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कहानी

हूक
चंद्रगुप्त विद्यालंकार


जब तक गाड़ी नहीं चली थी, बलराज जैसे नशे में था। यह शोरगुल से भरी दुनिया उसे एक निरर्थक तमाशे के समान जान पड़ती थी। प्रकृति उस दिन उग्र रूप धारण किए हुए थी। लाहौर का स्टेशन। रात के साढ़े नौ बजे। कराँची एक्सप्रेस जिस प्लेटफार्म पर खड़ा था, वहाँ हजारों मनुष्य जमा थे। ये सब लोग बलराज और उसके साथियों के प्रति, जो जान-बूझ कर जेल जा रहे थे, अपना हार्दिक सम्मान प्रकट करने आए थे। प्लेटफार्म पर छाई हुई टीन की छतों पर वर्षा की बौछारें पड़ रही थीं। धू-धू कर गीली और भारी हवा इतनी तेजी से चल रही थी कि मालूम होता था, वह इन सब संपूर्ण मानवीय निर्माणों को उलट-पुलट कर देगी; तोड़-मोड़ डालेगी। प्रकृति के इस महान उत्पात के साथ-साथ जोश में आए हुए उन हजारों छोटे-छोटे निर्बल-से देहधारियों का जोशीला कंठस्वर, जिन्हें 'मनुष्य' कहा जाता है।

बलराज राजनीतिक पुरुष नहीं है। मुल्क की बातों से या कांग्रेस से कोई सरोकार नहीं है। वह एक निठल्ला कलाकार है। माँ-बाप के पास काफी पैसा है। बलराज पर कोई बोझ नहीं। यूनिवर्सिटी से एम.ए. का इम्तहान इज्जत के साथ पास कर वह लाहौर में ही रहता है। लिखता-पढ़ता है, कविता करता है, तस्वीरें बनाता है और बेफिक्री से घूम-फिर लेता है। विद्यार्थियों में वह बहुत लोकप्रिय है। माँ-बाप मुफस्सिल में रहते हैं, और बलराज को उन्होंने सभी तरह की आजादी दे रखी है।

ऐसी निठल्ला बलराज कभी कांग्रेस-आंदोलन में सम्मिलित हो कर जेल आने की कोशिश करेगा, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। किसी को मालूम नहीं कि कब और क्यों उसने यह अनहोनी बात करने का निश्चय कर लिया। लोगों को इतना ही मालूम है कि बारह बजे के लगभग विदेशी कपड़े की किसी दुकान के सामने जा कर उसने दो-एक नारे लगाए, चिल्ला कर कहा कि विदेशी वस्त्र पहनना पाप है, और दो-एक भले मानसों से प्रार्थना की कि वे विलायती माल न खरीदें। नतीजा यह हुआ कि वह गिरफ्तार कर लिया गया। उसी वक्त उसका मामला अदालत में पेश हुआ और उसे छह महीने की सादी सजा सुना दी गई। बलराज के मित्रों को यह समाचार तब मालूम हुआ, जब एक बंद लारी में बैठ कर उसे मिण्टगुमरी जेल में भेजने के लिए स्टेशन की ओर रवाना कर दिया गया था।

लोग - विशेषकर कालेजों के विद्यार्थी - बलराज के जयजयकारों से आसमान गुँजा रहे थे, परंतु वह जैसे जागते हुए भी सो रहा था। चारों ओर का विक्षुब्ध वातावरण, आसमान से गाड़ी की छत पर अनंत वर्षा की बौछार और हजारों कंठों का कोलाहलल - बलराज के लिए जैसे यह सब निरर्थक था। उसकी आँखों में गहरी निराशा की छाया थी, उसके मुँह पर विषादभरी गहरी गंभीरता अंकित थी और उसके होंठ जैसे किसी ने सी दिए थे। उसके दोस्त उससे पूछते थे कि आखिर क्या सोच कर वह जेल जा रहा है। परंतु वह जैसे बहरा था, गूँगा था, न कुछ सुनता था, न कुछ बोलता था।

कांग्रेस के उन पंद्रह-बीस स्वयंसेवकों में से बलराज एक को भी नहीं जानता था, और न उसके कपड़े खद्दर के थे। परंतु उन सब वालंटियरों में एक भी व्यक्ति उसके समान पढ़ा-लिखा, प्रतिभाशाली और संपन्न घराने का नहीं था। इससे वे सब लोग बलराज को इज्जत की निगाह से देख रहे थे। गाड़ी चली तो उन सबसे मिल कर कोई गीत गाना शुरू किया और बलराज अपनी जगह से उठ कर दरवाजे के सामने आ खड़ा हुआ। डिब्बे की सभी खिड़कियाँ बंद थीं। बलराज ने दरवाजे पर की खिड़की खोल डाली। एक ही क्षण में वर्षा के थपेड़ों से उसका संपूर्ण मुँह भीग गया, बाल बिखर गए, मगर बलराज ने इसकी परवा नहीं की। खिड़की खोले वह उसी तरह खड़े रह कर बाहर के घने अंधकार की ओर देखने लगा, जैसे इस सघन अंधकार में बलराज के लिए कोई गहरी मतलब की बात छिपी हुई हो।

एक स्वयंसेवक ने बड़ी इज्जत के साथ बलराज से कहा, "आप बुरी तरह भीग रहे हैं। इच्छा हो तो आ कर लेट जाइए।"

बलराज ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। परंतु जिस निगाह से उसने उस स्वयंसेवक की ओर देखा, उससे फिर किसी को यह हिम्मत नहीं हुई कि वह उससे कोई और अनुरोध कर सके।

खिड़की में से सिर बाहर निकाल कर बलराज देख रहा है। उस घने अंधकार में, न जाने किस-किस दिशा से आ-आ कर वर्षा की तीखी-तीखी बूँदें उसके शरीर पर पड़ रही हैं। न जाने किधर सनसनाती हुई हवा उसके बालों को झटके दे-दे कर कभी इधर और कभी उधर हिला रही है।

इस घने अंधकार में, जैसे बिना किसी बाधा के, बलराज ने एक गहरी साँस ली। उसकी इस बाधा-विहीन ठंडी साँस ने जैसे उसकी आँखों के द्वार भी खोल दिए। बलराज की आँखों में आँसू भर आए और प्रकृतिमाता के आँचल का पानी मानो तत्परता के साथ उसके आँसुओं को धोने लगा।

इसके बाद बलराज को कुछ जान नहीं पड़ा कि किसने, कब और किस तरह धीरे से उसे एक सीट पर लिटा दिया। किसी तरह की बाधा दिए बिना वह लेट गया, और उसी क्षण उसने आँख मूँद ली।

2

चार साल पहले की बात।

पहाड़ पर आए बलराज को अधिक दिन नहीं हुए। वह अकेला ही यहाँ चला आया था। अपने होटल का भोजन कर, रात की पोशाक पहन, वह अभी लेटा ही था कि उसे दरवाजे पर थपथपाहट की आवाज सुनाई दी। बलराज चौंक कर उठा और उसने दरवाजा खोल दिया। उसका खयाल था कि शायद होटल का मैनेजर किसी जरूरी काम से आया होगा, अथवा कोई डाक-वाक होगी। मगर नहीं, दरवाजे पर एक महिला खड़ी थी - बलराज की रिश्ते की बहन। वह यहाँ मौजूद है, यह तो बलराज को मालूम था, परंतु उसे बलराज का पता कैसे ज्ञात हो गया, इस संबंध में वह अभी कुछ भी सोच नहीं पाया था कि उसकी निगाह एक और लड़की पर पड़ी, जो उसकी बहिन के साथ थी। बलराज खुली तबीयत का युवक नहीं है, फिर भी उस लड़की के चेहरे पर उसे एक ऐसी पवित्र मुस्कान-सी दिखाई दी, जो मानो पारदर्शक थी। इस मुस्कराहट की ओट में जो हृदय था, उसकी झलक साफ-साफ देखी जा सकती थी। बलराज ने अनुभव किया, जैसे इस लड़की को देख कर चित्त आह्लाद से भर गया है।

उसी वक्त आग्रह के साथ वह उन दोनों को अंदर ले गया। कुशलक्षेम की प्रारंभिक बातों के बाद बलराज की बहिन ने उसे लड़की का परिचय दिया, "यह कुमारी उषा है। अभी कालेज के द्वितीय वर्ष में पढ़ रही है।"

बलराज की बहिन करीब एक घंटे तक वहाँ रही। सभी तरह की बातें उसने बलराज से कीं, परंतु उषा ने इस संपूर्ण बातचीत में जरा भी हिस्सा नहीं लिया। अपनी आँखें नीची कर अपने मुँह को कोहनी पर टेक कर वह लगातार मुस्कराती रही, बेबात में हँसती रही और मानो फूल बिखेरती रही।

तीसरे दर्जे की लकड़ी की सीट पर लेटे-लेटे बलराज अर्धचेतना में देख रहा है, चार साल पहले के एक स्वच्छ दिन की दोपहरिया। होटल में सन्नाटा है। कमरे में तीन जन हैं। बलराज है। उसकी बहिन है, और सेकेंड ईयर में पढ़नेवाली सत्रह बरस की उषा है। बलराज अपने पलंग पर एक चादर ओढ़े बैठा है, उसकी बहिन बातें कर रही है, उषा मुस्करा रही है। सिर्फ मुस्करा रही है, परंतु लगातार मुस्कराए जा रही है।

कुछ ही दिन बाद की बात है। उषा की माँ ने बलराज और उसकी बहिन को अपने यहाँ चाय के लिए निमंत्रित किया। बलराज ने तब उषा को अधिक नजदीक से देखा। उसकी बहिन उसे उषा के कमरे में ले गई। तीसरी मंजिल के बीचो-बीच साफ-सुथरा छोटा-सा एक कमरा था, एक तरफ सितार, वायलिन आदि कुछ वाद्य यंत्र रखे हुए थे। दूसरी ओर एक तिपाई पर कुछ किताबें अस्त-व्यस्त दशा में पड़ी थीं। इस तिपाई के पास एक कुर्सी रखी थी। बलराज को इस कुर्सी पर बैठा कर उसकी बहिन और उषा पलंग पर बैठ गईं।

चाय में अभी देर थी और उषा की अम्मा रसोईघर में थी। इधर बलराज की बहिन ने पढ़ाई-लिखाई के संबंध में उषा से अनेक तरह के सवाल करने शुरू किए, उधर बलराज की निगाह तिपाई पर पड़ी हुई एक कापी पर गई। कापी खुली पड़ी थी। गणित के गलत या सही सवाल इन पन्नों पर हल किए गए थे। इन सवालों के आस-पास जो खाली जगह थी, उस पर स्याही से बनाए गए अनेक चेहरे बलराज को नजर आए - कहीं सिर्फ आँख थी, कहीं नाक और कहीं मुँह। जैसे आकृति-चित्रण का अभ्यास किया जा रहा है। बलराज ने यह सब एक उड़ती नजर से देखा, और यह देख कर उसे सचमुच आश्चर्य हुआ कि सत्रह बरस की उषा आकृति-चित्रण में इतनी कुशल है।

हिम्मत कर बलराज ने कापी का पृष्ठ पलट दिया। दूसरे ही पृष्ठ पर एक ऐसा पोपला चेहरा अंकित था, जिसके सारे दाँत गायब थे। चित्र सचमुच बहुत अच्छा बना था। उसके नीचे सुडौल अक्षरों में लिखा था - 'गणितज्ञ'। बलराज के चेहरे पर सहसा मुस्कराहट घूम गई। इसी समय उषा की भी निगाह बलराज पर पड़ी। उसी क्षण वह सभी कुछ समझ गई। बातचीत की ओर से उसका ध्यान हट गया और लज्जा से उसका मुँह नीचे की ओर झुक गया।

तभी बलराज की बहिन ने अपने भाई से कहा, "उषा को लिखने का शोक भी है। तुमने भी उसकी कोई चीज पढ़ी है?"

बलराज ने उत्सुकतापूर्वक कहा, "कहाँ? जरा मुझे भी तो दिखाइए।"

उषा अभी तक इस बात का कोई जवाब दे नहीं पाई थी कि बलराज ने किताबों के ढेर में से एक कापी और खींच निकाली। यह कापी अँगरेजी अनुवाद की थी। इस अनुवाद में भी खाली जगह का प्रयोग हाथ, नाक, कान, मुँह आदि बनाने में किया गया था। बलराज पृष्ठ पलटता गया। एक जगह उसने देखा कि 'मेरा घर' शीर्षक एक सुंदर गद्य-कविता उषा ने लिखी है। बलराज ने उसे एक ही निगाह में पढ़ लिया। पढ़ कर उसने संतोष की एक साँस ली। प्रशंसा के दो-एक वाक्य कहे और इस संबंध में अनेक प्रश्न उषा से कर डाले।

पंद्रह-बीस मिनट इसी प्रकार निकल गए। उसके बाद किसी काम से उषा को नीचे चले जाना पड़ा। बलराज ने तब एक और छोटी-सी नोटबुक उस ढेर से खोज निकाली। इस नोटबुक के पहले पृष्ठ पर लिखा था - 'निजी और व्यक्तिगत।' मगर बलराज इस कापी को देख डालने के लोभ का संवरण न कर सका। कापी के सफे उसने पलटे। देखा; एक जगह बिना किसी शीर्षक के लिखा था -

"ओ! मेरे देवता!

"तुम कौन हो, कैसे हो, कहाँ हो - मैं यह सब कुछ भी नहीं जानती, मगर फिर भी मेरा दिल कहता है कि सिर्फ तुम्हीं मेरे हो, और मेरा कोई भी नहीं।

"रात बढ़ गई है। मैंने अपनी खिड़की खोल डाली है। चारों ओर गहरा सन्नाटा है। सामने की ऊँची पहाड़ी की बर्फीली चोटियाँ चाँदनी में चमक रही हैं। घर के सब लोग सो गए हैं। सारा नगर सो गया है, मगर मैं जाग रही हूँ अकेली मैं। पढ़ना चाहती थी, मगर और नहीं पढ़ूँगी। पढ़ नहीं सकूँगी। सो भी नहीं। क्यों? क्योंकि उन बर्फीली चोटियों पर से तुम मुझे पुकार रहे हो। मैंने तो तुम्हारी पुकार सुन ली है, परंतु मन-ही-मन तुम्हारी उस पुकार का मैं जो जवाब दूँगी, उसे क्या तुम भी सुन सकोगे, ओ मेरे देवता?"

वह पृष्ठ समाप्त हो गया। बलराज अगला पृष्ठ पलट ही रहा था कि उषा कमरे में आ पहुँची। बलराज के हाथों में वह कापी देख कर वह तड़प-सी उठी, सहसा बलराज के बहुत निकट आ कर और अपना हाथ बढ़ा कर उसने कहा, "माफ कीजिए। यह कापी मैं किसी को नहीं दिखाती। यह मुझे दे दीजिए।"

बलराज पर मानो घड़ों पानी पड़ गया, और स्तब्ध-सी दशा में उसने वह कापी उषा के हाथों में दे दी।

अपनी उद्विग्नता पर मानो उषा अब लज्जित-सी हो उठी। उसने वह कापी बलराज की ओर बढ़ा कर जरा नरमी से कहा, "अच्छा, आप देख लीजिए, पढ़ लीजिए। मैं आपको नहीं रोकूँगी।" अब यह कह नोटबुक उसने बलराज के सामने रख दी। मगर बलराज अब उस कापी को हाथ लगाने की भी हिम्मत नहीं कर सका।

उसके बाद बलराज ही के अनुरोध पर उषा ने गा कर भी सुना दिया। अनेक चुटकुले सुनाए। वह जी खोल कर हँसती भी रही, मगर सत्रह बरस की इस छोटी-सी बालिका के प्रति ऊपर की घटना से, बलराज के हृदय में सम्मान-पूर्ण दशहत का जो भाव पैदा हो गया था, वह हटाए न हट सका।

3

वर्षा की बौछार के कुछ छींटे सोए हुए बलराज के नंगे पैरों पर पड़े। शायद उसे कुछ सर्दी-सी प्रतीत हुई। वह देखने लगा - सबसे ऊँची मंजिल पर ठीक बीचोबीच एक कमरा है। कमरे के मध्य में एक खिड़की है। इस खिड़की में से बलराज सामने की ओर देख रहा है। चाँदनी रात है। मकान में सड़क पर, नगर में सभी जगह सन्नाटा है। सामने की पहाड़ी की बर्फीली चोटी चाँदनी में चमक रही है। रह-रह कर ठंडी हवा के झोंके खिड़की की राह से कमरे से आते हैं और बलराज के शरीर भर में एक सिहरन-सी उत्पन्न कर जाते हैं। सहसा दूर पर वीणा की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ने लगी। बलराज ने देखा, चमकती हुई बर्फीली चोटी पर एक अस्पष्ट-सा चेहरा दिखाई देने लगा। यह चेहरा तो उसका देखा-भाला हुआ है। बलराज ने पहचाना - ओह, यह तो उषा है। आज की नहीं, आज से चार साल पहले की। वीणा की ध्वनि क्रमश: और भी अधिक करुण हो उठी। वह मानो पुकार-पुकार कर कहने लगी - 'ओ मेरे देवता! ओ मेरे देवता!'

4

दूसरे ही दिन बलराज की बहिन ने उसे सिनेमा देखने के लिए निमंत्रित किया। उषा भी साथ ही थी। भयानक रस का चित्र था। बोरिस कारलोफ का फ्रैंकंस्टाइन। बलराज मध्य में बैठा। उसकी बहिन एक ओर, और उषा दूसरी ओर। खेल शुरू होने में अभी कुछ देर थी। बातचीत में बलराज को ज्ञात हुआ कि उषा ने अभी तक अधिक फिल्म नहीं देखे हैं और न उसे सिनेमा देखने का कोई विशेष चाव ही है।

खेल शुरू हुआ। सचमुच डरानेवाला। श्मशान से मुर्दा खोल कर लाया जाना, प्रयोगशाला में सूखे हुए शव की मौजूदगी, अकस्मात मुर्दे का जी उठना यह सभी कुछ डरानेवाला था। बालिका उषा का किशोर हृदय धक्-धक् करने लगा और क्रमश: वह अधिकाधिक बलराज के निकट होती चली गई।

आखिरकार एक जगह वह भय से सिहर-सी उठी और बहुत अधिक विचलित हो कर उसने बलराज का हाथ पकड़ लिया। फ्रैंकंस्टाइन ने बड़ी निर्दयता से एक अबोध बालिका का खून कर दिया था। उषा के काँपते हुए हाथ के स्पर्श से बलराज को ऐसा अनुभव हुआ, जैसे उसके शरीर भर में प्राणदायिनी बिजली-सी घूम गई हो। उसने बालिका के हाथ को बड़ी नरमी के साथ थोड़ा-सा दबाया। उषा ने उसी क्षण अपना हाथ वापस खींच लिया।

खेल समाप्त हुआ। बलराज ने जैसे इस खेल में बहुत कुछ पा लिया हो, परंतु प्रकाश में आ कर जब उसने उषा का मुँह देखा, तो उसे साफ दिखाई दिया कि बालिका के चेहरे पर हल्की-सी सफेदी आ जाने के अतिरिक्त और कोई भी अंतर नहीं आया। उसकी आँख उतनी ही पवित्र और अबोध थी, जितना खेल शुरू होने से पहले। उत्सुकता को छोड़ कर और किसी का भाव उसके चेहरे पर लेश मात्र भी चिह्न नहीं था। बलराज ने यह देखा और देख कर जैसे वह कुछ लज्जित-सा हो गया।

* * *

गाड़ी एक स्टेशन पर आ कर खड़ी हो गई। बलराज कुछ उनींदा-सा हो गया। उसकी आँखें जरा-जरा खुली हुई थीं। सामने की सीट पर एक दढ़ियल सिपाही अजीब ढंग से मुँह बना कर उबासियाँ ले रहा था। बलराज को ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे फ्रैंकंस्टाइन का भूत सामने से चला आ रहा है। लैंप के निकट से एक छोटी-सी तितली उड़ी और बलराज के हाथ को छूती हुई नीचे गिर पड़ी। बलराज को अनुभव हुआ, मानो उषा ने उसका हाथ पकड़ा है। बहुत दूर से इंजन की सीटी सुनाई दी। बलराज को ऐसा जान पड़ा, जैसे उषा चीख उठी हो। उसके शरीर भर में एक कंपन-सा दौड़ गया। मुमकिन था कि बलराज की नींद उचट जाती, परंतु इसी समय गाड़ी चलने लगी और उसके हल्के-हल्के झूलों ने उसके उनींदेपन को दूर कर दिया।

5

शर्मीली तबीयत का होते हुए भी बलराज काफी सामाजिक है। अपरिचित या अल्प परिचित लोगों से मिलना-जुलना और उन पर अच्छा प्रभाव डाल सकना उसे आता है, परंतु न जाने क्या कारण है कि उषा के सामने आ कर वही बलराज कुछ भीगी बिल्ली-सा बन जाता है। उषा अब लाहौर के ही एक कालेज में एम.ए. में पढ़ रही है। अब वह सुसंस्कृत, सभ्य और सामाजिक नवयुवती बन गई है। बलराज अब किसी कालेज में नहीं पढ़ता, फिर भी स्थानीय कालेजों के विद्यार्थियों में अत्यधिक लोकप्रिय है और विद्यार्थियों का नेता है, सभा-सोसाइटियों में खूब हिस्सा लेता है, बहुत अच्छा भाषण दे सकता है। वह कवि है, लेखक है, चित्रकार है और उषा भी जानती है कि वह भी कुछ है। इसी कारण वह बलराज को विशेष इज्जत की निगाह से देखती है। परंतु बलराज जब उषा के सामने पहुँचता है, तब वह बड़ी निराशा के साथ अनुभव करता है कि उसकी वह संपूर्ण प्रतिभा, ख्याति और वाग्शक्ति न जाने कहाँ जा कर छिप गई है।

सूरज डूब चुका था और बलराज लारेंस बाग की सैर कर रहा था। अँधेरा बढ़ने लगा और सड़कों की बत्तियाँ एक साथ जगमगा उठीं। बाग में एक कृत्रिम पहाड़ी है। इस पहाड़ी के पीछे की सड़क पर अधिक आवागमन नहीं रहता। बलराज आज कुछ उदास और दु:खी-सा था। वह धीरे-धीरे इसी सड़क पर बढ़ा चला जा रहा था।

इसी समय उसके नजदीक से एक ताँगा गुजरा। बलराज ने उड़ती निगाह से देखा, ताँगे पर दो युवतियाँ सवार हैं। अगले ही क्षण एक लड़की ने प्रणाम किया। बलराज के शरीर भर में आह्लाद की लहर-सी घूम गई। ओह, यह तो उषा है। बलराज ने उषा के प्रणाम का कुछ इस तरह जवाब दिया, जिसने समझ लिया कि जैसे वह उसे ठहरने का इशारा कर रहा है। ताँगा कुछ दूर निकल गया था, उषा ने ताँगा ठहरवा लिया और स्वयं उतर कर बलराज के निकट चली आई। आते ही बड़े सहज भाव से उसने पूछा, "कहिए, क्या बात है?"

बलराज को कुछ भी नहीं सूझा। उसने ताँगा ठहरने का इशारा बिलकुल नहीं किया था, परंतु यह बात वह इस वक्त किस तरह कह सकता था! नतीजा यह हुआ कि बलराज उषा के चेहरे की ओर ताकता ही रह गया।

उषा कुछ हतप्रभ-सी हो गई। फिर भी, बात चलाने की गरज से उसने कहा, "आपकी 'सराय पर' शीर्षक कविता मैंने कल पढ़ी थी। आपने कमाल कर दिया है।"

बलराज ने यों ही पूछ लिया, "आपको वह पसंद आई?"

"खूब।"

इसके बाद बलराज फिर चुप हो गया। जिस तरह तंग गले की बोतल ऊपर तक भर दी जाने के बाद, अपनी आंतरिक प्रचुरता के कारण ही, उलटा देने पर भी खाली नहीं हो पाती, उसी तरह बलराज के हार्दिक भावों की घनता ही उसे मूक बनाए हुए थी।

उषा प्रणाम करके लौटने ही लगी कि बहुत धीरे से बलराज ने पुकारा - "उषा!"

उषा घूम कर खड़ी हो गई। मुँह से उसने कुछ भी नहीं कहा, परंतु उसकी आँखों में एक बड़ा-सा प्रश्नवाचक चिह्न साफ तौर से पढ़ा जा सकता था।

बलराज ने बड़ी शिथिल आवाज में कहा, "आपको देख कर न जाने मुझे क्या हो जाता है!"

उषा यह सुनने के लिए तैयार नहीं थी। फिर भी वह चुपचाप खड़ी रही। क्षण भर रुक कर बलराज ने कहा, "आप सोचती होंगी, यह अजब बेहूदा आदमी है। न हँसना जानता है, न बोलना जानता है, मगर सच मानिए..."

बीच ही में बाधा दे कर उषा ने कहा, "मैं आपके बारे में कभी कुछ नहीं सोचती। मगर आपको यह होता क्या जा रहा है?"

बलराज के चेहरे पर हवाइयाँ-सी उड़ने लगीं। उसे उषा के स्वर में कुछ कठोरता-सी प्रतीत हुई। तो भी बड़े साहस के साथ उसने कहा, "मैं अपने आन्तरिक भाव व्यक्त नहीं कर सकता।"

उषा ने चाहा कि वह इस गंभीरतम बात को हँस कर उड़ा दे, मगर कोशिश करने पर भी वह हँस नहीं सकी। कुछ भयभीत-सी हो गई। उसने कहा, "मैं जाती हूँ।"

और घूम कर चल दी।

बलराज एक कदम आगे बढ़ा। उसके जी में आया कि वह आगे बढ़ कर उषा का हाथ पकड़ ले, परंतु वह ऐसा कर नहीं सका।

एक कदम आगे बढ़ कर वह पीछे की ओर घूम गया। उसी वक्त ताँगे पर से एक नारी-कंठ सुनाई दिया, "उषा! उषा!"

6

अभी परसों की ही बात है।

गर्मियों की इन छुट्टियों में लाहौर से विद्यार्थियों की दो टोलियाँ सैर के लिए चलनेवाली थीं - एक सीमा-प्रांत की ओर और दूसरी कुल्लू से शिमला के लिए। इस दूसरी टोली का संगठन बलराज ने किया था और वही इस टोली का मुखिया भी था।

उषा के दिल में अभी तक बलराज के लिए आदर और सहानुभूति के भाव थे। बलराज के मानसिक अस्वास्थ्य को देख कर उसे सचमुच दु:ख होता था। वह अपने स्वाभाविक सहज व्यवहार द्वारा बलराज के इस मानसिक अस्वास्थ्य की चिकित्सा कर डालना चाहती थी। और संभवत: यही कारण था कि वह उसके साथ, अन्य दो-तीन लड़कियों समेत, कुल्लू यात्रा पर जाने को भी तैयार हो गई थी।

परंतु अभी परसों की ही बात है। शाम के समय बलराज ने अपनी पार्टी के सभी सदस्यों को चाय पर निमंत्रित किया। घंटे दो घंटे के लिए बलराज के यहाँ अच्छी चहल-पहल रही। हँसी-मजाक हुआ, गाना-बजाना हुआ और पर्वत-यात्रा के विस्तृत प्रोग्राम पर भी विचार होता रहा।

चाय के बाद, जब सभी लोग चले गए, बलराज उषा को उसके निवास-स्थान तक पहुँचाने के लिए साथ चल दिया। उषा ने इस बात पर कोई आपत्ति नहीं की।

माल रोड पर पहुँच कर बलराज ने प्रस्ताव किया कि ताँगा छोड़ दिया जाय और पैदल ही लारेंस बाग का चक्कर लगा कर घर जाया जाय। उषा ने यह प्रस्ताव भी बिना किसी बाधा के स्वीकार कर लिया।

दोनों जने ताँगे से उतर कर पैदल चलने लगे। उषा ने अनेक बार यह प्रयत्न किया कि कोई बात शुरू की जाय। बलराज भी आज अपेक्षाकृत कम उद्विग्न प्रतीत हो रहा था। फिर भी कोई भी बात मानो चली नहीं, पनप ही नहीं पाई।

क्रमश: वे दोनों नकली पहाड़ी के पीछे की सड़क पर जा पहुँचे। इस समय तक साँझ डूब चुकी थी, और सड़कों पर की बत्तियाँ जगमगाने लगी थीं।

इस निस्तब्धता में दोनों जने चुपचाप चले जा रहे थे कि मौलश्री के एक घने पेड़ के नीचे पहुँच कर बलराज सहसा रुक गया।

उषा ने भी खड़े हो कर पूछा, "आप रुक क्यों गए?"

बलराज ने कहा, "उस दिन की बात याद है?"

उसका स्वर भारी हो कर लड़खड़ाने लगा था। उषा कुछ घबरा-सी गई। बात टाल देने की गरज से उसने कहा, "चलिए वापस लौट चला जाय। देर हो गई है।"

मगर बलराज अपनी जगह से नहीं हिला। मालूम होता था कि उसके दिल में कोई चीज इतनी जोर से समा गई कि वह उसका दम घोंटने लगी है। बलराज के चेहरे पर पसीने की बूँदें चमकने लगीं। काँपते हुए स्वर में उसने कहा, "उषा! अगर तुम जानतीं कि मैं दिन-रात क्या सोचता रहता हूँ।"

उषा अब भी चुप थी। उसके हृदय में विद्रोह की आग भभक उठी, मगर फिर भी वह चुपचाप खड़ी सहन करती रही।

बलराज ने फिर से कहा, "उषा! तुम मुझ पर तरस खाओ। मुझ पर नाराज मत होओ।"

उषा ने कठोर और दृढ़ स्वर में कहा, "नहीं मालूम आपको क्या हो गया है। अगर आपने एक भी बात इस तरह की और कही, तो मैं आपसे कभी नहीं बोलूँगी।"

बलराज यह सुन कर भी सम्हल नहीं सका। उसकी आँखों में आँसू भर आए और अनुनय के साथ उसने उषा का हाथ पकड़ लिया।

उषा ने तड़प कर अपना हाथ छुड़ा लिया और शीघ्रता से एक तरफ को बढ़ चली। चलते हुए, बहुत ही निश्चयपूर्ण स्वर में वह कहती गई, "मैं आपके साथ कुल्लू नहीं जाऊँगी।"

कुछ ही दूरी पर उषा को एक खाली ताँगा मिला। उस पर सवार हो कर वह अपने घर की ओर चली गई।

अगले दिन सुबह बलराज ने अपनी पार्टी के सभी सदस्यों के नाम इस बात की सूचना भेज दी कि वह कुल्लू नहीं जा सकेगा। किसी को मालूम भी नहीं हो पाया कि माजरा क्या है और संपूर्ण पार्टी बर्खास्त हो गई।

सीमा प्रांत की ओर जानेवाली पार्टी सुबह की गाड़ी से ही पेशावर के लिए रवाना हुई है। अब से सिर्फ चौदह घंटे पहले। इस पार्टी को विदा देने के लिए बलराज भी स्टेशन पर पहुँचा था। उषा भी इस पार्टी के साथ गई है। अपने माँ-बाप से यात्रा पर जाने की अनुमति प्राप्त कर कहीं भी न जाना उसे उचित प्रतीत नहीं हुआ। आज सुबह लाहौर स्टेशन पर ही बलराज ने इस पार्टी को कई तरह की नसीहतें दी थीं। किसी को उसके आचरण में जरा भी असाधारणता प्रतीत नहीं हुई थी। परंतु गाड़ी चलने से पहले ही, चुपचाप सब से पृथक हो कर वह तीसरे दर्जे के मुसाफिरों की भीड़ में जा मिला था।

बलराज स्टेशन से बाहर आया, तो दुनिया जैसे उसके लिए अंधकारपूर्ण हो गई थी। आसमान में सूरज बिना किसी बाधा के चमक रहा था। सड़कों पर लोग सदा की तरह आ-जा रहे थे। दुनिया के सभी कारोबार उसी तरह जारी थे, परंतु बलराज के लिए जैसे सभी ओर सूनापन व्याप्त हो गया था। कहीं कुछ भी आकर्षण बाकी न रहा था। सभी कुछ नीरस, फीका, बिलकुल फीका हो गया था।

सड़क के किनारे फुटपाथ पर बलराज धीरे-धीरे बिलकुल निरुद्देश्य भाव से चला जा रहा था। हजारों, लाखों मनुष्यों से भरी यह नगरी बलराज के लिए जैसे बिलकुल निर्जन और सुनसान बन गई है। रह-रह कर जो इतने लोग उसके निकट से निकल जाते हैं, उसकी निगाह में जैसे बिलकुल व्यर्थ और निर्जीव हैं, चलती-फिरती पुतलियों से बढ़ कर और कुछ भी नहीं।

एक खाली ताँगा बड़ी धीमी रफ्तार से चला आ रहा था। उसका कोचवान बड़ी मस्त और करुण-सी आवाज में गाता चला आता था -

"दो पतर अनाराँ दे।

फट मिल जाँदे, बोल न जाँदे माराँ दे!

दो पतर अनाराँ दे,

सड़ गई जिंदड़ी, लय गए ढेर अँगाराँ दे।"

("अनार के दो पत्ते? शारीरिक घाव भर जाते हैं, पर मित्र पर मित्र के ताने का घाव कभी नही भरता। अनार के दो पत्ते! मेरा जीवन जल गया है और अंगारों के ढेर लग गए हैं!")

बलराज ने यह सुना और उसके दिल में एक गहरी हूक-सी उठ खड़ी हुई। निष्प्रयोजन वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता चला गया, और अंत में अनायास ही उसने अपने को विदेशी कपड़ों की एक दुकान के सामने पाया, जहाँ काँग्रेस के कुछ स्वयंसेवक पिकेटिंग कर रहे थे।

गाड़ी उड़ी चली जा रही है, और बलराज सपना देख रहा है। दुनिया के किसी एक कोने में मौलश्री का एक बहुत बड़ा पेड़ है। अकेला, बिलकुल अकेला। चारों ओर सघन अंधकार है। सिर्फ इसी वृक्ष के ऊपर नीचे, आसपास उजाला है। चारों तरफ क्या है, कुछ है भी या नहीं - कुछ नहीं मालूम। ठंडी, सनसनाती हुई हवा चल रही है। पेड़ के पत्ते ऊँची आवाज में इस तरह साँय-साँय कर रहे हैं, जैसे रेलगाड़ी भागी जा रही हो। इस पेड़ के नीचे सिर्फ दो ही व्यक्ति हैं - उषा और बलराज। उषा बलराज से बहुत दूर हट कर बैठना चाहती है, परंतु बलराज उसका पीछा करता है। वह जिधर जाती है, धीरे-धीरे उसी की ओर बढ़ने लगता है। उषा कहती है, "मेरे निकट मत आओ!" परंतु बलराज नहीं सुनता। वह बढ़ता चला जाता है, और अंत में लपक कर उषा को पकड़ लेता है। उषा उससे बहुत नाराज हो गई। वह कहती है, मैं तुम्हें अकेला छोड़ जाऊँगी। सदा के लिए, अनंत काल के लिए। फिर कभी तुम्हारे पास न आऊँगी। बलराज उससे माफी माँगता है, गिड़गिड़ाता है, परंतु वह नहीं सुनती। चल देती है एक तरफ को। गहरे अंधकार में विलीन होती जा रही है।

गाड़ी की रफ्तार बहुत धीमी हो गई है। उनींदी-सी दशा में बलराज बड़े ही कातर स्वर से धीरे से पुकार उठा - "उषा! उषा! तुम लौट आओ, उषा!"

इसी वक्त एक सिपाही ने चिल्ला कर कहा, "उठो। मिण्टगुमरी का स्टेशन आ गया!"

बलराज चौंक कर उठ बैठा। उसने देखा, रात के दो बजे हैं और उसके हाथों में हथकड़ियाँ पड़ी हुई हैं।

"इन्क्लाब जिंदाबाद!" और 'महात्मा गांधी की जय!' के नारों से मिण्टगुमरी के रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म रात के गहरे सन्नाटे में भी सहसा गूँज उठा।


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हिंदी समय में चंद्रगुप्त विद्यालंकार की रचनाएँ