डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कहानी

कंजकें
रोहिणी अग्रवाल


रात भर अधनींद में डूबी पम्मी कब से भोर के उजास का इंतजार कर रही है। उल्लास और उत्तेजना के मारे। कितनी लंबी बाट जोहने के बाद तो आता है आज का दिन। साल में कुल जमा दो बार। सभी सिर आँखों पर बैठा लेते हैं। घर के भी। बाहर के भी। देवी। कंजक देवी। दुर्गा माँ की कन्या देवी। वह इतराई-इतराई-सी डोलती रहती है। इधर-उधर। कितने बुलावे। कितनी मनुहार। रोज-रोज क्यों नहीं आता यह त्योहार।

माँ भोर सवेरे उठ गईं हैं। ढेरों काम जो निबटाने हैं उन्हें। हलवा-पूरी-छोले-रायता। देखना, अभी थोड़ी देर में रसोई भीनी-भीनी खुशबू से महकने लगेगी। पर मजाल है कोई कदम भी धर दे भीतर। बिना नहाए-धोए। उहूँ, नहा-धो लो, फिर भी नहीं। लेकिन वो निक्कू है न। मरभुक्खा। पेटू। बाज थोड़ेई न आएगा अपनी हरकतों से। आँख बचा कर हलवे में ठोंगा मारने की कोशिश न करे तो चैन कैसे पड़े। बंदर है पूरा। माँ भी कम नहीं। गिद्ध-सी तेज नजर। बेचारा पकड़ा ही जाता है हर बार। अब तो सख्त कानून बना दिया है माँ ने। पहले पूजा। फिर कंजक देवियाँ। तब कहीं जा कर आएगा नंबर घर के जनों का। लड़कों का।

'कितने ठाठ हैं लड़कियों के। हर त्योहार में उन्हीं की पूछ।' निक्कू आह भर कर रह जाता है - 'हमें तो कोई घास भी नहीं डालता।'

'अरे, आज इतनी सवेरे उठ गई?' माँ नहाने की तैयारी में व्यस्त थीं। उसे देखा तो स्नेह से मुस्करा दीं। 'सो जा अभी थोड़ी देर। कम से कम दो घंटे लगेंगे तैयारी में।'

पम्मी जानती है।

'ठीक आठ बजे आ जाना।' शुक्ला आंटी ने उसे पुकार कर कहा था। माँ ने नुक्कड़वाले प्रोविजनल स्टोर से आधा किलो काले चने लाने भेजा था। निक्कू भी उसके साथ था।

'मगर आठ बजे तो शर्मा आंटी ने बुलाया है।' उसे असुविधा हुई। एक ही समय दो न्योते।

'कोई बात नहीं बेटे। शर्मा आंटी के बाद हमारे यहाँ।'

'मैं भी आऊँ न आंटी?' निक्कू आगे बढ़ आया। शायद शुक्ला आंटी ने अँधेरे में उसे देखा न हो।

'तुम?' वे थोड़ी असहज हो आईं। 'अच्छा। तुम भी आ जाना।'

'बुद्धू! लड़के कंजक नहीं होते। तुम नहीं आ सकते। है न आंटी?' पम्मी खासी नाखुश थी आंटी के इस अविवेकपूर्ण न्योते से। निक्कू भी चला गया तो उसकी क्या अहमियत रह जाएगी।

'कोई बात नहीं।' आंटी स्नेह से भर गईं। 'सात कंजकों के बीच एक लंगूर सही।'

'अरे हाँ, वृंदा कहाँ है? उसे तो मैंने देखा ही नहीं।' वे चिंतित-सी हो गईं। सात लड़कियाँ। नई-नई आईं थीं न इस मुहल्ले में। सात लड़कियों का जुगाड़ कर पाना मुश्किल लग रहा होगा।

'वृंदा। वो उसके मामू आए हैं न आज। उन्हीं के साथ होगी।'

'ओह!'

'मैं बुला लाऊँ उसे?' पम्मी एक पाँव मोड़ कर वृंदा के घर की तरफ रुख कर बैठी।

शुक्ला आंटी हँस दीं। इतनी उतावली! 'कोई जल्दी नहीं। कल सुबह बुला लाना अपने साथ।'

'रीनी और किटी को भी बुला लाऊँ? मेरी पक्की सहेलियाँ हैं।'

'हाँ हाँ।' वे खिल गईं। सात-नौ-ग्यारह - जितनी कंजकें, उतनी बरकत। क्यों मना करें?

शुक्ला आंटी को जल्दी हो न हो, पम्मी को तो है। वह काले चने लेना भूल गई। सीधी वृंदा के घर। वहाँ से रीनी के। फिर किटी। 'ठीक आठ बजे। याद रहेगा न?' उसने हिदायत दी। किटी ने सिर हिला कर स्वीकृति नहीं दी। वह उँगलियों पर कुछ गिन रही थी। 'बारहवीं आंटी।'

पम्मी बुद्धुओं की तरह उसे ताकने लगी। 'बारहवीं आंटी क्या?'

'शुक्ला आंटी को मिला कर बारह आंटियों ने बुलाया है मुझे।' वह गर्व से इठला गई। हैं किसी के पास इतने न्योते!

पम्मी पिछड़ जाने के बोध से अंदर ही अंदर कट गई। अच्छा जी, हम ही ने न्योता दिलाया और हम्हीं पर धौंस! लेकिन किटी उसकी प्यारी सहेली है। वह उससे जलेगी नहीं। बस, चालाकी से उगलवा लिए बारह आंटियों के बारह न्योते। धत्त तेरे की। ये सब तो उसके पास भी हैं।

'निक्कू, तुझे भी किसी ने बुलाया?' किटी हँस कर निक्कू को खिझाने लगी।

बेचारा निक्कू! एक भी न्योता नहीं।

'तू अगले जन्म लड़की बन जाना। हँ?' किटी ने सुझाया।

वह अपमान से काला पड़ गया। धकेलने लगा पम्मी को - 'चल।'

'ठहर न!' पम्मी को बहुत-सी बातें करनी हैं। कल की प्लानिंग। अंतरंग सहेलियों के साथ।

'रीनी को भी बुला लेते हैं।' किटी ने सुझाव दिया - 'और मीनू को भी।'

मीनू उन सबसे दो साल बड़ी है। उनकी लीडर। गुड्डियों के ब्याह की तारीखें और जोड़े अक्सर वही तय करती है। अच्छा है, कल इतवार है। स्कूल की छुट्टी। न्योते निबटा लें किसी तरह। फिर उस के बाद मजे से गुड्डे-गुड्डी का ब्याह रचा सकतीं हैं।

'न्योते हैं, तभी तो ब्याह रचा पाएँगे।' वे दोनों हँस पड़ीं। पैसे। ब्याह के लिए जरूरी पैसे। मिठाई... झालरें... गुड्डे-गुड्डी के कपड़े... बर्तन... गहने... बारातियों की खातिर... कोई एक खर्चा होता है? दादी-नानियों की तरह वे खर्चे और कतर-ब्योंत में जुट गईं। रीनी को गुड़िया की ग्यारह ड्रैसेज के अलावा सास-ननद के नाम की पाँच ड्रैसेज भी देनी थीं।

'नहीं भाई, मेरी तो कमर ही टूट जाएगी। इतने कपड़े कहाँ से लाऊँगी मैं?'

पम्मी अड़ी रही। 'क्या करूँ, गुड्डे की माँ मानती ही नहीं।'

उसके गुड्डे के साथ है न रीनी की गुड़िया की शादी। अपर हैंड। बिना नाज नखरे किए मान गई तो गुड्डेवाली होने के ठसके किसे दिखाए?

'रूमी के पड़ोस मे दर्जिन आंटी रहती हैं। ढेरों कतरनें रोज कूड़े में फेंकती हैं। उन्हीं को जोड़-तोड़ कर लहँगा-चुनरी, स्कर्ट-टॉप बनवा लो न!' फालतू से खड़े निक्कू ने बात में शामिल होने की कोशिश की।

सबकी सब उछल पड़ीं। वो मारा!

'लेकिन दर्जिन आंटी की मिट्ठू के साथ कुट्टा है न हमारी।' मीनू ने याद दिलाया। इन्हीं दो कौड़ी की कतरनों को ले कर इतना-इतना रोब गाँठती है। सबने बायकाट कर दिया है उसका। रहो अकेली और चाटो अपनी कतरनें। वे मायूस हो गईं।

'उससे अब्बा कर लें।'

'खबरदार।' मीनू खासी खुंदकी है।

आपसदारी में ही बात सुलझानी पड़ेगी।

'ठीक है, गुड़िया की नौ और सास-ननद की चार ड्रैसेज ही काफी हैं।' पम्मी ने पहल की।

'नहीं।' रीनी को अब भी इनकार है। 'इतने लालची घर में मैं नहीं ब्याहूँगी अपनी गुड़िया।' रीनी ने रिश्ता तोड़ने की पेशकश की।

पम्मी को काटो तो खून नहीं। इतनी जल्दी बदल गया जमाना! दो-दो गुड़ियों की शादियाँ रचाई हैं उसने। माँ गवाह है। दान-दहेज देने में कोर-कसर नही छोड़ी कोई। और अब बदले में माँगना चाहे तो...

मीनू ने बात सँभाल ली। 'रिश्ते ऐसे नहीं टूटते। भगवान के घर से बन कर आते हैं, हाँ।'

कुल जमा सात ड्रैसेज पर बात तय हो गई। बँटवारा जैसे मर्जी कर लो, रीनी को परवाह नहीं। रीनी के नखरे भी जायज हैं। वही अकेली है जिसके पास बार्बी गुड़िया है। असली, महँगी बार्बी। पम्मी का गुड्डा तो धन्न-धन्न मानेगा खुद को। चरन धो कर न पिए तो कहना।

'पम्मी, तेरे गुड्डे की बारात में तो मैं जाऊँगा न?' घेरे से बाहर खड़े निक्कू ने अंदर आने की एक और कोशिश की। अपनी रिजर्वेशन को ले कर वह पूरी तरह आश्वस्त था।

'बिल्कुल नहीं।' मीनू को हक है शादी-ब्याह के मुतल्लिक सारे फैसले लेने का।

पम्मी को धक्का लगा। निक्कू उसका भाई है। वह क्यों न बनाए उसे बाराती?

'याद नहीं। सारी सहेलियों ने मिल का फैसला किया था - लड़कों-भाइयों का बायकाट।'

पिछली बार निशी की गुड़िया की शादी में रूमी के भाई ने बाराती बन कर जो ऊधम मचाया था, कोई भूलेगा? और ...मिट्ठू का भाई तो नदीदों की तरह मिठाई पर टूट पड़ा था। बारातियों को एक-एक पेस्ट्री में सब्र करना पड़ा था।

निक्कू की आखिरी उम्मीद भी ढह गई। वह पम्मी के बाल खींचने लगा - 'माँ ने चने लाने को कहा था और तू यहाँ पटर-पटर बातें किए जा रही है। चलती है कि नहीं?'

पम्मी ने बाल छुड़ा लिए। अभी इंतजामात को ले कर भी ढेरों बातें तय करनी हैं। किसी को दम मारने की फुर्सत नहीं। निक्कू फिर घेरे से बाहर हो गया। फालतू। प्रश्नचिन्ह की मानिंद। वह बोगेनवेलिया की पत्तियाँ नोच-नोच कर बिखेरने लगा। नुची पत्तियों का पहाड़।

'वृंदा!' वृंदा का भाई उसे ढूँढता हुआ वहाँ आया। 'माँ बुला रही है।'

निक्कू उसे देख किलक गया। वे संग-संग पत्तियाँ तोड़ने लगे। नहीं, सिर जोड़ कर बातें करना लड़कियों की आदत है। छिः, गुड्डे-गुड़िया के खेल नहीं। वे लड़के हैं। सुपरमैन। और बाँहों को एयर जैट की तरह फैला कर वे सड़क पर सरपट दौड़ने लगे। दौड़ते-दौड़ते लड़कियों के झुंड को जोर का धक्का दे कर रफूचक्कर हो गए। 'जो सुपरमैन से टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा।' एक कतार में गिरी साइकिलों की तरह लड़कियाँ एक-दूसरे पर औंधी पड़ी बिलबिलाती रहीं।

पम्मी सुबह-सुबह ही नहा ली। अकेले। न साबुन लगानी पड़ी, न रगड़ना पड़ा। माँ तो इत्ती जोर से हाथ-बाँह रगड़ती है कि दर्द होने लगता है। अपने आप नहाने में कितना मजा है! एक मग्गा पानी अपने ऊपर, एक मग्गा दीवार पर। धार बना कर एक पटरे पर डाला तो एक साथ दो धारें नीचे टपकती हैं - मग्गे की, पटरे की। नहा भी लो, खेल भी लो।

'मैं नहा भी ली।' मॉडल गर्ल की तरह पोज बना कर पम्मी माँ के ऐन सामने खड़ी हो गई। उसे चौके में आने की छूट है।

'लेकिन मुँह तो धोया नहीं।' माँ हँस दी।

'धोया था।' वह साफ झूठ बोल गई। माँ जादूगरनी है। सब जान जाती है।

'माँ, मैं पूरी बेल लूँ?' पूड़ियाँ बेलने में तल्लीन माँ से उसने अनुनय की। 'सिर्फ एक।'

'नहीं।' माँ ने रोक दिया।

'प्लीज।'उसने गुँधे आटे की तरफ हाथ बढ़ाया।

माँ ने एतराज से ताका उसे।

'देखो, धुले हैं मेरे हाथ।' उसने हथेलियाँ फैला दीं। उजली। साफ। माँ ने टुकड़ा भर आटा उसे थमा दिया।

'ले, बेल।' और पूड़ियाँ तलने लगी।

आटा और बेलन पम्मी के काबू आए ही नहीं। बिंगा-टेढ़ा जाने कैसी-कैसी आकृतियों में फैलता रहा आटा। बेतरतीब। कहीं से मोटा, कहीं से कटा-फटा। पूड़ी की गोलाई का सवाल ही नहीं। वह रुँआसी हो गई। माँ तो कैसे मजे से...

'बन गई?' माँ ने उसके कच्चे हाथों की अनगढ़ कलाकृति उठा ली। 'कितनी सुंदर! बिल्कुल भारत के नक्शे-सी।'

वह खिल गई। 'अरे, हाँ।'

'तल दूँ?' छन्न - न्न - भारत का नक्शा घी में तैरने-उतराने लगा। वह बाग-बाग हो गई। अपनी ड्राइंग दिखाएगी सबको। निक्कू को।

निक्कू को दिलचस्पी नहीं थी। रसोई से बाहर वह फालतू यहाँ-वहाँ मँडरा रहा था। नहा कर तैयार होने की कोई जल्दी नहीं। उसके बिना भी पूजा हो जाएगी।

'देख, देख निक्कू, मैंने बनाई। अपने हाथों से।' वह हुलस-हुलस कर बताने लगी। कितनी बड़ी उपलब्धि - माँ जैसी। निक्कू अनदेखी करता रहा। वह दिखाती रही। जबरन। नचाती रही। लहराती रही। अचानक सब गड़बड़ हो गया। शांत निक्कू ने झटके से पूड़ी छीन ली अैर गड़ुप... गड़ुप... मुँह में ठूँस ली। ही-ही... ही-ही... वह कूद-कूद कर हँसने लगा। पम्मी स्तब्ध।

'लड़कियों का काम है रोटी बनाना और लड़कों का काम है रोटी खाना।' वह मेज पर बैठ कर मजे से पैर हिलाने लगा - 'ऐ लड़की, जा, एक पूड़ी और हलवा ला।'

वह भौंचक्की उसे देखती रही।

'लड़की, सुनता नहीं तुझे? जा।'

पासा पलट गया था।

'बहनों पर हुक्म नहीं चलाते।' पम्मी की फरियाद पर डैडी जी ने हस्तक्षेप किया।

'लड़कियों पर तो चलाते हैं न?' निक्कू ने आश्वस्त भाव से उनकी ओर ताका।

डैडी जी हँसने लगे।

पम्मी! पम्मी! वृंदा की आवाज। वह तेजी से रसोई की ओर पलटी।

'वृंदा बाहर है बेटे। अंदर कहाँ जा रही हो?' डैडी जी ने टोका उसे।

'प्लेट लेने।' उसने भागते-भागते जवाब दिया।

'अपने यहाँ भी सब तैयार है। पूरे फौज-फाटे के साथ जल्दी ही आ जाना।' माँ ने पीछे से आवाज दे कर उसे बताया।

'अच्छा।' पता नहीं उसकी आवाज माँ के कानों तक पहुँची भी कि नहीं।

बाहर वृंदा-रीनी-रूमी-किटी-केशी-मिनी-अंजू-नेहा सब खड़ी थीं। शर्मा आंटी के घर। उन्होंने तय किया और प्लेटें खनकातीं दौड़ पड़ीं एक साथ।

बेहद खुश थीं। दो-दो रुपए और गोटे-किनारीवाली लाल-लाल चुनरी। बहुत अच्छी बोहनी। रीनी की गुड़िया के कपड़ों की समस्या ही खत्म।

नई प्लेट ले कर वे फिर दौड़ पडीं। रीनी के घर।

'पता है, माँ सबको नौ-नौ चूड़ियाँ देगी। काँच की चूड़ियाँ। हरी-लाल-नीली। साथ में दो-दो रुपए।'

सब विभोर।

केशी की माँ ने इतने सुंदर रंग-बिरंगे हेयर-बैंड दिए।

और वृंदा के यहाँ तो... मजा ही आ गया। 'करतारपुर से लाई है मेरी नानी।' वृंदा ने गर्व से सिर ऊँचा करके बताया था - 'लकड़ी का खिलौना सोफा सैट। खासतौर से कंजकों के लिए। माँ ने कोई मन्नत मान रखी थी न।'

गुप्ता आंटी ने सबको स्टील का किचन सैट दिया। छोटे-छोटे बर्तन - गिलास, कटोरियाँ, प्लेटें, चम्मच।

'अब मेरे घर।' पम्मी ने आदेशात्मक स्वर में आगे का कार्यक्रम निर्धारित किया। सब उसकी रहनुमाई में पीछे-पीछे चल पड़ीं। नौ लड़कियाँ।

'पता है, पम्मी की माँ ने कंजकों के लिए खिलौना गैस और कुकर खरीदे हैं।' किटी पम्मी की खास सहेली है। पम्मी के सारे राज जानती है। फुसफुसा कर उसने केशी को बताया।

'प्लास्टिक के नहीं जी, स्टील के।' केशी के अनुमान का खंडन करते-करते उसका स्वर ऊँचा हो गया था। सबने सुन लिया। पम्मी का कद दो अंगुल बढ़ गया। कुकर खरीदना सबके बस की बात नहीं होती।

'पलटन आ गई।' निक्कू ने दूर से ही उन्हें देख कर हाँक लगाई। डैडी जी लपक कर बाहर आए। हाथ में पानी की बाल्टी और मग। पम्मी सीधे किचन की ओर बढ़ चली।

'रुको रुको। सब। यहीं।' डैडी जी ने रोक दिया उन्हें। एटैंशन।

एक तरफ छोटी-छोटी चप्पलों का ढेर लग गया। जाने कहाँ-कहाँ भटक कर आई है माँ दुर्गा कन्या के रूप में। वे उसके पाँव के हर काँटे को बीन लेंगे। एक-एक करके सबके पाँव धुलाए। नरम-नरम हाथों से जैसे कबूतर के पंख से छू रहे हों। फिर हौले से पोंछ दिया उन्हें। देवी की अभ्यर्थना।

'अरे, पम्मी कहाँ गई? पम्मी!' डैडी जी ने गिनीं - आठ कंजकें। 'पम्मी, आओ भाई।'

'मैं?' पम्मी रोमाँच से भर उठी। 'मेरे पैर भी धुलाए जाएँगे।' निक्कू की ओर विजय भरी मुस्कान फेंक कर वह डैडी जी के सामने खड़ी हो गई - दोनों पैर आगे निकाल कर।

'आप क्यों नहीं हमें रोज नहला देते?' कबूतर के परों का स्पर्श। वह पुलक उठी।

'धत!' डैडी जी उसकी बेअक्ली पर रीझ गए। 'बच्चों को नहलाने का काम माँओं का होता है। समझी।'

सब चौके में आ गईं। डैडी जी ने अपने हाथों से फूलदार चादर चौहरी करके लंबाई में बिछा दी। वे सब बैठ गईं। सामने अपनी-अपनी प्लेट। माँ ने अखबार हटा कर परात में से पूड़ियाँ उठानी शुरू कीं - एक-दो-चार-पाँच। पाँच-पाँच पूड़ियाँ, दो कड़छी हलवा, एक कड़छी सूखे काले चने। सबको बराबर-बराबर। किसी ने कुछ नही खाया। छिः! दूसरों के घरों में भी कुछ खाते हैं? पम्मी ने भी नहीं। माँ को पता है छुट्टीवाले दिन पम्मी ब्रैड-जैम के अलावा कुछ नही खाएगी। पहले से ही तय है। वृंदा-रूमी-मिनी-रीनी वगैरह सब एक-दूसरे की तरफ देखने लगीं। उन्हें कुछ और चाहिए।

'बच्चियों को दक्षिणा तो दो।' माँ के कहने पर डैडी जी कुर्ते की जेब से मुट्ठी भर सिक्के निकाल कर बाँटने लगे। एक-एक के दो सिक्के। फिर सिर पलूस दिया - खुश रहो। जीओ।

बस? तो क्या किटी ने झूठ कहा था?

पम्मी घबरा गई। माँ भूल तो नही गई?

'माँ!' डर, नाराजगी, निराशा और दुख से भर कर वह चिल्ला पड़ी।

'और ये भी...' माँ के हाथ में पारदर्शी लिफाफा।

'निक्कू!' 'डैडी जी ने पुकारा।

'क्या है?' रूठा निक्कू भारी-सा मुँह बना कर चौके के दरवाजे में जरा सा झाँका। न, जहाँ उसकी पूछ नहीं, वहाँ क्यों जाए?

'इधर आओ।'

'क्यों?' वह खड़ा ही रहा। पैर-वैर बिल्कुल नहीं धुलाएगा वह किसी के।

'आ तो सही यार।' डैडी जी के याराना लहजे ने उसे आश्वस्त कर दिया।

'हूँ?' अभी भी अपने पाले में खड़ा।

'ये तोहफा छोटे लाट साहब की तरफ से।' बतौर वारिस निक्कू को इंट्रोड्यूस करते हुए डैडी जी के चेहरे पर तृप्ति और उल्लास फैल गया।

इतनी बड़ी तरक्की! निक्कू को पलभर विश्वास ही नहीं हुआ। फैले हाथों पर कुकर-गैस रखते हुए उसका चेहरा खुशी और बड़प्पन से दमक रहा था। वह अब किसी भी घेरे से बाहर नहीं था। सबके साथ था। बल्कि केंद्र में। बीचोंबीच।

पम्मी को बहुत नाज है डैडी जी पर। कितनी जिंदादिली से मनाते हैं हर त्योहार। दीवाली हो या करवा चौथ। छलनी की ओट में चाँद देख कर माँ जब डैडी जी की आरती उतारती हैं तो कितना दमकता है उनका चेहरा - पूनम के चाँद-सा। मानो सूरज का रोबीला तेज भी घुल गया हो उसमें। और माँ झिलमिल लाल साड़ी, गहरी लिपस्टिक, हाथ भर चूड़ियाँ, बिंदी-सिंदूर और मेंहदी रचे हाथ के बावजूद निस्तेज। रात के अँधेरे की तरह फीकी-फीकी, थकी-उकताई।

'चलो भाई, चलो। पूजा-वूजा के ढकोसले हो गए हों तो खाना खिलाओ। पेट में चूहे कूद रहे हैं।' डैडी जी कहते तो वे दोनों भी धम-धम सीढ़ियाँ उतर जाते - भूख! भूख!

पक्की रसोई। चौके में तेल का धुआँ भर कर माँ मुरझाए चेहरे से पूड़ियाँ उतारती रहती। वे मजे-मजे से खाते। किसी को ख्याल भी नहीं आता कि पिछले चौबीस घंटे से माँ ने कुछ खाया ही नहीं। आए भी तो कुछ अटपटा नहीं लगता। यही दस्तूर है न!

'घर के सब जन को खिलाए बिना औरत खुद खाने बैठ जाए तो बरकत होगी भला?' दादी द्रौपदी के अक्षय पात्रा का हवाला देतीं। हर बार नए ढंग से। उसी तर्क से। पम्मी को ऐसे ढेर से किस्से-कहानियाँ याद हैं। हर त्योहार पर मेहँदी रचाते हुए उन किस्सों की खुशबू तन-मन में रचा-बसा कर माँ जैसी बुढ़-सुहागन लाड़ली बहू बनने के ख्वाब भी देखने लगी है। पहले दादी की आँख से। अब अपनी आँख से।

लेकिन पम्मी की बाबत डैडी जी कुछ नहीं भूलते। 'कुड़ीआँ लागी हुंदीआँ हैं।' वे बाकायदा याद रखते हैं और राखी से कुछ दिन पहले ही पूछना शुरू कर देते हैं - 'हाँ भई पम्मी, कितना 'लाग' निकालें तेरा?'

पम्मी को छूट है, जितनी ऊँची बोली चाहे लगा दे। निक्कू छटपटाता रहेगा - 'इसे इतने रुपए। मुझे कुछ भी नहीं।'

वह इतरा जाती। गर्व भरी इतराहट।

'मुझे भी मेरा 'लाग' दो।' निक्कू पैर पटक कर अपना गुस्सा जाहिर करने लगता - 'नहीं तो...'

'छिः छिः!' दुख और घृणा के मारे डैडी जी का सर्वांग सिहर जाता।

'कैसे लड़के हो तुम? इतना भी नही जानते, लड़कियाँ 'लाग' लेती हैं। लड़के 'लाग' देते हैं। समझे?'

निक्कू नहीं समझता। वह पैर पटकता रहता। लेकिन लाख रोने-चिल्लाने पर भी डैडी जी उसे कुछ न देते। पम्मी को मुँहमाँगा मिलता। सच, तभी तो कहती है, रोज-रोज क्यों नहीं आते त्योहार!

आज डैडी जी और निक्कू में गाढ़ी छन रही है। दोपहर से ही दोनों जाने क्या खुसर-पुसर किए जा रहे हैं।

'निक्कू! मैं अपने गुड्डे की बारात ले कर जा रही हूँ।' पम्मी ने उसे छेड़ा और फलाँग कर दरवाजे से निकल जाने को तैयार हो गई। चिढ़ कर निक्कू झपटा तो अपनी सेफ्टी का पूरा बंदोबस्त। मगर निक्कू ने कान ही नहीं दिया। ...और अब लौट कर आई तो भी चुप।

'लागी आई! लागी आई!' और बस, 'चंपक' पढ़ने में मगन।

उसके पास ढेरों बातें हैं बताने के लिए। निक्कू न सही, माँ है। डैडी जी हैं। वह बताने लगी - रीनी के घर की बड़ी-सी छत। बरसाती में सारा तामझाम। स्टीरियो पर दलेर मेंहदी के गाने। खूब नाच। भँगड़ा। रीनी और रूमी की दीदियों ने तो ऐसी रौनक लगाई। पता है, केशी की माँ भी खूब अच्छा नाचती है। फिर खाने में कितना कुछ - केक... बर्गर... ढोकला... गुलाबजामुन... कोक...

'लागी' आ गई न अपनी औकात पर। खाना-पीना - दूसरों के घर से ले कर...' चंपक में नजर गड़ाए-गड़ाए बोला निक्कू।

माँ ने तरेरा उसे। डैडी जी सिर्फ मुस्करा दिए। पम्मी उसी रौ में बताती रही - दान-दहेज कपड़े-जेवर।

'तेरा गुड्डा-गुड़िया हैं कहाँ? दुल्हन को बिदा करा कर नहीं लाई?'

'नहीं।' पम्मी ने उदास-सा मुँह बना लिया। 'ये लंगूर है न। जान से मार देता दोनों को।' पम्मी ने तरेरा निक्कू को।

'लागी' डर गई। 'लागी' डर गई।' चंपक परे फेंक निक्कू उसके सामने आ खड़ा हुआ। दोनों हाथ कमर पर। संभावित खतरे को सूँघ माँ उसे घसीट ले गई।

'चलो, खाना खा लो।'

पम्मी सिर्फ दूध पीएगी। उसका पेट ऊपर तक भरा है।

चौके में सुबह की 'कढ़ाही' की बासी गंध अभी तक टँगी है। हलवा-पूरी-छोले से अधभरी प्लेटें अब भी पड़ी हैं। दोपहर में भरपेट खा लिए जाने के बावजूद। अनाज है। नहीं नहीं, परसाद। बेकद्री थोड़ेई न करेंगे। घर के सब जन मिल कर खाएँगे।

'माई और जमादारनी को दे दिया था?' डैडी जी जिम्मेदारी से पूछते हैं। शायद बचाव का रास्ता यहीं से निकल आए।

'हाँ। खूब दे दिया। कल के लिए भी रख दिया है।' एक बड़े से पैकेट की ओर इशारा किया माँ ने।

'जितना पकाया-खिलाया, उससे कहीं ज्यादा तो पम्मी ही ले आई।' माँ कह रही है - 'ऊपर से पकाने-राँधने की तकलीफ अलग। ऐसे ही आलतू-फालतू के त्योहार।'

'आलतू-फालतू क्या?' डैडी जी गरज उठे - 'बात करने की तमीज नहीं। त्योहार त्योहार है। बड़े-बुजुर्गों ने जो रीत चलाई है, कुछ सोच समझ कर ही तो।'

वे दिखा-दिखा कर स्वाद से खाने लगे। पता नहीं किसके घर की प्लेट थी - वृंदा... रीनी...

लेकिन निक्कू अनखाए जा रहा है। 'नहीं, मैं नहीं खाऊँगा।' डैडी जी की ओर देख कर उसकी हिम्मत बढ़ गई। 'लागी' का 'लाग' मैं क्यों खाऊँ?' वह जोर-जोर से विरोध करने लगा।

पम्मी चुपचाप दूध पीती रही। वह न तीन में, न तेरह में।

निक्कू की सारी बर्छियाँ खाली गईं। वह तिलमिला गया। मोटो-झोटो को धेले की अक्ल नहीं। 'लागी' का मतलब ही नहीं पता शायद। उसे पूरी तरह याद है। आज ही तो डैडी जी ने बताया है।

'पम्मी, तू 'लागी' है न?' उसने स्नेहसिक्त स्वर में पम्मी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया।

'हाँ।' पम्मी दूध पीती रही।

'तुझे पता है 'लागी' क्या होता है?'

'हाँ।'पलके नींद के मारे बोझिल।

'लागी' माने कमीन लोग। काम्मी-मुजारे। नौकर-चाकर। छोटे काम के बदले या माँग-ताँग कर खानेवाले लोग।' वह जल्दी-जल्दी ज्ञान का पिटारा उड़ेलने लगा।

'नहीं।' झन्न से गिलास फर्श पर पटक दिया पम्मी ने। नींद हिरन।

'हाँ।' निक्कू ने हाथ को मोड़ कर कटोरा बना लिया - 'ऐसे माँगते हैं। अल्लाह के नाम पर माई। भगवान के नाम पर बाबा।'

'नहीं।' आहत पम्मी ने डैडी जी की ओर ताका। उसका सबसे बड़ा रक्षा कवच। वहाँ परसाद छकने के साथ-साथ बातों का लुत्फ उठाने का भाव था।

'तुझको रखे राम तुझको अल्लाह रखे। दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रखे।' निक्कू को शह मिली।' 'ऐ पम्मी' घुड़कने के अंदाज में उसने सुझाव दिया - 'अगले साल राखी पर यह गाना गाएगी, तभी 'लाग' दूँगा तुझे। समझी।'

पम्मी कंजक है। दुर्गा माँ का कन्या रूप। वह एकाएक काली बन गई। मजे से खिलखिलाते निक्कू को जमीन पर गिरा दनादन मुक्के जड़ने लगी। नाक-मुँह-पेट-छाती। पल भर के लिए जैसे सब कुछ ठहर गया। निक्कू की चीखें छत फाड़ने लगीं। डैडी जी को होश आया।

'पम्मी!' भरपूर तमाचा गाल पर जड़ दिया। पहली बार।

अविश्वास से जड़ पम्मी ताकती रही। आँसुओं से लथपथ। निक्कू को मौका मिल गया उठ कर बदला लेने का। माँ स्तब्ध-सी सब देख रही थीं। वह फुर्ती से झपटा।

'निक्कू!' कस कर दोनों हाथ पकड़ लिए उन्होंने निक्कू के।

पता नहीं क्या था माँ के स्वर में - डर, अनुनय, चेतावनी कि पम्मी कूद कर चौके से बाहर हो गई।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में रोहिणी अग्रवाल की रचनाएँ