डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कविता

सान्निध्य की सीमा
अन्ना अख्मातोवा

अनुवाद - वरयाम सिंह


(नि . व. ने. के लिए)

सान्निध्‍य की भी होती है अपनी पावन सीमाएँ
जिनका अतिक्रमण न प्रेम कर सकता है न वासनाएँ
भले ही एक हो जाएँ होठ भयानक खामोशी में
और प्‍यार में हो जाएँ हृदय के टुकड़े-टुकड़े।

अशक्‍त पड़ जाती है मित्रता
अभिजात और अग्निमय सुखों के वर्ष
जब मन हो जाता है मुक्‍त और पराया
प्रेम की धीमी थकान के लिए।

दीवाने हैं वे जिनका लक्ष्‍य होता है वह
पा लेने वाले हो जाते हैं पराजित अवसाद से।
अब तो तुम समझ गए होंगे
क्‍यों नहीं धड़कता है तुम्‍हारे हाथों के नीचे मेरा हृदय।

 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में अन्ना अख्मातोवा की रचनाएँ