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उपन्यास

खोया पानी
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

अनुवाद - तुफ़ैल चतुर्वेदी

अनुक्रम

अनुक्रम ज्ञान चतुर्वेदी की प्रस्तावना, अनुवादक की कलम से और लेखक की भूमिका     आगे

व्यंग्य का एकदम नया रंग

ज्ञान चतुर्वेदी

हिंदी ही नहीं, विश्व की प्रायः अन्य बड़ी भाषाओं में भी व्यंग्य उपन्यास गिने-चुने ही लिखे गये हैं। अंग्रेजी में पी.जी. वुडहाउस ने अलबत्ता फैंटेसी की अपनी दुनिया और जीव्स जैसे पात्र रचकर हास्य के अमर उपन्यास लिखे हैं - वो भी ढेर सारे। परंतु उनके उपन्यासों की भूमि यह धरती नहीं और इस धरती का आमजन नहीं। वो अलग ही दुनिया है, जो बेहद बांधती तो है, पर कहीं है नहीं। फिर 'थ्री मेन इन ए बोट' जेरोम की अमर रचना है, जोसफ़ हेलर की 'कैच ट्वेंटी टू' नामक युद्ध विरोधी अनोखा व्यंग्य उपन्यास है, उन्हीं की 'गुड एज गोल्ड' भी है, डॉ. रिचर्ड गॉर्डन की 'डॉक्टर सीरीज' के विख्यात व्यंग्य उपन्यास हैं। ये तो अंग्रेजी के तुरत-फुरत याद आने वाले अमर व्यंग्य उपन्यास हैं। इन्हीं में 'एनिमल फार्म' को भी गिन लूं, तो गलत नहीं कहा जायेगा।

इधर हिंदी में 'राग दरबारी' ने हिंदी पाठकों को पहली बार यह बताया कि कैसे इतने बड़े कैनवस को समेट कर बड़ा उपन्यास भी विशुद्ध व्यंग्य में लिखा जा सकता है, गो कि श्रीलाल शुक्ल जी को इसे व्यंग्य-उपन्यास की संज्ञा देना नहीं भाता। पर वो है तो। क्या करें। है, तो है।

परसाई जी की 'रानी नागफनी की कहानी' नामक एक फैंटेसीनुमा लघु-व्यंग्य-उपन्यास था, जिसकी सीमाएँ 'राग दरबारी' के बरक्स रखकर कभी भी जानी जा सकती हैं। व्यंग्यकार रवींद्रनाथ त्यागी ने भी एक आत्मकथात्मक उपन्यास (अशेष कथा) लिखा, जो व्यंग्य-उपन्यास नहीं था। शरद जोशी का 'मैं, मैं और केवल मैं' नामक अधूरा-सा व्यंग्य-उपन्यास उनकी मृत्यु के बाद छपा और वो कथ्य, कहन, तथा कैनवस के स्तर पर भी अधूरा ही रहा। मेरा विश्वास है कि शरद जी यदि जीवित होते, तो इसको इस रूप में न छपवाते। इससे पहले व्यंग्य-उपन्यास के नाम पर सुबोध कुमार श्रीवास्तव का 'शहर बंद क्यों है' को भी ले सकते हैं। ज्ञान चतुर्वेदी नामक खाकसार ने 'नरकयात्रा', 'बारामासी' और 'मरीचिका' नामक तीन व्यंग्य-उपन्यास लिखे, जो 'राग दरबारी' की विरल परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं। यशवंत व्यास ने 'चिंताघर' और कामरेड गोडसे' नाम के दो महत्वपूर्ण प्रयोगवादी व्यंग्य-उपन्यास लिखे हैं जो काफी चर्चित भी रहे। गिरीश पंकज ने भी 'माफिया' लिखकर व्यंग्य-उपन्यासों की दुनिया में कदम रखा है। प्रदीप पंत का 'इन्फोकार्प का करिश्मा' उपन्यास हाल ही में आया है। दुखद है कि 'राग दरबारी' के लेखक ने बाद में कोई व्यंग्य-उपन्यास लिखा ही नहीं। अब उर्दू पर आयें।

उर्दू में अपनी मिठास तो है ही और उसमें काव्यात्मक लोच भी है, जो उसके समृद्ध कविता संसार में देखा जा सकता है। शायरी की एक जगमग परंपरा है वहां। परंतु उर्दू में हास्य-व्यंग्य की जो लंबी रिवायत है, वो तो उसे एकदम से बेहद समृद्ध भाषा बना देती है। उर्दू व्यंग्य में हिंदी व्यंग्य से इतर बहुत-सी ऐसी बातें हैं, जो उसके व्यंग्य को अपेक्षाकृत अधिक पठनीय, तीखा और जमीन से जुड़ा बनाती हैं। कुछ बातों की चर्चा करना मुनासिब होगा। एक तो ये कि वहां हास्य को व्यंग्य के समकक्ष ही आदर दिया गया है, बल्कि दोनों को अलग करके देखने की अप्राकृतिक कोशिश भी वहां नहीं की गयी है। हास्य की जो समृद्ध परंपरा शौकत थानवी, पतरस बुखारी आदि से चली है, वो अपने उच्चतम शिखर पर यूसुफ़ी साहब के इस उपन्यास में दिखाई देती है, जो इस समय आपके हाथ में है। इम्तियाज अली ताज, ग़ुलाम अब्बास, कन्हैया लाल कपूर, इब्ने-इंशा, फिक्र तौंसवी, मुज्तबा हुसैन आदि के तीखे व्यंग्य में उसी तरह से हास्य है, जैसा हिंदी में बड़े कौशल से शरद जोशी की रचनाओं में मिलता है या 'राग दरबारी' और उसकी परंपरा के उपन्यासों में मिलता है और इस हास्य के कारण उर्दू व्यंग्य कभी कमजोर नहीं हुआ - बल्कि वह बेहद पठनीय और हृदयंगम हो गया। तो एक तो यह, दूसरी बात है उर्दू व्यंग्यकारों की जुम्लेबाजी और विट की बादशाहत। ये चली ही आ रही है। पतरस बुखारी की रचनाओं से शुरू करो तो फिर यूसुफ़ी साहब तक पहुंचो। वे बड़ी मशक्कत से जुम्ले तैयार करते हैं और हर जुम्ला आपको बेसाख्ता चमत्कृत करता है। यूसुफ़ी साहब का यह उपन्यास तो जुम्लों का नायाब खजाना है और किसी भी व्यंग्यकार के लिए एक टेक्स्ट बुक की तरह भी है कि हम विश्लेषित करें कि कैसे 'कही' को 'बतकही' बनाया जा सकता है।

तीसरी बात उनकी सहजता है। उर्दू व्यंग्य बेहद सहज है। वह प्रायः फालतू के पांडित्य प्रदर्शन में नहीं पड़ता। आजकल का हिंदी व्यंग्यकार प्रायः अपनी रचनाओं में थानेदार, वकील और न्यायाधीश तो होता ही है, साथ ही कोड़े फटकारने वाला भी - और इस कोशिश में अपने लेखन में अधिकतर असहज हो जाता है। परसाईजी, शरदजी या त्यागीजी वहां महान हैं, जहां सहज हैं। हिंदी वालों पर यह अतिरिक्त दबाव शायद आलोचकों का है कि व्यंग्य ऐसा हो, वैसा हो, इस डिजाइन का हो और सबसे बेहूदा बात कि कैसा न हो? इस दबाव के चलते कई बार असहजता दिखाई पड़ती है। उर्दू व्यंग्य बेहद सहज है और सहज होना कितना कठिन हो सकता है, यह कोई यूसुफ़ी साहब जैसा एक पैराग्राफ लिखने की कोशिश करके कभी भी देख सकता है। चौथी बात यह कि उर्दू व्यंग्यकार अपनी कविता के बेहद करीब है। उर्दू की शेरो-शायरी की काव्य संपदा से बेहद परिचित और सटीक जगहों पर उसके इस्तेमाल की शाइस्तगी और तमीज से भी परिचित। कविता की बुनावट से उसका यह गहन लगाव और समझ उर्दू व्यंग्य को एक काव्यात्मक भाषा और अभिव्यक्ति भी देती है।

यूसुफ़ी साहब के इस उपन्यास में कई जगहों पर वे विशुद्ध कवि हैं - कहने में बेहद भावुक और भाषा में महाकवि के समकक्ष। हास्य के जुम्ले गढ़ते-गढ़ते यूसुफ़ी साहब कब कविता की भाषा के गहने गढ़ने में मुब्तिला हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। और भी बहुत- सी बातें लिखी जा सकती हैं, पर अभी वह अवसर नहीं है।

इतना सारा लिखने का मेरा कुल तात्पर्य यह था कि हिंदी के संसार को हम मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब की लिखी, उर्दू व्यंग्य की इस नायाब कृति से परिचय करायें जिसका अनुवाद 'तुफ़ैल' चतुर्वेदी ने ऐसी सहज भाषा में किया है कि यह हिंदी की ही मूलकृति नजर आने लगी है। 'तुफ़ैल' ने अपनी पत्रिका 'लफ्ज' के जरिये जब मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब का परिचय हम हिंदी वालों से कराया, तब मैंने बड़ी शिद्दत से महसूस किया था कि यदि 'तुफ़ैल' जैसे मूल्यवान पुल दो भाषाओं के बीच न हों, तो हमें तो पता ही न चले कि उस तरफ की दुनिया कैसी नायाब है। मैं तो 'खोया पानी' की पहली किस्त पढ़कर ही चमत्कृत रह गया था। ऐसे अनुवाद दूसरी भाषा के खजाने को बटोरकर अपनी भाषा की झोली में भरने जैसे होते हैं। यूसुफ़ी साहब का यह व्यंग्य-उपन्यास, हिंदी व्यंग्य के लेखकों और पाठकों, दोनों को व्यंग्य की नई ताकत, तेवर और तरावट से परिचित कराता है।

यूसुफ़ी साहब के इस उपन्यास में नॉस्टेल्जिया का अद्भुत संसार है। पार्टीशन द्वारा हिंदुस्तान के दो फांक हो जाने के बाद का दर्द भी और यथार्थ भी, यादें भी और बदलती दुनिया की बातें भी, फिर पात्र सारे ऐसे कि जिन्हें घनघोर यथार्थ से उठाकर उन पर फंतासी का रंग रोगन कर दिया गया हो। वे लोग कि जो अभी भी उसी समय में जी रहे हैं जो गुजर गया, वे शहर जो अब वो नहीं रहे कि जैसा छोड़कर कभी पाकिस्तान जाना पड़ा।

धार्मिक कठमुल्लापन की बेलौस खिल्ली - बिना लाग-लपेट के। आम मुसलमान के जीवन की मुश्किलें, सपने और हकीकतें। हास्य की पराकाष्ठा। इंप्रोवाइजेशन के अद्भुत प्रयोग। भाषा के मायावी खेल। नायाब चरित्र। इन्सान और इन्सानियत से प्रेम करने का एक कोमल तागा, जो पूरी रचना में यहां से वहां तक। जुम्लेबाजी के एक से बढ़कर एक प्रयोग कि जिन्हें कंठस्थ करके किसी को भी सुनाने का मन करे।

हिंदी के व्यंग्य-उपन्यासों की अपनी परंपरा अभी बन रही है। उसमें सीखने, समझने, करने और अपना लेने की बड़ी गुंजाइश है। यूसुफ़ी साहब का यह उर्दू व्यंग्य-उपन्यास हमें व्यंग्य उपन्यास रचने के सूक्ष्म नये तरीकों से परिचित कराता है - विषय, उसकी भाषा और कहन को लेकर यह उपन्यास हिंदी के व्यंग्य उपन्यासों से अलग जुरूर है पर बेहद ताकतवर, दिलकश, पठनीय और बार-बार पढ़ने के लिए बाध्य करने वाला। इसमें पी.जी. वुडहाउस का फंतासी संसार जैसा भी कुछ है, 'राग दरबारी' के समकक्ष हास्य तथा विट भी है, उर्दू हास्य का अपना कलेवर भी और वे अनोखे पात्र भी, जो अभी भी इस दुनिया को दुनिया होने का अर्थ देते हैं। यूं वो साहित्य से धीरे-धीरे खारिज हो रहे हैं या दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आम आदमी आदि के तहत मात्र फतवे के तौर पर वहां रह पा रहे हैं।

यूसुफ़ी साहब के जरिये वास्तव में हम उर्दू के एक ऐसे अनोखे हास्य-व्यंग्य संसार से परिचित होते हैं, जो उर्दू में भी अद्वितीय है। यूसुफ़ी साहब जैसे लिखने वाले तो उर्दू में भी नहीं। उन्होंने उर्दू हास्य-व्यंग्य को एक नया रंग दिया है। उनके तीन और व्यंग्य उपन्यास हैं, जिनका तुफ़ैल चतुर्वेदी अनुवाद कर रहे हैं। मैं आशा करता हूं कि ये उपन्यास भी हिंदी में जल्द ही उपलब्ध होंगे। उर्दू यूं भी हिंदी ही तो है, और उसकी कहानियां भी हिंदुस्तान के अवाम की कहानियों जैसी। ये उपन्यास हिंदी व्यंग्य के पाठकों की रुचि और सोच में एक नया आयाम जोड़ेंगे, इस आशा के साथ यूसुफ़ी साहब का यह पहला उपन्यास आपकी नज्र।

 

अनुवादक की कलम से

तुफ़ैल चतुर्वेदी

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब का उपन्यास 'खोया पानी' मेरी पत्रिका 'लफ्ज' में 1 से 12 अंक तक छप चुका है, किंतु उसकी भूमिका पहली बार आ रही है। व्यंग्य मूलतः करुणा से उपजता है, इस बात की पुष्टि ये भूमिका करेगी। मैंने जब छहमाही संकलन 'रसरंग' को 'लफ्ज' में बदला तो ये भी सूझा इस बार इसे पत्रिका का रूप दिया जाये। 'रसरंग' के समीक्षकों व पाठकों के अनुसार समकालीन गजल का सर्वोत्तम रूप होने के बावजूद ये मन में था कि बाजार इसे स्वीकारेगा या नहीं। मैं मुश्ताक़ साहब को पढ़ चुका था और बातचीत में कहता भी था कि इनके उपन्यास समकालीन व्यंग्य के बेहतरीन दस्तावेज हैं।

एक फुसलाऊ और बिकाऊ नीति के तहत शायरी के साथ व्यंग्य को जोड़ने की योजना बनायी और लफ्ज के पहले अंक को बाजार में पटक दिया। जिन लोगों ने लफ्ज का पहला अंक देखा है वो मेरी बात समझ जायेंगे। मुझे पत्रिका में कॉलम बनाये जाने चाहिए जैसी बात का भी शऊर नहीं था। पहले अंक में पूरे पेज पर एक ही पंक्ति टाइप की गई, नतीजा ये निकला कि जब पाठक पंक्ति खत्म करके अगली पंक्ति के प्रारंभ पर आता तो कई बार नजरें फिसल कर इच्छित पंक्ति की जगह कहीं और पहुंच जातीं। फिर भी भरपूर कामयाबी मिली। लफ्ज अपने पहले अंक से ही पाठकों की जुरूरत का हिस्सा बन गया और अब तो ये स्थिति है कि हमारे प्रसार विभाग के लोग अगर देर से बाजार में पत्रिका पहुंचाते हैं तो बेचने वाले लड़ मरते हैं कि पाठक लौट-लौट कर जा रहे हैं। लफ्ज के स्टैबलिश होने के पीछे सबसे बड़ा हाथ मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब का है।

इस उपन्यास में आप हंस और हंस के अलावा कहीं चंद्र-बिंदु नहीं पायेंगे। हमारे विचार में इन दो शब्दों के अलावा बाकी सब जगह बिंदी से काम चल जाता है। आज से पंद्रह-बीस साल पहले बहुत-से शब्दों में चंद्र-बिंदु लगता था मगर अब लगभग समाप्त-प्राय है। ये हिंदी का सरलीकरण करने के तहत है। इसी तरह गई/पाई/दिखाई जैसै शब्दों को गयी/पायी/दिखाई लिखा गया है। इसी तरह के अन्य शब्दों के साथ भी यही व्यवहार किया गया है। हम लोगों की सोच इस नियम पर आधारित है कि गई/पाई/दिखाई को जब इसी क्रम में गया/पाया/दिखाया लिखा जाता है तो इसे गयी/पायी/दिखाई ही लिखा जाना चाहिए। इसी प्रकार उर्दू के शब्दों को उनके मूल उच्चारण के हिसाब से लिखा गया है। अस्ल, वज्न, फत्ह जैसे बहुत-से शब्द हैं जो संयुक्ताक्षर होते हुए भी हिंदी में असल, वजन और फतह लिखे जाते हैं। शब्दों का अस्ली वज्न केवल शायर या कवि तय कर सकते हैं चूंकि छंद में शब्द को बांधने से ही उसका वज्न तय होता है। फत्ह का वज्न छंद में ऽ+। (2+1) होगा जबकि फतह का वज्न ।+ऽ (1+2) होगा। ये इस तरह है कि समझना को समझ-ना भी पढ़ा जा सकता है और सम-झना भी। पहले उच्चारण में इस शब्द का वज्न ।+ऽ+ऽ (1+2+2) होगा दूसरे उच्चारण का वज्न ऽ+।+ऽ (2+1+2) होगा। मैं चूंकि स्वयं शायर हूं इसलिए मेरे लिए यह विषय महत्त्वपूर्ण है और इस पुस्तक में इस बात का ध्यान रखा गया है। इस किताब की प्रूफरीडिंग बहुत ठोक-बजा कर, छान-फटक कर की गई है और इसमें मेरे साथी श्री कमलेश पांडेय ने अपनी बहुत रातें काली की हैं, दिन तो वो ऑफिस में काला करते हैं।

इस सफर में कई ऐसे मेहरबान भी साथ आये जिनकी अनुपस्थिति में मैं कुछ नहीं कर पाता। रहीम ने कहीं कहा है -

रहिमन वे नर मर चुके जे कहुं मांगन जायं

ये वो लोग थे जिन्होंने लफ्ज के लिए लोगों से बात की। इन्हें कोई आवश्यकता नहीं थी कि ये लफ्ज के लिए किसी से कहते किंतु इन्होंने मुझ पर कृपा की। इनका उल्लेख न करना कृतघ्नता होगी। मैं हृदय की गहराइयों से श्री गिरीश चतुर्वेदी, श्री सुधीर चतुर्वेदी, श्री दीनानाथ मिश्रा और श्री ललित कुमार गुप्ता का आभार प्रकट करता हूं।

अंत में अपनी पत्नी रति का आभार कि उन्होंने मेरे अनुवाद करते समय मुझे कभी डिस्टर्ब नहीं किया जो कि हर पत्नी का वैवाहिक दायित्व होता है। बल्कि कई बार तो कई-कई हफ्ते के लिए मायके चली गयीं। परिवार के लोग समझते रहे कि हम दोनों के बीच मन-मुटाव है मगर वो अनुवाद के लिए अनुकूल वातावरण बना रही थीं। मेरे मन से उनके लिए दुआ निकलती है, भगवान उनका सुहाग बनाये रखे।

किताब के बारे में कृपया लोगों को बतायें और खरीद कर पढ़ने के लिए बाध्य भी करें। क्या उपहार में देने के लिए अच्छी किताबों का चयन करना उपयुक्त होगा?

 

भूमिका

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

'अहसान भाई! मुनव्वर हुसैन भी चले गये - इंतिकाल से पहले।' 'किसके इंतिकाल से पहले?' मियां अहसान इलाही ने अपनी धुंधलायी हुई आंखों से छत के पंखे को तकते और अपने फालिज-ग्रस्त हाथ को दूसरे हाथ से उठाकर अपने दिल पर रखते हुए पूछा। उन्हें रह-रह कर एन्जाइना के दर्द का शक हो रहा था।

ये जनवरी 1987 का जिक्र है, मुझे अपनी बात उन तक पहुंचाने में खासी दुश्वारी हो रही थी, मियां अहसान इलाही पांच साल से बिस्तर पर पड़े हुए थे। फालिज के हमले के बाद वो दिल की बीमारियों के अस्पताल में दस-बारह दिन कोमा में रहे। जब होश आया तो उन्हें मालूम हुआ कि उनके आधे बदन पर फालिज गिर चुका है। नजर जाती रही, जबान भी बुरी तरह शिकार हुई, याददाश्त आंख-मिचौनी खेलने लगी, सिर्फ तकलीफ देने वाली बातें याद रह गयीं।

अगर अब उन्हें कोई पहली बार देखता तो ये सोच भी नहीं सकता था कि ये वही सवा छह फुट, दो सौ दस पौंड और पहलवानी डील-डौल वाला शख्स है जो बहत्तर साल की उम्र में सुब्ह चार बजे डेढ़ घंटे दंड-बैठक लगाता, फिर एक घंटे टेनिस खेलता और दिन में चार-पांच मील पैदल चलता था। 1960 में दिल के पहले भारी दौरे के बाद उन्होंने बदपरहेजी, बैठकों और यारबाशी में बढ़ोत्तरी कर दी थी। लंदन गये तो इब्नुल हसन बर्नी की तरह उन्हें भी कहीं कोई जीना दिखाई पड़ता तो उस पर चढ़ते जुरूर थे। कहते थे कि 'इससे दिल जवान होता है और बुढ़ापा हार जाता है। साठ-पैंसठ साल पहले चिन्यौट के दूर-पास में कोई पेड़ ऐसा नहीं था जिस पर मैं न चढ़ा हूं।'

डाक्टरों ने खाने में सख्त परहेज बताया। उन्होंने चिन्यौट से अस्ली घी और आम का अचार मंगवाना तो छोड़ दिया लेकिन चिन्यौटी कोफ्ता, सिंधी बिरयानी, बर्नस रोड की तर-तराई ताफतान, कोयटा के सज्जी कबाब, बादाम की हैदराबादी लौज, मुल्तान के अनवर रटौल... संक्षेप में यूं कहिए के दिल के मरीज के लिए आत्महत्या का कोई साधन नहीं छोड़ा। खुद ही नहीं, अपने डाक्टर को भी घर बुलाकर बड़े चाव और इसरार से खिलाते थे। कहते थे अच्छे खाने से बीमारी का सामना करने का हौसला और ताकत पैदा होती है। वो बदस्तूर अपनी-सी पे कायम रहे। रोजे भी नहीं छोड़े, कि बचपन से रखते चले आये थे। इसी तरह पांचों समय की नमाज बाकायदगी से छोड़ते थे। कारण ये देते थे कि अब शुरू करूं तो लोग कहेंगे, मियां साहब एक ही हार्ट-अटैक में उठक-बैठक करने लगे। डाइबिटीज भी हो गई, लेकिन सोने से पहले एक पाव फुल क्रीम वाली आइसक्रीम जुरूर खाते। जितने बुद्धिमान थे, उससे बड़ी हर विषय पर राय रखते थे। कहते थे कि 'आइसक्रीम दिल को ठंडक पहुंचाती है और ब्लड प्रेशर पर कंट्रोल रखती है, बशर्ते कम न खायी जाये। सरगोधा या साहीवाल अपने समधियाने जाता हूं तो संकोच में रात को आइसक्रीम का नागा हो जाता है। रात-भर करवटें बदलता रहता हूं। जिस रात आइसक्रीम न खाऊं, उस रात मच्छर बहुत काटते हैं। 1970 में आपको मालूम है, योरोप के टूर पर गया था, कई दिन तक बिरयानी नहीं मिली, चुनांचे वियना में हर्निया का ऑप्रेशन कराना पड़ा। आप मेरे चटोरेपन और बदपरहेजी का मजाक उड़ाते हैं, गालिब को देखिए सारी उम्र नाकद्री, परेशानी और तंगी का रोना रोते रहे, विशेष रूप से अंतिम दिनों में, लेकिन मौत की बीमारी से पहले की उनकी आखिरी खुराक तो देखिए, 'सुब्ह को सात बादाम की चटनी, कंद के शरबत के साथ, दोपहर को सेर-भर गोश्त का सूप, छह घड़ी रात गये पांच रुपये-भर शराब और इतना ही दूधिया अर्क', भाई मेरे! यहां अल्लाह का दिया सब कुछ है सिवाय डोमनी के, लेकिन मुझे तो मौत की बीमारी के बिना भी इतनी केलोरीज नहीं मिलती। गालिब पांच-रुपये भर शराब इसलिए पीते थे कि अगर उसकी मात्रा बढ़ा देते तो फिर इतना ही दूधिया अर्क भी जहर-मार करना पड़ता। भाई मेरे! मैं तो दूध की आइसक्रीम सब्र और चैन से खाता हूं। कभी तोला-माशा की कैद नहीं लगायी।' डाक्टरों से एक्सरे और बीमारी की पहचान कराने के बाद अक्सर बायोकेमेस्ट्री से खुद अपना इलाज करते। ऐसे संकल्प शक्ति के धनी और बेढब मरीज पर डाक्टरों को गुस्सा नहीं आता, तरस और प्यार आता है। दोस्तों के बीच मीठी बातचीत पर आते तो डिंपल उनके गालों में ही नहीं, वाक्यों में भी पड़ता था। अंत में उनकी बदपरहेजी और लाजवाब कर देने वाली डाक्टरी का नतीजा फालिज की शक्ल में सामने आया।

मैं ड्राइंगरूम और बरामदे से होता हुआ उनके कमरे तक पहुंचा तो देखा कि उनके म्यूजिक रूम में (जिसमें नौ-दस लाउडस्पीकर इस कमाल से लगाये गये थे कि एक भी नजर नहीं आता था) ताला पड़ा है। उनकी निजी लाइब्रेरी भी, जिसकी सैकड़ों किताबों की कीमती जिल्दें उन्होंने निजाम हैदराबाद के शाही जिल्द बनाने वाले से विशेष रूप से बनवायी थीं, चार साल से बंद पड़ी थी। इसी लाइब्रेरी में उन्होंने मेरा परिचय नियाज फत्हपुरी, मौलाना मुहम्मद अय्यूब देहलवी, मुहम्मद हसन अस्करी और सलीम अहमद से कराया था। यहीं से उन्होंने एक बार आधे घंटे तक मुझे फोन पर उस्ताद बुन्दू खां की सारंगी सुनवायी थी कि वो अपने हर शौक और मजे में दोस्तों को शामिल करके अपनी खुशी दुगुनी करने की खूबी से परिचित थे।

फोन पर सारंगी सुनवाने का किस्सा ये है कि उनके पिता मरहूम हाजी मुहम्मद याकूब साहब अपने घर में ताश, औरतों की फोटो (मुराद एक्ट्रेसों से थी) और पानदान रखने के विरोधी तो थे ही, गाने की बैठक को भी बर्दाश्त नहीं करते थे। कहते थे 'बेटा जी! गाना हराम तो हइ हय, मनहूस भी होता है। जिस घर में एक बार तबला या घुंघरू बज गये, उस घर के सामने एक न एक दिन दिवाले और कुर्की का ढोल बजेगा ही बजेगा। वो घर उजड़े ही उजड़े, इसे मेरी वसीयत जानो'। वसीयत के सम्मान में मियां अहसान इलाही इस सस्वर मनहूसियत की व्यवस्था मेरे घर करवाते थे, लेकिन खुदा का करम, मरहूम की भविष्यवाणी के अनुसार हमारे घर के सामने कभी कुर्की का ढोल नहीं बजा। किसी भी घर के सामने नहीं बजा, जबकि इस अंतराल में हमने (किराये के) नौ-दस घर बदले। मियां अहसान इलाही अपने घर में गाना केवल तीन सूरतों में जायज समझते थे। पहला, गाने वाली जिंदा हालत में न हो, मतलब ये कि उसके गाने का सिर्फ रिकार्ड या टेप हो। दूसरे, उनके घर में गाने वाला बिल्कुल तन्हा गाये, यानी न तबले की संगत हो और न उनके अलावा कोई और सुनने वाला मौजूद हो। ये अंदेशा भी न हो कि गाने के बोल समझ में आ जायेंगे यानी रागिनी पक्की हो। तीसरे, गाने वाले को दाद के सिवा कुछ और न देना पड़े, मतलब ये कि गाने वाला फ्री में गाना गाये। मिर्जा कहते हैं कि इन पवित्र शर्तों और नियमों के बाद जो चीज अस्तित्व में आयेगी वो वालिद मरहूम की वसीयत हो सकती है, गाना हरगिज नहीं।

मियां अहसान इलाही इस वक्त कमरे के पिछले हिस्से में एक ऊंचे अस्पताली बेड पर नई रेशमी दुलाई ओढ़े ऊंघा-नींदी की हालत में लेटे थे। दायीं दीवार पर जवानी की दो तस्वीरें टंगी थीं। एक में वो मौलाना हसरत मोहानी के साथ खड़े थे। दूसरी में वो बंदूक का बट मुर्दा नीलगाय की थूथनी पर रखे खड़े मुस्कुरा रहे थे। दोनों तस्वीरों के नीचे उनकी नई व्हील-चेयर रखी थी। उनके सिरहाने एक ऊंचे स्टूल पर वो कीमती दवाएँ सजी थीं जिनके बेअसर और नकारा होने का वो अधजिंदा इश्तिहार थे। उस वक्त तो मुझे उनकी याददाश्त का कायल होना पड़ा, इसलिए कि उन्होंने मेरे आतिथ्य के लिए फ्रेस्को से मेरी पसंद की गर्म जलेबियां और नाजिमाबाद के मुल्ला हलवाई के गुलाब जामुन मंगवाये थे। दायीं तरफ दीवार से लगे सागौन के किंग साइज बेड पर तकिये नहीं थे। उनकी बेगम की मौत को दो महीने हुए थे। दरवाजे के सामने वाली खिड़की के कार्निस पर एक छोटा-सा कैसेट प्लेयर और उन मुशायरों के टेप रखे थे, जो बीते पैंतीस बरसों में इस लॉन पर हुए थे और जिसके लिए घास ढाका से, गुलाब और पाम के पेड़ पिंडी और श्रीलंका से मंगवाये थे। फालिज के कारण पंखा, एयरकंडीशनर, खिड़कियां, बुरी खबरें, बच्चों का आना सब बंद थे। मैंने सोचा कि उनको सुनाई देने में भी कठिनाई होने लगी है - मैंने जरा ऊंची आवाज में दुहराया -

'हमारे यार - जानी मुनव्वर हुसैन मर गये।'

'हां, मुझे किसी ने बताया था,' उन्होंने बड़ी लड़खड़ाती आवाज में कुछ कहा, जिसका मतलब मैंने यही समझा। मुझे कुछ ऐसा महसूस हुआ जैसे वो इस विषय पर बात नहीं करना चाहते थे।

मेरी बात पर वो अपना ध्यान बीस-पच्चीस सेकेंड से अधिक देर तक फोकस नहीं कर पा रहे थे और इस छोटे-से कोंदे में अपनी बात कहने में मुझे कठिनाई हो रही थी।

वो बात ये थी कि अट्ठाईस साल कराची में रहने के बाद मैंने जनवरी 1979 में लंदन जाने के लिए सामान बांधा तो पहले अपने दोस्तों (जिनके नाम खानापूरी के लिए मियां अहसान इलाही और मुनव्वर हुसैन मान लीजिए, नाम में क्या रखा है। दोस्त को किसी भी नाम से पुकारें, फूलों ही की खुशबू आयेगी।) की बातें और यादें उन्हीं की आवाज में टेप पर सुरक्षित कीं। विस्तृत नोट भी लिए और याददाश्त पर आधारित दस चरित्र-चित्रण और लेख लंदन में बड़ी तेजी से लिख डाले। फिर आदत के अनुसार पाल में लगा दिये कि डेढ़-दो साल बाद निकाल के देखेंगे कि कुछ दम है भी या निरा खौरा है। मियां अहसान इलाही और मुनव्वर हुसैन से दुबारा उनके जपने की अनुमति चाही तो उन्होंने बिना किसी शर्त के प्रसन्नता के साथ दे दी। मैंने साफ करने के लिए लेख निकाल कर देखे तो एक अजीब समस्या से दो-चार हुआ - ऐसा लगा जैसे ये सब किसी और ने लिखा है। ये तो बिल्कुल स्पष्ट था कि ये दो किताबों का मैटर है। मैं एक पुलंदे से दो किताबें निकालने का जतन कर रहा था कि मुनव्वर हुसैन का एक संक्षिप्त पत्र मिला, जिसमें उन्होंने लिखा था कि मुझे तो निजी तौर पर कोई विरोध नहीं, लेकिन संभव है इनका छपना मेरे करीबी लोगों को अच्छा न लगे। इसलिए इन बातों और यादों को मेरे नाम से न जोड़ा जाये। इससे पहले कि मैं कराची जा कर उनसे इस विषय पर विस्तृत बातचीत करूं, दो-तीन महीने बाद उनका देहांत हो गया।

मेरी कथा सुनकर मियां अहसान इलाही ने टूटे-फूटे लहजे में कहा कि मुझे तो कोई विरोध नहीं, आप जैसा उचित समझें करें, फिर कहने लगे बहुत दिन हो गये अब पाकिस्तान आ भी जाइए। हमारे बाद आये तो क्या आये। आंखें भी बिल्कुल जाती रहीं, कभी-कभी मुझे आपका चेहरा याद नहीं आता - ये कह कर फूट-फूट कर रोने लगे। पैंतीस साल में मैंने उन्हें दूसरी बार रोते देखा।

अब मैं अजीब परेशानी से घिर गया। दोनों की यादें और बातें एक-दूसरे में कुछ इस तरह गुंथी और गुंधी हुई थीं कि इन जुड़वां सियामी लेखों को ऑपरेट करके अलग करना मेरे बस का काम न था। न ये संभव था कि एक के नाम, जगह और परिचय को तो प्रकट कर दूं और दूसरे के नाम और घटनाओं को बदलकर कहानी की पोशाक पहना दूं। इन हालात में मेरे लिए इसके सिवा और कोई चारा नहीं था कि सारे लेखों को एक बार में ही रद्द करके न केवल नाम और जगह बदल दूं बल्कि शुरू से अंत तक सब कुछ fictionalise कर दूं, जिसका इन दोनों से कोई संबंध न हो। और मैंने यही किया।

चुनांचे 'खोया पानी' के पांच कहानीनुमा निबंधों में जो कुछ आप पढ़ेंगे, उसका इन दोस्तों के जीवन की घटनाओं या उनके साथियों, बुजुर्गों और मिलने वालों से कोई संबंध नहीं है। विनम्र निवेदन है कि फिक्शन को फिक्शन ही समझ कर पढ़ा जाये, अगर कोई घटना सच या चरित्र अस्ली नजर आने लगे तो इसे संयोग समझा जाये। लगभग सारी घटनाएँ और चरित्र फर्जी हैं। अलबत्ता जिन प्रसिद्ध लोगों का जिक्र जहां कहीं बुराई या आलोचना के लिए आया है, उसे झूठ न समझा जाये। इतना अवश्य है कि मैंने अपनी पूरी कोशिश-भर मुनव्वर हुसैन और मियां अहसान इलाही के बातचीत के ढंग, आपस की नोक-झोंक के बीच चिंगारी उड़ाते हुए वाक्यों को ज्यों-का-त्यों रखने की कोशिश की है।

यूं भी इससे क्या अंतर पड़ता है कि फिक्शन है या सच्ची घटना या इन दोनों का मिश्रण जिसे आजकल Faction (Fact+Fiction) कहा जाता है। एक चीनी विद्वान का कथन है कि इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि बिल्ली काली है या सफेद - देखना ये चाहिए कि वो चूहे पकड़ सकती है या नहीं।

इस पृष्ठभूमि का वर्णन और स्पष्टीकरण मुझ पर इसलिए भी आवश्यक है कि इस किताब का अस्ली केंद्र, प्रस्तावक और कारण - दो पुराने दोस्तों का साथ और हंसी-मजाक था, जो मेरे जीवन का सर्वाधिक मूल्यवान काल है। वो दोस्तों के साथ के हर क्षण को एक उत्सव समझ कर बिताते थे, इस ऋण और महान कृपा को प्रकट न करना अनुचित होगा।

जिस उखड़ी-उखड़ी बातचीत का ऊपर जिक्र हुआ है, उसके कुछ ही दिन बाद मियां अहसान इलाही भी अपने रब से जा मिले और देस सूना कर गये, और अब जबकि मैं एक अंतरराष्ट्रीय बैंक के धीन ग्यारह साल लंदन में बिताने के बाद अपने वतन जाने की तैयारी कर रहा हूं तो, उनका गिला और शिकवा सही साबित हो रहा है।

पीछे मुड़कर देखता हूं तो निजी, साहित्यिक, व्यावसायिक, राजनीतिक और सामाजिक आधार से इस नकारा-काल में घाटे के सिवा कुछ दिखाई नहीं पड़ता। हां! विदेश घूमने और देश से दूर रहने का एक लाभ यह देखा कि देश और देशवासियों से प्यार न केवल बढ़ जाता है बल्कि अहैतुक हो जाता है।

सफर करदम बहर शहरी दुवेदम
    बलुत्फो - हुस्ने - तोकस रानदीदम

हानि ये कि हर सूचना और अफवाह जो उधर से आती है, दिल दहलाने और खून जलाने वाली होती है। पाकिस्तान की अफवाहों की सबसे बड़ी खराबी यह है कि सच निकलती हैं। ये क्रम दस-ग्यारह साल तक चले तो भावुक आदमी की हालत सिस्मोग्राफ की-सी हो जाती है - जिसका काम ही भूकंपों के झटके रिकॉर्ड करना और हर समय कांपते रहना है। यूं लगता है कि हमारी राजनीति का मसाला ज्वालामुखी से निकला है।

लीडर भ्रष्ट, विद्वान लोग स्वार्थी, जनता भयभीत-आतंकित और हर आदेश का पालन करने वाली। जब संस्थान खोखले और लोग चापलूस हो जायें तो जनतंत्र धीरे-धीरे डिक्टेटरशिप को रास्ता देता जाता है। फिर कोई डिक्टेटर देश को कुपित आंखों से देखने लगता है। तीसरी दुनिया के किसी भी देश के हालात पर दृष्टिपात कीजिए। डिक्टेटर स्वयं नहीं आता, लाया और बुलाया जाता है और जब आ जाता है तो प्रलय उसके साथ-साथ आती है। फिर वो कहानी के परंपरागत ऊंट की तरह बद्दुओं को खेमे से निकाल बाहर करता है। बाहर निकाले जाने के बाद खिसियाने बद्दू एक-दूसरे का मुंह नोचने लगते हैं फिर एक अनुपलब्ध बल्कि दुर्लभ वस्तु की खोज में निकल पड़ते हैं, मतलब ये कि अपने वाले से अधिक आज्ञाकारी ऊंट तलाश करने और उसे बुलाने की योजना बनाने लगते हैं ताकि उसकी पीठ पर बैठकर अपने खेमे में रह सकें और अपने पुरस्कार-अयोग्य मालिक यानी पिछले ऊंट पर लानत भेज सकें। ये सच्चाई है कि डिक्टेटर से अधिक प्यार-भरा और कोई नहीं हो सकता, इस माने में कि वो अपने दिल की गहराइयों से ये समझता है कि जनता और देश से जिस तरह टूट के वो प्यार करता है और जैसी और जितनी सेवा वो अकेला कर सकता है, पूरे देश के बूते का काम नहीं। वो सचमुच महसूस करता है कि उसके जिगर में सारे-जहां का दर्द ही नहीं इलाज भी है।

इसमें शक नहीं कि उसके पास उन Non-issues और फर्जी झगड़ों का निहायत इत्मीनानबख्श हल होता है जो वो अपनी करतूतों से खड़े करता है। ये कहना गलत न होगा कि समाचार-पत्रों में क्रॉसवर्ड बनाने वालों की तरह पहले वो बहुत-से हल इकट्ठे कर लेता है और फिर अपनी पहेली गढ़नेवाली बुद्धि की मदद से इनसे आड़ी-तिरछी समस्याएँ गढ़ता चला जाता है।

राय की सर्वोच्चता और सत्ता की निरंकुशता का अनिवार्य परिणाम ये कि वो ईश्वर की सृष्टि से इस तरह संबोधित होता है जैसे वो पाषाणकालीन जंगली हों और वो स्वयं उन्हें अंधकार से निकाल कर अपने नेतृत्व में लाने और वनमानुष से मनुष्य बनाने के ईश्वरी काम पर है। वो हर समय अपनी सीसा पिलाई हुई दीवार से बात करता है मगर मानवाकार अक्षरों में उस पर अंकित लिखावट उसे दिखाई नहीं देती। न्याय के अपने बनाये तराजू के ऊंचे-नीचे पलड़ों को, कभी इस पलड़े तो कभी उस पलड़े में अपनी तलवार का पासंग डालकर, बराबर कर देता है।

फिर जैसे-जैसे साम्राज्य पर अहंकार और हवस बढ़ती जाती है डिक्टेटर अपने निजी विरोधियों को ईश्वर का विरोधी और अपने चाकर-टोले को बुरा बताने वालों को देशद्रोही बताता है। जो उसके कदमों में नहीं लोटते, उन पर ईश्वर की धरती का अन्न, उसकी छांव और चांदनी हराम कर देता है। लेखकों, कवियों को शाही बिरयानी खिलाकर ये बताता है कि लिखने वाले के क्या कर्तव्य हैं और नमकहरामी किसे कहते हैं। वो ये जानता है कि साहित्य व पत्रकारिता में बिके हुए लोगों का एक कबीला होता है, उनसे वो गवाही दिलवाता है कि मेरे राज्य में बोलने, छपने और जपने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। मतलब ये कि जिसका जी चाहे, जिस छंद या विधा में स्तुति लिखे और पढ़े। बल्कि स्तुति-काव्य छंद, बुद्धि से परे भी हो तो कोई बात नहीं।

जैसे और दौर बीत जाते हैं, ये दौर भी बीत गया। लेकिन कुछ लोग ऐसे आतंकित और चढ़ते सूरज की पूजा के इतने आदी हो गये थे कि सूरज डूबने के बाद भी सिजदे में पड़े रहे कि न जाने कब और किधर से निकल आये। कभी किसी ने कौली भरके जबरदस्ती खड़ा करना भी चाहा तो मालूम हुआ कि खड़े नहीं हो सकते। सारे जोड़ अकड़ कर रह गये हैं।

अर्जेंटाइना हो या अलजजाइर, तुर्की हो या बांग्लादेश, इराक हो या मिस्र इस दौर में तीसरी दुनिया के हर देश में लगभग यही ड्रामा खेला जा रहा है। सेट, डायलॉग और मास्क के परिवर्तन के साथ।

इस उपन्यास में लिखे गये लेख जो अपने स्टाइल और जानबूझ कर रचे गये फैलाव बल्कि बिखराव के कारण नॉवल के निकट हैं, इसी काल की कड़वाहटें हैं। इनमें से सिर्फ पांच इस उपन्यास में शामिल हैं। कहते हैं किसी ने एमिनॉल जोजफ सीज से पूछा कि आपने फ्रांस की क्रांति में कौन-सा कारनामा किया तो उसने जो दो शब्दों का जवाब दिया वो इतिहास का अंग बन गया, "I servived!" यानी मैंने अपने-आप को बचा लिया। वतन और अपनों से ग्यारह साल की दूरी का जो परिणाम स्वभाव और जीवन पर पड़ता है, उसकी परछाइयां आपको जहां-तहां इन पंक्तियों में नजर आयेंगी। यूं लंदन बहुत दिलचस्प जगह है और इसके अलावा इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती कि गलत जगह पर स्थित है। थोड़ी-सी कठिनाई जुरूर है कि आसमान हर समय बादलों और कोहरे से घिरा रहता है। सुब्ह और शाम में अंतर पता नहीं लगता। इसलिए लोग A.M. और P.M. बताने वाले डायल की घड़ियां पहनते हैं। मौसम ऐसा है जैसे किसी के दिल में नफरत भरी हो, घर इतने छोटे और गर्म कि लगता है कमरा ओढ़े पड़े हैं। बकौल फिलिप लेकिन ये कैसी मजबूरी कि -

"Nowhere to go but indoors"

अच्छाई और सुंदरता और शालीनता में अंग्रेज का जवाब नहीं। धर्म, राजनीति और सेक्स पर किसी और कैसी भी सभा में बात करना अशिष्टता और परले दर्जे की बुराई समझते हैं, सिवाय पब और बार के। गंभीर और आवश्यक विषयों पर बातचीत सिर्फ नशे की हालत में ठीक समझते हैं। बेहद हमदर्द, कारवाले इतने शिष्ट कि इकलौते पैदल चलने वाले को रास्ता देने के लिए अपनी और दूसरों की राह खोटी करके सारा ट्रैफिक रोक देते हैं। मिर्जा अब्दुल वदूद बेग, जो सदा के भावुक ठहरे, कहते हैं कि बेतहाशा जी चाहता है कि जेब्रा-लाइन पर ही खड़े होकर, पहले सब को झुक-झुक कर अलग-अलग कोर्निश बजायें, फिर सड़क पार करें।

कफस में कोई अजीयत नहीं मुझे सय्याद
    बस एक हश्र बपा बालो - पर में रहता है

कोई लिखने वाला अपने लोगों, अपने समकालीनों, अपने देश-समाज की समस्याओं, लोक-परंपरा और कल्चर से कटकर कभी कोई जीवित और अनुभव की दहकती कुठाली से निकली हुई महान कृति का निर्माण नहीं कर सकता। ब्रिटेन में रहने वाले एशियाइयों में सौ में निन्यानवे उन सुंदर पेड़ों के नाम नहीं बता सकते जो उनके मकानों के सामने न जाने कब से खड़े हैं। (रहा सवाल ब्रिटिश आदमी का तो उसने पेड़ों को कभी नोटिस ही नहीं किया।) न इन रंग-बिरंगे पक्षियों के नाम जो मुंह-अंधेरे और शाम-ढले इन पर चहचहाते हैं, और न उस गर्लफ्रेंड के बालों का शेड बता सकते हैं, जिसके साथ रात भर बड़ी रवानी से गलत अंग्रेजी बोली। गोल्डन-ऑबर्न, कॉपर-ऑबर्न, ऐश-ब्लॉंड, चेस्टनट-ब्राउन, बरगंडी-ब्राउन। इनकी लालची आंखें तो 'जो कुछ भी हो, खुदा की कसम, लाजवाब हो' पर आकर ठहर जाती हैं। दूसरे, देश का जीवन, उसके समाज का अनुभव, उसकी समस्याओं की समझ और पकड़ इतनी सरसरी और हल्की होती है कि कभी म्यूजियम, आर्ट गैलरी, थियेटर, नाइ टक्लब, सोहो की चमक-दमक, वैसी गलियों की परिक्रमा, ईस्ट-एंड में अपमानजनक 'मगिंग' या चियरिंग-क्रॉस पर ग्राहकों की प्रतीक्षा करती वेश्याओं के ध्यानाकर्षण से आगे नहीं बढ़ पाती। बहुत तीर मारा तो ब्रिटिश नागरिकता हासिल करके वो रही-सही इज्जत भी गंवा दी, जो टूरिस्ट या मेहमान मजदूर होने के कारण उपलब्ध थी। ब्रिटिश पासपोर्ट और देशवासियों की बेबसी का प्रतिशोध लेने के लिए किसी अंग्रेज औरत से शादी कर ली और अपनी तरफ से सारे अंग्रेजों को नाड़े के रिश्ते में बांध कर डाल दिया। नख-शिख और जातीय दृष्टि से अंग्रेजों का स्टॉक बहुत अच्छा है। कद, काठ, रंग, रूप और तीखे तरशाये नैन नक्श के कारण इनकी गिनती खूबसूरतों में होती है। मिर्जा कहते हैं कि बदसूरत अंग्रेज औरत Rarity है, बड़ी मुश्किल से दिखाई पड़ती है, यानी हजार में एक। पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी इसी औरत से शादी करता है, लेकिन अंग्रेज औरत से शादी करने से न तो इंग्लैंड फत्ह होता है, न समझ में आता है बल्कि जैसे-जैसे समय बीतता है, खुद औरत भी समझ में नहीं आती। चुनांचे देश-निकाला दिया गया साहित्यकार (चाहे उसने बेहतर वेतन और बदतर व्यवहार की चाह में खुद को देश निकाला दिलवाया हो या निजी और राजनैतिक मजबूरी के कारण आर्थिक रूप से उन्नत देश-निकाला स्वीकार किया हो) घूम-फिर के उसी छोड़ी हुई मंजिल और बीते हुए जीवन का चित्रण करता है जिसे दूरी, निर्वासन और नॉस्टेलजिया ने अब आउट ऑफ फोकस करके ग्लेमेराइज भी कर दिया है। लंदन में निर्वासित उर्दू साहित्यकारों का भी कुछ ऐसा ही हाल है।

कोई उनकी बज्मे - जमाल से कब उठा , खुशी से कहां उठा
    जो कभी उठा भी उठाये से तो इसी तरफ निगरां उठा

लंदन में इस दरबार से बहिष्कृत पर क्या बीती और बुद्धि को चमका देने वाले कैसे-कैसे कपाट खुले, यह एक अलग दास्तान है, जिसमें कुछ ऐसे पर्दानशीनों के नाम आते हैं, जो साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। इसे जल्द ही अलग किताब के रूप में सामने लाऊंगा।

इस कथानक के अधिकतर चरित्र अतीत-पूजक, अतीत-ग्रस्त हैं। इनका मूल रोग नॉस्टेलजिया है। जब मनुष्य को वर्तमान से अतीत अधिक सुंदर दिखाई देने लगे और भविष्य दिखाई देना बंद हो जाये तो समझ लेना चाहिए कि वो बूढ़ा हो गया है। यह भी याद रहे कि बुढ़ापे का जवानीलेवा हमला किसी भी उम्र में... विशेष रूप से जवानी में हो सकता है। अगर अफीम या हेरोइन उपलब्ध न हो तो उसे अतीत की याद और फैंटेसी में, जो थके- हारों का अंतिम आश्रय-स्थल है, खुशी महसूस होती है। जैसे कुछ बहादुर और कड़ियल लोग अपनी भुजाओं की शक्ति से अपना भविष्य आप बनाते हैं, इसी तरह वो अपने विचारों की शक्ति से अपना अतीत आप बना लेता है।

यादों की शोर मचाने वाली नदी अतीत के मैदान में बहते-बहते सपनों की मरीचिका में उतर जाती है फिर अंदर-ही-अंदर कहीं उभरती, गुम-होते स्रोतों और विचार-बगूलों में बोई हुई खेती को सींचती रहती है और कहीं अचानक किसी चट्टान से जीवन का चश्मा फूट निकलता है।

कभी-कभी कोई समाज भी अपने ऊपर अतीत को ओढ़ लेता है। गौर से देखा जाये तो एशियाई ड्रामे का अस्ल-विलेन अतीत है। जो समाज जितना दबा, कुचला और कायर हो उसे अपना अतीत उतना ही अधिक उज्ज्वल और दुहराये जाने लायक दिखाई पड़ता है। हर परीक्षा और कठिनाई की घड़ी में वो अपने अतीत की ओर उन्मुख होता है और अतीत भी वो नहीं, जो वस्तुतः था, बल्कि वो जो उसने अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार तुरंत गढ़ कर बनाया है। ...अतीत के इच्छुक, इस अतीत पूजा के परिदृश्य में घायल अहंकार का मोर-नाच देखने योग्य होता है कि मोर अपना नाच ही नहीं, अपना जंगल भी खुद पैदा करता है। नाचते-नाचते एक जादुई क्षण ऐसा आता है कि सारा जंगल नाचने लगता है और मोर चुपचाप खड़ा देखता रह जाता है।

नॉस्टेल्जिया इसी क्षण की कहानी है

घायल अहंकार अपने लिए कहां-कहां और कैसे-कैसे आश्रय-स्थल ढूंढ़ता बनाता है, यह अपनी-अपनी रुचि, पराजय के आकार-प्रकार और भागने की क्षमता पर निर्भर है। आध्यात्मवाद, सूफिज्म, समाधि, शराब, हास्य-व्यंग्य, सेक्स, हेरोइन, वैलियम, अतीत, फेंटेसी... जिसको जो नशा रास आ जाये। ऑरनॉल्ड ने हार जाने वाले, मगर हार न मानने वाले, ध्यान-धूल में लथपथ पूर्व की हार की सहनसीमा के बारे में लिखा था।

The East bow'd low before the blast

In patient, deep disdain

She let the legions thunder past

And plunged in thought again

और इस घमंड-भरी समाधि में सदियां बीत जाती हैं। सबसे गहरा और सपने दिखाने वाला नशा, जो आदमी को वर्तमान और अपने अस्तित्व से विमुख कर देता है, खुद अपने लहू में किसी सपने या विचार की मिलावट से पैदा होता है। ये नशा चढ़ जाये तो सब कुछ स्वीकार, सब कुछ बर्दाश्त।

प्राचीन काल में चीन में जिस व्यक्ति की खिल्ली उड़ानी होती थी उसकी नाक पे सफेदी पोत देते थे, फिर वो कितनी भी गंभीर बात कहता, क्लाउन ही लगता। न्यूनाधिक यही हाल व्यंग्यकार का भी होता है। वो अपनी फूलिश कैप उतार कर फेंक भी दे तो लोग उसे झाड़-पोंछ कर दोबारा पहना देते हैं। मुझे ये तो ध्यान नहीं कि बैंकरों की इस गली में सर पे पगड़ी रही या नहीं, फिर भी आप इस उपन्यास का विषय, स्वभाव और जायका अलग पायेंगे। अनुभव और कथानक स्वयं अपना स्टाइल तय करते चले जाते हैं। इकबाल खुदा के हुजूर में मुसलमानों का शिकवा, अपने उस्ताद दाग देहलवी की नखरे-चोंचले करती जबान में नहीं लिख सकते थे। मिर्जा रुसवा की 'उमराव जान अदा' और तवायफों से संबंधित मंटो की कहानियों का अनुवाद मौलाना अबुल कलाम आजाद की जिन्नाती जबान में करके उन्हें (तवायफों को) जबरदस्ती सुनाया जाये तो मुझे विश्वास है कि एक ही पेज सुनकर कान पकड़ लें और अपना धंधा छोड़ दें। वो तो वो, खुद हम अपने धंधे से तौबा कर लें कि आज वो, कल हमारी बारी है। बहरहाल इस बार विषय, कथानक और अनुभूतियां सब भिन्न थीं, सो वही लिखा जो देखा। किस्सा बयान करने वाले कलंदरों की पुरानी आदत है कि कहानी का ताना-बाना बुनते-बुनते अचानक उसका रंग, रूप और जायका बदल देते हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कहानी कहते-कहते खुद कहानी कहने वाले को कुछ हो जाता है। वो, फिर वो नहीं रहता, जो था। सो कुछ ऐसी ही लेखक के साथ बीती।

ईश्वर की कृपा से मैं अपनी शारीरिक और साहित्यिक उम्र के जिस पड़ाव पर हूं वहां मनुष्य स्तुति और निंदा दोनों से इतना विमुख हो जाता है कि न किये हुए गुनाहों को भी स्वीकार करने में संकोच अनुभव नहीं करता। चुनांचे अब मुझे ये स्वीकार करने में शर्म महसूस नहीं होती कि मैं शरीर, उसूल और स्वभाव से निराश और बहुत जल्दी हार मान लेने वाला आदमी हूं। डिप्रेशन शायद व्यंग्यकार का भाग्य है। हास्य-व्यंग्यकारों के बाबा आदम डेन सॉफ्ट पर उन्माद के दौरे पड़ते थे और उसके नैराश्य की यह स्थिति थी कि वो अपने जन्म को एक दुर्घटना समझता था, इसलिए अपनी वर्षगांठ के दिन बड़ी धूम-धाम से शोक व्यक्त करनेवाले काले कपड़े पहनता था और उपवास करता था। मार्क ट्वेन पर भी अंतिम समय में डिप्रेशन हावी हो गया था। मिर्जा कहते हैं कि इन प्रसिद्ध लोगों से तुम्हारा मेल बस इतना ही है। बहरहाल समय से पहले निराश हो जाने का एक लाभ यह पाया कि नाकामी और सदमे का डंक और डर पहले ही निकल जाता है। कई नामवर पहलवानों के घरानों में ये रीत है कि होनहार लड़के के बुजुर्ग उसके कान बचपन में ही तोड़ देते हैं ताकि आगे चलकर कोई प्रतिस्पर्धी पहलवान तोड़ने की कोशिश करे तो तकलीफ न हो। व्यंग्य को मैं बचाव का मैकेनिज्म समझता हूं। यह तलवार नहीं उस व्यक्ति का कवच है जो बुरी तरह से घायल होने के बाद इसे पहन लेता है। जेन बुद्धिज्म में हंसी को ज्ञान की सीढ़ी समझा जाता है, लेकिन सच पूछिए तो ऊंच-नीच का सच्चा ज्ञान उस समय पैदा होता है जब खंबे पर चढ़ने के बाद कोई नीचे से सीढ़ी हटा ले। मगर एक कहावत ये भी सुनी कि बंदर पेड़ की फुनगी पर से जमीन पे गिरे तब भी बंदर ही रहता है।

'हवेली' की कहानी एक त्यागी हुई ढंढार हवेली और उसके उद्दंड और क्रोधी मालिक के आस-पास घूमती है। 'धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा' में एक कस्बे के स्कूल, उसके टीचर और व्यवस्थापक के कैरीकेचर हैं। 'स्कूल मास्टर का ख्वाब' एक दुखी घोड़े, नाई और मुंशी से संबंधित है। 'शहरे दो किस्सा' एक छोटे-से कमरे और इसमें पिचहत्तर साल बिता देने वाले सनकी आदमी की कहानी है और 'कार, काबुली वाला और अलादीन बेचिराग' एक खटारा-कार, अशिक्षित पठान आढ़ती और वाचाल तथा लपाड़ी ड्राइवर का एक बड़ा कैरीकेचर है। इसमें जो केंद्रीय या तुलनात्मक रूप से अधिक उभरने वाले चरित्र हैं वो सबके-सब बहुत आम और सामाजिक रुतबे की दृष्टि से बहुत मामूली हैं, इसलिए खास कृपा-दृष्टि चाहते हैं। मैंने जीवन को ऐसे ही लोगों के हवाले से देखा, समझा, परखा और चाहा है। इसे बदनसीबी ही कहना चाहिए कि जिन बड़े और कामयाब लोगों को निकट से देखने का अवसर मिला, उन्हें मनुष्य के रूप में बिल्कुल अधूरा और हल्का पाया। किसी विद्वान का कथन है कि जितनी बड़ी मात्रा में ईश्वर ने आम आदमी बनाये हैं उससे तो यही मालूम पड़ता है कि इन्हें बनाने में उसे विशेष रूप से आनंद आता है वरना इतने सारे क्यों बनाता और सदियों-सदियों से क्यों बनाता चला जाता। जब हमें भी ये इतने अच्छे और प्यारे लगने लगें तो जानना चाहिए हमने अपने-आप को पहचान लिया। ये ऐसे ही आम लोगों का जिक्र है। इनकी अलिफ लैला एक हजार एक रातों में भी खत्म नहीं हो सकती।

हरेक फर्द जहां में वरके - नाख्वांदा

संभव है कुछ लोगों को चरित्रों की अधिकता और प्लाट का अभाव खले। मैंने पहले किसी और संदर्भ में निवेदन किया है कि प्लाट तो फिल्मों, ड्रामों, नॉविलों और साजिशों में होता है। मुझे तो दैनंदिन जीवन में दूर-दूर इसका निशान नहीं मिला। रहा चरित्र-चित्रण, तो इसमें कोई ऐब नहीं और न खूबी। अगर चरित्र केवल ऐब निकालने पर आधारित नहीं और पात्र सच्चे एवं जानदार हैं तो अपनी कहानी अपनी जबानी कहते चले जाते हैं। इन्हें तोड़-मरोड़ कर कहानी के सांचे में डालने या किसी आदर्शी शिकंजे में कसने की आवश्यकता नहीं। गिजगौल, चेखोव जीवन की छोटी-छोटी बातें अपने कैनवस पर बड़ी लापरवाही से बिखेरते चले जाते हैं। प्रूस्त ने एक पूरा नॉविल एक डिनर पार्टी की डिटेल्स बयान करने में लिख दिया है - जो Total Recall का बेहतरीन उदाहरण है। अंग्रेजी के सबसे बड़े, बिना प्लाट के नॉविल, Ulysses की कहानी 16 जून 1916 को सुब्ह आठ बजे शुरू हो कर इसी दिन खत्म हो जाती है। यूजीन ओ नील के ड्रामे Long Day's Journey into Night की भी कुछ ऐसी ही हालत है। इन प्रसिद्ध रचनाओं का हवाला देने का उद्देश्य केवल इतना है कि अगर मेरी कुछ बात नहीं बनती तो यह टेक्नीक का कुसूर नहीं, सरासर मेरी मूढ़ता और बेहुनरी है कि पेड़ गिनता रह गया, जंगल का समां न दिखा सका। न्याग्रा प्रपात का तेज, प्रताप और ऊंचाई का अनुमान लगाने के लिए इसके नीचे खड़े होकर ऊपर देखना जुरूरी है। मैं जितनी बार देखता हूं, अभिमान का मुकुट पैरों पर आ पड़ता है।

यहां एक साहित्यिक अभद्रता का स्पष्टीकरण आवश्यक है। फारसी की पंक्तियों और शेरों के अर्थ फुटनोट में देने के दो कारण हैं। पहले, नई-नस्ल के पढ़ने वालों को उनके अर्थ मालूम नहीं। दूसरे, खुद मुझे भी मालूम नहीं थे। इस पीड़ा का विस्तार ये कि मैंने फारसी सिर्फ चार-दिन चौथी क्लास में पढ़ी थी और आमदनामा के व्याकरण से इतना घबराया कि ड्राइंग ले ली हालांकि इसमें व्याकरण नहीं था, लेकिन रोने-पीटने के मौके जियादा निकले। इसमें दसवीं तक मेरी महारथ सुराही और तोता बनाने से आगे न बढ़ पायी, और मैं इन दोनों ड्राइंगों में स्पेशलाइज करने से पहले भी उन्हें बिल्कुल वैसी बना सकता था। ड्राइंग मास्टर कहता था तुम अपना नाम इतनी मेहनत और मुहब्बत से लिखते हो और तुम्हारी Lettering इतनी सुंदर है कि तुम्हें फेल करने का जी नहीं चाहता। अगर तुम स्केच के नीचे ये न लिखो कि ये अंगूर की बेल है तो तुम्हें घड़ौंची बनाने के सौ में से सौ नंबर मिलें।

तीन कृपालु ऐसे हैं जो अच्छी तरह जानते हैं कि मैं फारसी से अनभिज्ञ हूं इसलिए वह अपनी चिट्ठियों और बातचीत में केवल फारसी शेरों से मेरी चांदमारी करते हैं। दस-बारह साल तक तो मैं ये सब झेलता रहा, फिर अक्ल आयी तो ये ढंग पकड़ा कि अपने जिन दोस्तों के बारे में मुझे अच्छी तरह पता था कि फारसी पर उनकी पकड़ मेरे बराबर यानी जीरो है, उन्हें उन शेरों से ढेर करने लगा। इस काम से मेरे स्तर तथा फारसी ज्ञान के दबदबे में दस-गुना बढ़ोत्तरी और दोस्तों की संख्या में इसी अनुपात में कमी हो गयी। इस किताब में फारसी के जो शेर या पंक्तियां जहां-तहां दिखाई दें, वो इन्हीं तीन कृपालुओं की अवांछित अनुकंपाओं में से हैं। ये हैं, बिरादरम मंजूर इलाही शेख, जो स्वास्थ्य पूछने के लिए लाहौर से लंदन इंटरनेशनल कॉल भी करें तो बीमारी और उसका हाल पूछने से पहले संबंधित फारसी शेर सुनाते हैं, फिर मेरी फरमाइश पर उनका उर्दू अनुवाद करते हैं। इतने में वक्त खत्म हो जाता है और ऑपरेटर लाइन काट देता है। दूसरे दिन वो मुझे क्षमा और फारसी शेरों से भरा पत्र लिखते हैं कि माफ कीजिए कल सारा समय अनुवाद में ही नष्ट हो गया। मैंने टेलीफोन दरअस्ल ये पूछने के लिए किया था कि आपका ऑप्रेशन किस चीज का हुआ है और तबीयत कैसी है? जब से सुना है, बहुत बेचैनी है।

समय नष्ट करने पर शेख सादी ने क्या खूब कहा है मगर बेदिल ने इसी विषय को कहां से कहां पहुंचा दिया। ...वाह वाह ...दूसरे कृपालु हैं डॉक्टर जियाउद्दीन शकेब। वो जब भी ब्रिटिश लाइब्रेरी जाते हैं, बुक स्टॉल से एक खूबसूरत और समझ में आने वाला पिक्चर पोस्टकार्ड खरीदते हैं... फिर इस पर फैजी, बेदिल या तालिब के शेर से पानी फेर कर मुझे पोस्ट कर देते हैं और तीसरे हैं मुख्तार मसूद, जो मेरे ज्ञान की घाटी को भरने में चौथाई सदी से जुटे हुए हैं। अपने दिल-पसंद विषय पर घंटों मेरे आगे बीन बजाते और मजबूरन खुद ही झूमते रहते हैं। कई बार उनसे पूछा, हुजूरे-वाला आपको यह कैसे पता लग जाता है कि मुझे यह बात मालूम नहीं, मगर वो विनम्रता से काम लेते हैं। खुद जरा क्रेडिट नहीं लेते। बस, आसमान की तरफ पहली उंगली उठा देते हैं और इसी उंगली से अपना कान माफी के अंदाज में पकड़ कर अगर बैठे हों तो उठ खड़े होते हैं और खड़े हों तो बैठ जाते हैं। विनम्रता दिखाने की उनकी ये खास अदा है, जिसके दोस्त-दुश्मन सब शिकार हैं।

फारसी शेरों के जो अर्थ आप पढ़ेंगे वो इन्हीं मेहरबानों से पूछ कर लिख दिये हैं, ताकि सनद रहे और भूल जाऊं तो दुबारा उनके पास न जाना पड़े। विशेष रूप से मुख्तार मसूद साहब से, कि जब से वो आर.सी.डी. के सिलसिले में तुर्की का सरकारी फेरा लगा आये हैं और मौलाना रूमी की कब्र के आस-पास दुरवेशों का नाच फटी-फटी आंखों से देख आये हैं, फारसी शेरों का मतलब तुर्की के हवाले से समझाने लगे हैं। यूं तो हम अपने एक और पुराने मेहरबान प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस M.A.B.T. से भी संपर्क कर सकते हैं, लेकिन वो आसान शेर को भी अपने ज्ञान और समझ के जोर से अबूझ बना देते हैं। सच तो ये है कि फारसी शेर की मार आजकल के पाठक से सही नहीं जाती। विशेष-रूप से उस समय, जब वो बेतुकी जगह पर कोट किये गये हों। मौलाना अबुल कलाम आजाद तो गद्य का सजावटी-फ्रेम केवल अपने प्रिय फारसी शेर तानने के लिए प्रयोग करते हैं। उनके शेर बेतुकी जगह पर कोट नहीं होते, गद्य बेतुकी जगह पर कोट होता है। वह अपने गद्य का तमाम रेशमी कोया, अपने भेजे की लार से फारसी शेर के आस-पास बुनते हैं। लेकिन, याद रहे रेशम हासिल करने का प्राचीन काल से एक ही ढंग है कि कोये को रेशम के जीवित कीड़े समेत खौलते पानी में डाल दिया जाये। जब तक वो मर न जाये रेशम हाथ नहीं लगता।

मिर्जा कहते हैं कि गालिब की शायरी की सबसे बड़ी मुश्किल उसकी व्याख्याएँ हैं। वो न हों तो गालिब को समझना बिल्कुल मुश्किल नहीं। वो ये भी कहते हैं कि गालिब दुनिया का अकेला शायर है जो समझ में न आये तो दुगुना मजा देता है। खुदा इन तीन ज्ञानियों के बीच इस फकीर को सलामत रखे, जबसे मेरी सेहत खराब हुई है इनकी तरफ से चिंतित रहता हूं।

'किसके घर जायेगा सैलाबे - बला मेरे बाद'

एक बार मैंने मंजूर इलाही साहब से निवेदन किया, कि 'आपने अपनी दोनों किताबों में फारसी के बहुत खूबसूरत शेर कोट किये हैं, लेकिन मेरी तरह पाठकों की नई पीढ़ी भी फारसी से अनभिज्ञ है। यूं ही अटकल से समझने की कोशिश करें तो मतलब कत्ल हो जाता है। अगर अगले एडीशन में ब्रेकिट में उनका मतलब उर्दू में लिख दें तो समझने में आसानी होगी।'

सोच में पड़ गये। फिर आंखें बंद करके, बंद होठों से दिलों को जीत लेने वाले अपने खास अंदाज में मुस्कुराये और बोले, 'मगर भाई साहब! फिर मकसद कत्ल हो जायेगा।'

इस पर मिर्जा कहने लगे, 'तुमने इस किताब में जो ढेर सारे अंग्रेजी शब्द बेधड़क इस्तेमाल किये हैं, उनके बारे में भी यही कहा जा सकता है। अंग्रेज तो दूसरी भाषाओं के शब्द खास-खास मौकों पर जानबूझ कर और मजबूरी में इस्तेमाल करते हैं। जैसे, उनके खाने फीके, सीठे और बदमजा होते हैं, इसलिए रेस्टोरेंट में उनके नाम हमेशा फ्रेंच में दिये जाते हैं। फ्रेंच आज भी शालीनता और विनम्रता की भाषा मानी जाती है, अतः अंग्रेजों को कोई आर्टिस्टिक या बेहूदा बात कहनी हो तो झट फ्रेंच-वाक्य का घूंघट निकाल लेते हैं। तुम्हें तो मालूम होगा कि सेम्युअल पीपस (1633-1703) ने अपनी प्रसिद्ध डायरी (जिसमें अपनी आवारगियों और रात्रि-विजयों के हाल बड़े विस्तार से लिखे हैं) शॉर्ट हैंड में लिखी थी ताकि उसके नौकर न पढ़ सकें। जहां कोई ऐसी नाजुक जगह आती, जिसे अंग्रेज अपने परंपरागत under statement से काम लेते हुए naughty कहकर आगे बढ़ जाते हैं, तो वो उस घटना को फ्रेंच में दर्ज करता था लेकिन जहां बात इतनी अश्लील और अकथनीय हो - जो कि अक्सर होती थी - कि फ्रेंच भाषा भी सुलग उठे, तो वो उस रात की बात को धड़ल्ले से स्पेनिश भाषा में लिखता था।

अब जरा कलाओं और ज्ञान की तरफ देखें। अंग्रेजों ने पेड़ों तथा पौधों के नाम और अधिकतर कानूनी बातें लैटिन से ली हैं। ज्ञान की बातें वो सामान्यतः ग्रीक भाषा में उल्टे कौमों में लिखते हैं, ताकि कोई अंग्रेज न समझ पाये। ऑपेरा के पक्के गानों के लिए इटेलियन और दर्शन के वाक्यों के लिए जर्मन भाषा का प्रयोग करके अबूझ को असह्य बना देते हैं।'

इस विस्तृत भूमिका के बाद फरमाया, 'लेकिन हम अंग्रेजी के शब्दों का, केवल उन अवसरों पर प्रयोग करते हैं, जहां हमें विश्वास हो कि इस बात को उर्दू में कहीं अच्छे ढंग से कहा जा सकता है।'

इस आवश्यक ताकीद और डांट-डपट के बावजूद आपको अंग्रेजी शब्द जगह-जगह दिखाई देंगे। कारण ये कि मुझे उनके उर्दू समानार्थक मालूम नहीं या वो किसी सजे-सजाये डायलॉग में चिपके हुए हैं। दूसरी तरफ, आम-तौर पर प्रयोग होने के अलावा इतने गलत उच्चारण के साथ बोले जाते हैं कि अब इन्हें उर्दू ही समझना चाहिए। कोई अंग्रेज इन्हें पहचानने या अपनाने के लिए तैयार न होगा।

'स्कूल मास्टर का ख्वाब' और 'धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा' पर पुराने मेहरबान और दोस्त मुहम्मद अब्दुल जमील साहब ने दृष्टिपात किया और अपने मशवरों से लाभान्वित किया। जैसे नफासत-पसंद और संकोची स्वभाव के वो स्वयं थे, वैसे ही धीमे उनके एतराज, जिन्हें उन्होंने मेरी पांडुलिपि पर इतनी हल्की पेंसिल से नोट किया था कि उंगली भी फेर दें तो मिट जायें। कुछ ऐसी गलतियों की ओर भी संकेत किया था, जिनके करेक्शन पर लेखक किसी तरह राजी नहीं हुआ। उदाहरण के लिए, मैंने एक गर्मागर्मी के दौरान गुजराती सेठ से कहलवाया था, 'हम इस साले लंगड़े घोड़े को ले के क्या करेंगा' जमील भाई की लखनवीयत इसे स्वीकार न कर सकी। पूरा वाक्य तो न काटा मगर साले को काट कर उसके ऊपर बिरादरे-निस्बती (Brother-in-law) लिख दिया। फिर फरमाया कि हजरत ये हक-दक क्या होता है? हक्का-बक्का लिखिए। हमारे यहां हक-दक नहीं बोला जाता। निवेदन किया हक्का-बक्का में सिर्फ फटी-फटी आंखें और खुला हुआ मुंह नजर आता है। जबकि हक-दक में ऐसा लगता है जैसे दिल भी धक-से रह गया हो। बोले तो फिर सीधे-सीधे 'धक-धक करने लगा' क्यों नहीं लिखते। और हां! मुझे हैरत है कि आपने एक जगह लूती (Gay - जनखा, लौंडा) लिखा है। कलम के लिए अपमानजनक ही कहूंगा। माफ कीजिए! ये शब्द आपकी कलम को शोभा नहीं देते।

पूछा, 'तो फिर आपके यहां लूती को क्या कहते हैं?'

बोले, 'कुछ नहीं कहते।'

मैं जोर-से हंस दिया तो चौंके। दूसरे पहलू पे ध्यान गया तो खुद भी देर तक हंसते रहे। रूमाल से आंसू पोंछते हुए कहने लगे, 'ऐसा ही है तो उसकी जगह बदतमीज लिख दीजिए। तहजीब का तकाजा यही है।' यह सुनकर मैं हक्का-बक्का रह गया। इसलिए कि मैंने ये शब्द (बदतमीज) दूसरे चैप्टरों में तीन-चार जगह ऐसे लोगों के बारे में इस्तेमाल किया था, जो केवल शब्द-कोश के अर्थों में बदतमीज थे। इस तहजीबदार अर्थ के साथ तो वो मुझ पर अपने को अपमानित करने और मानहानि का मुकदमा चला सकते थे।

कुछ देर बाद कलफ लगे मलमल के कुर्ते की आस्तीन उलट कर पांडुलिपि के पन्ने पलटते हुए बोले, 'दबावखाना, संगोटियां, आर और जूझना लखनऊ के शरीफ लोग नहीं बोलते। निवेदन किया 'मैंने इसी लिए लिखे हैं।' फड़क उठे, कहने लगे, 'बहुत देर बाद आपने एक समझदारी की बात कही', फिर इस खुशी में सिगरेट से सिगरेट सुलगाते हुए बोले 'मगर मुश्ताक़ साहब, यह बोक क्या होता है? हमने नहीं सुना।' निवेदन किया, जवान और मस्त बकरा जो नस्ल बढ़ाने के काम आता है। इसके दाढ़ी होती है और बदन से सख्त बदबू आती है। मांस भी बदबूदार और रेशेदार। बोले, 'वल्लाह हमने ये शब्द ही नहीं सुना, ऐसा बकरा भी नहीं देखा। शब्द, अर्थ और मांस तीनों से बदबू आती है। मकई है, आप इसकी जगह कोई कम बदबूदार जानवर इस्तेमाल नहीं कर सकते? कराची में इस शब्द को कौन समझेगा। निवेदन किया 'वही जो मकई (कै लाने वाला, जिससे उल्टी आ जाये) को समझेगा। आपको तो गालिब का दीवान कंठस्थ है। आपको तो ये शब्द मालूम होना चाहिए कि इसका वर्णन गालिब ने अजीब ढंग से किया है। अलाई के नाम अपने चिट्ठी में लिखते हैं 'कि तुम खस्सी बकरों के मांस के कलिए उड़ा रहे होगे, लेकिन खुदा की कसम मैं तुम्हारे पुलाव, कलिए पर जलन नहीं करता। खुदा करे तुम्हें बीकानेर की मिसरी का टुकड़ा न मिला हो। जब विचार करता हूं कि मीरजान साहब इस मिसरी के टुकड़े को चबा रहे होंगे तो ईर्ष्या से अपना कलेजा चबाने लगता हूं।' खोजने की बात ये कि इस मिसरी की डली से गालिब का अभिप्राय क्या है। केवल मिसरी? सो वो तो अच्छी से अच्छी किस्म की दिल्ली में मनों उपलब्ध थी। आश्चर्य है रिसर्च करने वालों और टीकाकारों की बुरी नजर इधर नहीं गयी। हालांकि गालिब ने मिसरी के रूपक का इश्क-आशिकी के सिलसिले में एक दूसरे पत्र में भी इस्तेमाल किया है।

हजरत! ये रूहड़ किस भाषा का शब्द है। सुनने में बुरा बिल्कुल गंवारू लगता है। क्या राजस्थानी है? निवेदन किया 'खुद मुझे भी ये शक था इसलिए मैंने माजिद भाई से पूछा।'

कौन माजिद भाई?

माजिद अली साहब - भूतपूर्व सी.एस.पी. - लंदन शिफ्ट हो गये हैं। छोटे-बड़े, अपने-बेगाने, बॉस-जूनियर सब उन्हें माजिद भाई कहते हैं। सिवाय उनकी बेगम जॅहरा निगाह के, वो उन्हें माजिद चचा कहती हैं। उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि लिहाफ की पुरानी रुई को, जिसे गरीब-गुरबा हाथों से तूम के दोबारा इस्तेमाल करते हैं, रूहड़ कहते हैं।

यूं तो वो मेरे लिए पूज्य का दर्जा रखते हैं और उनका बताया हुआ हमेशा ठीक होता है, फिर भी मैंने अधिक तसल्ली के लिए पूछा, 'क्या बदाऊं में भी बोला जाता है?' चेहरे पे बनावटी मिठास और बोली में बनावटी तुतलाहट पैदा करते हुए बोले, 'देखिए! निजी बेतकल्लुफी अपनी जगह, लेकिन बदायूं को बदाऊं कहने का अधिकार केवल हम बदायूं वालों को है। यूं समझिए कि कल आप माजिद भाई को माजिद चचा कहने लगे तो लंदन पुलिस उन्हें पौली-गेमी में धर लेगी। आपका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। बहरहाल रूहड़ सही है। बदाऊं में तो फेरी वाले घर-घर आवाज लगा कर रूहड़ खरीदते थे और उसके बदले रेवड़ियां देते थे, जिन्हें अंधे आपस में बांट लेते थे।

भाषाई ज्ञान की खोज मुझे अब उस जगह ले आयी थी जहां और सवाल करना अपनी पगड़ी से खुद फुटबाल खेलने के बराबर था। माजिद भाई की बात से बात बनाने और जोड़ने की क्षमता के सामने अच्छे-अच्छे नहीं ठहर पाते। एक बार उनके बॉस (मिनिस्टर) के ऑफिस के सामने, कुछ दूर पर लोग उनके खिलाफ 'अय्यूब खां का चमचा, अय्यूब खां का चमचा' नारे लगा रहे थे। मिनिस्टर ने पूछा, 'ये लोग क्यों शोर मचा रहे हैं?' उन्होंने जवाब दिया 'सर कटलरी के बारे में कुछ कह रहे हैं।'

जमील साहब इस विस्तृत बातचीत से कुछ पसीजे - नाक से सिगरेट का धुआं निकालते हुए बोले, 'अगर आपको साफ रुई से एलर्जी है तो रूहड़ भी चलेगा। लेकिन एक बात है फेंकी हुई चीजें आपको बहुत फैसीनेट करती हैं। खैर मुझे तो अच्छी लगती हैं, किस वास्ते कि मुझे एंटीक जमा करने का शौक है। लेकिन संभव है, पढ़ने वालों को इतना अच्छा न लगे। ब्रेकिट में माने लिख दीजिएगा।'

अर्ज किया 'मिर्जा अक्सर ताना देते हैं कि तुम उन थोड़े से लोगों में हो जिन्होंने देश-विभाजन के समय अपनी छूटी हुई संपत्ति का कोई क्लेम नहीं किया। कारण यह है कि चलते वक्त तुम अपने साथ छूट जाने वाली चीजों को खोद कर, समूचा ढोकर पाकिस्तान ले आये। बदबू एक तरफ, अगर इन में से एक शब्द, जी हां, केवल एक शब्द भी दुबारा प्रचलित हो गया तो समझूंगा जीवन-भर की मेहनत सकारथ हुई।

बोले, 'फिर वही।'

अफसोस जमील साहब केवल दो चैप्टर देख पाये थे कि उनका बुलावा आ गया।

आखिर में अपनी पत्नी इदरीस फातिमा का शुक्रिया भी जुरूरी है कि जिन्होंने अपनी गलतियां बताने वाली मुस्कुराहट से जीवन-भर मेरी गलतियों की निशानदेही की है। वो सारी पांडुलिपि देख चुकीं तो मैंने कहा, 'राजस्थानी लहजा और मुहावरा किसी तरह मेरा पीछा नहीं छोड़ते - बहुत धोता हूं, पर चुनरी के रंग छुटाये नहीं छूटते।

Out, damned spot! Out, I say

हैरत है इस बार तुमने जबान की एक भी गलती नहीं निकाली। कहने लगी 'पढ़ाई खत्म होते ही इस घर में आ गई। अब मुझे कुछ याद नहीं कि मेरी जबान क्या थी, और तुम्हारी बोली क्या - अब तो जो सुनती हूं सभी ठीक मालूम होता है।'

एक दूसरे की छाप, तिलक सब छीन कर अपना लेने और सिंध तथा रावी का ठंडा मीठा-पानी पीने के बाद तो यही कुछ होना था और जो कुछ हुआ, बहुत खूब हुआ।

लंदन 16 अक्तूबर - मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी


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