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कविता

न जापान की छायाएँ
वेलिमीर ख्लेब्निकोव

अनुवाद - वरयाम सिंह


न जापान की नाजुक छायाएँ
न तुम, ओ मधुभाषी भारत-पुत्रियों,
तुम्‍हारे बोल इतने शोकाकुल नहीं हो सकते
जितने कि इस अंतिम साँझ के बोल।

मृत्‍यु से पहले पुनः प्रकट होता है जीवन,
इतनी तीव्रता और किसी दूसरे रूप में !
और यही नियम सुतल है
सफलताओं और मृत्‍यु के नृत्‍य का।

 


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