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उपन्यास

खोया पानी
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

अनुवाद - तुफ़ैल चतुर्वेदी

अनुक्रम हाजी औरंगजेब खान इमारती लकड़ी के सौदागर और आढ़ती पीछे    

पतला शोरबा और सूजी का हलवा

अभी मौलाना करामत हुसैन के वजीफे को चालीस दिन भी नहीं हुए थे कि बिशारत एक और समस्या में उलझ गये जो कुछ इस तरह थी कि हाजी औरंगजेब खान, इमारती लकड़ी के सौदागर और आढ़ती - पेशावर वाले उनसे रकम वसूल करने आ धमके। उन्होंने कोई एक साल पहले बढ़िया किस्म की लकड़ी पंजाब के एक आढ़ती की मार्फत बिशारत को सप्लाई की थी, यह दागदार निकली। जब यह साल भर तक नहीं बिकी तो बिशारत ने घाटे से सात हजार में बेच दी। यह वही लकड़ी थी जिसकी चोरी, दोबारा-प्राप्ति और खराबी का हाल हम पिछले पृष्ठों में बयान कर चुके हैं। बिशारत का कहना था कि मैंने यह लकड़ी सात हजार में घाटे से बेची। खान साहब कहते थे कि आपकी आधी लकड़ी तो चोर ले गये आधी पुलिस वाले ने हथिया ली। आप इसे बेचना कहते हैं, इसके लिए तो पश्तो में बहुत बुरा लफ्ज है।

बिशारत के अनुमानानुसार लकड़ी की मालियत किसी प्रकार सात हजार से अधिक नहीं थी, उधर हाजी औरंगजेब खां उसूली तौर पर एक पाई भी छोड़ने के लिए तैयार न थे। जिसका मतलब यह था कि बिशारत बाकी रकम, यानी 2573.9.3 रुपये अपनी जेब से भरें (यह रकम आज के दो लाख रुपये के बराबर थी। खान साहब कहते थे कि आपने माल बेचने में शैतानी जल्दी दिखाई। जल्दी का काम शैतान का, सेठ! यह लकड़ी थी, बालिग लड़की तो नहीं, जिसकी जल्द-से-जल्द विदाई पुण्य कार्य हो।

एक मुद्दत से इस रकम के बारे में पत्र-व्यवहार चल रहा था। एक दिन खान साहब के दिल में न जाने क्या आई कि कानूनी नोटिस की रजिस्ट्री करायी। पेशावर जनरल पोस्ट ऑफिस से सीधे घर आये। सामान बांधा और नोटिस से पहले खुद पहुंच गये। नोटिस उनके आने के तीन दिन बाद उनकी उपस्थिति में इस प्रकार प्राप्त हुआ कि रजिस्ट्री स्वयं उन्होंने डाकिये के हाथ से छीन कर खोली, नोटिस निकाल कर फाड़ दिया और लिफाफा बिशारत को थमा दिया। ठहरे भी उन्हीं के घर पर। उस जमाने में नियम था कि आढ़ती या थोक व्यापारी आये तो उसे घर पर ही ठहराया जाता था। यूं भी बिशारत की खान साहब से खूब बनती थी। बिशारत खान साहब की मुहब्बत और आवभगत पर जान छिड़कते थे और खान साहब उनकी लच्छेदार बातों पर फिदा थे।

दिन भर एक-दूसरे के साथ झांय-झांय करने के बाद शाम को खान साहब बिशारत के साथ उनके घर चले जाते। यहां उनकी इस तरह खातिर होती जैसे दिन में कुछ हुआ ही नहीं। घर वाले उनकी आवभगत करते-करते तंग आ चुके थे। इसके बावजूद खान साहब को शिकायत थी कि यहां पतले शोरबे का सालन खा-खा कर मेरी नजर कमजोर हो गयी है। थोड़ा लंगड़ा के चलने लगे थे, कहते थे, घुटनों में शोरबा उतर आया है। रात के खाने के बाद सूजी का हलवा जुरूर मांगते, कहते थे हलवा न खाऊं तो बुजुर्गों की आत्मायें सपने में आ-आ कर डांटती हैं। प्रायः उन पूरी रानों को याद करके आहें भरते जो उनके दस्तरख्वान की शोभा हुआ करती थीं। उनका पेट ऊंची नस्ल के बकरों, मेढ़ों का कब्रिस्तान था, जिसके वो मुजाविर (झाड़ू देने वाला) थे। बिशारत ने दोपहर को उनके लिए फ्रंटियर होटल से रान और चिपली कबाब मंगवाने शुरू किये। मिर्जा ने कई बार कहा कि इससे तो बेहतर है कि 2573.9.3 रुपये देकर अपना पिंड छुड़ाओ, यह फिर भी सस्ता पड़ेगा। मगर बिशारत कहते थे कि सवाल रुपये का नहीं उसूल का है, खान साहब भी इसे अपने स्वाभिमान और उसूल की समस्या बनाए हुए थे।

पीर-फकीर जिस एकाग्रता से ध्यान और साधना करते हैं, खान साहब इससे अधिक एकाग्रता और तन्मयता भोजन में दिखाते थे। अक्सर कहते थे कि नमाज, नींद, खाने और गाली देने के बीच कोई दख्ल दे तो उसे गोली मार दूंगा। किसी अजनबी या दुश्मन या अविश्वसनीय मित्र से मिलने जाते तो गले में 38 बोर का रिवाल्वर डाल लेते। मशहूर था कि हज के समय काबे की परिक्रमा के दौरान भी रिवाल्वर अहराम (उस समय पहने जाने वाली चादर) में छुपा रखा था। खुदा ही बेहतर जानता है, हमें तो पता नहीं। दस सेर सूजी बतौर उपहार साथ लाये थे, उसी का हलवा बनवा-बनवा कर खा रहे थे। बिशारत रोज सूजी की बोरी देखते और दहल जाते, इसलिए कि अभी तो इसके समाप्त होने में बहुत देर थी। खान साहब कहते थे कि अगली बार मर्दान शुगर मिल्ज से ताजा गुड़ की बोरी लाऊंगा, सफेद चीनी खाने से खून पतला पड़ जाता है। एक दिन बिशारत ने घबरा के बातों-बातों में टोह लेनी चाही। पूछा, 'खान साहब! गुड़ से क्या-क्या बनता है?' सूजी के हलवे का गोला हल्क में फिसलाते हुए बोले, 'भाभी से पूछ लेना। इस वक्त दिमाग हाजिर नहीं। बात यह है कि घाटे, झगड़े और गुड़ से - और रोजे से भी हमारे दिमाग को एकदम गर्मी चढ़ जाता है। हम रमजान में सिर्फ हाथापाई करता है, क्योंकि रोजे में गाली देना मना है।'

 

टांगे और पाये

खान साहब अपने दस्तरख्वान और आवभगत का क्या कहना। बिशारत को पेशावर में उनके यहां मेहमान रहने का मौका मिला था। हर खाने पर बकरी या दुंबे की पूरी रान सामने रख देते। नाश्ते और चाय पर अलबत्ता मुर्गी की टांग से गुजारा करते। उनके दस्तरख्वान पर रान और टांग के सिवा किसी और हिस्से का गोश्त नहीं देखा न कभी सब्जी या मछली देखी। इसका कारण यही समझ में आता था कि बैंगन और मछली के टांगें नहीं होतीं। यह कहना तो मुश्किल है कि पेरिस के Folies bugere और Lido की कोरस गर्ल्ज का legs show देख कर खान साहब पश्तो में क्या फर्माते, लेकिन इतना हम विश्वास से कह सकते हैं कि उन्हें ऐसी टांगों से कोई दिलचस्पी नहीं थी, जिन्हें रोस्ट करके वो खा और खिला न सकें।

टांग का गोश्त रुचिकर होने के बावजूद खान साहब को बोंग की नहारी और शिरी पायों से सख्त चिढ़ थी। एक बार कहने लगे, मुझसे तो जानवरों के गंदे, गोबर में बसे हुए खुरों का शोरबा नहीं खाया जाता। हमारे फ्रंटियर में तो कोई बुड्ढा किसी कच्ची उम्र की कुंवारी से शादी कर ले तो हकीम और पड़ौसी उसे ऐसा ही गर्म पदार्थ खिलाते हैं। इससे वो आंतों की बीमारी का शिकार हो कर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। सुना है विलायत में तो खुरों से सालन के बजाय सरेश बनाते हैं। आप भी कमाल करते हैं! बकरी के पाये, भेड़ के पाये, दुंबे के पाये, भैंस के पाये, मेरे विचार में तो चारपायी के पाये आप महज इसलिए छोड़ देते हैं कि वो साफ होते हैं।

 

पिछली शताब्दी का स्टैच्यू

खान साहब सुंदर और भारी भरकम आदमी थे, उनकी बेकार बात में भी वज्न महसूस होता था। कद लगभग साढ़े छः फुट, जिसे टोपी और पगड़ी से साढ़े सात फुट बना रखा था। मगर आठ फुट के लगते थे और यही समझ कर बात करते थे। स्वास्थ्य और काठी इतनी अच्छी कि उम्र कुछ भी हो सकती थी। शरीर का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि हत्थेवाली कुर्सी पर जैसे तैसे ठुंस कर बैठ तो जाते, लेकिन जब उठते तो कुर्सी भी साथ उठती। सुनहरी मूंछें और हल्की-भूरी आंखें, बायें गाल पर घाव का निशान, जो अगर न होता तो चेहरा अधूरा दिखाई देता। तर्जनी दूसरे पोर से कटी हुई, किसी को चेतावनी देनी हो या आसमान को किसी समस्या में गवाह बनाना हो (जिसकी आवश्यकता दिन में कई बार पड़ती थी) तो ये अधकटी उंगली उठा कर बात करते। उनकी कटी उंगली भी हमारी पूरी उंगली से बड़ी थी। पास और दूर की नजर काफी कमजोर थी, परंतु जहां तक संभव हो ऐनक लगाने से बचते थे। सिर्फ चेक पर दस्तखत करने और गाली देने के बाद, जिसे गाली दी उसके चेहरे के इंप्रेशन देखने के लिए पास की ऐनक लगा लेते और उतारने से पहले जल्दी-जल्दी दूर की चीजें देखने की कोशिश करते। यह मालूमात उनकी दिन-भर की आवश्यकताओं के लिए काफी होती थी। आंखों में शरारत चमकती थी। खुल कर हंसते तो चेहरा अनारदाना हो जाता, चेहरे पर हंसी समाप्त होने के बाद उसकी अंदरुनी लहरों से पेट देर तक हिचकोले खाता रहता। जरी की टोपी पर पगड़ी का हाथ-भर ऊंचा कलफदार तुर्रा घायल अंगूठे की तरह सदा खड़ा ही रहता था। गहरा ब्राउन तुर्की कोट, 'तिल्ले' की पेशावरी चप्पल जिसमें हमारे दोनों पैर आगे-पीछे आ जायें। बेतहाशा घेर की सफेद शलवार। खान साहब एक बेहद रोबीले पिछली शताब्दी के आदमी दिखाई देते थे। कसीदे (प्रशंसा में लिखी गयी कविता) और स्टैच्यू के लिए यह आवश्यक है कि कम-से-कम डेढ़ गुना हो, लाइफ साइज न हो, खान साहब अपना स्टैच्यू आप थे।

वास्कट की जेब में जो सोने की घड़ी रखते थे उसकी जंजीर दो फुट लंबी अवश्य होगी, इसलिए कि वास्कट की एक जेब से दूसरी जेब की दूरी इतनी ही थी। जितनी देर में खान साहब की शलवार में कमरबंद डलता उतनी देर में आदमी आराम से टहल कर वापस आ सकता था। नर्वस स्टिम बेहद शक्तिशाली था। मामूली तकलीफ और बेआरामी का उनको अहसास ही नहीं होता था। एक बार धोबी ने उनकी मैली शलवार के नेफे से पेन्सिल के टुकड़े बरामद किये। खूब खाते थे और खाने के दौरान बातचीत से परहेज करते और पानी नहीं पीते थे कि ख्वामखाह जगह घेरता है। दाल को हिंदुवाना बुराई और सब्जी खाने को मवेशियों का अधिकार छीनने में गिनते थे। कड़ाही गोश्त का अर्थ सिर्फ यही नहीं होता था कि वो कड़ाही का गोश्त खायेंगे, बल्कि कड़ाही भर के खायेंगे। खैरियत गुजरी कि उस जमाने में बाल्टी गोश्त का रिवाज नहीं था वरना वो यकीनी तौर पर बाल्टी को कड़ाही से बेहतर समझते। तीतर, बटेर की हड्डियों, अंगूर, माल्टे और तरबूज के बीज थूकने को जनानी हरकतों में शुमार करते थे। अपनी शारीरिक स्थिति से स्वयं परेशान थे। घूमने-फिरने और चहलकदमी के शौकीन मगर इस शर्त पर कि हर चालीस कदम चलने के पश्चात सुस्ताने और कुछ पेट में डालने के लिए थोड़ा रुकेंगे ताकि ताजादम हो कर आगे बढ़ें यानी अगले चालीस कदम। माना कि खान साहब में इतनी फुर्ती और चलत-फिरत नहीं थी कि बढ़ कर शत्रु पर आक्रमण कर सकें, मगर लड़ाई के दौरान अगर वो उस पर सिर्फ गिर पड़ते तो वो पानी न मांगता। हाथ-पांव मारे बिना वहीं दम घुट के ढेर हो जाता। यहां उगाही के लिए आते तो कारतूसों की पेटी नहीं बांधते थे, कहते थे कि इसके बिना ही काम चल जाता है। सीने और पेट पर पेटी के निशान से एक लकीर बन गयी थी जो धड़ को दो समानांतर त्रिकोणों में आड़ा विभाजित करती थी। कहते थे जहां पहाड़ी हवायें और बंदूक की आवाज न आये वहां मर्दों को नींद नहीं आती।

उनकी कटी हुई तर्जनी का किस्सा यह है कि उनका लड़कपन था। लड़कों में लेमोनेड की गोली वाली बोतल को उंगली से खोलने का मुकाबला हो रहा था। खान साहब ने उसकी गोली पर उंगली रख कर दूसरे हाथ से पूरी ताकत से मुक्का मारा, जिससे फौरन बोतल और हड्डी टूट गयी। बोतल की गर्दन उनकी उंगली में सगाई की अंगूठी की तरह फंस कर रह गयी, दो सप्ताह बाद कटवानी पड़ी। क्लोरोफार्म सूंघने को वो मर्दों की शान के खिलाफ समझते थे, इसलिए बिना क्लोरोफार्म के आपरेशन कराया। आपरेशन से पहले कहा कि मेरे मुंह पर कस के ढाटा बांध दो। अपने विचार में कोई बहुत ही बुद्धिमानी की बात करनी हो तो बात में वज्न पैदा करने के उद्देश्य से पहले अपनी ठुड्डी पर इस तरह हाथ फेरते मानो वहां टैगोर जैसी दाढ़ी है, जो उलझी हुई है और कंघे की मुहताज है। फिर कटी हुई तर्जनी आकाश की ओर उठाते और पढ़ने की ऐनक लगा कर बोलना शुरू करते। लेकिन गंभीर और पेचीदा वाक्य के बीच कोई शोख बात या चंचल फिकरा अचानक जह्न में कौंध जाता तो उसे अदा करने से पहले आंख मारते और आंख मारने से पहले ऐनक उतार लेते, ताकि देखने वालों को साफ नजर आये।

उनकी हंसी की तस्वीर खींचना बहुत मुश्किल है। यूं लगता था जैसे वो बड़े जोर से एक लंबा कहकहा लगाना चाहते हैं, मगर किसी कारणवश उसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं। परिणामस्वरूप उनके मुंह से बड़ी देर तक ऐसी आवाजें निकलती रहतीं जैसी बैटरी खलास होने के बाद कार को बार-बार स्टार्ट करने से निकलती हैं। हंसने से पहले आम-तौर पर अपनी वास्कट के बटन खोल देते थे। कहते थे, परदेस में रोज-रोज किस से बटन टंकवाऊं।

शादी एक ही की। एक जगह लग कर काम करते रहने के कायल थे। पत्नी ने तंग आ कर कई बार उनसे कहा कि दूसरी कर लो ताकि औरों को भी तो चांस मिले।

 

लंगड़े काकरोच से शेख शादी तक

आप चाहें तो खान साहब को अनपढ़ कह सकते हैं, मगर जाहिल बिल्कुल नहीं। रची-बसी तबियत, बला की सूझ-बूझ और नजर रखते थे, जो तुरंत बात की तह तक पहुंच जाती थी। सही अर्थों में सभ्य थे कि उन्होंने इंसान और जिंदगी को बरता था, किताब के distorting mirror और आर्ट के सजावटी फ्रेम में नहीं देखा था। खुद जिंदगी जो कुछ दिखाती, सिखाती और पढ़ाती है वो सीधा दिल पर अंकित होता है।

'नजीर' सीखे से इल्मे-रस्मी बशर की होती है चार आंखें

पढ़े से जिसके हो लाख आंखें वो इल्म दिल की किताब में है

खान साहब बरसों चैक पर अंगूठा लगाते रहे जिस दिन उनका बैंक बैलेंस एक लाख हो गया उन्होंने उर्दू में दस्तखत करने सीख लिए। कहते थे, अंगूठा लगा-लगा कर सूदखोर बैंकों से ओवर ड्राफ्ट लेने में तो कोई हरज नहीं, पर हलाल की कमाई की रकम सोच-समझ कर निकालनी चाहिये। दस्तखत क्या थे, लगता था कोई लंगड़ा काकरोच दवात में नहा कर कागज पर से गुजर गया है। दस्तखत के दौरान उनका हाथ ऐसी तोड़ा-मरोड़ी से गुजरता और हर छोटा-बड़ा वृत्त बनाते समय उनके खुले हुए मुंह की गोलाई इस प्रकार घटती-बढ़ती कि एक ही दस्तखत के बाद उनके हाथ और देखने वाले की आंख में ऐंठन पड़ जाती। उस जमाने में खान साहब का एकाउंट मुस्लिम कमर्शियल बैंक में था, जहां उर्दू में दस्तखत करने वालों को स्टांप पेपर पर यह अपमानजनक जमानत देनी पड़ती थी कि अगर उनके एकाउंट में जाली दस्तखतों के कारण कोई फ्राड हो जाये तो बैंक जिम्मेदार न होगा, बल्कि यदि इसके नतीजे में बैंक को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में कोई हानि पहुंची तो उसे भी वही भरेंगे। खान साहब को जब इसका मलतब पश्तो में समझाया गया तो क्रोधित हो उठे। उर्दू बोलने वाले एकाउंटेंट से कहने लगे कि ऐसी बेहूदा शर्त मानने वाले के लिए पश्तो में बहुत बुरा शब्द है। हमारा दिल बहुत खफा है। बकते-झकते बैंक के अंग्रेज मैनेजर मिस्टर ए. मेक्लीन के पास विरोध करने गये। कहने लगे कि मेरे दस्तख्त इतने खराब हैं कि कोई पढ़ा-लिखा आदमी बना ही नहीं सकता। जब मैं स्वयं अपने दस्तखत इतनी मुसीबत से करता हूं तो दूसरा कैसे बना सकता है? आपके स्टाफ में दो दर्जन आदमी तो होंगे। सब-के-सब शक्ल से चोर, उचक्के और चौसरबाज लगते हैं। अगर इनमें से कोई मेरे दस्तखत बना कर दिखा दे तो तुरंत एक हजार इनाम दूंगा, फिर गोली से उड़ा दूंगा। मिस्टर मेक्लीन ने कहा कि मैं बैंक के नियम नहीं बदल सकता। ग्रैंडलेज बैंक में भी यही नियम हैं। हमने सारे फार्म उसी से नक्ल किये हैं। नक्ल क्या, मक्खी पे मक्खी मारी है, बल्कि इस फार्म पर तो प्रिंटर की लापरवाही से नाम भी ग्रैंडलेज बैंक का ही छपा है। खान! तुम वर्नाक्युलर की बजाय अंग्रेजी में दस्तखत करना सीख लो तो इस झमेले से अपने-आप मुक्ति मिल जायेगी। उसने अपने हुक्म में प्रार्थना का रंग भरने के लिए खान साहब की चाय और पेस्ट्री से खातिर भी की। इस आदेश के पालन के लिए खान साहब दो महीने तक अंग्रेजी दस्तखतों का अभ्यास करते रहे। जब हाथ रवां और पक्का हो गया तो चिक उठा कर सीधे मिस्टर मेक्लीन के कमरे में प्रवेश किया और रू-ब-रू दस्तखत करके दिखाये। वो इस तरह कि पहले हाथ ऊंचा करके चार-पांच बार हवा में दस्तखत किये और फिर एकदम कलम कागज पर रख कर फर्राटे से दस्तखत कर दिये। उसने तुरंत एक स्लिप पर एकाउंटेंट को आदेश दिया कि उनकी इंडेम्निटी रद्द समझी जाये। मैं उनके अंग्रेजी दस्तखत की जो उन्होंने मेरी उपस्थित में इस कार्ड पर किये हैं, पुष्टि करता हूं।

हुआ सिर्फ इतना था कि खान साहब ने इन दो महीनों में उर्दू दस्तखत को दायें से बायें करने के बजाय बायें से दायें करने का अभ्यास किया और निपुणता प्राप्त कर ली। इस दौरान नुक्ते और मर्कज गायब हो गये। मिस्टर मेक्लीन के सामने उन्होंने यही दस्तखत बायें से दायें किये और सारी उम्र इसी अंग्रेजी शैली पर चलते रहे। चेक और कारोबारी कागजों पर इसी प्रकार दस्तखत करते। परंतु यदि किसी दोस्त रिश्तेदार को चिट्ठी लिखवाते या कोई हलफनामा दाखिल करते, जिसमें सच बोलना आवश्यक हो, तो आखिर में उर्दू में दस्तखत करते। मतलब यह कि कलम दायें से बायें चलता। खान साहब दस्तखत करने की कला में अब इतनी निपुणता प्राप्त कर चुके थे कि अगर जापानी में दस्तखत करने के लिए कहा जाता तो वो इसी लेटे हुए काक्रोच को मूंछें पकड़ के सर के बल खड़ा कर देते।

खान साहब को कभी बहस जल्दी निपटानी होती या विरोधी और संबोधित को महज बोझों मारना होता तो कहते, शेख सादी ने फरमाया है कि... उन्होंने अपने समस्त स्वर्णिम तथा अस्वर्णिम वचन शेख सादी के पक्ष में त्याग दिये थे। हमें विश्वास है कि शेख सादी भी यदि इन वचनों को सुन लेते तो वो स्वयं भी त्याग देते।

बात कितनी ही असंबद्ध और छोटी-सी हो, खान साहब उसके पक्ष में बड़े-से-बड़ा नुक्सान उठाने के लिए तैयार रहते थे। नजरअंदाज करने और समझौते को उन्होंने हमेशा मर्दानगी के विरुद्ध समझा। अक्सर कहते कि जो व्यक्ति खून-खराबा होने से पहले ही समझौता कर ले, उसके लिए पश्तो में बहुत बुरा शब्द है। इस समस्या के बाद बिशारत को एक बार बन्नू में उनके पुश्तैनी मकान में ठहरने का संयोग हुआ, देखा कि खान साहब किसी घमासान की बहस में जीत जाते या किसी प्रिय घटना पर बहुत खुश होते तो तुरंत बाहर जा कर घोड़े पर चढ़ जाते और अपने किसी दुश्मन के घर का चक्कर लगा कर वापस आ जाते। फिर नौकर से अपने सर पर एक लोटा ठंडे पानी का डलवाते कि अहंकार अल्लाह को पसंद नहीं।

 

खान साहब ने अपने हाल पर मगरमच्छ के आंसू बहाये

खान साहब दिन में दो-तीन बार बिशारत को यह धमकी जुरूर देते कि 'एक पाई भी नहीं छोड़ूंगा, चाहे मुझे एक साल तुम्हारे यहां मेहमान रहना पड़े' अक्सर यह भी कान में डालते रहते कि कबाइली शिष्टाचार में अतिथि सत्कार के तकाजे कुछ और हैं। अगर आप अतिथि से यह पूछ बैठें कि तुम कब जाओगे और इस पर वो आपका खून न कर दे तो उसकी शराफत, गैरत और वल्दियत में संदेह होगा।

सुब्ह से शाम तक दोनों बारहसिंघे आपस में सींग फंसाये फुंकार मारते। अच्छे संबंधों का वास्ता, व्यापार की रीत-रस्म, रहम की अपील और एक-दूसरे से जुल्म और धांधली से बाज रहने की वार्निंग के अतिरिक्त कोई ओछा हथियार न था जो इस झगड़े में खुल कर इस्तेमाल न किया गया हो। उदाहरण के तौर पर खान साहब अपने अनपढ़ होने की दुहाई देते। उत्तर में बिशारत स्वयं को सीख लेने वाली दृष्टि से दिखाते कि शाइर हूं, बी.ए. हूं, फारसी पढ़ी है और लकड़ी बेच रहा हूं! खान साहब अपने बिजनेस में घाटे की बात करते, तो बिशारत कहते, अरे साहब! यहां तो सिरे से बिजनेस है ही नहीं, गिरह का खा रहे हैं। बिशारत तो खैर विधवा मेम के साथ अपनी फर्जी दरिद्रता और बहुसंतान की रिहर्सल कर चुके थे। लेकिन खान साहब भी आवश्यकता पड़ने पर अपने हाल पर मगरमच्छ के आंसू बहा सकते थे। एक दिन तो उनकी अदाकारी इतनी संपूर्ण थी कि सीधी आंख से एक सचमुच का आंसू श्रीलंका के नक्शे की भांति लटक रहा था। साइज भी वही। एक बार खान साहब ने अपनी फर्जी बेचारगी का तुरुप फेंका कि मेरे हिस्से की जमीनों पर चचा ने चौथाई शताब्दी से कब्जा कर रखा है। बिशारत ने इसको इस प्रकार काटा कि अपने पेट के अल्सर पर हाथ रख कर कहा कि वो इतनी ही मुद्दत से पेट की बीमारी से पीड़ित हैं। खाना नहीं पचता, पेट में दवा और हवा तक नहीं ठहरती। खान साहब बोले, 'ओ हो। पच्चीस बरस से पेट खराब है, आप तो पोतड़ों के मरीज निकले।' वैसे इन चोंचों में आम-तौर पर बिशारत ही का पल्ला भारी रहता, लेकिन एक दिन जब खान साहब ने आधी आंसू-भरी आंख (आधी इसलिए कि दूसरी आंख मुस्करा रही थी) से यह कहा कि मेरे तो पिता का भी देहांत हो चुका है तो बिशारत को अपने आदरणीय पर बहुत गुस्सा आया कि उन्हें भी इसी समय जीना था।

शब्दों के युद्ध में विजय किसी की भी

हो, शहादत सिर्फ सच्चाई की होती है

खान साहब किसी प्रकार रकम छोड़ने के लिए तैयार न थे। बिशारत ने तंग आकर यहां तक कहा कि कौन सही है, कौन गलत, इसे भूल जाइये, यह देखिये कि आपका हमारा व्यापार, व्यवहार आगे भी रहेगा, फिर कभी कसर निकाल लीजियेगा। खुदा न करे, यह आखिरी सौदा तो है नहीं। इस पर खान साहब बोले कि खान संग मर्जान खान ने मुझे नसीहत दी थी कि दोस्त से मिलो तो ऐसे मिलो जैसे आखिरी मुलाकात है। अब के बिछड़े फिर नहीं मिलेंगे और किसी से सौदा करो तो यह समझ के करो कि आखिरी सौदा है, दोबारा यह 'दल्ला' नहीं आने का। शेख सादी कहते हैं कि बावले से बावला कुत्ता भी यह उम्मीद नहीं रख सकता कि जिसे उसने काटा है वो खुद को फिर कटवाने के लिए दोबारा-तिबारा आयेगा।

एक बार बिशारत का स्वर कुछ कटु हो गया और उन्होंने बार-बार 'खान साहब! खान साहब' कहकर ताना दिया तो कहने लगे, 'देखो सेठ। गाली-गुफ्तार करनी है तो मुझे 'खान साहब' मत कहो, 'हाजी साहब' कहके गाली दो ताकि मुझे और तुम्हें दोनों को कुछ तो शर्म आये।

बिशारत ने उनके गले में बांहें डाल कर माथा चूम लिया।

 

अरबपति और कराची की पांच सौगातें

डूबी हुई रकमों की वसूली के सिलसिले में कराची के फेरों ने खान साहब को बहुभाषी बना दिया था। हमारा मतलब है - उर्दू, फारसी और गुजराती के अलावा चारों क्षेत्रीय भाषाओं में रवानी से गाली दे सकते थे। गाली की हद तक अपने शिकार का सम्मान उसकी मातृ-भाषा में बढ़ाते थे। अगर कहीं तंगी या झोल महसूस करते या संबोधित जियादा ही बेशर्म होता तो अंत में उसके ताबूत में पश्तो की ऐसी कील ठोकते कि कई पुश्तों के आर-पार हो जाती। इसमें शक नहीं कि जैसी कोक शास्त्रीय गालियां हमारे यहां प्रचलित हैं, उनके सामने अंग्रेजी और अन्य भाषाओं की गालियां फूलों की छड़ियां और बच्चों की गांउ-गांउ प्रतीत होती है जिससे कच्चे दूध की गंध आती है। आर.के. नारायण के नॉवल इंग्लैंड और अमरीका के पाठकों के लिए जो विशेष आकर्षण रखते हैं उसमें उन देसी गालियों का भी योगदान है, जिनका वो अंग्रेजी में शाब्दिक अनुवाद करके संवाद में बारूदी सुरंगें बिछाता चला जाता है। हमारी गालियों में जो अनोखापन, जोर आजमाइश, भौगोलिक-चित्रण, कामेच्छा कूट-कूट कर बल्कि साबुत-संपूर्ण भरी है, उसका सही-सही अनुमान हमें 1975 में दुबई में हुआ। वहां के गल्लादारी बंधुओं की गिनती अरब-अमीरात और मध्य-पूर्व के अरब-पतियों में होती थी। बल्कि यह कहना चाहिये कि अत्यंत अमीर अरब-पतियों में होती थी, क्योंकि अरब-पति तो वहां सभी होते हैं। अब्दुल वहाब गल्लादारी और अब्दुल लतीफ गल्लादारी जो अरब हैं और जिनकी मातृ-भाषा अरबी है, बेहतर शिक्षा और बदतर प्रशिक्षण के सिलसिले में कुछ अर्सा कराची रह चुके हैं। हमारे आश्चर्य की सीमा न रही जब हमने देखा कि वो किसी से खफा होते हैं, या किसी अरब से उनका झगड़ा होता है और कोई अरब ऐसा नहीं, जिससे उनका झगड़ा न हुआ हो तो अरबी बोलते-बोलते उर्दू में गाली देने लगते हैं, जो अरबी के पवित्र प्रकरण में और भी गलीज लगती है। अब्दुल लतीफ गल्लादारी का कहना है कि कराची की पांच चीजों का कम-से-कम इस दुनिया में तो जवाब नहीं। जड़ाऊ जेवरात, कव्वाली, बिरयानी, गाली और इत्र। 1983 में जब उनके बैंक और बिजनेस का दीवाला निकला तो जेवर, कव्वाली, बिरयानी और इत्र तो दुश्मनों के हिस्से में आ गये, अब सिर्फ पांचवीं चीज पर गुजारा है और यह दौलत समाप्त होने वाली नहीं, जितनी देते हैं, लोग उसकी सात-गुनी लौटा देते हैं।

 

कबाब परांठे और बड़ा शत्रु -वर्ग

खान साहब छल-कपट से दूर, मिलनसार और मुहब्बत वाले आदमी थे। बहस में कितनी ही गर्मा-गर्मी हो जाये, दिल में जरा मैल नहीं रखते थे। मजाक-मजाक में दोस्तों को छेड़ने और गुस्सा दिलाने में उन्हें बड़ा मजा आता। नाश्ते में तीन तरतराते परांठे और शामी कबाब खाने और लस्सी के दो गिलास पीने के बाद दिन-भर तंद्रा की स्थिति में अधखुली आंखों से दुनिया और दुनिया वालों को देखते रहते। यह कहना गलत न होगा कि पलकों को महज आंखें ढकने के लिए इस्तेमाल करते और कठहुज्जती का जवाब जम्हाई और डकार से देते। ऐसे बेहोशी लाने वाले नाश्ते के बाद आदमी एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग कर सकता है, 'स्ट्रीम आफ कान्शियसनेस' वाला नॉवल लिख सकता है, सरकार की पंचवर्षीय योजना बना सकता है, परंतु दिमागी काम नहीं कर सकता। न ढंग से बहसा-बहसी कर सकता है। खान साहब को दूसरे दिन यह याद नहीं रहता था कि कल क्या कहा था, इसलिए नये सिरे से हुज्जत आरंभ करते, जैसे इससे पहले इस समस्या पर कभी बात नहीं हुई। फैज के मिसरे में 'उल्फत' के बजाय हुज्जत जड़ दें तो उनके वारदात करने के ढंग पर एकदम पूरा उतरता है।

वो जब मिले हैं तो उनसे हर बार

की है 'हुज्जत' नये सिरे से

किसी से जियादा देर खफा नहीं रह सकते थे, शाइरी से नफरत के बावजूद अक्सर यह शेर पढ़ते परंतु कुछ शब्दों को इतना खींच या सिकोड़ कर पढ़ते कि मिसरा वज्न और बह्र से खारिज (बाहर) हो कर गद्य बन जाता :

इंसान को इंसान से कीना नहीं अच्छा

जिस सीने में कीना हो वो सीना नहीं अच्छा

और इस पर फर्माते कि मुसलमान से कीना रखना उस पर जुल्म है। इससे तो बेहतर है कि उसे कत्ल कर दिया जाये। यह भी गर्व से फर्माते कि हम तो आजाद कबाइली आदमी हैं, उर्दू तो हमने डूबी हुई 'रकमों' की वसूली के लिए व्यापारियों से लड़ाई-दंगे के दौरान सीख ली। नतीजा यह कि उनका सारा शब्दकोश शांति की स्थिति में बिल्कुल निकम्मा और नाकारा हो जाता था। राणा सांगा के शरीर की भांति उनकी लड़ाका उर्दू पर भी 72 घावों के चिह्न थे। उनकी उर्दू का विश्लेषण करने से पता चलता था कि कहां-कहां के और किस-किस राज्य के आदमी ने रकम दबायी है। उनकी जुबान से गुजराती, हैदराबादी और दिल्ली की करखंदारी जुबान के ठेठ शब्द सुन कर अनुमान होता था कि उनकी बहस और झगड़े के डांडे कहां-कहां मिलते हैं।

 

लोक लहजा

खान साहब की बातचीत और झगड़े की भाषा पर तो खैर रुपया लेकर न देने वालों की छाप थी, लेकिन बोलते अपने ही खरे, खनकते पश्तून स्वर में थे जो कानों को भला लगता था। इसके मुकाबले में बिशारत को अपना स्वर बिल्कुल सपाट और बेनमक लगता। पश्तून उर्दू स्वर में एक नर्म-सा संकोच और तेज-ओ-ताजा महक है जो किसी भारी-भरकम और द्विअर्थी बात को स्वीकार नहीं करती। यह कौंधता-ललकारता स्वर संदेहास्पद सरगोशियों का लहजा नहीं हो सकता, इसी तरह पंजाबी उर्दू में एक खुलापन, गर्मजोशी और घुलावट की अनुभूति होती है। उसमें मैदानी दरियाओं का पाट, धीरज और दिल-दरिया पार गमक है और सहज-सहज रास्ता बनाने के लिए अपनी लहरी कगार काट पर पूरा विश्वास। बिलूच स्वर में एक हूक-सी, एक हुमकती पहाड़ी गूंज और दिल को खींचने वाली सख्त कैफियत के अतिरिक्त एक चौकन्नापन भी है, जो कठोर पहाड़ और जलहीन रेगिस्तान अपने आजादों को बख्श देते हैं। सिंधी उर्दू-स्वर लहकता, लहराता, lyrical स्वर है। एक ललक, एक मेहराब लहर जो अपने-आपको चूम-चूम कर आगे बढ़ती है। उर्दू के क्षेत्रीय स्वरों में वो लोक-ठाठ, मिठास और रस-जस है, जिसका हमारे घिसे-पिटे टकसाली और शह्री स्वर में दूर-दूर पता नहीं मिलता, लोक-स्वर के समावेश से जो नया उर्दू स्वर उभरा है उसमें बड़ी ताजगी, लोच और समाई है।

 

'भरे हैं यहां चार सिम्तों से दरिया '

बहस और तकरार के मध्यांतर में खान साहब पैदल सैर को निकल जाते। कोहाट और बन्नू के दस-पंद्रह भक्त जो सारे दिन वास्कटों में पिस्तौल रखे, बाहर प्रतीक्षा में बैठे होते, उनकी अर्दली में चलते। ये उनके कमांडोज थे जो उनकी कटी हुई उंगली के आधे इशारे पर अपनी कमर से बारूद बांध कर किसी भी प्रकार का खतरा मोल लेने को तत्पर रहते थे। खान साहब ने उनके लेटने, बैठने और खातिरदारी के लिए बाहर तीन चारपाइयां और काबुली समोवार रखवा दिया था। उसमें दिन-भर चाय उबलती रहती, जिसके निकास के लिए बिशारत को टीन की नालीदार चादरों का एक अस्थायी टायलेट बनवाना पड़ा। इसमें वो यूज्ड ब्लाटिंग पेपर रखवा देते थे। लोगों ने कच्ची रोशनाई की शिकायत की तो उन्होंने पिछले दिन का अखबार रखवाना शुरू कर दिया, जो हर सरकार का तरफदार रहा था। अब यह टायलेट पेपर के तौर पर उपयोग किया जाने लगा। इसमें कम-से-कम अखबार के साथ जियादती नहीं थी। दिन भर गप्पें, चुहलें और वज्न उठाने के मुकाबले होते रहते। जवान अपने रोजगार, खेल-कूद, महंगाई, सिनेमा, खाने-पीने और निशानेबाजी की बातें करते, जबकि अधेड़ उम्र वाले जियादा चीनी की चाय और गंदे लतीफों से खुद को रीचार्ज करते रहते। दोनों की गर्मी से घड़ी-भर के लिए गुलाबी बुढ़ापे की ठिरक दूर हो जाती तो ठरक सर पे चढ़ के ऐसी दीवानी बातें करने लगती कि जवान सुन के शर्मा जाते। जिसकी मूंछ में जितने अधिक सफेद बाल होते या कमर जितनी अधिक झुकी होती, उसका लतीफा उतना ही दूर-मार और नशीला होता।

खान साहब को कभी कोई जियादा ही मजेदार किस्सा सुनाना होता तो कल्ले में गुड़ या मिश्री की डली दबा कर सी-सी-सी करते हुए चाय पीते जाते। झूमते हुए कहते, यारा जी! समरकंद और फर्गाना में इसी तरह पी जाती है।

फुर्सत का सारा समय खान साहब कराची और कराची वालों को देखने और जो कुछ देखते उस पर लानत भेजने और भिजवाने में गुजारते। कहते थे कराची में सांस लेने के लिए भी खुद कोशिश करनी पड़ती है। कबाइली इलाके की हवा हल्की और शफ्फाक (प्रदूषण रहित) होती है अपने-आप गोली की तरह अंदर दाखिल हो जाती है, खास-तौर पर जाड़े में। सुब्ह रेडियो कह रहा कि हवा में नमी का प्रतिशत 90 है, इसका मतलब तो यह हुआ कि कराची में दूध वाले हवा में सिर्फ दस प्रतिशत मिला कर दूध बना लेते हैं। आप जिन अवसरों पर नारे, शेर और वजीफे पढ़ने लगते हैं, वहां हम ठांय से गोली मार देते हैं। मैं इतने दिन से यहां हूं, शहर के एक आदमी के हाथ में बंदूक नहीं देखी। हमारे यहां तो निकाह के वक्त भी पिस्तौल साथ रखते हैं कि पता नहीं मेहर पर गोली की नौबत कब आ जाये। किसी-किसी दुल्हन का बाप और रिश्तेदार एकदम खबीस, कंजूस, वाहियात और बेहूदा निकलता है। मैं तो एहतियात के तौर पर छोटी मशीनगन ले गया था, उससे मेरे मामू ने 1937 में खैसूरा के पास कतूरी खैल इलाके में एक पहाड़ी खोह से तीन गोरे मार गिराये थे, जिनमें एक कप्तान था। उसकी सूरत बुलडाग जैसी थी। उस सुअर के बच्चे ने फकीर ऐपी के अनगिनत मुरीद (भक्त) शहीद किये थे। मामू ने उसके कान और नाक काट कर चील कौओं को खिला दिये। दूसरे गोरे की जेब से, जो मामूली सिपाही था, उसकी झुकी हुई कमर वाली बूढ़ी मां और एक साल की बड़ी प्यारी-सी बच्ची के फोटो निकले। बच्ची के हाथ में गुड़िया थी। फोटो देख कर मेरा मामू बहुत रोया। लाश के हाथ पर से जो सोने की घड़ी उसने उतार ली थी, वो वापस बांध दी। लाश को छांव में रखकर वापस जा रहा था कि थोड़ी ही दूर चल कर कुछ खयाल आया। वो पल्टा और अपनी चादर उतार के उस पर डाल दी।

तो मैं यह कह रहा था कि मैं मामू की मशीनगन से लैस हो कर गया था। बच्चों, काजी और नाई के अलावा कोई और निहत्था नहीं था। ठीक निकाह के समय लड़की वाले पसर गये। कहने लगे कि मेहर एक लाख का होगा। इस पर मामू झगड़ा करने लगा, वो शरई (धार्मिक कानून के अनुसार) मेहर यानी पौने तीन रुपये भर चांदी पर अड़ा था, जिसका कीमत उस समय तेरह रुपये साढ़े पांच आने थी। कबीले के एक बुद्धिमान बुजुर्ग ने सुझाव पेश किया कि कुछ लड़की वाले कम करें, कुछ लड़के वाले मेहर बढ़ायें। दोनों पार्टियां औसत रकम पर समझौता कर लें। इस पर एक और बुद्धिमान बोला, सरदार! होश करो, तेरह रुपये साढ़े पांच आने और एक लाख के बीच कोई औसत रकम नहीं होती। ऐसे में औसत तलवार से निकलता है।

राड़-रौला बढ़ा तो मैंने सेहरा हटा कर जोर से कहा, मैं तो पांच लाख का मेहर बांधूंगा, इससे कम में मेरे खानदान की बेइज्जती होगी। ये सुन कर मामू सन्नाटे में आ गया। मेरे कान में कहने लगा 'क्या तू आज पोस्त पी के आया है? पांच लाख में तो कलकत्ते की गौहर जान और एक सौ एक रंडियों का नाच हो सकता है।' मैंने कहा, 'मामू! तू बीच में मत बोल! तूने जिंदगी में बायीं आंख मींच कर दायीं आंख से राइफल का निशाना बांध कर सिर्फ अपने दुश्मन को देखा है या फिर कलदार रुपयों पर क्वीन विक्टोरिया का चेहरा देखा है। तूने दुनिया नहीं देखी, न तुझे मर्दों की आन का कुछ खयाल है, अगर मुझे देना ही नहीं है तो बड़ी रकम मारूंगा। छोटी रकम मारना जलीलों और दय्यूसों का काम है।

मुझे आये इतने दिन हो गये, कराची में एक भी दंगा फसाद नहीं हुआ, क्या यहां रिश्तेदार नहीं रहते? क्या यहां सब एक दूसरे को अनाथ, लावारिस समझ के माफ कर देते हैं? परसों की बात है मैं एक दोस्त से मिलने लांडी गया था। बस-कंडक्टर ने मेरी रेजगारी नहीं लौटायी। मैंने उतरते समय गाली दी तो सुनी-अनसुनी कर गया। मैंने दिल में कहा, 'बदबख्ता! मैंने गाली दी है, नसीहत तो नहीं दी, जो यूं एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल दी।'

इस लतीफे के बाद बड़ी देर तक उनके हल्क से कमजोर बैट्री वाली कार को बार-बार स्टार्ट करने की आवाजें निकलती रहीं और शरीर जेली की तरह थुलथुलाता रहा।

परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि खान साहब को कराची बिल्कुल पसंद नहीं आया। कहते थे कराची में अगर कराची वाले नहीं हों और समुद्र डेढ़ दो सौ मील परे हट जाये तो ट्रक और घोड़े दौड़ाने के लिए शहर बुरा नहीं। कराची के कुछ हिस्से उन्हें बेहद पसंद आये। ये कच्ची बस्तियों के वो इलाके थे, जो तहसील कोहाट जैसे लगते थे और जहां एक जमाने में उनकी जवानी ने, उनके कहे अनुसार पूरी तहसील को अपनी लपेट में ले लिया था।

 

यार जिंदा, फजीहत बाकी

बिशारत और खान साहब के बीच हुज्जत और तकरार सिर्फ दफ्तरी समय यानी 9 से 5 के बीच होती, जो हार-जीत का फैसला हुए बिना कल तक के लिए टल जाती, ताकि ताजा-दम हो कर झगड़ सकें।

सुल्ह है इक मुहलते-सामाने-जंग

करते हैं भरने का यां खाली तुफंग

सुना है पुराने जमाने में पड़ोसनें इसी तरह लड़ती थीं, लड़ते-लड़ते गला बैठ जाता और शाम पड़ते ही वो मर्द घर लौटने लगते जिन पर गालियां पड़ती रहीं, तो दोनों मकानों की सरहद अर्थात सांझी दीवार पर एक हांडी उल्टी करके रख दी जाती थी, जिसका मतलब यह होता था कि अंधेरे के कारण अस्थायी गाली-बंदी हो गयी है। कल फिर होगी। बात यह कि जब तक दूसरे पक्ष का चेहरा दिखाई न पड़े, गाली में Third dimension पैदा नहीं होती। जिस दुकान में हर समय झगड़े और दंगल का माहौल हो और बाहर एक पक्ष के दस-पंद्रह मुस्टंडे हिमायती समोवार के गिर्द पड़ाव डालें हों, उसके ग्राहक बिदकें नहीं तो और क्या करें। बकौल हमारे पहले उस्ताद मौलवी मुहम्मद इस्माईल मेरठी के, जिनकी 'रीडर' से हमने बचाव और फरार का पहला पाठ पढ़ा -

जबकि दो मूजियों में हो खट-पट

अपने बचने की फिक्र कर झट-पट

कोई ग्राहक मारे बांधे ठहर भी जाता तो खान साहब उसके सामने अपनी डूबी हुई रकम को इस तरह याद करते कि वो क्षमतानुसार डर कर या रुआंसा हो कर भाग जाता।

बहसा-बहसी का प्रभाव खान साहब की सेहत पर अत्यंत रोचक सिद्ध हुआ। उनकी जुबान और भूख दिन-प्रतिदिन खुलती जा रही थीं। वो किसी तौर लकड़ी की कीमत कम करने को तैयार नहीं थे, इसलिए कि घर में उन्हें इतने ही की पड़ी थी। उधर बिशारत बार-बार कहते 'पहले तो लकड़ी दागी और गुट्ठल थी, उस पर तेज से तेज आरी खुट्टल हो गयी। दूसरे, सीजन भी नहीं हुई थी। कई तख्तों में बल आ गया था। कोई बेदाग नहीं निकला। तीसरे, छिजत (काट-छांट या लादने उतारने से माल में आई कमी) बहुत हुई। चौथे, जगह-जगह कीड़ा लगा हुआ था।'

खान साहब ने लुक्मा दिया 'पांचवें, यह लकड़ी चोरी हो गयी। यह भी मेरा ही कुसूर है। छठे, यह कि हमने आपको लकड़ी दी थी, लड़की तो नहीं दी कि आप उसके दहेज में हजार कीड़े निकालने बैठ जायें। आप तो पान खा-खा के बिल्कुल जनानियों की तरह लड़ने लगते हैं।'

बिशारत ने 'जनानों' सुना और समझा। तड़ से जवाब दिया 'आप भी तो काबुली वाला से कम नहीं।'

'यह क्या होता है सैब?'

बिशारत ने काबुली वाला का मतलब बताया तो वो आग-बगूला हो गये। कहने लगे 'हमारे कबीले में आज तक किसी ने सूद लिया, न सूद दिया। सुअर बराबर समझते हैं, जबकि आप खुलेआम सूद देते भी हैं और खाते भी हैं। आपके घर का तो शोरबा (सालन का रसा) भी हराम है। उसमें आधा पानी, आधी मिर्चें और आधा सूद होता है। अगर आइंदा यह शब्द मुंह से निकाला तो ठीक न होगा।'

यह कह कर उन्होंने क्रोध से मेज पर इतने जोर से मुक्का मारा कि उस पर रखे हुए कप, चम्मच, पिन और तले हुए मटर हवा में एक-एक बालिश्त ऊंचे उछले और मेज पर रखे हुए टाइम पीस का अलार्म बजने लगा। फिर उन्होंने मुंह से तो कुछ नहीं कहा, अपने टर्किश कोट की जेब से भरा हुआ रिवाल्वर निकाल कर मेज पर रख दिया। मगर थोड़ी देर बाद नाल का मुंह फेर कर अपनी ओर कर लिया।

बिशारत सहम गये। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि जहर में बुझे हुए इस तीर को जो न सिर्फ कमान से निकल चुका था बल्कि प्यारे मेहमान के सीने में उतर चुका था, अब कैसे वापस लायें। खान साहब ने उसी समय अपने एक कमांडो को हुक्म दिया कि तुरंत जाकर पेशावर का टिकट लाओ। दोपहर का खाना भी नहीं खाया। बिशारत मिन्नतें करते रहे। खान साहब बार-बार बिफर कर दफ्तर से बाहर जाते, मगर इस अंदाज से कि हर कदम पर

मुड़ के तकते थे कि अब कोई मना कर ले जाये

बिशारत ने चार बजे उनके पैर पकड़ लिए तो वो घर चलने के लिए इस शर्त पर राजी हुए कि पहले अपने हाथ से मुझे पान खिलाओ लेकिन इसके बाद खान साहब के रवैये में एक अच्छा बदलाव आ गया। बिशारत तो खैर अपने कहे पर लज्जित थे बल्कि अंग्रेजी मुहावरे के अनुसार अपने ही पानी में डूबे जा रहे थे, परंतु खान साहब भी अपनी तीव्र प्रतिक्रिया पर कुछ कम लज्जित न थे। तरह-तरह से भरपायी करने का प्रयास करते। मिसाल के तौर पर बिशारत कभी उदास या बुझे नजर आते या घमासान की बहस में अचानक मैदान छोड़ कर भाग जाते कि खान साहब डान क्योटे की तरह अकेले हवा में तलवार चलाते रह जाते, तो ऐसे अवसर पर वो एक अजीब दिलकश अदा से कहते 'हुजूरे-वाला! काबुली वाला को तलब हो रही है, पान खिलाइये' उन्होंने इससे पहले पान कभी चखा तक नहीं था। बिशारत शर्म से जमीन में गड़ जाते। कभी कुछ खिसियाने, कभी Mock-serious अंदाज से हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते, कभी घुटने छूते और कभी यूं भी होता कि खान साहब उनके हाथ चूम कर आंखों से लगा लेते।

 

पलंग जेब खान

शाम को वो खुले आंगन में पलंग बिछा कर उस पर मच्छरदानी लगवाते। कुछ दिनों से कुर्सी पर बैठना छोड़ दिया था। बिशारत से कहते थे कि तुमने मेहमान की शलवार के लिए कीलों को नंगा छोड़ रखा है। अपने पलंग से कुछ फासले पर मिलने आने वालों के बैठने के लिए चार चारपाइयां मच्छरदानी के साथ बिछवाते। कहते थे अगर फ्रंटियर के बिच्छुओं के पर लग जायें तो कराची के मच्छर बन जायेंगे। सारी बहस बैठे-बैठे होती। हां, किसी को तकरीर के दौरान जोश आ जाता तो वो मच्छरदानी इस तरह हटाता जैसे दूल्हा निकाह के बाद सेह्रा उलट देता है। कराची की दूर-दराज बस्तियों से उनके पठान दोस्तों, गिरांईं और भक्तों के समूह मिलने आते। उनकी आवभगत ऐसे करते, मानों यह सब अपने ही घर में हो रहा है। देर रात तक तामचीनी की नीली छींट वाली प्लेटें और हुक्के घूमते रहते। चाय के रसिया उबलती चूरा चाय में मर्दान के गुड़ के अतिरिक्त खशखश का बूरा भी डलवाते। जो भी आता खान साहब के लिए कुछ न कुछ भेंट अवश्य लाता। अखरोट, चिलगोजे, पेशावर के काले गुलाब-जामुन, शहद के छत्ते और डेरा इस्माईल खान का सफेद तंबाकू, कराकुली और जवान असील मुर्ग जिन्हें खान साहब बड़े शौक से खाते थे। दिन भर घर में दर्जनों असील मुर्गे छूटे फिरते। सुर्ख सीमेंट के फर्श पर हरी बीट और भी खलती थी (इसे 'खिलती' पढ़ें तब भी मजा देगी।) जो मुर्ग बेवक्त या जियादा जोर से अजान देता, उसे खान साहब सबसे पहले जिबह करते। एक दिन एक नौजवान गलती से मुर्गी दे गया, सुब्ह सारे मुर्गे आपस में बड़ी खूंखारी से लड़े। यह पहला अवसर था कि मुर्गे किसी स्पष्ट और उचित उद्देश्य के लिए लड़े वरना रोज अकारण ही एक-दूसरे बल्कि तीसरे पर भी झपटते और कटते-मरते रहते। कोई उन्हें लड़ने से दूर रखने की कोशिश नहीं करता था, इसलिए कि जब वो आपस में नहीं लड़ते थे तो घर वालों को काटने लगते। इकलौती मुर्गी पर लड़ कर वो ऐसे लहूलुहान हुए कि सुब्ह अजान देने के लायक भी न रहे। दड़बे में चुपके पड़े, मुल्ला की अजान सुनते रहे।

खान साहब इतवार को सारे दिन पलंग पर आधे लेट कर कबाइली झगड़ों और बन्नू तथा कोहाट की जमीनों के फैसले करते। अब वो औरंगजेब खान की बजाय पलंगजेब खान जियादा लगते थे। हां, रात को फर्श पर सोते। कहते थे कि इससे अहंकार और कमर का दर्द दूर होता है। हमारे फ्रंटियर में जाड़े में शौकीन लोग पयाल (बारीक सूखी घास) पर सोते हैं। पयाल से जंगलों और पहाड़ों की खुशबू आती रहती है। जिस आदमी को जंगल की खुशबू आती और भाती रहे वो कभी की किसी की गुलामी स्वीकार नहीं करेगा।

एक दिन यानी इतवार को लंच के बाद नमाज अदा करते। अगर खाना बदमजा होता या मिर्चें जियादा होतीं तो मूड बिगड़ जाता। नमाज छोड़ देते। कहते कि दिल का हाल जानने वाले के सामने मुझसे तो झूठ नहीं बोला जाता। किस दिल से बारह बार 'अल्हम्दुलिल्लाह' (अल्लाह तेरा शुक्र है) कहूं? कमरे में बहस और गीबत (पीठ पीछे बुराई करना) की महफिल उसी तरह गर्म रहती और वो अकेले एक कोने में जानमाज बिछा कर नमाज के लिए खड़े हो जाते मगर कान इसी तरफ लगे रहते। नमाज के बीच भी कोई व्यक्ति आपस में ऐसी बात कह देता जो खान साहब के स्वभाव या उद्देश्य के विरुद्ध होती तो तुरंत सिजदे की हालत में हों तब भी, नमाज तोड़ कर उसे पश्तो में गाली देते और फिर से उसी तरफ कान लगा कर नमाज पढ़ने लगते।

नमाज के बाद कुर्ता उतार कर पसरा करते। अधिकतर बनियानों में बड़े-बड़े छेद हो गये थे। कहते थे क्या करूं, मेरे साइज का बनियान सिर्फ रूस से स्मगल हो कर आता है। कभी-कभार लंडी कोतल में मिल जाता है तो ऐश आ जाते हैं। कोई-कोई बनियान तो इतना खूबसूरत होता है कि कुर्ते के ऊपर पहनने को जी चाहता है। खान साहब गहरी सांस लेते या हंसी का दौरा पड़ता तो चवन्नी बराबर सूराख फैल कर पिंग-पोंग की गेंद के बराबर हो जाते। इन फैलती सुकड़ती झांकियों में से बदन घटते-बढ़ते फोड़ों की तरह उबला पड़ता था। कैसी भी गर्मी हो, कुर्ता उतारने के बाद भी कुलाह नहीं उतारते थे। कहते थे, जब तक कुलाह सर पर है, बंदा खुद को नंगा और बेहया महसूस नहीं करता। अंग्रेज इसलिए तो औरतों को देखते ही हैट उतार देते हैं।

एक रात उपस्थित-गणों की चारपायी ओवर-लोडिंग की वज्ह से दस-बारह सवारियों समेत बैठ गयी। पांच-छः मिनट तक वो मच्छरदानियों और बानों के जाल से खुद को आजाद न करा सके। उसके अंदर ही मछलियों की तरह एक-दूसरे पर छलकते, फुदकते, कुलबुलाते रहे। चारपायी का एक पाया, पट्टी और एक कोहाटी खान की कलाई टूट गयी। जैसे ही यह मालूम हुआ कि कलाई टूट गयी है उस कोहाटी खान ने शुक्र अदा किया कि खुदा ने बड़ी खैर की, घड़ी बच गयी। दूसरे दिन औरंगजेब खान ने अपने कमरे में चांदनी बिछवा दी और अपने बिस्तर को गोल करके गाव-तकिया बना लिया। यह चांदनी (चादर) उन मुशायरों के लिए आरक्षित थी जो बिशारत के यहां हर इतवार के इतवार बड़ी पाबंदी से होते थे। खान साहब भी दो मुशायरों में शरीक हुए। शेर में जरा भी ऐंच-पेंच होता तो पास बैठने वाले से पूछते कि ये कहना क्या चाहता है? वो फुसफुसा कर मतलब बयान कर देता तो जोर से कहते, 'लाहौल विला कुव्वत।'

 

फटी चांदनी और इजाफत -खोर शाइर

(इजाफत का शाब्दिक अर्थ है संबंध, फारसी में दो शब्दों को मिलाने वाला चिन्ह जैसे शामे-गम इसमें 'ए' इजाफत है)

दूसरे मुशायरे के बाद खान साहब ने बड़ी हैरत से पूछा, 'क्या यहां हर बार यही होता है?' जवाब मिला, 'और क्या!' बोले, 'खुदा की कसम! इस चांदनी पर इतना झूठ बोला गया है कि इस पर नमाज जायज नहीं! ऐसे झूठे शायर की मैय्यत (शव) को तो हुक्के के पानी से नहलाना चाहिये ताकि कब्र में कम-से-कम तीन दिन तक तो पूछ-ताछ करने वाले फरिश्ते न आयें। चांदनी पर जहां-जहां शाइरों ने सिग्रेट बुझाये थे, वहां-वहां छोटे-छोटे सूराख हो गये थे, जिन्हें बाद में शेर कहने और दाद देने के दौरान उंगली डाल-डाल कर बड़ा किया गया था। चांदनी कई जगह से फट भी गयी थी। खान साहब के लिए शाइरों का इतनी बड़ी संख्या में इकट्ठा होना एक अजूबे से कम न था। कहने लगे, अगर कबाइली इलाके में किसी आदमी के घर के सामने ऐसा जमघट लगे तो इसके दो कारण होते हैं, या तो उसके चाल-चलन पर जिरगा बैठा है या उसका बाप मर गया है।

कभी कोई शेर पसंद आ जाये, हालांकि ऐसा कभी-कभार ही होता था, तो 'वई!' कह कर आनंद से आंखें बंद कर लेते और झूमने लगते। शायर वो शेर दोबारा पढ़ने लगता तो उसे हाथ के इशारे से रोक देते कि इससे उनके आनंद में बाधा पड़ती थी।

एक दिन एक नौजवान शाइर ने दूसरे से पूछा कि तुमने मेरी जमीन में गजल क्यों कही? उसने कहा, सौदा की जमीन है, तुम्हारे बाप की नहीं। उस शायर ने यह आरोप भी लगाया गया कि वो इजाफत बहुत खाता है। इस पर दोनों में बहस हो गयी। शुरू में तो खान साहब की समझ में ही न आया कि झगड़ा किस बात का है। अगर खेत, मकान का झगड़ा है तो जबानी क्यों लड़ रहे हैं। हमने जब रदीफ, काफिये और इजाफत का मतलब समझाया तो खान साहब दंग रह गये। कहने लगे 'लाहौल विला मैं तो जाहिल आदमी हूं। मैं समझा, इजाफतखोर शायद रिश्वत या सुअर खाने वाले को कहते हैं। फिर सोचा, नहीं! बाप को गाली दी है, इस पर लड़ रहे हैं। फर्जी जमीनों पर जूतम-पैजार होते हमने आज ही देखी। क्या ये अपनी औलाद के लिए यही जमीनें विरासत में छोड़ के मरेंगे कि बर्खुरदारो! हम तो चले, अब तुम इन पुश्तैनी जमीनों की चौकीदारी करना। इनमें काफियों की पनीरी लगाना और इजाफतों का मुरब्बा बना के खाना। पश्तो में इसके लिए बहुत बुरा शब्द है।'

न हुई गालिब अगर उम्र तबीई न सही

उन्हें खुशी के आलम में बार-बार गाते, गुनगुनाते भी देखा। लहराती, गटकरी लेती आवाज में तंबूरे के तार का सा खरज का एक अचल सुर भी था, जो कानों को अच्छा लगता था। अपने जमाने में राग-रंग के रसिया रह चुके थे अर्थात संगीत का इस हद तक ज्ञान था कि यह अच्छी तरह जानते थे कि खुद बेसुरा गाते हैं। अक्सर कहते कि हमारे यहां सुशील, सज्जन व्यक्तियों में अच्छा गाने को ऐब समझा जाता है। मैं बिगाड़ के गाता हूं। शुद्ध गायकी को सिर्फ गायकों, तवायफों, मीरासियों और नाचने वाले सुंदर लड़कों के केस में क्षमायोग्य समझते थे। उन्हें अनगिनत टप्पे याद थे मगर एक पश्तो गीत उनका फेवरेट था। उसका मुखड़ा कुछ इस तरह था कि देख दिलदारा! मैंने तेरी मुहब्बत में प्रतिद्वंद्वी को नंगी तलवार से कत्ल कर डाला। कानों पे हाथ रख कर 'या कुर्बान!' अलाप के बाद जिस अंदाज से वो गाते थे, उससे तो यही टपकता था कि उन्हें जो आनंद कत्ल में प्राप्त हुआ, मिलन में उसका अंश मात्र भी न मिला। इस बोल की अदायगी वो ऐसे पहलवानी जोश और अधाधुंध ढंग से करते कि शलवार में हवा भर-भर जाती।

कहते थे कि दुश्मनी और इंतकाम के बिना मर्द का जीवन निरुद्देश्य, अप्राप्त और फिजूल हो कर रह जाता है।

एक न एक दुश्मन अवश्य होना चाहिये, इसलिए कि दुश्मन न होगा तो इंतकाम किससे लेंगे? फिर बरसों मुंह अंधेरे कसरत करने, बाल्टियों दूध पीने और तकिये के नीचे पिस्तौल रख कर सोने से क्या लाभ? सारे पुश्तैनी और कीमती हथियार बेकार हो जायेंगे। नतीजा यह कि शेर-दिल लोग सम्मान-जनक मृत्यु को प्राप्त होने की बजाय दमे और उल्टी-दस्त से मरने लगेंगे। स्वाभाविक उम्र तक तो सिर्फ कव्वे, कछुए, गिद्ध, गधे और वो जानवर पहुंचते हैं, जिनका खाना धार्मिक-नियमानुसार हराम है। खान साहब यह भी कहते थे कि जब तक आपका कोई बुजुर्ग बेदर्दी से कत्ल न हो, आप बदले के आनंद से परिचित नहीं हो सकते। सिर्फ मंगतों (भिखारियों) मुल्लाओं, जनानों, मीरासियों, बिना बाप के आदमी और शायरों को कोई कत्ल नहीं करता। अगर आपका दुश्मन आपको कत्ल योग्य नहीं समझता तो इससे अधिक अपमान की बात नहीं हो सकती। इस पर तो खून हो जाते हैं। ईमान से! ऐसे बेगैरत आदमी के लिए पश्तो में बहुत बुरा शब्द है।

 

घोड़ा, गुल्लैल और विनम्रता

'यूं मेरा दादा बड़े उग्र स्वभाव का था। उसने छः खून किये और छः ही हज किये। फिर कत्ल से तौबा कर ली। कहता था अब मैं बूढ़ा हो गया, अब मुझसे बार-बार हज नहीं होता। वो पिचानवे साल की उम्र में अपनी मर्जी और इच्छानुसार मरा! जब तक आखिरी दुश्मन मर नहीं गया, उसने अपने आपको मरने नहीं दिया। कहता था कि मैं किसी दुश्मन को अपने जनाजे को कंधा नहीं देने दूंगा, न ही मैं अपने पत्नी का सुहाग लुटते देख सकता हूं। दादा सचमुच बड़े डील-डौल और रोब-दाब का आदमी था। पैदल भी चलता तो यूं लगता जैसे घोड़े पर आ रहा है। वो बड़ा बुद्धिमान और समझदार व्यक्ति था। इस समय मुझे घोड़े के जिक्र पर याद आया, वो कहता था कि सबसे बेहतरीन सवारी अपनी टांगें हैं। घोड़ों की टांगों का इस्तेमाल सिर्फ दो सूरतों में जायज है। एक मैदाने-जंग में दुश्मन पर तेज-रफ्तार से हमला करने के लिए, दूसरे हमला नाकाम हो तो मैदाने-जंग से दुगनी तेज-रफ्तार से भागने के लिए। मजाक अपनी जगह, मेरा दादा कजाकिस्तानी घुड़सवारों की तरह तेज दौड़ते हुए घोड़े की जीन को छोड़ कर उसके पेट के गिर्द चक्कर लगाता हुआ दूसरी तरफ से दोबारा जीन पर बैठ जाता था। मेरे पास उसकी तलवार और जड़ाऊ छोटी कटार है। इनमें उसी फौलाद का उपयोग हुआ है, जिससे नादिर शाह की तलवार ढाली गयी थी। हमारे खानदान में सौ साल के अरसे में मैं पहला आदमी हूं जिसने कत्ल नहीं किया, कम-से-कम अब तक। मेरे ताया ने भी कत्ल नहीं किया, इसलिए कि वो जवानी में ही कत्ल कर दिया गया।'

खान साहब को घोड़े से बहुत दिलचस्पी थी। काला घोड़ा उनकी कमजोरी था। बन्नू में पांच-छः घोड़े अस्तबल में बेकार खड़े खाते थे, सब काले। किसी का उपहार में दिया हुआ एक ऊंची नस्ल का बादामी रंग का घोड़ा भी था, जिसकी दुम और रानें काली थीं लेकिन उसे सिर्फ दुम ओर रानों की हद तक पसंद की दृष्टि से देखते थे। अक्सर कहते, हमारे कबीले में जिस मर्द का निशाना चूकता हो, जिसकी वंशावली में लोग केवल कत्ल हुए हों या जिसको घोड़ा बार-बार जमीन पर पटख देता हो, उससे निकाह जायज नहीं। घोड़ा मैंने हमेशा रखा। उस जमाने में भी जब बेहद तंगी थी और मैं बिना ब्रेक की साइकिल पर आता-जाता था। बाहर एक मुश्की (काला घोड़ा) खड़ा हिनहिनाता रहता था। किसी ने पूछा इसमें कौन-सी तुक थी, खान साहब? बोले, अव्वल तो अपने गांव में घोड़े पर टंगे-टंगे फिरना अहंकार की निशानी समझी जाती थी। दूसरे, घोड़ा बूढ़ा था - अब्बा की आखिरी निशानी। मुझे मेरे दादा ने पाला। वो अभिमान और दुष्टता के एकदम विरुद्ध था। कहता था, हमेशा गर्दन झुका कर चलो, यही खरे पख्तूनों का तरीका है। मेरी उठती जवानी, गर्म खून था। एक दिन मैं सीना ताने और गर्दन को इतना अकड़ाये कि सिर्फ आसमान नजर आता था, उसके सामने से गुजरा तो उसने मुझे रोक लिया। मेरे भाई के हाथ से गुलेल छीन कर उसके दोशाखे को मेरी गुद्दी में पीछे से फंसा कर गर्दन को इतना झुकाया कि मुझे अपनी ऐड़ी नजर आने लगी। मैंने कसम खाई कि आइंदा कभी गर्दन अकड़ा के नहीं चलूंगा। फिर गुलेल गर्दन से अलग करके भाई को वापस करना चाहा तो दादा ने सख्ती से मना कर दिया। कहने लगा, इसे संभाल के रख ले, काम आयेगी। बुढ़ापे में इसे दूसरी तरफ से इस्तेमाल करना, ठोड़ी के नीचे लगा कर गर्दन खड़ी कर लेना।

 

अहले - खानाबदोश

खान साहब अपने किसी साथी के साथ जब कच्ची आबादियों और पठान बस्तियों का दौरा करते और रास्ते में कोई भारी पत्थर पड़ा नजर आता तो खिल उठते। वहीं रुक जाते, जवानों को इशारा करते कि इसे उठा कर दिखाओ तो जानें। अगर किसी से न उठता तो आस्तीन चढ़ा कर आगे बढ़ते और या अली! कह कर सर से ऊंचा उठा कर दिखाते। राह चलते लोग और मुहल्ले के बच्चे तमाशा देखने खड़े हो जाते, कभी कराची की खुशहाल और साफ-सुथरी बस्तियों से गुजरते तो अफसोस करते कि खान! यह कैसी झाड़ू-फिरी खाना-खराब बस्ती है कि एक पत्थर पड़ा नजर नहीं आता, जिसे कोई मर्द बच्चा उठा सके। मेरे बचपन में गांव में जगह-जगह बड़े-बड़े पत्थर और चट्टानें पड़ी होती थीं, जिन पर खड़े हो कर आप दुश्मन को गाली दे सकते थे, टेक लगा कर सुस्ता सकते थे। इन्हीं पत्थरों पर जाड़े में बड़े-बूढ़े स्लेटी रंग का कंबल इस तरह ओढ़ के बैठते थे कि सिर्फ दो आंखें दिखाई देती थीं। धूप सेंकने के बहाने वो इन आंखों से नौजवानों के चाल-चलन पर नजर रखते थे। उधर जब कुंवारी लड़कियां, जिनके सफेद बाजू उथले पानी की मछलियों की भांति किसी प्रकार पकड़ में नहीं आते, पनघट से अपने सरों पर घड़े उठाये गुजरतीं तो इन्हीं पत्थरों पर बैठे गबरू जवान अपनी नजरें उठाये बिना, सिर्फ चाल से बता देते थे कि किसका घड़ा लबालब भरा है और किसका आधा खाली और कौन घूंघट में मुस्करा रही है। कोई लड़की मोटी चादर के नीचे फंसा-फंसा कुर्ता पहन कर या दांतों पर अखरोट का ताजा दंदासा लगा कर आती, तब भी चाल में फर्क आ जाता था। जवान लड़की की ऐड़ी में भी आंखें होती हैं। वो चलती है तो उनसे पता होता है कि पीछे कौन, कैसी नजरों से देख रहा है। गांव की सरहद पर मलिक जहांगीर खान की बुर्जी के पास एक तिकोना-सा पत्थर आधा जमीन में धंसा, आधा राक्षस के पंजे की तरह बाहर निकला हुआ था। उस पर अभी तक उन गोलियों के निशान हैं जो पचास बरस पहले ईद के दिन मैंने निशानेबाजी के दौरान चलाई थीं। एक गोली का टुकड़ा पत्थर से टकरा कर उचटता हुआ नसीर गुल की रान में घुस गया। वो कच्ची उम्र का सुंदर लड़का था। लोगों ने तरह-तरह की बातें बनायीं। उसका बाप कहने लगा कि मनहूस के बच्चे! मैं तेरी दोनों जांघों में गोली से ऐसा दर्रा खोलूंगा कि एक लिहाफ की रुई से भी मूसलाधार खून बंद नहीं होगा। गांव में कभी सन्नाटे में फायर होता तो उसकी प्रतिध्वनि को दूर-निकट के पहाड़, अपनी गरज में शामिल करके, बारी-बारी लौटाते तो जमीन देर तक कांपती रहती और दिल दहल जाते। औरतें अपने-अपने मर्द के लिए दुआयें करतीं कि खुदा खैर से लौटाये।

मुहब्बत और नफरत दोनों खान साहब 'वेट लिफ्टिग' से व्यक्त करते। मतलब यह कि बहस में हार जायें तो प्रतियोगी को उठा कर जमीन पर पटख देते और अगर मुद्दत के बिछड़े दोस्त मिल जायें या हम जैसे कद-काठी वाले भक्तगण सलाम करें तो गले मिलने के दौरान हमें इस तरह हिलाते, झंझोड़ते जैसे फलदार वृक्ष की शाख को झड़झड़ाते हैं। फिर जोशे-मुहब्बत से हमें जमीन से अधर उठा लेते, हमारे माथे को अपनी lip level तक लाते और चूम कर वहीं हवा में न्यूटन के सेब की भांति गिरने के लिए छोड़ देते।

इसी प्रकार उनके एक पसंदीदा टप्पे से, जो वो अक्सर गाते और गुनगुनाते थे, यह जाहिर होता था कि महबूब भी उन्हें सिर्फ इसलिए भाता है कि उसे दोनों हाथों में उठा कर घड़े की तरह सर पर रखा जा सकता है। उस टप्पे का अर्थ था कि जानां आ! मेरे पहलू का घड़ा बन जा कि तुझे सीने के रास्ते से सर पर चढ़ा लूं। गाने में कटी उंगली से अपने सीने पर गुदाज घड़े के सफर का ऐसा नक्शा खींचते कि -

मैंने ये जाना कि गोया ये भी मेरे सर पे है

महबूब का, वज्न के अतिरिक्त रूप-रंग में भी घड़े के सदृश होना हालांकि लाजमी शर्त नहीं, लेकिन एक्स्ट्रा क्वालिफिकेशन अवश्य प्रतीत होती थी। घड़े को अपने शर्माये हुए पहलू से जुदा करके सर पर रख लेने से शायद पवित्र निगाह और निकाह का यह पहलू दिखाना था कि सुंदर घड़े को सारा समय सर पर उठाये फिरने वाला अहले-खानाबदोश खुद कभी इसका पानी नहीं पी सकता। उस दुखिया की सारी उम्र घड़े को सर पर संतुलित करने और लौंडों की गुलेल से बचाने में ही गुजरेगी।

 

सचार

सच बात कहने में खान साहब उतने ही बेबस थे जितने हम आप छींक के मामले में। मुंह पर आई हुई बात और डकार को बिल्कुल नहीं रोकते थे। अगर उनकी किसी बात से दूसरा आहत या क्रोधित हो जाये तो उन्हें पूरी तरह इत्मीनान हो जाता था कि उन्होंने सच बोला है। उन्हें सच इस तरह लगता था जैसे सामान्य आदमी को हिचकी या शायरों को ताजा गजल लगती है। इतरा-इतरा कर लिखने वाले को लिखार और खुलकर खेलने वाले को खिलाड़ कहते हैं, बिल्कुल इसी तरह बात-बेबात सच बोलने वाले को सिंधी में 'सचार' कहते हैं। खान साहब का संबंध इसी कबीले से था। मिसाल के तौर पर एक बार एक साहब से उनका परिचय कराया गया। छूटते ही पूछने लगे 'ऐसी मूंछें रख कर आप क्या साबित करना चाहते हैं?' वो साहब बुरा मान गये तो कहने लगे 'माफ करना! मैं जाहिल आदमी हूं, यूं ही अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए पूछ लिया। खलील अहमद खां 'रिंद' से पूछा 'माफ करना आपकी सेहत पैदाइशी खराब है या खुद खराब की है? क्या आप के वालिद भी नाम के आगे खान लिखते थे।' वो साहब रुहेलखंड के अक्खड़ पठान थे, सचमुच बिगड़ गये। कहने लगे, 'क्या मतलब?' वो बोले, 'हमने तो वैसे ही पूछ लिया। क्योंकि बारासिंघा मां के पेट से सींगों के झाड़ समेत पैदा नहीं होता।' एक बार बिशारत से पूछा 'आप रेशमी कमरबंद इस्तेमाल करते हैं, खुल-खुल जाने के अतिरिक्त इसके और क्या लाभ हैं?' एक और अवसर पर तीन-चार दोस्तों की उपस्थिति में बिशारत को बड़ी सख्ती से टोका, 'यारा जी! माफ करना मैं तो जाहिल आदमी हूं। मगर यह आप दिन भर आदाब अर्ज! आदाब अर्ज! तस्लीमात अर्ज! तस्लीमात अर्ज! क्या करते रहते हैं, क्या अस्सलाम अलैकुम कहने से लोग बुरा मान जायेंगे?'

इससे पहले बिशारत ने इस पहलू पर कभी गौर ही नहीं किया था। सच तो यह है कि इधर हमारा भी खयाल नहीं गया था। बिशारत ने अपने पिता को हमेशा 'आदाब-तस्लीमात' ही कहते सुना था और इसमें उन्हें बड़ी विनम्रता और सौंदर्य प्रतीत होता था। खान साहब ने दूसरी बार भरी महफिल में टोका तो वो सोच में पड़ गये। अब जो पलट कर पीछे देखा तो नजरों के सामने एक दृश्य के बाद दूसरा दृश्य आता चला गया।

1. क्या देखते हैं कि मुगल बादशाहों ने अपने पारंपरिक राजसी वस्त्र उतार फेंके और राजपूती खिड़कीदार पगड़ियां पहन लीं। शहंशाह माथे पे तिलक लगाये फत्हपुर सीकरी के इबादतखाने बैठे फैजी से फारसी रामायण का पाठ सुन रहे हैं। थोड़ी देर बाद पंडितों और मुल्लाओं के शास्त्रार्थ में वो शोर और हंगामा हुआ कि यूं लगता था जैसे मस्त खच्चर भिड़ों के छत्ते बचा रहे हैं। सम्राट अकबर ने धर्म ईजाद कर डाला। वो अपनी हिंदू जनता को जल्दी-से-जल्दी खुश करने के उद्देश्य से भी अपने पुश्तैनी दीन से बेजारी और असंबद्धता दर्शाना चाहता था। सच्चाई यह है कि इतने बड़े साम्राज्य के बावजूद वो शरीअत (इस्लामी धार्मिक कानून) से परेशान, मुल्लाओं से निराश और अपनी प्रजा के बहुसंख्यकों से भयभीत था। आहिस्ता-आहिस्ता उसने अपनी पैगंबरी का दावा कर दिया, जिस पर उसकी महारानी जोधाबाई और मुल्ला-दो-प्याजा तक ईमान न लाये। उसने सब को खुश करने के लिए सब धर्मों का एक काकटेल बनाया जिसे सबने इसी आधार पर ठुकरा दिया।

2. फिर देखा कि काले घोड़े की नंगी पीठ पर रातों-रात मंजिलें तय करने वाले और देश-देश झंडा गाड़ने वाले मुगल सूरमा अब जमना-किनारे राजपूती तर्ज के दर्शनी झरोखे और लाल झूल और पचरंगी मस्तक वाले हाथी पर विराजे नजर आ रहे हैं। लू के थपेड़ों ने उनकी वेषभूषा बदल डाली, मलमल के हवादार अंगरखों ने जिरह बख्तर (कवच) की जगह ले ली, आहिस्ता-आहिस्ता विजयी होने वालों ने अपनी मातृभाषायें अरबी, तुर्की और फारसी छोड़ कर एक नयी भाषा उर्दू बनायी, जो आरंभ में उनके लिए भी इतनी ही विदेशी और अजनबी थी, जितनी हिंदुओं के लिए तुर्की या फारसी। मुकम्मल सैनिक-विजय के पश्चात हुक्मरानों ने अपनी अस्ल भाषा त्याग कर खुशी से एक प्रकार की सांस्कृतिक पराजय स्वीकार कर ली, ताकि हारने वाले यह न समझें कि वो अपने सिक्के के साथ अपनी मातृभाषा भी प्रचलित करना चाहते हैं। मस्जिदों और खानकाहों के दरवाजों, महराबों पर हिंदुओं के पवित्र फूल कमल की नक्काशी होने लगी। शूरवीरों की महफिलों में ताजिकिस्तानी नृत्य का जोश और समरकंद और बुखारा के नगमे फिर कभी सुनायी न दिये कि समय ने लय ही नहीं, नय (बांसुरी) और नगमा भी बदल के रख दिये। हिंद पार के फनकार, अपने साज बगलों में दबाये, मुद्दतें गुजरीं, विदा हो गये। उनके जाने पर न आसमान रोया, न हिमालय की जती फटी कि उनके कद्रदानों ने अब सितार, सारंगी और मृदंग पर हिंदुस्तानी राग-रागिनियों से दिलों को गर्माना सीख लिया था।

3. लिखने वाली उंगली जो लिखती चली जाती है, सांस्कृतिक समझौते के चित्रों का एक और पृष्ठ पलट कर दिखाती है। गोमती नदी के रूप-किनारे रास का रसिया, अवध का आखिरी ताजदार, पैरों में घुंघरू बांधे स्टेज पर अपनी ही बनायी हुई हिंदी धुन पर नृत्य-भाव बता रहा है। एक पृष्ठ और पलटिये तो जमना-किनारे एक ही दृश्य नजर के सामने आता है। कुछ दाढ़ी वाले परहेजगार बुजुर्ग मसनद की टेक लगाये धर्म के पतन के कारणों, धर्म के पुनरुत्थान और जिहाद की जुरूरत पर अरबी और फारसी में पत्रिकायें निकाल रहे हैं, लेकिन जब सलाम करना हो तो दोहरे हो कर एक-दूसरे को आदाब, तस्लीमात, बंदगी और मुजरा बजा लाते हैं। अस्सलाम-अलैकुम कहने से बचते हैं कि यह रिवाज (जो बारह सौ वर्ष से मुसलमानों की पहचान रहा था, जैसे 'श्लूम' मूसा को मानने वालों की या 'जयराम जी की' और 'नमस्कार' हिंदुओं की पहचान रही है) अब बिल्कुल समाप्त हो चुका था। नौबत यहां तक आ पहुंची कि हजरत शाह वली उल्लाह के खानदान के लोग भी जब सलाम करते तो कहते थे अब्दुल कादिर तस्लीमात अर्ज करता है।

बिशारत अक्सर कहते हैं कि मैं यह कभी नहीं भूलूंगा कि पेशावर के एक अनपढ़ पठान के ताने ने चार पुश्तों का पाला-पोसा आदाब अर्ज छुड़वा दिया।

 

कराची वाले किसी चूजे को मुर्गा नहीं बनने देते

खान साहब बहस के दौरान हर बात और हर सूरत-हाल के आम-तौर पर दो कारण बताते थे, जिनमें से एक की हैसियत महज पख की होती थी। मिसाल के तौर पर बिशारत ने एक दिन शिकायत की 'कराची की सुब्ह कैसी गंदली-गंदली और थमी-थमी सी होती है जैसे कि सूरज को निकलने में आलस आता है। सुब्ह उठने को जी नहीं चाहता। बदन ऐसा दुखता है जैसे किसी बॉक्सर ने रात भर इस पर प्रैक्टिस की हो। मैं कानपुर में मुर्गे की पहली आवाज पर ऐसे उठ बैठता था जैसे किसी ने स्प्रिंग लगा दिया हो।' खान साहब अपनी कटी तर्जनी उनके घुटने की ओर उठाते हुए बोले कि 'इसके दो कारण हैं, पहला तो यह कि कराची वाले किसी चूजे को मुर्गा नहीं बनने देते, अजान देने से पहले ही उसका किस्सा तमाम कर देते हैं, दूसरा यह कि आपके स्प्रिंग को गठिया हो गया है। चालीस दिन तक मेथी दाने की भुजिया खाओ और बूढ़े घुटने पर पनघट के पौधे का लेप लगाओ। हमारा पश्तो शायर कह गया है कि पनघट का हर पौधा दवा होता है क्योंकि कुंवारियों के पल्लू उसे छूते रहते हैं। मैं तो जब भी कराची आता हूं, हैरान-परेशान रहता हूं जिससे मिलो, जिससे बोलो, कराची से कुछ-न-कुछ शिकायत जुरूर रखता है। एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो अपने शहर पर गर्व करता हो। इसके दो कारण हैं, पहला तो यह कि यहां गर्व करने लायक कोई चीज नहीं, दूसरा यह कि...'

दूसरे कारण बताने के लिए उन्होंने अपनी तर्जनी आकाश की ओर की ही थी कि मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग बीच में कूद पड़े। कहने लगे - साहब! दूसरा कारण यह कि शरणार्थी, पंजाबी, सिंधी, बिलोच, पठान - सब अपने रब का फज्ल तलाश करने के लिए यहां आ-आ कर आबाद हुए। कड़ी धूप पड़ रही थी, सबके सरों पर कराची ने करुणामयी मां की भांति अपनी फटी-पुरानी चादर की छत तान दी। उन पर भी जो बसर करने के लिए केवल ठिया-ठिकाना मांगते थे, फिर पसरते चले गये लेकिन सबको शिकायत, सब बेचैन, बिखरे, उदास परेशान। शरणार्थियों को ही लीजे दिल्ली, लखनऊ, बंबई, बाराबंकी, जूनागढ़ - हद यह कि उजाड़! झूंझनूं (जयपुर - लेखक की ओर संकेत) को याद करके आहें भरता है, उसे यह अहसास नहीं कि जिन्हें याद कर-करके वो खुद पर रोना तारी किये रहता है, वो छोड़ा हुआ शहर नहीं, बल्कि उसकी रूठी हुई जवानी है जो लौट कर नहीं आ सकती। अरे साहब! अस्ल रौला भूगोल का नहीं, जवानी और बीते समय का है, जो वर्तमान के अमृत में विष घोल देता है। पंजाबी, जिन्हें सबसे पहले सर सैयद अहमद खां ने 'जिंदादिलाने-पंजाब' का खिताब दिया था, जन्नत में पहुंच कर भी 'लहोर-लहोर ए।' पुकारेंगे। उन्हें कराची जरा नहीं भाता। वो सिंध के चित्तीदार केले, चीकू और पपीते में मुल्तान के आम और मौंटगुमरी के माल्टे का मजा न पा कर सचमुच उदास हो जाते हैं। फ्रंटियर का गुल जमान खान चौकीदार शेर शाह-कॉलोनी की झुग्गी झोपड़ी में अपने वतन के जंगल, पहाड़ और दरिया मांगता है।

कोई नहीं जो उठा लाये घर में सहरा को

वो सुब्ह दिल्ली की नहारी खाता है, तीसरे पहर को सेठ की कोठी के एक ओझल कोने में अपने मकई के बेमौसम पौधे को बड़े लाड़ से पानी देता है। वो दिन-भर पश्तो अंदाज में बंबइया उर्दू बोलने के बाद शाम को ट्रांजिस्टर पर पश्तो गानों से दिल बहलाता है और रात पेशावर रेलवे स्टेशन को आंखों में भर के सड़क के किनारे झुग्गी में सो जाता है। सड़क पर रात-भर पटाखे छोड़ती मोटरसाइकिल, रिक्शा और धड़धड़ाते ट्रक गुजरते रहते हैं, पर उसे सपने में ढोल, सुरना, रबाब और घड़े पर टप्पे सुनायी देते हैं।

उधर कोयटा से आया हुआ बिलोच कराची का नीला समुद्र देखता है और बिलोचिस्तान के चटियल पहाड़ों और उन तगड़े दुंबों को याद करके रोता है, जिनके वो बड़े खस्ता कबाब बना सकता था। अब रहा पुराना सिंधी, तो वो गरीब उस जमाने को याद करके आहें भरता है जब यह चारों हजरात कराची नहीं पधारे थे।

इस विषय में अंतिम कील खान साहब ने ही ठोकी। कहने लगे, 'खां! इसके दो कारण हैं। पहला, यह शेख सादी कह गये हैं कि जिस गांव का हर वासी उठते-बैठते, सोते-जागते किसी दूसरे गांव की याद में तड़पता रहे, वो गांव चौपट होवे ही होवे। हमारे 'मुलुक' में अगर कोई औरत दूसरी शादी के बाद अपने पहले पति को इसी तरह याद करे तो दूसरा पति दोनों की नाक काट कर एक-दूसरे की हथेली पर रख देगा। मुल्ला करम अली कहता था - जो औरत अपने पहले पति को बहुत याद करे उसे अरबी में हिनाना (छिनाल) कहते हैं। ऐसी औरत के दूसरे पति के लिए पश्तो में बहुत बुरा शब्द है।

खान साहब कठिन समस्याओं और जीवन की गुत्थियों को कभी-कभी अपनी अपढ़ सूझ-बूझ से इस तरह पानी पानी कर देते थे।

कि किताब अक्ल की ताक में

जूं धरी थी तूं ही धरी रही

दोनों पक्षों का झगड़ा अब इतना तूल खींच गया था कि दोनों एक-दूसरे को अपनी दलीलें तक सुनाते हुए कभी-कभी मुस्करा देते थे। अब यह कोई मामूली कारोबारी झगड़ा नहीं रहा था। दोनों पक्ष अपने-अपने उसूलों को तर्क के पाले में मुर्गों की तरह लड़ा रहे थे। वो भी इस शर्त पर कि जिसका मुर्गा जीत जायेगा उसे जिब्ह करके दोनों मिल के खायेंगे। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि खान साहब अक्सर फर्माते थे कि हारा हुआ मुर्गा खाने से आदमी इतना बोदा हो जाता है कि हुकूमत की हर बात ठीक लगने लगती है। कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि खान साहब सिर्फ दिल बहलाने के लिए मामले को खींच रहे हैं वरना वो बड़े दिल के और खुले हाथ वाले आदमी थे, यारों के यार थे। बिशारत को भी यह बात अच्छी तरह मालूम थी और यह भी कि खान साहब उन्हें जी-जान से चाहते हैं, उनकी हाजिर-जवाबी से आनंदित होते हैं। दो बरस पहले भी वो बिशारत से पेशावर में कह चुके थे कि मेरा जी चाहता है, आपको सामने बिठा कर इसी प्रकार महीनों आपकी बातें सुनता रहूं। बिशारत खुद भी खान साहब पर फिदा थे। दहकते सुर्ख अंगारा फौलाद से चिंगारियां उड़ती देखने में उन्हें बहुत मजा आता था।

एक ओर तो खान साहब के लेन-देन की यह चरम सीमा कि एक पाई छोड़ने में उनकी शान घटती थी, दूसरी ओर मुहब्बत और लिहाजदारी का यह हाल कि जहां बिशारत का पसीना गिरे, वहां उनके दुश्मन का खून बहाने के लिए तैयार। बिशारत की दुकान से एक एक्साइज इंस्पेक्टर चार बरस पहले दस हजार रुपये की लकड़ी उधार ले गया और अभी तक रकम दबाये बैठा था। तीन साल हुए प्रोनोट लिख दिया था, मगर अब कहता था कि जाओ! नहीं देते, नालिश करके देख लो। प्रोनोट की समय सीमा कब की समाप्त हो चुकी थी। बिशारत ने अपनी अन्य परेशानियों के साथ इस नुकसान का भी जिक्र किया। दूसरे दिन शाम को खान साहब अपनी पच्चीस-तीस कमांडोज की टुकड़ी लेकर उसके घर पहुंच गये। दरवाजा खटखटाया, इंस्पेक्टर ने खोला और आने का कारण पूछा तो खान साहब ने कहा कि हम वो खिड़की दरवाजे उखाड़ कर ले जाने के लिए आये हैं, जिनमें हमारे भाई बिशारत की लकड़ी का उपयोग हुआ है। यह कह कर उन्होंने एक ही झटके से दरवाजे को कब्जे, स्क्रू और हैंडल समेत उखाड़ कर इस प्रकार बगल में दबा लिया जैसे स्कूल के भगोड़े लड़के तख्ती बगल में दबाये फिरते हैं। दीवार पर से इंस्पेक्टर के स्वर्गवासी दादा का फोटो जिसके बारे में उन्हें संदेह हुआ कि इसके फ्रेम में वही लकड़ी उपयोग हुई है, कील समेत नोच कर अपने एक कमांडो को थमा दिया। इंस्पेक्टर एक ही घाघ था, मौके की नजाकत समझ गया। कहने लगा, 'खान साहब! मेरी एक अर्ज सुन लीजिये।' खान साहब बोले, 'छोड़ो भी यार! गोली मारो, अब अर्ज-वर्ज किसी और को सुनाना, होश में आओ, रकम निकालो।'

रात के बारह बजने में अभी चार-पांच मिनट बाकी थे कि खान साहब ने दस हजार के नये नोटों की दस गड्डियां ला कर बिशारत के हवाले कर दीं। इनमें से सात पर बिलैका टेक्सटाइल मिल्ज की मुहर थी, जो उस इंस्पेक्टर के रिश्वत क्षेत्र में आता था। यही नहीं उन्होंने उससे अपने पहलवान कमांडो के रिक्शों का किराया और दूध के पैसे भी एक सेर प्रति व्यक्ति के हिसाब से वसूल कर लिए।

खान साहब घर वालों में ऐसे घुल मिल गये कि अक्सर शाम को बच्चों के लिए, जो उन्हें चचा कहने लगे थे, मिठाई, कपड़े और खिलौने ले कर जाते। सबसे छोटे बच्चे को बहलाने के लिए पलंग पर चित लेट जाते और पेट को धोंकनी की तरह फुला और पिचका कर उस पर बच्चे को उछालते। पड़ोस के बच्चे उन्हें देखते ही उनके पेट के लिए मचलने लगते और मांओं के सर हो जाते। खान साहब ने अब बिशारत के साथ उनके रिश्तेदारों की शादी-ब्याह, गमी और सालगिरह के आयोजनों में भी जाना शुरू कर दिया परंतु बिशारत ने कुछ समय बाद इस सिलसिले को एकाएकी बंद कर दिया क्योंकि उन्हें कुछ बाहरी सूत्रों से पता चला कि उनके (बिशारत के) रिश्तेदारों की सारी हमदर्दी खान साहब के साथ है और एक दिन तो यह सुन कर वो भौंचक्के रह गये कि एक ऐसे शरारती रिश्तेदार ने खान साहब को अलग से आमंत्रित किया है, जिससे बिशारत के संबंध एक अर्से से खराब, बल्कि टूटे हुए थे।

बिशारत को किसी मुखबिर ने यह भी खबर दी कि खान साहब दो-तीन बार चोरी-छुपे थाने भी जा चुके हैं और एस.एच.ओ. को कराकली टोपी, एक बोरी अखरोट, अस्ली शहद और दर्रे के बने हुए बिना लाइसेंस के रिवाल्वर का तोहफा भी दे आये हैं! वो घबराये, अब यह कोई नया फड्डा है। इसके भी दो कारण हो सकते हैं, उन्होंने सोचा।

 

रोटी तो किसी तौर कमा खाये मछंदर

खान साहब ने अब खुद शेव करना और शलवार में कमरबंद डालना भी छोड़ दिया था। रोज खलीफा नियमित रूप से आता था। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं, खलीफा को साईसी, कोचवानी, ड्राइवरी, खाना पकाना, बैरागीरी, हजामत, बागबानी, प्लंबिंग - यह कहिये क्या नहीं आता था। उस काम में भी निपुण था जो इन सबसे अधिक लाभदायक है - चापलूसी और खुशामद। जब सब धंधे ठप हो जाते तो खलीफा अपने बुनियादी पेशे की ओर पलटता। अपने बेटे को, जो पुरखों के पेशे से घृणित एवं लज्जित था, अक्सर नसीहत करता कि बेटा! हज्जाम कभी बेरोजगार नहीं रह सकता। हज्जाम की आवश्यकता सारी दुनिया को रहेगी, जब तक कि सारी दुनिया सिख-धर्म न अपना ले! और सिख यह कभी होने नहीं देंगे। खलीफा दिन-रात खान साहब की खिदमत में जुटा रहता। शाम को उनके दोस्तों का झुंड डेरे डालता तो लपक-झपक अंदर से कहवा और चिलम भर-भर लाता। एक बार अपने घर से चार असील मुर्गों की, जिन्होंने अजान देनी नयी-नयी सीखी थी, बिरयानी बना कर लाया। इनके बारे में उसका दावा था कि जब ये जवान पट्ठे सुब्ह-सुब्ह गर्दन फुला-फुला कर अजान देते तो सारे मुहल्ले के मुल्ला और मुर्गियां बेकरार हो के बाहर निकल पड़ते थे। एक दिन कोहाट की जमीन का एक झगड़ा तय होने की खुशी में वो दोनों पक्षों के लिए मुसल्लम भेड़ रोस्ट करके लाया। सुबूत में एक बकरे की कटी हुई दुम भी उठा लाया ताकि खान साहब को यह शक न हो कि बकरे की बजाय सस्ती भेड़ भून के भेड़ दी। खान साहब उसे देखते ही बोले इतनी छोटी रान वाले बकरे की दुम इतनी बड़ी हो ही नहीं सकती। दुम के इस पहलू पर खलीफा की नजर नहीं गयी थी। हाथ जोड़ के खड़ा हो गया। फिर खान साहब के घुटने पकड़े और झूम-झूम कर टांग दबाने लगा। उन्होंने यह कह कर छुड़ायी कि बदबख्ता! घुटना पकड़ते-पकड़ते अब मेरी रान किस लिए टटोल रहा है?

खान साहब को खलीफा के पकाये हुए खानों से जियादा उसकी लच्छेदार बातों में मजा आता था। कहते थे, जिस बात को कहने वाला और सुनने वाला दोनों ही झूठ समझें, उसका गुनाह नहीं होता। वो उसकी शेखी को बढ़ावा देते। वो हर दूसरे-तीसरे दिन उनके तलवों पर रोगन-बादाम की मालिश करता। कहता था, इससे दिमाग को तरावट पहुंचती है। एक दिन अचानक खान साहब को कुछ खयाल आ गया। कहने लगे, तेरे खयाल से मेरा दिमाग मेरे तलवों में उतर आया है? लेकिन खलीफा ठीक ही कहता था, इसलिए कि सात-आठ मिनट बाद ही खान साहब रिवाल्वर तकिये के नीचे रखे, जोर-जोर से खर्राटे लेने लगते। हर तीन-चार मिनट के बाद चौंकते और खर्राटों में नया सुर लगा कर फिर से सो जाते। एक दिन वो बड़े ऊंचे सुरों में खर्राटे ले रहे थे कि पैर दबाते-दबाते खलीफा का हाथ न जाने क्यों उनकी वास्कट की जेब पर पड़ गया। आंखें खोले बगैर कहने लगे, 'बदबख्ता! नक्दी तो मेरे कोट की जेब में है!'

दरअस्ल वो उनके मुंह लग गया था। खिदमतगार, चिलम भरने वाला, हज्जाम, दास्तानगो, खानसामां, अर्दली, गाइड, मुखबिर, सलाहकार - वो उनका सभी कुछ था। तीन-चार दिन से आपस में न जाने क्या मिस्कौट हो रही थी। रोजाना शाम को भी किसी-न-किसी बहाने बिशारत के यहां आ जाता। उनकी बेगम ने दो-तीन बार कहा कि इसका आना भेद और मनहूसियत से खाली नहीं।

 

आदमखोर शेर को पहचानने की आसान तरकीब

एक दिन सुब्ह उठते ही खान साहब ने अचानक यह सुझाव पेश किया कि अब तक जो रकम आपने दी है उसे घटाने के बाद जो रकम देने वाली बनती है, उसके बदले यह गाड़ी जो अर्से से बेकार खड़ी है, मुझे दे दीजिये। बिशारत ने कहा लकड़ी की अस्ल मालियत किसी तरह सात हजार से अधिक नहीं जबकि इस गाड़ी की कीमत नयी बाडी और नये पुर्जों के साथ किसी तरह नौ हजार से कम नहीं, फिर जिस अंग्रेज की सवारी में यह रहती थी उसे सर का खिताब मिलने वाला था। खान साहब ने जवाब दिया, आपकी गाड़ी बहुत-से-बहुत पांच हजार की होगी, जबकि मेरी लकड़ी नौ हजार की थी। आपने तो पेट्रोल और पंक्चर जोड़ने का सारा खर्चा, खलीफा की तन्ख्वाह और उसकी पत्नी का मेहर भी कार की कीमत में जोड़ दिया। बहुत कुछ बहसा-बहसी और घुड़-सौदेबाजी के बाद अदा की जाने वाली रकम का अंतर घट कर वही आया गया, जहां से झगड़ा शुरू हुआ था। यानी 2513.9.3। अब खान साहब इस क्लेम के बदले यह गाड़ी चाहते थे।

'खान साहब! आप बिजनेस कर रहे हैं या बार्टर, (Barter)?' बिशारत ने झुंझला कर पूछा।

'यह क्या होता है सैब?'

'वही जो आप करना चाहते हैं।'

पश्तो में इसके लिए बहुत बुरा शब्द है'

वो जब पश्तो का हवाला दे दें तो फिर किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि अस्ल या अनुवाद की मांग करे। अक्सर कहते कि पश्तो गिड़गिड़ाने और रोने-पीटने की जुबान नहीं, नर आदमी की ललकार है। मतलब उनका यह था कि डंके की चोट पर बात करने, कछार में बेखबर सोते हुए शेर की मूंछें पकड़ कर जगाने और फिर उससे डायलाग बोलने की जुबान है। मिर्जा उस जमाने में कहते थे कि खान साहब उन लोगों में से हैं जो शेर की मूंछें उखाड़ने पर ही बस नहीं करते, बल्कि उसके मुंह में अपना सर दे कर यह रिसर्च करना चाहते हैं कि वेजिटेरियन है या आदम खोर!

 

'बट्टा -सट्टा'

बिशारत ने खान साहब की आसानी के लिए बार्टर को वस्तु-विनिमय कहना शुरू कर दिया, फिर इसका अर्थ समझाया। लंबी-चौड़ी व्याख्या सुन कर बोले 'यारा जी! तो फिर सीधा-सीधा बट्टा-सट्टा क्यों नहीं कहते, जिसमें हर पक्ष यही समझता है कि वो घाटे में रहा।'

और इसी भौंडे उदाहरण पर फैसला हो गया। खान साहब ने बड़ी खुशी और गर्व से एलान किया कि वो 'वस्तु विनिमय' के लिए तैयार हैं। दोनों ने एक-दूसरे को मुबारकबाद दी और इस तरह गले मिले, जिस तरह वो दुखियारे मिलते हैं जो एक-दूसरे के बहनोई भी होते हैं और साले भी।

लेकिन बिशारत दिल-ही-दिल में खुश थे कि खटारा गाड़ी सात हजार में बिक गयी। खान साहब उनसे भी जियादा खुश थे कि दलिद्दर लकड़ी के बदले नौ हजार की कार हथिया ली। दोनों पक्ष इस स्थिति को सत्य की विजय समझ रहे थे। हालांकि हम से दिल की बात पूछें तो झूठ ने झूठ को पछाड़ा था और कूड़ा-करकट का हस्तानांतरण कूड़ा-करकट से हुआ था। खान साहब कार को चमकाते हुए कहने लगे, 'हम इसको लंडी कोतल का सैर करायेगा। अखरोट के पेड़ की छांव में खड़ा करेगा। इसमें काबुल से कराकली, कालीन और चिल्गोजे भर कर लायेगा, काबुल के उत्तर के चिल्गोजे में, ईमान से निकाह के दस छुहारों के बराबर ताकत होता है।

फैसला होते ही खान साहब ने नयी-नयी सीखी हुई लखनवी उर्दू और कानपुरी लहजे के शिकंजे से खुद को एक ही झटके में आजाद कर लिया। वाक-चातुर्य में निपुण शत्रु पर विजय पाने के बाद कैमोफ्लाज की आवश्यकता न रही।

कहने का उद्देश्य सिर्फ यह है कि खान साहब के नजदीक मुश्की से बेहतर दुनिया में कोई सवारी हो ही नहीं सकती थी। वो उस कार को, जो अब इनकी हो चुकी थी, मुश्की कहने लगे।

 

बालू - शाही का इतिहास

बिशारत ने चोरी-छुपे शुक्राने की नमाज अदा की मगर खान साहब से अपनी खुशी छुपाये नहीं छुप रही थी। वो हरचंद राय रोड पर से गुजरते हुए तांगों के घोड़ों को ललचायी हुई नजरों से देख रहे थे कि यह पल विजय-प्राप्ति का था। दुश्मन के घर के चारों ओर शाही अंदाज में निकलने की घड़ी थी। बर्दाश्त न हो सका तो फिलहाल मुश्की की रान यानी कार के मडगार्ड को थपथपा कर दिल के हौसले निकाले, इंजन की थूथनी पर हाथ रख कर शाबाशी दी। उनका बस चलता तो उसे घास-दाना खिला कर अपने हाथ से खरेरा करते। कुछ देर बाद जैसे ही एक तांगे वाले ने स्पेंसर आई हास्पिटल के सामने पेड़ की छांव में घोड़ा खोला, वो लपक कर उस पर जा चढ़े और बिशारत की दुकान के दो चक्कर लगाये। फिर बिशारत ही से जग में ठंडा पानी मंगवाया और सर पर उसके तरेड़ों के बाद सात सेर बालूशाही मंगवा कर बांटी। बिशारत के तीन रिश्तेदारों के हिस्से लगा कर खुद पहुंचाये। बिशारत दंग रह गये। हद हो गयी। सख्त नाराजगी के आलम में भी उन्हें कभी इन तीनों पर शक नहीं हुआ था कि यह ऐसे फसादी और दोगले निकलेंगे। भीतर-ही-भीतर खान साहब से मिल जायेंगे। बहरहाल, बालूशाही द्वारा दोगलेपन का भांडा फूटने का इतिहास में यह पहला उदाहरण था। हमारा मतलब है बालूशाहियों के इतिहास में।

बन्नूं के भक्तों ने रायफलों चला-चला कर सुल्ह का ऐलान किया। एक पड़ोसी दुकानदार दौड़ा-दौड़ा बिशारत को मुबारकबाद देने आया। वो यह समझा कि उनके यहां बेटा पैदा हुआ है।

एक ट्रक ड्राइवर से, जो दुकान पर पड़तल लकड़ी की डिलीवरी देने आया था, खान साहब ने इच्छा व्यक्त की कि जरा हमें हमारी कार में गोवर्धन दास मार्किट तक सैर तो करा दो, तुम्हारे चाय-पानी का बंदोबस्त हो जायेगा। कुछ देर बाद लौटे तो कार की परफार्मेंस से बेहद खुश थे। कहने लगे, खुदा की कसम! बिल्कुल अब्बा जान की मुश्की की तरह है।

एक पेंटर को बुला कर रातों-रात कार पर काला स्प्रे पेंट करवाया ताकि आदतों के अलावा रूप-रंग में मुश्की जैसी लगे।

 

'Et, tu, Brute!'

दूसरे दिन बिशारत दुकान के शटर बंद करवा रहे थे कि सामने एक ट्रक आकर रुका जिसमें ड्राइवर के पहलू में थाने के मुंशी जी बैठे थे और पीछे उनकी चोरी हो गयी लकड़ी भी थी। तख्तों पर राइफल उठाये वही कांस्टेबल टंगा था। खान साहब ने एक डी.एस.पी. के माध्यम से, जो बन्नूं का रहने वाला उनका गिराईं था, न सिर्फ सारा माल शेर के मुंह से निकलवा लिया था, बल्कि उसके दांत भी प्रसाद के तौर पर निकाल लाये थे। ट्रक के पीछे-पीछे एक टैक्सी में (जो आम रास्ते पर अपने पीछे से निश्चित मात्रा से अधिक धुआं निकालने के कारण अभी-अभी पकड़ी गयी थी) वकील साहब पहुंचे, ताकि आपस में सुल्ह-सफाई हो जाये और मामला रफा-दफा हो। उनसे कुछ कदम के फासले पर वही मुल्जिम-नुमा मुवक्किल एक हाथ में उनका ब्रीफकेस थामे और दूसरे में कानून की किताबें उठाये पीछे चल रहा था। वकील साहब के हाथ में मिठाई के दो डिब्बे थे। एक खान साहब को पेश किया और दूसरे के बारे में बिशारत से कहा, कि हमारी ओर से भाभी साहिबा और बच्चों को दे दीजियेगा।

थाने के मुंशी जी ने पूछा, 'हमारा खलीफा कहां है?' बिशारत को यह जानकार बड़ा शॉक लगा कि पुलिस लॉक-आप में रात गुजारने के बाद से खलीफा महीने में दो बार थाने जाता रहा है और एस.एच.ओ. से लेकर हिरासती मुल्जिमों तक की हजामत बनाता रहा है! थाने के स्टाफ में या किसी हवालाती मुल्जिम के यहां निकट या दूर भविष्य में बच्चा पैदा होने वाला हो या थाने के आस-पास के इलाके की झुग्गियों में कोई स्त्री भारी कदमों से चलती नजर आ जाये तो उससे पक्का वादा लेता कि अगर लड़का हुआ तो खत्ने मैं करूंगा। उसके स्वर्गवासी पिता की वसीयत थी कि बेटा! अगर तुम बादशाह भी बन जाओ तो अपने पुरखों के पेशे को न छोड़ना। दूसरे, जिस किसी से मिलो उसको हमेशा के लिए अपना कर रखो या उसके हो रहो। सो वो गरीब सबका हो रहा।

खान साहब रात दो बजे तक कर्जों और 'पूला' तोड़ कर खेतों को पानी देने के सरसरी मुकद्दमों को, जिनमें गाली गलौज के समावेश से पेचीदगियां पैदा हो गयीं थीं, निपटाते रहे। मुकद्दमों की सुनवायी और फैसले के दौरान, लोगों के झुंड उनको खुदा हाफिज कहने आते रहे। अदालत हरेक की चाय, चिलम, चिल्गोजे और बालूशाही से खातिर करती रही। सुब्ह चार बजे से खान साहब ने अपना सामान बांधना शुरू कर दिया। सुब्ह की अजान के बाद एक असील मुर्ग की कुर्बानी की। उसका सर बिल्ली को और शेष घर वालों को नाश्ते पर खिलाया। दिल खुद चबाया। नाश्ते पर ही ऐलान किया कि मुश्की मालगाड़ी से नहीं जायेगी। बल्कि मैं इसे पंजाब की सैर कराता, दरियाओं का पानी पिलाता 'बाई रोड' ले जाऊंगा। बच्चे उनके जाने से बहुत उदास थे। उन्होंने खुद भी इकरार किया कि मेरा भी जाने को जी नहीं चाहता, मगर क्या करूँ लकड़ी का कारोबार वहीं है। अगर यहां जंगल होते तो खुदा की कसम तुम लोगों को छोड़ कर हरगिज न जाता। फिर उन्होंने तसल्ली दी कि इंशाल्लाह दो महीने बाद फिर आऊंगा। एक बोहरी सेठ से वसूली करनी है। अकेला आदमी हूं, बूढ़ा हो गया हूं, एक समय एक ही बेईमान से निपट सकता हूं।

बिशारत को मुस्कुराता देख कर खुद भी मुस्कुरा दिये। कहने लगे, यहां उधार पर बिजनेस करना ऐसा ही है जैसे गन्ने के खेत में कबड्डी खेलना! जितना बड़ा शहर होगा, उतना ही बड़ा घपला और फड्डा होगा, जिसकी छत जियादा बड़ी है, उस पर बर्फ भी जियादा गिरेगी।

फिर सबसे छोटे बच्चे को बहलाने के लिए चारपायी पर लेट गये।

चलते समय उन्होंने बिशारत की बेटी मुनीजा को, जो उनकी चहेती हो गयी थी, पांच सौ रुपये दिये। यह उसकी पांचवीं सालगिरह का तोहफा था, जो आठ दिन बाद मनायी जाने वाली थी।

73.6.3 रुपये नौकरों को बांटे। इससे पहले पिछली रात वो एक पठान नौजवान गुल दाऊद खान को दो हजार रुपये दे चुके थे, ताकि वो अपने चचा पर, जिसने उसकी जमीनों पर जबर्दस्ती कब्जा कर रखा है, फौजदारी मुकद्दमा दायर करे और उस दल्ले को यतीमों की जायदाद पर कब्जा करने की ऐसी सजा दिलवाये कि सब चचाओं को सीख मिले। इन तीनों रकमों को कुल जोड़ 2573.6.3 रुपये बनता है और यही वो रकम थी जिसका सारा झगड़ा था और जिसकी वसूली के लिए उन्होंने अपने कमांडोज के साथ धावा बोला था। बल्कि मिर्जा के अनुसार, प्रतिद्वंद्वी के किले के बीच में तंबू तान कर भंगड़ा डाल रखा था।

इस किस्से को तीस साल होने के आये। हमारी सारी उम्र हिसाब-किताब ही में बीती है, मगर हम आज भी यह नहीं बता सकते कि वास्तव में किसकी किस पर कितनी रकम निकलती थी और आखिर में जीत किस की रही। हमारी ही समझ का कुसूर था, जिन्हें हम दुश्मन समझे, वो दोस्त निकले और...।

खान साहब नौकरों को दे दिला कर बिशारत के वालिद को खुदा हाफिज कह रहे थे कि बिशारत क्या देखते हैं कि ठीक नौ बजे एक व्यक्ति चला आ रहा है, जिसकी सिर्फ शक्ल खलीफा से मिलती है। तंग मोहरी के पाजामे, मलमल के कुर्ते और मखमल की टोपी के बजाय मलेशिया की शलवार और कुर्ता, सर पर जरी की कुलाह पर मशहदी पगड़ी, कामदार वास्कट, पैर में टायर के तले वाली पेशावरी चप्पल। वास्कट और कुलाह क्रमानुसार तीन साइज बड़ी और छोटी थी। कोट की आस्तीन पर इमाम जामिन (सुरक्षा के लिए तावीज) हाथ में बलबन (घोड़ा) की लगाम। खान साहब ने सूचित किया कि बलबन भी एक ट्रक में बन्नूं जा रहा है। उनके अस्तबल में जहां पांच घोड़े, बेकार खड़े हिनहिना रहे हैं, वहां एक और सही। प्रत्येक प्राणी अपने भाग्य का अन्न साथ लाता है।

खान साहब ने घोषणा की कि मुश्की को खलीफा ड्राइव करके पेशावर ले जायेगा और कयामत तक वापस नहीं आयेगा। इसके दो कारण हैं, पहला तो यह कि उसके पुरखे कंधार से पेशावर के रास्ते से हिंदुस्तान आये थे। यात्रा के सामान में नंगी तलवार के अतिरिक्त कुछ न था। यह भी अधिकाधिक उपयोग से घिस-घिसा कर उस्तरा बन गयी। दूसरा यह कि उन्होंने इस नमक-हलाल को मुलाजिम रख लिया।

बिशारत का मुंह फटा-का-फटा रह गया।

'खलीफा! तुम...!'

'सरकार! - ' उसने इस अंदाज से हाथ जोड़ कर घिघियाते हुए कहा कि किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता न रही। इसमें लज्जा भी थी, विनती भी और हर हाल में रोटी कमाने-खाने का हौसला भी।

 

जब उम्र की नकदी खत्म हुई

खान साहब के जाने के कोई छः-सात सप्ताह बाद उनका लिखवाया हुआ एक खत मिला। लिखा था 'खुदा का शुक्र है, यहां हर तरह से खैरियत है, बाकी यह कि मैंने अपने वहां रहने के दौरान आपको बताना ठीक न समझा, क्योंकि आप ख्वामख्वाह चिंता करते और सोहबत का सारा मजा किरकिरा हो जाता। पेशावर से चलने के तीन सप्ताह पूर्व डॉक्टरों ने मुझे जिगर का सिरोसिस बताया था, दूसरी स्टेज में, जिसका कोई इलाज नहीं। जिनाह अस्पताल वालों ने भी यही बताया। डॉक्टरों ने सलाह दी कि हर समय अपना दिल खुश रखो। खुद को खुश रखो, और ऐसे खुशबाश लोगों के साथ अधिक-से-अधिक समय बिताओ जिनकी संगत तुम्हें खुश रखे। बस यह तुम्हारा इलाज और अच्छी जिंदगी का नुस्खा है। यारा जी! मैं बच्चा नहीं हूं। जो उन्होंने कहा वो मैं समझ गया और जो नहीं कहा वो भी अच्छी तरह समझ गया। यह सलाह तो मुझे कोई तबला बजाने वाला भी मुफ्त दे सकता था। इसके लिए एफ.ओ.सी.जी. और एफ.आर.सी.एस. होने और जगह-बेजगह टोंटी लगा कर देखने की जुरूरत नहीं।

मैंने लंडी कोतल से लांडी तक निगाह डाली। आपसे जियादा मुहब्बत करने वाला, खुद खुश रहने और दूसरों का मन प्रसन्न करने वाला कोई बंदा नजर नहीं आया सो मैं टिकट लेकर आपके पास आ गया। बाकी जो कुछ हुआ वो तबीयत का जंग उतारने का बहाना था। जितने दिन आपके साथ गुजरे, उतने दिनों मेरी जिंदगी बढ़ गयी। खुदा आपको इसी तरह खुश और मुझ पर मेहरबान रखे। आपको मेरी वज्ह से तकलीफ हुई उसकी माफी मांगना लखनवी तकल्लुफ में गिना जायेगा जो मुझ जैसे जाहिल के बस का काम नहीं। मगर दोस्ती में तो यही कुछ होता है - मेरा दादा कहता कि फारसी में एक कहावत है - या तो हाथी-बानों से दोस्ती मत करो और अगर कर ली है तो फिर अपना मकान ऐसा बनाओ जो हाथियों की टक्कर सह सके।

एक ट्रक वाले के हाथ मरदान का दस सेर ताजा गुड़ जिसमें नयी फस्ल के अखरोट डले हुए हैं, सोवात के शहद के तीन छत्ते कुदरती हालत में, अस्ली मोम और मुर्दा मक्खियों समेत और एक सुराहीदार गर्दन वाली टोकरी में बीस फस्ली बटेरें भेज रहा हूं। युसूफी साहब के लिए उनका पसंदीदा पेशावर केंट वाली दुकान का सेर भर ताजा पनीर और पिंडी का हलवा एक नाजुक-सी हवादार टोकरी में है। चलते समय उन्होंने गंधार आर्ट के दो-तीन नमूनों की फरमाइश की थी। कुछ तो रवानगी की अफरा-तफरी, फिर मैं जाहिल आदमी। यहां अपने ही जैसे दो-तीन दोस्तों से पूछा। उन्होंने मुझे गंधार मोटरपार्ट के दफ्तर भेज दिया। वो बोले हम तो ट्रक और उसके पार्ट्स बेचते हैं। तुम्हें किसका नमूना चाहिये। सोमवार को एक ठेकेदार का मुंशी चार काले पत्थर की मूर्तियां खुदाई से चादर में छुपा कर लाया था मगर एक जानने वाले ने जो आदमकद से भी बड़ी मूर्तियां स्मग्ल करके अमेरिका भेजता रहता है, मुझे बताया कि यह बुद्ध की नहीं है बल्कि उसके चपड़कनात चेले-चांटों की हैं। पश्तों में उसके चेलों के लिए बहुत बुरा लफ्ज है। बुद्ध इतना तगड़ा कभी था ही नहीं। सुना है, निर्वाण के बाद बुद्ध की सेहत और पसलियां युसूफी साहब जैसी हो गयी थीं। बहरहाल, तलाश जारी है। बाद सलाम उनसे अर्ज कीजिये कि इससे तो बेहतर होगा कि दीवार पर काबुली वाला का फोटो टांग लें।

'इस बीमारी का खाना खराब हो। उम्र का पैमाना पूरा होने से पहले ही छलका जा रहा है। खत लिखवाने में भी सांस उखड़ जाती है। डर के मारे ठीक से खांस भी नहीं सकता। आपकी भाभी रोने लगती हैं, मुझसे छुप कर थोड़ी-थोड़ी देर के बाद गरज-चमक के साथ रोती हैं। बहुत समझाता हूं कि बख्तावर! जब तक बिल्कुल बेहोश न हो जाऊं, मैं बीमारी से हार मानने वाला आदमी नहीं। बिशारत भाई! ऐसे आदमी के लिए पश्तो में बहुत बुरा शब्द है। पिछले हफ्ते से यूनिवर्सिटी रोड पर एक नया मकान बनवाना शुरू कर दिया है। दालान में पेशावर के पचास या कराची के सौ शायरों के पाल्थी मार कर बैठने की गुंजाइश होगी।

बाकी सब खैरियत है। खलीफा सलाम अर्ज करता है। मैंने उसे बैंक में चपरासी लगवा दिया है। रोज शाम को और छुट्टी के दिन मुश्की वही चलाता है। बहुत चंगा है, मुश्की को पश्तो में रवानी से गाली देने लगा है, मगर अभी पश्तो की तमीज पैदा नहीं हुई। सुनने वाले ठट्ठे लगाते हैं। कल ही मैंने उसे गुर बताया है कि जिसे तू हमेशा पुल्लिंग समझता आया, अब उसे स्त्रीलिंग कर दे, फिर तुझे पश्तो आ जायेगी। सबको सलाम, दुआ, प्यार और डांट-डपट।

आपका चाहने वाला काबुली वाला।

एक बात और यहां आ कर पुराना हिसाब देखा तो पता चला कि अभी कुछ लेना-देना बाकी है। मुझे सफर मना है। आप किसी तरह फुर्सत निकाल कर यहां जल्दी आ जायें तो हिसाब पूरा हो जाये और आपके काबुली वाला को थोड़ी-सी जिंदगी और उधार मिल जाये।

दूसरे, अब नये मकान और दालान का इंतजार कौन करे। मैंने आपके लिए फिलहाल एक बेछेद चांदनी और पांच शायरों का इंतजाम कर लिया है। वस्सलाम।

बिशारत पहली ट्रेन से पेशावर रवाना हो गये।


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