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एक खत टेलीग्राम के नाम
धर्मेन्द्र मोहन पंत


टेलीग्राम! तुझे तो जाना ही था। खलनायक कभी जिंदा नहीं रहता। एक दिन उसे जाना होता है और सुना है कि तू भी जा रहा है अगले महीने (जुलाई 2013) की 15 तारीख को। सच कहूँ तो अब तुझसे कुछ वास्ता नहीं है। अब डर भी नहीं लगता है तुझसे लेकिन जब गाँव में था तो दहशत पैदा करता था तू। पूरे गाँव वालों में। टेलीग्राम (तार) आया है तो जरूर कुछ अनहोनी होगी। तू क्या जाने कि वह फुसफुसाहट अंदर तक कितना कँपा जाती थी। तू पहुँचता बाद में था लेकिन तेरा डर लोगों को पहले से थर्रा देता था। आखिर तेरी अच्छी छवि बनती भी तो कैसे। मैंने तो यही देखा कि जब भी तू आया किसी घर को रुला गया। गाँव को शोक में डुबाता था तू।

अरे कभी तूने उस चिट्ठी या मनीआर्डर से कुछ सीख लिया होता जिसके बारे में सुनते ही चेहरा खिल उठता था। तूने अगर गाँव की दादियों, ताइयों, चाचियों, भाभियों की चिट्ठी आने पर चेहरे की चमक देखी होती तो तू भी उससे ईर्ष्या करने लग जाता। तुझे जब-तब चिट्ठी का साथ मिला जरूर लेकिन तूने उससे कुछ नहीं सीखा। तुझे तो हमेशा दूसरों को पीड़ा देने में मजा आता था। अरे आखिर तू ये क्यों भूल जाता था कि वह डाकिया भी तुझसे नफरत करता था जिसके झोले में तू कुछ समय गुजारता था। डाकिया भी तुझे किसी दूसरे के घर में

देकर गंतव्य तक पहुँचाने का आग्रह करके चला जाता था।

तू कभी हमारे गाँव, मेरे पहाड़ के गाँवों को नहीं समझ पाया था। तू ईर्ष्या करता था उनसे, इसलिए मैंने तुझे कभी अच्छी खबर लाते हुए नहीं देखा था। अरे कभी तो तूने ये समझा होता कि हमारे कितने भाई देश की रक्षा के लिए सीमाओं पर तैनात हैं। वहाँ से तो उनकी कुशलता की खबर लाता तो कितना अच्छा होता। नहीं, तूने ऐसा सीखा ही नहीं था। अरे कभी तो तुझे एहसास हुआ होता कि हमारी अर्थव्यवस्था मनीआर्डर पर आधारित है। गाँव छोड़ना हमारी मजबूरी थी। देहरादून से लेकर दिल्ली और मुंबई की सड़कों पर खाक छानते हुए पेट भरने के लिये बने थे हम। यहाँ कौन था हमारा। माँ ने परायों को सौंप दिया था अपना बेटा। माँ ने देश को समर्पित कर दिया था अपना बेटा। भेज दिया था उसे पाकिस्तान से लेकर चीन की सीमाओं पर। और हाँ, अब जबकि तू जा रहा है तो तुझे एक सचाई बता दूँ। वह मां कभी तेरा नाम नहीं लेना चाहती थी।

मेरी माँ को भी एक टेलीग्राम मिला था। उसके बाद क्या हुआ था यह सुनकर तेरी भी रूह काँप जाएगी। आखिरी दम तक तड़पाता रहा था मां को वह छोटा सा संदेश। पिताजी पढे लिखे थे, फौज में रहे थे और तमाम चीजों के अच्छे जानकार थे। पूरा गाँव अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनके पास आता था लेकिन उस दिन वह भी तेरा मजमून नहीं समझ पाए थे। ...लेकिन अब तू जा रहा है तो मन में किसी तरह की खुशी भी नहीं हो रही है। तुझे तो जाना ही था। अब तेरी किसी को जरूरत नहीं रही। लेकिन उम्मीद है कि तू इस सीख के साथ जा रहा होगा कि जो दूसरों को दुख देता है उसका अंत बुरा होता है। तू खुद को ही देख ले। आज तू जा रहा है और तुझे पूछने वाला कोई नहीं है। कोई नहीं है तेरा हमदर्द। कोई नहीं है तेरा अपना। जवानी में तूने जो गुल खिलाए उनकी सजा भुगत रहा है तू। उम्मीद है कि दुनिया तुझसे सबक लेगी। तू भले ही मेरे लिए खलनायक रहा लेकिन मैं तेरी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करूँगा। ओम शांति ओम।


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हिंदी समय में धर्मेन्द्र मोहन पंत की रचनाएँ