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कोश

अहिंसा - विश्वकोश

संपादन - नंदकिशोर आचार्य

अनुक्रम

अनुक्रम अहिंसा - विश्वकोश खंड 1     आगे

अहिंसा-विश्वकोश

परामर्श

 

डी. आर० मेहता                     भँवरलाल जैन

डॉ. मुकुन्द लाठ                     महोपाध्याय विनय सागर

डॉ. कुसुम जैन                      कन्हैयालाल लोढ़ा

डॉ. एल० के० कोठारी                 डॉ० सुषमा सिंघवी

मुश्ताक अहमद राकेश                सुरेन्द्र बोथरा

डॉ. अंजु ढढ्ढा मिश्र                  रूडी यांस्मा

शीन काफ निजाम                   अनुपम मिश्र

 

 

 

 

 

समस्त अहिंसाचारियों

एवं

अहिंसक भविष्य को समर्पित

 

प्रकाशक :

डी० आर० मेहता
संस्थापक एवं मुख्य संरक्षक
प्राकृत भारती अकादमी
13-ए, गुरुनानक पथ,
मेन मालवीय नगर,
जयपुर-302017
फोन : 0141-2524827
भँवरलाल जैन, अध्यक्ष
भँवरलाल-कांताबाई जैन मल्टीपर्पज फाउंडेशन, जलगाँव
प्रथम संस्करण : 2010
मूल्य : 1500/-

 

 

 

 

प्रकाशकीय

प्राकृत भारती अकादमी व भंवरलाल-कांताबाई जैन-मल्टीपर्पज फाउंडेशन द्वारा अहिंसा का यह प्रथम विश्वकोश प्रस्तुत करते हुए हम विनम्र गौरव का अनुभव कर रहे हैं। अहिंसा-विश्वकोश के नाम से प्रकाशित कुछ अन्य ग्रंथ वस्तुतः, विश्वकोश न होकर अहिंसा संबंधी लेखों का संकलन हो जाते हैं, जिनमें कोश की शैली-संरचना का निर्वाह नहीं किया जाता। इस दृष्टि से वर्तमान विश्व-कोश भिन्न व प्रामाणिक है।

यह विश्व-कोश अहिंसा की अवधारणा को एक व्यापक धरातल पर स्थापित करने का प्रयत्न करता है। इसमें विभिन्न धर्मों और दर्शनों में विकसित अहिंसा के सिद्धांत तो हैं ही, रोचक बात यह है कि यह कोश अहिंसा के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत करता है। इस कोश की विशेषता यह है कि इसमें अहिंसा को एक बहुआयामी और अंतरानुशासनात्मक परिप्रेक्ष्य में देखा गया है। उदाहरणार्थ, अर्थशास्त्र और पर्यावरण के सवालों पर अहिंसा के परिप्रेक्ष्य में प्रविष्टियां शामिल की गई हैं। उसके मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व वैज्ञानिक पक्षों को भी समाहित किया गया है। इसलिए, यह स्वरग्राम व्यापक और वैविध्यपूर्ण है।

धार्मिक परिप्रेक्ष्य के अतिरिक्त सभी जीवन-रूपों में एकत्व के तार का बोध इस कोश की केंद्रीय विषय वस्तु है, जो अहिंसा की समझ को और गहरा करती है तथा उसे अधिक ग्राह्य बनाती है।

इस ग्रंथ में अहिंसा को मूलतः एक जीवन-मूल्य के रूप में प्रस्तुत किया है।

अहिंसा का दर्शन और व्यवहार आज की चरम आवश्यकता है। निश्चय ही, आज इसकी प्रासंगिकता पूर्वकालों से अधिक है। वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सभी स्तरों पर घृणा और कलह जब व्याप्त हैं, तब समरसता के लिए और मानव सहित सभी जीवन-रूपों के अस्तित्व के लिए एक शांतिदायक और शमनकारी दृष्टिकोण की अतीव आवश्यकता है। साथ ही, इस ग्रह को लालच, शोषण और अतिरेकपूर्ण दोहन से बचाने की दृष्टि से अहिंसा एक वैकल्पिक स्थायी आर्थिक प्रतिरूप प्रदान करती है। अहिंसा की एक और मुख्य भूमिका पर्यावरण को और अधिक विकृति और विनाश से बचाने की है। अहिंसा से पल्लवित अंतर्वैयक्तिक संबंध और संप्रेषण जीवन में सौहार्द और गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। यह भी ध्यातव्य है, जैसा कई प्रविष्टियां बताती हैं, कि पिछली कई शताब्दियों में जो विज्ञान मानव-हत्या के नए-नए उपकरण आविष्कृत कर वैयक्तिक से वैश्विक स्तरों पर हिंसा को बढ़ाता गया है, वही अब अहिंसा का सर्वाधिक सबल अवधारणात्मक समर्थक होकर उभर रहा है।

इस अहिंसा-कोश को बड़ी संख्या में प्रतिष्ठित विद्वानों और वैज्ञानिकों ने अपनी प्रविष्टियों से समृद्ध किया है। हम इन सभी लेखकों के अत्यंत आभारी हैं।

वस्तुतः, इस कोश के संपादक प्रो० नंदकिशोर आचार्य के बहुश्रुत पांडित्य, प्रतिबद्धता और श्रम की वजह से ही यह महती कार्य इतनी द्रुत गति से संपन्न होना संभव हो सका है। वे अहिंसा-शास्त्र के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विद्वान हैं। उनके इस विशाल कार्य के लिए धन्यवाद करने के लिए हमारे पास पर्याप्त शब्द नहीं हैं।

भंवरलाल-कांताबाई-जैन-मल्टीपर्पज-फाउंडेशन, जलगांव के न्यासीगण श्री अशोक जैन, श्रीमती ज्योति जैन, श्री अनिल जैन, श्रीमती निशा जैन, श्री अजित जैन, श्रीमती शोभना जैन और श्री अतुल जैन, श्रीमती भावना जैन के प्रति उनके उदार सहयोग के लिए आभार!

भंवरलाल - कांताबाई - जैन - मल्टीपर्पज
फाउंडेशन , जलगांव
भंवरलाल जैन, अध्यक्ष
प्राकृत भारती अकादमी , जयपुर
डी० आर० मेहता
संस्थापक एवं मुख्य संरक्षक
संजय कानोडिया
अध्यक्ष

 

 

पुरोवाक्

जीवन का नियम है अहिंसा

संस्कृति मूल्यान्वेषण और मूल्यानुभूति की निरंतर गत्यात्मक प्रक्रिया है। मनुष्य और जीवन के अन्य रूपों में यह बुनियादी भेद है कि जहां अन्य रूपों में मूल्य-चेतना की अनुपस्थिति दिखाई देती है, वहीं मनुष्य रूप में जीवन आत्मचेतन स्वरूप ग्रहण कर लेने के कारण अपने को जानना-समझना ही नहीं, अपनी विकास-प्रक्रिया का नियंता होना या कम-से-कम उसमें संकल्पपूर्वक सहभागिता करना चाहता है। इसी अर्थ में मनुष्य अनिवार्यतः सृजनात्मक होता है। प्रत्येक सृजन मूलतः आत्मसृजन है। जीवन की सृजनात्मकता ही परम या साध्य मूल्य है। लेकिन, इस सृजनात्मकता का प्रकाशन देश-काल से प्रतिविशिष्ट होने के कारण हम सामान्यतया संस्कृति को देशकाल बद्ध रूप में ही देखते-समझते और उसकी तत्प्रसूत भिन्नता को ही अधिक महत्त्व देने लगते हैं। सभी अस्मितावादी विमर्शों की आत्यंतिक आग्रहशीलता और तत्प्रसूत मूलगामी कट्टरतावाद इसी प्रवृत्ति का अतिवादी अवतार है। जिस तरह प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्ट आकृति और स्वभाव के बावजूद मूलतः मनुष्य है, उसी प्रकार सांस्कृतिक प्रक्रिया भी देशकालगत भिन्नता के बावजूद मूलतः मानव-संस्कृति है। इसीलिए जहां हम एक ओर संस्कृति के देशकालबद्ध स्वरूप को समझना चाहते हैं, वहीं, साथ ही, एक सार्वभौम और सर्वकालिक मानव-संस्कृति के अस्तित्व से भी इनकार नहीं कर सकते। जीवन का आत्मचेतन मनुष्य-रूप में विकास जहां एक विशिष्ट देश-प्रदेश से सापेक्ष है, वहीं वह संपूर्ण पृथ्वी-मंडल और सौर-मंडल में अपनी अव`िस्थ्ाित से भी सापेक्ष है। इसलिए, जैसे एक देश-प्रदेश में बद्ध मानव-समूह एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखा जा सकता है, वहीं पृथ्वी-मंडल पर उपस्थित समस्त मानव-समूह ही नहीं, जीवन-मात्र तथा उसकी पृष्ठभूमि में उपस्थित संपूर्ण वस्तु-जगत को भी एक सृजनात्मक प्रकिया में संलग्न इकाई की तरह देखा जाना पूर्णतया संगत है।

जीवन की सृजनात्मक प्रक्रिया में एक सचेत एवं सक्रिय भागीदार होने के नाते ही मनुष्य को मूल्य-स्रष्टा कहा गया है। संस्कृति कोई जड़ वस्तु अर्थात् विधि-निषेधों की एक आरोपित संहिता नहीं है। वह जीवन की आत्मचेता सृजनात्मक प्रक्रिया से प्रस्फुटित और पोषित होती और निरंतर नए स्वरूप ग्रहण करती रहती है। जीवन मात्र के एकत्व और सृजनात्मकता का बोध और सम्मान ही वह बीज है, जिससे मानव-संस्कृति रूपी महावृक्ष निरंतर विकसित हो रहा है-कई तरह के झंझावातों, सूखों और अतिवृष्टियों के बावजूद।

संस्कृति का आधार किसी समाज का मूल्यबोध और उसकी कसौटी उसका आचरण है। यदि संस्कृति मूल्य-दृष्टि है तो वह सार्वभौम है और तब उसे देश-प्रदेश की सीमाओं में बांटकर देखने की एक सीमित उपयोगिता ही हो सकती है क्योंकि मूल्यगत प्रक्रिया होने के नाते वह सनातन और सार्वभौम प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया का बुनियादी प्रयोजन और लक्ष्य एक ही है; उसकी मूल प्रवृत्ति और आकांक्षा एक ही होनी चाहिए। यदि उसके बाह्य स्वरूप में कोई परिवर्तन दिखाई भी देते हैं तो वे संदर्भ से प्रतिविशिष्ट होते हैं। ऐसी स्थिति में संस्कृति के देशबद्ध रूप को एकमात्र वैध रूप मान लेना प्रकारांतर से संस्कृति की मूल अवधारणा का ही विरोध करना है। संस्कृति को अक्सर किसी भाषा या धर्म-संप्रदाय या देश-प्रदेश के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है-यथा हिंदू संस्कृति, मुस्लिम संस्कृति, ईसाई संस्कृति, बांग्ला संस्कृति, मराठी संस्कृति, फ्रांसीसी संस्कृति आदि। ऐसा विभाजन यदि एक मूलभूत संस्कृति के संदर्भगत और परिवेशगत विभिन्न स्वरूपों को समझने के लिए किया जाए तो कुछ सीमा तक उसकी उपादेयता भी है; लेकिन, इस विभाजन को आत्यंतिक मानकर उसे विभिन्न समाजों या व्यक्तियों के सांस्कृतिक आचरण की एकमात्र सार्वभौम कसौटी बना लेना क्या संस्कृति को एक राष्ट्रवादी, संप्रदायवादी या भाषावादी सांस्कृतिक पाखंड में विकसित होने देना नहीं है? किसी जमाने में संस्कृति की चर्चा अधिकांशतः धर्म के साथ जोड़कर की जाती थी। फिर यह चर्चा राष्ट्र के साथ जोड़कर की जाने लगी। अब लगता है कि यदि संस्कृति की बात पूरी मानव-जाति के संदर्भ में नहीं की जाती है और हमारा ध्यान स्वरूपगत भिन्नताओं के कारण अलगाव को पुष्ट करते रहने के बजाय प्रकृतिगत बुनियादी एकता के संदर्भ में संस्कृति को समझने की ओर नहीं जाता है तो यह सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक विसंगति की ओर से आंखे मूंदना होगा, जिसके परिणाम पूरी मानव-जाति को भुगतने होंगे।

लेकिन, सवाल यह है कि संस्कृति के देशकालबद्ध वैशिष्ट्य की पहचान जिस प्रकार उसकी मूल्य-चेतना के विशिष्ट स्वरूप के संदर्भ में की जाती है, उसी प्रकार उसके सार्वभौम और सनातन रूप की पहचान के लिए भी क्या किसी सनातन और सार्वभौम मूल्य का अन्वेषण किया जा सकता है। क्या मानव चेतना का इतिहास किसी सनातन मूल्य के अन्वेषण की प्रक्रिया का कोई साक्ष्य प्रस्तुत करता है? वह मूल्य क्या है और उसकी अभिव्यक्ति विविध देशकालों में किस प्रकार संभव हुई है? क्या मनुष्य के सांस्कृतिक इतिहास को मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया के संदर्भ में समझा जा सकता है?

मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया होने के नाते स्वाभाविक ही संस्कृति में धर्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। मूल्य वह है जो जीवन को मूल्यवान बनाता है और जीवन का मूल्यवान होना जीवन के प्रयोजन का पूरा होना है। अतः, जीवन के प्रयोजन की जिज्ञासा मूल्य-चेतना की निर्मिति का प्रारंभिक चरण है। मनुष्य को क्या करना चाहिए, इस सवाल का उत्तर पाने के लिए उसका अपनी अवस्थिति को समझना पूर्वशर्त है। धर्म मनुष्य की इसी जिज्ञासा के समाधान का प्रयास है। मानवविज्ञानी तो धर्म को एक प्रकार का मिथ्या विज्ञान मानते हैं तथा उसमें जादू-टोने को भी उसके प्रारंभिक रूप की तरह शामिल करते हैं। धर्म की उत्पत्ति अपने अस्तित्व और उसके प्रयोजन के बारे में मनुष्य की जिज्ञासा के समाधान का अनुचिंतनात्मक प्रयास है। इस प्रकार धर्म भी वैज्ञानिक दृष्टि के विकास की प्रक्रिया का प्रारंभिक चरण हो जाता है। फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिक धर्म की उत्पत्ति मनुष्य द्वारा अपने रक्षक की कामना में देखते हैं, जिसका आभास ईश्वर की अवधारणा में होता है, जिसे सभी के पिता या रक्षक, या न्यायकर्ता के रूप में समझा जाता है। धार्मिक आचरण ही तब मूल्य बन जाता है और उसका तात्पर्य होता है ईश्वर की इच्छा या आदेश के अनुरूप आचरण। लेकिन, कुछ ऐसे भी धर्मों का विकास हुआ है, जो ईश्वर की-और कभी-कभी आत्मा-की अवधारणा में भी विश्वास नहीं करते। वे ईश्वर के अभाव में समूची सृष्टि-प्रक्रिया को समझने और उस प्रक्रिया के अनुसार जीवनयापन को धार्मिक आचरण की संज्ञा देते हैं। वैज्ञानिक जानकारी के अभाव में सृष्टि-प्रक्रिया की उनकी अवधारणा अनुचितंनात्मकता-ध्यान-का परिणाम होती है और वे भी अपने ध्यानप्रसूत ज्ञान के आधार पर जीवन के प्रयोजन और उसके अनुकूल आचरण का निर्देश करते हैं।

ध्यान या अनुचिंतन धर्म की ज्ञानमीमांसा है, जिसके आधार पर उसकी तत्त्वमीमांसा और मूल्यमीमांसा या नैतिकी निर्मित होती है। सभी प्रमुख धर्मों का अध्ययन इस नतीजे तक पहुंचता है कि अपनी तत्त्वमीमांसा में भिन्नता के बावजूद सभी धर्मों की नैतिकी में विस्मयकारी समानता है। दूसरे शब्दों में, इसका तात्पर्य यह है कि सृष्टि की उत्पत्ति और ईश्वर की अवधारणा में भिन्नता के बावजूद मनुष्य से जिस आचरण की अपेक्षा की जाती है, उसमें कोई भेद नहीं है और इस आचरण की कसौटी अहिंसा है, जिसे प्रेम, करुणा, आनृशंस्य, अनुकंपा, दया आदि विभिन्न नामों से व्यंजित किया गया है। अहिंसा पद को निषेधात्मक कहा जाता है-जो वह है भी-लेकिन अपनी अर्थ-व्याप्ति में वह पूर्णतया सकारात्मक है।

भारत कई धर्म-दर्शनों की जन्मभूमि रहा है। यद्यपि इसकी मुख्य धारा आस्तिक अर्थात् वेदनिष्ठ धर्म-दर्शनों की रही है, किंतु नास्तिक या वेदेतर धर्मों के विकास और व्यापकता की दृष्टि से भी भारत की भूमिका कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। उल्लेखनीय यह है कि वेदनिष्ठ तथा अवैदिक दोनों ही प्रकार के धर्म-दर्शनों की नीति-मीमांसा में केंद्रस्थ नैतिक मूल्य अहिंसा है।

वैदिक यज्ञों में पशुबलि की अनुमति होने के कारण, सामान्यतः, हिंदू धर्म के वैदिक स्वरूप को अहिंसा के संदर्भ में स्मरण नहीं किया जाता और जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म को उसके विरोध में विकसित बताया जाता है। लेकिन, इस बात की अनदेखी कर दी जाती है कि मूल भेद दोनों परंपराओं की तत्त्वमीमांसा में है और अपनी नीतिमीमांसा में दोनों ही अहिंसा मार्ग के अनुकरण का आग्रह करती हैं। दुनिया की सभी संस्कृतियों में कुछ आचरणगत खामियां दिखाई जा सकती है क्योंकि मनुष्य कहीं भी पूर्ण नहीं है। प्रत्येक संस्कृति मूल्य-साधना की प्रक्रिया है, जिसे उसकी मूल्य-प्रेरणा के संदर्भ में ही समझा जा सकता है क्योंकि इस साधना में उसकी असफलताओं का स्वीकार भी साधना की वांछनीयता को तो संकेतित करता ही है। इस दृष्टि से वैदिक धर्म-दर्शन के केंद्रीय मूल्य के रूप में अहिंसा स्थापित होती है। ऋग्वेद में दया को प्रमुख कर्त्तव्यों में माना गया है (10:117) तथा किसी भी व्यक्ति का अनिष्ट करने को पापकर्म (5:85, 7) बताया गया है। ऋग्वेद में संपूर्ण सहजीवन की जो कल्पना की गई है (10.191.2-4), वह भी मानव-जाति के एकत्व के बोध का संकेत करती है। सामवेद में तो स्पष्टतः हिंसा न करने (1; 2:9, 2), अथर्ववेद में (17.1-7) सबके प्रति मैत्रीभाव रखने (36.18) तथा पशु-पक्षियों के वध का निषेध करते हुए उनकी सेवा करने की बात कही गई है। ब्राह्मण ग्रंथों में मनुष्यों और मनुष्येतर प्राणियों के प्रति कर्त्तव्यपालन का आग्रह करते हुए पंचऋण की अवधारणा में नृऋण तथा भूतऋण का भी उल्लेख किया गया है। उपनिषदीय दर्शन में तो स्पष्टतः सदाचार विश्लेषण में अहिंसा और दानशीलता को अत्यंत महत्त्व दिया गया है। (छांदोग्य, 3:17)। तैत्तिरीय उपनिषद (1:11) में श्रद्धापूर्वक दान का निर्देश किया गया है।

हिंदू धर्म के पौराणिक रूप में तो अहिंसा को धर्म ही घोषित कर दिया गया है। महाभारत अहिंसा को कहीं परमधर्म तो कहीं सकल धर्म कहता है। शांतिपर्व (अध्याय 162) में सत्य के तेरह रूपों में न केवल अहिंसा की गणना की गई है, बल्कि सभी रूप अहिंसा की ही विविध अभिव्यक्तियां दिखाई पड़ती हैं, जिसका अर्थ है सूक्ष्म स्तर पर अहिंसा और सत्य का एक हो जाना-जैसा हमारे युग में महात्मा गांधी भी मानते हैं। महाभारत के अनुशासन पर्व में मांसाहार का निषेध करते हुए (अध्याय 115-16) हत्या के लिए पशु लाने, उसे मारने की अनुमति देने तथा मारने, खरीदने, बेचने, पकाने और खाने को पाप का समान भागी बताया गया है।

वामन पुराण में निर्देशित दशांग-धर्म (14/1-2) में न केवल अहिंसा को सर्वप्रथम रखा गया है-बल्कि अस्तेय, दान, क्षांति, दम, शम, अकृपणता आदि भी अहिंसा की ही अभिव्यक्तियां हैं। मत्स्य पुराण (143/30-32) में अक्रोध, अलोभ, शम, दम, भूतदया, सुकुमारता, क्षमा और धैर्य को सनातन धर्म का मूल कहा गया है। विष्णु पुराण हिंसा को अधर्म की पत्नी (प्रथम भाग, अध्याय 7) बताता है तो ब्रह्मांड पुराण अहिंसा को धर्म का द्वार (2/31-35) कहता है। इसी तरह ब्रह्म पुराण, शिव पुराण, कूर्म्म पुराण, पद्म पुराण, वायु पुराण आदि में अहिंसा को सर्वोच्च धर्म और सुख कहा गया है। अग्निपुराण में अहिंसा की विस्तृत व्याख्या करते हुए सभी सद्गुणों को उसका ही रूप बताया गया है। पुराणों में केवल निषेधात्मक अहिंसा का निर्देश ही नहीं है, बल्कि जनकल्याण के सभी कार्यों द्वारा अहिंसा के सकारात्मक रूप पर भी आग्रह किया गया है। भागवत पुराण तो यहां तक कह देता है कि मनुष्यों का स्वत्व केवल वहीं तक है जितने से उनका पेट भरता है, जो व्यक्ति उससे अधिक को अपना कहता है, वह चोर है, इसलिए दंडनीय है। (7.14-18)।

वेदनिष्ठ अनुचिंतनात्मक दर्शन-संप्रदायों की नैतिकी में भी अहिंसा को केंद्रीय हैसियत प्राप्त है। न्याय-दर्शन में पृथकत्व के बोध से मुक्ति को परम श्रेय माना गया है क्योंकि सभी पाप-कर्म अपने पृथक् होने के बोध से ही उत्पन्न होते हैं। श्रीधर के न्याय-कंदली में अहिंसा को सभी देशकालों पर लागू होने वाला सनातन कर्तव्य बताया गया है। वैशेषिक दर्शन में भी अहिंसा, सभी की हितचिंता तथा क्रोधवर्जन को अनिवार्य सनातन कर्तव्यों में शामिल किया गया है। सांख्य-दर्शन में भी जीव-हत्या को पाप की जननी माना गया है। मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अहम् भाव है, इसलिए नास्मि (मैं कुछ नहीं), में (मेरा कुछ नहीं) और नाहम् (अहंभाव का लोप) का बोध मोक्ष-प्राप्ति के लिए आवश्यक है। योग-दर्शन में नैतिक साधना पर अत्यधिक बल देते हुए अहिंसा, सत्य, अस्तेय, जितेंद्रियता तथा अपरिग्रह के पालन का निर्देश दिया गया है तथा अन्य सब गुणों को अहिंसा में ही बद्धमूल माना गया है। योगभाष्य के अनुसार अहिंसा का तात्पर्य है सभी प्रकार के द्वेषभाव से मुक्त होना। यह वैर तथा क्षति पहुंचाने का अभाव है। शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत अहिंसा का आग्रह करते हुए योगभाष्य में उसे योगी का मूल व्रत बताता है। अध्यात्मपटल भाष्य में शंकराचार्य नैतिक गुणों को ज्ञानाभिव्यक्ति के हेतु बताते हैं तथा अक्रोध, अहर्ष, अरोष, अमोह, अदंभ, अद्रोह, त्याग, आर्जव, मार्दव, शम, दम, अविरोध, अक्षुद्वता और आनृशंस्य की गणना योग में करते हैं। ये सब अहिंसा की ही गुणाभिव्यक्तियां हैं। वह अहिंसा की परिभाषा करते हुए उसे सर्वभूतहित का अविरोध कहते हैं-सर्वभूताविरोधलक्षणा हिंसा।

वेदेतर धर्म-दर्शनों में जैन-धर्म तथा बौद्ध धर्म अपनी अहिंसा-निष्ठा के कारण विशेष ध्यानाकर्षण के अधिकारी हैं। जैन-दर्शन के पंचव्रतों में न केवल अहिंसा की गणना की गई है, बल्कि प्रकारांतर से वही अन्य सभी व्रतों का मूल है। जैन-आगम आचारांग-सूत्र में अहिंसा को शुद्ध, नित्य और शाश्वत धर्म बताते हुए जीव-मात्र की समता को स्थापित किया गया है तथा निर्देश किया गया है कि किसी भी प्राणी, भूत, जीव और सत्त्व का हनन नहीं करना चाहिए, उन पर शासन नहीं करना चाहिए, उन्हें दास नहीं बनाना चाहिए, उन्हें परिताप नहीं देना चाहिए तथा उनका प्राण-वियोजन नहीं करना चाहिए (4/1-2)। महावीर वनस्पति-जगत तक की मनुष्य से समानता को स्थापित करते हुए कहते है : यह मनुष्य शरीर भी जनमता है, यह वनस्पति भी जनमती है। यह मनुष्य शरीर भी बढ़ता है, यह वनस्पति भी बढ़ती है। यह मनुष्य शरीर भी चैतन्ययुक्त है, यह वनस्पति भी चैतन्ययुक्त है। यह मनुष्य शरीर भी आहार करता है, यह वनस्पति भी आहार करती है। यह मनुष्य शरीर भी अशाश्वत है, यह वनस्पति भी अशाश्वत है। यह मनुष्य शरीर भी उपचित और अपचित होता है, यह वनस्पति भी उपचित और अपचित होती है। यह मनुष्य शरीर भी विविध अवस्थाओं को प्राप्त होता है, यह वनस्पति भी विविध अवस्थाओं को प्राप्त होती है (1/6/118)। यह उल्लेखनीय है कि जैन-नीतिमीमांसा भावहिंसा और द्रव्य हिंसा में भेद करती तथा भाव-हिंसा को द्रव्य हिंसा से भी अधिक हेय बताती है। यह भी ध्यातव्य है कि जैन-विश्लेषण के अनुसार भाव-हिंसा प्रकारांतर से आत्महिंसा भी है।

जैन-दृष्टि के लिए अहिंसा हिंसा का अभाव मात्र नहीं है। प्रश्नव्याकरण में अहिंसा की समानार्थक पदावली में मैत्री, करुणा और अनुकंपा जैसे जो पद दिए गए हैं, उनका सीधा तात्पर्य यही है कि अहिंसा एक सकारात्मक अवधारणा है, जिसका संबंध सर्वकल्याण से है। प्रश्नव्याकरण (1.5) में अहिंसा का तात्पर्य सब त्रस-स्थावर प्राणियों का कुशल करना बताया गया है। अतः, स्पष्ट है कि समर्थ होते हुए भी जो सर्वकल्याण की भावना से कार्य नहीं करता है, वह अहिंसाधर्म का पालन नहीं कर रहा है। दरअस्ल, अहिंसा का जैन तात्त्विक आधार समता है और समता का तात्त्पर्य जीव मात्र की समता है, जिसका आख्यान आचारांग सूत्र के उपर्युक्त उद्धरण में मिलता है, जिसके आयाम स्वतः ही स्वैच्छिक अपरिग्रह, अल्प उपभोग और पर्यावरणीय तथा पारिस्थितिकीय संतुलन में व्यंजित हो जाते हैं।

जैन धर्म की ही तरह बौद्ध धर्म भी एक वेदेतर धर्म-दर्शन है। दोनों ही सृष्टि को अनादि मानते तथा किसी ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते; लेकिन, दोनों में एक बुनियादी तत्त्वमीमांसीय फर्क यह है कि जैन-दर्शन जीव या आत्मा के अस्तित्व में विश्वास करता है, जबकि बौद्ध धर्म अनात्मवादी है; लेकिन, इस तत्त्वमीमांसीय वैपरीत्य के बावजूद दोनों धर्म-दर्शनों की नैतिकी अधिकांशतः समान है। फर्क केवल यह है कि जैन-धर्म गृहस्थियों के लिए तो मध्यमार्गी है, पर मुनियों के लिए निर्धारित व्रतों का उसका आग्रह आत्यंतिक है, जबकि बौद्ध धर्म भिक्षुओं के लिए भी मध्यम मार्ग की बात करता है। बौद्ध नैतिकी में भी अहिंसा को केंद्रीय हैसियत प्राप्त है। दुखमुक्ति के लिए बुद्ध जिस अष्टांग मार्ग (सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक् समाधि) का उपदेश करते हैं, उसमें वाक्, कर्मांत और आजीव का सीधा संबंध अहिंसक आचरण से है तथा अन्य का बौद्धिक-भावात्मक जगत से। मन, वचन और कर्म आजीविका सहित सम्यक् होने चाहिए अर्थात् उनसे किसी अन्य की कोई हानि अथवा उस पर आघात न हो। जैन आचारांग-सूत्र में जिस तरह महावीर द्वारा वनस्पति-जगत तथा अन्य जीवों के साथ मनुष्य की समानता का निदर्शन किया गया है, उसी प्रकार सुत्त-निपात में मनुष्य एवं अन्य प्राणियों के एक समान होने का उल्लेख करते हुए उनका वध करने-करवाने का निषेध किया गया है। कहीं-कहीं तो दोनों की भाषा भी समान है। त्रस और स्थावर जीवों की मन, वचन, कर्म से हिंसा न करने का निर्देश जिस भाषा में उत्तराध्ययन सूत्र में किया गया है, लगभग उसी शब्दावली में धम्मपद (26/23) भी यही निर्देश करता है। जैन नैतिकी में भाव-हिंसा और द्रव्य हिंसा में जो भेद किया गया है, उसी प्रकार धम्मपद भी मानता है कि संकल्प या मानसिक विकार के बिना जो हिंसा हो जाती है, वह पापकर्म नहीं है क्योंकि उसमें मनोविकार न होने से वह संस्कार नहीं बनती। बौद्ध नैतिकी में ब्रह्मविहार की अवधारणा का बड़ा महत्त्व है जिसका तात्पर्य है मैत्री (सभी प्राणियों से प्रेम), करुणा (सबके प्रति निरपेक्ष दया), मुदिता (सबको हानि पहुंचाने वाले तक के प्रति प्रसन्नतापूर्ण सहानुभूति) तथा उपेक्षा (अपनी निंदा-प्रशंसा के प्रति अवहेलना) भाव का विकास। मनोवैज्ञानिक स्तर पर ये सभी अहिंसा-भाव की ही अभिव्यक्तियां हैं। बौद्ध दर्शन क्योंकि आत्म की अवधारणा में विश्वास नहीं करता, इसलिए वहां पर का अस्तित्व नहीं है और हिंसा पर के बोध के बिना संभव नहीं होती। पर का बोध अविद्या का परिणाम है, जो सभी दुखों का मूल है, इसलिए अहिंसा वह भाव है जो, बौद्ध-विचार के अनुसार, अविद्या के लोप का साधन है। अहिंसा की साधना, इसलिए, दुखशमन की साधना है क्योंकि अविद्या ही सभी दुखों का मूल है।

मध्यकालीन संतो यथा कबीर, नानक, चैतन्य, तुलसीदास, दादू, पीपा आदि में भी अहिंसा को धर्म का लक्षण बताया गया है। तुलसी कहते हैं परहित सरस धरम नहीं भाई/परपीड़ा सम नहीं अधमाई। नानक सिखधर्म के संस्थापक हैं। वह मजलूमों के प्रति अत्याचार का निषेध करते हुए पशु-पक्षियों तक के प्रति हिंसा को भी उतना ही गलत मानते हैं, जितना मनुष्यों के प्रति हिंसा को। कबीर तो यहां तक कह देते है कि यदि जीव-हत्या करने वाले लोग धार्मिक है तो पापी और कसाई कौन है! पीपा तो अहिंसा के आग्रह के कारण राज्य-त्याग तक कर देते हैं।

भारत से बाहर विकसित धर्म-दर्शनों में यहूदी धर्म, ईसाइयत और इस्लाम का प्रमुख स्थान माना जाता है और इन सभी धर्मों की नैतिकी में अहिंसा और उसकी समानार्थी अवधारणाओं को केंद्रीय स्थान प्राप्त है-चाहे इन धर्मों से संबंधित संस्थानों और उनके अनुयायियों का व्यवहार कई बार इस नैतिकी का उल्लंघन ही करता हो। यहूदी धर्म के दस धर्मादेशों (Commandments) में अंतिम पांच का साम्य जैन व्रतों-अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, सत्य और अपरिग्रह-से देखा जा सकता है : (1) तुम हत्या नहीं करोगे, (2) तुम व्यभिचार नहीं करोगे, (3) तुम चोरी नहीं करोगे, (4) तुम अपने पड़ौसी के खिलाफ झूठी गवाही नहीं दोगे और (5) तुम लालच नहीं करोगे।

ईसाइयत की नैतिकी के केंद्र में प्रेम है, जो अहिंसा की ही सकारात्मक अभिव्यक्ति है। ईसाई भी दस धर्मादेशों में तो यकीन करते ही हैं, साथ ही, वे यह मानते हैं कि मानव-जाति के प्रति प्रेम के कारण ही ईश्वर ने अपने पुत्र ईसा को धरती पर भेजा, जिसने सबके प्रति प्रेम के कारण सलीब पर चढ़ने की सजा को स्वीकार किया। ईसा ने अपने को सजा देने वालों को भी क्षमा कर देने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। ईसाइयत के अनुसार ईश्वर स्वयं प्रेम है। ईसाइयत न केवल मित्रों बल्कि अपने शत्रुओं से भी प्रेम करने का आग्रह करते हुए (मैथ्यू. 5.43-44) निर्देश देती है कि बुरे से भी बुरा व्यवहार न करो। यह उल्लेखनीय है कि बहुत से प्रारंभिक ईसाइयों ने अपनी अहिंसा-निष्ठा के ही कारण रोमन सेना में शामिल होने से इनकार कर दिया था। ईसाई सिद्धांतों के अनुसार युद्ध में शामिल नहीं हुआ जा सकता था, इसलिए अनंतर न्यायपूर्ण या उचित युद्ध (Just War) की अवधारणा का विकास हुआ। तोलस्तोय जैसे ईसाई विचारक इसीलिए अपनी पुस्तक लॉ ऑफ लव एंड लॉ ऑफ वायलेंस में देशभक्तिवाद के नाम पर भी युद्ध में शामिल होने को अनुचित बताते हैं। ईसा का यह कथन तो प्रसिद्ध है ही कि यदि कोई दाहिने गाल पर थप्पड़ मारता है तो बांया गाल उसके आगे कर दो (मैथ्यू. 5.39)। क्षमा, जो अहिंसा का ही एक रूप है, ईसाइयत में बहुत प्रतिष्ठित भाव है। स्वयं को सलीब पर चढ़ाए जाते समय ईसा का यह कथन क्षमा-भाव का ज्वलंत उदाहरण है : उन्हें क्षमा कर दो, पिता! वे नहीं जानते वे क्या कर रहे हैं (ल्यूक. 23.34)। अपने शिष्यों को ईसा का अंतिम आदेश यही था कि एक-दूसरे को वैसे ही प्रेम करो, जैसे मैं तुम से प्रेम करता हूं। अपने मित्रों के लिए सबसे महान प्रेम उनके लिए अपने जीवन का त्याग कर देना है (जॉन.15.13)।

सामान्यतः, अहिंसा के संदर्भ में इस्लाम का जिक्र कम ही किया जाता है-बल्कि यह विवाद बना रहा है कि उसकी शिक्षाएं अहिंसा को पूरा समर्थन नहीं देती। इस संदेह का कारण इस्लाम की बुनियादी नैतिकी के बजाय उसके अनुयायियों के राजनीतिक इतिहास पर ध्यान देना रहा है। महात्मा गांधी का मानना है कि ईसाई, बौद्ध, जैन और हिंदू धर्म की भांति इस्लाम भी शांति का धर्म है। यद्यपि गांधीजी के कुछ मुसलमान मित्रों द्वारा ही उन्हें बताया गया कि मुसलमान विशुद्ध हिंसा का समर्थन कभी नहीं करेंगे, लेकिन उनकी मान्यता थी कि इस्लाम शब्द का अर्थ ही शांति है, जिसका मतलब अहिंसा है। कुरान के अपने अध्ययन से भी गांधीजी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि उसके उपदेश बुनियादी तौर पर अहिंसा के पक्ष में है। कुरान में अहिंसा को हिंसा से बेहतर बताया गया है। अहिंसा को फर्ज बताया गया है, जबकि हिंसा की इजाजत जरूरत पड़ने पर ही दी गई है। इस्लाम के मानने वालों में तलवार के प्रयोग के बारे में गांधीजी का कहना था कि यह कुरान के उपदेश के कारण नहीं बल्कि वातावरण के कारण हुआ। ईसाई धर्म के बारे में भी तो यही हुआ। इसी कारण तो अपने को ईसाई मानने वाले पश्चिमी समाज के बारे में उनका मत है कि यद्यपि वह ईसाई धर्म के अनुयायी होने का दावा करता है, पर वहां न ईसाई मत है, न ईसा; अन्यथा वहां युद्ध नहीं होता। हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म को मानने वालों में भी व्यावहारिक स्तर पर युद्ध और हिंसा के असंख्य उदाहरण मिल जाते हैं। एक ओर अशोक है तो दूसरी ओर कनिष्क और चंगेज खां भी हैं, जो बौद्ध थे। हिंदू और जैन शासकों की राजनीति में भी हिंसा और युद्ध के उदाहरण कम नहीं हैं, यद्यपि वैयक्तिक स्तर पर उन्हें धर्मनिष्ठ कहा जा सकता है।

इस्लाम में जिहाद की अवधारणा के संदर्भ में हिंसा-अहिंसा का विवाद सर्वाधिक रहा है। लेकिन जिहाद का तात्पर्य धार्मिक युद्ध से न होकर अपने अंदर की बुरी प्रवृत्तियों और बाहरी सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष से है। पहले प्रकार के जिहाद को अल-जिहाद-अल-अकबर और दूसरे प्रकार को अल-जिहाद-अल-असगर कहा गया है। अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का रूप भी कई प्रकार का हो सकता है। हजरत मोहम्मद के अपने जीवन में दोनों प्रकार के जिहाद के कई उदाहरण मिल जाते हैं। जिहाद के साथ रहम, (दया), अद्ल (न्याय) और सब्र (धैर्य) इस्लाम की नैतिकी के अन्य आधार-स्तंभ हैं। ये सभी अहिंसा की ही गुणाभिव्यक्तियां हैं।

यह उल्लेखनीय है कि इस्लाम के सूफी मत में अहिंसा और उसके सकारात्मक रूप प्रेम (इश्क) को केंद्रीय महत्त्व दिया गया है। कुछ लोग सूफी मत को इस्लाम की केंद्रीय धारा से विचलन मानते हैं; लेकिन, बहुत-से अध्येताओं की मान्यता है कि सूफीवाद के बीज कुरान और हदीस में ही मिल जाते हैं, इसलिए वे उसे इस्लाम की मूल अवधारणा से विचलन नहीं मानते। सूफी साधना-पद्धति में जो विभिन्न सोपान बताए गए हैं, वे इस प्रकार हैं : तौबा (पश्चाताप); जुहद (धर्म-निष्ठा); तवक्कुल (ईश्वर में आस्था); फक्र (गरीबी); जिक्र (ईश्वर का स्मरण); सब्र (धैर्य); शुक्र (कृतज्ञता); रिदा (संतोष); मोहब्बत (प्रेम); और मारिफत (दैवी ज्ञान)। इन सभी सोपानों से मुजाहिद (आत्मत्याग) के माध्यम से गुजरना होता है। तौबा, फक्र, सब्र, शुक्र, मोहब्बत और मुजाहिद प्रकारांतर से अहिंसा भाव के ही विभिन्न रूप हैं। बहुत-से सूफी संतों यथा रूमी, शेख फरीद, अमीर खुसरो, शाह लतीफ, हमीदुद्दीन नागौरी आदि ने तो स्पष्ट शब्दों में अहिंसा का समर्थन और कुछ ने मांसाहार के लिए जीव-वध का निषेध भी किया है। इस संदर्भ में अमीर खुसरो और हमीदुद्दीन नागौरी का नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है। रूमी पूरी सृष्टि के एकत्व में यकीन करता है और वह भी पैगंबर के इस कथन को उद्धृत करते हुए कि मच्छर से हाथी तक सभी उसके परिवार के सदस्य हैं। शेख सादी कहता है कि यदि तुम दूसरे के दुख को महसूस नहीं कर सकते तो तुम आदम की संतान कहलाने के लायक नहीं हो। मध्यकालीन भारतीय भक्ति आंदोलन में भी जिसका उल्लेख पहले किया गया है, सूफी संतों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

अहिंसा के संदर्भ में चीनी ताओवाद और कनफ्यूश्यस का उल्लेख अनिवार्य है। ताओ नैसर्गिक व्यवस्था में विश्वास करता है, जिसे भारतीय पदावली में ऋत कहा जा सकता है। लाओत्से इस ऋत ताओ में हस्तक्षेप अनुचित मानते तथा विनम्रता, संतोष, धैर्य, अपरिग्रह, अद्वंद्व आदि ताओं की गुणाभिव्यक्तियों के रूप में आग्रह करते हैं। यह विस्मयकारी है कि ताओ ते चिंग में ईसा पूर्व छठी शताब्दी में निरस्त्रीकरण के महत्त्व को समझते तथा शस्त्रों को अशकुन का माध्यम बताते हुए (31.71) सेना के आवागमन और शिविरों के कारण फसलों की बर्बादी का उल्लेख किया गया (31.69)। कनफ्यूश्यस ताओ की राजनीतिक व्यंजना को न्यायपूर्ण शासन की तरह व्याख्यायित करते हुए अपने ग्रंथ लन यू में कहते हैं कि जब राज्य में ताओ का प्रभुत्व होता है तो आम जनता विवादों में नहीं पड़ती (16.2)। वह गरीबी को अन्याय मानते हुए कहते हैं कि जहां समान वितरण होगा, वहां गरीबी नहीं होगी। जहां समरसता होगी, वहां अभाव नहीं होगा और जहां संतोष होगा, वहां सत्ता परिवर्तन नहीं होगा (16.1)। वह हिंसक क्रांति के बजाय सुधारात्मक प्रक्रिया को तरजीह देते हैं। उल्लेखनीय है कि समान वितरण और समरसता अहिंसा का ही सामाजिक-आर्थिक रूप में चरितार्थ होना है। व्यक्तिगत व्यवहार में भी कनफ्यूश्यस पारस्परिक संबंधों में विनयशील, सद्व्यवहार और औचित्य-विवेक का बार-बार आग्रह करते हैं।

मानवीयता या सद्गुण को परिभाषित करते हुए कनफ्यूश्यस कहते हैं कि स्वार्थ पर पूरी तरह काबू पा लेना और उचित व्यवहार का पालन करना मानवीयता है। इसलिए उचित व्यवहार की व्याख्या करते हुए वह वही बात कहते हैं जो सभी नैतिक दर्शनों में कही गई है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार मत करो, जो तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे साथ हो (12.1; 12.2)। इसी तरह एक अन्य स्थल पर वह उदारता को परिभाषित करते हुए उसे दूसरों से प्रेम करना कहते हैं (12.22)।

चीनी परंपरा की ही तरह ग्रीक-रोमन दार्शनिक परंपरा में भी अहिंसा का जिक्र जैन और बौद्ध परंपराओं की तरह केंद्रीय तो नहीं है, लेकिन उनकी नैतिकी का सूक्ष्म विश्लेषण हमें अहिंसा की ओर ही ले जाता है। सुकरात, प्लेटो और अरस्तू में सद्गुण को किसी भी तरह व्याख्यायित किया जाए, उसकी एक चरितार्थता अहिंसा भाव में होनी ही है। सिनिकवाद, स्टोइकवाद और एपीक्यूरियनवाद की नैतिकी जिस प्रकार के आचरण और जीवनयापन का आग्रह करती है, उसमें मांसाहार या मनुष्येतर जीव-जगत को शामिल न करें तो, अहिंसा पारस्परिक व्यवहार में निश्चय ही एक वांछनीय गुण है। सिनिकवादी दार्शनिक परंपरा में मांसाहार के अपवाद को छोड़ दें तो हिंसा का कहीं भी समर्थन नहीं मिलता। संपूर्ण जीवन के साथ सहज और नैसर्गिक जीवन जीने की सिनिकवादियों की आकांक्षा, उनका अपरिग्रही जीवन और सुख-दुख के प्रति निरपेक्ष व्यवहार उन्हें व्यवहारतः अहिंसा का पालक बना देते हैं। इसी तरह, स्टोइकवाद इस पूर्व-मान्यता में विश्वास करता है कि मनुष्य को सृष्टि में अंतर्निहित नैतिक और प्राकृतिक नियम के अनुसार अपनी नैतिकी का विकास करना चाहिए। स्टोइकवाद इस विश्व को ईश्वर का शरीर मानता है और सभी जीवात्माओं को ईश्वर की आत्मा का अंश। अतः, स्वाभाविक ही मनुष्य को अन्य के साथ वैसा ही व्यवहार करना उचित है, जैसा वह ईश्वर के अंश के साथ करना उचित समझता है। स्टोइकवादी मानते हैं कि लालसा (Passion) से मनुष्य के मन में विक्षोभ होता है; पवित्र जीवन के लिए इस लालसा से मुक्त होना आवश्यक है। इससे हम मानसिक, वाचिक और कायिक हिंसा से बच सकते हैं। लालसा-पूर्ति में बाधा क्रोध, घृणा और हिंसा पैदा करती है। स्टोइकवाद किसी के भी प्रति क्रोध एवं घृणा का निषेध करता है। वह वनस्पति एवं अन्य जीवों में भी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है। एपीक्यूरियनवाद का प्रवर्त्तक एपीक्यूरस किसी को भी हानि पहुंचाने का निषेध करता है। एपीक्यूरस और उसके अनुयायियों को कुछ विद्वान शाकाहारी मानते हैं। स्वयं एपीक्यूरस का कथन है कि एक विवेकवान व्यक्ति घृणा, शत्रुता, ईर्ष्या और तिरस्कार आदि उन सभी संवेगों और अभिप्रेरणाओं को जीत लेगा, जो अन्य की हानि, हिंसा और पीड़ा का कारण होते हैं। स्पष्ट है कि ग्रीक-रोमन नैतिकी में अहिंसा को पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। पोरफिरी तो स्पष्टतया मांसाहार का निषेध एवं शाकाहार का समर्थन करता है। धर्म और अनुचिंतनात्मक दर्शनों की नैतिकी स्पष्टतः अहिंसा को केंद्र में रखती है।

धर्म और अनुचिंतनात्मक दर्शनों का आधार अनुभूति और तर्क-बुद्धि होती है; लेकिन, उनकी वैज्ञानिक प्रामाणिकता पर संदेह बना रहता है। परिणामस्वरूप, उनकी नैतिकी के मानवीय औचित्य को स्वीकार के बावजूद उसे वैज्ञानिक आधार पर विकसित नहीं माना जा सकता। मनुष्य क्यों नैतिक हो और क्यों अहिंसक? क्या इसलिए कि धर्म ऐसा कहता है या ईश्वर ने अपने किसी पैगंबर के माध्यम से मनुष्य को नैतिक आचरण का आदेश दिया है। लेकिन, सभी धर्म-चाहे वे ईश्वर और आत्मा तक को न मानते हों-किसी-न-किसी प्रकार की अतिप्राकृतिक सत्ता-प्रक्रिया में विश्वास पर टिके हैं, जिसकी वैज्ञानिक प्रामाणिकता सिद्ध नहीं है। कुछ वैज्ञानिक अपने लोकप्रिय लेखन में ब्रह्मांड की रहस्यमयता में विश्वास प्रकट करते दिखाई दे सकते हैं; लेकिन, यह उनका व्यक्तिगत विश्वास या कल्पना होती है-वैज्ञानिक पद्धति द्वारा प्रमाणित सिद्धांत नहीं। यह कहा जा सकता है कि भौतिक विज्ञान मनुष्य का संपूर्ण ज्ञान नहीं है; लेकिन, शुद्ध तर्क को भी आनुभाविक प्रमाणों की जरूरत होती है और निरपेक्षता उस अनुभव की पूर्वशर्त है क्योंकि उसके आधार पर एक निरपेक्ष तत्त्वमीमांसा और उससे प्रसूत नैतिकी की निर्मिति होनी होती है।

यह मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि धर्म और अनुचिंतनात्मक या कल्पनाप्रसूत दर्शन एक सीमा तक हमारी जिज्ञासा के समाधान की प्रारंभिक वैज्ञानिक प्रक्रियाएं हैं। लेकिन, प्राकृतिक विज्ञानों के विकास तथा ब्रह्मांड की प्रक्रिया की बढ़ती जानकारी के साथ इन धर्म-दर्शनों में अपरीक्षित निष्ठा किसी सुदृढ़ तत्त्वमीमांसीय आधार के अभाव में, अपनी उच्च मूल्यवत्ता के बावजूद, सर्वथा वेध्य बनी रहती है। इसलिए अनुचतिंनात्मकता के आधार पर विकसित नैतिकी भी वेध्य हो जाती है-चाहे वह कितनी भी सद्भावनापूर्ण हो। सवाल यह भी उठता है कि यदि कोई व्यक्ति किसी धर्म-दर्शन में उसके विज्ञानसम्मत न होने के कारण आस्था नहीं रखता तो क्या उसके लिए नैतिक आचरण का कोई आधार नहीं है। राज्य द्वारा प्रवर्तित नैतिकता राज्य की शक्ति द्वारा आरोपित होती है। उसे, अनिवार्यतः, मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति नहीं माना जा सकता और यदि कोई बात मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति की अनदेखी करती है तो उसकी सफलता की संभावना लगभग शून्य हो जाती है। यदि अहिंसा जीवन का नियम है तो यह देखना उपयोगी होगा कि क्या आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के निष्कर्षों की दार्शनिक निष्पत्ति अहिंसा को अपने नैतिक आयाम में केंद्रस्थ रखती है। इसलिए इस प्रश्न पर विचार आवश्यक हो जाता है कि क्या नैतिकता या अहिंसा का कोई विज्ञानसम्मत आधार है। दूसरे शब्दों में, क्या नैतिकता एक आदर्श कल्पना है या मनुष्य का जैविक धर्म? विवेकशीलता नैतिकता की पूर्वशर्त है, इसलिए यह समझना भी जरूरी होगा कि विवेकशीलता का वैज्ञानिक आधार क्या है।

विज्ञान इस ब्रह्मांड की प्रक्रिया को नियमशासित मानता है तथा मनुष्य को इसी ब्रह्मांड की प्रक्रिया के माध्यम से विकसित एक भौतिक अस्तित्व। इसलिए स्वाभाविक ही, वह मन अर्थात् चेतना और उसके द्वारा अर्जित ज्ञान को भी भौतिक ही स्वीकार करता है क्योंकि ज्ञान मन और भौतिक विश्व के संबंध का परिणाम है और भौतिक से अभौतिक की उत्पत्ति नहीं हो सकती। मानववादी दर्शन सृष्टि के केंद्र में मनुष्य को रखता और उसे विवेकशील मानता है; लेकिन, वैज्ञानिक मानववाद मनुष्य को सृष्टि की विकास-प्रक्रिया के अद्यतन उत्कर्ष के रूप में परिभाषित करता हुआ एक नियमशासित भौतिक प्रकृति की पृष्ठभूमि से उत्पन्न होने के कारण उसे सारतः विवेकशील मानता है। इसलिए यह देखना आवश्यक होगा कि यह भौतिक प्रकृति एकात्मक है या द्वंद्वात्मक क्योंकि यदि यह एकात्म अर्थात् परस्पर-आश्रित और परस्परपोषी है तभी एकात्मोन्मुख नैतिकी अर्थात् अहिंसा वैज्ञानिक कही जा सकेगी और यदि यह परस्पर-विरोधी या संघर्षरत है तो अहिंसा को जीवन के नियम के रूप में प्रतिपादित किया जाना वेध्य बना रहता है।

अद्यतन पारिस्थितिकीय शोधों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि पूरा सृष्टितंत्र परस्पर संबंधित है और उसमें अगर भिन्नता दिखाई भी देती है तो वह अपृथकसिद्ध भिन्नता है-गहरे स्तरों पर वह एक अस्तित्व है। इसी आधार पर प्रसिद्ध दार्शनिक अर्ने नेस्स ने गहन पारिस्थितिकी की अवधारणा प्रस्तुत की जो मानव-केंद्रित या उपयोगितावादी पर्यावरणवाद से अलग है। उपयोगितावादी पर्यावरणवाद जहां मानवीय प्रयोजनों को महत्त्व देता है, उसकी पर्यावरण-चिंता का स्रोत मनुष्य के लिए उपयोगी-संसाधनों के संरक्षण तथा मानव-अस्तित्व की फिक्र में है, वहीं गहन पारिस्थितिकी एक ऐसी अवधारणा है, जो समस्त जैवमंडल को अपनी परिधि में लेती है। वह जैवमंडलीय समतावाद और वैविध्य की चिंता करती है। यह अवधारणा जीवों के सोपान-क्रम पर आधारित श्रेष्ठता की अवधारणा को खारिज करते हुए जीव मात्र की समानता का पुरजोर आग्रह करती है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्येतर जीव-जगत को भी जीवन जीने और विकसित होने का नैतिक स्तर पर उतना ही अधिकार है, जितना मनुष्य-जगत को। इस दृष्टि से अहिंसा का प्रत्यय गहन पारिस्थतिकी की अवधारणा में केंद्रस्थ हो जाता है। पारिस्थितिकी केवल जीव-विज्ञान की एक शाखा नहीं रहती बल्कि अहिंसा की तत्वमीमांसा की हैसियत अख्तियार कर लेती है क्योंकि इसके आधार पर एक नई मूल्य-व्यवस्था स्थापित हो जाती है, जिसमें जैव-मंडल के समस्त सदस्यों के जीवन के अधिकार को मान्यता मिलती है। हम चाहें तो इसे मानवाधिकार की तर्ज पर जीवाधिकार कह सकते हैं। अर्ने नेस्स के लिए जैव-मंडल अपने में आत्म है-वह उसे इकॉलॉजिकल सेल्फ-पारिस्थतिकीय आत्म कहते और समस्त जैव-मंडल के एकत्व की अनुभूति को आत्मानुभूति का वास्तविक स्वरूप मानते हैं और क्योंकि सभी कुछ आत्म है, इसलिए पर की अवधारणा और उससे प्रसूत हिंसा के लिए कोई अवकाश नहीं बचता। यह उल्लेखनीय है कि गहन पारिस्थतिकी की अवधारणा जैन-दर्शन की समता तथा वेदांत-दर्शन के अद्वैत बोध और हिंदू तथा बौद्ध नैतिकी की सर्वभूतहित की अवधारणाओं से साम्य रखती है-फर्क है तो केवल यह कि उपर्युक्त अवधारणाओं का विकास अनुचिंतनात्मक प्रक्रिया के माध्यम से हुआ है, जबकि गहन पारिस्थितिकी और पारिस्थितिकीय आत्म की ज्ञान-मीमांसा पारिस्थितिकी विज्ञान के अद्यतन शोध हैं। रिशेल्स कार्सन, आल्डो लियोपोल्ड, बैरी कॉमनर , पॉल सिअर्स और फ्रिटजोफ काप्रा जैसे विचारकों द्वारा प्रस्तुत अहिंसामूलक नैतिकी का आधार भी इसी तरह विज्ञानसिद्ध कहा जा सकता है।

इस संदर्भ में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेम्स लवलॉक द्वारा प्रतिपादित पृथ्वी सिद्धांत (Gaia Theory) तथा रूसी वैज्ञानिक व्लादिमीर इवानोविच वर्नाद्स्की द्वारा प्रतिपादित चेतना-मंडल (Noosphere) के सिद्धांत का भी उल्लेख समुचित है। नासा के साथ मंगल ग्रह पर जीवन की खोज में जुटे वैज्ञानिकों में से एक जेम्स लवलॉक ने अपने शोध के आधार पर प्रतिपादित किया है कि संपूर्ण पृथ्वी अपने-आप में एक जैव-संस्थान है अर्थात् भू-मंडल (Geosphere) और जैव-मंडल (Bioshphere) परस्पर अंतर्ग्रंथित हैं और इसलिए समूची पृथ्वी की नियति एक है। प्रसिद्ध कथाकार विलियम गोल्डिंग के सुझाव पर लवलॉक ने अपने सिद्धांत को पृथ्वी की यूनानी देवी गाया (Gaia) के नाम पर पृथ्वी सिद्धांत की संज्ञा दी। लवलॉक के सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी के विभिन्न मंडलों में जो परिवर्तन होता है, उसका प्रभाव सभी मंडलों पर पड़ता है और नई परिस्थिति पैदा होने पर विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार, अन्य मंडलों में उस परिस्थिति का सामना करने के लिए नए विकास की संभावनाएं पैदा होती हैं। यह एक जटिल अंतःक्रियात्मकता है, जिसमें जैव-मंडल पृथ्वी की परिस्थिति को सदैव निवास योग्य बनाए रखने के उपाय अपनाता है। बहुत-से वैज्ञानिक पृथ्वी को एक जैव-संस्थान मानकर उस पर विकासवाद के सिद्धांत को लागू करने के विचार से सहमत नहीं थे; लेकिन, तीन पृथ्वी-सम्मेलनों में हुए विचार-विमर्श और पृथ्वी-सिद्धांत में निरंतर हुए परिष्करण के बाद एमस्टरडम घोषणा में कई वैज्ञानिकों द्वारा यह स्वीकार किया गया कि पृथ्वी अपने भौतिक, रासायनिक, जैविक और मानवीय घटकों के साथ एक स्व-नियमित व्यवस्था की तरह व्यवहार कर रही है। मानवीय गतिविधियां ग्रीन-हाउस गैस-उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ कई प्रकार से पृथ्वी के पर्यावरण को प्रभावित कर रही है और अपने प्रभाव और विस्तार में प्राकृतिक शक्तियों के समतुल्य हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक क्रिस्पिन टिकेल (Crispin Teckall) ने भी यह स्वीकार किया कि पृथ्वी सिद्धांत जीत रहा है और अब उसे अपने को प्रमाणित करने की जरूरत नहीं है। लवलॉक ने अपनी नई पुस्तक दि रिवेंज ऑफ गाया में पृथ्वी-सिद्धांत की अनदेखी के परिणामस्वरूप पृथ्वी के बिगड़ते हालात का वर्णन करते हुए भी यह माना है कि विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार अपनी स्व-नियमितता के नियम के अंतर्गत पृथ्वी इस चुनौती का सामना करने या परिस्थिति के अनुरूप जीवन को ढालने के लिए नए रूप विकसित कर लेगी। लवलॉक न केवल मनुष्य के बचे रहने बल्कि उसके और परिष्करण की आशा करते हैं। लवलॉक की उम्मीद या भविष्य-कल्पना पूरी होती है या नहीं, यह तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन, पृथ्वी-सिद्धांत इतना तो स्पष्ट कर ही देता है कि संपूर्ण पृथ्वी एक है, अवयवी है और इस पर बसे सभी भूमंडल और जैवमंडल परस्पर-ग्रथित है। इसलिए, किसी एक पर की गई हिंसा सब पर और इस तरह अपने पर भी की गई हिंसा है। पृथ्वी-सिद्धांत जीवन के ही नहीं, बल्कि संपूर्ण पृथ्वी के एकत्व-बोध का सिद्धांत होने के कारण हमारे आचरण में इसी एकत्व-बोध का प्रेरक बन जाता है।

विकासवाद की प्रक्रिया के आधार पर ही रूसी वैज्ञानिक व्लादिमीर इवानोविच वर्नाद्स्की ने चेतना-मंडल के विकास की अवधारणा का प्रतिपादन किया। वर्नाद्स्की एक खनन-विज्ञानी तथा भू-रसायनज्ञ थे। उन्होंने प्रतिपादित किया कि विकास की प्रक्रिया में भू-मंडल और जैव-मंडल के विकास के बाद विकास का नया आयाम चेतना-मंडल का विकास है। जीवन में चेतना है और भौतिक-तत्वों या भू-मंडल में चेतना अंतर्भूत है। इसलिए, भू-मंडल और जैव-मंडल के विकास का स्वाभाविक आगामी आयाम चेतना-मंडल का विकास ही हो सकता है। यह किसी एक व्यक्ति की चेतना नहीं, बल्कि संपूर्ण पृथ्वी की चेतना है; इसलिए, इसे चेतना-मंडल की संज्ञा दी गई है। यह सिद्धांत समूची पृथ्वी के एकत्व-बोध की ओर संकेत करता है। धर्मशास्त्रियों या दार्शनिकों में इस अवधारणा का प्रतिपादन पियरे तेयार शार्दे और बर्गसा ने किया। शार्दे ने विकास की प्रक्रिया को समझने के लिए जटिलता/चेतना के नियम का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार जीवन जितनी जटिल संघटना बनता जाता है, उतना ही चेतना का विकास होता जाता है। शार्दे के अनुसार, मनुष्य जीवन की सबसे अधिक जटिल संघटना है, अतः उसमें चेतना का सर्वाधिक विकास है। शार्दे के अनुसार विकास का यह नया आयाम चेतना-मंडल है। धर्मशास्त्री होने के नाते शार्दे इस वैज्ञानिक परिघटना को ईश्वरीय रंग में रंगते हुए यह कल्पना अवश्य करते हैं कि यह विकास स्वनियमित नहीं है, बल्कि यह ईश्वर ही है जो विकास की इस यात्रा को अपनी ओर खींच रहा है। बर्गसां भी सर्जनात्मक विकास की धारणा का प्रतिपादन करते हैं। इस संदर्भ में भारतीय दार्शनिक श्री अरविंद की अतिमन की अवधारणा का भी उल्लेख किया जा सकता है, जिसके अनुसार चेतना निम्नतम स्तर पर अवरोहण के बाद क्रमशः विकास करती हुई अतिमन के स्तर की ओर आरोहण कर रही है। यह उल्लेखनीय है कि जीवन और चेतना के सह-विकास की धारणा का प्रतिपादन करते हुए जैविक और सांस्कृतिक विकास को सहयात्री माना गया है और इस आधार पर राजनीति में भी चेतना- तंत्र (Noocracy) की अवधारणा प्रतिपादित की गई है, जो विश्व-नागरिकता और विश्व-संसद तथा विश्व-सरकार जैसी कल्पनाओं की ओर ले जाती है।

विकासवाद की अवधारणा में एकत्वमूलक आयाम विकसित करने वालों में रूसी अराजकतावादी विचारक प्रिंस क्रोपाटकिन का स्मरण आवश्यक है। क्रोपाटकिन एक वैज्ञानिक थे और उन्होंने रूसी जिओग्राफि सोसाइटी में एक भूगोलवेत्ता की हैसियत से साइबेरिया के अलावा फिनलैंड और स्वीडन में भी काम किया था। अपने काम के दौरान बहुत-से जीवों के जीवन का निकटता से अध्ययन करने के परिणामस्वरूप क्रोपाटकिन इस विकासवादी अवधारणा से सहमत नहीं हो पा रहे थे कि संघर्ष ही विकास का मुख्य कारक है। टी०एच० हक्सले ने डार्विन के विकासवाद की सामाजिक व्याख्या करते हुए अपने प्रसिद्ध निबंध अस्तित्व के लिए संघर्ष में यह प्रतिपादित किया कि न केवल पशु-जाति बल्कि मनुष्य जाति के विकास का केंद्रीय कारक पारस्परिक संघर्ष रहा है। क्रोपाटकिन अपने पर्यवेक्षण, अनुभवों और अध्ययन-विश्लेषण के आधार पर हक्सले के मत का खंडन करते हुए यह स्थापित करते हैं कि विकास में एक प्रमुख कारक पारस्परिक सहयोग है। अपनी पुस्तक म्युचुअल एड : फेक्टर इन इवोल्युशन में क्रोपाटकिन पहले मानवेतर प्राणियों में प्रत्येक पशु-जाति के संरक्षण और संवर्धन में उनके पारस्परिक सहकार के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जिनके बिना उन प्राणी-जातियों का जीवित रहना ही संभव नहीं होता। इस प्रकार, वह सहकार को जीव-वैज्ञानिक आधार पर एक जैविक प्रवृत्ति के रूप में स्थापित करते हैं। क्रोपाटकिन की स्थापना है कि अधिकांश पशु समुदायों में रहते हैं और प्रकृति की चुनौती का मुकाबला अकेले नहीं, बल्कि मिलकर करते हैं। वे पशु-जातियां ही अधिक संरक्षित और संवर्धित हुई है, जिन्होंने पारस्परिक सहयोग का रास्ता अपनाया। उदाहरण के रूप में गुरिल्ला और चिंपाजी जातियों को लिया जा सकता है। जिन पशु-जातियों में सामुदायिकता की भावना कम पाई जाती है, वे धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार की ओर जाती गई है। मनुष्य-जाति के विकास को भी वह जंगली, अर्ध-जंगली, ग्राम्य, मध्यकालीन नागर और आधुनिक काल में विभाजित करते हुए प्रत्येक दौर में मानव-अस्तित्व और उसके बहु-आयामी विकास के लिए संघर्ष के बजाय सहकार की प्रवृत्ति को श्रेय देते हैं, जो उनके अनुसार जैविकीसम्मत है। क्रोपाटकिन का मानना है कि अकेला मनुष्य न तो प्रकृति की विपरीताओं से पार पा सकता था और न परिवार या समाज का विकास हो सकता था। समाज में जितनी भी खामियां रही हों, पर समाज का होना ही पारस्परिकता की भावना का प्रमाण है। ग्राम्य समाजों या किलेबंद नगरों में रहने वाले समाजों का पारस्परिक सहयोग अधिक सांस्थानिक होता गया है और आधुनिक समाज भी-अपनी सारी कमजोरियों के बावजूद-संस्थाबद्ध पारस्परिक सहयोग के आधार पर ही टिका है।

क्रोपाटकिन सामाजिकता या सामाजिक एकप्राणता को वैयक्तिक प्रेम से भिन्न जैविक प्रवृत्ति किंतु उच्चतर नैतिकता मानते हैं, जो विकास का प्रमुख कारक है। क्रोपाटकिन के विचारों की समीक्षा करते हुए विकासवादी जैविकीविद् स्टीफन जे० गुल्क का कहना है कि क्रोपाटकिन का बुनियादी तर्क वैध है क्योंकि संघर्ष के कई रूप हैं और कई परिस्थितियों में सहकार किसी भी जाति के सदस्यों के लिए लाभदायक हो सकता है। एक और वैज्ञानिक डगलस एच० बाउचर की टिप्पणी है कि क्रोपाटकिन के विचार रूढिमुक्त हैं, पर वैज्ञानिक दृष्टि से सम्माननीय हैं और यह मान्यता आधुनिक सामाजिक जैविकी का अंग हो चुकी है कि पारस्परिक सहयोग सामर्थ्य को बढ़ाने का माध्यम हैं।

एम०एन० राय जैसे पूर्णतया भौतिकवादी तथा महात्मा गांधी जैसे अध्यात्मवादी विचारक क्रोपाटकिन की सामाजिक विकास की राय से सहमत होते हैं। राय लिखते हैं : यह सही है कि मनुष्य का प्राथमिक सरोकार उसका अपना अस्तित्व है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उसकी स्वार्थ -वृत्ति अपना ही अतिक्रमण करने के सामर्थ्य को भी उपजाती है। वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत इस तथ्य की अनदेखी करता है कि सहकार सदैव ही एक दृढ़तर सामाजिक कारक रहा है। अन्यथा, सभ्यता के प्रारंभ में ही समाज टुकड़े-टुकड़े हो जाता। राय के समरूप दृष्टि महात्मा गांधी के इस कथन से व्यंजित होती है : अगर दुनिया की कथा लड़ाई से शुरू हुई होती, तो आज एक भी आदमी जिंदा रहता......दुनिया लड़ाई के हंगामों के बावजूद टिकी हुई है। इसलिए लड़ाई के बल के बजाय दूसरा ही बल उसका आधार है। हजारों बल्कि लाखों लोग प्रेम के बल रहकर अपना जीवन बसर करते हैं। करोड़ों कुटुंबों का क्लेश प्रेम की भावना में समा जाता है, डूब जाता है। सैकड़ों राष्ट्र मेलजोल से रह रहे हैं, इसको हिस्टरी नोट नहीं करती, हिस्टरी कर भी नहीं सकती। जब इस दया की, प्रेम की और सत्य की धारा रुकती है, टूटती है, तभी इतिहास में वह लिखा जाता है। मानवेंद्रनाथ राय और महात्मा गांधी में फर्क सिर्फ यह है कि अध्यात्मवादी होने के नाते महात्मा गांधी दया, प्रेम आदि भावात्मक पदों का प्रयोग करते हैं, जबकि सहकार कुछ अधिक व्यावहारिक और सांस्थानिक पद है। लेकिन पारस्परिकता समाज का निर्धारक नियम है, यह दोनों मानते हैं।

यहां क्रोपाटकिन के लगभग समकालीन व्लादिमीर सर्गेयेविच सोलोव्योव और बाद की पीढ़ी के पितरम अलेक्जेंड्रोविच सोरोकिन के विचारों की चर्चा अस्थाने नहीं होगी क्योंकि दोनों ही पारस्परिक सहयोग और प्रेम को समाज-वैज्ञानिक अवधारणाओं के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्नीसवीं सदी के रूसी दर्शन में सर्वसहभाव (Sobornost) और उसके आधार पर विकसित अखंड ज्ञान (Integral Knowledge) की अवधारणाओं का विकास हुआ, जिसका तात्पर्य यह है कि ज्ञान को अलग-अलग खांचों में बांटकर नहीं देखा जा सकता-उसे समग्रतः एक अखंड या समेकित दृष्टि से समझने की आवश्यकता होती है। सोलोव्योव ने एक ऐसे दर्शन का विकास करने का प्रयत्न किया, जिसमें ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों और विचार-प्रणालियों के बीच मिलाप हो सके। सोलोव्योव की मान्यता है कि सर्वसहभाव की अवधारणा ही वह भूमिका है, जिसके आधार पर विरोधी विचारों में समन्वय किया जा सकता है। अखंड ज्ञानवादी रूसी दार्शनिकों में इस अवधारणा का बहुत महत्त्व रहा है। सोलोव्योव उन विचारकों में हैं, जिन्होंने दोस्तोयेवस्की और तोलस्तोय जैसे साहित्यकारों और सोरोकिन जैसे समाज-वैज्ञानिकों को गहरे स्तरों पर प्रभावित किया है। सोलोव्योव अपनी पुस्तक दि मीनिंग ऑफ लव में प्रेम को हमारी अधिकांश समस्याओं-तनावों का समाधान तथा मानवीय सार्थकता का अर्जन मानते हैं। वह कहते हैं कि प्रेम हमारी अहंबद्धता का अतिक्रमण करता और मनुष्य को समग्र का लघु रूप बना देता है। वह प्रेम को दो व्यक्तियों के पारस्परिक आकर्षण या शिशु-प्रजनन से अलग और बहुत बड़ी ऐसी अनुभूति मानते हैं, जिसमें संपूर्ण अस्तित्व की एकता का अहसास होता है। अहंबद्धता समस्त मानसिक हिंसा का मूल है, जिसका उपचार प्रेम की वह अनुभूति है, जिसका विस्तार न केवल सभी प्राणियों बल्कि पूरे ब्रह्मांड को अपने घेरे में ले लेता है।

सोलोव्योव की प्रेम की इस अवधारणा का सोरोकिन समाज-वैज्ञानिक दृष्टि से विश्ल्रेषण करते हैं। वह प्रेम को जीवन में हमारी समस्त रूचि का अन्य में केंद्रीकरण मानते हैं। मनुष्य की त्रासदी यह है कि वह स्वयं को केंद्र में रखते हुए अन्य सब कुछ को परिधि में रखता और उनके बाह्य और सापेक्षिक मूल्य को ही स्वीकार करता है। वह प्रेम के सात पहलुओं का जिक्र करते हैं, जिन्हें धार्मिक, नैतिक, तत्त्वमीमांसीय, भौतिक, जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलू कहा गया है। सोरोकिन परहितवाद (Altruism) का भी जैविक आधार स्वीकार करते हैं क्योंकि वह विकसित जैविक अचेतन से उद्भूत होता है। शेरिंगटन जैसे जीव-वैज्ञानिक का भी यह मानना है कि परहितवाद का भाव जीवन के मनुष्य स्तर के विकास में ही पाया जाता है। सोरोकिन के अनुसार मनुष्य की चेतना जैविक से सामाजिक स्तर पर होती हुई अंततः एक उच्चतर अवस्था में परिणत होती है-यद्यपि यह अभी बहुत कम मात्रा में है-जिसे अतिचेतना, अतिमन (Supraconscious) कहा जाता है। यह अवधारणा कुछ भेद के साथ श्री अरविंद में भी पाई जाती है। उल्लेखनीय है कि श्री अरविंद भी अखंड ज्ञानवादी कहे जा सकते हैं। सोरोकिन ईश्वरीय कृपा में विश्वास करते हैं, लेकिन, वह यह भी मानते हैं कि विज्ञान के विकास के साथ मनुष्य-मन का ज्ञान बढ़ेगा और इससे उन विधियों का आविष्कार होने में सहायता मिलेगी, जिनके माध्यम से अहं का अतिक्रमण हो सकेगा। प्रेम, सोरोकिन के अनुसार, जीवन का प्रयोजन और सार्थकता है। यह प्रेम जितना निरपेक्ष और सर्वसमावेशी, स्थाई, सघन और विविध आयामी तथा जीवन के सब पक्षों का प्रेरक होता जाता है, एक अहिंसक संस्कृति वाले समाज के विकास की संभावना उतनी ही मूर्त होती जाती है।

जीवन ही नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के एकत्व के विचार की पुष्टि पारिस्थितिकी विज्ञान के साथ-साथ भौतिकी की आधुनिक शोधों से भी होती है। दरअस्ल, पिछली शताब्दी में एकीकृत क्षेत्र सिद्धांत तथा क्वांटम सिद्धांत द्वारा इसे समझने के प्रयत्न हुए हैं। लेकिन, एकीकृत क्षेत्र प्रत्येक क्षेत्र को अलग मानकर किसी बाहरी संयोजन के माध्यम से उनकी परस्पर अंतःक्रिया की अवधारणा करता है-यद्यपि वह कण के बजाय क्षेत्र का आग्रह अवश्य करता है। क्वांटम सिद्धांत भी ब्रह्मांड की मशीनी अवधारणा को चुनौती अवश्य देता है, पर उसका पूरी तरह अतिक्रमण नहीं कर पाता क्योंकि अनिर्धार्यता के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए भी उसमें तत्वों को बुनियादी अलगाव और बाह्यता बने रहते हैं। डेविड बोम अपनी पुस्तक होलनेस एंड दि इंप्लीकेट ऑर्डर में उपर्युक्त दोनों सिद्धांतों की सीमाओं और अंतर्विरोधों का निर्देशन करते हुए एक अंतर्वलित तंत्र (Implicate order) की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि प्रत्येक वस्तु प्रत्येक वस्तु में अंतर्वलित है और इसलिए प्रत्येक अंश में समग्र विद्यमान है। बोम इसे होलोग्राम (Hologram) के उदाहरण से स्पष्ट करते हैं, जिसमें एक अंश के चित्र में समग्र वस्तु के बारे में जानकारी रहती है। बोम के अनुसार सभी अंश परस्पर अंतःक्रिया में संलग्न पृथक अस्तित्वों के बजाय एक समग्र क्रियाशीलता (Life Implicit) में पर्यवसित होते हैं और समग्रत्व भी एक अनवरत प्रक्रिया है, जिसमें नए समग्र निरंतर प्रकट होते रहते हैं। इसी आधार पर बोम यह स्थापित करते हैं कि पदार्थ और चेतना या निर्जीव और सजीव आत्यंतिक रूप से पृथक नहीं है और अंतर्वलित जीवन (Life Implicit) ही अभिव्यक्त जीवन और निर्जीव पदार्थ का मूल है और यह मूल ही प्राथमिक, स्वयंभू और सार्वभौमिक है। यह सिद्धांत जीवन और निर्जीव पदार्थ को विच्छिन्न नहीं करता, बल्कि एक को दूसरे में अंतर्वलित मानता है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि पदार्थ या जीवन के विभिन्न रूपों का अपना कोई नियम नहीं हैं, लेकिन सभी नियमों को बोम सापेक्ष स्वायत्त उप-समग्रता का नियम कहते हैं, जो, अंततः, अंतर्वलित जीवन के नियम होलोनॉमी (Holonomy ) से नियमित है। बोम अंतवर्लित जीवन के सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में विकास सिद्धांत की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि विकास एक सार्वभौमिक सनातन प्रक्रिया है, जिसमें हमारे साथ हमारे विचार और प्रायोगिक अन्वेषण भी शामिल है।

यह सिद्धांत, दरअस्ल, केवल अभिव्यक्त जीवन के एकत्व को ही नहीं बल्कि समग्र अस्तित्व के एकत्व को तथा उसमें अंतर्वलित जीवन को स्वीकार करता है, इसलिए इसे अहिंसा की विज्ञान सम्मत तत्वमीमांसा के रूप में देखा जा सकता है। यहां इस बात का उल्लेख भी समीचीन होगा कि जीवन और निर्जीव आंतरिक एकत्व का सिद्धांत इस तथ्य से भी प्रमाणित है कि मूलतः जीवन की उत्पत्ति भौतिक पदार्थ से है और वनस्पति जगत से लेकर मानव-जगत तक जीवन-तत्त्व एक ही है। पशुओं पर किए जा रहे प्रयोगों के आधार पर मानव-चिकित्सा के शोध तथा मानव-रूप के विकास-पूर्व की स्थिति वाले जीवन अर्थात् बंदरों और चिंपाजी के जीनों तथा मानव-जीनों से अत्यंत कम अंतर भी जीवन की मौलिक एकता को प्रमाणित करता है।

यहां प्रसिद्ध उपयोगितावादी दार्शनिक जेरेमी बेंथम और पशु-मुक्ति के विचार के प्रस्तोता पीटर सिंगर का उल्लेख समीचीन होगा जो पशुओं और मानव-प्राणियों में समानता का आग्रह करते हुए मानवाधिकारों की तर्ज पर पशु-अधिकारों का प्रस्ताव करते हैं। यद्यपि प्राचीन धार्मिक नैतिकियों में मानव-मानवेतर जीव समता और जीव-दया का पर्याप्त महत्त्व है, लेकिन बेंथम और पीटर किसी दया भाव की नहीं बल्कि नैतिक स्तर पर पशुओं के अधिकारों की बात करते हैं। बेंथम ने अफ्रीकी गुलामों के प्रति अमानवीय व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि जिस प्रकार त्वचा के रंग के आधार पर असमानता को अनुचित माना जाने लगा है, उसी प्रकार पांवों की संख्या, दीर्घरोमी त्वचा आदि के आधार पर भी किसी के साथ असमान व्यवहार नहीं किया जा सकता और कभी वह दिन आ सकता है, जब शेष पशु-जगत भी वे अधिकार प्राप्त कर ले, जिनसे उसे अत्याचार द्वारा ही वंचित किया जा सकता है। बेंथम कहते हैं कि सवाल यह नहीं है कि पशु तर्क या बातचीत कर सकते हैं अथवा नहीं; सवाल यह है कि क्या उन्हें पीड़ा महसूस होती है, जैसे मनुष्यों को होती है। यदि पशु पीड़ा महसूस कर सकते हैं तो इसका तात्पर्य है कि उनका हित पीड़ा से मुक्ति पाना है और इस दृष्टि से उनका हित मनुष्यों के समान है। अतः, हित की समानता के आधार पर उन्हें समता की अवधारणा में शामिल नहीं किया जाना नीतिसम्मत नहीं होगा।

बेंथम के इस तर्क को एक और आयाम में रखते हुए पीटर सिंगर मनुष्यों के नस्लवाद (Specisism) को अनावृत्त करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार नस्लवादी लोग अपनी नस्ल के हितों को दूसरी नस्ल के हितों पर वरीयता देते हैं, उसी प्रकार मानव-जाति अपने हितों के लिए पशु-जाति के प्रति भेदपूर्ण व्यवहार करती है। इसे वह मनुष्यों का नस्लवाद या जातिवाद कहते हैं, जो उसी प्रकार अवैज्ञानिक और अनैतिक है, जैसे नस्लवाद या ऐसी ही असमानतामूलक अवधारणाएं और आचरण।

चेतना और पदार्थ को एक अंतवर्लित तंत्र के प्रक्षेप मानने के कारण, बोम के अनुसार, यह समझना गलत होगा कि प्रत्येक व्यक्ति एक अलग सत्ता है जो ममेतर अर्थात् अन्य व्यक्तियों और प्रकृति से अंतःक्रिया करता है। ये सभी एक ही समग्र के प्रक्षेप हैं, इसलिए अलगाव का बोध एक भ्रांति है, जिससे हिंसा पैदा होती है, जबकि समग्र के आधार-नियम के रूप में अंतर्वलित जीवन का बोध अहिंसा की मनोभूमि है। अंतर्वलित तंत्र का सिद्धांत अनुचिंतनप्रसूत वैदिक ऋत के सिद्धांत का विज्ञानप्रसूत बंधु ठहरता है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि बोम विचार को भी एक तंत्र (System) मानते हुए समग्र मानवीय चिंतन को एकल प्रक्रिया की तरह देखते हैं और उसके अर्थात् चेतना के विकास के लिए वह विचार-प्रक्रिया को संवाद-आधारित मानते हैं, जो अंततः समाज में अंतर्भूत अलगाव और विच्छिन्नता को मिटाने में सहायक हो सकता है। विचार को एक तंत्र मानने तथा मानव-चेतना के एकत्व के प्रत्यय को नॉम चॉमस्की के गहन भाषिकी (Deep Grammar) के सिद्धांत से भी समर्थन मिलता है, जिसके अनुसार चेतना के माध्यम भाषा के विविध रूपों में मूलतः एक ही भाषातंत्र अंतर्भूत है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे जीवन के विविध रूपों में एक ही जीवन-तत्त्व का वैविध्यपूर्ण प्रस्फुटन है। गहन भाषिकी का सिद्धांत मानव-चेतना के एकत्व के सिद्धांत को भाषिक आयाम में प्रमाणित करता है। यह माना गया है कि यह अंतः सांस्कृतिक संप्रेषण का आधार है, जिसके बिना विभिन्न विचारों में संवाद संभव ही नहीं है और संवाद एकत्व की ही तो अभिव्यक्ति है।

यह उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी जैसे अध्यात्मवादी विचारक भी अहिंसा-धर्म की पृष्ठभूमि में सक्रिय वैज्ञानिक नियमों का जिक्र करते हैं। वह अहिंसा या प्रेम को अस्तित्व का नियम मानते और अधुनातन वैज्ञानिक सिद्धांतों से अपनी बात की पुष्टि करते हैं। जिस प्रकार प्रकृति की द्वंद्वात्मकता का नियम अर्थात् द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, मार्क्सवादी दृष्टि में, ऐतिहासिक भौतिकवादी वर्ग-संघर्ष में परिणत हो जाता है, उसी प्रकार जड़ पदार्थों में व्याप्त संसजक बल मानवीय जीवन में प्रेम में बदल जाता है। गांधीजी के अपने शब्दों में : वैज्ञानिक बताते हैं कि जिन अणुओं से मिलकर हमारी पृथ्वी की रचना हुई है, उनके बीच यदि संसजक या संसक्तिशील बल विद्यमान हो तो पृथ्वी खंड-खंड हो जाएगी और हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा; और जिस प्रकार जड़ पदार्थों में संसजक बल है,उसी प्रकार सभी चेतन पदार्थों में भी यह बल उपस्थित होना चाहिए और चेतन पदार्थों में इस संसक्तिशील बल का नाम है प्रेम। हमें इसके दर्शन पिता-पुत्र में, भाई-बहन में, मित्र-मित्र में होते हैं, लेकिन हमें समस्त जगत के बीच इस बल के प्रयोग का अभ्यास डालना चाहिए; इसी प्रयोग में हमारा ईश्वर का ज्ञान निहित है। जहां प्रेम है वहां जीवन है; घ्रृणा विनाश की ओर ले जाती है। और ऐसा नहीं है कि इस संसक्तिशील बल की बात गांधीजी ने वैसे ही कर दी है क्योंकि वह पूर्व-उद्धृत कथन के करीब एक दशक बाद फिर उसी पदावली को दोहराते हैं : मेरा मानना है कि मानव-जाति की ऊर्जा का कुल योग हमारे अपकर्ष के लिए नहीं, बल्कि हमारे उत्कर्ष के लिए है और यह प्रेम के नियम के अचेतन किंतु निश्चित प्रवर्तन का ही परिणाम है। मात्र यह तथ्य कि मानव-जाति का अस्तित्व बरकरार है, इस बात का प्रमाण है कि संसक्तिशील बल विच्छेदक बल से अधिक शक्तिशाली है, अभिकेंद्री बल अपकेंद्री बल से बढ़कर है। एक अन्य जगह वह अहिंसा के इस बल को उस गुरुत्वाकर्षण से जोड़कर देखते हैं जो पूरी सृष्टि की एकता का आधार है : जिस प्रकार पृथ्वी गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से बंधकर अपनी कक्षा में स्थित है, उसी प्रकार सारा समाज अहिंसा के सूत्र से बंधा है। लेकिन, जब गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज हुई तो उस खोज के अनेक ऐसे परिणाम सामने आए, जिनका ज्ञान हमारे पूर्वजों को नहीं था। इसी प्रकार, जब समाज की रचना सोच-समझकर अहिंसा के नियम के अनुसार की जाएगी तो उसकी संरचना की भौतिक विशेषताएं जैसी आज हैं, उनसे भिन्न होगी। दरअस्ल, गुरुत्वाकर्षण और संसक्तिशील या अभिकेंद्री बल के सिद्धांत पृथक अस्तित्वों के बीच संबंध स्थापित करने के नियम अवश्य हैं, पर एक अलगाव का बोध उनमें बना रहता है। इसी अंतर्विरोध को सुलझाते हुए डेविड बोम का उपरोक्त अंतर्वलित जीवन का सिद्धांत पदार्थ और चेतना के सभी रूपों में एकत्व स्थापित कर देता है।

वैज्ञानिक दृष्टि यह मानती है कि प्रकृति से उद्भूत और उसका अंग होने के नाते प्रकृति का नियम मनुष्य और उसके व्यवहार पर भी लागू होता है और उसी को आधार बनाकर वह सही दिशा में अपने जीवन की प्रगति कर सकता है। अतः, इस आधार पर विभिन्न दार्शनिक प्रणालियों ने प्राकृतिक विज्ञानों द्वारा अन्वेषित प्रकृति के नियमों की दार्शनिक व्याख्याएं की हैं। श्री अरविंद भी ऐसे प्रमुख आधुनिक भारतीय दार्शनिक हैं, जो विकासवादी सिद्धांत की व्याख्या प्रकृति के विकासात्मक प्रत्यय के रूप में करते हैं। उनका कहना है कि प्रकृति सदैव गत्यात्मक और विकासशील है। लेकिन, इस गत्यात्मकता में कुछ ऐसे सनातन सत्य या सिद्धांत अंतर्निहित हैं, जिनके आधार पर ही मनुष्य जाति का पूर्णता की ओर विकास हो सकता है। इस नियम के प्रतिकूल जाने पर असमाप्य अराजकता फैल सकती है। जीवन के नियमों के इस निर्धारण में इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि हम क्योंकि अपूर्ण और विकासशील अस्तित्व हैं, इसलिए इन नियमों की भी दो कोटियां हो जाती हैं : हमारी वर्तमान वास्तविकता का नियम और हमारी संभावना का नियम। हमारी वास्तविकता हमारे जीवन के आज तक के विकास के स्तर की अभिव्यक्ति है; लेकिन, हमारी संभावना नए रूपों की ओर संकेत करती है। वास्तविकता और संभावना के बीच हमारी बुद्धि वर्तमान नियमों और रूपों को ही हमारी प्रकृति और अस्तित्व के सनातन नियम मानकर उससे किसी परिवर्तन को विचलन या पतन मान लेती है, या इसके विपरीत किसी भविष्य और संभाव्य नियम को सनातन आदर्श मानकर उससे हमारे विचलन को हमारी गलती या पाप मान लेती है। वास्तव में, सनातन वही है जो सभी परिवर्तनों के बीच स्थिर रहता है और हमारा आदर्श उसकी प्रगत्यात्मक अभिव्यक्ति से अधिक कुछ नहीं हो सकता। श्री अरविंद के अनुसार, प्रकृति जीवन को तीन प्रकारों में रचती है : वंश (जीनस), जाति और व्यक्ति। प्राणी जगत में यह विभाजन बना रहता है, लेकिन स्व-चेतन मानव-जाति में प्रकृति इन विभाजनों का अतिक्रमण कर पूरी जाति में एकता और एकत्व के बोध के लिए निर्देशित करती है। मानव-समुदाय एक ही वंश या जाति की सहज सामूहिकता के अलावा, स्थानीयता, हित-साधन और विचारों के आधार पर भी संगठित होते हैं और ये सीमाएं जातियों, राष्ट्रों, हितों, विचारों और संस्कृतियों के पारस्परिक संगमन से टूट भी जाती हैं। तब भी, इस अलगाव के टूट जाने पर भी, उनका तथ्यात्मक अस्त्वि बना रहता है क्योंकि वे प्रकृति के एक आधारभूत नियम-एकता में विविधता पर आधारित होते हैं। श्री अरविंद के अनुसार इसका तात्पर्य है कि प्रकृति का आदर्श या अंतिम लक्ष्य प्रत्येक व्यक्ति और सभी व्यक्तियों के संपूर्ण सामर्थ्य का पूर्ण परितोष तक विकास है। इस नियम की अवहेलना के कारण हमारे जीवन में परस्पर संघर्ष, विचारों-भावनाओं ओर हितों का विरोध तथा कई प्रकार के युद्धों या एक प्रकार की बौद्धिक या भौतिक लूट-यहां तक कि दमन और विनाश आदि द्वारा अपना हित साधने का प्रचलन दिखाई देता है। श्री अरविंद की मान्यता है कि प्रकृति का वास्तविक नियम विविधता को बल देने वाली एकता है। उसका यह गुप्त संदेश इसी बात से उजागर है कि एक ही नियम से संचालित होने के बावजूद उसका आग्रह अनंत वैविध्य या भिन्नता पर है। उसकी मानव-योजना एक है, लेकिन कोई भी दो मनुष्य अपनी बनावट में बिलकुल समान नहीं होते। मानव-प्रकृति मोटे तौर पर समान है; लेकिन, किन्हीं भी दो मनुष्यों का स्वभाव, चारित्रिकताएं और मनोवैज्ञानिक बनावट एक सरीखे नहीं होते। जीवन अपनी आधारभूत योजना और सिद्धांत में एक है; यहां तक कि वनस्पति और पशु भी मनुष्य के मान्य कुटुंबी हैं-लेकिन, जीवन की यह एकता अनंत विविधताओं को स्वीकार और प्रोत्साहित करती है। व्यक्तियों के समान मानव-समुदाय भी अपनी विशिष्ट चारित्रिकता, रूपभेद सिद्धांत और प्राकृतिक विधि विकसित करते हैं। विविधता का सिद्धांत स्वतंत्र अंतस्संबंधों में बाधा नहीं है, वह जीवन की समग्रता के विरोध में नहीं जाता। श्री अरविंद के अनुसार, एकता और विविधता के बीच इस संगति में ही जीवन का रहस्य अंतर्निहित है। एकता और विविधता की संगति के इस स्वीकार का ही नाम अहिंसा है।

जब हम कहते हैं कि मनुष्य जीवन की विकास-प्रक्रिया का एक स्तर है, तब उसका एक मानी यह भी होता है कि वह विकासशील चेतना है क्योंकि चेतना जीवन का ही गुणोत्कर्ष है और इसलिए जीवन की विकास-प्रक्रिया का एक अर्थ चेतना का विकास हो जाता है-खास तौर पर मनुष्य के संदर्भ में। आत्मरक्षा जीवन की सहज प्रवृत्ति है, लेकिन चेतना का विकास होने पर आत्म का दायरा विस्तृत होता जाता है क्योंकि अपने और शेष जीवन के साथ एक तात्त्विक ऐक्य का भाव विकसित हो जाता है। संतान, परिवार, जाति, धर्म, वर्ग, राष्ट्र आदि आत्म के इसी विस्तार के दायरे हैं-और दायरे हैं, इसलिए उन से होने वाली आत्म की पहचान और इनके माध्यम से जीवन के एकत्व के बोध की एक सीमा है, जिसे न समझ पाने पर आत्म का विस्तार और उसकी पहचान बाधित होती है। तब वह न केवल निर्दोष सत्य नहीं हो सकती, बल्कि कई बार उसी को अंतिम मान लेने पर एक आत्म-प्रंवचना भी हो जाती और इस प्रकार जीवन और चेतना के विकास में बाधा भी हो जाती है। नस्लवाद, राष्ट्रवाद, संप्रदायवाद, वर्गवाद, साम्राज्यवाद आदि के कारण इतिहास में जो हिंसा घटित होती रही है, वह इसी दृष्टिभ्रम का परिणाम है।

जो लोग मानव-जीवन में हिंसा के अनिवार्य प्रयोग पर बल देते हैं, वे भी यह तो मानते हैं कि प्रवृत्ति के रूप में हिंसा बुरी है। लेकिन, उनकी राय में, इसके बिना काम नहीं चल सकता। क्रांतियों के प्रसंग में जब हिंसा पर बात की जाती है, तब भी यही कहा जाता है कि साध्य के आधार पर साधन की पवित्रता को आंकना चाहिए। इसी में क्या यह भाव निहित नहीं है कि हिंसा है तो अनुचित-पर यदि किसी अच्छे उद्देश्य के लिए उसका उपयोग करना पड़े तो वैसा किया जा सकता है? इसका सीधा मतलब यही होता है कि हिंसा अपने-आप में कोई मूल्य नहीं है-यद्यपि कभी आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग किसी अच्छे उद्देश्य के लिए भी किया जा सकता है।

इससे भी यह तो तय हो ही जाता है कि हिंसा की प्रवृत्ति अपने-आप में एक अमानवीय प्रवृत्ति है, जो जीवन और चेतना की विरोधी बल्कि उनके विनाश की ओर उन्मुख प्रवृत्ति है। इसी से यह स्वयमेव सिद्ध है कि, मूलतः, अहिंसा एक ऐसी मानवीय प्रवृत्ति है, जो न केवल मनुष्य को पाशविकता के स्तर से ऊपर उठाती है, बल्कि उसे पूरे जीवन के साथ अस्तित्वगत ऐक्य का अनुभव भी करवाती है। यही भाव अहिंसा का मूल भाव है और चेतना के विकास का मतलब इस भाव का गुणोत्कर्ष होते जाना है। इसलिए अहिंसा कोई निषेधात्मक प्रत्यय नहीं बल्कि यह मनुष्य होने की मूल शर्त है। जो लोग यह कहते हैं कि हिंसा मनुष्य के स्वभाव में है, वे यह भूल जाते हैं कि मनुष्य विकास-प्रक्रिया के एक स्तर पर है, जिसके आगे का विकास अहिंसा के भाव पर आधारित है। मनुष्य नाम का जीव जितना अधिक अहिंसक होता जाएगा, उतना ही वह मनुष्यत्व को अधिक अर्जित करता जाएगा और उसी में से उसके भावी विकास की दिशा खुलेगी।

इसका तात्पर्य यह हुआ कि चेतना के विकास का तात्पर्य है मनुष्य का निरंतर अहिंसक होते जाना-निषेधात्मक नहीं, विधायी अर्थों में। जीवन मात्र के, अस्तित्व मात्र के प्रति लगाव, प्रेम, करुणा, अनुकंपा का भाव और उसका सूक्ष्मतर बोध अहिंसा के भाव की ही गुणाभिव्यक्तियां हैं। अहिंसक होना ही वास्तविक अर्थों में मनुष्य होना और जीवन के विकास की गति में सार्थक भूमिका निबाहना है।

धार्मिक और अनुचिंतनात्मक दर्शनों तथा प्राकृतिक विज्ञान की ज्ञान-मीमांसा के आधार पर जीवन का एकत्व तत्त्व या सत् के रूप में प्रतिष्ठित होता है और इसकी नैतिकी के रूप में स्वाभाविक ही अहिंसा-क्योंकि अहिंसक आचरण के विविध रूप जीवन के एकत्व के बोध को संपोषित करने की ही विविध-स्तरीय प्रक्रियाएं हैं। इस तरह अहिंसा एक मानव-मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित होती है और संस्कृति मूलतः मूल्यान्वेषण और मूल्यानुभूति की ही गत्यात्मक प्रक्रिया है। इस अर्थ में अहिंसा किसी विशिष्ट संस्कृति-रूप नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव-संस्कृति के बुनियादी मूल्य के रूप में स्वीकरणीय है, जिसे सभी धर्मों और अनुचिंतनात्मक दर्शनों के साथ-साथ विज्ञानसम्मत तत्त्वमीमांसीय आधार प्राप्त है। लेकिन, मूल्य आचरण की मांग करते हैं- उन्हें केवल काल्पनिक स्तर पर अनुभूत नहीं किया जा सकता-और आचरण का संबंध जितना आदर्श से है, उतना ही मानव-प्रवृत्तियों से भी। इसलिए, यह देखना आवश्यक हो जाता है कि हम जिस मूल्य को मानव-व्यवहार के आदर्श के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, उसके लिए मानव-प्रवृत्ति या कहें कि मनुष्य की मनोवैज्ञानिक बनावट में कितनी संभावना है-क्योंकि यदि मानव-मन की बनावट में अहिंसा एक स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं है तो आचरण में उसके चरितार्थ होने की संभावना नगण्य ही रहती है।

मनोवैज्ञानिकों में इस बात को लेकर अनवरत विमर्श जारी है कि क्या अहिंसा मनुष्य में अंतर्जात है। इस सवाल को इस तरह भी देखा गया है कि हिंसा या आक्रामकता मनुष्य में अंतर्जात है अथवा अर्जित या परिस्थितिगत। शरीरक्रिया वैज्ञानिकों और तंत्रिका-मनोवैज्ञानिकों में इस बात पर सर्वसम्मति नहीं है कि हिंसा मनुष्य का मूल स्वभाव नहीं है; लेकिन, एक बड़ी संख्या में इस क्षेत्र के शोधार्थियों का मानना यह प्रतीत होता है कि हिंसा यदि अंतर्जात है भी तो भी उसकी अभिव्यक्ति बाह्य उत्तेजना या परिस्थितिगत दबाव से प्रतिक्रिया में होती है।

उन्नीसवीं शताब्दी में प्रसिद्ध जीव-विज्ञानी सेसर लोंब्रोसो (Cesar Lombroso) ने मत प्रकट किया था कि मनुष्य के हिंसक व्यवहार का प्रमुख कारण जैविक होता है। जैविक से उनका तात्पर्य आनुवंशिक कारणों से मस्तिष्क की विशिष्ट जैविक संरचना से था। लोंब्रोसो की मान्यता के अनुसार हिंसक व्यवहार या आपराधिक क्रियाशीलता ऐसे व्यक्तियों में अंतर्जात होती है-अर्थात् वे जन्मजात हिंसक या अपराधी होते हैं। लोंब्रोसो मनुष्य के सामाजिक वातावरण को उसके हिंसक व्यवहार के लिए उत्तरदायी नहीं मानते थे। लेकिन, लोंब्रोसो की मान्यता अपराधी या हिंसक व्यक्तियों पर उनके मस्तिष्क की विशिष्ट जैविक संरचना के कारण लागू होती है, मानव-जाति पर नहीं। स्पाट्ज वाइडम जैसे विद्वानों ने अपने शोध से प्रमाणित किया है कि हिंसक व्यवहार वाले माता-पिताओं के बच्चों का हिंसक होना अनिवार्य नहीं है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जॉन वाटसन के इस विषय पर गहन शोध का निष्कर्ष है कि हिंसक व्यवहार का मुख्य कारण आनुवंशिक या जैविक नही बल्कि परिवेशगत है। आधुनिक अपराध-विज्ञान के विशेषज्ञ भी अधिकांशतः वाटसन के विचारों से सहमत दिखाई देते हैं कि हिंसक व्यवहार का कारण सामाजिक परिवेश और मनोवैज्ञानिक वातावरण है।

कानराड लारेंज के शोध मुख्यतया आक्रामकता पर केंद्रित है। प्राणी-जगत के व्यवहार का अध्ययन करते हुए लारेंज आक्रामकता को अंतर्जात मानते हैं। अपनी पुस्तक ऑन एग्रेसन में लारेंज मछलियों (chiclid fish) का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि यदि अन्य जाति की मछलियों को पहुंच से दूर कर दिया जाए तो इस जाति का नर-मत्स्य अपनी ही साथिन और संतति के प्रति आक्रामक हो जाता और उन्हें नष्ट तक कर देता है। लारेंज के निष्कर्ष की हीलिजेनबर्ग (Heiligenberg) के शोध से भी संपुष्टि होती है, जो यह बताता है कि इस मछली को यदि अन्य पर आक्रमण के अवसर से वंचित कर दिया जाए तो उसकी मौखिक कार्यशीलता में उत्खनन (Digging) का औसत बढ़ जाता है। ऐसे उदाहरणों को प्राणियों में अंतर्जात आक्रामकता की उपस्थिति के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

यह उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने भी मुमूर्षा (Death Instinct) को प्रमुख मानसिक वृत्ति मानते हुए आक्रामकता को उसका बाह्योन्मुख अनुप्रेक्षण मान लिया था। फ्रायड की सर्वाधिक प्रतिभाशाली उत्तराधिकारी मेलेनी क्लीन (Melanie Klein) का मानना है कि मनुष्य में शैशव-काल से ही आक्रामकता प्रकट होने लगती है क्योंकि शिशु में प्रेम और घृणा का द्वंद्व अंतर्जात होता है। वह भी यह स्वीकार करती हैं कि यह प्रवृत्ति मुमूर्षा का बाह्य जगत की ओर अनुप्रेक्षण है।

यह सवाल भी किया जा सकता है कि यदि आक्रामकता अंतर्जात है भी तो क्या उसकी अभिव्यक्ति और उसका हिंसक स्वरूप में ही होना अनिवार्य है। क्या कोई धनात्मक या अहिंसक आक्रामकता भी संभव है?

जे०पी० स्कॉट, झिंग यांग कुओ, इबिल-इबेसफेल्ट और बर्कोविट्ज जैसे अध्येताओं का मानना है कि आक्रामकता अंतर्जात नहीं बल्कि बाह्य उत्तेजना की प्रतिक्रिया है। स्कॉट अपनी चर्चित पुस्तक एग्रेसन में कई मामलों में शोध करने के पश्चात् बताते हैं कि प्रत्येक मामले में कारण-श्रृंखला का अध्ययन यह बताता है कि ऐसा कोई शरीर क्रियात्मक साक्ष्य नहीं है, जो लड़ाई के लिए शरीर में किसी स्वतः स्फूर्त उत्तेजना की ओर इंगित करता हो। इसके आधार पर स्कॉट यह निष्कर्ष देते हैं कि बाह्य परिवेश में जो कुछ घटित होता है, उसके अतिरिक्त आक्रामक या रक्षात्मक लड़ाई की कोई जरूरत ही नहीं है। इसका सीधा तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति के परिवेश में आक्रामकता को उत्तेजित करने वाली स्थितियां न हो तो उसमें लड़ने की मानसिकता कभी विकसित नहीं होगी। इसे भूख, प्यास या यौनेच्छा की तरह अंतर्जात नहीं कहा जा सकता। लेकिन, स्कॉट यह जरूर मानते हैं कि मानव में कुछ ऐसी आंतरिक शरीरक्रियात्मकता अवश्य है, जिसे लड़ाई के लिए बाहर से उत्तेजित किया जा सकता है। स्कॉट के अनुसार यह भेद व्यावहारिक परिस्थिति में अधिक महत्त्व नहीं रखता, लेकिन, इसके आधार पर बाह्य परिवेश के परिवर्तन के माध्यम से आक्रामकता को संयमित करने की आशा की जा सकती है। यदि हमारी सामाजिक संरचना में हिंसात्मक प्रतिक्रिया का उत्तेजन पैदा करने वाली परिस्थिति न हो तो मनुष्य में आक्रामकता के उभरने का अवकाश ही नहीं होगा।

झिंग यांग कुओ का निष्कर्ष भी स्कॉट से मिलता-जुलता है। अपने प्रसिद्ध प्रयोग द्वारा कुओ ने यह सिद्ध किया कि यदि एक बिल्ली को एक चूहे के साथ प्रारंभ से ही रखा जाए तो वह बिल्ली चूहे को अपने साथी के रूप में स्वीकार कर लेती है और तब उसे कभी भी चूहों पर आक्रमण करने के लिए उत्तेजित नहीं किया जा सकता। कुओ कहते हैं कि अवयव-संस्थान का व्यवहार अपने में एक निष्क्रिय मामला है। एक प्रदत्त परिस्थिति में कोई मनुष्य या पशु किस तरह का आचरण करेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि उसे किस तरह पाला गया और किस तरह उत्तेजित किया जा सकता है। तूलेन के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक लाहे-संग-साई ने भी अपने शोध द्वारा यह दिखाया है कि प्राकृतिक शत्रु माने जाने वाले चूहा और बिल्ली भी एक-दूसरे के साथ सहयोग कर सकते और करते हैं। इस प्रकार की खोज मनोविज्ञान के इस रूढ़ सिद्धांत को गलत साबित करती है कि पशु-स्वभाव में अनिर्मूलनीय कलह-प्रेम का सहज ज्ञान है, जो लड़ाई अथवा युद्ध को अनिवार्य बना देता है। साई का शोध प्रकारांतर से सांस्कृतिक प्रशिक्षण के महत्त्व को स्वीकार करता है। अतः, हिंसा का सवाल मानव के मूल स्वभाव का मामला नहीं है क्योंकि मूल स्वभाव परिवर्तनीय नही होता-सामाजिक या सांस्कृतिक स्वभाव को बदला जा सकता है। यह निष्कर्ष हमें हिंसा-अहिंसा के सवाल को सांस्कृतिक-ऐतिहासिक मनोविज्ञान की दृष्टि से समझने के लिए भी प्रेरित करता है।

इतिहास में लगातार युद्धों और हत्याओं का होना मनुष्य द्वारा हिंसा का रास्ता अपनाने का ज्वलंत प्रमाण है। लेकिन, इनके आधार पर हिंसा को मानव-स्वभाव का अनिवार्य गुण नहीं माना जा सकता। इससे केवल इतना ही सिद्ध होता है कि कुछ परिस्थितियों में मनुष्य हिंसा का सहारा ले भी सकता है। शाकाहार और मांसाहार को लेकर भी यही तर्क दिया जा सकता है कि सभी मनुष्यों का मांसाहारी न होना इस बात के लिए यथेष्ट प्रमाण है कि मनुष्य की आहार-वरीयता उसके किसी मूल स्वभाव पर नहीं, बल्कि उपलब्धता और समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा निर्धारित होने के कारण प्रकृति-सापेक्ष एवं संस्कृति-सापेक्ष है। प्रो० ग्लेन डी पेज के इस कथन को अवैध नहीं माना जा सकता कि अधिकतर मनुष्य हत्या नहीं करते। उन सभी मनुष्यों में, जो अभी जीवित है और जो कभी जीवित थे, केवल कुछ ही लोग हत्यारे हैं। आप चाहे किसी भी समाज के मानव-हत्या के आंकड़ों पर विचार करें, यही सच है। पेज का तर्क है कि युद्ध में हुई हत्याओं में मानव-समाज की आधी आबादी स्त्रियों की भागीदारी नगण्य है। पुरुषों के बारे में भी पेज लेफ्टिनेंट कर्नल ग्रासमैन के इस कथन से सहमत हैं कि युद्ध एक वातावरण है जो इसमें भाग लेने वाले अठानवे प्रतिशत लोगों को मनोवैज्ञानिक रूप से दुर्बल बनाता है। दो प्रतिशत लोग, जो युद्ध में विक्षिप्त नहीं होते, पहले से ही विक्षिप्त अर्थात् आक्रामक मनोरोगी होते हैं।

इस मान्यता को तंत्रिका-वैज्ञानिकों से भी समर्थन मिलता है, जिसे ब्रूस ई० मार्टन ने न्यूरोरिएलिज्म कहा है। मार्टन के शोध का निष्कर्ष है कि मानव-मस्तिष्क में उच्चतर भावनाएं-सृजनात्मकता, परोपकार, सहयोग आदि-न्यूरोसेरेब्रल प्रणाली के अंतर्गत आती हैं, जो हर मनुष्य के मस्तिष्क में विद्यमान हैं और जिन्हें और सक्रिय किया जा सकता है। यह प्रणाली अहिंसक समाज का आधार मानव-मस्तिष्क में मानती है। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि इस जीव-वैज्ञानिक आधार का सांस्कृतिक मानसिकता के साथ समन्वय किया जाना चाहिए। प्रसिद्ध मानवविज्ञानी इरेनस इबल-इब्सफेल्ट इसीलिए अहिंसा की पृष्ठभूमि में जीव-वैज्ञानिक आधार देखते हुए कहते हैं कि शांति के लिए विश्वव्यापी इच्छा का मूल संस्कृति एवं जीव-वैज्ञानिक सिद्धांतों के बीच टकराव में स्थित है, जिसके कारण मनुष्य अपने जीव-वैज्ञानिक और सांस्कृतिक सिद्धांतों में समन्वय लाने की कोशिश करते हैं। हमारा अंतःकरण ही हमारी उम्मीद है और इस पर आधारित विवेक-निर्देशित क्रम-विकास ही शांति की ओर ले जा सकता है।

सांस्कृतिक मनोविज्ञान यह मानता है कि मनुष्य का आचरण और भावनाएं संस्कृति-सापेक्ष होने के कारण उनके बारे में कोई सार्वभौमिक सिद्धांत नहीं बनाए जा सकते। किसी व्यक्ति का हिंसक होना या न होना उस सांस्कृतिक मानसिकता पर निर्भर करता है, जिसमें उसका पालन-पोषण हुआ है। मानव-प्रकृति के रूप में आक्रामकता का अध्ययन इस मान्यता की पुष्टि करता है। मनोवैज्ञानिकों में आक्रामकता की परिभाषा और व्याख्या को लेकर कुछ मतभेद रहे हैं-और कुछ लोग आत्मरक्षात्मक आक्रामकता को आक्रामकता के रूप में स्वीकार नहीं करते। लेकिन, आत्मरक्षात्मक आक्रामकता भी यह तो सिद्ध करती ही है कि यह आक्रामकता अंतर्जात नहीं बल्कि स्थिति-सापेक्ष है और एक स्थिति में दो भिन्न संस्कृतियों में दीक्षित व्यक्ति भिन्न आचरण कर सकते हैं।

अमेरिका में हिंसा की स्थिति पर एक विस्तृत अध्ययन का यह निष्कर्ष उल्लेखनीय है कि प्रकृति हमें केवल हिंसा के लिए समर्थ बनाती है; हम उस सामर्थ्य का इस्तेमाल करें या नहीं, अथवा कैसा करें, यह हमारी सामाजिक परिस्थिति द्वारा निर्धारित होता है। इस सामाजिक परिस्थिति में सांस्कृतिक दीक्षा एक प्रमुख घटक होता है। ओटो क्लाइनबर्ग इसी अध्ययन के आधार पर निष्कर्षस्वरूप कहते हैं कि हिंसा न सार्वभौमिक है, न अनिवार्य और न ही प्रवृत्तिगत क्योंकि कुछ व्यक्तियों या व्यक्ति-समूहों में यह अधिक परिलक्षित होती है और कुछ में अत्यंत कम। कुछ समाज पूरी तौर पर अहिंसक पाए गए हैं। इसका क्या कारण है कि एक-सी परिस्थिति में एक व्यक्ति या समूह हिंसक हो उठता है और दूसरा नहीं?

इस सवाल पर विचार करते हुए अमरीकी समाजशास्त्री वोल्फगांग और इतालवी मनोवैज्ञानिक फेराकुती का कहना है कि यह संबंधित व्यक्ति या समूह की उपसंस्कृति पर निर्भर करता है। कुछ संस्कृतियों या उपसंस्कृतियों में रूढ़िबद्ध नैतिक प्रतिमान या लोक-मान्यताएं हिंसा को उचित और सम्माननीय मानती हैं, जबकि अन्य में ऐसा नहीं होता। जैन, वैष्णव आदि संप्रदायों के बारे में कहा जा सकता है कि उन संस्कृतियों में पोषित लोग सामान्य व्यवहार में कम हिंसक पाए गए हैं। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में कम हिंसक आचरण प्रदर्शित होना भी काफी हद तक उनकी सांस्कृतिक मनोरचना के कारण संभव होता है। मनोविज्ञान की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक शाखा के एक रूसी प्रर्वत्तक व्यीगोत्स्की के बाल-विकास के अध्ययन का निष्कर्ष है कि एक बच्चे की मनोरचना का विकास बड़ी हद तक उसकी संस्कृति और अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण पर निर्भर करता है। एक विशिष्ट सांस्कृतिक समूह में ऐतिहासिक परिस्थितिगत कारणों से कुछ उच्च मानसिक प्रकायरें का विकास होता है और माता-पिता तथा अन्य वयस्क लोगों के साथ सामाजिक अंतःक्रिया के माध्यम से व्यक्ति रूप में एक बालक अपनी सांस्कृतिक आदतें विकसित कर लेता है। व्यीगोत्स्की की इस मान्यता को सांस्कृतिक मध्यस्थता कहा जाता है। व्यीगोत्स्की इस सांस्कृतिक शिक्षण की मानव-विकास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका देखते हैं। सांस्कृतिक मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो हिंसक आचरण का विकास भी बहुत कुछ सांस्कृतिक वातावरण और तत्प्रसूत मनोरचना से प्रभावित होता है। यहां इस तथ्य का उल्लेख भी किया जाना संगत है कि मनुष्य के मस्तिष्क का सर्वाधिक नवविकसित हिस्सा सेरेब्रल कोर्टेक्स है, जो हमारे आवेगों से संबंधित हिस्से हाइपोथेलेमस को नियंत्रित और संतुलित रखता है तथा आत्मरक्षा की स्थिति में उसे संकेत देता है। मानव-विकास में इस नियंत्रक हिस्से का बड़ा महत्त्व है।

आक्रामकता और हिंसा के संदर्भ में यह सवाल उठाने की भी जरूरत है कि क्या आक्रामकता अनिवार्यत हिसंक ही होती है। क्या आक्रामकता धनात्मक या अहिंसक भी हो सकती है? कई शरीर क्रिया विज्ञानी और मनोवैज्ञानिक आक्रामकता को अंतर्जात मानते हुए भी उसे अनिवार्यतः हिंसक नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के विकास के लिए उपयोगी मानते हैं। फ्रायड और एडलर के बीच दरार का मुख्य कारण यही था कि फ्रायड यौनेच्छा को केंद्रीय मान रहे थे, जबकि एडलर श्रेष्ठता के लिए प्रतिस्पर्धा को, जो अपने में एक आक्रामक प्रवृत्ति कही जा सकती है। एडलर ने मनुष्य में आक्रामकता की उपस्थिति को स्वीकार करते हुए उसे शुरू में शक्ति (सत्ता) की आकांक्षा का नाम दिया, जो अनंतर श्रेष्ठता के लिए प्रतिस्पर्धा और अंततः पूर्णता के लिए प्रयास के रूप में विकसित हुई। इस प्रक्रिया में आक्रामकता धनात्मक स्वरूप लेकर सामाजिक भावना में से गुजरती हुई संपूर्ण मानवेतर जगत से जुड़ाव की आकांक्षा के रूप में अभिव्यक्त होती है। पूर्णता का लक्ष्य, एडलर के यहां, केवल वैयक्तिक नहीं है। यह भी स्मरणीय है कि एडलर बालक के विकास के लिए माता-पिता, परिवार और व्यापक स्तर पर पूरे सामाजिक परिवेश को उत्तरदायी मानते तथा उन्हें सलाह देते हैं कि उन्हें ऐसे प्रयत्न करने चाहिए कि बालक परिवार और समाज में अपने को अन्य के समान अनुभव कर सके क्योंकि समानता के बोध के अभाव में या तो उसमें हीनता- ग्रंथि का विकास होगा या श्रेष्ठता-ग्रंथि का। एडलर ने हीनता-ग्रंथि और श्रेष्ठता-ग्रंथि की अवधारणाओं का प्रतिपादन करते हुए यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक व्यक्ति की अचेतन आकांक्षा श्रेष्ठता प्राप्त करने की होती है। उसमें एक आत्म-आदर्श होता है, जिसे सामाजिक और नैतिक परिवेश से सामंजस्य बिठाना पड़ता है। यदि सामंजस्य ठीक से नहीं बैठ पाता तो व्यक्ति में हीनता-ग्रंथि विकसित होने लगती है, जो अहंकेंद्रीयता, सत्ताकांक्षा और आक्रामकता के रूप में अभिव्यक्त होने लगती है। इस प्रकार एडलर अंतर्जात आक्रामकता को स्वीकार करते हुए भी उसके हिंसक रूप ग्रहण करने के लिए पारिवारिक-सामाजिक परिवेश को उत्तरदायी मानते हैं।

यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि नवफ्रायडवादी कहे जाने वाले एरिक फ्रॉम, हार्नी और सल्लिवन जैसे मनोविश्लेषणशास्त्रियों ने जैविक आवेगों और आवश्यकताओं का महत्त्व स्वीकार करते हुए भी उन्हें मानवीय आचरण को प्रभावित करने वाली सर्वाधिक प्रबल प्रवृत्ति नहीं माना। एरिक फ्रॉम के अनुसार मानवीय व्यवहार को प्रभावित करने वाले सबसे प्रबल तत्त्व उसके अस्तित्व की स्थितियों में अर्थात् उसके मानव होने की स्थिति में ही होते हैं। मानव-स्थिति से फ्रॉम का तात्पर्य उस ऐतिहासिक-सामाजिक स्थिति से है, जिसमें मनुष्य आज है। मनोविश्लेषण के क्षेत्र में अपने अनुभवों और अध्ययन के आधार पर फ्रॉम ने निष्कर्ष स्थापित किया कि मनुष्य केवल जैविक आवेगों द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में जिन मानवीय प्रवृत्तियों-यथा स्वतंत्रता, प्रेम, सामाजिकता आदि का उसमें विकास हुआ है, वे ही उसकी जीवन-शैली और आचरण को प्रभावित करने वाली प्रेरक शक्तियां हैं-उन्हें किसी भी तरह जैविक आवेगों से दूसरे दरजे की प्रवृत्तियां नहीं माना जा सकता। एरिक फ्रॉम स्वतंत्रता और सामाजिकता को, जो सामाजिक चिंतन में मूल्य का दरजा रखते हैं, मनोविज्ञान के क्षेत्र में मानव-स्वभाव की सहजवृत्ति बना देते हैं। वह मानते हैं कि व्यक्ति-मानव के सामाजिक चरित्र के विकास के आधार पर ही समाज का भावी विकास निर्भर करता है और स्वतंत्रता तथा सामाजिकता के सम्मुख उत्पन्न खतरों के बावजूद आश्वस्त हैं कि स्वतंत्रता और प्रेम जैसी भावनाएं किसी भी तरह पूर्णतया और सदैव के लिए समाप्त नहीं की जा सकतीं क्योंकि वे मनुष्य में ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विकास-प्रक्रिया का परिणाम हैं।

इस संदर्भ में परहित के भाव का विश्लेषण किया जा सकता है, जिसे वैज्ञानिकों द्वारा एक विशिष्ट मानव-लक्षण बताया गया है। प्रसिद्ध तंत्रिकाविज्ञानी और नोबुल पुरस्कार से अलंकृत सर चार्ल्स शेरिंगटन के मतानुसार मानव-मस्तिष्क के उच्चतम चिंतन की परिणति परहित है-इस दृष्टि से किसी और प्राणी के मस्तिष्क की मानव-मस्तिष्क से तुलना नहीं की जा सकती। सवाल उठ सकता है कि क्या परहित का भाव मानव-विकास में अंतर्जात है या अर्जित। उदाहरण दिया जाता है कि यदि हम सड़क पर चलते हुए किसी बच्चे को अचानक गिरता हुआ देखते या किसी वाहन के उससे टकरा जाने की आशंका समझते हैं तो तत्काल स्वतःस्फूर्त ही उसकी सहायता के लिए सक्रिय हो जाते हैं-यद्यपि उस बच्चे से न तो हमारा कोई संबंध होता है और न स्वार्थ। क्या इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि परहित की भावना मानवीय अस्तित्व में अंतर्जात है। इसी तरह यदि हम अकारण किसी की हत्या नहीं करते अथवा उसे चोट नहीं पहुंचाते या प्राकृतिक आपदाओं आदि के समय अन्य की सहायता करने के लिए निःस्वार्थ भाव से सक्रिय हो जाते हैं तो यह मानव-स्वभाव में अहिंसा और परहित के अंतर्जात होने की ही अभिव्यक्ति है। इन भावनाओं को चाहे हम जैविक नहीं भी कहें, लेकिन जीवन के चेतना में गुणोत्कर्ष के परिणामस्वरूप, जिसे एरिक फ्रॉम ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया कहते हैं, अहिंसा और परहित मानव-चेतना में अंतर्जात है।

मानव मूलतः हिंसक नहीं है-इस बात का सत्यापन करते हुए विश्व के जाने-माने जीव-वैज्ञानिकों, मानव-विज्ञानियों, तंत्रिका-विज्ञानियों, मनोवैज्ञानिकों तथा समाज-वैज्ञानिकों ने सम्मिलित रूप से सेविले उद्घोषणा में कहा है कि वैज्ञानिक दृष्टि से यह कहना गलत होगा कि हमारे अंदर हिंसा की प्रवृत्ति हमारे पशु-पूर्वजों से उत्तराधिकार के रूप में मिली है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह कहना असत्य होगा कि मानव-स्वभाव में युद्ध अथवा किसी भी हिंसक व्यवहार की रचना आनुवंशिक रूप से हुई है...वैज्ञानिक दृष्टि से यह कहना असत्य है कि मानव के क्रमिक विकास में अन्य प्रकारों की तुलना में आक्रामक व्यवहारों का अधिक चुनाव हुआ है...वैज्ञानिक दृष्टि से यह कहना भी असत्य है कि युद्ध का कारण अंतःप्रेरणा अथवा कोई एक प्रेरणा है। इस घोषणा में यह भी कहा गया है किहमारा निष्कर्ष है कि मनुष्यता युद्ध के लिए जीव-विज्ञान द्वारा अभिशप्त नहीं है और जिस प्रजाति (अर्थात् मानव-जाति) ने युद्ध का आविष्कार किया, वही शांति का आविष्कार करने में भी समर्थ हैं।

स्पष्ट है कि हिंसा का सवाल जीव-वैज्ञानिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-सामाजिक सवाल है। हमारी समाजीकरण की प्रक्रिया अभी तक हिंसा के औचित्य या उसके द्वारा प्रदत्त बल का सम्मान करती, अर्थात् उसे वांछनीय मान लेती है। ब्रूस दि बोंता ने अपने शोध के दौरान ऐसे सैंतालीस जनजातीय समाजों की खोज की है, जहां अत्यधिक पारंपरिक सामंजस्य तथा नगण्यतम हिंसा है। यदि हिंसा मनुष्य का मूल स्वभाव होता तो किसी भी समाज में ऐसा नहीं हो सकता था। स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के तेबीस मनोचिकित्सकों की हिंसा के सवाल पर गठित समिति का निष्कर्ष कहता है : मानव-स्वभाव के बारे में हमारा जितना ज्ञान है, उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि हिंसा का युग समाप्त हो सकता है-यदि हम दूसरे विकल्पों को अपनाने का निश्चय करें।

 

इतिहास मानव-जाति की प्रयोगशाला है। हम प्रयोगों से लगातार सीखते हैं-उनकी सफलताओं से ही नहीं, असफलताओं से भी। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि हिंसा-अहिंसा के संदर्भ में इस प्रयोगशाला के नतीजे किस निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं। सामान्यतः, जब भी हम इतिहास की बात करते हैं तो हमारा ध्यान युद्धों, षड़यंत्रजनित सफलताओं, साम्राज्य-निर्माण और सांप्रदायिक तथा जातीय हिंसक संघर्षों की ओर जाता है-और ऐसा प्रतीत होता है जैसे समूचा इतिहास हिंसा की गौरव-गाथा है। इतिहास की पुस्तकों में सभी साम्राज्य-निर्माता नायक-छवि में प्रस्तुत किए जाते हैं। हिंसा से स्वयं को मुक्त करवाने के प्रयत्न भी अंततः हिंसा की वांछनीयता को ही प्रमाणित करते दिखाई देते हैं-चाहे उनका स्वप्न एक हिंसामुक्त समाज की रचना करना ही क्यों न रहा हो। कुछ नववामपंथी विचारक तो राजनीतिक उपाय के रूप में हिंसा को अपनाना न केवल क्षम्य बल्कि वरेण्य मानते हैं। कार्ल मार्क्स और उनके अनुयायियों को आवश्यकता पड़ने पर हिंसा से गुरेज नहीं था, लेकिन ये नववामपंथी तो उसी तरह हिंसा को एक मात्र उपाय मानने का आग्रह करते हैं, जैसे महात्मा गांधी सत्याग्रह को मानते हैं। इन नववामपंथी विचारकों का नेतृत्व फ्रैंज फेनन करते हैं। अपनी पुस्तक दि रेचिड ऑफ दि अर्थ में उनकी स्थापना है कि हिंसा के माध्यम से ही आम लोग सामाजिक सत्यों को जान पाते हैं, हिंसा व्यक्तियों की शुद्धि करती है, और यह दबे हुए लोगों को उनकी हीनता-ग्रंथि तथा निराशा और निष्क्रियता से मुक्ति दिलाकर उन्हें अभय और आत्मसम्मान लौटाती है। ज्यां पाल सार्त्र फेनन से सहमत होते हुए इसी पुस्तक की भूमिका में शोषण या दमन से मुक्ति के लिए हिंसा की प्राथमिकता को स्वीकार करते हैं। वह लिखते हैं कि जब कोई मूल अफ्रीकी किसी उपनिवेशी पर हिंसा का इस्तेमाल करता है तो अपनी खोई हुई निष्पापता का पुनराविष्कार करता है। बाल गंगाधर तिलक अपने ग्रंथ गीता-रहस्य में निष्काम कर्म की व्याख्या करते हुए उसका प्रयोजन लोक-संग्रह को मानते हैं और प्रतिपादित करते हैं कि लोक-संग्रह अर्थात् वैयक्तिक स्वार्थ और फलाशा से मुक्त कर्म में यदि हिंसा भी हो तो उसके शुभ-अशुभ फल का बंधन या लेप नहीं लगता। हर्बर्ट मारक्यूज अपनी पुस्तक क्रिटीक ऑफ प्योर टालरेंस में हिंसा को अनैतिक तो मानते हैं, लेकिन, उनका सवाल है कि इतिहास का निर्माण नैतिक मानदंडों के आधार पर कहां हो सकता है।

विचार की बात प्रथम तो यह है कि घृणा या क्रोध के बिना हिंसा संभव ही नहीं है, न परभाव के बिना; अतः, उसका निष्काम होना स्वीकार्य नहीं हो सकता। दूसरे यह कि यदि कोई व्यक्ति रागद्वेषादि से मुक्त होकर निष्काम हिंसा संपादित कर भी सकता हो और धार्मिक-नैतिक दृष्टि से उसे दोषमुक्त मान लिया जाए, तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि बाकी समाज पर उसका प्रभाव अशुभ नहीं होगा क्योंकि संपूर्ण समाज तो निष्काम भाव को प्राप्त नहीं होगा। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हिंसा और हिंसा के संघर्ष में विजय हिंसा की ही होती है-वही पक्ष जीतता है, जो अधिक हिंसा में समर्थ है-अनिवार्यतः वह नहीं जो सत्य और न्याय के साथ है। हिंसा निष्काम हो तब भी वह शक्ति के नियम से ही परिचालित होगी। निष्काम हिंसा के माध्यम से यदि हम किसी तात्कालिक उद्देश्य में सफल भी होते हैं, तब भी उससे हिंसा या शक्ति के नियम की सफलता ही तो प्रमाणित होगी, जो अन्याय की मूल है।

फ्रेंज फेनन स्वयं एक मनश्चिकित्सक रहे। लेकिन, उनका और उनके नववामपंथी मित्रों का हिंसा की ओर आकर्षण एक मनोरोग की तरह ही अधिक व्यक्त हुआ है। फेनन का तर्क है कि हिंसा का प्रयोग दमित-शोषित-उत्पीड़ित वर्ग में हीनभाव को मिटाकर आत्म-सम्मान पैदा करता है। लेकिन, यह तर्क विफलता-बोध से उत्पन्न क्रूर मानसिकता की उपज है-चाहे इस क्रूरता का कारण हमारी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिस्थिति में रहा हो-और इसलिए वह एक मानसिक विकृति है, जिससे अंततः फासीवाद पैदा होता है। जिस आत्मविश्वास और आत्मगौरव की बात नववामपंथी करते हैं, वह एक आक्रामक आत्मविश्वास है, जो किसी गहरी हीनभावना की अभिव्यक्ति होता है। अहिंसा जो आत्मविश्वास पैदा करती है, उसकी जड़ें एक गहरे नैतिक बोध में होती है। यह आत्मविश्वास न तो आक्रामक होता है और न उसमें हीन भावना ही होती है। अहिंसा एक स्वस्थ मन की अभिव्यक्ति है-यदि वह अहिंसा की आड़ में कायरता नहीं है। अतः, दलित वर्ग में जिस आत्मसम्मान के लौटने की बात फेनन और उनके साथी करते हैं, वह तो अहिंसा के माध्यम से ही संभव है। महात्मा गांधी का यह कथन स्मरणीय है कि क्रूरता का जवाब क्रूरता से देना अपने नैतिक और बौद्धिक दिवालिएपन को स्वीकार करना है और यह केवल एक दुश्चक्र को ही जन्म दे सकता है। सच तो यह है कि यदि शुद्ध उपयोगिता या व्यावहारिकता की दृष्टि से देखें तो भी क्रांतिकारी परिवर्तन के औजार के रूप में हिंसा सदैव असफल ही रही है। जयप्रकाश नारायण मानते हैं कि हिंसक क्रांति के लिए उन्हें कोई नैतिक आपत्ति नहीं है, लेकिन, न तो वह जल्दी हो पाती है और न ही कोई हिंसक क्रांति आज तक अपने मूल उद्ेश्य को पा सकी है। अपनी पुस्तक मेरी विचार-यात्रा में जयप्रकाश नारायण कहते हैं कि क्रांतिकारी जमात के हाथ में सत्ता के आ जाने मात्र से क्रांति को सफल नहीं कहा जा सकता क्योंकि वास्तविक लक्ष्य तो एक नई समाज-व्यवस्था का निर्माण करना होता है। जे०पी० पूछते हैं कि इतिहास में क्या एक भी ऐसी क्रांति हुई है, जो अपने अभीष्ट आदर्शों को प्राप्त करने में सफल रही हो। अहिंसक प्रक्रिया में तो परिवर्तन और नवनिर्माण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। दूसरे, यह भी देखा गया है कि राजनीतिक हिंसा के प्रति-क्रांतिकारी होने की संभावना अधिक रहती है क्योंकि हिंसक क्रांति हमेशा किसी-न-किसी प्रकार की तानाशाही को जन्म देती है। जयप्रकाश नारायण तोलस्तोय की उक्ति को थोड़ा बदलकर कहते हैं कि क्रांतिकारियों ने जनता के लिए सब कुछ तो किया है, केवल उसकी पीठ पर से उतरने का कष्ट नहीं किया है। यही कारण है कि साम्यवाद की संपत्ति संबंधी o-9धारणा से सहमत होते हुए भी गांधी जी ने हिंसा के आधार पर किसी स्थाई परिवर्तन की उम्मीद नहीं की। 1928 ई० में ही यंग इंडिया में अपने एक लेख में उन्होंने लिखा है कि बोल्शेविकवाद का अर्थ उनके लिए निजी संपत्ति की संस्था का उन्मूलन करना है, जो अर्थजगत् में अपरिग्रह के नीतिपरक आदर्श की प्रयुक्ति ही है। महात्मा गांधी इस आदर्श को स्वेच्छा से अपनाने या शांतिपूर्ण तरीकों से अपनाने के लिए प्रेरित करने का आग्रह करते हुए बोल्शेविक तरीकों से असहमति जताने के साथ स्पष्ट कहते हैं : मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि बोल्शेविक व्यवस्था का यह रूप बहुत दिनों तक नहीं चल सकता। कारण कि, मेरी यह पक्की धारणा है कि हिंसा के बल पर खड़ी की गई कोई चीज ज्यादा नहीं टिक सकती। इस भविष्यवाणी पर इतिहास ने भी अपनी मुहर लगा दी। यह आश्चर्यजनक है कि भारत के कम-से-कम तीन चिंतकों ने हिंसा पर आधारित साम्यवाद की कमजोरियों का विश्लेषण करते हुए, अंततः, उसके विफल होने की भविष्यवाणी की थी। महात्मा गांधी के अतिरिक्त दो अन्य चिंतक थे - डॉ० राममनोहर लोहिया और मानवेंद्रनाथ राय।

इतिहास के अध्येताओं का पर्याप्त ध्यान, दरअस्ल, इस बात की ओर नहीं गया है कि शनैः शनैः विश्व-इतिहास की धारा-हिंसक भटकावों के बावजूद-अहिंसा की ओर उन्मुख है। इतिहास के प्रारंभिक दौर में हिंसक बल के आधार पर किसी वस्तु को हथियाना-जिसका संगठित रूप युद्ध है-उचित माना जाता था। एक शक्तिशाली राज्य का यह जैसे पावन कर्तव्य समझा जाता था कि वह अपने से निर्बल राजाओं को सैन्य शक्ति के आधार पर पराजित कर उन्हें अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य करे या उनके राज्य को सीधे अपने साम्राज्य में मिला ले। साम्राज्य-निर्माण को एक स्वाभाविक और उचित आकांक्षा माना जाता था। विजिगीषु होना राजा होने का एक प्रमुख लक्षण माना गया। सारे प्राचीन महाकाव्य-चाहे वे रामायण-महाभारत हों या इलियड-ओडेसी-योद्धाओं के कारनामों के प्रशंसात्मक वर्णनों से भरे पड़े हैं। विद्वान लोग महाभारत का अंगीभूत रस शांत रस को मानते हैं, लेकिन लोक-मानस में युधिष्ठिर के बजाय भीम और अर्जुन की वीरता के किस्से अधिक अंकित रहे हैं।

यद्यपि प्राचीन विश्व-इतिहास में सभी सभ्यताओं में हिंसा की व्यर्थता और उससे उत्पन्न नैतिक-भौतिक अकल्याण को पहचानने वाले धर्म-प्रवर्त्तक और चिंतक रहे हैं-जैसे महावीर-बुद्ध, लाओत्से-कनफ्यूश्यस, यूनानी सिनिक और एपीक्यूरियन, ईसा और मुहम्मद आदि, जिनका असर दीर्घकालीन और विश्वव्यापी रहा है-लेकिन, इतिहासकारों का अधिक ध्यान विश्व-विजय का स्वप्न देखने वाले योद्धा नायकों की ओर ही रहा है। मानवता को विभिन्न समुदायों के पारस्परिक व्यापारिक और सांस्कृतिक-बौद्धिक संपर्क से जो लाभ हुआ है, वह युद्धों से नहीं। कुछ इतिहासकार व्यापारिक-सांस्कृतिक संपर्क का श्रेय भी विजय-अभियानों को देते हैं, मानो उनके बिना व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क संभव ही नहीं था। यदि बुद्ध की शिक्षाएं पूरे एशिया में फैल सकीं और सिल्क रूट का विकास हो सका तो इसका श्रेय व्यापरियों और धार्मिक-बौद्धिक प्रयत्नों को जाता है, किन्हीं विजय-अभियानों को नहीं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि विश्व-संस्कृति के विकास में युद्धों की वास्तविक भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता रहा है। इस बात की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि अपनी सारी शक्ति, वैभव और विशाल साम्राज्यों के बावजूद सामान्य जनता के आचरण और विश्वासों को सम्राटों और सेनापतियों ने उतना प्रभावित नहीं किया, जितना धार्मिक-सांस्कृतिक व्यक्तित्वों ने। अशोक अवश्य अपवाद है, पर उसके प्रभाव का कारण भी उसका युद्ध नहीं, बल्कि युद्ध-त्याग है। इतिहास की भौतिकवादी धारा में भी जितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका वैज्ञानिकों, तकनीशियनों और किसानों-व्यापारियोंकी रही है, उतनी सैनिकों की नहीं-और इतिहास-अध्ययन की नवीन दृष्टियां इस तथ्य को स्वीकार भी करने लगी हैं। साम्राज्य-निर्माण के वृतांतों के बजाय इतिहासकार यदि आज दर्शन, विज्ञान, कला-साहित्य और आर्थिक संस्थाओं आदि के विकास की प्रक्रियाओं और घटनाओं पर अधिक ध्यान देने लगा है तो यह इस बात का प्रमाण है कि वह मानव-विकास की प्रक्रिया के प्रेरक विचार के रूप में हिंसा के बजाय अहिंसा को स्वीकार करता जा रहा है।

सामान्य जन-मानस में आज यदि हिंसा त्याज्य मानी जा रही है तो यह हिंसा की ऐतिहासिक व्यर्थता के बोध की ही अभिव्यक्ति है। वीर भोग्या वसुंधरा को आज शायद ही कोई स्वीकार करने को प्रस्तुत हो-वे भी जो क्रांतिकारी या साधनात्मक हिंसा के माध्यम से एक अहिंसक समाज की रचना को साध्य मान रहे हैं। आज कोई व्यक्ति या समाज युद्ध को उचित मानने की घोषणा नहीं कर सकता। जो युद्ध करता भी है, वह उसे आत्मरक्षा की विवशता का परिणाम बताता है-अपने-आप में या आत्मरक्षा से इतर किसी अन्य स्वार्थ के लिए उसके इस्तेमाल का औचित्य नहीं बताता। यह बहुत संभव है कि आत्मरक्षा की दलील एक छद्म ही हो; लेकिन, इस छद्म का सहारा इसीलिए तो लेना पड़ रहा है कि विश्व-जनमत हिंसक उपायों का समर्थक नहीं रह गया है। स्पष्ट है कि इतिहास-प्रक्रिया ने भी विश्व-मानस में अहिंसा को एक मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया है-चाहे इस मूल्य की सांस्थानिक और व्यावहारिक क्रियान्विति दूर भी हो।

इतिहास-प्रक्रिया के अध्ययन से उजागर होने वाली एक और बात है केवल युद्ध या स्थूल हिंसा की ही नहीं, बल्कि शनैः शनैः हिंसा के सूक्ष्म और सांस्थानिक रूपों की भी अस्वीकृति। विश्व-जनमत आज किसी भी तरह के शोषण, दमन और उत्पीड़न अर्थात् संरचनागत हिंसा (Structural violence) को अनुचित मानता है। इतिहास की गति सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक हिंसक संरचना को पहचानती और उसके उन्मूलन की ओर उन्मुख दिखाई देती है। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का स्वप्न एक अहिंसक समाज का स्वप्न है। इन मूल्यों पर लगभग सारा विश्व-जनमत आग्रहशील है-चाहे इनकी व्याख्याओं को लेकर कुछ मत-वैभिन्य भी हो-यहां तक कि लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए शासन के लिए भी अबाधित संप्रभुता और मनमानी के अधिकार की स्वीकृति नहीं है। पूंजीवादी पद्धति का भी तर्क तो यही है कि वह सभी की सुख-समृद्धि के लिए सक्रिय है-केवल पूंजीपति वर्ग के लिए समर्पित नहीं। यह इस बात का संकेत है कि शोषण अर्थात् आर्थिक हिंसा को विश्व-जनमत का नैतिक समर्थन नहीं मिल सकता। दरअस्ल, अब धार्मिक, नस्लीय, भाषिक या लैंगिक या अन्य किसी भी प्रकार के भेद की अस्वीकृति किसी भी प्रकार की हिंसा का निषेध है। मानवाधिकारों की व्यापक स्वीकृति इस बात का प्रमाण है कि विश्व-जनमत ने अहिंसा को वैयक्तिक और सामूहिक आचरण की केंद्रीय प्रेरणा और कसौटी के रूप में कम-से-कम सैद्धांतिक स्तर पर तो स्वीकार कर ही लिया है। उल्लेखनीय है कि अपराधियों तक के साथ हिंसक व्यवहार को अनुचित माना जाने लगा है तथा कारागारों को सुधार-गृहों की तरह विकसित किए जाने का आग्रह लगभग सर्व-स्वीकार्य है। दांत के बदले दांत और आंख के बदले आंख के नियम पर आधारित न्याय-प्रणाली अब जघन्य अपराधों की सजा के रूप में भी मृत्यु-दंड के अस्वीकार तथा अपराधी के साथ भी हिंसक व्यवहार के बजाय उदार दयापूर्ण व्यवहार की मांग करने लगी है। पशुओं तक के अधिकारों की सैद्धांतिक स्वीकृति भी अहिंसा के विचार के बढ़ते प्रभाव का ही संकेत है। स्पष्ट है कि विश्व-इतिहास की प्रयोगशाला के नतीजे अहिंसा को जीवन के नियम के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। उसकी क्रियान्विति के सांस्थानिक और व्यावहारिक रूप विकसित करने वाली प्रौद्योगिकी का स्वीकार्य विकास ही विश्व-इतिहास की भावी दिशा का संकेत है।

अहिंसा को जीवन का नियम मानने का निहितार्थ जीवन के सभी रूपों में अहिंसानुकूल आचरण करना है-वैयक्तिक, अंतर्वैयक्तिक और सामूहिक जीवन के सभी रूपों में। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि न केवल हमारे निजी व्यवहार बल्कि सभी प्रकार की सामाजिक क्रियाशीलताएं-आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक क्रियाशीलताओं सहित-सदैव अहिंसा के भाव से प्रेरित और संभव सीमा तक उसके अनुकूल तथा उसे संपोषित करने वाली होनी चाहिए। जब हम यह मान लेते हैं कि मानव-विकास की आगामी संभावना चेतना के विकास की है और चेतना की दिशा प्रेम और अहिंसा की ओर उन्मुख है तो इसका निहितार्थ यह हुआ कि चेतना के विकास का अर्थ मनुष्य का निरंतर अहिंसक होते जाना है-निषेधात्मक नहीं विधायी अर्थों में। जीवन मात्र के-बल्कि अस्तित्व मात्र के प्रति लगाव, प्रेम, करुणा, अनुकंपा का भाव अर्थात् जीवन के एकत्व के सूक्ष्मतर बोध से प्रेरित भाव और आचरण अहिंसा है। अहिंसक होना ही वास्तविक अर्थों में मनुष्य होना और मानव-विकास की प्रक्रिया में सार्थक भूमिका निबाहना है।

लेकिन जब हम हिंसा या अहिंसा की बात करते हैं तो अक्सर उसका संदर्भ बहुत स्थूल और दैहिक होता है। हिंसक मनुष्य भी केवल हिंसक नहीं है-वह मनुष्य भी है, इसलिए बुद्धि का उपयोग भी करता है और यदि उसके उपयोग की पृष्ठभूमि में हिंसा की प्रवृत्ति हो तो उसके लिए बहुत सूक्ष्म और बौद्धिक तरीके भी ईजाद करता है। इसलिए हिंसा सिर्फ व्यक्तिगत प्रवृत्ति ही नहीं रहती, बल्कि सांस्थानिक-सामाजिक स्तर पर समाज के आचरण में भी प्रतिफलित होने लगती है। इसे संरचनागत हिंसा (Structural violence) कहा गया है, जिसमें हम बौद्धिक-सांस्कृतिक और उस विचारधारात्मक हिंसा को भी सम्मिलित कर सकते हैं, जो कई बार संरचनागत हिंसा का हिंसक प्रतिरोध होती है। जाति, नस्ल, वर्ग, राष्ट्र, भाषा और धार्मिक संप्रदाय आदि के आधार पर अपने को श्रेष्ठ समझना और दूसरे पक्ष को अपने से ओछा या हीन समझना हिंसा का ही सूक्ष्म रूप है।

हम उसी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था को उचित या वांछनीय कह सकते हैं जो मनुष्य की चेतना के विकास के लिए उपयुक्त और प्रेरक वातावरण की भूमिका निबाह सके। दूसरे शब्दों में, इस पूरी व्यवस्था का भी आधार विधायी अर्थ में अहिंसा को ही होना चाहिए; तभी विकास की प्रक्रिया में मनुष्य एक चेतन प्राणी होने के नाते अपने उत्तरदायित्व को निभा सकेगा। यदि वह इस उत्तरदायित्व को नहीं निभाता है तो वह जैविक स्तर पर तो मनुष्य कहला सकता है, लेकिन सांस्कृतिक और मूल्यगत स्तर पर नहीं। विकास की प्रक्रिया बड़ी धीमी, जटिल और भटकावों से भरी है। आज यदि हमारी व्यवस्था या प्रवृत्ति अहिंसा की दिशा की ओर पूरी तरह उन्मुख नहीं भी दीखती तो इसे इतिहास की एक और भटकन ही मानना चाहिए।

स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के तीनों प्रेरक सिद्धांत मूलतः अहिंसा के ही विभिन्न रूप हैं-चाहे फ्रांसीसी क्रांति में इनके विस्फोट का संदर्भ हिंसापूर्ण रहा हो। यही कारण है कि लोकतंत्र, समतावादी समाज और अंतर्राष्ट्रीयता तथा वैश्विकता की धारणाएं परस्पर-संबंद्ध धारणाएं हैं क्योंकि उन सब का उत्स अहिंसा की वह विधायी प्रवृत्ति है, जो मनुष्य के वास्तविक अर्थों में मनुष्य हो सकने का मूल आधार है। यह ठीक है कि अभी इन सबके रूप पूर्ण तोक्या संतोषजनक भी नहीं है और दुनिया की अधिकांश आबादी अपने अस्तित्व की जैविक आवश्यकताओं के संघर्ष में ही इस तरह उलझी है कि अन्य बातों की ओर या तो ध्यान ही नहीं जाता या उन्हें बौद्धिक विलास मान लिया जाता है। लेकिन, जैविक आवश्यकताओं के पूरा न हो सकने का भी एक मूल कारण क्या यही नहीं है कि चेतना को अपनी देह और संतान-परिवार से लेकर संप्रदाय और राष्ट्र तक के छोटे-बड़े दायरों में ही बांधा जाता रहा है। उसका सही अर्थों में वैश्विक बल्कि संपूर्ण अस्तित्व तक विस्तार नहीं हो पा रहा जो कि उसकी सही दिशा है। अस्मिता का बोध एक जैविक-सांस्कृतिक आवश्यकता है, लेकिन तब प्रत्येक की अस्मिता का सम्मान एक नैतिक उत्तरदायित्व बन जाता है। यदि अस्मिता-बोध आक्रामक या हिंसक अस्मिता में बदल जाए तो यह अपनी वास्तविक अस्मिता को भूल जाना है-अपनी नैतिक-आध्यात्मिक और मानव अस्मिता को। आवश्यक यह है कि हम अपनी वर्तमान दशा-दिशा को पहचानें और यदि वह हमें मनुष्य होने और चेतना के विकास से भटका रही हो तो उसे बदल देने के लिए सचेष्ट हों-सूक्ष्म से विराट् स्तरों तक। चेतनासंपन्न होने के नाते मनुष्य केवल यंत्रचालित व्यवहार नहीं कर सकता क्योंकि चेतना के रूप में वह अपने भावी विकास की दिशा को नियंत्रित-निर्धारित करने का सामर्थ्य पा चुका है। वह इतिहास या नियति का माध्यम मात्र नहीं रहता, बल्कि उसकी दिशा और प्रक्रिया का नियंता हो सकता है-जो वह है भी; तब स्वयं इतिहास ही मनुष्य की चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम हो जाता है। कार्ल मार्क्स ने इतिहास की स्वचालित द्वंद्वात्मक गतिकी का सिद्धांत निरुपित करते हुए जब यह कहा कि दार्शनिक दुनिया की व्याख्या भिन्न-भिन्न रूप में करते हैं, लेकिन, मुख्य बात उसे बदलने की है, तब क्या वह भी प्रकारांतर से मनुष्य के इस सामर्थ्य को ही नहीं स्वीकार कर रहे थे कि वही दुनिया के बदलाव का नियंता है। अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार मनुष्य को जीवन का उत्कृष्टतम गुणात्मक विकास माना गया है और उसका निर्धारक तत्त्व उसकी चेतना है-यानी चेतना न केवल मनुष्य को विशिष्ट बनाती है, बल्कि जीवन का गुणात्मक विकास है। मनुष्य चेतनासंपन्न है, अतः, उत्तरदायी भी-अपनी ही चेतना के प्रति उत्तरदायी क्योंकि उसके मानवत्व की सिद्धि इसी में है कि उसके प्रत्येक निर्णय व कर्म में यह उत्तरदायित्व प्रतिबिंबित हो। इस उत्तरदायित्व का सहज बोध ही वह मूल्य-बोध है, जिसकी अपेक्षा हर मानव-प्राणी से की जाती है। इसलिए परिस्थितियों-भौतिक और मानवीय दोनों प्रकार की परिस्थितियों-को मनुष्य के अनुकूल विकसित करने का तात्पर्य उन्हें इस तरह विकसित करना है कि वे जीवन के संरक्षण, संवर्धन और गुणात्मक विकास के लिए अधिकाधिक अनुकूल हो सके। चेतना का यह विकास प्रत्येक मनुष्य में होता है, यदि हम मानव देह में ही उसका अस्तित्व मानें।

अहिंसक मानव-विकास का तात्पर्य है जीवन की गरिमा, उसके सभी रूपों की स्वतंत्रता और सर्जन का विकास। इसलिए वे सारी विचारधाराएं और व्यवस्थाएं हिंसक या जीवन-विरोधी कही जा सकती हैं जो किसी भी कारण से स्वतंत्रता और सृजनात्मकता को किसी भी प्रकार से कुंठित करती हों। इसलिए समकालीन पूंजीवादी और सर्वसत्तावादी व्यवस्थाएं बुनियादी अर्थों में जीवन की विकास-प्रक्रिया पर आघात करने वाली ही मानी जाएंगी क्योंकि दोनों परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्र सर्जन-चेतना का किसी-न-किसी प्रकार से दमन या जड़ीकरण करती है। स्वतंत्रता और समानता को एक साथ अर्जित कर लेना बहुत-से लोगों को एक कल्पना लगती है, जबकि एक के बिना दूसरी की कोई मानवीय सार्थकता नहीं है। मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की प्रस्तावना में मानव-परिवार के प्रत्येक सदस्य की स्वतंत्रता, समान अधिकारों और गरिमा पर विचार करते समय कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो की उस आदर्श समाज-व्यवस्था की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है, जिसमें प्रत्येक का स्वतंत्र विकास ही सबके स्वतंत्र विकास की अनिवार्य शर्त है। अहिंसा की दृष्टि से देखें तो इस प्रत्येक में मानव-जगत के साथ-साथ संभव सीमा तक मानवेतर जीवन को भी शामिल माना जाना चाहिए। निश्चय ही इसके लिए अनुदार और अमानवीय शक्तियों के विभिन्न रूपों से विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न तरीकों से संघर्ष करते रहना होगा। लेकिन, इस संघर्ष में जरूरी है उस सुंदर को, उस न्याय को पहचानते रहना, जिसके लिए यह सारा संघर्ष है। यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि संघर्ष की प्रक्रिया ही कहीं अमानवीय या जीवन-विरोधी न हो जाए। जैसे मानवाधिकारों के घोषणा-पत्र के तीसवें अनुच्छेद में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इस घोषणा-पत्र की किसी भी बात की व्याख्या इस प्रकार नहीं की जा सकती, जिससे किसी भी राज्य, व्यक्ति या संगठन को इस घोषणा-पत्र में प्रस्तावित किसी भी मानवाधिकार या स्वतंत्रता का हनन करने वाले कार्य करने की छूट मिलती हो, उसी प्रकार अहिंसक समाज की स्थापना के संघर्ष में भी किसी भी प्रकार के हिंसक संघर्ष का कोई नैतिक औचित्य नहीं है क्योंकि अहिंसा समस्त नैतिकता का मूल या परम धर्म है।

अहिंसा मानवकेंद्रित नहीं, बल्कि समग्रतामूलक है तथा समस्त मानवीय और मानवेतर सृष्टि के साथ अस्तित्वगत अद्वैत का अनुभव है। अहिंसा संपूर्ण सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व है और इस उत्तरदायित्व की पृष्ठभूमि में संपूर्ण सृष्टि के अस्तित्व की एकता की भावना काम कर रही है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि सृष्टि की प्रत्येक वस्तु के साथ मनुष्य का रिश्ता एक मर्यादा से अनुशासित हो। लेकिन, इस मर्यादा का आधार क्या है? जिसे हम मर्यादा या धर्मसम्मत आचरण कहते हैं, उसकी कसौटी क्या है? उसकी कसौटी वही है जो, महाभारतकार के शब्दों में, दूसरे के प्रति ऐसा कुछ नहीं करना है, जो यदि हमारे प्रति किया जाए तो हमें प्रतिकूल लगे-आत्मानां प्रतिकूलानि परेषां समाचरेत। इस दूसरे में मानवेतर सृष्टि भी शामिल है। इस मर्यादा का उल्लंघन ही हिंसा है। इस अहिंसा-बोध की व्याप्ति केवल सामाजिक संबंधों तक ही नहीं; बल्कि मानवेतर सृष्टि के साथ इस मर्यादा का पालन ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में मनुष्य बनाता है। मनुष्य किसके प्रति आचरण कर रहा है, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि आचरण करने वाला मनुष्य है, जिसके आचरण में हर स्तर पर मनुष्यत्व का प्रतिबिंबन अनिवार्य है। हमारी परंपरा में कर्त्तव्य पर अधिक आग्रह इसीलिए है कि हमारे कर्त्तव्य अन्य के अधिकार हैं और अन्य के अधिकारों का सम्मान ही हमें अहिंसक बनाता है।

कुछ आधुनिकतावादी इसे व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की स्पष्ट अवहेलना के रूप में देख सकते हैं। लेकिन, वे यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति या वर्ग के कर्तव्यों में अन्य के अधिकार की स्वीकृति है और यह भी कि अधिकार को तो स्वेच्छापूर्वक छोड़ा भी जा सकता है, लेकिन, कर्तव्य से कोई छूट नहीं है। यदि भारतीय परंपरा में संपूर्ण जीवन को ऋणशोधन का यज्ञ माना गया है तो यह मूलतः उस समग्रतामूलक अहिंसक दृष्टि से प्रसूत विधान है, जो संपूर्ण सृष्टि के साथ मनुष्य के रिश्तों की एक मर्यादा निर्धारित करता है। इस आधारभूत एकता की अनुभूति और उससे उपजी अहिंसा-दृष्टि के कारण हमारी सामाजिक-आर्थिक संस्थाओं को ही नहीं, विज्ञान और तकनीकी को भी उसी आधार पर विकसित किया जाना वांछनीय है, जिसमें मानवेतर जगत के साथ हमारा संबंध समन्वय और कृतज्ञता का हो जाता है।

महात्मा गांधी ने यदि आधुनिकतावादी सभ्यता को अधर्म कहा तो इसका कारण यही था कि यह सभ्यता हिंसा के विभिन्न रूपों-संरचनाओं-पर आधारित है और अपनी प्रक्रिया में उन्हें और पुष्ट करती है। पारंपरिक समाज में आ गई विकृतियां तो हिंसक हैं ही; लेकिन, परिवर्तन की जो तीव्र मांग उठ रही है, वह भी बुनियादी अर्थों में हिंसक लक्ष्यों और प्रक्रिया की ओर उन्मुख दिखाई दे रही है। एक ओर सामाजिक जीवन को निरंतर अर्थ और सत्ता के नियंत्रण में लाया जा रहा है, तो दूसरी ओर स्वयं राज-व्यवस्था और अर्थ-व्यवस्था हिंसक प्रवृत्ति की ओर उन्मुख है क्योंकि दोनों केंद्रीकरण की समर्थक हैं और केंद्रीकरण अनिवार्यतः स्वतंत्रता का दमन करता और अपने अंतर्गत रहने वाले नागरिकों के मनों को हिंसक बनाता है, जो एक ओर अलगाववाद और उग्रवाद में बदलता है, तो दूसरी ओर राज्य के सर्वसत्तावाद में। आधुनिक प्रौद्योगिकी भी प्रकृति के साथ एक अनिवार्य हिंसक संबंध रखती है वह मानवेतर सृष्टि के प्रति तो क्या, स्वयं मनुष्य के प्रति भी कोई लगाव नहीं रखती। समाजशास्त्रीय अनुसंधान यह प्रमाणित करता है कि अधिकनायकतंत्रीय और निरंकुश शासन-व्यवस्था के लिए संचार-साधनों, हथियारों और आर्थिक जीवन पर एकाधिपत्य आवश्यक है और वह किसी-न-किसी प्रकार के औद्योगिक आधार के बिना संभव नहीं होता। यदि ऐतिहासिक भौतिकवाद की इस मूल प्रतिज्ञा को ध्यान में रखा जाए कि उत्पादन के उपकरण ही उत्पादन-संबंधों के आधार हैं और उन्हीं के आधार पर संपूर्ण सामाजिक अधिरचना निर्मित होती है तो इस बात की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि हिंसक वृत्ति और केंद्रीकृत अर्थ-व्यवस्था वाली तकनीकी पर आधारित समाज-संरचना भी अनिवार्यतः केंद्रीकरण की ओर उन्मुख होती है। हम अर्थ-व्यवस्था को तो कोसते हैं, लेकिन, उस तकनीकी को अपनाना चाहते हैं, जो इस अर्थ-व्यवस्था का मूलाधार है। हमें बेरी कॉमनर के कथन का स्मरण करते रहना होगा कि हमारी बहुत-सी समस्याओं का कारण प्रासंगिक प्रौद्योगिकीय विफलताएं नहीं, बल्कि उसकी सफलताएं हैं।

इस दृष्टि से देखा जाए तो मनुष्य के आर्थिक जीवन और उत्पादन की प्रक्रिया को भी अहिंसा की परिधि में होना चाहिए। इस बात का एक पहलू तो लोगों की समझ में आने लगा है और किसी भी प्रकार के आर्थिक शोषण को एक प्रकार की हिंसा मानकर उसे कम-से-कम नैतिक और सैद्धांतिक स्तर पर अस्वीकार किया जाने लगा है। लेकिन, अधिकांश लोग अभी भी इस गंभीर तथ्य की अनदेखी कर देते हैं कि उत्पादन की आधुनिक प्रक्रिया किस तरह हिंसा का विस्तार करती रही है। पर्यावरण और पारिस्थितिकी की समस्या से भी हम इसीलिए चिंतित हैं कि मनुष्य के जीवन के लिए खतरा महसूस होने लगा है- अहिंसा-दृष्टि से नहीं। पर्यावरण-विमर्श अधिकांशतः मानव-केंद्रित है, समग्रतामूलक नहीं और न ही मानव-चेतना के अहिंसक विकास की दृष्टि से उस पर विचार किया जाता है। उत्पादन की आधुनिक प्रक्रिया की सबसे बड़ी विडंबना तो यही है कि मनुष्य के सामाजिक-आर्थिक जीवन की वास्तविक आवश्यकताएं उपेक्षित हो जाती हैं और अधिकांश प्रौद्योगिकी का उपयोग हथियार अथवा गौण आवश्यकताओं या विलासिता के उपकरणों के उत्पादन में होने लगता है, जिसका एक दूरगामी परिणाम यह होता है कि प्रकृति और मनुष्य के बीच एक दीवार पैदा हो जाती है, जबकि मनुष्य प्रकृति का ही पुत्र है; आज भी प्रकृति ही मनुष्य का प्राण है।

मानव-जाति के तकनीकी आविष्कारों के इतिहास का अध्ययन करते हुए इतिहासविद् हेरोल्ड इन्निस ने इस बात को पहचाना था कि प्रत्येक नया तकनीकी साधन कुछ ही अवधि में साधन नहीं रहकर साधक हो जाता है क्योंकि आविष्कृत होने पर ये उपकरण स्वायत्त हो जाते हैं और फिर अन्य उपकरणों के साथ मिलकर मनुष्य का ही पुनराविष्कार करते हैं। यदि तकनीकी का प्रभाव मानव-संबंधों पर पड़ता है तो, स्पष्ट है, उसे मूल्य-निरपेक्ष नहीं कहा जा सकता। इसलिए तकनीकी का सवाल केवल तकनीकी सवाल नहीं है। तकनीकी अपने आप में एक विचारधारा और कार्यक्रम हो जाती है।

इस तकनीकी पर आधारित अर्थ-व्यवस्था और विकास की अवधारणा की मूल खामी यह है कि वह मनुष्य को केवल एक ऐंद्रिक अस्तित्व और इस नाते उपभोक्ता मात्र मानती है और इस उपभोग के लिए उसे उत्पादन करना और क्रयशक्ति को अर्जित करना पड़ता है। इसका अनिवार्य परिणाम होता है उपभोग-वृद्धि को एक जीवन-मूल्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास। उत्पादन केवल जरूरतों की पूर्ति के लिए नहीं होता, बल्कि नई जरूरतों, नई मांगों की सृष्टि भी करनी पड़ती है क्योंकि मनुष्य के विकास का तात्पर्य उसकी चेतना का नहीं, उसके ऐंद्रिक उपभोग का विकास हो जाता है। हमें यह बुनियादी बात नहीं भूलनी चाहिए कि अनावश्यक उपभोग भी हिंसा है और जब हम किसी अन्य के प्रति हिंसा करते हैं-मनुष्य अथवा मनुष्येतर के प्रति-तो पहले स्वयं को हिंसक बना रहे होते अर्थात् अपने में मनुष्यत्व के विकास को कुंठित करते हुए जीवन के विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया में अपने को प्रतिक्रियावादी और अवैज्ञानिक सिद्ध कर रहे होते हैं। इसलिए उत्पादन-पद्धति के रूप में स्वदेशी, उपभोग में स्वैच्छिक त्याग और स्वामित्व में ट्रस्टीशिप महात्मा गांधी की वे अवधारणाएं हैं, जिनसे आर्थिक विकास चेतना के अहिंसक विकास की प्रक्रिया का माध्यम हो सकता है। मुख्य बात यह है कि हम विकास को केवल आर्थिक संदर्भ की परिधि में ही देखते हैं या उसे वृहत्तर और समग्र जीवन-विकास की संश्लिष्ट प्रक्रिया का एक अंग बनाना चाहते हैं। स्थूल अथवा सूक्ष्म, किसी भी प्रकार की हिंसा के सहारे चलने वाला विकास जीवन-विरोधी ही हो सकता है।

इसी तरह यदि मनुष्य की राजनीतिक क्रियाशीलता भी मानवीय चेतना के विकास की प्रक्रिया का ही अंग है तो यह देखना आवश्यक हो जाएगा कि क्या अहिंसक राजनीतिक संरचना और व्यवहार संभव है-निम्नतम स्तर से अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक। अक्सर होता यह है कि राज्य में सत्ता और शक्ति का अधिकाधिक केंद्रीकरण राज्य-संस्थानों के सम्मुख नागरिक को कमजोर बनाता और उसकी उपेक्षा और दमन का कारण बनता है। यह लोकंतात्रिक और एकतंत्रीय दोनों ही प्रकार के राज्य-संस्थानों के लिए सही है। अर्थतंत्रीय आवश्यकताएं नागरिकों के सम्मुख जिस राज्य की शक्ति को बढ़ाने की जरूरत प्रतिपादित करती हैं, वहीं उसी राज्य को स्वयं अर्थतंत्र एजेंट की तरह व्यवहार करने के लिए विवश कर देती हैं। महात्मा गांधी के शब्दों में कहें तो राज्य का कार्य यह होगा कि वह जनता की इच्छाओं को पूरा करे, कि वह जनता पर अपनी इच्छा लादे या जबर्दस्ती करे। और यह तभी संभव हो सकता है यदि राज्य-शक्ति का संभव सीमा तक विकेंद्रीकरण हो सके। एक विकेंद्रित राज्य ही अहिंसक राज्य हो सकता है। साथ ही, राज्य का विरोध करने वालों की भी आस्था अहिंसा में होनी आवश्यक है। यदि राज्य भी हिंसक हो और उसकी हिंसा का प्रतिरोध करने वाले भी तो दोनों ही चेतना के विकास की दृष्टि से प्रतिगामी ही कहे जाएंगे। इस बात से तब कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि किसकी हिंसा अंततः विजयी होती है। अच्छे प्रयोजन के लिए हिंसा को उचित उपाय मानने वालों को भी यह समझना होगा कि जीवन के नियम का उल्लंघन जीवन के लिए लाभदायक नहीं हो सकता।

अहिंसा का सवाल इसलिए समग्र जीवन-दृष्टि का सवाल है-इसे वैयक्तिक खान-पान, अंतर्वैयक्तिक आचरण या दया-दान तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों को समझे बिना बहुस्तरीय और बहुआयामी संरचनागत हिंसा को समझना और उसके समाधान की दिशा में सचेष्ट होना संभव नहीं हो सकेगा। वैयक्तिक-पारिवारिक से लेकर वैश्विक स्तर तक अहिंसा का स्वीकार ही स्वस्थ जीवन का आधार हो सकता है। मानवाधिकारों की अवधारणा भी वस्तुतः, अहिंसा के बोध से प्रेरित जीवन का ही कार्यक्रम है।

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यह अहिंसा-कोश अहिंसा से जुड़ी अवधारणाओं, विचारकों और उसके बोध से प्रेरित सक्रिय व्यक्तियों से संबंधित जानकारी एकत्र करने का एक विनम्र प्रारंभिक प्रयास है। मुझे यह अहसास है कि अहिंसा-कोश का काम कई खंडों में होने पर भी पूरा नहीं कहा जा सकता-इसलिए एक जिल्द में सब कुछ समाहित करने का दावा दंभ होगा। लेकिन, मेरा विश्वास है कि अहिंसा को जीवन के नियम के रूप में प्रतिपादित करने वाली जानकारियों की विश्लेषणात्मक प्रस्तुति का यह प्रारंभिक प्रयास सुधीजनों की अनुशंसा अवश्य प्राप्त कर सकेगा।

इस कोश की प्रस्तुति में जिन मित्रों का प्रोत्साहन, परामर्श, और सहयोग मुझे निंरतर मिलता रहा है, उसके लिए कृतज्ञता का भाव मुझे आपूरित किए है। इस अवसर पर मैं प्राकृत भारती अकादमी के सभी सहयोगियों का आभार भी स्वीकार करना चाहूंगा, जो संस्थान में एक पारिवारिक वातावरण बनाए रखते हैं। मैं अपने परियोजना-सहायक श्री विमल सोनी का धन्यवाद किए बिना नहीं रह सकता, जिनके निष्ठापूर्वक श्रम के बिना इतने अल्प समय में यह काम पूरा हो पाना मुश्किल होता।

इस अवसर पर मैं प्राकृत भारती अकादमी के संस्थापक एवं अध्यक्ष पद्मभूषण श्री देवेन्द्रराज मेहता एवं डॉ० अंजु ढड्ढा मिश्र का भी आभार स्वीकार करना चाहता हूं। श्री मेहता से मेरा कोई पूर्व-परिचय नहीं था-लेकिन डॉ० अंजु ढड्ढा मिश्र की सलाह के आधार पर उन्होंने मुझे इस गुरुतर कार्य के संपादन के लिए आमंत्रित कर लिया। यदि मैं इन दोनों के विश्वास को बनाए रख पाने में उचित सीमा तक सफल हो सका हूं तो स्वयं को कृतकृत्य मानूंगा।

इस गुरु-पर्व पर मैं अपने सभी गुरुओं के प्रति कृतज्ञता अनुभव कर रहा हूं, जिनके आशीर्वाद ने मुझे इस तरह के गुरुतर दायित्व को स्वीकार करने का साहस दिया-विशेषतया स० ही० वात्स्यायन अज्ञेय और डॉ० छगन मोहता का। यह वर्ष वात्स्यायन जी का जन्मशती वर्ष है। मैंने यह काम डॉ० मोहता के जन्मशती वर्ष में शुरू किया था और इस वर्ष मैं यह काम संपादित कर सका, इसे ऋषिऋण से उऋण होने की मेरी जीवन-साधना का एक सोपान समझा जाए तो मैं और कृतज्ञ अनुभव करूंगा।

- नंदकिशोर आचार्य

गुरु पूर्णिमा , सं० 2067
    25 जुलाई , 2010 ई०


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