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कहानी

अलिफ लैला
प्रथम भाग

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सहस्र-रजनी चरित्र, जो अब भी भारत में अपने अरबी नाम अल्फ लैला के प्रचलित बिगड़े हुए रूप 'अलिफ लैला' के नाम से अधिक जाना जाता है, वास्तव में लोक कथाओं का ऐसा संग्रह है जिसकी लोकप्रियता का मुकाबला पंचतंत्र की कथा माला के अलावा और कोई कथा-माला नहीं कर सकती। अरबी साहित्य इतिहास के लेखक प्रोफेसर आ.ए. निकलसन के कथनानुसार यूरोपवासियों में कुरआन से भी अधिक जिस अरबी साहित्य को जाना जाता है वह अल्फ लैला ही है। अरबी में अल्फ का अर्थ है एक हजार और लैला का अर्थ है रात। इस लिहाज से इस कथामाला का हिंदी नाम 'सहस्र रजनी चरित्र' बहुत उपयुक्त अनुवाद है।

प्रोफेसर निकलसन ने दसवीं शताब्दी ईस्वी के अरब लेखक और इतिहासकार मसऊदी के हवाले से कहा है कि अल्फ लैला की कथामाला का आधार फारसी की प्राचीन कथामाला 'हजार अफसाना' है। अल्फ लैला की कई कहानियाँ जैसे 'मछुवारा और जिन्न' 'कमरुज्जमा और बदौरा' आदि कहानियाँ सीधे 'हजार अफसाना' से जैसी की तैसी ली गई हैं। निकलसन के अनुसार सब से अधिक कल्पनाशील कथाएँ यही हैं, शेष कहानियाँ जो अरब स्रोतों से आई हैं उनमें हास्यजनित मनोरंजन का तत्व अधिक है। निकलसन और मसऊदी का अपना एक विशेष दृष्टिकोण हो सकता है। मेरे विचार से जिसे इन लोगों ने कल्पनाशीलता का नाम दिया है वह जादू-टोने के बल खड़ा हुआ कल्पना का महल है। जिन अरब स्रोतों की कहानियों को इन लोगों ने हास्यात्मक मनोरंजन कहा है मेरे विचार से वे आधुनिकता के अधिक समीप हैं। यह सही है कि उनमें मानव मन की किन्हीं गहराइयों के दर्शन नहीं होते किंतु उनमें मिलने वाले उन्मुक्त वर्णन में हमें तत्कालीन समाज की जो झलकियाँ मिलती हैं वे उस समय के सामाजिक जीवन और सामाजिक मान्यताओं का अच्छा दिग्दर्शन कराती हैं। मैं इस पर बाद में कुछ कहूँगा, यहाँ मुझे सिर्फ यही कहना है कि जादू-टोने का सहारा पुराने कथाकार केवल इसलिए लिया करते थे कि स्वाभाविक वातावरण में श्रोताओं के कौतूहल को कायम रख सकें।

ऐसा मालूम होता है कि पुराने ईरानी कथा साहित्य का लगभग पूरा आधार ही जादू-टोने पर स्थापित है। फिरदौसी के शाहनामे में, जिसे एक प्रकार से प्राचीन ईरान का इतिहास कहा जा सकता है, अच्छे-खासे अनुपात में अलौलिक बातें पाई जाती हैं, जैसे जुह्हाक के कंधों पर साँप निकल आना, रुस्तम के पिता जाल का एक काल्पनिक पक्षी सीमुर्ग द्वारा पालन-पोषण, रुस्तम की देवों (राक्षसों) से लड़ाइयाँ आदि। हजार अफसाना की आधारकथा वही है जो अल्फ लैला में ज्यों की त्यों ले ली गई है। यह कथा है : एक बादशाह अपनी रानी के व्यभिचार को देख कर संन्यास ग्रहण का निर्णय लेता है और इस निर्णय को तभी बदलता है जब उसे और उसके भाई को एक जिन्न की रक्षिता स्त्री अपने साथ संभोग करने के लिए विवश कर देती है। इसके बाद वह बादशाह वापस आकर रानी को मरवा देता है और बाद में यह नियम बना लेता है कि रोज शाम को एक कन्या से विवाह करे और अगली सुबह उसे मरवा दे। अंत में उसी के मंत्री की बेटी बादशाह से विवाह करती है और एक हजार रातों तक मनोरंजक कहानियाँ कह कर अपनी मृत्यु टालती रहती है और इस काल के अंत तक बादशाह का हृदय ऐसा बदल जाता है कि वह न केवल मंत्री-कन्या को जीवित रहने देता है बल्कि अपना रोज शादी कर अगली सुबह रानी को मरवाने का नियम भी छोड़ देता है।

कुछ कहानियों में - विशेषतः उनमें जो खलीफा हारूँ रशीद के नाम के साथ जुड़ी हैं, इतिहास और जादू-टोने को ऐसी दिलचस्प सूरत में मिला दिया गया है जिसमें आम लोगों की कहानी में दिलचस्पी बढ़ जाए। हारूँ रशीद 787 ईस्वी में खलीफा बना और 808 ईस्वी में मर गया। उसने वजीर जाफर बरमकी को 783 ईस्वी में अपना पूर्ण विश्वस्त बनाया और 803 ईस्वी में मरवा भी दिया। लेकिन अल्फ लैला के कथाकारों के लिए हारूँ के काल का यही सात-आठ साल का जमाना सब से अधिक महत्वपूर्ण है।

निकलसन के कथनानुसार अल्फ लैला की अंतिम कथाओं की रचना मिस्र के ममलूक खलीफाओं (1250-1517 ईस्वी) के काल में हुई है। स्पष्ट है कि अंतिम कहानियों ही में, जो हारूँ रशीद के चार-पाँच सौ बरस बाद रची गई हैं, हारूँ का उल्लेख है। यह भी संभव है कि इस काल में पुरानी कथाओं को और रोचक बनाने के लिए उनमें हारूँ रशीद जोड़ दिया गया हो।

बहरहाल, ये कहानियाँ लोक-कथाओं के अलावा कुछ नहीं हैं। प्राचीन काल ही से मुस्लिम इतिहासकार इतिहास रचना कर रहे थे किंतु लोक कथाकारों को इससे कुछ लेना-देना न था। इतिहासकारों ने हारूँ की विलासप्रियता से इनकार नहीं किया है किंतु उन्होंने अधिक जोर उसकी शासन कुशलता, विद्याप्रेम और न्यायप्रियता पर दिया है (वैसे अपने कृत्यों में हारूँ बहुत न्यायप्रिय साबित नहीं होता, न वह बहुत गंभीर प्रकृति का आदमी ही मालूम होता है)। लोक कथाकारों को उसके विद्याप्रेम और कलाप्रेम से इतना ही सरोकार है कि वह संगीतज्ञों को प्रश्रय देता था। उसकी न्यायप्रियता से उन्होंने केवल उसके वेश बदल कर बगदाद का मुआइना करने का तत्व ही लिया किंतु ऐसी हालत में भी वह न्याय तो बाद में और वह भी कभी-कभी करता है, पहले तमाशा देखता है और तमाशों में भाग लेता है, यहाँ तक कि कभी-कभी अपमानित भी होता है।

हारूँ रशीद की बड़ी बेगम जुबैदा थी। वह ऐतिहासिक तथ्य है किंतु अल्फ लैला में हारूँ से संबद्ध पहली कहानी में जुबैदा का जो वर्णन किया गया है उसमें वह विवाह के पहले अच्छी-खासी जादूगरनी के रूप में उभरती है जिससे एक बार खलीफा की जान को भी खतरा पैदा हो जाता है। यह दूसरी बात है कि बाद में वह मामूली रानियों की तरह सिर्फ महल के अंदर ही षड्यंत्र कर पाती है और जब खलीफा को इसका पता चलता है तो वह यद्यपि उसे मरवाता नहीं लेकिन उसका जी कुढ़ाने के लिए उसकी सौत ले आता है और वह इस स्थिति में समझौता कर लेती है।

ऐतिहासिक तथ्य इससे बिल्कुल अलग हैं। जुबैदा का विवाह राज घरानों के साधारण विवाहों जैसा ही था। उसे महल के अंदर दासियों के विरुद्ध षड्यंत्र करने की फुरसत ही नहीं थी। वह शासन के संचालन में भी अपना प्रभाव रखती थी। जाफर बरमकी को हारूँ ने उसी के भड़काने से मरवाया था। जाफर को प्राणदंड दिए जाने का अल्फ लैला में कहीं उल्लेख नहीं है। इस ठेठ राजनीतिक घटना से कहानी की लोकप्रियता, रोमांचकता खत्म हो जाती।

अब यह देखिए कि अल्फ लैला से हमें मध्यकालीन पश्चिम एशिया के जीवन की कौन-सी झलकियाँ मिलती हैं। चूँकि यह लोक कथाकारों की रचनाएँ हैं इसलिए इनमें उस राजनीतिजन्य कृत्रिमता की संभावना नहीं है जो राज्याश्रित विद्वान इतिहासकारों के लिए आवश्यक हो जाती है। अतएव ये वर्णन अधिक विश्वसनीय हैं।

सबसे पहले निगाह जाती है धार्मिक विश्वासों पर। कथाकार और श्रोता दोनों मुसलमान थे इसलिए हर जगह इस्लाम का प्राधान्य दिखाई देता है। हिंदुस्तान के वर्णन में सारा समाज मुसलमान दिखाई देता है - यहाँ तक कि बंगाल (यंत्रचालित घोड़े की कहानी) में भी, जिसे हिंदुस्तान से अलग समझा गया है, राज परिवार मुस्लिम ही है और संभवतः प्रजा में भी गैरमुस्लिम लोग लगभग नहीं के बराबर हैं। हाँ, श्रीलंका में (सिंदबाद की कथा) तथा एक-आध जगह और मूर्ति पूजकों का उल्लेख जरूर मिलता है। ज्ञातव्य बात यह है कि इन कहानियों में अरबों तथा मूर्ति पूजक लोगों में कोई संघर्ष नहीं दिखाई देता। इसका एक संभव कारण दक्षिण भारत में अरबों का प्रवास हो सकता है। उत्तर भारत में मुस्लिम आक्रमण तुर्किस्तान और अफगानिस्तान ही से हुए जिनका अरब मानस पर संभवतः कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दोनों जातियों में, राजकीय स्तर ही पर सही, पूर्ण सहयोग और सौहार्द दिखाई देता है। कहानियों के मुसलमान नायकों का धार्मिक संघर्ष केवल अग्निपूजकों से होता है। मुसलमान राजाओं के राज्यों में भी अग्निपूजक दिखाई देते हैं जो अपने आराध्य देव अग्नि को मुसलमानों की बलि देते हैं और तारीफ की बात यह है कि मुस्लिम शासकों को इसका पता भी नहीं चलता है क्योंकि ये अग्निपूजक यह काम बहुत गुप्त रूप से करते हैं। हाँ, उनका अपराध ज्ञात होने पर उनको जबरन मुसलमान बना लिया जाता है।

अग्निपूजक उस काल में केवल जरथुस्त्र मतावलंबी पारसी ही थे। उक्त धर्म में नरबलि का कहीं विधान नहीं है। यह बात जरूर है कि तेरहवीं-चौदहवीं ईस्वी शताब्दी में अग्निपूजक जहाँ भी थे वे मुसलमानों को, जिन्होंने उन्हें अपना देश छोड़ने को विवश किया था, बहुत ही नापसंद करते थे और उनसे कोई सामाजिक संबंध नहीं रखना चाहते थे। यह भी याद रहे कि सारी धार्मिक कट्टरताओं के बावजूद ईसाइयों और यहूदियों के मुसलमानों से व्यापारिक संबंध थे और ये लोग मुसलमानों के बीच घुलमिल कर रहते थे। मुसलमान भी अन्य धर्मावलंबियों की अपेक्षा ईसाइयों और यहूदियों को उनके एकेश्वरवाद और दैवी ग्रंथ पर विश्वास (अह्ले-किताब होने) के कारण अधिक क्षम्य समझते थे। अग्निपूजकों को इसी अलगाव के कारण आम मुसलमानों ने अपनी कल्पना में बहुत नीची जगह दी थी और उनकी दुष्टता की कहानियाँ गढ़ ली थीं।

हब्शियों का जहाँ भी उल्लेख आया है, गुलामों ही के रूप में आया है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक अफ्रीका वासियों को सारे संसार में इसी रूप में देखा जाता था। साथ ही उन्हें बड़ा ओछा भी दिखाया गया है। जाफर का गुलाम, जिसे खाने-पीने की कोई तंगी नहीं हो सकती थी, बालक के हाथ से सेब छीन कर भागता है। जल्लाद का काम करने के लिए भी हब्शी रखे जाते थे। ताज्जुब की बात यह है कि व्यभिचारिणी स्त्रियों की काम-पिपासा शांत करने के लिए भी हब्शी ही प्रयुक्त किए गए हैं। यूँ तो गोरे रंग के गुलाम भी बाजारों में खूब बिकते थे, किंतु बेगमों को हब्शियों के अलावा कोई पसंद ही नहीं आता था। यहाँ तक कि एक कथा (मछुवारा और जिन्न) में परम शक्तिशालिनी जादूगरनी मलिका अपने हब्शी गुलाम पर ऐसी आसक्त दिखाई गई है कि उसकी लगातार खुशामद किया करती है और उस गुलाम के घायल और बोलने से लाचार होने पर बरसों तक उसकी सुश्रूषा करती रहती है।

इसका कारण केवल यही नहीं मालूम होता कि हब्शी लोग आम अरबों से शारीरिक रूप से अधिक पुष्ट होते थे। इसकी जड़ में यह बात दिखाई देती है कि कथाकार को जहाँ भी किसी स्त्री की दुष्टता को उभारना होता है वहीं उसका संबंध किसी हब्शी से करा दिया जाता है, क्योंकि तत्कालीन अरब समाज में हब्शियों को नर-पशु से अधिक नहीं समझा जाता था। जहाँ मधुर प्रेम-संबंध दिखाए गए हैं वहाँ मुसलमान शहजादों या धनाढ्य लोगों की भी नमाज दिखाई गई है, किंतु आम लोगों और निर्धनों की नमाज का उल्लेख नहीं के बराबर है। यह स्थिति आज की स्थिति से भिन्न हैं क्योंकि आज मुसलमानों में नमाज के पाबंद गरीब ही अधिक दिखाई देते हैं। हज का उल्लेख भी कहानियों में एक-आध जगह ही प्रकारांतर से हुआ है। उसका कोई विवरण नहीं दिया गया है जबकि शाही महलों और जादू के महलों की सजावट के वर्णन में पृष्ठ के पृष्ठ रंग दिए गए हैं।

हाँ, एक इस्लामी विश्वास जरूर उभर कर आता है। वह यह कि इस्लाम में आत्महत्या जघन्य अपराध समझी गई है। कई कहानियों में नायक निराश होकर आत्महत्या की बात सोचता है, फिर इसे घोर पाप समझ कर रुक जाता है। यह इस्लामी मान्यता कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाने में बड़ी सहायक सिद्ध हुई है और इसीलिए इसका खूब सहारा लिया गया है।

किंतु इस्लामी मान्यताओं ने मदिरापान पर कहीं रोक नहीं लगाई। राजा हो या रंक, अगर उन्हें पेट भर खाने को मिलता है तो कुछ देर बाद शराब जरूर पीते हैं। शराब के साथ अनिवार्य रूप से फल और मिठाई खाने का रिवाज भी आम है। हर सम्मानित अतिथि का स्वागत सामिष भोज्य पदार्थों और फिर मदिरा से किया जाता है। इस्लाम में शराब और हर तरह के नशे की मनाही है किंतु यह धार्मिक निषेध किसी कहानी में प्रकारांतर से भी उल्लिखित नहीं हुआ है। तत्कालीन मुस्लिम समाज स्पष्टतः ही मद्यपान को बुराई समझना छोड़ चुका था। इसी तरह कोई हँसी-खुशी का मौका नाच-गाने के बगैर नहीं होता। बादशाहों और खलीफाओं के यहाँ तो यह दैनिक कार्यक्रम में शामिल है ही, आम लोग भी जहाँ खुशी मनाते हैं वहाँ नाच-गाना जरूर होता है और इस सिलसिले में इस बात का जिक्र तक नहीं होता कि इस्लाम ने नृत्य, संगीत, कविता (ईशभक्ति के काव्य के अतिरिक्त) आदि का निषेध किया है।

सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रथम सोपान पर स्वभावतः ही बादशाह, शहजादे और वजीर दिखाई देते हैं। लेकिन उसके बाद व्यापारियों ही का नंबर आता है। बड़े व्यापारी, विशेषतः जौहरी, तो अति प्रतिष्ठित हैं ही, मामूली व्यापारी भी और लोगों से अधिक प्रतिष्ठित हैं। इसे मध्यपूर्व के सारे सामाजिक जीवन की विशेषता समझना चाहिए। समुद्री व्यापार का महत्व स्थलमार्ग के व्यापार से भी अधिक है। सभी जहाजों के कप्तान बादशाहों की दृष्टि में भी प्रतिष्ठित हैं। व्यापारी वर्ग को अतिशय ईमानदार माना गया है। वे लोग बरसों बाद भी खोए हुए व्यक्ति की धरोहर ज्यों की त्यों वापस कर देते हैं और मालिक के आग्रह करने पर भी उसमें से थोड़ा-सा हिस्सा भी नहीं लेते। एक कहानी में धरोहर को हथियाने वाले व्यापारी को दिखाया गया है किंतु उसकी घोर दुर्दशा भी दिखाई गई है।

इसके विरुद्ध पुलिसवालों और अन्य राजकर्मचारियों को कहीं भी ईमानदार नहीं दिखाया गया है। वे तभी तक ईमानदारी से काम करते हैं जब तक तात्कालिक दंड का डर रहता है। इस वर्ग का चरित्र और प्रतिष्ठा व्यापारी वर्ग से बिल्कुल उल्टी दिखाई देती है। बाद के जमाने की ईरान की कहानियों और नाटकों में भी व्यापारी वर्ग को राज कर्मचारी वर्ग से कहीं अधिक प्रतिष्ठित दिखाया गया है। यह मान्यता भारत के सामंती काल के समाज की मान्यताओं से बिल्कुल उल्टी है। हाँ, सारे संसार के सामंती समाजों की भाँति मध्यपूर्व के सामंती समाज में भी मजदूरों, हस्तशिल्पियों आदि का मान बहुत कम है, यानी गुलामों से कुछ ही अधिक है।

प्राकृतिक तथा अन्य दृश्यों में पहाड़ों, नदियाँ, वनों आदि का उल्लेख तो हर देश की कथाओं में है किंतु अल्फ लैला में जिस प्रकार से हर कहानी में बागों, नहरों और पालतू जानवरों और चिड़ियों का वर्णन है उससे यह मालूम होता है कि ये चीजें उस जमाने में वहाँ आम लोगों की पहुँच के अंदर थीं यानी वे लोग इन चीजों के बारे में इतना जानते थे कि उनके विशद वर्णन से आनंद उठा सकें। शहरों की सूरत ऐसी ही दिखाई देती है जैसी मध्य युग में हर देश के शहरों की थी। तंग गलियों में मामूली मकानों के साथ-साथ बने हुए भव्य भवन, जिनके बाहरी दरवाजों पर कोई शान-शौकत नहीं दिखाई देती, इन शहरों की विशेषता है। भारत के वाराणसी तथा अन्य पुरानी बस्तियों में भी शहरों की ऐसी ही सूरत दिखाई देती है।

हास्यात्मक कथाओं में हास्य अधिकतर बादशाहों और सामंतों के आम आदमी की मूर्खताओं पर हँसने या अपने मनोरंजन के लिए उन्हें बेवकूफ बनाने तक ही सीमित मालूम होता है। शिष्ट हास्य इन लोक कथाकारों की पहुँच के बाहर मालूम होता है।

वास्तव में यह कथामाला किसी सर्वमान्य रूप में नहीं है। कई संग्रहों में कई ऐसी कहानियाँ हैं जो अन्य संग्रहों में नहीं हैं। ऐसा मालूम होता है कि यूरोपियनों या उनके प्रभाव में आने वाले अन्य लोगों ने ऐसी अजीब-अजीब कहानियाँ गढ़कर इसमें शामिल कर दी हैं, जो दूसरी कहानियों के मिजाज से मेल नहीं खाती। इन लोगों ने शायद यह समझ लिया है कि कोई भी कामुकतापूर्ण घटना अल्फ लैला में चल जाएगी।

प्रस्तुत संग्रह में केवल सर्वमान्य कहानियाँ दी गई हैं, यद्यपि उनका ऐसा संक्षिप्तीकरण नहीं किया गया है जो कहानी को कथानक तक सीमित कर दे क्योंकि लोकसाहित्य का मूल्य उसके कथानक में नहीं, उसके वर्णन में निहित होता है।

सरस्वती सरन 'कैफ'

 

 

 

 

 

 


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