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बाल साहित्य

नाना का घर - जादू-मंतर
अरशद खान


''कल मैं नाना के घर गया था। पूछो कैसे?''

शिब्बू अपने साथियों को इकट्ठा करके मौज-मस्ती कर रहा था।

''बस से।''

''उहूँ।''

''पापा के स्कूटर से।''

''उहूँ।''

''अपनी सायकिल से?''

''उहूँ।''

''तो फिर...?''

''पैदल।''

''पैदल!'' साथियों ने कंधे उचका कर एक-दूसरे की तरफ आश्चर्य से देखा।

''हाँ, और जब मैं गाँव पहुँचा तो नाना खेत पर थे। मैं सीधा वहीं जा पहुँचा। देखा, तो नाना टैक्टर पर दो आलू लदवा कर वापस लौट रहे हैं।''

''सिर्फ दो आलू!''

''पूरी बात तो सुनो। पता है आलू कितने बड़े थे? ए... इतने-इतने।'' शिब्बू ने दोनों हाथ फैला दिए, ''इससे भी बड़े।''

''इससे भी बड़े?''

''और नहीं तो क्या। नाना के गाँव में आलू इतने ही बड़े होते हैं।''

साथियों ने फिर कंधे उचकाए, ''अच्छा, फिर...?''

''फिर हम लोग ट्रैक्टर पर बैठ कर घर आ गए। नाना मजदूरों का हिसाब करने लगे और मुझे बैठक में भेज दिया। अह...हा बैठक क्या थी, पूरी जन्नत थी। चारों तरफ फलदार पेड़; डालों पर चहचहाते सतरंगे पक्षी; शीशे जैसा साफ सरोवर; तैरते हंस; खिले हुए कमल।''

''इतना सब एक कमरे में...?'' साथी चौंक गए।

''बस, इतने में ही चौंक गए?'' शिब्बू हँसा, ''अभी तो पूरी कहानी पड़ी है।''

लंबी साँस ले कर शिब्बू फिर शुरू हुआ, ''उस कमरे में ज्यादा देर तक नहीं बैठा। मुझे तो गोलू-टोलू से मिलने की जल्दी थी। गोलू गोल-मटोल गुब्बारे-सा और टोलू लंबे ताड़-सा। माली बाबा से पूछा तो पता चला दोनों अगले कमरे में लकड़ियाँ लाने गए हैं।''

आश्चर्य का स्थान अब जिज्ञासा ने ले लिया था। सारे साथी खामोशी से शिब्बू की बातें सुन रहे थे।

''मैं झटपट उस कमरे में जा पहुँचा। अंदर पहुँचा तो घना जंगल। घुप्प अंधेरा। कीड़े-पतंगों की तरह-तरह की आवाजें - चीं-चीं...चर्र-चर्र। जानवरों की गुर्राहट। मुझे तो डर लगने लगा। जोर से पुकारा, 'गोलू-टोलू!' आवाज सुन कर पक्षी फड़फड़ा कर उड़े। सामने की झाड़ी में 'सर्र' से कुछ भागा। मैं तो और घबराया। इस बार ज्यादा जोर से पुकारा। अबकी दूर कहीं से आवाज आई, 'हम यहाँ हैं। बरगद के पास।' बरगद का पेड़ वहाँ से करीब दो किलोमीटर दूर था। मैं सोच में पड़ गया कि वहाँ कैसे पहुँचा जाए। घना जंगल, अनजान रास्ता, जंगली जानवरों का खतरा। तभी उस झुटपुटे में छोटे कद का एक घोड़ा दिखाई दिया। मुझे मन माँगी मुराद मिल गई। झटपट सवार हुआ और चल पड़ा। इतनी तेज रफ्तार कि पूछो मत। मिनट भर में गोलू-टोलू के पास। मुझे देख कर वे बोले, "बड़े बहादुर हो तुम!"

मैंने कहा, "इसमें बहादुरी की कौन-सी बात है?"

वे हँस कर बोले, "शेर की सवारी जो करके आए हो।"

"बाप रे, मेरी तो जान ही निकल गई। जिसे मैं घोड़ा समझ रहा था, वह तो शेर निकला। मेरी हालत पतली हो गई। टाँगें थरथर काँपने लगीं।''

शिब्बू ने डरने और काँपने का ऐसा अभिनय किया कि सभी साथी खिलखिला पड़े।

''मैंने गोलू-टोलू से कहा, "यार, तुम लोग यहाँ क्यों आते हो? सूखी लकड़ियाँ तो किनारे पर भी मिल सकती हैं।" वे हँस कर बोले, "लकड़ियाँ लेने कौन आता है। यह तो एक बहाना है। हम तो यहाँ अंगूर खाने आते हैं।" बस, टोलू चढ़ गया एक पेड़ पर। एक बड़ा-सा अंगूर तोड़ कर नीचे आया और डालों में दबा कर निचोड़ा तो रस के धारे बह चले। हम तीनों ने भर पेट रस पिया और बचा-खुचा रस जेबों में डाल कर चल पड़े।''

साथी खामोश थे। बस, उनकी पुतलियाँ आश्चर्य से फैल रही थीं।

''अब हम तीनों मामा-मामी के पास उनके कमरे में पहुँचे। उस समय वे चाय पी रहे थे। हमें देख कर बोले, 'अरे, तुम्हारी जेबों में क्या है?' हमने जेबों पर हाथ मारा तो भनभना कर सैकड़ों मक्खियाँ ऐसे उड़ पड़ीं जैसे काले बादल छा गए हों। खूब डाँट पड़ी। खैर, जब हम नहा-धो कर वापस आए तो मामी ने खाना लगा दिया था। खा-पी कर हमने अपनी चारपाइयाँ एक पेड़ के नीचे डाल दीं। वह पेड़ जानते हो किस चीज का था?'' शिब्बू ने साथियों की ओर देखा।

साथी हथेलियों पर ठोड़ी टिकाए चुपचाप बैठे रहे। न 'हाँ' बोले, न 'ना' कहा।

शिब्बू ने खुद ही उत्तर दिया, ''सरसों का। इतना बड़ा, इतना बड़ा कि उसकी चोटी आसमान को छू रही थी। टोलू ने बताया, 'हमने यहीं से एफिल टावर, स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी और चीन की दीवार देखी है।' हम बातें कर ही रहे थे कि मामी वहाँ आ गईं और एक कमरे की ओर इशारा करते हुए बोलीं, 'तुम लोग उस कमरे की तरफ बिल्कुल मत जाना।' मामी बता कर चली गईं। मेरे मन में हलचल मच गई। मैं देखना चाहता था कि उस कमरे में क्या है। मेरी जिद पर गोलू-टोलू भी तैयार हो गए। हम लोग चुपचाप कमरे में घुस गए। वहाँ का दृश्य बड़ा अजीब था। अजब तरह के पेड़। अनोखे पक्षी। तिरछी-बेडौल चट्टानें। वहाँ का वतावरण देख कर सिहरन-सी होती थी। तभी एक बड़ा-सा बादल का टुकड़ा दिखाई दिया। गोलू चिल्लाया, 'फौरन भाग कर छिप जाओ।' हम लोग दौड़ कर एक चट्टान के पीछे छिप गए। पास आया तो पता चला वह बादल का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक बड़ी-सी पक्षी है जो आदमी तक को उठा ले जा सकता है। हम लोग डर के मारे छिपे रहे। अब हमारी समझ में आया कि मामी ने यहाँ आने से क्यों मना किया था। पक्षी के जाने के बाद ज्यों ही चलने को तैयार हुए कि लगा हम सरक रहे हैं। देखा तो आस-पास की चट्टानें, पेड़-पौधे, घस-फूस सब चल रही हैं। डर के मारे पसीना छूटने लगा। तभी गोलू ने कहा, "दादा बताते हैं यहाँ एक बड़ा अजगर रहता है जो सालों बाद शिकार की तलाश में निकलता है। इस बीच उसके शरीर पर बड़े-बड़े पेड़ उग आते हैं; बड़ी-बड़ी चट्टानें जम जाती हैं। शिकार पाने के बाद वह फिर सो जाता है।"

"हम लोग घबरा गए कि अगर कहीं उसने हमें देख लिया, तो खैर नहीं। हम फौरन उसकी पूँछ की ओर भागे। भागते रहे, भागते रहे। एक घंटे, दो घंटे। न जाने कितनी देर लगातार दौड़ते रहे। आखिरकार एक घास के मैदान में कूद कर हमने अपनी जान बचाई।"

''हम लोग थक कर चूर हो गए थे। घास में पड़े-पड़े झपकी आ गई। अचानक लगा कि धरती काँप रही है। पेड़ थरथराने लगे। फल टूट कर 'टप्प-टप्प' गिरने लगे। चिड़ियों के घोसले जमीन पर आ गए। गोलू चिल्लाया, 'भागो डायनासोर आ गया।' गोलू की आवाज सुन कर मैं भाग खड़ा हुआ। भागता रहा, भागता रहा। गोलू-टोलू जाने कहाँ रह गए। मैं वहाँ से जो भागा तो सीधे यहाँ आ कर रुका।''

कह कर शिब्बू सचमुच हाँफने लगा।

''तुम्हारे नाना का घर तो बहुत मजेदार है। हमें भी घुमाने ले चलोगे?'' साथियों ने पूछा।

''हाँ-हाँ, क्यों नहीं आज ही चलते हैं।''

''आज ही! वह कैसे?''

''रात को सपने में, और कैसे।'' कह कर शिब्बू हँस पड़ा।

उसकी हँसी में साथी भी शामिल हो गए।


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