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उपन्यास

राजर्षि
रवींद्रनाथ टैगोर

अनुवाद - जयश्री दत्त

अनुक्रम


राजर्षि के सम्बन्ध में कुछ कहने का अनुरोध किया गया है। कहने को विशेष कुछ नहीं है। इस बारे में मुख्य वक्तव्य यही है कि यह मेरा स्वप्न में उपलब्ध उपन्यास है।

बालक पत्रिका की संपादिका ने मुझे इस मासिक की थाली में नियमित रूप से परोसने के काम में लगा दिया था। उसका फल हुआ यह कि प्राय: एकमात्र मैं ही उसके भोज का प्रबंधकर्ता बन गया। तनिक समय पाते ही मन 'क्या लिखूँ' 'क्या लिखूँ' करता रहता था।

राजनारायण बाबू थे, देवघर में । उनसे भेंट करने जाने के लिए निकलना पड़ा। रात में गाड़ी की रोशनी विश्राम में बाधा पहुँचाएगी, इस वजह से उसका निचला आवरण खींच दिया। एंग्लो-इण्डियन सहयात्री का मन उससे प्रसन्न नहीं हुआ, ढकना खोल दिया। जगे रहना अनिवार्य सोच कर एक कथा का प्लॉट मन में लाने की चेष्टा करने लगा। नींद आ गई। स्वप्न में देखा -- पत्थर का एक मन्दिर है। छोटी लडकी को लेकर पिता पूजा करने आया है। सफेद पत्थर की सीढ़ियों से बलि का रक्त बह रहा है। देखते ही लडकी के चेहरे पर क्या भय! क्या वेदना! करुण स्वर में बार-बार पिता से कहने लगी, पिताजी, इतना रक्त क्यों! पिता किसी तरह लडकी का मुँह बंद कर देना चाहता है, तब लडकी अपने आँचल से रक्त पोंछने लगी। जागते ही बोला, कथा मिल गई। स्वप्न का यह विवरण 'जीवन स्मृति' में पहले ही लिख चुका हूँ, पुनरुक्ति करनी पड़ी। असली कथा थी, प्रेम की अहिंसा-पूजा के साथ हिंस्र-शक्ति-पूजा का विरोध। किन्तु मासिक पत्रिका की पेटू जरूरत साहित्य की वैध भूख के परिमाप में सिमटना नहीं चाहती। व्यंजनों की सूची-संख्या बढ़ाते चलना पड़ा।

वस्तुत: उपन्यास पूरा हो गया, पन्द्रहवें परिच्छेद में। फसल वाले खेत का जहाँ किनारा होता है, वहाँ बुवाई हुई नहीं, बेकार का जंगल खड़ा हो गया। सामयिक पत्रिका की विवेचनाहीनता में अक्सर लेखनी का मूल स्वभाव नष्ट हो जाता है। विशेष रूप से जहाँ शिशु-पाठक ही लक्ष्य हों, वहाँ व्यर्थ की वाचालता में संकोच नहीं रहता। अल्पवयस्क बालकों के सम्मान की रक्षा भी आवश्यक है, प्राय: यह बात शिशु-साहित्य के लेखक भूल जाते हैं। साहित्य-रचना में यदि गुणी लेखनी में सतर्कता न रहे, यदि वह रचना बिना मर्यादा के व्यर्थ हो जाए, तब वह अस्वास्थ्यकर हो ही जाएगी, विशेषत: बालकों के पाक-यंत्र के लिए। अगर व्यवसाय की खातिर दूध के बदले चावल का घोल चलाना पड़े, तो वह धोखा चलाया जा सकता है, वयस्कों की थाली में, उससे उनकी रुचि की परीक्षा हो जाएगी; किन्तु बालकों के भोग में नैव नैव च ।

श्रावण : 1347


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