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कर्तव्य वह है जो नहीं करना चाहिए
दुःखिनीबाला


बहुत-सी भाषाओं में और भी कुछ लिखा हुआ था। किंतु एक मनुष्य से पूछने पर मालूम हुआ कि भिन्न-भिन्न भाषाओं में यही एक बात लिखी हुई है।

यहाँ स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं है, यहाँ पुरुष सर्व सुखों का अधीश्वर नहीं है और न स्त्री अंतःपुराबद्धा दासी ही है। दोनों बराबर हैं। दोनों ही अपनी इच्छानुसार काम करते हैं। रहने के स्थान भी अलग-अलग-से हैं। किसी गृह में स्त्री-पुरुष एक साथ निवास नहीं करते। यहाँ आने के दूसरे ही तीसरे दिन एक नवयुवक से मेरी भेंट हो गई। उसी के साथ मैं एक दिन एक सभा में गई। सभा में स्त्री-पुरुषों की खासी भीड़ थी। किंतु स्त्रियों के लिए कोई अलग बैठने का स्थान न था, न वे पर्दे में ही थीं। सब एक साथ बैठे हुए थे मानो वहाँ कोई स्त्री थी ही नहीं। हाँ, एक बात जरूर थी। ये स्त्री-पुरुष Consciousness (अंतश्चैतन्य) में सांसारिक स्त्री-पुरुषों से कुछ अधिक बढ़े-से दिखाई देते थे। सभामंडल में चारों तरफ तख्तियाँ लटक रही थीं। सूत्रों की भाँति उसमें कुछ लिखा था। उस समय सबमें क्या लिखा था यह जान लेना कठिन था। किंतु दस-पंद्रह जो मेरे सामने थीं उनमें ये बातें लिखी थीं -

(1) Duty is what one should never do. (कर्तव्य वह है जिसे मनुष्य को कभी न करना चाहिए।)

(2) Do what you want to do, not what you ought to do. (तुम जो करना चाहते हो उसे करो, जो करना चाहिए उसे नहीं।)

(3) सर्वोत्त्म नियम यह है कि संसार में कोई नियम नहीं।

(4) मनुष्य स्वयं अपना ईश्वर है।

(5) Know thyself. (अपने को जानो।)

(6) Life degrades when instinct is limited by morality. (स्वभाव को नियमबद्ध करने से जीवन बिगड़ता है।)

(7) The imposition of Morals upon individual will at first frustrates, then limits, and finally subjugates it. The result is the habitual spiritual apathy. (नैतिक नियमों का संस्कार पहले व्यक्ति के मन को हताश करता है, फिर परिमित करता है अंततः वश में कर लेता है। परिणाम वही अभ्यस्त आध्यात्मिक उपेक्षा है।)

(8) Morality is prison. (सदाचार कारागार है।)

(9) I am good not because I am good and virtuous but because I am myself. (मैं अच्छा हूँ, इसलिए नहीं कि मैं अच्छा और धर्मात्मा हूँ वरन् इसलिए कि मैं अपने आप में हूँ।)

(10) If you want to grow up face fact and realities of life. (यदि तुम उन्नति चाहते हो तो जीवन की हकीकतों और सच्चाइयों का साहस के साथ सामना करो।)

(11) Perpetual money-making destroys the habit of philosophic thought. (निरंतर धनार्जन से बुद्धियुक्त विचार करने का स्वभाव नष्ट हो जाता है।)

(12) Money is poison and poverty the precursor and generator of all evils. (धन विषस्वरूप है और निर्धनता सारी बुराइयों की जड़ है।)

(13) Follow the Devil. (शैतान का अनुसरण करो।)

(14) No Human being can afford to be contented. (किसी मनुष्य के संतुष्ट रहने में गुजर नहीं।)

(15) No greater sin than contentment. (संतोष से बड़ा कोई पाप नहीं।)

(16) So long as you can conceive something better than yourself you ought not to be easy unless you are striving to bring it into existence or clearing the way for it. (जब तक तुम अपने से किसी श्रेष्ठतर अवस्था का चिंतन कर सकते हो, तब तक उसको अस्तित्व में लाने या उसके लिए मार्ग परिष्कृत करने के उद्योग के बिना तुम्हें आराम न करना चाहिए।)

(प्रज्ञा पाठक द्वारा आविष्कृत तथा संपादित 'सरला : एक विधवा की आत्मजीवनी' (प्रकाशन काल 1915-16) से। लेखक ने अपना नाम दुःखिनीबाला बताया है, जिसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। इन पंक्तियों का प्रसंग यह है कि बाल-विधवा सरला एक दिन स्वप्न में अपनी मृत भाभी लाडली को देखती है। लाडली उसे अपनी नई जगह के बारे में, जिसे वहाँ के लोग स्वर्ग कहते हैं, बताती है।)


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