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अशरफी
अजित वडनेरकर


बादशाहों-सुल्तानों के किस्से-कहानियों में अक्सर अशरफी का उल्लेख होता रहा है। यह सोने की एक मुद्रा थी जो सुदूर मिस्र से लेकर भारत तक मशहूर थी।पुराने जमाने में बादशाह जब किसी पर कृपालु होते तो उसे अशरफियों की थैली भेंट देते थे। किस्सा यह भी है कि कई बार दरबारी शायरों और कवियों को हर पंक्ति पर एक-एक अशरफी इनाम में मिलती थी।

अशरफी चाहे किस्सों में बेहद मशहूर रही हो, मगर अर्थव्यवस्था में यह मुद्रा कभी टिकाऊ नहीं रही औरदिनार का ही सिक्का जमा रहा। अशरफी के तौर पर अपनी पहचान बनानेवाली इस प्रसिद्ध स्वर्णमुद्रा का यह नाम दरअसल मिस्र के एक प्रसिद्ध सुल्तान के नाम पर पड़ा। अल-अशरफ अद-दीन बर्सबी (1422 -1438) इतिहास में कई प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना जाता है। मौद्रिक सुधार के तहत उसने तब प्रचलित स्वर्ण मुद्रा दिनार की जगह एक नई मुद्रा चलाई जो 3.3 ग्राम वजन की थी। अशरफी मूलतः दिनार ही थी, फर्क सिर्फ उसके आकार और वजन का था। उन दिनों प्रचलित दिनार का वजन 4.25 ग्राम होता था। अशरफी का सही नाम दरअसल अशरफी दिनार ही था।

अशरफी के जन्म के पीछे अरबी जबान का अशरफ शब्द है। अशरफ का अर्थ होता है भद्र, सज्जन, शिष्ट अथवा आदर्श। सेमेटिक भाषा परिवार के इस शब्द के आगे-पीछे और भी कई शब्द हैं जो अरबी, फारसी, उर्दू-हिन्दी में प्रचलित हैं। अशरफ बना है शरफ से जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठता, उच्चता,कुलीनता आदि। सज्जन अथवा कुलीन के अर्थ में शरीफ जैसा शब्द, जो बोलचाल की हिन्दी में खूब रचा-बसा है, इससे ही बना है। शराफतशब्द सभ्यता, कुलीनता, भद्रता के अर्थ में प्रचलित है। अशरफ का शुद्ध रूप अश्रफ है। इस तरह अशरफी हुआ अश्रफी, मगर ये दोनों ही रूप हिन्दी को अमान्य हैं। मुशर्रफ भी इसी कड़ी का शब्द है जिसका मतलब होता है सम्मानित, सरल, कुलीन। वैसे अशरफ शब्द फारसी मूल का भी बताया जाता है और अवेस्ता के अशर से भी इसकी व्युत्पत्ति कही जाती है जिसका अर्थ होता है परमशुद्ध या सात्विक। गौरतलब है कि अशरफी ने चाहे दिनार की जगह नई मुद्रा के रूप में जन्म लिया हो, मगर वह ज्यादा दिनों तक बाजार को गर्म नहीं रख पाई। अलबत्ता कहानियों के खजाने में आज भी अशरफी की खनक मौजूद है। शरफ से बनेअशरफ और मुशर्रफ तो व्यक्तिनाम के तौर पर प्रचलित हैं ही, मजे की बात यह भी कि अशरफ से बनी अशरफी भी भारत-पाकिस्तान में अशर्फीलाल बनकर चल रही है।

 

दिनार

अब बात दिनार की। ईसापूर्व 45 से लेकर ईसा के बाद चौथी-पाँचवीं सदी तक रोमन साम्राज्य से भी भारत के कारोबारी रिश्ते रहे। भारत के पश्चिमी समुद्र तट के जरिए यह कारोबार चलता रहा। भारतीय माल के बदले रोमन अपनी स्वर्ण मुद्रा दिनारियस में भुगतान करते थे। ये व्यापारिक रिश्ते इतने फले-फूले कि दिनारियस लेन-देन के माध्यम के रूप में बरसों तक दिनार के तौर पर डटी रही। कनिष्क के जमाने (98ई.) का एक उल्लेख गौरतलब है- 'भारतवर्ष हर साल रोम से साढ़े पाँच करोड़ का सोना खींच लेता है।' जाहिर है यह उल्लेख रोमन स्वर्णमुद्रादिनारियस का ही है। रोम में तब भारतीय मसालों और मलमल की बेहद माँग थी। ग्रीको-रोमन दिनार यूँ तो स्वर्णमुद्रा थी मगर उसमें पच्चीस फीसदी चाँदी भी होती थी। भारत से गायब होने के बावजूद यह आज भी हिन्दी के शब्दकोशों में संस्कृत शब्ददीनार के रूप में स्वर्णमुद्रा के अर्थ में डटी हुई है। आप्टे के संस्कृत कोश में भी यह दीनार के रूप में मौजूद है। इसका उल्लेख सिक्के के साथ-साथ आभूषण के तौर पर भी हुआ है।उर्दू-फारसी शब्दकोश में इसे फारसी शब्द बताया गया है।

दिनार आज भी दुनिया के कई मुल्कों की प्रमुख मुद्रा है। ज्यादातर अरबी मुल्कों में यही चलती है। दिलचस्प ये कि किसी जमाने की स्वर्णमुद्रा आज सिर्फ कागजी मुद्रा बन कर रह गई है।एशियाई मुल्कों के अलावा कुछ यूरोपीय देशों जैसे यूगोस्लाविया, अल्बानिया, सर्बिया आदि में भी दिनार का चलन है। आखिर क्यों न हो, दिनार की जन्मभूमि तो यही है। 


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