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पत्र

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के पत्र
रामधारी सिंह दिनकर


बनारसीदास चतुर्वेदी के नाम

पो.ऑ. लालगंज

मुजफ्फरपुर

६-१-३६

श्रद्धेय चतुर्वेदी जी,

प्रणाम!

आपका ५-१-३६ का कृपा-पत्र आज संध्‍या को मिला। इस पत्र ने मुझे बहुत कुछ उत्‍साह दिया है।

अपने मित्रों में जरा इमोशनल कहलाता हूँ। इसीलिए लोग मुझे ऐसी बात कहने या ऐसी चीजें दिखाने से डरते हैं जिससे मुझे दु:ख होने की संभावना हो। अभी हाल ही, मैं शिवपूजन जी से मिला था। तब तक साप्‍ताहिक विश्‍वमित्र में निर्झरिणी की निन्‍दा छप चुकी थी। शिवपूजन जी ने मुझे वह लेख देखने नहीं दिया। कहने लगे जब लोग तुम्‍हारी निन्‍दा खुलकर करने लगें तब तुम समझो कि तुम्‍हारी लेखनी सफल हुई। अस्‍तु।

चौदह करोड़ लोगों के द्वारा बोली जाने वाली हिन्‍दी का क्षेत्र इतना विस्‍तृत है कि लोग किसी व्‍यक्ति-विशेष की रचना पर साधारणत: खास तौर से आकृष्‍ट नहीं हो सकते। इस विशाल समुद्र में किसी इंडिविजुअल की कृति एक तिनके से बड़ी नहीं। फिर इसे तो मैं अपना सौभाग्‍य ही समझता हूँ कि भाव, कुभाव, अनख आलसहूँ 'रेणुका' का नाम दस भले लोगों के मुँह पर आ जाता है।

आप विश्‍वास रखें, आप पूज्‍यों की कृपा से मुझमें इतनी ताकत जरूर है कि अखबारों में रोज निकलने वाली पंक्तियाँ मुझे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकतीं। कोई प्रशंसा ऐसी नहीं जो मुझे याद रहे, कोई निन्‍दा ऐसी नहीं जो मुझे उभार दे। नास्ति का परिणाम नास्ति है। कुछ नहीं से कुछ की उत्‍पत्ति नहीं हो सकती। अगर आज कोई सत्ता है तो वह किसी के मिटाये से नहीं मिटेगी। पदार्थ का अस्तित्‍व नहीं है तो वह किसी के पैदा करने से पैदा नहीं हो सकता। कीट्स ने एक बार एक मित्र को लिखा था :

'If all my poems were burnt the next day they were written and no eye shine upon them, yet I would go on writing and writing.'

मैं रेणुका के दोषों को भलीभाँति जानता हूँ। उसमें कलाविदों को पद-पद पर अनुभवहीनता, इमैच्‍युरिटी और कहीं-कहीं भाषा सम्‍बन्‍धी कमजोरियाँ मिलेंगी। कीट्स के ही शब्‍दों में It is a foolish attempt, rather than a deed accomplished.

मैं जो कुछ चाहता हूँ , जो कुछ सोचता हूँ उसे ठीक मनचाहे रूप में अब तक उतार नहीं सका हूँ। इस चेष्‍टा का एक अस्‍पष्‍ट रूप मेरी आँखों के सामने बराबर टँगा रहता है। All the same, no one should be justified in passing a remark of insincerity regarding my feelings. I don't believe in the saying that Renuka contains lines written forcibly. Although at times, my poems have been deprived of the support of my character, I know that they have always come out in spontaneity. More or less, every poem has been a direct enlightenment in my life. रेणुका को लेकर धूम मचा करे लेकिन, मैं अभी तक निश्चित रूप से यह भी नहीं समझ पाया हूँ कि मेरे political career का श्रीगणेश हो गया। भगवान मुझ पर कृपा करे कि मैं अभी कुछ दिनों तक और भी सरस्‍वती के चरणोदक से अपनी मूर्खता धोता रहूँ। हिंन्‍दुओं को पुनर्जन्‍म का भी भरोसा रहता है।

बच्‍चन को मैं एक पत्र लिख चुका हूँ। उसने भी एक पत्र लिखा है। अब रेगुलर करेस्‍पोंडेंस शुरू करता हूँ। योगी में अवश्‍य लिखूँगा। लेकिन, बच्‍चन अपनी प्‍याला, बुलबुल आदि कविताएँ भेज दे तो मजमून कुछ अधिक दिलचस्‍प होगा।

मनोरंजन जी से पत्र-व्‍यवहार करके मैं अपने को सौभाग्‍यशाली समझूँगा।

इधर मुझे ऐसा जान पड़ता है कि शुद्ध भाषा लिखने की ट्रेनिंग मुझे और लेनी चाहिए। भरसक कोशिश कर रहा हूँ। कविताएँ शिवपूजन जी से दिखाकर छपाया करूँगा। आप इस विचार को कैसा समझते हैं? मेरे विचार से शिवपूजन जी की जैसी चार्टर्ड हिन्‍दी लिखने वाला विरला ही होगा।

आशा है आप प्रसन्‍न हैं।

अगर मैंने छुट्टी नहीं ली तो दो महीनों तक यहाँ रहने की बात है।

आपका

दिनकर

आवश्‍यक :

जनवरी के अन्‍त में मेरे घर में कुछ यज्ञ-प्रयोजन होने वाला है। अतएव मैं भी मुँगेर में रह सकूँगा कि नहीं यह अनिश्चित है। आपके वसन्‍तोत्‍सव का क्या हुआ? मुझे तो मार्च के पहले छुट्टी प्राय: मिल ही नहीं सकती। उसके लगभग प्रोग्राम रखें तो मैं अभी से छुट्टी की कोशिशें करूँ।

दिसम्‍बर का वि. भा. अब तक नहीं मिला है। भारत और अभ्‍युदय नहीं देखा है। न देखने की इच्‍छा है। विश्‍वमित्र वाले दोनों लेख देख चुका हूँ।

''विश्‍वास' वाला आपका लेख सुन्‍दर है। यह विचार कुछ अनन्‍त की ओर जाने वालों को अप्रासंगिक भले ही लगे लेकिन इसके बिना कवियों का भी उद्धार नहीं है। आज यह राजवाटिका छोड़, चलो कवि वनफूलों की ओर। एमर्सन और क्रोपटकिन को छोड़ कर आप किन्‍हीं दो तीन अन्‍य लेखकों और उनकी सुन्‍दर कृतियों के नाम भेज दें जो आपको पसन्‍द हों।

आपके जीवन में वसन्‍त आ रहा है - इस ४४वें वर्षं में। भगवान करें यह कभी आपको छोड़े नहीं। आप फाल से डरते हैं? You may have a fall, but a fall on the knee which may end in prayer.

दिनकर

पटना-६

४-८-५५

मान्‍यवर चौबे जी,

प्रणाम। पत्र मिला। कहते हैं मनुष्‍यों के हाथों की जाने वाली दुर्गति से घबरा कर चना एक बार ब्रह्मा के यहाँ गया। किन्‍तु, ब्रह्मा ने कहा कि रक्षा मैं क्‍या खाक करूँगा। मेरे मुँह में तो खुद पानी आ रहा है। वही हाल आपका है। किन्‍तु, हाल-चाल जो रहे, आज्ञा आपकी शिरोधार्य है।

पत्रकारों की संस्‍था का सभापतित्‍व ग्रहण करके आपने बहुत अच्‍छा किया। यह हिन्‍दी का अपूर्व सम्‍मान है और अपने भाषण में आपने उस सम्‍मान की भलीभाँति रक्षा की है। मेरा 岩हृदय तो आनन्‍द से फूल उठा।

ब्रजशंकर से कल ही बातें हो रही थीं। He is not at all displeased with you. He continues to be yours as ardent as ever.

रामधन के पत्र पर पत्र आ रहे हैं और मैं ईंट-पत्थर सबसे प्रार्थना किये जा रहा हूँ। देखिये, क्‍या होता है।

मैं तीन चिंताओं का शिकार रहा हूँ। अधूरी किताब की चिंता, अधूरे मकान की चिंता, अधूरे बेटे की चिंता। बेटा तो आपके आशीर्वाद से प्राध्‍यापक हो गया है। वह आठ तारीख को कार्य-भार सम्‍भालेगा। मकान से भी जबर्दस्‍ती कर रहा हूँ कि अब तू पूरा हो जा क्‍योंकि बेसूदी कर्ज में मेरा बाल-बाल गिरवी हो गया है। Still I believe when you can borrow money without interest, it is as good as income, provided you are given good health and peaceful time to work for its repayment.

किताब पूरी करने में लगा हुआ हूँ। जब तक पूरी नहीं होती, दिल्‍ली नहीं आऊँगा। Delhi makes us all shallow and flat. You can't do a good work there. I think, you are the brightest instance in point.

झूठ कहता हूँ? दिल्‍ली दो ही प्रकार के लोगों के उपयुक्‍त है। एक तो उनके लिए जो सुरा और सुन्‍दरी के रसिया हैं। दूसरे, उनके लिए जो दिन में सोते हैं।

नागार्जुन की गरीबी अब देखी नहीं जाती। परसों प्रण किया है कि उसके लिए कुछ-न-कुछ व्‍यवस्‍था तुरन्‍त करूँगा। किन्‍तु, यह निर्धन और साधनहीन का प्रण है जिसका पूरा होना ईश्‍वरीय कृपा पर निर्भर है। राँची में उसने जवाहरलाल जी पर एक कविता सुनायी जो उत्तम कोटि की थी। उत्तम से नीचे तो वह लिखता ही नही है। और कितने सरल, निस्‍पृह तथा विशाल हैं नागार्जुन।

आशा है आप प्रसन्‍न हैं। पिन नहीं है, इसलिए दोनों कागज यों ही लिफाफे में डाल राह हूँ।

आपका

दिनकर

आर्यकुमार रोड, पटना-४

१-११-६०

मान्‍यवर पण्डित जी,

आपका २९-१० का कृपापत्र प्राप्‍त हुआ। अन्तिम पुरुषार्थ से आपको निराशा हुई, यह बात मैं नोट करता हूँ। किन्‍तु इस भाव को रोकूँ कैसे? वीरता अनेक प्रकार की होती है, उसका एक प्रकार यह भी है कि आत्‍मा जो कहना चाहे वही कहो, यश-अपयश का विचार छोड़ दो। अभी हाल ही में पास्‍टरनेक पर लिखते हुए मैंने ये पंक्तियाँ लिखी थीं -

मोड़ो न धार स्‍वर की अकीर्तियों के भय से,

रोको मत अपना कंठ कीर्तियाँ पाने को,

रह जाती मर कर यहाँ कुसुम की भी सुगन्‍ध,

पत्‍थर की भी आवाज दूर तक जाती है।

कवि पर फूल बरसाये जायँ, तो संभव है, उनकी गंध उसी समय नष्‍ट हो जाय। और किसी पर पत्‍थर फेके जायँ तो यह भी संभव है कि उन पत्‍थरों की आवाज भविष्‍यत को सुनायी दें।

To give you more pain I quote a few lines more from my recent composition -

मैं वहीं हूँ तुम जहाँ पहुँचा गये थे।

खण्‍डहरों के पास जो स्रोतस्विनी थी,

अब नहीं वह शेष, केवल रेत भर है,

दोपहर को रोज लू के साथ उड़कर बालुका यह

व्‍याप्‍त हो जाती हवा-सी फैल कर सारे भवन में।

खिड़कियों पर, फर्श पर, मसिपात्र, पोथी, लेखनी में

रेत की कच-कच, कलम की नोक से फिर शब्‍द कोई

भी न उगता है। कल्‍पना मल-मल दृगों को लाल कर लेती।

आँख की इस किरकिरी में दर्द कम ही हो भले,

पर खीझ, बेचनी, परेशानी बहुत है।

कहाँ तक लिखूँᣛ? जो कुछ भी लिखता हूँ, उसमें यही उदासी उतर पड़ती है। क्‍या अपनी पीठ पर आप कोड़े लगाऊँ और जबरन अपने को उस ओर हाँक दूँ जिधर कुरुक्षेत्र और रश्मिरथी के कँगूरे दिखाई देते हैं?

लगता है, संघर्ष करते अब टूट रहा हूँ। आप तो जानते ही हैं‍ कि एक बेटी और पाँच भतीजियों के ब्‍याह रचवाने का काम पूरा कर चुका हूँ। केवल अपनी बेटी के ब्‍याह में छोटे भाई ने पाँच हजार रुपये की मदद की। बाकी सारा खर्च और लड़का मुझे ही जुटाना पड़ा। और अक्‍सर ऐसे दामाद मिले जो असन्‍तोष पालते रहे हैं। भाइयों ने बीस वर्ष पहले ही बाँट कर अलग कर दिया और अलग हो जाने पर भी उनके बेटों और बेटियों का सारा बोझ माथे पर उठाये चल रहा हूँ। यह भी विचित्र अभिशाप है। मैंने भाइयों को इतना निश्चिंत रखा कि वे काहिल हो गये। बड़े तो मेरे हिस्‍से का खेत पा जाने पर भी दयनीय हैं और मर-खप कर कुछ न कुछ मदद अब भी करनी पड़ती है। परिवार बड़ा भारी शोषक होता है। उसके शोषण से वही बच सकता है जो वैज्ञानिक समाजवाद में विश्‍वास करे। मुझ जैसे मानवतावादी लोग तो उस शोषण के जाल से निकल नहीं सकते न यही कह सकते हैं कि हमने त्‍याग किया है।

और जरा सोचिये कि मेरी एक बेटी अब भी क्‍वाँरी है और एक बेटी बड़े भाई की भी है जिसे ब्‍याह में देना है। पोतियों का जिम्‍मा तो खैर मेरे लड़के का होगा। भगवान उसे सकुशल रखें। मेरा स्‍वास्‍थ्य लड़खड़ा रहा है। अब मेरा एक मात्र भरोसा मेरा पुत्र है जो सारा बोझ उठाये हुए है।

किन्‍तु इन सबसे अधिक हानिकर प्रभाव मैत्री-भंग का पड़ा है। साहित्‍य के मित्र शत्रु हो गये, जो हुए वे तटस्‍थ हो गये हैं। गाँव में दो-एक दोस्‍त थे वे भी कन्‍नी कटा गये क्‍योंकि वे मुझे प्रभावशाली समझते हैं और प्रभाव का उपयोग मैं उन्‍हें करने नहीं देता। लगता है, मैं गलत युग में पकड़ा गया हूँ। मुझे दस साल पूर्व ही चल देना था। कहाँ वह समय जब कविताओं से देश में लहर आ जाती थी और कहाँ यह समय जब कविताओं पर नजर कभी-कभी ही उठती हैं। आपको इस वातावरण में आशा कहाँ दिखाई देती है? उल्‍लास और उमंग की कौन-सी कहानी अब शेष है?

धुँआ-धुँआ सब ओर, चतुर्दिक घुटन भरी है,

आँख मूँदने पर भी तो अब दीप्ति न आती।

तिमिर व्यूह है ध्‍यान, गीत का मन काला है,

धूम ध्‍वान्‍त फूटता कला की रेखाओं से।

मधुमेह तो खैर सँभल गया है, किन्‍तु चक्‍कर का आना नहीं रुका है। रक्‍तचाप अधिक से अधिक १७० तक जाता है। किन्‍तु उतने में ही लक्षण अनुभूत होने लगते हैं। टण्‍डन जी वाले समारोह में जाने का पक्‍का विचार कर लिया था, लेकिन उसी दिन रक्‍तचाप फिर बढ़ गया तथा डाक्‍टर और घर के लोग एक हो गये कि अब जाने नहीं देंगे।

बिलकुल एकान्‍त में रहने से मानसिक शक्ति कुछ बढ़ जाती हैं, लेकिन एकान्‍त को नष्‍ट करने वाले छोटे-छोटे विघ्न आते ही रहते हैं।

डाक्‍टर कहते हैं, चिन्‍ता को मन से निकाल दो। किन्‍तु सब चिन्‍ताएँ छूट जाने पर भी यह चिन्‍ता नहीं छूटती कि उर्वशी काव्‍य अधूरा पड़ा है।

ब्रजशंकर ब्रज में विहार कर रहे हैं आ जाएँ तो उन्‍हें आपका अभिवादन कह सुनाऊँगा।

आशा है, आप प्रसन्‍न हैं। बड़ी कृपा कि आपने इस युग में मेरी भी कविता पढ़ ली।

आपका

दिनकर

आचार्य कपिल के नाम

लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर

२६-१-५१

प्रिय कपिल जी,

हम लोगों के परम प्रिय विद्वान श्री कामेश्‍वर शर्मा (राष्‍ट्रवाणी) का एक लेख कहीं निकला है जिसकी कतरन आप की सूचना के लिए भेज रहा हूँ। जरा गौर से देख जाइये।

कामेश्‍वर फूलें, फलें और बढ़ें, यह मेरी कामना पहले भी थी और अब भी है। उन्‍हें मैं यह भी छूट देता हूँ कि वे दिनकर काव्‍य के विरोधी के रूप में अपना विकास करें और उन्‍हें बुरा न लगे तो मेरे साथ एक थाली में बैठकर भोजन भी करें। मुझे हार्दिक प्रसन्‍नता होगी। किन्‍तु उन्‍हें और प्रत्‍येक लेखक को चाहिये कि वस्‍तुस्थिति को देखकर बोले और लिखे जिससे किसी की पद मर्यादा को अनुचित जर्ब नहीं पहुँचे। पटने में एक साहित्यिक षड्यंत्र चल रहा है जिसका केंन्‍द्र यह कल्पित बात है कि दिनकर बिहार के सभी साहित्‍यिकों का बाधक है और कुछ लोगों के खिलाफ तो उसकी फौज खड़ी रहती है। जब उमा मुझ पर आक्रमण करें, बेनीपुरी मुझ पर चोट करें, प्रदीप मेरे विरुद्ध लेख छापे और कामेश्‍वर मेरे विरुद्ध लिखें तब लोग न जाने किसे मेरी फौज का आदमी समझते हैं? मुझे लगता है, कामेश्‍वर जी इस भ्रम में हैं कि दिनकर का विरोध करने से निष्‍पक्ष आलोचक के रूप में वे पूजे जायेंगे। सो इसे तो मैं घोर भ्रम समझता हूँ और जिस निर्णय पर मैं १५ वर्षों के बाद पहुँचा हूँ उस पर वे भी कभी न कभी आयेंगे ही। प्रयत्‍नपूर्वक उनसे मिलकर उन्‍हें आप समझा देंगे कि प्रभात जी महाराज के साथ एक साँस में वे मेरा नाम न लें। कुरुक्षेत्र के विरुद्ध वे चाहें तो एक लेखमाला आरम्‍भ कर दें जिसके लिए स्‍थान मैं राष्‍ट्रवाणी में ही दिलवा दूँगा। मगर, ईश्‍वर के नाम पर वे भाषा में शिष्‍टता लायें और कोई ऐसा काम न करें जिससे उन्हें बाद को चलकर लज्जित होना पड़े।

उन्‍हें मैंने आत्‍मीय समझा है, इसीलिए ये बातें लिख रहा हूँ। प्रेमी भी परस्‍पर एक दूसरे की आलोचना कर सकते हैं, किन्‍तु, ऐसी भाषा में नहीं जिससे जग हँसाई हो। मैंने जीवन-भर में किसी आलोचक के लिए कोई पत्र नहीं लिखा था। यह पहला पत्र है। साहित्‍य में विचार स्‍वातंत्र्य रहना चाहिए, मगर, गाली-गलौज या मुँ‍ह-चिढ़ाना विचार स्‍वातंत्र्य नहीं है। खैर, कामेश्‍वर अभी-अभी अंडा तोड़ कर निकला है इसलिए बहकना तो स्‍वाभाविक है। और जब सभी लोग अपने विकास के लिए दिनकर को लतियाना आवश्‍यक मानते हैं तो वही क्‍यों बाज आए? आखिर, पटने के साहित्यिकों में निर्भीक कहलाने का गौरव तो उसे मिलेगा ही।

शेष कुशल है।

आलोचक महाराज इन दिनों घर पर हैं। वे सम्‍भवत: ३ या ४ को मुँगेर आयेंगे और ५ फरवरी को पटना।

आपका

दिनकर

मुजफ्फरपुर

२५.४.५१

प्रिय कपिल जी,

आपका पत्र मिला। प्राची का अंक भी यथासमय आ गया था। प्राची के विषय में क्‍या कहूँ? मुझे तनिक भी आशा नहीं थी कि मुँगेर से आप इतनी अच्‍छी सामग्री प्रस्‍तुत कर सकेंगे। प्राची में आपने जिस सुरुचि का परिचय दिया है उससे मुझे सात्विक आनन्‍द हुआ। अब मैं आग्रह करूँगा कि इसका दिनों-दिन विकास कीजिए।

एक दो बातें और हैं जिनकी ओर निर्देश कर देना उचित समझता हूँ। आवरण पर से आप मिट्टी के छोटे माधो को तो हटा ही दें। भीतर संकलन और संपादन में जो गांभीर्य है उसके अनुरूप ऊपर का आवरण सादा ही रहना चाहिए अथवा हलकी रेखाओं में कोई छोटा स्‍केच रहे तो ठीक है। आपका उद्देश्य कदाचित यह है कि शिक्षण-संस्‍थाओं में जो प्रश्‍न और समस्‍याएँ हैं, डट कर उन्‍हीं पर प्रकाश डाला जाय। यह एक उपयोगी काम है। मगर, स्‍टैंडर्ड को जरा ऊपर ले जाइये तथा इस प्रकार की समस्याओं पर भी लेख लिखवाइये जैसे :

१) छायावाद का जन्‍म कब हुआ तथा उसके आदि कवि कौन हैं?

२) नई कविता हिन्‍दी की परम्‍परा में आई है अथवा आकस्मिक रूप से?

३) हिन्‍दी-गद्य के क्षेत्र में उस नेतृत्‍व को प्रधानता मिलनी चाहिए जो प्र. ना. मि., बालकृष्‍ण भट्ट, बालमुकुन्‍द गुप्‍त तथा गुलेरी जी के द्वारा दिया गया अथवा उसे जो रामचन्‍द्र शुक्‍ल एवं प्रसाद जी की देन है?

४) यह बात कहाँ तक ठीक है कि उर्दू में से फारसी-अरबी शब्‍दों को हटा कर हिन्‍दी बना ली गई है?

५) रसवादी आलोचना पद्धति में क्‍या संशोधन किया जाय कि वह आधुनिक साहित्‍य की व्‍याख्‍या में सफल हो?

६) रीति कालीन साहित्‍य का मूल्‍यांकन नई समीक्षा की कसौटी पर।

७) भाषा सम्‍बन्‍धी दुष्प्रयोगों पर रोक लगाने के लिए आन्‍दोलन।

ये कुछ मोटे विषय हैं जो याद आ रहे हैं। इनके समानान्‍तर और भी समस्‍याएँ होंगी। सोचने पर आप खुद एक अम्‍बार लगा दीजियेगा।

मैं तो १२ मई तक कुछ नहीं भेजूँगा। हाँ, उसके बाद कुछ न कुछ अवश्‍य भेजूँगा, खातिर जमा रखिये। आपके और काम भी इसी छुट्टी में होंगे। छुट्टियों में आप कहाँ रहेंगे?

आगामी ३ मई को हमारे यहाँ परिषद का वार्षिकोत्‍सव है। हजारी प्रसाद जी और द्विज जी आ रहे हैं। निबन्‍ध-प्रतियोगिता और वाद-विवाद प्रतियोगिता २ मई को है। आपके यहाँ से भी निबन्‍ध और वक्‍ता आने चाहिए। निबन्‍ध का विषय है, 'हिन्‍दी में नई समीक्षा का जन्‍म और विकास' वाद-विवाद प्रतियोगिता का विषय है, "State Vs Civil liberty " या ऐसा ही और कुछ।

शेष कुशल है।

आपका

दिनकर

११, केर्निग, नई दिल्‍ली

१६-४-६१

प्रिय भाई,

आज यहाँ आते ही तुम्‍हारा पत्र मिला। कल और परसों चेहरा तो देख ही चुका था। चिन्‍ता हुई कि तुम कठिनाई में हो।

समय से पेट यदि रोज स्‍वयमेव साफ हो जाय तो सभी अंगों को लाभ होता है और चेतना को भी। मैं स्‍वयं इस मामले में २७ जनवरी से अच्‍छा चल रहा था। बस, १२ अप्रैल से कुछ गड़बड़ी शुरू हो गयी है और उसी अनुपात में चेतना पर भी प्रभाव पड़ा है। इसलिए, मेरा ख्‍याल है, पेट की सफाई पर ध्‍यान दो। बेल का गूदा २-३ तोला खाया करो। फल तो देर से आता है, किन्‍तु, वह स्‍थायी होता है। स्‍वानुभूत प्रयोग लिखता हूँ।

किन्‍तु, कुछ सफाई मन की भी होनी चाहिए। जिस काम से आत्‍मा तुष्‍ट रहे उसी से चेतना भी स्‍वच्‍छ रहती है। पुरानी बातों में बड़ा बल है। ईर्ष्‍या, द्वेष, निन्‍दा सुनने या करने की प्रवृत्ति, क्रोध और लोभ, इन्‍हें वश में लाना कठिन होता है। किन्‍तु, कोशिश करने से कुछ सफलता भी जरूर मिलती है, ऐसा मेरा अपना अनुभव है। मैं तो विशेषत: क्रोध से ही हारता हूँ। लेकिन, संघर्ष जारी है।

नवम्‍बर-दिसम्‍बर की बीमारी के बाद मैंने अपने मन को विशेष रूप से स्‍वच्‍छ बनाने की कोशिश की है और उसका प्रभाव मेरे स्‍वास्‍थ्य के लिए हितकारी सिद्ध हुआ है। हर आदमी के कुछ अपने सवाल होते हैं, किन्‍तु, साहित्‍य धर्मी होने के कारण हम दोनों में कुछ न कुछ समानता जरूर होनी चाहिए। इसलिए कुछ थोड़ी बातें तुम्‍हारी जानकारी के लिए लिख देता हूँ ।

हाल में मैंने अपने मन को ये हिदायतें दी हैं।

सुयश के पीछे नहीं दौड़ना; धन के पीछे भी नही दौड़ना। जो मिला सो मेरा, जो नहीं मिला वह किसी अन्‍य अधिकारी मानव-बन्‍धु का है।

दोस्‍ती में मर्द अच्‍छे होते हैं; औरतें निकृष्‍ट होती हैं। मर्दों की दोस्‍ती का भरोसा रखना।

दोस्‍त से दोस्‍त के समान, मुलाकाती से मुलाकाती के समान मिलना। ऐसा काम नही करना जिसे छिपाने की जरूरत हो। ऐसे किस्‍से नहीं जानना जिनकी जानकारी से कोई जवाबदेही आती हो।

Loyalty is the greatest attribute of man, इसका खुद निर्वाह करना और दोस्‍तों से केवल इतनी ही सी चीज की माँग करना। इससे जीवन में शान्ति मिलती है।

यदि ईश्‍वर में तुम्‍हारा विश्‍वास हो तो कोई नाम जपना शुरू कर दो। मैं कई नाम जपता हूँ। इधर हाल में एक जाप यह भी शुरू किया है :

श्रीकृष्‍ण! गोविन्‍द! हरे! मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!

रामचरितमानस का पाठ भी नियमित रूप से करो।

ऐसा भी हो सकता है कि तुम समझो, भैया थक गये और मुझे भी थकावट की ओर खींच रहे हैं।

भगवान करें कि तुम कभी नहीं थको, किन्‍तु, शान्ति का स्‍थान थकावट के स्‍थान से अधिक दूर नहीं होता। गरीबी में जन्‍म लेकर प्रतिकूल परिस्‍थितियों से जुझते हुए पुरुषार्थ के कुछ थोड़े करतब मैंने भी दिखाये हैं। किन्‍तु, नारायण! अब साफ देखता हूँ कि सबसे बड़े पुरुषार्थ का नाम आत्‍मसमर्पण है। No warrior can achieve a greater conquest.

लोकनायक जयप्रकाश नारायण को

पटना

९-११-५८

मान्‍यवर जयप्रकाशजी!

प्रणाम।

मानवीय गुणों पर जोर देते हुए आपने अभी हाल में जो बयान दिया है उसकी कतरन मैंने पास रख ली है और उसे कई बार पढ़ गया हूँ। अजब संयोग की बात कि जब आपका बयान निकला, मैं धर्म और विज्ञान पर एक निबन्‍ध लिख रहा था जो ४० पेज तक गया है, मगर, अभी कुछ अधूरा है। बयान पढ़कर मुझे लगा कि आप जिस चीज को इतनी अच्‍छी भाषा में और इतनी सुस्‍पष्‍टता के साथ कह रहे हैं, मेरी असमर्थ भाषा भी उसी के आस-पास चक्‍कर काट रही है। इस बयान पर लोगों की क्‍या प्रतिक्रिया है, यह भी मुझे मालूम है। लेकिन, हर बड़े काम की राह में लोक-मत कुछ बाधक बनकर आता है और उसकी उपेक्षा किए बिना ये काम किए नहीं जा सकते। वर्त्तमान सभ्‍यता अनेक रूढ़ियों को तोड़कर आगे बढ़ी है, लेकिन, मुझे अब पूरा सन्‍देह हो रहा है कि वह खुद एक प्रकार की रूढ़ि में जा फँसी है, जिसका उपयुक्‍त भाषा के अभाव में, मैं 'बुद्धि की रूढ़ि' नाम देता हूँ। अगर मनुष्‍य को विकसित होना है तो उसे इस रूढ़ि से भी निकलना होगा। बर्ट्रेण्‍ड रसल ने लिखा है कि आदमी में तीन प्रवृत्तियाँ होती हैं, instinct to live, instinct to think and instinct to feel. ये मैं अपनी भाषा में रख रहा हूँ। Feel शायद उसने नहीं कहा है। इस प्रवृत्ति का नाम उसने spirit की प्रवृत्ति दिया है। इन तीनों में समन्‍वय हुए बिना मनुष्‍य का दोषहीन विकास नहीं हो सकता। रसल और हक्‍सले के अलावे, मैंने Alexis Carel

की Man: The Unknown नामक किताब में भी यही देखा कि वैज्ञानिक सभ्‍यता गलत दिशा की ओर जा रही है और मैं मान गया हूँ कि कैरेल का कहना बिल्‍कुल ठीक है। एक धारा है जो सबको बहाए लिए जा रही है। जरूरत है उन पुरुषों की जो इस बहाव में बहने से इनकार कर दें। आपने अपना पाँव जमा लेने का इरादा किया है, इसलिए, मैं आपका सादर अभिनन्‍दन करता हूँ।

युद्ध-काव्‍य के विषय में भी आपका सुझाव बेनीपुरी से मिला है। होगा।

आपका

दिनकर

रामसागर चौधरी को

११, केनिंग लेन,

नई दिल्‍ली

४-३-६१

प्रिय श्री रामसागर चौधरी,

सच ही, मैं आपको नहीं जानता तब भी आपका २८-२-६१ का पत्र पढ़ दु:खी हुआ। यह लज्‍जा की बात है‍ कि बिहार के युवक इतनी छोटी बातों में आ पड़े।

मैं जातिवादी नहीं हूँ। तब भी अनेक बार लोगों ने मेरे विरुद्ध प्रचार किया है और जैसा आपने लिखा है, वे अब ऐसी गन्‍दी बातें बोलते हैं। लेकिन, तब मैं जातिवादी नहीं बनूँगा। अगर आप भूमिहार-वंश में जनमे या मैं जनमा तो यह काम हमने अपनी इच्‍छा से तो नहीं किया, उसी प्रकार जो लोग दूसरी जातियों में जनमते हैं, उनका भी अपने जन्‍म पर अधिकार नहीं होता। हमारे वश की बात यह है कि भूमिहार होकर भी हम गुण केवल भूमिहारों में ही नहीं देखें। अपनी जाति का आदमी अच्‍छा और दूसरी जाति का बुरा होता है, यह सिद्धान्‍त मान कर चलनेवाला आदमी छोटे मिजाज का आदमी होता है। आप-लोग यानी सभी जातियों के नौजवान-इस छोटेपन से बचिये। प्रजातन्‍त्र का नियम है कि जो नेता चुना जाता है, सभी वर्गों के लोग उससे न्‍याय की आशा करते हैं। कुख्‍यात प्रान्‍त बिहार को सुधारने का सबसे अच्‍छा रास्‍ता यह है कि लोग जातियों को भूल कर गुणवान के आदर में एक हों। याद रखिये कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता। वह बहुतों के समर्थन से चलता है। यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजनिक जीवन गल जायेगा।

आप सोचेंगे, यह उपदेश मैं आपको क्‍यों दे रहा हूँ? किन्‍तु, आपने पूछा, इसलिए, आप ही को लिख भी रहा हूँ। आज आप पीड़ित हैं, अपने को आप दु:खी समझते हैं। आपके विरुद्ध जिनका द्वेष उभरा है, कल उनका क्‍या भाव था? शायद अपने को वे उपेक्षित अनुभव करते थे। इसलिए, स्‍वाभाविक है कि उनका असन्‍तोष व्‍यक्‍त हो रहा है। और उपाय भी क्‍या था? इसलिए, आपको धीरज रखने को कहता हूँ, उच्‍चता पर आरूढ़ रहने को कहता हूँ ।

जाति नाम का शोषण करके मौज मारनेवाले चन्‍द लोग, जो कुछ करते हैं उसकी कुत्‍सा उस जाति-भर को झेलनी पड़ती है, यह आप-लोग समझ रहे हैं? यही शिक्षा कल उन्‍हें भी मिलेगी जो आप को केवल इसलिए डस रहे हैं कि आप भूमिहार हैं। तो इससे निकलने का मार्ग कौन-सा है? केवल एक मार्ग है। नियमपूर्वक अपनी जाति के लोगों को श्रेष्‍ठ और अन्‍य जातिवालों को अधम मत समझिये। और यह धर्म उस समय तो और भी चमक सकता है जब आदमी आँच की कसौटी पर हो।

आपका

दिनकर

चंद्रदेव सिंह को

आर्यकुमार रोड, पटना-४

१३-४-६३

प्रियवर,

कविता मिली। पढ़कर बड़ा मजा आया। मुझे आपने जो गालियाँ दी होंगी, उन्‍हें मैंने नहीं देखा, न आज से पहले यह बात मुझे मालूम थी। लेकिन अच्‍छा हुआ कि आपने स्‍वयं अपना मार्जन कर लिया। यह शुद्ध हदय का लक्षण है, यह इस बात का संकेत है कि आप वैयक्तिक मालिन्‍य से ऊपर रहना चाहते हैं। जीवन के प्रत्‍येक क्षेत्र में चरित्र ही प्रधान है।

'परशुराम की प्रतीक्षा' से दो प्रकार के लोग बहुत नाराज हैं। एक वे जो यह समझते हैं कि चीनी-आक्रमण के विरुद्ध जगनेवाला क्रोध जल्‍दी शांत हो जाए, नहीं तो यह क्रोध देश की प्रगतिशील प्रवृत्तियों के विरुद्ध पड़ेगा। दूसरे वे लोग जो यह समझते हैं कि युद्ध का जवाब युद्ध से न देने की भावना यदि बढ़ी तो वह गांधी-धर्म के प्रतिकूल जायगी।

मेरे जानते दोनों-के-दोनों गलती पर हैं। भारत साम्‍यवादी हो जाए तब भी चीन से उसकी खटपट चलती रहेगी जैसे रूस के साथ चल रही है। और गांधी-धर्म को भी मैं एक दूसरे रूप में समझता हूँ। गांधीजी कहते थे, कायरता सबसे बुरी चीज है, उनके बहुत-से शिष्‍य ऐसे हैं, जो केवल यह मानते हैं कि अहिंसा सबसे अच्‍छी चीज है। लेकिन जो कायर भी नहीं है और अहिंसक भी नहीं, वह क्‍या करे? इस सवाल का जवाब गांधीजी के पास था, लेकिन सर्वोदयवालों के पास नहीं है। इसीलिए उनमें से कुछ लोग मुझे हिंसावादी मानकर मेरी निन्‍दा करते हैं।

पिछले १५ वर्षों में देश कहाँ-से-कहाँ पहुँचा है, यह बात मेरे प्रसंग में भी देखी जा सकती है। १९४६ में 'कुरुक्षेत्र' निकला था। उसी में यह पंक्ति थी ''जिनको सहारा नहीं भुज के प्रताप का है, बैठते भरोसा किए वे ही आत्‍मबल का।'' लेकिन कुरुक्षेत्र पर द्वेष के उतने तीखे बाण नहीं बरसे थे जितने परशुराम पर बरस रहे हैं। २७ साल की अहिंसा-साधना का नतीजा यह निकला कि छह लाख हिन्‍दू और मुसलमान पाप की तलवार से काटे गये। यदि देश की निर्वीर्यता नहीं टूटी, तो वह कितना बलिदान लेगी, यह कवि और चिन्‍तक समझ सकते हैं। बाकी लोगों की समझ में यह बात तब आयेगी जब दुर्घटना घटित हो चुकेगी। कितना लिखूँ? केवल आपको धन्‍यवाद देता हूँ। आप बड़े अच्‍छे हैं।

आपका

दिनकर

राजेन्‍द्रनगर, पटना

१२-६-७२

प्रिय चन्‍द्रदेव,

तुम्‍हारी बड़ी कृपा है कि नैनीताल में तुम्‍हें मेरी याद आयी।

हिन्‍दी-ग्रन्‍थ-अकादमी के चेयरमैनशिप का ऑफर सरकार की ओर से आया था। तुम जानते हो कि उस पद पर अभी सुधांशुजी काम कर रहे हैं। वे रुग्‍ण तो हैं ही, अभी भारी विपत्ति में भी हैं। अपने पद पर वे बने रहें तो उससे उन्‍हें थोड़ा ढाढ़स रहेगा। यही सब सोच कर मैंने ऑफर को स्‍वीकार नहीं किया। वैसे काम की मुझे जरूरत है। माथे पर अनाथ पोते-पोतियों का बोझ है जो मुझे अब क्षण भर को भी निश्चिन्‍त होने नहीं देता।

क्‍या करूँ, कुछ समझ में नहीं आता है।

हम जिस समाज में जी रहे हैं, उसके प्रोप्रायटर राजनीतिज्ञ हैं, मैनेजर अफसर हैं, बुद्धिजीवी मजदूर हैं।

बूढ़ा मजदूर भर-पेट मजदूरी नहीं कमा सकता, वही हाल मेरा है।

सरस्‍वती और लक्ष्‍मी के बैर को बुझाने की कोशिश मैं जीवन-भर करता रहा, लेकिन वह बैर बुझा नहीं। अभी तो वह जरा तेज ही हो गया है।

भावुकता में विलाप की बातें लिख गया, क्षमा करना।

भगवान तुम्‍हें सुखी रखें।

तुम्‍हारा

दिनकर

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी को

साउथ एवेन्‍यू लेन, नई दिल्‍ली

२१-८-६५

श्रद्धेय वाजपेयीजी,

आपका पत्र मिला। आपका यह पितृ-स्‍नेह बलदायक होगा।

आपने जो बातें बतलायी हैं, उनमें से अधिकांश पर आरूढ़ हूँ - यहाँ तक कि अब ब्रह्मचर्य में भी ढील नहीं है। किन्‍तु, असली बीमारी मेरे मन में बसी हुई है और वह परिवार को लेकर है। दुर्भाग्यवश, मेरे बड़े लड़के ने परिवार का ध्‍वंस कर दिया, रजिस्‍ट्री से बँटवारा कर लिया और अब बतलाता है कि उसके पास जीविका नहीं है। मैंने राय दी कि जो घर तुम्‍हें हिस्‍से में मिला है उसे किराये पर उठा दो और खुद किराये में रहो। मेरे पास जो भी सम्‍पत्ति थी, दोनों भाइयों के बीच बँट गयी। मेरे पास न घर है, न कारबार। पटने में किराये के मकान में रहता हूँ। सम्‍पत्ति के नाम पर एक मोटर कार है जो पटने में है।

राहुलजी की दुर्दशा उनकी पत्‍नी ने की। नवीनजी को मृत्‍यु के मुख में उनकी पत्‍नी ने ढकेला। बेनीपुरी की दुर्दशा उसके पुत्र ने की और मुझे भी दुर्दशा में मेरा बेटा ही डाले हुए है। जो कहीं भी मार नहीं खाता, वह सन्‍तान के हाथ मारा जाता है। तब भी मानता हूँ कि भगवान मेरे बेटे को कल्‍याण करें।

भागलपुर में हालत बहुत खराब थी। दिल्‍ली में ज्‍यादा आराम है। तब भी दिमाग के भीतर खंजर घूमता रहता है। बड़ी मुश्किल से उसे रोक पाता हूँ। मैं जीवन में चारों-ओर से घिर गया हूँ। मृत्‍यु और वैराग्‍य के सिवा तीसरा दरवाजा दिखायी नहीं देता है। दु:ख भूलने को ही वाइसचान्‍सेलरी की ओर गया था। दु:ख भूलने को ही दिल्‍ली आ गया हूँ। किन्‍तु, संसार-त्‍याग के बिना मुझे मानसिक शान्ति अब शायद नहीं मिलेगी।

आपके उपदेशों पर अमल करने की कोशिश करूँगा।

आपका

दिनकर

विश्वनाथ मुखर्जी को

पटना

२२ मार्च ७२

प्रिय मुखर्जी,

श्री रामेश्‍वरजी टाँटिया लेखकों में लेखक, राजनीतिज्ञों में राजनीतिज्ञ, धनियों में धनी, गरीबों में गरीब, ज्ञानियों में ज्ञानी और मूर्खों में मूर्ख हैं। ठलुआ-क्‍लब की निगाह उन पर सही पड़ी है। ठलुआ-क्‍लब द्वारा अभिनन्दित होने की उनकी योग्‍यता अपार है। एक बात और कह दूँ कि टाँटियाजी कंजूसों के बीच भी कंजूस हैं। पिछली बार जब मैं दिल्‍ली से बिदा ले रहा था टाँटियाजी ने गंगाबाबू से कहा - चलिये आज दिनकरजी को कहीं चाय पिलायी जाय। मैंने कहा, गेलार्ड से कम में काम नहीं चलेगा। टाँटियाजी की सिटृी-पिटृी गुम हो गयी और आखिर चाय पिलाने का कार्यक्रम उन्‍होंने रद्द कर दिया।

उनके शरीर की बनावट में हाथी और ऊँट का संघर्ष है। हाथी ने उन्‍हें पूरा ऊँट बनने से रोक लिया, तो ऊँट ने भी उन्‍हें हाथी बनने नहीं दिया। वैसे टाँटियाजी हाथी और ऊँट, दोनों बनना चाहते थे।

टाँटियाजी थर्ड-क्‍लास में यात्रा कर‍के इस आम राय का खण्‍डन करते हैं कि रेल का तीसरा-वर्ग नरक का वर्ग है। टाँटियाजी का ख्‍याल है कि थर्ड-क्‍लास करोड़पतियों का क्‍लास है। उसमें नींद ज्‍यादा आसानी से आती है। खादी-भण्‍डार में जो कपड़े सबसे खराब होते हैं उन्‍हें टाँटियाजी व्‍यवहार में लाते हैं और जूते भी वे, वही पसन्‍द करते हैं जिन्‍हें और लोग पसन्‍द नहीं करेंगे। सुना है, वे संन्‍यास लेनेवाले हैं, इसलिए नहीं कि संन्‍यास मुक्ति का मार्ग है, बल्कि इसलिए कि संन्‍यासी होने पर वे कम्‍बल पहन सकेंगे। टाँटियाजी को मृगछाला ही पसन्‍द है।

भगवान करें कि टाँटियाजी की मूर्खता और कंजूसी, दोनों की वृद्धि हो।

आपका

दिनकर

राजेश्‍वर सिंह को

५, सफदरजंग लेन, नई दिल्‍ली

२३.३.७१

प्रियवर,

बुढ़ापे की मुसीबत को जानते हो?

उस दर्द को पहचानते हो

जो बुढ़ापे के सीने में उठता है?

बुढ़ापे की मुसीबत बुढ़ापा नहीं,

जवानी है।

यह भी एक अबूझ कहानी है

कि शरीर बूढ़ा होने पर भी

मन नहीं मरता है।

जिन रंगीनियों में जवानी गुजरी है,

बुढ़ापा ऊँघता-ऊँघता भी

उन्‍हें याद करता है।

आपका

रामधारीसिंह दिनकर


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हिंदी समय में रामधारी सिंह दिनकर की रचनाएँ