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कहानी

मैंनू लै चले बाबुला लै चले वे
ख़दीजा मस्तूर

अनुवाद - शम्भु यादव


पतली-सी नाली में पानी की धार रेंग रही थी और साबुन का फूला-फूला झाग पानी पर गिलाफ की तरह चढ़ा हुआ मालूम हो रहा था। वह अभी-अभी अंधेरे गुसलखाने से नहाकर निकला था और तौलिया से बाल खुश्क करता हुआ सहन में पड़ी आरामकुर्सी को धूप में घसीटकर सर्दी से अकड़ते हुए जिस्म को जरा गर्म करने के लिए बैठ गया था। तौलिया से बालों को रगड़ते हुए उसकी नजर नाली पर पड़ी। गन्दी कीचड़ भरी नाली में पानी रुक-रुककर बह रहा था . उसे अचानक वह वाकया याद आ गया जिसने उसके अत्यन्त भावुक मन-मस्तिष्क पर बुरी तरह असर किया था। कई दिन तक उसकी यह हालत रही थी जैसे वह इस घटना के अलावा कुछ सोच ही न सकता। फिर आहिस्ता-आहिस्ता वह सब-कुछ भूलता गया। लेकिन आज बहुत दिन बाद साबुन के झाग के साथ बहती हुई पानी की धार ने उसके मन में इस घटना की याद पूरी तेजी से उभार दी। उसके दिल की गहराइयों में अनगिनत आहें घुटने लगीं। उस वक्त उसकी हालत कुछ उस दिन जैसी होने लगी जब वह उसी घटना से दो-चार हुआ था। हालांकि इसके पहले ऐसे-ऐसे दर्दनाक दृश्य देखे थे कि पत्थर भी पिघलकर रह जाता। लेकिन कभी वह इस तक प्रभावित नहीं हुआ था।

शहर की गहमा-गहमी को मौत ने निगल लिया था, जिन्दगी कोनों-खदरों में मुंह छुपाये सिसक रही थी। वीरान कहती थी कि अब कभी आबाद न होंगे। मौत कहती थी कि मेरे चंगुल से अब कोई भी बच न सकेगा। मगर सहायता समिति के दर्दमन्द दिल कहते थे कि जिन्दगी इतनी सस्ती नहीं कि हम इन्हें कीड़े-मकोड़ों की तरह मौत के जाल में फंस जाने देंगे। वे जहां-जहां जा सकते थे, जहां-जहां पहुंच सकते थे, रोती-सिसकती मायूस जिन्दगियों को ढूंढ-ढ़ूंढक़र, चुन-चुनकर शरणार्थियों के कैम्प में पहुंचा रहे थे। उस दिन भी वे सारा दिन लारी पर सुनसान शहर की कोने-कोने का चक्कर लगाकर पचास दंगाग्रस्त इनसानों को कैम्प में पहुंचाकर सुरक्षित कर चुका था और सारे दिन का थका-हारा पुलिस-चौकी पर लारी से उतरकर घर जाने के लिए पैदल चल रहा था। शाम के पांच बज रहे होंगे। वह जल्द-से-जल्द घर पहुंचकर आराम करने के लिए तेंज-तेंज कदम उठा रहा था कि एकदम उसके पांव रुक गये। सड़क के किनारे बारह-तेरह आदमी खड़े झुक-झुककर नाली में न जाने क्या देख रहे थे। वह उन सबके पास जाकर खड़ा हो गया। बिल्डिंग के सदर दरवांजे में बड़ा-सा ताला पड़ा हुआ था। वे सब उसे तोड़ने के बारे में सोच रहे थे।

'हम लोगों ने आज तीन दिन हुए इस घर के बच्चे-बच्चे को पार लगा दिया पर यह कैसे बचा रहा?' सुर्ख आंखों और भयानक चेहरेवाला आदमी छुरा लहरानेलगा।

'फिर तोड़ दो न ताला जी!' दूसरे ने जमीन पर लटकते हुए कमरबन्द से अपना उलझता हुआ पांव निकाल कर कहा। 'लेकिन सोचो तो ताला पड़ा है। भला घर में कौन होगा?'उसने लोगों को समझाना चाहा।

'कोई न होगा तो क्या जादू का खेल हो रहा है?' तीसरा सुर्ख-सुर्ख आंखें निकालकर नाली की तरफ इशारा करने लगाचौड़ी उथली नाली में बिल्डिंग से आता हुआ साबुन का झाग मिला पानी कीचड़ में रेंग रहा था।

'मालूम होता है कोई गुसल फरमाया गया है।' चौथा अपनी कमींज से छुरा सांफ करने लगा और वह क्षण भर के लिए सोच में पड़ गया कि अब क्या करे। उस वक्त वह सिपाहियों को बहुत दूर पुलिस-चौकी पर छोड़कर आ रहा था और पुलिस का कहीं दूर-दूर पता न था।

'ताला तोड़ दो जी !' कई आवांजें एक साथ भिनभिनायीं।

'लेकिन देखो न इनसानियत का तो यह तकाजा है' वह बदले के जोश से खुले हुए दांगों पर इनसानियत के तकाजों के छींटे देना चाहता था। लेकिन उसकी बात बीच ही में झपट ली गयी।

'जब हमारी मांओं, बहनों और हमारे भाइयों को खून में नहलाया जा रहा था, और तब आप कहाँ थे? कई आदमियों ने एक सवाल कर दिया।

'अपनी इनसानियत के साथ रहे होंगे।' भयानक सूरत और सुर्ख आँखोंवाले ने शैतानी कहकहा लगाया।

'लेकिन देखो न।' उसके दोनों हाथ बुलन्द होकर झुक गये।

'ताला तोड़ा जाएगा। आप क्यों मना कर रहे है?' लोग उसे ऐसी नंजरों से देखने लगे जैसे वह उनमें से एक नहीं।

'मैं मना नहीं करता। ताला जरूर तोड़ दो।' उसने बेबसी से कहा। वह जानता था कि उस वंक्त उसकी बात कोई भी न सुनेगा और अगर ज्यादा विरोध किया तो उसे भी चीर-फाड़कर फेंक देंगे। ताले को थोड़ी ही देर में कुंडे से अलग कर दिया गया और वे सब अन्दर दाखिल हो गये। वह सबके पीछे था। और जैसे उसकी रूह धड़क-धड़ककर रो रही थी वह छुपे हुए इनसान की जान बचाने के लिंए तेजी से सोचने लगा। और अचानक उसके दिमांग ने जान बचाने की एक मामूली-सी तरकीब सोच ही ली।

'देखों यूं अन्धा धुन्ध आगे मत बढ़ो। सम्भव है उसके पास बन्दूक हो। मेरे पास राइफल है मैं आगे चलता हूं। तुम सब दबे कदमों मेरे पीछे चलो।' उसने आहिस्ता से कहा। सब उसका कहा मानकर उसके पीछे हो लिए। वह आहिस्ता-आहिस्ता सीढ़ियां तय करने लगा एक-दो-तीन सीढ़ियां जैसे न खत्म होने वाली कड़ी हो गयी थीं। वह सारा दिन काम करने के कारण बहुत थका हुआ था। उसका जिस्म और मन-मस्तिष्क सभी निढाल हो गये थे। लेकिन उस वक्त वह जरा भी थकान न महसूस कर रहा था। वह सबसे आगे था और बराबर सोच रहा था कि जब पहले उस ऊंची बिल्डिंग में कत्ल-खून का बांजार गर्म कर लिया गया था। एक को भी अपने हिसाब से छोड़ा न था। फिर भी वह छुपकर अपनी जान बचा गया। इस वक्त भी वह जैसे ही नंजर आएगा, उसे छुप जाने का इशारा कर देगा। उसे बता देगा कि मौत उससे चन्द कदम के फासले पर लपकी चली आ रही है। निश्चय ही उस घर में ऐसी जगह जरूर होगी जिसमें वह पहले की तरह छुप सकता है।

पहली मंजिल दूसरी तीसरी हर मंजिल के एक-एक कोने को छान मारा। हर कमरे में वह सबसे पहले दांखिल होता था। वहां खामोशी और वीरानी के सिवाय कुछ न था। ऐसा लगता था कि उल्लुओं का राज है। लेकिन जब चौथी मंजिल पर जाने के लिए कदम उठ रहे थे तो न जाने क्यों उसका दिल फड़क-फड़ककर दुआएं कर रहा था कि वहां भी कोई न हो। वहां भी उल्लुओं का राज हो।वह इनसानी तराश-खराश के ऐसे नमूने देख चुका था कि अब अपने में कोई और नमूना देखने की शक्ति न पाता था।उसके कदम तेंज हो गये थे। उसने पीछे दबे-दबे कदमों आनेवालों को कई गज पीछे छोड़ दिया था और जब सीढ़ियां खत्म होते ही सबसे पहले कमरे मे दांखिल हुआ तो जैसे सहमकर रह गया। नीले साफ-सुथरे लिबास में सजी एक बूटे से कद की खूबसूरत लड़की उसके सामने जमीन पर बैठी थी। उसकी नाक सुर्ख थी। पपोटे सुर्ख और फूले हुए। आंखें मुंदी-मुंदी और जिस्म निढाल। उसके बाल खुले हुए थे और हाथ में कन्घा थामे सामने रखे आईने में अधखुली आंखों से देख रही थी। उसके पास ही जमीन पर साबुनदानी, तौलिया, क्लिप और बालपिनें पड़ी हुई थीं। उसे अपनी आंखों पर यकीन न आ रहा था कि उसके सामने कोई जीता-जागता इनसान है। कोई खूबसूरत रूह है। वह कोई परी है। लेकिन जब लड़की ने अपनी बोझिल आंखें उठाकर उसे देखा और उसके हाथ से कन्घा छूटकर जमीन पर गिर गया तो उसके जीते-जागते अस्तित्व का अहसास हुआ। और फिर उसे बचाने के लिए उसकी रूह फड़की। उसने उसे छुप जाने के लिए इशारा किया। आहिस्ता से उसे बताया कि लोग पीछे आ रहे हैं। मगर लड़की जैसे अपनी जगह पर जमकर रह गयी थी। उसे हल्की-सी जुम्बिश भी न हुई। लड़की ने बस एक बार उसे बेबसी से देखा और नंजरें झुका लीं। सब लोग कमरे में घुस आये। उनके लहराते हुए छुरे नीचे झुक गये। वे सब शैतानी हंसी हंसने लगे।

'पहाड़ खोदा था तो चुहिया निकली।' सुर्ख आंखोंवाला लड़की की तरफ बढ़ा और उसे महसूस हुआ कि जोर से भूचाल आ गया। लड़की का चेहरा एकदम सफेद हो रहा था।'रहम करो। इसे मत छूना।' वह लड़की और सुर्ख आंखों वाले के बीच आकर पागलों की तरह चीखने लगा।

'अरे तो क्या बदन मैला हो जाएगा। मेहनत करे बी फाख्ता कव्वे मेवे खाएं। अजी अपनी राह लगिए।' एक ने कहा और सब फिर हंसने लगे। दो आदमियों ने धक्के देकर उसे लड़की के पास से हटा दिया।

'नहीं, नहीं'वह फिर लड़की के सामने आ जाना चाहता थाकि सुर्ख आंखों वाले ने अपना छुरा उसके सीने पर रख दिया फिर एक ने लड़की को उठाकर भेड़ की तरह कन्धे पर डाल लिया। लड़की के मुंह से कोई आवांज न निकली। उसने कोई विरोध न किया। लेकिन जब वे लड़की को लेकर जाने लगे तो उसने अपनी लटकती हुई बांहें उसकी तरफ फैली दीं। उसका जी चाहा कि काश उस वक्त तो सचमुच वह छुरा उसके सीने के पार हो जाता। वह बेचैन होकर उसकी तरफ बढ़ा मगर उसे धक्का देकर पीछे हटा दिया गया। और सुर्ख आंखोंवाले ने आगे बढ़कर लड़की की फैली हुई बांहें अपने गले में डाल लीं। लड़की की आंखें जैसे बेहद दर्द से बन्द हो गयीं।

फिर आन की आन में कमरा खाली था। पहले से ज्यादा वीरान और खामोश। वे सब जा चुके थे और वही उसी जगह जमीन पर बैठा था जहां लड़की जरा देर पहले कन्घी कर रही थी। वह फैली हुई बांहों का सहारा न बन सका था। वह बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने लगा। उसके सीने में कोई जिद्दी-सी भावना मचल-मचलकर उसे रुला रही थी। उसने जाने कितनी जवान औरतों को अगवा होते देखा। उनकी चीखें, उनकी फरियादें सुनी थीं। मगर इस तरह कोई भी तो उसके दिल पर असर न कर सकी थीं। मगर यह गुमसुम-सी लड़की सिर्फ बांहे फैलाकर उसे किस कदर प्रभावित कर गयी थी। उसके दिल जैसे नांजुक गोश्त में भरपूर चुटकी ले गयी थी।

जब वह जी भरकर रो चुका तो उसने कदमों से रौंदी हुई बाल-पिनों और क्लिपों को समेटकर एक तरफ रख दिया। उन्हें देखता रहा, उन्हें छूता रहा और हल्की-सी गीली तौलिया को उठाकर सहलाता रहा और फिर उस बिस्तर को देखने लगा जिस पर इस कदर सिलवटें पड़ी हुई थीं कि जैसे उस पर लगातार कई दिन तक कोई पड़ा करवटें बदलता रहा हो, पांव रगड़ता रहा हो। वह सोचने लगा कि इस खूबसूरत और अजीब लड़की ने तीन दिन तीन रातें इस बिस्तर पर तड़प-तड़पकर गुजारी हैं। और फिर वह उठकर आहिस्ता-आहिस्ता बिस्तर की सिलवटें ठीक करने लगा। तकिये पर जगह-जगह आंसुओं के बड़े-बड़े धब्बे पडे हुए थे। तीन दिन, लगातार तीन दिन तक वह रोती रही और फिर उसने थकन से निढाल होकर मुंह धोया था। ताकि उसमें फिर रोने की हिम्मत पैदा हो जाए और फिर वह अपने बाल संवारने बैठ गयी थी। लेकिन बाल क्यों संवार रही थी। उसने साबुन से मुंह क्यों धोया अगर थक गयी थी तो मुंह पर यूं ही पानी के छीटे भी तो दे सकती थी? मगर उसने तो बाकायदा साबुन से मुंह धोया था और चाव से शृंगार कर रही थीशहर में सन्नाटा था। उसकी बिल्डिंग में सन्नाटा था। मौत सबको निगल गयी थी। पूरी बिल्डिंग में भयानक वीरानी छायी हुई थी। ंजिन्दगी का आसपास तो क्या दूर-दूर तक पता न था और वह शृंगार कर रही थी!

इस एकान्त खामोश कमरे में लगातार तीन दिन रो चुकने के बाद शृंगार कर रही थी। थकन से निढाल और चूर, आखिर वह किसके लिए शृंगार कर रही थी? क्यों वह कौन-सी भावना थी? कितनी अजीब, कितनी हसीन लड़की !और जब उसे उठाकर ले गये तो वह चुपचाप चली गयी। फिर उसके मन-मस्तिष्क को दो फैली हुई बांहों ने जकड़ लिया। काश! वह उस थकी-थकी निढाल लड़की का सिर अपनी गोद में रख सकता। उसके सुर्ख फूले हुए पपोटों को सहला सकता। वह उसके लिए वह सब-कुछ कर सकता जो वह चाहती थी। और फिर कुछ न कर सकने की भावना ने उसे बेचैन कर दिया। उसने सिरहाने से तकिया उठाकर अपनी गोद में रख लिया। तकिये के नीचे एक कांगंज पड़ा था। मैला, पुराना, गला हुआ। वह उसे खोलकर पढ़ने लगा : 'मेरी जान!...' वह पूरा खत जल्दी-जल्दी पढ़ गया। लेकिन आंखिर में जब वह पढ़ रहा था'मैं तुमसे जल्दी आकर मिलने वाला हूं । मैं तुम्हें देखने के लिए बेहद बेचैन हूं। इतना बेचैन कि मेरी राह में कोई बड़े से बड़ा तूफान भी आकर खड़ा हो जाएे तो वह मुझे तुम तक पहुंचने से न रोक सकेगा। मैं तुम्हारे पास, सीधा तुम्हारे कमरे में पहंचूंगा। जहां तुम बनी-संवरी बैठी मेरी राह देख रही होगी और...' हाथ कांपे। खत छूटकर जमीन पर गिर गया।

नीचे अचानक शोर होने लगा। धमाधम तेज आवांजें आने लगीं। शायद निकट की किसी बिल्डिंग का सामान लूटा जा रहा था। उसने बाल-पिनें और क्लिप उठाकर जेब में डाल लिये और लड़खड़ाते हुए कदमों से सीढ़ियां तय करके चुपचाप घर की तरफ चल पड़ा।

सोचते-सोचते उसने एक बार फिर नाली की तरफ देखा। पानी बह चुका था और साबुन का झाग बुझकर खत्म हो चुका था।


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