तुम अपने घर से निकलते हो, तब तुम अपना सर ऊँचा किए रखते हो। बीस कदम के बाद तुम्हारा सर झुक जाता है और तुम अपने हाथ पीठ पीछे बाँध लेते हो। आँखें खोले चीजों पर तुम नजर तो डालते हो लेकिन साफ मालूम होता है कि न तो अपने सामने की कोई चीज देखते हो और न अपने दोनों तरफ की। आखिर में तुम्हारे होठ हिलने लगते हैं और तुम खुद से बातें करने लगते हो। इसके ही साथ अकसर तुम अपना एक हाथ दूसरे से छुड़ा कर कविता-पाठ जैसा कुछ करने लगते हो। आखिर में तुम बीच सड़क रुक जाते हो और देर तक वहीं खड़े रहते हो। पर जनाब, बहुत बुरी बात है यह। मेरे अलावा दूसरे लोगों का ध्यान भी इस बात की ओर जा सकता है, और हो सकता है कि तुम ऐसा न चाहो। जाहिर है, मैं इसकी जरा भी परवाह नहीं करता, न ही यह उम्मीद करता हूँ कि मैं तुम्हारी यह बीमारी ठीक कर सकता हूँ। अलबत्ता तुम मेरा मतलब समझ गए होगे, कि नहीं?'

'आप क्या यह बात जानते हैं कि मेरा पीछा किया जा रहा है?' रस्कोलनिकोव ने पैनी नजरों से स्विद्रिगाइलोव को देखते हुए पूछा।

'नहीं, मुझे इस बारे में कुछ भी मालूम नहीं,' स्विद्रिगाइलोव ने इस तरह जवाब दिया, गोया उसे यह सुन कर ताज्जुब हुआ हो।

'खूब, तो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए,' रस्कोलनिकोव माथे पर बल डाल कर बुदबुदाया।

'अच्छी बात है, तुम्हें तुम्हारे हाल पर छोड़ देते हैं।'

'मुझे तो आप यह बताइए कि अभी जब मैं सड़क से ऊपर खिड़की की ओर देख रहा था तो मुझसे आप छिप क्यों रहे थे। आप अगर यहाँ आम तौर पर पीने आते हैं और दो बार मुझसे यहाँ आ कर मिलने को कह चुके हैं तो आपने मुझसे नजर चुरा कर यहाँ से खिसकने की कोशिश क्यों की? मैं सब देख रहा था।'

'हा-हा! और जब मैं तुम्हारे चौखट पर खड़ा था और तुम आँखें बंद किए सोफे पर पड़े थे तो सोने का बहाना क्यों कर रहे थे, जबकि तुम सो नहीं रहे थे मैंने भी अच्छी तरह सब कुछ देखा था।'

'हो सकता है कि... मेरे ऐसा करने की कोई वजह रही हो, जैसा कि आप खुद जानते हैं।'

'मेरे पास भी ऐसा करने की वजह हो सकती है, हालाँकि तुम उसे नहीं जान सकोगे।'

रस्कोलनिकोव ने अपनी दाहिनी कुहनी मेज पर टिका ली और दाहिने हाथ की उँगलियों से ठोड़ी को नीचे से सहारा दे कर गौर से स्विद्रिगाइलोव को घूरने लगा। वह लगभग एक मिनट तक उसके चेहरे को नजरें जमा कर देखता रहा, क्योंकि हमेशा से ही वह उसके चेहरे से बहुत प्रभावित था। वह एक अजीब किस्म का चेहरा था जो देखने में मुखौटे जैसा लगता था : सफेद चेहरा, लाल गाल, गहरे लाल होठ, हलके रंग के सन जैसे बालों की दाढ़ी और सुनहरे बाल जो अभी तक काफी घने थे। लेकिन उसकी आँखें जरूरत से कुछ ज्यादा ही नीली लगती थीं, और नजर जरूरत से ज्यादा बोझिल और निश्चल थी। इस खूबसूरत चेहरे में, जो उसकी उम्र को देखते हुए बेहद नौजवान चेहरा था, कोई बात ऐसी जरूर थी जिससे नफरत पैदा होती थी। स्विद्रिगाइलोव की पोशाक गर्मियोंवाले हलके कपड़े की बनी हुई थी और लगता था, उसे अपनी कमीज पर खास गर्व था। उसकी एक उँगली पर बड़ी-सी अँगूठी थी, जिसमें कीमती नग जड़ा हुआ था।

'मुझे क्या आपके पीछे भी वक्त बर्बाद करना होगा?' रस्कोलनिकोव ने अचानक ब्रेसब्री से कसमसाते हुए सीधे मतलब की बात कही। 'हो सकता है आप कोई मुसीबत खड़ी करना चाहें और बहुत ही खतरनाक साबित हों, लेकिन आपकी वजह से मैं अपनी जिंदगी में कोई उलझाव पैदा करने को तैयार नहीं हूँ। आपको मैं साफ-साफ बता देना चाहता हूँ कि मुझे अपनी उतनी चिंता कतई नहीं जितनी आप शायद समझते हैं। इतना समझ लीजिए जनाब, मैं आपसे साफ-साफ यह कहने आया हूँ कि अगर आप अभी भी मेरी बहन की तरफ वही पहलेवाले इरादे रखते हैं, और अगर यह समझते हैं कि आपको अभी हाल में मेरे बारे में जिस बात का पता लगा है उसे इस्तेमाल करके आप अपनी मंशा पूरी कर लेंगे, तो इससे पहले कि आप मुझे जेल भिजवाएँ, मैं आपको जान से मार दूँगा। मेरी कोरी धमकियाँ देने की आदत नहीं है और मैं समझता हूँ, आप यह जानते ही होंगे कि मैं अपनी बात का पक्का हूँ। दूसरे, अगर आपको मुझसे कोई बात कहनी है -क्योंकि मुझे हर वक्त ऐसा लगता रहता है कि आपको मुझसे कोई बात कहनी है - तो वह बात आप मुझे फौरन बता दीजिए। इसलिए कि वक्त बहुत कीमती है और बहुत मुमकिन है कि जल्द ही देर हो जाए और वह बात बताने का वक्त न रहे।'

'ऐसी जल्दी क्या है? कहीं जाना है क्या?' स्विद्रिगाइलोव ने हैरानी से उसे देखते हुए पूछा।

'हर आदमी का काम करने का अपना ढंग होता है,' रस्कोलनिकोव ने बेचैनी से और गंभीर हो कर जवाब दिया।

'अभी तुमने खुद मुझे ललकारा था कि मैं तुमसे साफ-साफ बातें करूँ और अब तुम मेरे पहले ही सवाल का जवाब देने से इनकार कर रहे हो,' स्विद्रिगाइलोव ने मुस्कराते हुए अपनी राय जाहिर की। 'मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि तुम समझते हो, मेरे मन में कोई बात है, और इसीलिए तुम मुझे शक की नजर से देखते हो। खैर तुम्हारी हालत को देखते हुए यह बात पूरी तरह समझ में आती है। लेकिन यह चाहते हुए भी कि मैं तुम्हारे साथ दोस्ती निभाऊँ, मैं तुम्हें यह समझाने की कोशिश नहीं करूँगा कि ऐसा समझना तुम्हारी भूल है। मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि यह कोई ऐसी बात नहीं जिसमें दिमाग खपाया जाए। सच तो यह है कि तुमसे किसी खास बात के बारे में चर्चा करने का मेरा कोई इरादा भी नहीं था।'

'तो फिर आपको मेरी इतनी क्या जरूरत पड़ी थी आप ही तो मुझे तलाश करते घूम रहे थे, कि नहीं?'

'तुम्हें बस देखने-समझने की एक दिलचस्प चीज मानते हुए। तुम्हारे लिए मेरे मन में सिर्फ इसलिए दिलचस्पी पैदा हुई थी कि तुम जिस हालत में थे, वह अजीब थी। जी, यही बात थी! अलावा इसके तुम एक ऐसी नौजवान महिला के भाई हो जिनमें मेरी काफी दिलचस्पी रही है और जिनसे मैंने तुम्हारे बारे में इतना कुछ सुना था कि मैं लाजमी तौर पर इसी नतीजे पर पहुँचा कि उन पर तुम्हारा गहरा असर रहा है। क्या इतना काफी नहीं है? हा-हा-हा! तो भी मैं यह मानने को तैयार हूँ कि तुम्हारा सवाल कुछ टेढ़ा है और उसका जवाब देना मेरे लिए मुश्किल है। मिसाल के लिए, तुम मेरे पास न सिर्फ एक खास मकसद से आए हो, बल्कि इसलिए भी आए हो कि तुम कोई नई बात जानने के लिए बेचैन हो। है न यही बात है न?' स्विद्रिगाइलोव काइयाँ मुस्कराहट के साथ बार-बार अपना सवाल पूछता रहा। 'अच्छा, तब तुम क्या कहोगे अगर मैं कहूँ कि यहाँ आते वक्त रास्ते में रेल पर मैं यही आस लगाए हुए था कि तुम मुझे कोई नई बात बताओगे और मुझे तुमसे कोई अनमोल चीज मिलेगी देखा न, हम दोनों किस कदर दौलतमंद हैं!'

'आप मुझसे क्या पाना चाहते थे?'

'मैं भला क्या बताऊँ सच पूछो तो मुझे खुद मालूम नहीं। तुम देख रहे हो न कि मैं किस तरह के गंदे होटल में अपना वक्त बिताता हूँ, और यह मुझे अच्छा भी लगता है या शायद यह कहना बेहतर होगा कि यह जगह मुझे उतनी अच्छी नहीं लगती है जितनी यह बात लगती है कि कोई ऐसी जगह हो जहाँ मुझे सुख मिल सके। मिसाल के लिए, उस बेचारी कात्या को लो-तुमने देखा था न उसे ...अगर मैं कोई पेटू होता, या क्लबों में अच्छा खाने का शौकीन होता तो कोई बात भी होती, लेकिन यह रहा वह खाना जो मैं खाता हूँ।' (यह कह कर उसने कोने में रखी एक छोटी-सी मेज की तरफ इशारा किया जिस पर टीन की एक तश्तरी में बहुत ही बुरी बीफस्टेक का बचा हुआ टुकड़ा और आलू के कुछ कतले पड़े थे।) 'अरे हाँ, तुमने खाना खा लिया है क्या? मैं अभी थोड़ा-सा खा चुका हूँ, अब कुछ खाने को जी नहीं चाहता। मिसाल के लिए, मैं शराब नहीं पीता। शैंपेन छोड़ कोई हल्की शराब भी नहीं पीता और उसका भी पूरी शाम में एक गिलास। उतने से ही मेरे सर में दर्द होने लगता है। इस वक्त तो मैंने बस अपना हौसला बढ़ाने के लिए थोड़ी-सी मँगा ली थी, क्योंकि अभी मुझे किसी से मिलने जाना है। इसीलिए तुम मुझे एक खास किस्म की दिमागी हालत में देख रहे हो। मैंने स्कूली लड़कों की तरह छिपने की कोशिश इसीलिए की थी कि मुझे डर था, तुम इस वक्त मेरे लिए मुसीबत बन जाओगे। लेकिन,' उसने घड़ी निकाल कर देखा, 'मैं समझता हूँ तुम्हारे लिए एक घंटे का वक्त अभी मेरे पास है। इस वक्त साढ़े चार बजे हैं। देखो, बात यह है कि मेरा बहुत जी चाहता है कि मेरे पास करने को कुछ होता। काश, मैं जमींदार होता, या बाप होता, या घुड़सवार फौज का अफसर होता, या फोटोग्राफर होता, या पत्रकार होता... लेकिन मैं तो कुछ भी नहीं हूँ... मुझे कोई काम भी नहीं आता। कभी-कभी मैं बेहद ऊब जाता हूँ। मैं सोच रहा था कि तुम मुझे नई बात बताओगे।'

'लेकिन आप हैं कौन और यहाँ किसलिए आए हैं?'

'मैं कौन हूँ क्यों, तुम्हें मालूम नहीं? मैं एक शरीफ आदमी हूँ, दो साल तक घुड़सवार फौज में नौकरी की, उसके बाद कुछ समय तक यहाँ पीतर्सबर्ग में भटकता रहा, फिर उस औरत से शादी कर ली जो अब मर चुकी है और देहात में रहने लगा। मेरी जिंदगी की कहानी बस यही है!'

'मैं समझता हूँ आप जुआरी भी हैं!'

'नहीं, भला किस तरह का जुआरी मैं हो सकता हूँ! मैं पत्तेबाज हूँ, जुआरी नहीं।'

'आप सचमुच पत्तेबाज रह चुके हैं?'

'हाँ, पत्तेबाज भी रह चुका हूँ।'

'और कभी आपकी पिटाई भी हुई है?'

'हुई है। क्यों?'

'खूब, तो मैं समझता हूँ कि आपके सामने ऐसे मौके भी आए होंगे जब आपने किसी को द्वंद्व के लिए भी ललकारा होगा... आम तौर पर इस तरह की बातों से जिंदगी में आदमी की दिलचस्पी बनी रहती है।'

'मैं तुम्हारी बात को झुठलाना नहीं चाहता। इसके अलावा मैं दार्शनिकों जैसी बातें करने में भी कोई माहिर नहीं हूँ। लेकिन यह मान लेने में मुझे कोई एतराज नहीं है कि यहाँ मैं खास तौर पर औरतों की वजह से ही आया।'

'कुछ ही दिन पहले अपनी बीवी को दफन करके यहाँ आए, क्यों?'

'हाँ, तो,' स्विद्रिगाइलोव निहत्था कर देनेवाली मुस्कान मुस्कराया। 'तो क्या हुआ मुझे लगता है, तुम यह सोचते हो कि औरतों के बारे में मेरा इस तरह बातें करना कोई बेहूदा बात है। क्यों?'

'आपका मतलब यह है कि मैं बदकारी को कोई बुराई समझता हूँ कि नहीं?'

'बदकारी तो तुम यह सोच रहे हो! लेकिन पहले मैं आम तौर पर औरतों के बारे में अपनी राय साफ-साफ बता दूँ। तुम जानते हो, इस वक्त मेरा थोड़ा दिल खोल कर बातें करने को जी चाह रहा है। अब तुम ही बताओ, मैं किसलिए अपने आपको काबू में रखूँ अगर औरतें अच्छी लगती हैं तो मैं उन्हें क्यों छोड़ दूँ कम-से-कम मेरा वक्त तो कट जाता है।'

'तो आप यहाँ सिर्फ बदकारी की उम्मीद ले कर आए हैं?'

'अच्छा, तो क्यों नहीं? इसी को रटने से फायदा! तुम्हारे दिमाग पर बदकारी ही सवार है। हाँ, मैं बदकारी को पसंद करता हूँ। सवाल कम-से-कम सीधा तो पूछा गया। इस बदकारी में कोई चीज ऐसी है जो हमेशा रहती है। कोई ऐसी चीज जिसकी बुनियाद प्रकृति पर होती है, जो महज कल्पना की उड़ान की पाबंद नहीं होती। कोई ऐसी चीज जो खून में हमेशा एक दहकते अंगारे की तरह मौजूद रहती है। कोई ऐसी चीज जो ऐसी आग भड़काती है जिसे उम्र गुजरने के साथ भी एक अरसे तक बुझाया नहीं जा सकता। तुम्हें मानना पड़ेगा कि यह भी वक्त काटने का एक ढंग है, क्यों?'

'इसमें इतना खुश होने की क्या बात है यह एक बीमारी है, सो भी खतरनाक बीमारी।'

'अच्छा, तो तुम यह सोच रहे हो मैं मानता हूँ कि यह एक बीमारी है, हद से आगे बढ़ी, हर चीज की तरह और इस तरह के सिलसिलों में कोई भी आदमी हद से आगे बढ़े बिना रह नहीं सकता। लेकिन पहली बात तो यह है कि इसका दारोमदार इस पर होता है कि कौन किस किस्म का है। दूसरे, हर बात में आदमी को कुछ-न-कुछ संतुलन, कोई-न-कोई हिसाब तो रखना ही पड़ता है, चाहे वह हिसाब कितना ही बुरा हो! अगर ऐसा न हो तो आदमी अपने भेजे में गोली मार कर मर जाए। याद रखना, मैं इस बात को पूरी तरह मानता हूँ कि शरीफ आदमी का कर्तव्य होता है ऐसी ऊब झेलना, लेकिन बहरहाल...'

'तो आप अपने भेजे में गोली मार कर मर सकते हैं?'

'हे भगवान!' स्विद्रिगाइलोव ने उकता कर उसका सवाल टालते हुए कहा। 'मेहरबानी करके इसकी बात न करो,' उसने जल्दी से कहा। उसमें अब वह पहलेवाला डींग मारने का भाव नहीं था; चेहरे का भाव भी बदला हुआ लग रहा था। 'माफ करना, लेकिन मुझे डर है कि मैं एक ऐसी कमजोरी का अपराधी हूँ जिसे माफ नहीं किया जा सकता। मेरे दिल में मौत का डर है और मैं नहीं चाहता कि लोग उसकी चर्चा करें। क्या तुम जानते हो कि मैं थोड़ा-सा रहस्यवादी हूँ?'

'खूब! और वह आपकी बीवी का भूत! वह अब भी आता है?'

'भगवान के लिए उसकी चर्चा न करो! पीतर्सबर्ग में तो वह अभी तक नहीं आया है। लानत है उस पर!' उसने अचानक चिढ़ कर जोर से कहा। 'नहीं, बेहतर हो हम लोग कुछ और बातें करें... लेकिन... अफसोस कि मेरे पास वक्त नहीं है। मैं तुम्हारे पास अब और ज्यादा देर नहीं रुक सकता। वक्त होता तो मैं तुम्हें कुछ-न-कुछ बताता।'

'जा क्यों रहे हैं? कोई औरत है?'

'हाँ, एक औरत है। इत्तफाक से ही मुलाकात हो गई थी... लेकिन मैं उसकी बात नहीं कर रहा था।'

'लेकिन इस सारे घिनौनेपन का आप पर क्या कोई असर नहीं होता? क्या आपमें इस सिलसिले को रोकने की काबिलियत नहीं रही?'

'तुम काबिलियत की बात कर रहे हो? हा-हा! मानना पड़ेगा, दोस्त, कि तुमने मुझे हैरत में डाल दिया, हालाँकि मैं पहले से जानता था कि ऐसा ही होगा। तुम मुझसे बदकारी और जिंदगी की खूबसूरती की बातें कर रहे हो! तुम शिलर हो... आदर्शवादी हो! खैर, यह सब कुछ वैसा ही है जैसा कि होना चाहिए। ताज्जुब तो तब होता जब ऐसा न होता। फिर भी जब जिंदगी में इस तरह की किसी चीज से पाला पड़ता है तो ताज्जुब होता है... अफसोस है कि मेरे पास बहुत थोड़ा वक्त है, जबकि तुम बहुत ही दिलचस्प आदमी हो! अच्छा, यह बताओ, शिलर तुम्हें पसंद है क्या? मुझे तो बेपनाह पसंद है।'

'हे भगवान, आप भी किस कदर शेखीबाज हैं!' रस्कोलनिकोव ने कुछ बेजारी से कहा।

'नहीं दोस्त,' स्विद्रिगाइलोव ने हँसते हुए जवाब दिया। 'लेकिन मैं बहस नहीं करूँगा। शेखीबाज शायद मैं हूँ। अगर किसी को कोई नुकसान न हो तो थोड़ी-सी शेखीबाजी में हर्ज क्या है? देखो, मैंने अपनी बीवी के साथ सात साल देहात में बिताए हैं। इसलिए अब जबकि मेरी मुलाकात तुम्हारे जैसे होशियार, समझदार और बेहद दिलचस्प आदमी से हुई है, तो मुझे बातचीत करके खुशी हो रही है। अलावा इसके, मैंने आधा गिलास शराब भी पी रखी है, और मुझे लगता है वह मुझे कुछ चढ़ भी गई है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि एक ऐसी बात हुई है जिसने मेरे अंदर काफी जोश भर दिया है, लेकिन जिसके बारे में मैं... एक शब्द भी नहीं कहूँगा। तुम चले कहाँ?' स्विद्रिगाइलोव ने अचानक घबरा कर पूछा।

रस्कोलनिकोव उठने ही वाला था। वह न जाने क्यों उदास हो गया था। उसका दम घुट रहा था और वह कुछ अटपटा-सा महूसस कर रहा था। मन-ही-मन वह पूछ रहा था कि वह यहाँ आया ही क्यों। अब उसे पक्का यकीन हो चुका था कि स्विद्रिगाइलोव दुनिया का सबसे निकम्मा और सबसे बेकार, दुष्ट आदमी था।

'ऐ भले आदमी, भगवान के लिए बैठ भी जाओ! कुछ देर तो और ठहरो,' स्विद्रिगाइलोव ने गिड़गिड़ा कर कहा। 'मुझे कम-से-कम चाय पिलाने का मौका तो दो। थोड़ी देर और बैठो मेरे साथ, और मैं कोई बकवास नहीं करूँगा... मेरा मतलब है अपने बारे में। मैं तुम्हें कुछ और बातें बताऊँगा। चाहो तो मैं तुम्हें यह बताऊँ कि किस तरह एक औरत ने, तुम्हारे शब्दों में, मुझे 'बचाने' की कोशिश की थी... यही सचमुच तुम्हारे पहले सवाल का जवाब होगा क्योंकि वह औरत तुम्हारी बहन थी। तुम्हें बताऊँ वह बात? इससे वक्त काटने में भी मदद मिलेगी।'

'अच्छी बात है, लेकिन उम्मीद है कि आप...'

'अरे, तुम परेशान मत हो! मेरे जैसे गंदे और खोखले इनसान के दिल में भी अव्दोत्या रोमानोव्ना के लिए भरपूर गहरी इज्जत के अलावा और कोई जज्बा नहीं हो सकता।'

4

'शायद तुम्हें पता हो (मैंने तो तुम्हें खुद ही बताया था!),' स्विद्रिगाइलोव ने कहना शुरू किया, 'कि मुझे यहाँ कर्ज न चुकाने पर जेल भेज दिया गया था। मेरे ऊपर बहुत बड़ा कर्ज था पर उसे चुकाने के न तो साधन थे न इसकी कोई उम्मीद थी। शायद विस्तार से यह बताना मेरे लिए जरूरी नहीं कि मेरी बीवी ने किस तरह मेरा कर्ज चुका कर मुझे छुटकारा दिलाया था। तुम्हें मालूम है क्या कि औरत कभी-कभी मुहब्बत में कितनी पागल हो जाती है वह बहुत ईमानदार औरत थी और कुछ खास नासमझ भी नहीं थी (हालाँकि वह पढ़ी-लिखी हरगिज नहीं थी।) अब जरा सोचो : इस ईमानदार और ईर्ष्यालु औरत ने रोने-धोने और कहा-सुनी की कई भयानक वारदातों के बाद मुझ पर एक बड़ा एहसान करके मेरे साथ एक तरह का करार कर लिया, जिसे उसने हमारे विवाहित जीवन में हमेशा निभाया। मुसीबत यह थी कि वह उम्र में मुझसे बहुत बड़ी थी। अलावा इसके हर वक्त वह लौंग चबाती रहती थी। पर मैं भी कुछ हद तक पाजी था और मैंने उससे साफ-साफ कह दिया कि मैं उसके साथ पूरी वफादारी नहीं बरत सकता। इस बात को मेरे मान लेने पर वह आग-बगूला हो उठी। लेकिन लगता है, मेरा दो-टूक बात कह देना उसे एक तरह से अच्छा ही लगा, क्योंकि उसने सोचा कि मैंने उसे पहले से ही आगाह कर दिया था और इसका मतलब यह था कि मैं उसे धोखा नहीं देना चाहता था। ईर्ष्यालु औरत के लिए सबसे बड़ी बात यही होती है। आँसुओं की नदियाँ बहाने के बाद हमने आपस में एक अनकहा समझौता कर लिया - पहली बात यह कि मैं कभी उसे छोड़ कर नहीं जाऊँगा और हमेशा उसका शौहर रहूँगा। दूसरे, मैं उसकी इजाजत के बिना कभी कहीं नहीं जाऊँगा। तीसरे, मैं हमेशा के लिए कभी कोई रखैल नहीं रखूँगा। चौथे, इसके बदले में मेरी बीवी कभी इस बात पर एतराज नहीं करेगी कि मैं कभी-कभार अपनी किसी नौकरानी के साथ कोई चक्कर पाल लूँ, लेकिन इस तरह कभी नहीं कि मेरी बीवी को अंदर-ही-अंदर उसका पता न हो। पाँचवें किसी भी हालत में मैं अपने वर्ग की किसी औरत के चक्कर में नहीं पड़ूँगा। छठे, भगवान न करे, अगर कभी मुझे किसी से बहुत गहरा प्यार हो जाए तो मुझे अपनी बीवी को बताना होगा लेकिन इस आखिरी शर्त के बारे में मेरी बीवी को कभी कोई खास चिंता नहीं हुई। वह समझदार औरत थी और इसलिए मुझे ऐसे ऐयाश और बदलचलन के अलावा कुछ और समझ ही नहीं सकती थी, जो किसी से संजीदगी से प्यार नहीं कर सकता था। लेकिन समझदार औरत और ईर्ष्यालु औरत दो अलग-अलग चीजें होती हैं, और सारी मुसीबत यही थी। मगर कुछ लोगों के बारे में एक निष्पक्ष राय कायम करने के लिए सबसे जरूरी यह होता है कि हम अपने चारों ओर की परिस्थितियों और अपने चारों ओर के लोगों के बारे में अपने पहले से कायम किए गए विचारों को और उनकी तरफ अपने आम रवैए को छोड़ें। मैं समझता हूँ, मैं दूसरे किसी भी आदमी के मुकाबले तुम्हारे फैसले पर कहीं ज्यादा भरोसा कर सकता हूँ। तुमने मेरी बीवी के बारे में बहुत से दिलचस्प और बेतुके किस्से सुने होंगे। यह सच है कि उसकी कुछ आदतें बेतुकी थीं, लेकिन मैं तुमसे साफ-साफ कहता हूँ कि मेरी वजह से उसे कई बार जो बहुत गहरी निराशा हुई, उसका मुझे बहुत ही अफसोस है। खैर, मैं समझता हूँ कि एक बेहद