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निबंध

छाया का जंगल
अज्ञेय
संपादन - कन्हैयालाल नंदन


यायावरी यात्राओं के सुखों में एक सुख तो यह है ही कि निकलें किसी चीज़ की खोज में और मिल जाये कोई बिलकुल दूसरी ही चीज़। लेकन जीवन-भर यायावरी करते रहकर भी उस कल्पनातीत आविष्कार के लिए मैं तैयार नहीं था जो इस बार राम-जानकी यात्रा के दौरान अकस्मात हुआ। यह तो जानता था कि रामायण के चरित्रों से सम्बद्ध जिन स्थलों की खोज में निकला हूँ उनके ऐसे अवशेष तो क्या ही मिल सकते हैं जिन्हें 'ऐतिहासिक' कहा जाए; और यह भी जानता था कि ऐसे बहुत से स्थल मिल जाएँगे जिनका रामायण से कोई वास्तविक सम्बन्ध रहा हो या न रहा हो, लेकिन उन्हें देखकर एकाएक यह मानने को जी होने लगे कि कुछ सम्बन्ध जरूर रहा होगा! खासकर नेपाल तराई के जंगली और नदी-नालों-भरे प्रदेश में से गुजरते हुए तो मन ऐसा हो गया था कि किसी भी स्थल से जुड़ी किसी असुर की, गन्धर्व की, अप्सरा की, किरात अथवा नागकन्या की गाथा सुनकर एकाएक यह प्रतिक्रिया न होती कि यह सब मनगढ़न्त है, ऐसा वास्तव में हुआ नहीं होगा, केवल आदिम-मानव की कच्ची कल्पना ने ये किस्से गढ़े होंगे। निश्चय ही स्थलों का अपना जादू होता है। ठोस व्यावहारिक आदमी भी ऐसे स्थलों पर पहुँचकर पाता है कि उसकी कल्पना चेत उठी है। फिर उसे अपनी संस्कृति के पुराण की ही बातें क्यों, दूसरी संस्कृतियों के पुराण भी सच्चे जान पडऩे लगते हैं-उनके भी वन-देवता और लता-बालाएँ और नदी-अप्सराएँ देखते-देखते उसके आगे रूप लेने लगती हैं।

वाल्मीकि नगर में ठहरे हुए हम लोग जंगल में वे सब स्थल देख रहे थे जो हमें 'वाल्मीकि आश्रम' के नाम से दिखाये गये थे। उन्हें देखकर वही दोहरी प्रतिक्रिया हुई थी-एक तरफ तो यह कि दिखाये गये सारे अवशेष बहुत पुराने होंगे तो पूर्व-मध्य-काल के होंगे, उससे ज्यादा पुराने नहीं हो सकते; दूसरी तरफ़ उतनी ही प्रबल यह प्रतीति कि ये स्थल तो निश्चय ही ऐसे हैं कि यहाँ कभी ऋषि का आश्रम रहा हो। न सही ये ही प्रस्तर-खंड और भग्नावशेष-पर स्थलों की अपनी भी तो रहस्यवेष्टित ऊर्जा होती है, जिसके कारण बार-बार उन्हीं स्थलों पर फिर दूसरे आश्रम और तीर्थ और मन्दिर बनते हैं...अपने दल के साथ इस प्रस्तावित वाल्मीकि आश्रम की सैर करके मन-ही-मन तय किया कि अगले दिन बड़े सवेरे अकेले निकलकर आएँगे और हो सका तो मनोयोग करके अपने को उन ऊर्जा स्रोतों से जोड़ेंगे। मन में कहीं ऐसा विश्वास तो था ही (और अब भी है) कि ऐसे किसी स्थल पर से गुजरूँगा तो जरूर उसकी ऊर्जा-रेखाओं के जाल-में प्रवेश करने का बोध मुझे हो जाएगा...
अगले दिन बड़े सवेरे अकेले ही फिर उधर को निकल आया। कुछ कोहरा था, सूर्योदय अभी नहीं हुआ था, लेकिन भोर का प्रकाश कोहरे को ही एक निरन्तर बदलते हुए रहस्यमय छायाचित्र का रूप दे रहा था, बल्कि रह-रहकर मुझे सन्देह हो आता था कि कहीं मैं भटक तो नहीं गया हूँ? अपने जाने तो उसी परिचित रास्ते से आया था, पर सब कुछ नया ही जान पड़ रहा था।

कैमरा भी मैं साथ लाया था, लेकिन यह तो समझ में आ ही गया था कि अगर कोहरा ऐसा ही रहा तो फोटो लेने का कोई सवाल ही नहीं होगा। बल्कि चित्रकार होता तो कोहरे में जब-तब दीख जानेवाली आकृतियों का जापानी ढंग का चित्र तो बना भी ले सकता। कैमरे से वह भी सम्भव नहीं है। कहने को तो फोटोग्राफ भी काले और उजले, प्रकाश और छाया के अंकन का नाम है, पर कलाकार की आँखें जो देखती है वह कैमरा नहीं देख सकता। क्योंकि आँख तो प्रकाश और छाया का खेल देखती हे, एक जीवन्त और गतिमान लीला, जबकि कैमरा केवल एक स्थिति का आकलन करता है।

एक बार मैंने कैमरा उठाकर उसके भीतर से झाँका भी, जानते हुए कि व्यर्थ का काम कर रहा हूँ। लेकिन फिर उसे झूलने देकर तेज कदमों से कोहरे की ओर बढ़ा।

कोहरे को मैंने पा लिया और सब ओर से उससे घिकर जब जाना कि अब मुझे वह रास्ता भी नहीं दीख रहा है जिससे मैं वहाँ तक आया हूँ तब मन-ही-मन प्रसन्न भी हुआ। मानो अपने को ही मैंने जंगल की तरफ़ से कहा, ''अब बोलो, बच्चू, अब तो पूरी तरह जंगल और कोहरे के काबू में हो-हो कि नहीं? कोहरा उठेगा तब किसी तरफ को निकल जाओगे, लेकिन अभी तो मेरे काबू में हो और जो मैं मनवाऊँगा तुम्हें मानना होगा।''

यों तो मेरी मन:स्थित ऐसी थी कि बिना धमकी के भी जो मनवाया जाता मान लेता, लेकिन जब चुनौती दी ही गयी तो कुछ कहना या कि करना ज़रूरी हो गया। मैं फिर तेजी से किसी एक तरफ़ को लपका-जैसे कि यों कहीं पार निकल ही आऊँगा।

झरे पत्तों को रौदता हुआ और कहीं-कहीं ठोकर खाता हुआ मैं सौ-डेढ़ सौ कदम चला हूँगा कि सामने अनगढ़ पत्थरों का एक ढेर पाकर अटक गया। पहले तो सोचा कि अगल-बगल देखूँ कि ढेर कितना बड़ा है और इसके पास से निकल जाने का रास्ता है कि नहीं। फिर इरादा बदलकर ढेर के एक बड़े पत्थर पर बैठ गया आखिर थोड़ी देर में तो सूरज निकलेगा ही, कोहरा कुछ हटेगा तब आगे की देखी जाएगी।

थोड़ी ही देर बाद रोशनी भी कुछ बढ़ी और कोहरा भी नीचे से कुछ उठा। मैंने सोचा था कि कोहरा धूप के कारण ऊपर से गलना शुरू करेगा। लेकिन हुआ उलटा-झरे हुए पत्तों की नमी से वह नीचे से कुछ गला और मुझे मानो धुनी हुई रूई की एक बड़ी दीवार में जहाँ-तहाँ सेंध-सी दीखी। मैंने अनुमान किया कि उसमें कहीं बँसवट है। बाँसों का इतना बड़ा जंगल होगा तो कहीं आसपास वन-जातियों में से किसी का कोई गाँव भी होगा। ठीक है, यहीं बैठे-बैठे सूर्योदय की प्रतीक्षा की जाए...

धुनी हुई रूई के पहाड़ में जो सुरंगें मुझे दीखी थीं उनमें से एक के परले सिरे पर एकाएक रोशनी बढ़ गयी, जैसे कि सूर्य की पहली किरण वहाँ झरी; और उसमें मुझे एक छोटी मानव-आकृति दीखी। यहाँ की वन-जातियों में कुछ बौने कद के भी होते हैं। लेकिन इतने छोटे? पुकारूँ? नहीं। मैंने पास से एक कंकड़ उठाकर फिर पत्थर पर गिरा दिया। शब्द से चौंककर वह आकृति वहीं ठिठकी। फिर उसने मुझे देख, दो कदम उस सुरंग के भीतर बढक़र उसने अटपटी भाषा में मुझसे कहा, ''इदर जाएगा नईं, ई छाया का जंगल। तुमारा छाया छीन लेगा।'' वह आकृति फिर दो कदम पीछे हटी और सुरंग के मुँह से एक तरफ़ होकर अदृश्य हो गयी।
छाया का जंगल। छाया छीन लेगा। यानी?

ठीक क्या आशय उसका रहा होगा, यह जानने का कोई उपाय नहीं था, लेकिन बचपन में (कब?) सुनी या पढ़ी परी-कथाओं की याद आने लगी। ऐसा तो कभी नहीं सुना था कि छायाओं का कोई जंगल होता होगा जिसमें छाया छिन जाती होगी, लेकिन ऐसे लोकों की बात ज़रूर पढ़ी-सुनी थी जिसमें छायाएँ ही बसती हैं, जिनमें जन्मान्तर माननवाली जातियों की मरणोत्तर किसी लोक की कल्पना इसी तरह रूपायित हो सकती होगी। और, हाँ, ऐसा भी तो कहीं पढ़ा या सुना था कि छाया ग्रस लेती है। छायाग्रासिनी- राहु की माता सिंहिका का नाम भी तो छायाग्रासिनी बताया गया है... लेकिन उसका चाक्षुष आधार तो स्पष्ट है। वह तो छाया को ग्रसने की बात नहीं, छाया के द्वारा ग्रसने की बात है। किसी की छाया पड़ जाती है, छाया ही कुछ ग्रस लेती है-यह थोड़े ही कि छाया को ही ग्रस अथवा छीन लिया जाता है! यों तो सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण भी (वैज्ञानिक दृष्टि से भी) छायाग्रास ही हैं; चन्द्रमा अथवा पृथ्वी की छाया सूर्य अथवा चन्द्रमा को ग्रस लेती है। स्वयं छाया ही ग्रसी जाए, छाया छिन जाए, यह तो आधुनिक कल्पना ही जान पड़ती है-'छायारहित आदमी'-छाया न रहने के कारण अधूरे या दुर्बल या या वेध्य-कल्पना तो यह भी पौराणिक कोटि की ही है, लेकिन हो सकती है शायद आधुनिक मानव की ही। आधुनिक पुराण-वाह! यह विरोधाभास गले से नहीं उतरता। तभी तो ऐसी स्थिति में पडक़र इधर लोग 'मिथक' की बात करने लगे हैं! मिथक-ग्रीक का मिथ भी और अपना मिथ्या भी-और मैधा का थकना भी!

मैं वहीं बैठकर कोहरे के और विरल होने की प्रतीक्षा करने लगा। धीरे-धीरे बँसवट के आकार भी स्पष्ट होने लगे, पर दीखा कि घने झुरमुट के बीच दो-तीन सुरंगें-सी हैं जो शायद आने-जाने के रास्ते का काम देती होंगी। इन्हीं में से एक के आगे एक रोशनी का वृक्ष दीखता था जहाँ शायद बाँसों के बीच आकाश की ओर खुली जगह भी होगी।

कोहरा उठने के साथ-साथ मेरा शरीर भी अलसाने लगा था और मेरे विचारों की दौड़ भी अनजाने कुछ धीमी; लेकिन साथ ही मधुरतर होती गयी थी-जैसे कि धूप की एक किरण मेरे मन की ओर भी भटक आयी हो। मैंने कैमरा अपने पास चट्टान पर रख दिया और अधखुली आँखों में बँसवट के भीतर प्रकाश की आँख-मिचौनी देखने लगा।

'छाया छीन ली जाती है।' नया मनोविज्ञान कहता है कि चित्त के दो पक्ष होते हैं, जिनमें से एक छाया पक्ष है। तो छाया का छिन जाना चेतना का ही पंगु हो जाना है। छाया नहीं रहती तो धीरे-धीरे सूखकर मर जाते हैं। क्या यह चेतना के ही जड़ हो जाने का ही रूपक है? लेकिन क्या छाया के छिन जाने के शाप से निस्तार कोई नहीं है? होना ही चाहिए... छाया आखिर छाया-पक्ष ही तो है-उत्तर पक्ष; तो पूर्व पक्ष भी तो होगा ही! कोई सत्ता पहले होनी चाहिए जिसकी छाया भी होती है। छाया छिन जाती है या ग्रस ली जाती है तो सत्ता तो बनी रहेगी। और सत्ता पंगु होकर भी जरूर किसी-न-किसी उपाय से अपना स्वास्थ्य फिर पा सकती होगी-अपने को समग्र कर ले सकती होगी। मेरी आस्तिकता ही सही- मेरे लिए तो सत्ता की परिभाषा में ही यह निहित है कि वह आत्ममृत है, अपनी अंग-क्षति को भी स्वयं पूर सकती होगी।

छाया। या याहें कहें कि छाया है तो सत्ता ही नहीं, एक सूर्य भी है। अगर हम छाया की ओर ही न मुड़े रहें, घूमकर उस प्रकाश-स्रोत की ओर देखें, सूर्य को खोजें तो शायद बात समझ में आ जाएगी। छाया का छिन जाना सूर्य का ही ओट हो जाना है। और इस रोग का इलाज छाया की खोज में नहीं, सूर्य के संस्पर्श में है।

क्या 'छाया का जंगल' ही तब हमें कहना है? क्या यही असल में जंगल नहीं है कि हम छाया की खोज में उस आलोक-पुंज से विमुख हो जाएँ जो असली प्राण-स्रोत है?

हर पौराणिक अभिप्राय का एक रूपक होता है। यह रूपक मानो एक बड़े सत्य का मुखौटा है। मुखौटे की ओट हम उस सत्य को देख लेते हैं, अपलक उसकी ओर ताक सकते हैं, नहीं तो उसकी चौंध हमें अन्धा कर दे। यहाँ रूपक क्या है? वह छिपा हुआ सत्य क्या है?

एक तो प्रेम है जो सूर्य है-उसके घाम में जीना एक आलौकित जीवन है-और उससे एक असन्दिग्ध छाया भी पड़ती है। जो प्रेममय है उसकी यह छाया ही उसी के समक्ष उसके अस्तित्व का प्रमाण देती है। नहीं तो वह शायद एकान्त रूप से आत्म-विस्मृत हो जाए। उसकी छाया ही उसे संज्ञान दिलाती है, बोध कराती है कि वह है। इस प्रकार प्रेममय जीवन का भी अहं है जो उसकी छाया है और जो उसे आत्मचेतन कर देता है।

मुझे लग रहा था कि मैं आश्चर्यजनक स्पष्टता के साथ सोच रहा हूँ। लेकिन मुझे यह भी लग रहा था कि मेरा शरीर ही नहीं, मेरा मन भी अलसाने लगा है, मेरा सोचना बड़ा शिथिल हो गया है। क्या मैं ऊँघ रहा हूँ? लेकिन विचार एक अदृश्य पहाड़ी सोते सरीखे लगातार लेकिन अदृश्य अबाध गति से बहते ही जा रहे थे-क्या और घनी छाया की ओर या कि प्रकाश की ओर?

वह जो बँसवट में दो सुरंगों का सन्धि-स्थल था, वहाँ पर थोड़ा खुला प्रकाश झलकने लगा था। मुझे जान पड़ा कि उसमें एक धुँधली आकृति टहल रही है- इस पार से उस पार, फिर पलटकर उस पार से इधर...क्या यह वही व्यक्ति है जिसने मुझे पहले चेतावनी दी थी, ई छाया का जंगल, इसमें जाएगा नहीं? लेकिन नहीं, यह अत्यन्त जीर्णकाय लडख़ड़ाता हुआ व्यक्ति तो कोई दूसरा है। उस धुँधले प्रकाश में उसकी छाया नहीं बनती, लेकिन वही मानो एक छाया-सा डोल रहा है। क्षण-भर के असमंजस के बाद मैंने उसे पुकार ही लिया, ''भाई, ओ भाई!''

क्या उसने सुना नहीं या अनसुनी कर दी? एकाएक मुझे लगा कि मेरी आवाज उस तक पहुँच नहीं सकती-या शायद पहुँची नहीं। जैसे मंच पर अभिनेता समाज की प्रतिक्रिया जानता भी है, सुनता भी है, लेकिन क्योंकि अभिनेता होने के नाते एक दूसरे जगत का प्राणी होता है, एक दूसरे समय में जीता है इसलिए छुआ नहीं जा सकता... मुझे लगा कि मैं सचमुच मंच पर ही एक अभिनय देख रहा हूँ-बल्कि देख ही नहीं, किसी अतीन्द्रिय चेतना से सुन भी रहा हूँ; समझ भी रहा हूँ कि मंच पर क्या हो रहा है।

एक दूसरी छाया-आकृति भी एकाएक उस प्रकृत मंच पर प्रकट हो गयी। एक नारी आकृति। पहली छाया ने उसकी ओर उन्मुख होकर और दीन भाव से कहा-कहा मुद्राओं से ही, लेकिन मुझे लगा कि मैं उसकी बात भी और उसमें थरथराती हुई निराशा भी स्पष्ट सुन सकता हूँ-''मेरा अन्त समय आ गया है, मेरा शाप अब पूरा होनेवाला है। छाया छिन गयी थी और अब मैं मर जाऊँगा, लेकिन मरने से पहले एक बार-अन्तिम बार-मैं उसे देख लेना चाहता था जिसे...।''

मंच पर उसका वाक्य अधूरा रह गया, लेकिन मैंने माना उसका शेषांश भी सुन लिया, ''जिसे मैंने प्यार किया था।''

स्त्री आकृति ठिठक गयी थी और उसका हाथ एक विचित्र मुद्रा में बोलने वाले की ओर बढ़ा हुआ था-उस मुद्रा में करुणा भी थी, वात्सल्य भी था और मानो अतृप्ति की एक पुकार भी थी। दूसरी आकृति लडख़ड़ाते हुए मानो उसी की परिक्रमा करने का यत्न कर रही थी।
अन्तिम बार...लेकिन उसने क्या कहा था-'अन्तिम बार' या 'अन्तिम प्यार?' पर इस बीच अनदेखे ही उस खुली जगह प्रकाश बढ़ गया था। स्त्री-आकृति नेबिना कुछ कहे दूसरे हाथ से एक ओर इशारा किया। पुरुष ने ठिठककर उधर देखा और कुछ चौंका-सा; उसके चौंकने के साथ ही मैंने भी देखा-पुरुष कुछ स्पष्ट छाया वहाँ देख रहा था और उसकी ओर स्त्री ने इशारा किया।

प्रकाश थोड़ा और बढ़ गया; छाया और स्पष्ट हो गयी। पुरुष धीरे-धीरे सीधा खड़ा हुआ, मानो प्रकाश की झरन ने उसके भीतर नई शक्ति भर दी है, और फिर उसकी देह एक नई लय में डोलने लगी। मैंने पहचाना कि यह वहीं की वन जाति के एक युगल नृत्य की विलम्बित लय है।

नारी के पैर भी थिरक उठे। धुँधलके में मुझे लगा था कि उसके पैरों में मोटे कड़े हैं, लेकिन अब मुझे घुँघरू का स्वर सुनाई दिया। दोनों आकृतियों के बढ़े हुए हाथ मिले और बढ़ते हुए प्रकाश में दोनों उसकी मन्द्र लय पर नाचते हुए सुरंग के भीतर की ओर ओझल हो गये। मैंने जाना कि उस व्यक्ति का शाप अब फलेगा नहीं, वह जिएगा-उसके प्यार का प्रकाश उसे एक स्पष्ट छाया भी देता रहेगा।
''हम जो बोला तुम देखा?''

यही वह स्वर है जिसने पहले मुझे जंगल में बढऩे से रोका था। लेकिन अबकी बार वह स्वर दूसरी तरफ से आया था-मेरे पीछे बिलकुल निकट से। मैं मुड़ा तो वह वनवासी बूढ़ा मेरी ओर ताकता हुआ मुस्करा रहा था। मैंने अपने स्वर को कुछ रोबीला बनाते हुए कहा, ''ऐसी अधूरी बात से नहीं चलेगा। हमको पूरी बात समझाओ।''
उसने कहा, ''तुमने अभी देखा, और क्या समझेगा?''

स्पष्ट था कि उस पर कोई रौब नहीं पड़ा है और वह मानो जानता है कि मैंने अभी कुछ क्षण पहले क्या देखा था। मैंने फिर विनय से कहा, ''जो मैंने देखा वह सब तो तुमको मालूम है। उसी को तो समझाने को कह रहा हूँ।''

''समझाने से नहीं समझता। जो समझता ओई समझता।'' वह थोड़ी देर चुप रहा और मैंने भी चुपचाप प्रतीक्षा करना ही उचित समझा। थोड़ी देर बाद जब लक्ष्य किया कि मैं कुछ पूछ नहीं रहा हूँ, लेकिन उत्सुक भाव से एकटक उसकी ओर देख रहा हूँ। तो वह फिर बोलने लगा। जो कुछ उसने मुझे बताया उसका सार यह है कि बँसवट के भीतर उस प्रकृत मंच पर जिन दो व्यक्तियों को मैंने देखा था वे बहुत पहले हुए थे-कई पीढिय़ों पहले। लेकिन वे अभी जीते हैं-वे तो कभी मरेंगे नहीं। उनकी छाया कभी धुँधली हो जाती है लेकिन कभी मिटती नहीं न वे दोनों कभी मरेंगे, न उनका प्रेम कभी मरेगा, न उनकी छाया कभी मिटेगी। वन-जातियों के प्रेमी जन भी कभी-कभी उनको देखने आते हैं। हर किसी को या हमेशा वे नहीं दीखते, लेकिन उनको देखना बहुत शुभ माना जाता है-बहुत बड़ा सौभाग्य होता है। अब भी किसी भी दिन सवेरे-सवेरे जब जंगल में कोहरा उठता है तब जगह-जगह घनी छाया के बीच सुनहले प्रकाश के चक्कर दीख जाते हैं-वनवासी लोग जानते हैं कि ये ही वे घेरे हैं जिनके भीतर वह प्रेमी जोड़ा नाचा था। जब तक उस जंगल में सुनहली धूप के ऐसे घेरे बनते रहेंगे, धूप-छाँव की ऐसी आँखमिचौनी होती रहेगी, तब तक वह जोड़ा जिएगा और वहाँ नाचेगा और प्रेमीजन उसी तरह देखने आते रहेंगे।

दूर कहीं से एक बड़ी हल्की-सी कूक मुझे सुनाई दी और मानो हवा के कारण बह गयी। फिर मानो मादल की ढब-ढबाढब-ढब सुनाई दी और वह भी उसी तरह हवा के स्वर में लय हो गयी। लेकिन उस बूढ़े की एडिय़ाँ मानो उसी अनसुनी लय पर थिरक उठी थीं। मैंने पूछा, ''तुम नाचने जाएगा?'' उसने खीसें निपोर दीं। थोड़ी देर बार बोला, ''सब्बी नाचता।''

मैंने जाना कि वह अब चल देगा, कि यह विदा का क्षण है, लेकिन फिर भी उसे अटकाने की नीयत से मैंने कहा, ''लेकिन मैंने तो उस जोड़े को नाचते देखा।'' और मैंने बँसवट की ओर इशारा किया।

वह एक उजली किन्तु स्वरहीन हँसी हँसा, फिर बोला, ''तो तुम्हारे लिए भी सुभ। तुमारा बाग्य बहुत अच्छा। तुम बी जिएगा।'' तनिक रुककर उसने जोड़ा, ''तुम बी नाचेगा।'' वह वैसी ही हँसी फिर हँसा-उजली, रवहीन, कौतुक-भरी, कुछ चिढ़ाती हुई, और मुडक़र इतनी फुर्ती से जंगल में अदृश्य हुआ कि मैं क्षण-भर सोचता ही रह गया कि क्या वह सचमुच वहाँ था भी।
लौटकर ठिकाने पहुँचा तो सहयात्रियों नेकन्धे पर लटका हुआ झोला देखकर पूछा, ''लाये कुछ? फोटो के लिए ख़ास कुछ मिला?''
मैंने कहा, ''हाँ, मिला तो, लेकिन अभी तो डेवलप होगा तभी नतीजा पता लगेगा। लेकिन जो लाया वह कैमरे में बन्द नहीं है।''
''तब फिर?''
''यहाँ है।'' कहकर मैंने एक उँगली से अपने माथे की ओर इशारा किया।

सहयात्रियों ने कुछ ठंडे पड़ते हुए स्वर में कहा, ''ओह! कवि की बात। हम तो समझे थे कि कोई बड़ा फोटो लेकर आये होंगे।''

मैंने बात के सिलसिले की परवाह किये बिना एक दूर से आती हुई गूँज दोहरा दी-''तुम बी जिएगा। तुम बी नाचेगा। सब्बी नाचता।''


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