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कहानी

अलिफ लैला
द्वितीय भाग

अज्ञात

अनुक्रम नाई के पाँचवें भाई अलनसचर की कहानी पीछे     आगे

नाई ने कहा कि मेरे पाँचवें भाई का नाम अलनसचर था। वह बड़ा आलसी और निकम्मा था। वह रोज किसी न किसी मित्र के पास जा कर बेशर्मी से कुछ भीख माँग लेता और खा-पी कर पड़ा रहता।

मेरा बाप कुछ समय बाद बूढ़ा हो कर मर गया। उसने तीन हजार एक सौ पचास रुपए छोड़े। इन रुपयों को हम सातों भाइयों ने बराबर-बराबर बाँट लिया। अलनसचर ने भी अपना भाग पाया और उससे कुछ व्यापार करने की सोची। उसने साढ़े चार सौ रुपए के शीशे के बरतन खरीदे और उन्हें टोकरी में रख कर बाजार में सड़क के किनारे बैठ गया। वहीं एक दरजी की दुकान थी। दो-एक दिन में दरजी से उसकी दोस्ती हो गई।

अलनसचर वाचाल और मूर्ख तो था ही, हवाई किले भी बनाता रहता था। एक दिन वह दरजी से कहने लगा, मैं इन साढ़े चार सौ के बरतनों को नौ सौ में बेचूँगा और फिर उससे और बरतन लूँगा जिन्हें अठारह सौ में बेचूँगा। इसी तरह व्यापार करते-करते मेरे पास तीस हजार रुपए हो जाएँगे। फिर मैं बहुमूल्य व्यापार सामग्री माणिक, मोती आदि खरीदूँगा और उनसे काफी मुनाफा कमाऊँगा। जब मेरे पास काफी रुपया हो जाएगा तो मैं एक विशाल भवन खरीद कर दास-दासियाँ भी मोल लूँगा और रईसों की तरह रहूँगा और मेरी प्रसिद्धि सारे नगर में हो जाएगी, मेरे यहाँ बड़े-बड़े गवैये और कलावंत आएँगे और मेरे यहाँ रात-दिन रास-रंग होंगे। मेरा व्यापार भी जारी रहेगा। जब बढ़ते-बढ़ते मेरा धन पाँच लाख तक पहुँच जाएगा तो मैं यहाँ के मंत्री के पास संदेश भेजूँगा कि अपनी बेटी का विवाह मुझ से कर दे। उसने स्वीकार किया तो ठीक वरना मैं उसकी बेटी को जबर्दस्ती उठा लाऊँगा।

फिर जब मंत्री की पुत्री से मेरा विवाह हो जाएगा तो मैं दस गुलाम खरीदूँगा और शहजादों जैसे बढ़िया कपड़े पहनूँगा और रत्नजटित जीन लगामवाले असील घोड़े पर चढ़ कर शान से मंत्री के घर जाऊँगा। जब मैं उसके महल में पहुँचूँगा तो सभी छोटे-बड़े लोग भय और आदरपूर्वक मुझे देखेंगे और मेरा पूर्ण सत्कार करते हुए मुझे अंदर ले जाएँगे। जब मैं ऊपर जाना चाहूँगा तो मेरे नौकर और गुलाम और नौकरों के जमादार अदब से जीने में दोनों और खड़े होंगे। वजीर अपना दामाद समझ कर मुझे अपने आसन पर बैठने की जगह देगा और स्वयं मेरे सामने बैठेगा। मैं अपने सेवकों से हजार-हजार अशर्फियों के दो तोड़े लाने को कहूँगा। मैं एक तोड़ा वजीर को दूँगा कि यह तुम्हारी बेटी का महर है और दूसरा अपनी इच्छा से तुम्हें देता हूँ। मेरी उदारता की चर्चा चारों ओर होने लगेगी। फिर मैं वैसे ही ठाठ-बाट से अपने घर आऊँगा।

जब मेरी पत्नी सुनेगी कि मैं उसके पिता से मिलने गया था और उसे भेंट दी थी तो वह मेरा एहसान मानेगी और एक उच्च कर्मचारी द्वारा कृतज्ञता का प्रकाशन करेगी। मैं उस कर्मचारी को बढ़िया इनाम दूँगा। कभी-कभी मैं अपनी पत्नी पर कृपा कर के उसका संग करने के लिए उसके महल में जाऊँगा और वहाँ भी ऐसी गंभीरता से जाऊँगा कि दाएँ-बाएँ किसी ओर निगाह न डालूँगा।

मेरी पत्नी, जिसका मुख पूर्णमासी के चंद्रमा की तरह होगा, बड़ी सज-धज के साथ सोलह श्रृंगार कर के मेरे सामने आएगी तो मैं गर्व के मारे उसकी ओर आँख भी नहीं उठाऊँगा, फिर उसकी प्रधान सेविकाएँ और सखी-सहेलियाँ मेरे सामने आ कर विनय करेंगी कि मालिक, आपकी पत्नी, जो आपकी दासी के समान है, आप की आज्ञा की प्रतीक्षा में है और आप के सामने खड़ी है। कृपा कर के उसे अपने आगे बैठ जाने को कहें। मैं फिर भी उन्हें कोई उत्तर नहीं दूँगा। उन्हें इस बात का बड़ा आश्चर्य होगा कि मैं उनकी ओर और अपनी पत्नी की ओर देखता क्यों नहीं हूँ। वे लोग बड़ी देर तक मेरे सामने खड़ी हो कर मुझ से अपनी पत्नी पर ध्यान देने के लिए अनुनय करती रहेंगी।

फिर मैं एक कृपापूर्ण दृष्टि अपनी पत्नी पर डालूँगा लेकिन फिर निगाह फेर लूँगा। मेरे इस रवैये से मेरी पत्नी की सेविकाएँ और साथिनें समझेंगी कि मैं वैसे किसी बात पर नाराज नहीं हूँ किंतु पत्नी का जो साज-श्रृंगार किया गया है वह मेरे मन का नहीं है इसलिए वे उसे दूसरे कक्ष में ले जाएँगी ताकि उसका नए सिरे से साज-श्रृंगार करें। इतने समय में मैं भी उठ कर नए कपड़े पहन लूँगा।

शयनकक्ष में जाने पर भी मैं अपनी पत्नी से पूर्ण उपेक्षा का बरताव करूँगा। मैं उसकी ओर एक दृष्टि भी नहीं डालूँगा और उससे एक बात भी नहीं करूँगा। मैं पलंग पर उसकी और पीठ कर के सो रहूँगा। मेरी पत्नी रात भर इस उपेक्षा से दुखी हो कर आँसू बहाती रहेगी और सवेरा होने पर अपनी माता यानी मंत्री की पत्नी से रो-रो कर कहेगी कि मेरे पति ने रात में मेरे साथ गर्व और उपेक्षा का बर्ताव किया। उसकी माँ उसे दिलासा देगी, फिर मेरे महल में आ कर सम्मानपूर्वक मेरा हाथ चूमेगी और कहेगी कि जमाई राजा, मेरी बेटी पर इतना अत्याचार न करो कि उसकी ओर देखना ही छोड़ दो। उसका अगर कोई कसूर है तो बताओ मैं उसे दंड दूँगी। वैसे यह तो कहने की जरूरत नहीं कि वह तुम्हारी दासी है और तब मन से तुम्हारी सेवा करना उसका कर्तव्य है। तुम उस पर एक बार तो कृपा दृष्टि करो।

उसके इस अनुनय-विनय का मुझ पर कोई असर नहीं होगा। फिर मेरी सास मेरे पास आ कर मेरा पाँव चूमेगी। मैं इस पर भी टस से मस नहीं हूँगा। फिर मेरी सास शराब का एक प्याला भर कर मेरी पत्नी को देगी कि अपने पति को पिला दो, शायद इससे वह तुम से प्रसन्न हो जाए। मेरी पत्नी मेरे सामने आ कर प्याला लिए बहुत देर तक भयभीत-सी खड़ी रहेगी। फिर वह कहेगी कि आपको उसी भगवान की सौगंध है जिसने आप को इतना ऊँचा बनाया है, कि इस दासी के हाथ से मद्यपात्र ले कर पियें। मैं उसकी इस बात को बदतमीजी समझूँगा और उसके मुँह पर एक तमाचा लगाऊँगा और उठ कर उसके इतने जोर से लात मारूँगा कि वह दालान से नीचे गिर पड़ेगी।

मेरा भाई अपनी कल्पना में इतना खो गया कि उसे अपनी स्थिति का भी ध्यान नहीं रहा। उसने उठ कर उसी टोकरे पर, जिसमें उसके शीशे के बरतन रखे हुए थे, जोर की लात जमाई। टोकरा सड़क पर जा गिरा और उसमें के सारे बरतन टूट-फूट कर बिखर गए। दरजी, जो उसकी बकवास को मजे ले कर सुन रहा था, हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया। उसने मेरे भाई से कहा, मूर्ख, अभागे, तुझे मालूम है कि तेरी यह हानि क्यों हुई है। तूने इतनी सम्मानित और सुंदर स्त्री का जो अपमान किया यह उसी का फल है। अगर मैं तेरे श्वसुर यानी मंत्री की जगह होता तो ऐसी बदतमीजी पर तेरे सौ कोड़े लगवाता और गधे पर बिठा कर सारे शहर में घुमाता कि लोग तुझे दंडित अपराधी के रूप में जान जाएँ।

मेरे भाई को भी अपने माल की बरबादी देख कर बड़ा दुख हुआ और वह रोने-चिल्लाने लगा। बहुत-से लोग उस समय जुमे की नमाज के लिए मस्जिद की ओर आ रहे थे। उसका रोना-पीटना सुन कर वहाँ भीड़ इकट्ठी हो गई। लोग पूछने लगे कि क्या बात है। जब दरजी ने उन लोगों को पूरा हाल बताया तो वे सब भी हँसने लगे और मेरे भाई का मजाक उड़ाने लगे।

संयोग से उसी समय एक अमीर घराने की स्त्री परदेवाली सवारी पर बैठी कहीं जा रही थी और उस स्थान से गुजर रही थी। उसने सवारी रुकवा कर भीड़ के लोगों से पूछा कि क्या बात है, कौन रो रहा है और उस पर क्या विपत्ति पड़ी है। उन लोगों ने जल्दी में पूरी बात नहीं बताई बल्कि कह दिया कि एक गरीब बरतनवाला एक चबूतरे पर टोकरे में बरतन रखे था, संयोग से ठोकर लगी और सारे बरतन जमीन पर गिर कर चूर-चूर हो गए। उस स्त्री को दया आई। उसने अपने एक सेवक को अशर्फियों की एक थैली दे कर कहा कि उस बेचारे गरीब को दे आओ जिसका नुकसान हुआ है। सेवक ने वह थैली, जिसमें पाँच सौ अशर्फियाँ थीं, मेरे भाई अलनसचर को दी। उसने थैली पा कर बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की और उस दानी स्त्री को बहुत-से आशीर्वाद दे कर थैली ले कर अपने घर चला आया।

कुछ ही देर में उसका दरवाजा किसी ने खटखटाया। उसने दरवाजा खोला तो देखा कि एक बुढ़िया खड़ी है। बुढ़िया ने कहा, बेटा, नमाज का समय हो गया है। मुझे एक लोटा पानी दो तो मैं वजू कर के नमाज पढ़ लूँ। मेरे भाई ने देखा कि वह काफी बूढ़ी है इसलिए नितांत अपरिचित होने पर भी उसने उसे ला कर पानी दिया। बुढ़िया नमाज पढ़ कर मेरे भाई के सामने आई और उसके सामने ऐसे झुकी जैसे नमाज में भगवान के समक्ष झुकते हैं और फिर उठ कर उसे बराबर आशीर्वाद देती रही। मेरे भाई ने उसके फटे कपड़े देख कर समझा कि यह भीख माँग रही है। उसने अशर्फियों की थैली निकाली और उसे दो अशर्फियाँ देने लगा। बुढ़िया ने वे अशर्फियाँ नहीं लीं। मेरे भाई अलनसचर ने बिगड़ कर पूछा कि क्या तू इतनी भीख से भी संतुष्ट नहीं है। बुढ़िया ने कहा कि तुमने गलत समझा कि मैं भिखारिन हूँ। मैं तो अति धनवान और सुंदर युवती की नौकरानी हूँ, वह मुझे बहुत कुछ देती है और मुझे भीख की जरूरत नहीं है।

मेरा भाई मूर्ख तो था ही, उस बुढ़िया के फरेब को न समझा और उससे कहने लगा कि हमें भी अपनी मालकिन को दिखाओ। इसके लिए वह उसे इनाम देने लगा। बुढ़िया हँस कर बोली, तुम यह इनाम रख लो और मेरे साथ चलो। तुम मेरी मालकिन को तो देखोगे ही, यह भी संभव है कि तुम्हारी सुंदरता देख कर वह तुमसे विवाह कर ले। ऐसा हुआ तो तुम वास्तव में भाग्यशाली हो जाओगे, असंख्य धन और अनिंद्य सुंदरी के स्वामी। मेरे भाई ने अंदर जा कर अच्छे वस्त्र पहने और अशर्फियों की थैली ले कर बुढ़िया के साथ चला। बुढ़िया उसे एक बड़े विशाल और सजे-सजाए मकान के सामने ले गई। उसके आवाज देने पर एक यूनानी दासी ने द्वार खोला। बुढ़िया ने उसे एक सुसज्जित स्थान पर बिठाया और अंदर गई। कुछ ही देर में एक अत्यंत रूपवती युवती आ कर उसके समीप बैठ गई और उससे घुल-मिल कर बातें करने लगी। उसने कहा, यह ऊपरी कपड़े उतार कर आराम से बैठो। अलनसचर ने ऐसा ही किया। कुछ ही देर में वह युवती घर के अंदर यह कह कर चली गई कि मैं अभी आती हूँ।

कुछ ही देर में एक बड़ा लंबा-चौड़ा हब्शी हाथ में नंगी तलवार ले कर आया और गरज कर मेरे भाई से बोला, तू यहाँ मेरे घर में क्या कर रहा है? मेरे भाई की भय के मारे घिग्घी बँध गई। हब्शी ने उसे तलवार के कई हाथ मारे जिससे वह गिर कर बेहोश हो गया। हब्शी ने उसकी कमर से अशर्फियों की थैली खोल ली और आवाज दी कि नमक लाओ। वही यूनानी दासी एक कटोरे में पिसा हुआ नमक ले आई। नमक वह यह देखने के लिए मँगाता था कि उसका शिकार अगर मरा न हो तो वह उसे फिर तलवार मार कर खत्म कर दे। दोनों ने उसके घावों पर नमक छिड़का। मेरा भाई उनका उद्देश्य समझ गया था इसलिए तकलीफ सह कर भी चुप हो कर पड़ा रहा।

हब्शी और दासी उसे पूर्ण मृत जान कर थैली ले कर चले गए। कुछ देर में बुढ़िया फिर आई और मेरे भाई को घसीटती हुई ले गई और एक कोने में बने हुए गढ़े में फेंक आई जहाँ और भी कई लाशें पड़ी हुईं थीं। मेरा भाई इस अरसे में तकलीफ की वजह से बेहोश हो गया था। गढ़े में फेंके जाने के कुछ देर बाद उसे होश आया। वास्तविकता यह थी कि तकलीफ देने के लिए डाला गया नमक ही उसके प्राण बचाने और शक्ति देने का कारण बना। थोड़ी देर के बाद वह उस गढ़े से निकल कर एक कोने में दब कर बैठा फिर छुपता-छुपाता मकान के दरवाजे पर पहुँचा। जो कुछ कहीं पड़ा मिलता खा-पी लेता। दो दिन बाद बुढ़िया फिर नए शिकार की तलाश में निकली तो यह मौका पा कर भाग निकला और मेरे पास आ गया और मुझसे अपनी सारी विपत्तियों का हाल कहा।

महीने भर में उसके सारे घाव भर गए और वह पूर्णतः स्वस्थ हो गया। अब उसने बदला लेने की योजना बनाई। उसने एक बड़ी-सी थैली बनाई और उसमें अशर्फियों के बराबर शीशे के टुकड़े भर दिए। फिर उसने बुढ़ियों जैसे कपड़े पहने और कपड़ों के अंदर तलवार छुपा कर हाथ में थैली ले कर निकल पड़ा।

संयोग से एक गली में वही धोखेबाज बुढ़िया मिल गई। उसने बूढ़ी स्त्रियों के जैसे स्वर में उससे कहा, बहन, मैं फारस देश की रहनेवाली हूँ और इस नगर में नई आई हूँ। मेरे पास पास सौ अशर्फियाँ हैं। मैं चाहती हूँ कि उन्हें परख और तौल कर देख लूँ कि पूरी और ठीक हैं या नहीं। तुम कहीं से मेरे लिए सिक्के तौलने का तराजू ला दो। उसने उत्तर दिया, बहन, तुम मेरे साथ चली आओ। मुझ से अधिक विश्वसनीय व्यक्ति इस नगर में कोई नहीं है। मेरा पुत्र सर्राफे का काम करता है। वह तुम्हारी अशर्फियाँ भली भाँति तौल और परख देगा। लेकिन जल्दी करो, ऐसा न हो कि वह घर से अपनी दुकान को चला जाए।

वह पापिन मेरे भाई को उसी घर में ले गई जिसमें पहले ले गई थी। यूनानी दासी ने पहले की भाँति द्वार खोला और मेरे भाई को अंदर ले जा कर एक अच्छी जगह बिठा दिया। बुढ़िया ने कहा, तुम यहीं बैठो, मैं अभी अपने बेटे को ले कर आती हूँ। कुछ ही देर में उसका तथाकथित पुत्र यानी वही हत्यारा हब्शी आया और कहने लगा कि भाई, मेरे साथ चलो। मेरा भाई अलनसचर बुढ़िया के वेश में उसके पीछे चल दिया। रास्ते में जब वह हब्शी लापरवाह हो गया तो मेरे भाई ने तलवार निकाल कर ऐसा हाथ मारा कि उसका सिर कट कर अलग जा पड़ा। अलनसचर ने उसका सिर और धड़ दोनों खींच कर उसी गढ़े में डाल दिए।

इतने में यूनानी दासी बरतन में पिसा नमक ले कर आई किंतु बुढ़ियों के वस्त्र पहने नंगी तलवार लिए पुरुष को देख बरतन फेंक कर भागने लगी। मेरे भाई ने झपट कर उसे पकड़ा और उसका सिर काट दिया।

दौड़-भाग और चीख-पुकार सुन कर वह बुढ़िया भी वहाँ आ गई। लेकिन वहाँ का हाल देख कर जान बचाकर भागने लगी। मेरे भाई ने दौड़ कर उसे पकड़ा और कहा, दुष्टा, कुकर्मिणी, तूने मुझे पहचाना या नहीं। बुढ़िया काँपती हुई बोली कि मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा, पहचानूँगी कैसे। मेरा भाई बोला, तूने देखा कैसे नहीं है, मैं वही हँ जिससे तूने उस गली में नमाज के लिए पानी माँगा था और फिर यहाँ ला कर अपनी समझ में मरवा डाला है। बुढ़िया हाथ जोड़ कर और गिड़गिड़ा कर कहने लगी कि मेरा अपराध क्षमा कर दो। किंतु मेरे भाई ने उस पर दया न की और उसके भी चार टुकड़े कर दिए।

अब मेरे भाई ने उस सुंदर युवती की तलाश की जिससे उसने पहले प्रेमालाप किया था। वह एक अन्य कक्ष में मिली और मेरे भाई को देख कर काँपने लगी। मेरे भाई ने उसे निरपराध जान कर उससे कोई कटु वाक्य न कहा बल्कि सांत्वना दी और पूछा, सुंदरी, मैंने उन दोनों बदमाश स्त्रियों और हब्शी का अंत कर दिया है। अब तुम बताओ कि तुम कौन हो, कहाँ की रहनेवाली हो और इन अत्याचारियों के फंदे में कैसे फँस गई। उसने उत्तर दिया, मैं एक धनी व्यापारी की पत्नी थी। यह बुढ़िया कभी-कभी मेरे घर आती थी लेकिन मुझे यह नहीं मालूम था कि यह कौन है और क्या करती है। एक दिन इसने आ कर मुझ से कहा कि मेरे घर विवाह है, तुम उसमें शामिल होने के लिए चलो। इसके बहुत अनुनय-विनय करने पर मैं इसके साथ उत्तम-उत्तम वस्त्राभूषण पहन कर और सौ अशर्फियाँ ले कर यहाँ आ गई। यहाँ से इन लोगों ने मुझे अपने घर न जाने दिया और इसी हब्शी के साथ सहवास के लिए मजबूर किया। तीन वर्ष से मैं यहीं रहती हूँ। इस हब्शी से और इन लोगों के कुकृत्यों में विवशतापूर्वक शामिल होने से मैं बड़ी दुखी थी किंतु कुछ कर नहीं पाती थी।

मेरे भाई ने पूछा कि इन लोगों ने भोले-भाले लोगों को मार कर कितना धन जमा किया है। उसने कहा कि धन तो इतना है कि तुम सारी आयु आराम से रह सकते हो। यह कह कर वह उसे कई कमरों में ले गई जहाँ पर कई संदूक मुद्राओं आदि से भरे थे। मेरे भाई की यह देख कर आँखें फट गईं। उस स्त्री ने उससे कहा कि तुम बाहर जा कर कुछ मजदूर ले आओ तो हम लोग यह सब यहाँ से उठा कर ले चलें। मेरा भाई बाहर जा कर बाजार की तरफ दौड़ गया और कई मजदूर ले कर आ गया किंतु उसे देख कर आश्चर्य हुआ कि इतनी देर में वह स्त्री संदूकों के समेत गायब हो गई, केवल एक कोने में अनुमानतः पाँच सौ अशर्फियों के मूल्य का सामान पड़ा हुआ था। मेरे भाई ने सोचा कि चलो, जो कुछ हाथ आया वही बहुत है और मजदूरों से वही सामान उठवा कर अपने घर आ गया।

दुर्भाग्य से मजदूरों को लाने के बाद उसने उस घर का दरवाजा बंद नहीं किया था, न बाहर जाने पर घर को ताला लगाया। अतएव आसपास के लोग वहाँ आ गए और मजदूरों को सामान उठाए हुए जाते देख कर और घर को खाली पा कर काजी के यहाँ चले गए और उससे सारा मामला बता दिया। मेरा भाई अपने घर में एक रात निश्चिंत हो कर सो रहा था कि कई सिपाही आए और उसे पकड़ कर काजी के पास ले गए। काजी ने उससे पूछा कि यह सामान कहाँ मिला। उसने कहा कि मैं ये सारी बातें सच-सच आपको बताऊँगा किंतु आप यह आश्वासन दें कि मुझे दंड न दिया जाएगा। काजी ने कहा, सच बोलने पर मैं तुझे दंड न दूँगा।

अतएव मेरे भाई ने सारी घटनाएँ उसे आद्योपांत बता दीं। काजी ने अपने सेवकों को भेज कर मेरे भाई के घर से सारा सामान उठवा मँगाया और उसे अपने घर भिजवा दिया और उसमें से मेरे भाई को कुछ भी नहीं दिया। इसके बाद उसने मेरे भाई अलनसचर को दो-तीन वर्ष के लिए नगर से निष्कासित कर दिया ताकि वह खलीफा के पास जा कर उससे काजी की शिकायत न कर सके।

मेरा भाई बेचारा उन दो-चार अशर्फियों को ले कर, जो उसकी जेब में पड़ी थीं, शहर से बाहर निकला और एक ओर को चल दिया किंतु दुर्भाग्य ने यहाँ भी उसे धर दबाया। दो-तीन दिन बाद उसे डाकुओं ने घेर लिया। वे उसका सारा धन, यहाँ तक कि पहनने के कपड़े भी, लूट कर ले गए। मुझे मालूम हुआ तो मैं कुछ कपड़े और रुपए ले कर अपने भाई की खोज में निकला और कुछ दिनों बाद उसे खोज निकाला। उसे वस्त्र और रुपए दे कर मैं उसे छुपा कर नगर में ले आया और अपने घर में ला कर रखा। इसके बाद मैं बराबर उसका भरण-पोषण करता रहा था।


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